रविवार, 10 दिसंबर 2017

👉 उपयोगिता की समझ

🔶 एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था। उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था।

🔷 कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था।

🔶 वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था। मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी।

🔷 वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा। परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था। ऐसी स्थिति देखकर बादशाह भी गुस्से में था। पर, कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।

🔶 नाव में बैठे दार्शनिक से रहा नहीं गया। वह बादशाह के पास गया और बोला - "सरकार! अगर आप इजाजत दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ।"

🔷 बादशाह ने तत्काल अनुमति दे दी। दार्शनिक ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया।

🔶 कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा। उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे। कुछ देर बाद दार्शनिक ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया।

🔷 वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया। नाव के यात्रियों के साथ बादशाह को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ।

🔶 बादशाह ने दार्शनिक से पूछा - "यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था, अब देखो कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है?"

🔷 दार्शनिक बोला - "खुद तकलीफ का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है। इस कुत्ते को जब मैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी ।"

👉 आज का सद्चिंतन 11 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Dec 2017


👉 अन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दोष

🔷 सम्पत्ति मात्र एक सीमित मात्रा में अपने पास रखी जा सकती है। उससे अधिक रखने के लिए गोदाम अपने पास है ही नहीं। फिर तृष्णाजन्य उपार्जन से संकट यह खड़ा हो जाता है कि जो चाहा गया है, यदि उतना मिल भी जाय, तो वह संचित न रखा जा सकेगा। चीज चाही हुई हो, प्रिय भी हो और मूल्यवान भी, पर उसे रखने का प्रबन्ध किये बिना, उसे जहाँ- तहाँ कैसे फेंक दिया जाय? स्थान बनाये बिना संग्रह कर लेना मुसीबत मोल लेने के समान है। पेट में चार रोटी का स्थान है।      

🔶 मिष्ठान्न सामने अधिक मात्रा में उपस्थित हों और उन्हें छोड़ देने का मन न हो, रखने की जगह नहीं, ऐसी दशा में खाये जाने पर पेट में दर्द उठेगा ही। बाहर कहीं रखेंगे, तो चोरी होने या सड़ जाने का संकट खड़ा होगा। यह है सांसारिक मुसीबतों की जड़। साधनों की कमी नहीं, पचाने की क्षमता नहीं। ऐसी दशा में तृष्णा अपनी ही होते हुए भी अपने लिए ही संकट उत्पन्न करती है।

🔷 संसार में असीम वैभव भरा पड़ा है, पर वह पात्रता के अनुरूप ही उपलब्ध है। भगवान सुख इतना देता है, जितना हजम हो सके। बिना पचे भी दर्द होता है। यही है तृष्णाजन्य दुःख अन्यथा इस वैभव से भरे संसार में हमें अकारण दुःख क्यों उठाना पड़े?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 3)

🔶 ऐसे व्यक्तियों को दो श्रेणी में विभक्त कर सकते हैं—
     

🔷 (1) विचारों से दुःखी— ऐसे लोग 90 प्रतिशत होते हैं, जिन्हें केवल मानसिक दुःख होता है। भविष्य के प्रति गलत निर्णय कर लेने से लोग अकारण ही दुःखी बने रहते हैं। पुत्री की शादी की चिन्ता, तरक्की न मिलने का दुःख, चोरों का भय, हानि का आशा का, मित्रों से विश्वास-घात की आशंका, गृह-नक्षत्र द्वारा हानि पहुंचने का डर पाये जाते हैं। ऐसे दुःखों का कारण वस्तुतः इतना बड़ा नहीं होता जितना कि वे उद्विग्न और संतप्त रहते हैं।

🔶 (2) शारीरिक दुःखी— इनके दुःख को दुःख कहा जा सकता है। शरीर रोगी है तो सुख कहां मिलेगा? पाचन-क्रिया खराब हो रही हो तो बहु स्वाद युक्त भोजन भी फीका जान पड़ेगा। ऐसे लोगों को एक हद तक वास्तविक दुःखी मान सकते हैं।

🔷 किन्तु यदि भावनाओं में परिष्कार किया जा सके तो अरुचिकर कारणों को भी सुख में बदला जा सकता है। तपस्वी लोग घर के सुखों को त्याग कर जंगल का जीवन अधिक व्यतीत करते हैं। देखने में वनवासी जीवन नितान्त अभावपूर्ण लगता है। आहार, विहार और आमोद-प्रमोद की जो सुविधा गृहस्थ जीवन में सम्भव है वह भला वन के जीवन में कहां मिलेगी? फिर भी एकान्त वासियों को आनन्द-पूर्ण जीवन बिताते देखा जाता है, इसका कारण भावनाओं का परिष्कार ही है।

🔶 स्वार्थी मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति को सुख मानते हैं किन्तु परमार्थी व्यक्तियों को परोपकार में सुख मिलता है। परोपकार देखने में घाटे का सौदा है। बाह्य दृष्टि से माप करें तो दूसरों के हित के लिये सदैव ही अपने हितों को होम देना होता है। समय, श्रम और कभी-कभी धन भी लगाना पड़ता है, किन्तु परोपकारी को अपनी उच्च भावनाओं में ही अतीव सुख प्राप्त होता है। देखने वाला उसे बेवकूफ मान सकता है किन्तु उसके आन्तरिक सुख को वह स्वयं ही जान सकता है। भावनाओं का सुख ही सच्चा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.27

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

👉 Solution Of Today’s Problems

🔶 Every body is worried today on account of internal conflict. A person has adequate wealth & means of livelihood, even then, he appears to be unhappy & worried. Another person looks lost inspite of being highly educated & well placed. Businessmen, scholars, leaders, religious persons & highly placed officers appear to be worried only for a solution of this problem. Most people complain of conflict, unhappiness, anguish & distress. Majority of people ‘both small & great, are worried only on account’ of these problems & make various efforts to get rid of them, even then, no solution is found.

🔷 In fact, the solution of these problems of life does not lie in the world of external achievements. The solution lies within the man.

🔶 The pride of prosperity, beauty, scholarship, intelligence, post, etc. is the boundary wall which has kept us apart from the realities of life. Pride, egoism may be of any quality, beauty or article, keeps man distant from real happiness & spiritual peace. How can he, whose mind & heart are caught in the siege of this vanity, remain contented.

🔷 When the rich will give up pride of wealth & will link their heart with poverty; when the scholars will sit in the line of ordinary being; when high officers will start worshipping common man, their egoism will vanish easily by itself & they will be able to find the solution of this important problem of life. Real happiness of life is only possible by making the heart free & comprehensive.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 2)

🔶 यह ऐसा समय है जिसमें किसी को किसी पर विश्वास नहीं रह गया है। आतंक और आशंकाओं से वातावरण चारों ओर घिरा हुआ है। सड़क पर जब आप निकलते हैं तो मालूम नहीं कि आपके साथ पड़ोस में चलने वाला आपके चाकू भोंककर कब आपकी सम्पत्ति छीन लेगा, इसका क्या विश्वास है? इनसान का चाल-चलन, इनसान का विचार इतना गन्दा-घटिया हो गया है कि यह स्थिति अगर बनी रही तो कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा, न भाई-भाई पर विश्वास करेगा, न स्त्री पुरुष पर विश्वास करेगी, न पुरुष स्त्री पर विश्वास करेगा, ऐसा गन्दा, ऐसा वाहियात समय है यह।
                 
🔷 यह समय इसलिए भी घटिया और वाहियात है कि नेचर हमसे आप सबसे नाराज हो गई है। जब उसकी मौज आती है तो अन्धाधुन्ध पानी बरसा देती है और जब मूड आता है तो सूखा नजर आता है। कहीं मौसम का ठिकाना नहीं कि मौसम पर पानी बरसेगा कि नहीं, ठण्ड के समय ठण्ड ही पड़ेगी कि गर्मी पड़ेगी, कोई नहीं कह सकता। भूकम्प कब आ जाए, कोई नहीं कह सकता? बाढ़ कब आ जाए, कोई ठिकाना नहीं? प्रकृति हम सबसे बिल्कुल नाराज हो गई है, इसलिए उसने काम करना बन्द कर दिया है। यह ऐसा भयंकर समय है।
    
🔶 ऐसे भयंकर समय में आपके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या आपके कोई कर्तव्य नहीं है? क्या आपके अन्दर भावनाएँ नहीं हैं? क्या आपका हृदय पत्थर और लोहे का हो गया है? नहीं, मेरा ख्याल है कि सब आदमियों का ऐसा नहीं हुआ होगा। ज्यादातर लोगों का तो ऐसा ही हुआ है कि वे घटते-घटते जानवर की तरीके से बनते चले जा रहे हैं। जवान आदमी जब ज्यादा बुड्ढा हो जाता है तो कमर झुकने लगती है, आँखें नीची हो जाती हैं, लाठी टेककर चलता है। इनसान की जवानी चली जाती है तो वह बौना हो जाता है, घटिया हो जाता है, कमर झुक जाती है, उसका आसमान की ओर देखने का न मन होता है, न उसकी बनावट ही ऐसी रह जाती है कि वह ऊपर देखे। अधिकांश आदमी आज ऐसे हो गए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 तड़फ

🔶 एक बार एक छोटा सा बच्चा अपने बेहद अमीर पिता की ऊँगली थामे नदी के किनारे सैर कर रहा था। नदी का पानी धीरे धीरे बह रहा था। बच्चे की नज़रें ढूंढ रही थीं नदी में रहने वाली मछलियों को, बच्चा कभी आगे जाता तो कभी पीछे आता। मछलियों से उसका सामना नहीं हो पता।

🔷 अचानक थोड़ी दूर चलकर उस बच्चे को नदी के किनारे एक मछली मिल ही गयी, मछली गलती से नदी के किनारे पे चली आयी थी और बुरी तरह से तड़फ रही थी। मछली की तड़फ बच्चे से देखी नही गयी वो फौरन अपने पापा से बोला - पापा मछली शायद भूखी होगी, चलो इसे फाइव स्टार होटल में खाना खिलाते हैं पापा मुस्कराये, बच्चा परेशान हो गया। वो बोला- पापा मछली को शायद नींद आ रही होगी, चलो इसे ले जाकर सोने के पलंग पर सुलाते हैं।

🔶 यह सुनकर पापा ने कहा नहीं बेटे मछली को सोना-चांदी, रुपया-पैसा खुश नही कर सकते, यह तो तभी खुश होगी जब इसे वापिस नदी में डाल देंगे और बच्चे ने उसे उठाकर नदी में डाल दिया, मछली झट से खुश होकर नदी में तैरने लगी।

🔷 ठीक इसी मछली की तरह हम और आप भी तड़फ रहे हैं इस भौतिक जगत में भगवान से दूर होकर रुपया-पैसा, धन-दौलत, बड़ी-बड़ी उपलब्धियां बड़े-बड़े सम्मान हमारी तड़फ, हमारे दुखों को कम नहीं कर पाते, थोड़ी समय के लिए ख़ुशी जरूर मिलती है, इन्हें पाकर लेकिन फिर तड़फ और बेचैनी अपने कब्जे में ले लेती है हमें।

🔶 हम भी भगवान के अंश होकर भगवान से बहुत दूर हैं और बहुत बहुत तड़फ रहे हैं भगवान की कृपा से जब कोई दिव्य आत्मा आकर हमारा हाथ भगवान के हाथ में थमा देता है तब हमें हमारी बेचैनी से छुटकारा मिल सकता है वरना ये दुःख, तकलीफ हमेशा यूँ ही जारी रहेंगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 Dec 2017


👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 2)

🔶 गृहस्थी की सुघड़ व्यवस्था बच्चों का पालन-पोषण, श्रम-उद्योग और क्रियाशीलता का आधार सूत्र मोह होता है। इससे यह बात समझ में आती है कि अपनी मर्यादा के अन्दर संसार की कोई भी वस्तु बुरी नहीं है। सुख प्राप्ति की आकांक्षा भी इसी प्रकार बुरी नहीं। यह स्वाभाविक एवं उचित भी है कि लोग सुखों की कामना करते हैं। जीवन के विभिन्न व्यापार इसी से तो चलते हैं।
   
🔷 सुख की आकांक्षा न हो तो कौन परिश्रम करना चाहेगा? कड़ी धूप में अपनी चमड़ी कौन सुखाना चाहेगा? आठ घण्टे ड्यूटी बजाने में कौन-सा आनन्द रखा है? सुख की आकांक्षा के पीछे संसार की एक बहुत बड़ी व्यवस्था सन्निहित है, किन्तु यह है तभी तक जब तक सुख की प्राप्ति के साधनों में व्यत्तक्रम उत्पन्न न हो। इसे साधन न मानें, आसक्ति न हो। शक्ति के रूप में ही सुख का महत्व है।

🔶 ‘सुख’ एक दृष्टिकोण है—जो लोगों की रुचि के अनुरूप होता है। वस्तुतः संसार की किसी भी वस्तु में न सुख है, न दुःख। जिसके सन्तान नहीं होती है, वह इसके लिए बड़ा व्यग्र, दुःखी तथा बेचैन रहता है, उसकी दृष्टि में पुत्र-प्राप्ति का सुख ही संसार का बड़ा भारी सुख होगा। पर जिसके कई सन्तानें पहले ही हैं, घर में धन का अभाव है, उन्हें सन्तान का होना दुर्भाग्य जान पड़ता है। सुख का प्रधान साधन और आकांक्षा की प्रमुख वस्तु ऐसे लोगों के लिए धन होगी। धन और पुत्र दोनों अवस्थाओं में एक जैसे हैं। किन्तु भिन्न दृष्टिकोणों के कारण एक व्यक्ति धन कसे सुख का सार मानता है दूसरे के लिए ‘पुत्र’ सुख है।

🔷 इससे स्पष्ट हो जाता है कि संसार के किसी भी पदार्थ में सुख नहीं। रुचि के अनुकूल सुख का भाव अपने दृष्टिकोण में होता है। लोगों के दुःख का कारण पदार्थ के सुख की आसक्ति ही है। अधिकांश लोग इसी कारण दुःखी रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.26

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

👉 Mental Tension

🔶 Man alone is born crying & lives & dies complaining. Other being have neither worries nor problems in their lives. But man on account of being rational & emotional is influenced by even small thing & manifests his reactions. These reactions are more unfavorable than favorable.

🔷 Someone is worried on account of lack of material happiness & comforts; someone else is worried on account of lack of mental peace. These problems have become even more serious these days. New problems are arising alongwith the development of civilization. Of all the problems created by today’s material civilizations, the main one is mental tension.

🔶 To keep oneself busy is the surest way of keeping free from mental tension alongwith various kinds of problems. Co-ordination between ambitions & capabilities also reduces tension to a great extent. Everybody is desirous of rising higher than his present position & reaching the acme of progress. Freedom from anxiety should be made our aim, but we should not be impatient & bewildered. The aim can be achieved step-by-step.

🔷 It is also necessary  for an individual to have faith in God in order to save himself from bodily ailments produced by tension. Some people may object to the acceptance of God’s existence, but everybody can have faith in himself at least.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
मित्रो !

🔶 जानवर की एक विशेषता यह होती है कि उसे अपने पेट की हमेशा फिक्र बनी रहती है। जब वह जवान होता है तो उसे सन्तान पैदा करने का ख्याल आता है। दो के अलावा वह और कोई काम कर नहीं पाता और इनसान? इनसान देखने में तो जानवरों जैसा ही मालूम होता है, किन्तु उसमें भावनाएँ पाई जाती है। वनमानुष, बन्दर, लंगूर शायद आपने देखे हों, इनसे मिलती-जुलती है आदमी की देह। लेकिन उसकी विशेषता खासतौर से यह है कि उसमें भावनाएँ होती हैं। कहीं अकाल पड़ता है तो आदमी अपने अनाज के कोठों को खाली कर देता है। कहता है हम अकेले जीकर के क्या करेंगे? बाकी लोग भी खाएँ तो क्या हर्ज है? यदि किसी के छप्पर में, मुहल्ले में आग लगे तो वह सबसे पहले दौड़ता है आग बुझाने के लिए। यह क्या है? यह है आदमी की भावनाएँ। दूसरों की सेवा के लिए दौड़ पड़ना, यह इनसानियत की एक ही परीक्षा है। अगर इस परीक्षा में फेल हो जाएँ तो जानना चाहिए कि शक्ल इनसान जैसी भले हो, पर है तो वास्तव में जानवर।
                 
🔷 इस समय जिसमें आप हमारी बात सुन रहे हैं, ऐसा समय है, जिसको सामान्य नहीं कह सकते। इसे असामान्य ही कहा जाएगा। वैसे आपका सूरज सबेरे निकलता है, शाम को अस्त हो जाता है। कुएँ से पानी निकालते हैं, चक्की से आटा पीसते हैं, चौके से खाना खा लेते हैं। समय मामूली-सा मालूम पड़ता है, लेकिन हम और आप विचारपूर्वक अगर इसका अन्दाज लगाना चाहें तो मालूम पड़ेगा कि यह बहुत भयंकर समय में तूफान भले ही न आते हों, आपके ऊपर घनघोर बारिश भले ही न होती हो, लेकिन संसार की निगाह से और जरा लम्बी दृष्टि फेंककर देखेंगे तो आपको यह मालूम पड़ेगा कि यह बहुत ही असाधारण समय है। दस समय में हवा में जहर ही जहर घुला हुआ है। जो साँस आप लेते हैं उससे आपके भीतर जहर चला जा रहा है और आपकी जिन्दगी को रोज कम कर रहा है।
    
🔶 इस भयंकर समय में प्रत्येक आदमी के ऊपर मुसीबत छाई हुई है। थोड़े आदमियों के ऊपर नहीं, बहुत आदमियों के ऊपर, सारे संसार के ऊपर। पानी गन्दा हुआ जा रहा है। विकिरण बढ़ता जा रहा है। इससे बच्चे अपाहिज, लँगड़े-लूले पैदा हो रहे हैं। जनसंख्या की दृष्टि से आदमी किस कदर बढ़ता हुआ चला जा रहा है और खाने के लिए सामान कम पड़ता चला जा रहा है। आपने देखा, सुना? आपकी इतनी उमर हो गई? जिस भाव से आपको आज गेहूँ मिलता है, चावल, घी मिलता है, क्या आपने इससे पहले कभी सुना था? नहीं, कभी नहीं सुना था। यह महँगाई बढ़ रही है। अभी और बढ़ेगी। मुझे घटने की कोई सूरत नजर नहीं आती। वस्तुतः यह मुसीबत का समय है और आदमी पर मुसीबतें बढ़ती ही चली जा रही हैं और बढ़ेंगी अभी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

👉 सबके दिलों में प्रेम

🔶 एक बार गुरु नानक पानीपत गए, जहां शाहशरफ नामक एक प्रसिद्ध सूफी फकीर रहते थे। गुरु नानक से शाहशरफ ने पूछा, 'फकीर होकर आपने गृहस्थों वाले कपड़े क्यों पहन रखे हैं और संन्यासियों की तरह आपने अपना सिर क्यों नही मुंडा रखा है?' नानक ने उत्तर दिया, 'मूंड़ना मन को चाहिए, सिर को नहीं और मिट्टी की तरह नम्र होकर ही मन को मूंड़ा जा सकता है। जो मनुष्य परमेश्वर के दर पर अपने सुख, स्वाद और अहंकार को त्यागकर गिर पड, वह जो भी वस्त्र धारण करे, परमात्मा उसे स्वीकार करता है। दरवेश का चोगा और टोपी यही है कि वह ईश्वरीय ज्ञान को अपनी आत्मा में बसा ले। जो कोई मन जीत ले, सुख-दुख में एक समान रहे और हर समय सहजावस्था में विचरण करे, उसके लिए हर तरह का वेश शोभनीय है।'

🔷 शाहशरफ ने पूछा, 'आप की जाति क्या है, आप का मत क्या है, गुजर कैसे होती है?' इस पर गुरुजी बोले, 'मेरा मत है सत्यमार्ग, मेरी जाति वही है जो अग्नि और वायु की है, जो शत्रु-मित्र को एक समान समझती है। मेरा जीवन वृक्ष और धरती की तरह है। नदी की तरह मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि मुझ पर कोई धूल फेंकता है या फूल और मैं जीवित उसी को समझता हूं, जिसका जीवन चंदन के समान दूसरों के लिए घिसता हुआ संसार में अपनी सुगंध फैला रहा है।

🔶 यह सुन कर शाहशरफ ने कहा- दरवेश कौन है? नानक ने कहा, 'जो जिंदा ही मरे की तरह अविचल रहे। जागते हुए सोता रहे, जान बूझकर अपने आप को लुटाता रहे। जो क्रोध में न आए, अभिमान न करे। न स्वयं दुखी हो, न किसी को दुख दे। जो हमेशा ईश्वर में मग्न रहे और वही सुने जो उसके अंदर से ईश्वर बोलता है और उसी अंतर्यामी परमात्मा को हर व्यक्ति, हर स्थान में देखे। यह सुनकर शाहशरफ काफी प्रसन्न हुए।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 9 Dec 2017


👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 1)

🔶 इस संसार के सभी लोगों को सुख की आकांक्षा होती है। धन, स्वास्थ्य, पद, प्रशंसा की कामना सभी करते हैं और इन्हें सुख का आधार मान कर लोग अपनी-अपनी तरह से इन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न भी करते हैं। तरीके भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सुख प्राप्ति की आकांक्षा सभी की एक जैसी ही होती है। धन—सुख का प्रधान साधन माना जाता है। इसे कमाने और प्राप्त करने के लिए लोग कड़ी मेहनत, उद्योग-धन्धे, खेती, दुकान, नौकरी आदि करते हैं। कई लोग इसके लिए अनैतिक कर्म भी करते हैं। इस साधनों में कितनी ही भिन्नता हो, किन्तु धन कमाने का मूल-उद्देश्य जीवन का सुख प्राप्त करना ही है।
   
🔷 यह आकांक्षा बुरी नहीं, आत्म-विकास में इससे सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु यह तभी संभव है, जब सुख प्राप्ति की भावना का व्यतिक्रमण न हो। संसार में जो कुछ भी परमात्मा ने बनाया है, उसका उचित रीति से उपभोग करें, तो यहां की कोई भी वस्तु मानवीय-विकास और आत्मिक प्रगति में बाधा उत्पन्न न करेगी। कामेच्छा आध्यात्मिक विकास के मार्ग में प्रमुख शत्रु मानी गई है। किन्तु इसका एक विशिष्ट महत्व भी है। काम की चेष्टा मनुष्य में न रही होती तो सृष्टि संचालन का क्रम कहां से चलता? राम, कृष्ण, गौतम, गान्धी, तिलक, मालवीय आदि महापुरुष कहां से आते? जीवन संचार का क्रम इसी भांति आगे भी चलने देने की दृष्टि से कामोपभोग बुरी वस्तु नहीं कही जा सकती। बुराई तो तब उत्पन्न होती है, जब केवल वासना पूर्ति और क्षणिक सुख की आकांक्षा से अपने शरीर का सार-तत्व अनुपयुक्त मात्रा में निचोड़ते रहते हैं।

🔶 क्रोध को ही लीजिए—यह न हो तो संग्राम में लड़ने वाले जवान दुश्मनों का सफाया कैसे करें? गुण्डे बदमाश आततायी व्यक्तियों पर क्रोध आये, उन्हें दण्ड दिया जाय तो यह बुरी बात नहीं। भगवान् राम ने रावण पर, कृष्ण ने कौरवों पर क्रोध किया। सत्य और संस्कृति की रक्षा के लिए क्रोध भी धर्म है। लोभ का भावी-जीवन की आकस्मिक घटनाओं के समय संचित द्रव्य के उपयोग का महत्व है। मोह का तो महत्व और भी अधिक है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.26

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

👉 Upasana, Sadhana & Aradhana

🔶 Three stages have been ordained for God realization- they are Upasana, Sadhana & Aradhana. Generally people take them as synonymous but they mean respectively as follows-

🔷 Upasana- namely seating near. How? By withdrawing one’s consciousness from mundane objects and directing it towards God & communicate immotionally with Him. When this process of communication starts, man beging to acquire Divine power.

🔶 Sadhana- It means moulding one-self according to divine discipling, to own, awaken & augment truthful tendencies, virtues & true efforts with full determination by means of inner inspiration, study, satsang ect. in conformity with bright future.

🔷 Aradhana- This means an effort to serve God through one’s own power. Now the question arises as to how at all man can be capable of serving the Almighty God? He is Formless & Bodyless.  How does He at all require the service of corporeal being? If at all, He requires, it what service can an ordinary being render to Him?

🔶 It is known that this universe is His gross visible form. God pervades every corner of this universe. An effort to make this beautiful orchard of his still more beautiful is true service to Him?

🔷 Upasana gives strangth to man, Sadhana develops this strength and Aradhana makes it properly useful. One, who follows this process in a prayerful mood, facilitates his path to God realization.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (अन्तिम भाग)

🔶 पिछले दिनों से ही आप लोगों को समझाया जाता रहा है कि भगवान् पूजा-पाठ का भूखा है। उसकी थोड़ी-सी प्रार्थना कर दी जाए, स्तुति कर दी जाए या भोग-प्रसाद जैसी छोटी-छोटी रिश्वतें खिला दी जाएँ तो हमारी मनोकामना पूर्ण करने के लिए वह तैयार रहता है। ये कितनी गन्दी और घृणित भावना थी? युगनिर्माण योजना ने यह प्रयास किया कि हर व्यक्ति को यह बताया जाय कि भगवान् कोई व्यक्ति नहीं है, बल्कि एक समग्र ब्रह्माण्ड ही भगवान् हैं और इस विश्व-ब्रह्माण्ड की पूजा करना और सेवा करना यही भगवान् की वास्तविक सेवा और पूजा है। इसका प्रभाव-परिणाम यह हुआ कि असंख्य व्यक्ति जो पूजा-भजन में ही सारा समय खर्च कर देने के लिए तैयार थे, उन्होंने सेवा को अपना धर्म मानना स्वीकार किया और पूजा-भजन एक सीमित मात्रा में सेवा कार्यों को अपने हाथ में ले लिया।
                 
🔷 धर्ममंच को सेवा-शिक्षा में मोड़ने का यह प्रयास एक बहुत अच्छा और बड़ा उपयोगी प्रयास था। उसने इस देश के नागरिकों में भावनात्मक नवनिर्माण करने की दिशा मे बहुत सफलता पायी। धर्म-क्षेत्र में जो सम्पत्ति लगी हुई है, जो पूँजी लगी हुई है, युगनिर्माण योजना का यह प्रयास है कि इस पूँजी को केवल पंंच-पुजारियों के कार्यों में खर्च न होने दिया जाए, बल्कि ऐसे उपयोगी कार्यों में लगाया जाए, जिससे कि उसे जन कल्याण के प्रयोजनों में प्रयोग किया जा सके। अकेले मथुरा-वृन्दावन में ही कई मन्दिर ऐसे हैं, जिनमें कि एक-एक लाख रुपया मासिक भोग-प्रसाद में खर्च कर दिया जाता है। वैसे मथुरा-वृन्दावन में ५००० मन्दिर हैं। ५००० मन्दिरों की आमदनी और खर्चे का क्या ब्यौरा दिया जाय?
    
🔶 दो मन्दिर एक से ही हैं मथुरा का द्वारकाधीश मन्दिर और वृन्दावन का रंगजी का मन्दिर। दोनों मन्दिर ऐसे हैं जिसमें कि भगवान् के भोग और प्रसाद पर एक-एक लाख रुपया खर्च होता है। (सन 1986 में) एक लाख रुपये के हिसाब से सालभर का खर्च हुआ बारह-बारह लाख रुपया। बारह लाख रुपये में साल में एक बढ़िया विश्वविद्यालय चलाया जा सकता है और उस विश्वविद्यालय के द्वारा ऐसे प्रशिक्षित व्यक्ति तैयार किये जा सकते हैं, स्नातक बनाये जा सकते हैं, जो विश्व की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करने के बाद सारे विश्व में भारत माता का सन्देश और भारतीय संस्कृति का सन्देश पहुँचाने में समर्थ हों। ऐसे कार्यकर्ताओं को तैयार करना इस विश्वविद्यालय के लिए क्या कठिन होगा?

🔷 इन्जीनियर बनाने वाले विश्वविद्यालय अपना काम करते हैं, चिकित्सक डॉक्टर बनाने वाले विश्वविद्यालय अपना काम करते हैं। धर्मप्रचारक और लोकसेवी पैदा करने वाले विश्वविद्यालय कहीं भी नहीं हैं। अगर एक मन्दिर चाहे तो अपनी आमदनी का बारह लाख रुपया साल भर में खर्च कर सकता है और जाने क्या समाज की सेवा कर सकता है? गायत्री तपोभूमि का मासिक व्यय दो हजार रुपया मासिक है। (सन 1986 में) इसका अर्थ हुआ चौबीस हजार साल। कहाँ बारह लाख रुपया सालभर का खर्च एक मन्दिर का, कहाँ चौबीस रुपया? ऐसे एक मन्दिर की आमदनी से गायत्री तपोभूमि जैसी संस्थाएँ ४८ बनाई जा सकती हैं। यही वह आधार है जो नव निर्माण का, युगनिर्माण का संकल्प पूरा कर सकेंगे।
 
आज की बात समाप्त।
ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

समाज के लिए एक मिसाल........

यूपी की IAS प्रीति यादव ने IAS दिलीप यादव से कोर्ट में जिस सादगी से शादी की वह चर्चा का विषय बन गई है। यह शादी खंडवा के कलेक्टोरेट में हुई जिसे खंडवा कलेक्टर अभिषेक सिंह ने संपन्न करवाया।

प्रीति यादव मूलत: UP की हैं और अभी MP के खंडवा में पदस्थ हैं। वहीं दिलीप जयपुर के रहने वाले हैं और अभी नागालैंड में पदस्थ हैं।

प्रीति से शादी करने के लिए दिलीप खुद खंडवा आये और उन्हें वरमाला पहनाई। दोनों ने कहा कि हमने इसलिए ऐसी शादी कि ताकि लोगों को बता सकें कि कम खर्च में सादगी से शादी हो सकती है, आप उसमें पैसा न बहाएं। जितना अपनी हैसियत में हो खर्च करें वरना कर्ज आदि न लें। समाज में दहेज़ प्रथा जैसी दूषित बिमारी को दूर भगाये।

आप दोनों को कोटि-कोटि बधाई व शुभकामनाएं

👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (अन्तिम भाग)

🔶 यदि आपको ऐसा स्वर्ग वांछित तथा अपेक्षित है, तो अपने आत्म-भाव का विस्तार कर अनुकूल तथा प्रियतापूर्ण परिस्थितियां प्राप्त कर लीजिये। आज से ही अपने-पराये की संकीर्णता त्याग दीजिये। जन-जन को आत्मीयता का अमृत और प्रेम का प्रसाद बांटने लगिये। अपने पड़ौसियों को अपना परिजन, दूसरे के बच्चों को अपना बच्चा और आगे बढ़कर जीव-मात्र को अपना आत्मीय समझिये और वैसा ही व्यवहार करिये। उनके लिये उसी प्रकार का त्याग और वैसी ही सेवा करने में तत्पर रहिये, जैसी कि आप अपने प्रिय एवं परिजनों के लिये करने को तैयार रहते हैं। दूसरों के दुःख से उसी प्रकार दुःखी और सुख से उसी प्रकार सुखी होइये, जिस प्रकार अपने प्रिय एवं परिजनों के लिये होते हैं। और तब देखिये कि आप वह आनन्द और वह सन्तोष पाते हैं या नहीं, जिसकी कल्पना किसी लोकतांत्रिक स्वर्ग में की जाती है।
   
🔷 शुद्ध और निर्विकार बात तो यह है कि अपनी दी हुई आत्मीयता के बदले में प्रेम अथवा प्रशंसा की कामना न की जाय और सारा सद्व्यवहार केवल अपनी ओर से एकाकी ही करते रहा जाय। इस निस्वार्थ-भाव में जो आनन्द और जो सन्तोष है, वह तो स्वर्गीय आनन्द और सन्तोष से भी बढ़कर है। तथापि आत्मीयता के बदले में आत्मीयता मिलना स्वाभाविक है। जो जिसको प्रेम देता है, वह उससे प्रेम पाता भी है। जो जिसे अपना मानता है, जैसा व्यवहार करता है, वैसा ही अपनत्व और व्यवहार पाता भी है।

🔶 जब जन-जन को निस्वार्थ-भाव से आत्मीय मानकर तदनुसार व्यवहार करेंगे और दूसरों के आत्मीय बनकर तदनुसार व्यवहार पायेंगे, तो ऐसे किसी सुख-सन्तोष से वंचित नहीं रह सकते हैं, जिसकी कल्पना लोकतांत्रिक स्वर्ग में की जा सकती है। आत्म-निर्मित पृथ्वी का यह स्वर्ग अधिक सत्य, अधिक सरल और अधिक महत्त्वपूर्ण है। यदि आपके इस आध्यात्मिक उपाय से पृथ्वी पर अपना स्वर्ग निर्माण कर लिया, तो निश्चय मानिये इसके उपलक्ष अथवा प्रतिफल में आप उस स्वर्ग को भी प्राप्त कर लेंगे, जिसका वर्णन मन मोह लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 8
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 When a Saint Led an Army

🔶 This story is about self confidence attracting God's grace. Once upon a time, the king of Taxshila was attacked by a powerful enemy. Seeing the huge army of the opponent the commander of Taxshila's army lost his confidence and told the king, "O King, the enemy's army is huge and well armed. It is better to surrender without a fight." Hearing this, the king became very sad and worried. A saint of Taxshila came to know about this situation. He approached the king and said firmly, "Let the commander of the army be immediately removed, I will myself lead the army in this battle." Now, the king was in a dilemma for a while, but considering that an honorable fight is better than surrender, he finally gave his consent.

🔷 The saint took charge of the army and marched ahead. There was an old temple on their way. Saint said to the soldiers, let us visit the temple and ask God about the outcome of this battle. They went in and the saint tossed a coin, saying, saying, "If it is a tail the victory shall be ours!" And tail it was! Knowing that they had the Divine approval the soldiers fought valiantly with full confidence and won.

🔶Everyone said this is the result of the blessings from the temple's God. But, the saint smiled mysteriously. He showed the coin he had tossed to them. It had tail mark on both the sides. The saint said, "The victory is the result of your own self confidence and valor. God helps those who help themselves!"

📖 From Pragya Puran

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 6)

🔶 धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों समानान्तर हैं। अगर यह राजसत्ता चाहे तो लोगों के मानसिक स्तर को ऊँचा उठा सकती है और लोगों को दिशाएँ दे सकती हैं, लोगों को क्रोध से रोक सकती है और लोगों को शुद्ध और सदाचारी बना सकती है। इसी प्रकार से धर्मसत्ता में भी वह सामर्थ्य है कि लोगों की भावनाओं को पढ़ सकती है और लोगों को अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा दे सकती है। अतः प्रयास यही किया गया कि हम धर्मतन्त्र को सँभालें और उसकी शक्ति का उपयोग करें और लोगों की भावनाओं को ऊँचा उठाने के लिए प्रयास करें। धर्मतन्त्र अपने आप में बड़ा सामर्थ्यवान है।
                 
🔷 धर्मतन्त्र में ५६ लाख व्यक्ति सन्त और महात्मा, बाबा और ब्राह्मण, महात्मा के रूप में भारतवर्ष के ७ लाख गाँवों में रहते हैं। भारतवर्ष में ७ लाख गाँव हैं और ५६ लाख सन्त-महात्मा है। हर गाँव के पीछे ८ आदमी आते हैं। अगर ये ८ आदमी चाहें कि हर गाँव को अपना कार्यक्षेत्र और सेवा-क्षेत्र बना लें तो हर गाँव में से शिक्षा की समस्या को हल किया जा सकता है। सामाजिक गुत्थियों की समस्याओं को दूर किया जा सकता है। विषमताएँ और दूसरी बुराइयाँ जो हमारे देहातों में व अन्य जगहों में फैली हुई हैं, उनको मिटाया जा सकता है। यह काम कोई कठिन नहीं है सफाई की समस्या को सहज ही हल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त सन्त-महात्मा घर-घर भक्ति के नाम पर सहयोग की भावना पैदा करें, कल्याण की भावना पैदा करें।
    
🔶 सरकार का यह व्यक्तिगत उत्तरदायित्व हो तो हमारा विश्वास बन जाता है और हमारा इतिहास अन्य किसी देश की तुलना में आगे बढ़ सकता है, पीछे रहने की कोई जरूरत नहीं हो सकती। लेकिन ये धर्मतन्त्र ठीक तरीके से काम नहीं कर सका। प्रयास युगनिर्माण योजना का यही था कि धर्मतन्त्र में जितने भी व्यक्ति काम करते हैं, उन सबको वह प्रेरणा दी जाए, वह शिक्षा दी जाए कि वह भगवान् का सूक्ष्म स्वरूप समझें, भगवान् का सन्देश समझें और भगवान् की सेवा-पूजा का उद्देश्य समझें।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 8 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Dec 2017


👉 गुरु का स्थान

🔶 एक राजा था. उसे पढने लिखने का बहुत शौक था. एक बार उसने मंत्री-परिषद् के माध्यम से अपने लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की. शिक्षक राजा को पढ़ाने के लिए आने लगा. राजा को शिक्षा ग्रहण करते हुए कई महीने बीत गए, मगर राजा को कोई लाभ नहीं हुआ। गुरु तो रोज खूब मेहनत करता थे परन्तु राजा को उस शिक्षा का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था. राजा बड़ा परेशान, गुरु की प्रतिभा और योग्यता पर सवाल उठाना भी गलत था क्योंकि वो एक बहुत ही प्रसिद्द और योग्य गुरु थे। आखिर में एक दिन रानी ने राजा को सलाह दी कि राजन आप इस सवाल का जवाब गुरु जी से ही पूछ कर देखिये।

🔷 राजा ने एक दिन हिम्मत करके गुरूजी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी, हे गुरुवर क्षमा कीजियेगा, मैं कई महीनो से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ पर मुझे इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है. ऐसा क्यों है ?

🔶 गुरु जी ने बड़े ही शांत स्वर में जवाब दिया,  राजन इसका कारण बहुत ही सीधा सा है…

🔷 गुरुवर कृपा कर के आप शीघ्र इस प्रश्न का उत्तर दीजिये, राजा ने विनती की।

🔶 गुरूजी ने कहा, राजन बात बहुत छोटी है परन्तु आप अपने बड़े होने के अहंकार के कारण इसे समझ नहीं पा रहे हैं और परेशान और दुखी हैं. माना कि आप एक बहुत बड़े राजा हैं। आप हर दृष्टि से मुझ से पद और प्रतिष्ठा में बड़े हैं परन्तु यहाँ पर आप का और मेरा रिश्ता एक गुरु और शिष्य का है। गुरु होने के नाते मेरा स्थान आपसे उच्च होना चाहिए, परन्तु आप स्वंय ऊँचे सिंहासन पर बैठते हैं और मुझे अपने से नीचे के आसन पर बैठाते हैं। बस यही एक कारण है जिससे आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और न ही कोई ज्ञान मिल रहा है. आपके राजा होने के कारण मैं आप से यह बात नहीं कह पा रहा था।

🔷 कल से अगर आप मुझे ऊँचे आसन पर बैठाएं और स्वंय नीचे बैठें तो कोई कारण नहीं कि आप शिक्षा प्राप्त न कर पायें।

🔶 राजा की समझ में सारी बात आ गई और उसने तुरंत अपनी गलती को स्वीकारा और गुरुवर से उच्च शिक्षा प्राप्त की।

🔷 मित्रों, इस छोटी सी कहानी का सार यह है कि हम रिश्ते-नाते, पद या धन वैभव किसी में भी कितने ही बड़े क्यों न हों हम अगर अपने गुरु को उसका उचित स्थान नहीं देते तो हमारा भला होना मुश्किल है. और यहाँ स्थान का अर्थ सिर्फ ऊँचा या नीचे बैठने से नहीं है, इसका सही अर्थ है कि हम अपने मन में गुरु को क्या स्थान दे रहे हैं। क्या हम सही मायने में उनको सम्मान दे रहे हैं या स्वयं के ही श्रेस्ठ होने का घमंड कर रहे हैं?

🔶 अगर हम अपने गुरु या शिक्षक के प्रति हेय भावना रखेंगे तो हमें उनकी योग्यताओं एवं अच्छाइयों का कोई लाभ नहीं मिलने वाला और अगर हम उनका आदर करेंगे, उन्हें महत्व देंगे तो उनका आशीर्वाद हमें सहज ही प्राप्त होगा।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

👉 दर्शन की प्यास ...

🔷 पूर्णमासी का चन्द्रमा जब पूरे आकाश पर छा जाता है, तब लोग उसे देखकर आदिशा के महान् तप को स्मरण करते और कहते -

🔶 "आज आदिशा के समकक्ष सारी पृथ्वी पर वैसे ही कोई दूसरा तपस्वी नहीं है, जैसे पूर्ण चन्द्र के सम्मुख कोई दूसरा चन्द्रमा नहीं! "

🔷 आदिशा का मनोनिग्रह इतना कठोर था कि राज-नर्तकियाँ वस्त्र-विहीन होकर उनके समक्ष पहुँचती हैं, तो भी उन्हें दो वर्षीय बालिका की तरह देखते! राजभवन से पहुँचते सुगन्धित षटरस व्यंजनों और अलोने-सत्तुओं में उन्हें कोई भेद न लगता था! ऐसा इन्द्रिय नियन्त्रण शायद ही कोई और तपस्वी कर पाया हो!

🔶 इतने पर भी आदिशा का चित्त शान्त न था! वर्षों तप करते हो गये थे, पर उन्हें भगवान पशुपत के दर्शन नहीं हो पाये थे! उनके पूजा-उपवास, यम-नियम, प्राणायाम-प्रत्याहार में कभी कोई त्रुटि नहीं आई थी! वर्षों बीत गये, क्रम कहीं भी टूटा नहीं था! उन्होंने तप में पूर्ण निष्ठा दर्शायी थी, तो भी वे आराध्य के दर्शनों से अब तक वंचित थे! वे स्वयं भी उसका कारण समझ नहीं पा रहे थे !

🔷 नर्मदा तट पर बने आदिशा के आश्रम मैं आज का दिन बड़े मंगल और आनन्द का है! प्रतिवर्ष के अनुसार इस वर्ष भगवान पशुपतनाथ की झाँकी सजाई गई है, उनका कीर्तन हो रहा है! दर्शनार्थी दूर-दूर से आ रहे हैं! संध्याकालीन आरती में भाग लेने के लिये दूर-दूर से लोग दौड़े चले आ रहे हैं! भीड़ बढ़ती ही चली जा रही है!

🔶 राजमहल की परिचारिका सुनयना आज सम्पूर्ण दिन व्यग्र रही! प्रातःकाल भगवान की आरती देखने की इच्छा उमड़ी थी, जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, आकांक्षा उतनी ही तीव्र होती गई पर राजमहल के कार्यों से निवृत्ति कहाँ? आज अन्तःपुर भी तो उत्सव में सम्मिलित होने वाला था, सुनयना को तब फिर अवकाश कहाँ से मिलता?

🔷 सांयकाल उसे अवकाश मिला! दिन भर की भूखी-प्यासी सुनयना ने अपने कुटीर की ओर न जाकर सीधे नर्मदा-तट की ओर प्रस्थान किया! मार्ग में कौन मिला, क्या मिला उसे कुछ भी सुधि न थी, उसके अन्तर्मन में तो प्रभु की आरती थी और उसी के ध्यान में वह क्षिप्र गति से आगे बढ़ती चली जा रही थी!

🔶 आँगन पर मरकत-स्तम्भ के सहारे स्वयं सन्त आदिशा खड़े हुये थे, शेष जन-समुदाय उनके दोनों बाजुओं की ओर खड़ा था! सुनयना वहाँ पहुँच तो गई, पर सघन जन-समुदाय को चीरकर भीतर पहुँचना उसके लिये कठिन था! वह उसी मरकत-स्तम्भ पर चढ़ गई! खड़े होने के स्थान का अभाव दीखा, सो एक पाँव स्तम्भ पर दूसरा आदिशा के कन्धों पर टिकाकर, वह भगवान की आरती देखने लगी !

🔶 आरती समाप्त हुई तब लोगों का ध्यान उधर गया! सन्त आदिशा के कन्धों पर क्षुद्र सुनयना की लात - बड़ी अशोभनीय बात थी! लोगों ने डाँटा - " मूर्ख, तुझे दिखाई नहीं दिया, महात्मा के कन्धों पर पैर रख दिये! " इससे पूर्व सुनयना कुछ कहे और क्षमा माँगे, महात्मा आदिशा ने कहा - " उसे बुरा मत कहो! सुनयना मेरी गुरु हुई! आज तक मैं भले-बुरे, ऊँच-नीच के भेद-भाव में पड़ा रहा, इसलिये तप का अभीष्ट लाभ न मिल पाया! आज पता चला की साधक की उत्कृष्ट अभिलाषा ही दर्शन का आधार है! जब तक दर्शनों की इतनी तीव्र प्यास न हो, ध्येय का मिलना कैसे सम्भव हो सकता है? "

🔷 उस दिन आदिशा की रही-सही, सांसारिक दृष्टि का अन्त हुआ और उन्हें दिव्य प्रकाश के दर्शन हुये!!
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1970 पृष्ठ 2

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 7 Dec 2017


👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (भाग 4)

🔶 एक और उदाहरण के लिये अपने बच्चों और परिजनों को ले लीजिये। अपने बच्चे और परिजन सबको बहुत प्रिय होते हैं। उनकी तुलना में दूसरे के बच्चे और परिजन जरा भी प्रिय नहीं लगते, फिर चाहे वे अपने बच्चों और परिजनों की अपेक्षा कितने ही अधिक अच्छे और गुणवान् क्यों न हों। बचें के विषय में तो यहां तक देखा जाता है कि अपना काला-कलूटा और कुरूप बच्चा तक दूसरों के फूल जैसे सुन्दर बच्चों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रिय लगता है। अपने परिजनों की तुलना में भी अपने बच्चे ही अधिक प्रिय तथा सुन्दर लगते हैं। इस भेद का कारण कोई स्वार्थ अथवा द्वेष नहीं है, बल्कि वह आत्म-भाव है जो व्यक्तियों में न्यूनाधिक मात्रा में स्थापित होता है।
   
🔷 और भी देखिये—बहुत बार ऐसा भी होता है कि अपने बच्चे की अपेक्षा अपना भतीजा, भाजां अथवा कोई अन्य बच्चा ही अधिक प्रिय लगने लगता है। इस विपर्य का कारण भी यही है कि किन्हीं कारणों से अपने बच्चे की तुलना में दूसरे बच्चे से आत्मीयता अधिक हो जाती है। इस प्रकार देख सकते हैं कि प्रियता का कारण अथवा आधार गुण, सुन्दरता, स्वार्थ अथवा आत्म जताता अथवा सम्बन्ध नहीं होता, बल्कि मनुष्य का अपना आत्म-भाव ही होता है, जो किसी से भी स्थापित हो सकता है। सारांश में इस बात को इस प्रकार कहा जा सकता है कि संसार की कोई वस्तु आप में न तो प्रिय है और न अप्रिय। किसी कारणवश जब किसी वस्तु में आत्म-भाव जुड़ पाता अथवा किसी कारण से जुड़ा हुआ आत्म-भाव टूट जाता है, तो वही वस्तु प्रियता रहित हो जाती है। प्रियता की उत्पत्ति आत्मीयता से होती है और किसी बात से नहीं।

🔶 मानव का सहज स्वभाव है कि वह अपने आस-पास प्रियजनों तथा प्रिय वस्तुओं को पाकर बड़ा सुखी और प्रसन्न होता है। जब तक उसकी मनभाई परिस्थिति उसे प्राप्त रहती है, दुःख, शोक अथवा ताप का उसे अनुभव नहीं होता। इस प्रकार यदि हमारे आस-पास प्रिय वस्तुयें, प्रिय व्यक्ति और मन चाही अनुकूल परिस्थिति बनी रहे, तो क्या हम जीवन भर सुखी और सन्तुष्ट नहीं रह सकते? रह सकते हैं और निश्चित रूप से रह सकते हैं। जीवन भर निर्विघ्न रूप से सुखी और सन्तुष्ट रखने वाली परिस्थितियां ही जीवन की वह स्थिति है, जिसे हम धरती का स्वर्ग कह सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 7
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan

🔶 The same stream of life that runs through my veins night and day runs through the world and dances in rhythmic measures.

🔷 It is the same life that shoots in joy through the dust of the earth in numberless blades of grass and breaks into tumultuous waves of leaves and flowers.

🔶 It is the same life that is rocked in the ocean-cradles of birth and of death, in ebb and in flow.

🔷 I feel my limbs are made glorious by the touch of this world of life. And my pride is from the life-throb of ages dancing in my blood this moment.

🔶 Is it beyond thee to be glad with the gladness of this rhythm? To be tossed and lost and broken in the whirl of this fearful joy?

🔷 All things rush on, they stop not, they look not behind, no power can hold them back, they rush on.

🔶 Keeping steps with that restless, rapid music, seasons come dancing and pass away – colours, tunes and perfumes pour in endless cascades in the abounding joy that scatters and gives up and dies every moment.

✍🏻 Rabindranath Tagore
📖 Gitanjali

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 5)

🔶 इसी प्रकार से अगर कोई आदमी क्रोधी है, कोई आदमी स्वार्थी है, कोई आदमी दुष्ट प्रकृति का है तो वह भी अपने समीपवर्ती लोगों के साथ जो व्यवहार करेगा, उसकी प्रतिक्रिया होगी ही और दूसरे लोग भी उसके प्रति डाह रखेंगे, ईर्ष्या रखेंगे, दुर्व्यवहार रखेंगे, कुढ़ेंगे, जलन पैदा करेंगे, लड़ाई-झगड़े होंगे ओर सब समस्याएँ उत्पन्न हो जाएँगी। गुस्सा वही है, गुस्सों का केन्द्र एक ही है, इसलिए उसको हल करने के लिए भावनात्मक निर्माण करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। चाहे वह उपाय आज इस्तेमाल किया जाय या एक हजार वर्ष बाद। स्वस्थ स्थिति तब हो सकती है, जब सबका ध्यान उस ओर जाएगा कि जहाँ गुत्थियों का केन्द्र उस केन्द्र को सुधारने और सँभालने के लिए कदम उठाये जाएँ।
                
🔷 युगनिर्माण योजना ने यह कदम उठाया और उसकी ओर पाँव बढ़ाया। इसलिए हमारा प्रयास भावनात्मक निर्माण है। इसी का दूसरा नाम ज्ञानयज्ञ है। ज्ञानयज्ञ का विचारक्रान्ति के नाम पर युगनिर्माण योजना ने बहुत दिन पूर्व कुछ क्रियाकलापों के लिए मंच, एक साधन, एक माध्यम बनाया था और उसको धर्ममंच माध्यम बोला गया था, क्योंकि भारतवर्ष की प्रतिक्रिया विशेष रूप से इसी लायक थी। भारतवर्ष में अस्सी फीसदी लोग बिना पढ़े-लिखे रहते हैं और ये अस्सी फीसदी लोग देहातों में रहते हैं। इनके मानसिक स्तर ऐसे हैं, जिसमें कोई चीज समझी या समझायी जा सकती है, वह धार्मिक क्षेत्र ही है। यहाँ लोग रामायण की बात, कहानी को, सामाजिक कथा को जानते हैं।
    
🔶 श्रीकृष्ण भगवान् की कथा को जानते हैं, मोरध्वज की कथा को जानते हैं लेकिन उनसे राजनीति या दूसरी समस्याओं के बारे में पूछा जाए तो शायद ही वह कुछ बात बता पायेंगे। यहाँ का देहाती व्यक्ति भी लोक-परलोक की बात, भगवान् की बात, आत्मा की बात, तीर्थयात्रा, पुण्य-परमार्थ की बात, परलोक की बात किसी हद तक बता सकता है और दूसरी बातों को नहीं। इसीलिए यह तय किया गया कि लोगों का मन बदला जाए, लोगों की दिशा जिधर है व लोगों का ध्यान जिधर है, लोगों की जानकारियाँ जिस क्षेत्र में हैं उसको हाथ में लेकर भावनात्मक नवनिर्माण का प्रयास प्रारम्भ किया जाए।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 163)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 कार्यक्रमों में प्रचारात्मक, रचनात्मक और सुधारात्मक अनेक कार्य हैं जिन्हें घर से बाहर रहते हुए परिस्थितियों के अनुरूप कार्यान्वित किया जा सकता है। प्रचारात्मक स्तर के कार्य १-झोला पुस्तकालय, २-ज्ञान रथ, ३-स्लाइड प्रोजेक्टर प्रदर्शन, टेपरिकार्डर से युग संगीत एवं युग संदेश को जन-जन तक पहुँचाना, ४-दीवार पर आदर्श वाक्य लिखना, ५-साइकिलों वाली धर्म प्रचार पद यात्रा योजना में सम्मिलित होना। संगीत, साहित्य, कला के माध्यम से बहुत कुछ हो सकता है। साधन दान से भी अनेक सत्प्रवृत्तियों का पोषण हो सकता है।

🔶 रचनात्मक कार्यों मेंः १-प्रौढ़ शिक्षा-पुरुषों की रात्रि पाठशाला, महिलाओं की अपराह्न पाठशाला। २-बाल संस्कारशाला। ३-व्यायामशाला। ४-स्वच्छता सम्वर्धन। ५-वृक्षारोपण आदि। सुधारात्मक कार्यों में अवांछनीयता, अनैतिकता, अन्धविश्वास आदि का उन्मूलन प्रमुख है। १-जातिगत ऊँच-नीच, २-पर्दा प्रथा, ३-दहेज, ४-फैशन के नाम पर अपव्यय, बाल विवाह, बहु प्रजनन आदि के उन्मूलन में सामर्थ्य भर प्रयत्न करना। इसके अतिरिक्त शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक क्षेत्रों से सम्बन्धित अनेक कार्यक्रम हैं, जिन्हें कार्यान्वित करने के लिए हर क्षेत्र और हर स्थिति में गुंजायश हैं। जिन्हें नवसृजन के लिए समय देना हैं, उन्हें अपनी योग्यता एवं परिस्थिति के अनुरूप कोई काम चुन या पूछ लेना चाहिए। यह सभी कार्य प्रगति प्रयास समयदान से सम्बंधित हैं।

🔷 एक व्यक्ति का एक लाख वर्ष का समय यों सुनने कहने में बहुत अधिक प्रतीत होता है, किन्तु जब परिजन मिलजुलकर इसकी पूर्ति करने पर कटिबद्ध होते हैं, तो हर परिजन के हिस्से में थोड़ा ही आता है।

🔶 बड़े अनुदान-बड़े वरदानः फुंसी का मवाद घरेलू सुई चुभोकर भी निकाला जा सकता है, पर मस्तिष्क या हृदय में घुसी गोली को निकालने के लिए कुशल सर्जन और बहुमूल्य उपकरणों की जरूरत पड़ती है। मकड़ी का पेट एक मक्खी से भर जाता है, पर हाथी को मनों गन्ना रोज चाहिए। घोंघे जलाशय की तली में जा बैठते हैं, पर समुद्र सोखने के लिए अगस्त्य ऋषि जैसे चुल्लू चाहिए। कुएँ से घड़ा भरकर पानी कोई भी निकाल सकता है, पर स्वर्ग से गंगा का अवतरण धरती पर करने के लिए भागीरथ जैसा तप और शिव जटाओं का आधार चाहिए। वृत्तासुर वध के लिए ऋषि दधीचि की ऊर्जामयी अस्थियों से वज्र बनाना पड़ा था। छोटे काम छोटे मनुष्यों की साधारण हलचलों से स्वल्प साधनों से बन पड़ते हैं, पर महान् कार्यों के लिए महान् व्यवस्था बनानी पड़ती है। धरती की प्यास बादल बुझाते और समुद्र की सतह यथावत बनाए रहने के लिए सहस्रों नदियों की असीम जलराशि का निरंतर समर्पित होते रहना आवश्यक है।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.187

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

👉 जैसा खाओ अन्न, वैसा होये मन: -

🔷 बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा। सेठ को हुआ कि इतना पाप हो रहा है तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।

🔶 एक दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजन प्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की। साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी। दोपहर का समय था। सेठ ने कहाः "महाराज ! अभी आराम कीजिए। थोड़ी धूप कम हो जाय फिर पधारियेगा।"

🔷 साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली। सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी।

🔶 साधु बाबा आराम करने लगे। खीर थोड़ी हजम हुई। चोरी के चावल थे। साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा ? साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर रख ली। शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े।

🔷 सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवत्पुरुष थे, वे क्यों लेंगे ? नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी।

🔶 इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः

🔷 "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।"

🔶 सेठ ने कहाः "महाराज ! आप क्यों लेंगे ? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा और आप नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते हैं।"

🔷 साधुः "यह दयालुता नहीं है। मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था। सेठ ! तुम सच बताओ कि तुम कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?"

🔶 सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूं,उसी चावल की खीर थी।

🔷 साधु बाबा "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि 'हे राम.... यह क्या हो गया ? मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी। इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया।"

🔶 इसीलिए कहते हैं किः

🔷 जैसा खाओ अन्न वैसा होवे मन। जैसा पीओ पानी वैसी होवे वाणी।

👉 प्रार्थना करें, याचना नहीं

🔷 भगवान से प्रार्थना कीजिये, याचना नहीं। आपकी स्थिति ऐसी नहीं कि कमजोरियों के कारण किसी का मुँह ताकना पड़े और याचना के लिए हाथ फैलाना पड़े। 

🔶 प्रार्थना कीजिये कि आपका प्रसुप्त आत्मबल जाग्रत् हो चले ।। प्रकाश का दीपक जो विद्यमान है, वह टिमटिमाये नहीं वरन् रास्ता दिखाने की स्थिति में बना रहे। मेरा आत्मबल मुझे धोखा न दे। समग्रता में न्यूनता का भ्रम न होने दे।  

🔷 जब परीक्षा लेने और शक्ति निखारने हेतु संकटों का झुण्ड आये, तब मेरी हिम्मत बनी रहे और जूझने का उत्साह भी। लगता रहे कि यह बुरे दिन अच्छे दिनों की पूर्व सूचना देने आये हैं।

🔶 प्रार्थना कीजिये की हम हताश न हों, लड़ने की सामर्थ्य को पत्थर पर घिसकर धार रखते रहें। योद्धा बनने की प्रार्थना करनी है, भिक्षुक बनने की याचना नहीं। जब अपना भिक्षुक मन गिड़गिड़ाये, तो उसे दुत्कार देने की प्रार्थना भी भगवान् से करते रहें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (भाग 3)

🔶 स्वर्ग की विशेषताओं में आनन्द के अतिरिक्त एक विशेषता अमरता भी है। ऐसी मान्यता है कि स्वर्ग प्राप्त कर लेने वाले देवकोटि में पहुंच जाते हैं और देवता अमर होते हैं, कभी मरते नहीं। अर्थात् स्वर्ग का अधिकारी अमरत्व का भी अधिकारी होता है। किन्तु सत्य बात यह है कि स्वर्ग की विशेषताओं में अमरता की उतनी प्रधानता नहीं है, जितनी की आनन्द की। यदि अमरता छोड़कर स्वर्ग से आनन्द की विशेषता हटा ली जाय और वहां की परिस्थितियां संसार की तरह सामान्य दुःख-सुख और कष्ट, क्लेश देने वाली हो जायं तो शायद उस एकाकी अमरता से भरा स्वर्ग बड़ा घोर भयानक बन जाये। लोग उसके लिये लालायित तो क्या हों, उल्टे उसकी कल्पना से भी भयभीत होने लगें। यदि आनंद से रहित अमरता पूर्ण स्वर्ग किसी को अनायास ही मिलने लगे तब भी कोई उसे स्वीकार न करे। इस थोड़ी-सी अवधि के जीवन में जब आनन्द का अभाव हो जाता है, दुःख और क्लेश का दबाव बढ़ जाता है तो वह दुर्वह भार बन जाता है।
   
🔷 लोग उससे पीछा छुड़ाने के लिये उत्सुक हो उठते हैं, तब भला निरानन्द अमरता से भरा वह युग-युग की अवधि वाला स्वर्गीय जीवन कितना भयानक और असह्य भार बन जाये। आनन्दहीन अमरता की अपेक्षा लोग सानन्द नश्वरता को ही अधिक पसन्द भी करेंगे और श्रेय भी देंगे। आनन्द की प्रधानता के कारण ही स्वर्ग की अमरता का महत्त्व है, अन्यथा वह तो एक असीम कारागृह से अधिक कुछ नहीं है। नरक क्या है? आनन्द रहित अमरता ही तो है, प्रतिकूलता से भी परिस्थितियां ही तो हैं, दुःख और यातना से पूर्ण अवस्था ही तो है। स्वर्ग का महत्त्व अमरत्व के कारण नहीं, आनन्द के कारण है और आनन्द की उत्पत्ति अनुकूल तथा प्रियतापूर्ण परिस्थितियों से होती है।

🔶 वह आनन्दपूर्ण स्वर्ग जो पारलौकिक स्वर्ग की तरह अमरता वाला भले ही न हो पर जो आपके इस जीवन में ही मूर्तिमान हो सकता है, आप स्वयं अपने प्रयत्न से निर्माण कर सकते हैं। वह प्रियता जो आनन्द की जननी कही गई है, आत्मीयता से उत्पन्न होती है। संसार में मनुष्य को जो कुछ अच्छा और प्रिय लगता है, वह आत्म-भाव के कारण। संसार की कोई भी वस्तु कितनी ही सुन्दर और उपयोगी क्यों न हो, तब तक प्रिय नहीं लगती जब तक उसमें आत्म-भाव स्थापित न हो। किन्हीं दर्शनीय स्थानों को दो आदमी एक साथ देखते हैं। उनमें से एक उसके सुन्दर दृश्य को देखकर आनन्दित और आत्म-विभोर हो उठता है, जबकि दूसरा व्यक्ति उसे देखकर अनमना बना रहता है। उसे उसमें न तो कोई आकर्षण अनुभव होता है और न प्रियता। इसका कारण यही है कि एक व्यक्ति उस दृश्य में तन्मय होकर उससे आत्मीयता स्थापित कर लेता है, जबकि दूसरा तटस्थ रहता है। यदि उस दृश्य की सुन्दरता ही प्रियता का कारण होता, तो दोनों व्यक्तियों को ही वह दृश्य एक समान सुन्दर और प्रिय लगता। प्रियतापूर्ण आकर्षण का कारण मनुष्य का आत्म-भाव है न कि किसी वस्तु की विशेषता या गुण।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 7
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/December/v1.7

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 4)

🔶 एक-दूसरे का सहयोग करने की वृत्तियाँ हर एक के मन में बसी हुई थीं। अपने आप स्वयं कष्ट उठा लेना और दूसरे की सेवा करना हर आदमी के सामने लक्ष्य था। यही कारण था कि आदमी थोड़ी-सी वस्तुओं में, साधारण वस्तुओं में भी सुखी रहते थे और दुनिया में जगद्गुरु कहलाते थे, चक्रवर्ती शासन व्यवस्था को सँभालते थे। यहाँ सुख-सम्पदाओं के थोड़े-से किफायतसारी मितव्ययता के आधार जो कुछ भी सम्पदा थी, उसी के इस्तेमाल करने और कुछ बचत करने का था। यहाँ हर घर में सोना-चाँदी था, हर घर में लक्ष्मी का निवास था, क्योंकि आदमियों ने मितव्ययता से उपयोग किया हुआ था।
                
🔷 अपव्ययता का दौर जो आजकल चारों ओर फैला हुआ है, उस जमाने में नहीं था। उस जमाने की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियों में हम जब तुलनात्मक दृष्टियों से देखते हैं तो पाते हैं कि जो सम्पन्नता आज हमारे पास ज्यादा है, शिक्षा हमारे पास ज्यादा है, विज्ञान के साधन हमारे पास ज्यादा हैं, चिकित्सा के माध्यम हमारे पास ज्यादा है, असंख्य माध्यम और साधन ज्यादा हैं, फिर भी हम असन्तुष्ट होकर कहीं अधिक दुःखी, कहीं अधिक दीन, कहीं अधिक उलझे हुए, कहीं अधिक व्याधियों से त्रस्त हैं। इसका कारण भावनात्मक स्तर का निकृष्ट हो जाना ही है।
    
🔶 युग निर्माण योजना का आविर्भाव केवल इसी समस्या का समाधान करने के लिए हुआ था। दूसरे शब्दों में इसको हम यों कह सकते हैं कि विश्व की जितनी भी समस्याएँ, कठिनाइयाँ और गुत्थियाँ हैं, उन सबका समाधान एक ही उपाय से करने के लिए जो हल ढूँढ़ा गया था, वह नवनिर्माण आन्दोलन का अर्थ भावनात्मक नवनिर्माण है। मनुष्य की विचारणाएँ, भावनाएँ और दृष्टिकोण को बदल देना यही हमारा उद्देश्य है, उसके बदल देने के पश्चात् सारी परिस्थितियाँ स्वयं ही बदल जाती है। एक-एक चीज को हम बदलना चाहें तो बहुत मुश्किल है। हजारों समस्याएँ सामने हैं, उनको अलग-अलग तरीके से हल करना असम्भव है क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्यों की आमदनी बढ़ती चली जाएगी, उसमें ही आदमी का खर्च बढ़ता चला जाएगा। आमदनी की अपेक्षा खर्च ज्यादा किया तो दर्द कैसे दूर हो जाएगा? अपव्यय अगर मनुष्य के काबू से बाहर है तो चाहे कितनी ही आमदनी क्यों न बढ़े, हमेशा कर्जदारी की समस्या बनी रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Vacant Palaces in the Heaven

🔶 Once upon a time Rishi Varud arrived at heaven to meet Indra- the divine king. Indra greeted him and took him for a trip of the heaven. As a result of their good deeds on Earth many persons were leading a lavish life in the heaven. But in the center of the heaven the best of golden palaces were vacant. Noticing this, Rishi Varud asked, "Why are these fascinating palaces full of alluring amenities unoccupied?" 

🔷 "These palaces have been constructed for the saints and compassionate devotees of God," replied Indra, "They are lying vacant because the true saints do not want to come here and spend their time in pleasure. They derive gratification in public service on Earth." God's love and grace is reserved only for such devotees.

📖 From Pragya Puran

👉 आज का सद्चिंतन 6 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Dec 2017


मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 3)

🔶 इसकी तुलना में दूसरी बात है जिनके पास अपार सम्पदाएँ थीं और रावण जैसों के पास सम्पदाओं की क्या कमी थी, उसकी सोने की लंका बनी हुई थी, लेकिन वह स्वयं भी दुःख में रहा, स्वयं भी क्लेश-चक्र में पड़ा रहा, उसके सम्पर्क में जो लोग आये, जहाँ कहीं भी वह गया, वहाँ उसने दुःख फैलाया है और संकट फैलाया। सम्पत्ति से क्या लाभ रहा? विद्या से मैं चैन से रहा हूँ, लेकिन उसके पास विद्या होने से भी क्या लाभ हुआ? उसके पास धन था, विद्या थी, बल था, सब कुछ तो था, लेकिन एक ही बात की कमी थी भावनात्मक स्तर का न होना।
                
🔷 बस, एक ही समस्या का आधार है, जिसे यों हम समझ लें तो फिर हम उपाय भी खोज लेंगे और विजय भी मिलेगी। उपाय भी खोज लेंगे और विजय भी मिलेगी। उपाय हम अनेक ढूँढ़ते रहते हैं, पर मैं समझता हूँ कि इतने पर भी समाधान नहीं हो पाते। खून अगर खराब हो तो खराब खून के रहते हुए फिर कोई दवा-दारू कुछ काम नहीं करेगी। फुन्सियाँ निकलती रहती हैं। एक फुन्सी पर पट्टी बाँधी, दूसरा घाव फिर पैदा हो जाएगा। बराबर कोई न कोई शिकायत पैदा होती रहेगी। खून खराब हो तब खून साफ हो जाए तब, न कोई फुन्सी उठने वाली न कोई चीज उठने वाली है। ठीक इसी प्रकार से अगर हमारा भावनात्मक स्तर ऊँचा हो तो न कोई समस्या पैदा होने वाली है और न कोई गुत्थी पड़ने वाली है। इसके विपरीत हमारी मनःस्थिति और हमारा दृष्टिकोण गिरा हुआ हो तो हम जहाँ कहीं भी रहेंगे अपने लिए समस्या पैदा करेंगे और दूसरों के लिए भी समस्या पैदा करेंगे। यही वस्तुस्थिति है और यही इसका आज की परिस्थितियों का दिग्दर्शन है।
    
🔶 भूतकाल में भारतवर्ष का इतिहास उच्चकोटि का रहा है, समुन्नत रहा, सुखी रहा है। इस पृथ्वी पर देवता निवास करते थे, स्वर्ग की परिस्थितियाँ थीं, इसका और कोई कारण नहीं था, न आज के जैसे साधन उस जमाने में थे। आज जितनी नहरें हैं उतनी उस जमाने में थीं कहाँ? आज बिजली का जितना साधन-शक्ति प्राप्त है, उस जमाने में कहाँ थी? आज जितने अच्छे पक्के मकान और दूसरे यातायात के साधन हैं, उस जमाने में कहाँ थे? लेकिन इस पर भी यह देश सम्पदा का स्वामी था। इस देश के नागरिक देवताओं के शिविर में चले जाते थे। यह भूमि तब ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ मानी जाती थी। यद्यपि आज की तुलना में अभावग्रस्त थी, उस जमाने में इसका क्या कारण था? इसका कारण एक ही था कि उस जमाने के लोग उच्चकोटि का दृष्टिकोण अपनाये हुए थे। उनकी भावनाएँ उच्चस्तर की थीं। उसका परिणाम यह था कि लोग परस्पर स्नेहपूर्वक रहते थे, सहयोगपूर्वक रहते थे, परस्पर विश्वास करते थे, एक-दूसरे के प्रति वफादार होते थे, संयमी होते थे, सदाचारी होते थे, मिल-जुलकर रहना जानते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (भाग 2)

🔶 स्वर्ग संसार से अलग बसा हुआ कोई देश अथवा स्थल नहीं है। जहां संसार समर जीतने वाले लोग जाकर रहते हैं। वास्तव में स्वर्ग मानव-जीवन की एक स्थिति है, जो इसी भूमि और इसी जीवन में पाई जा सकती है। जो इसी जीवन में उस स्थिति को नहीं पा सकता, वह लोकान्तर में, यदि कोई है भी, तो उस स्वर्ग को पा सकता है, यह सर्वथा संदिग्ध है। इस जीवन में भूमि का स्वर्ग पाने वाले ही उस स्वर्ग को पा सकने के अधिकारी हो सकते हैं। यदि वह स्वर्ग प्राप्ति है तो उनकी पात्रता इसी भूमि और इसी जीवन में उपार्जित करनी होती है।
     
🔷 स्वर्ग क्या है? स्वर्ग वह स्थिति है, जिसमें मनुष्य के आस-पास आनन्ददायक प्रियता ही प्रियता बनी रहे। संसार के सारे धर्म साहित्य में स्वर्ग का वर्णन आता है। उसके सम्बन्ध में न जाने कितनी कथायें पढ़ने को मिलती हैं। लोगों का स्वर्ग के लिये लालायित रहना, उसको पाने के लिये पुण्य तथा पुरुषार्थ का उपक्रम करना, परमार्थ तथा अध्यात्म का अनुसरण करना आदि पढ़ने को मिलता है। किसी धर्म अथवा मत सम्प्रदाय में स्वर्ग के स्वरूप और उसकी विशेषताओं के विषय में कोई भी मान्यता अथवा धारणा क्यों न रही हो, लेकिन उस सबका सार यही है कि वहां सब कुछ प्रिय तथा आनन्ददायक ही है।

🔶 वहां पर ऐसे कारण नहीं हैं, जिनसे मनुष्य को कष्ट, क्लेश अथवा दुःख प्राप्त हो। ऐसा स्वर्ग जिसकी विशेषता आनन्द तथा प्रियता है, मनुष्य स्वयं अपने लिये इस पृथ्वी और इस जीवन में जी रच सकते हैं। अपने अन्दर तथा बाहर की परिस्थितियां इस प्रकार से निर्मित करली जायं, जिससे न तो प्रतिकूलता का जन्म हो और न दुःख अथवा शोक-संताप का। वरन् इसके विपरीत प्रियता तथा आनन्द की अवस्थायें बनी रहें। यह मनुष्य के अपने वश की बात है। वह इस प्रकार का वांछित स्वर्ग अपने लिये यहीं पर बना सकता है और निश्चित रूप से बना सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 7
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/December/v1.7

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Dec 2017

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Dec 2017

👉 आज का सद्चिंतन 4 Dec 2017

👉 दूसरे की गलती

🔸 एक बार गुरू आत्मानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढाया। पाठ पढाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले- “अब तुम चारों इस पाठ का स्वाध्ययन कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुममें से कोई बोले नहीं। एक घंटे बाद मै तुमसे इस पाठ के बारे में बात करुँगा।“

🔹 यह कह कर गुरू आत्मानंद वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद चारों शिष्य बैठ कर पाठ का अध्ययन करने लगे। अचानक बादल घिर आए और वर्षा की संभावना दिखने लगी।

🔸 यह देख कर एक शिष्य बोला- “लगता है तेज बारिश होगी।“

🔹 ये सुन कर दूसरा शिष्य बोला- “तुम्हें बोलना नहीं चाहिये था। गुरू जी ने मना किया था। तुमने गुरू जी की आज्ञा भंग कर दी।“

🔸 तभी तीसरा शिष्य भी बोल पडा- “तुम भी तो बोल रहे हो।“

🔹 इस तरह तीन शिष्य बोल पडे, अब सिर्फ चौथा शिष्य बचा वो कुछ भी न बोला। चुपचाप पढता रहा।

🔸 एक घंटे बाद गुरू जी लौट आए। उन्हें देखते ही एक शिष्य बोला- “गुरूजी! यह मौन नहीं रहा, बोल दिया।“

🔹 दुसरा बोला- “तो तुम कहाँ मौन थे, तुम भी तो बोले थे।“

🔸 तीसरा बोला- “इन दोनो ने बोलकर आपकी आज्ञा भंग कर दी।“

🔹 ये सुन पहले वाले दोनो फिर बोले- “तो तुम कौन सा मौन थे, तुम भी तो हमारे साथ बोले थे।“

🔸 चौथा शिष्य अब भी चुप था।

🔹 यह देख गुरू जी बोले- “मतलब तो ये हुवा कि तुम तीनो ही बोल पडे। बस ये चौथा शिष्य ही चुप रहा। अर्थात सिर्फ इसी ने मेरी शिक्षा ग्रहण की और मेरी बात का अनुसरण किया। यह निश्चय ही आगे योग्य आदमी बनेगा। परंतु तुम तीनो पर मुझे संदेह है। एक तो तुम तीनों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया; और वह भी एक-दूसरे की गलती बताने के लिये। और ऐसा करने में तुम सबों ने स्वयं की गलती पर ध्यान न दिया।

🔸 आमतौर पर सभी लोग ऐसा ही करते हैं। दूसरों को गलत बताने और साबित करने की कोशिश में स्वयं कब गलती कर बैठते हैं। उन्हें इसका एहसास भी नहीं होता। यह सुनकर तीनो शिष्य लज्जित हो गये। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की, गुरू जी से क्षमा माँगी और स्वयं को सुधारने का वचन दिया।

👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (भाग 1)

🔶 स्वर्ग पाने के लिये प्रायः सभी लोग उत्सुक रहते हैं। स्वर्ग एक उपलब्धि मानी जाती है। मनुष्य की यह इच्छा होती है कि यह जिस स्थान पर है, वहां से आगे बढ़े। वह उन वस्तुओं को प्राप्त करे, जो उसके पास नहीं हैं। मनुष्य एक जीवन्त प्राणी ही नहीं, वह विवेक तत्त्व से भी समान्वत है। जीवन और विवेक का मिलन उसे उन्नति और प्रगति के लिये प्रेरित करता है। जिसमें यह दोनों तत्त्व मौजूद होते हैं, वे आगे बढ़ने और ऊपर उठने के प्रयत्न से विरत नहीं रह सकते। वे उसके लिये यथासाध्य प्रयत्न अवश्य करेंगे।
     
🔷 स्वर्ग एक उपलब्धि मानी गई है। उसको संसार से अलग भी माना जाता है। मानव-जन्म के उपलक्ष में संसार तो उसे मिल ही चुका होता है। अस्तु, अपनी प्रकृति के अनुसार इस मिले हुए से आगे बढ़कर, जो अब तक नहीं मिला है, उस स्वर्ग को पाना चाहता है। ऐसा करने में उसे पुरुषार्थ का श्रेय मिलता है, वृत्ति का सन्तोष होता है और उपलब्धि का गौरव प्राप्त होता है।

🔶 स्वर्ग पाने की लोग कामना मात्र ही नहीं करते, उसे पाने का प्रयत्न भी करते हैं। जप, तप, पूजा-पाठ, पुण्य, परमार्थ और साधना, उपासना में संलग्न होने के पीछे प्रायः स्वर्ग पाने की ही कामना छिपी रहती है। यद्यपि सकाम उपासना को अधिक श्रेष्ठ नहीं माना गया है, तथापि यदि वह कामना सांसारिक पदार्थों के आगे की वस्तुओं को पाने से सम्बन्धित है तो उसको किसी हद तक स्वीकार कर लिया जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 7
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/December/v1.7

👉 Not only self-introspection but also self-refinement

🔶 Mutual sharing and caring is a common human trait. It is by this process of ‘give and take’ that the entire universe is sustained. This process is seen to be working incessantly among matter, vegetation and other sentient creatures. Contributing towards the sustenance of this process is essential.

🔷 However, it should be remembered that it is self-reliance that is the prime factor in worldly success and in self - growth of human soul. Those who are dependent on others can neither sustain their lives nor move forward on the path of self-growth.

🔶 Everyone is familiar with the gravitational force of the Earth. This force attracts everything towards the Earth. A human being too has a magnetic field of his own. This not only holds together similar people, objects and favourable circumstances but also pulls them towards itself forcibly. A person instinctively searches a like - minded friend. The water of rivers ultimately reaches the ocean. The ocean again returns this water to the source of rivers through its messengers – the clouds.

🔷 One should develop worthiness in tune with one’s aspirations. There is a natural law which rewards according to one’s worthiness. Therefore, instead of knocking at other’s door for help and succour, we should not only introspect ourselves but also try to uplift and refine ourselves according to the light given to us during introspection. This is the highway to success in all fields.

📖 From Akhand Jyoti

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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