शुक्रवार, 24 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 March 2017


👉 दो माह में दूर हुआ अल्सरेटिव कोलाइटिस

🔴 एक बार मुझे बड़ी अजीब सी बीमारी ने घेर लिया। सन् २००१ ई. की बात है। पहले तो पेट में दर्द हुआ और इसकी दवा लेते ही दस्त शुरू हो गए।दस्त की दवा ली, तो रोग ने और भी गंभीर रूप ले लिया। यहाँ तक कि मल के रास्ते से खून के थक्के निकलने लगे। शरीर के सभी जोड़ों में असहनीय दर्द होने लगा। कमजोरी इतनी बढ़ गई थी कि चलने-फिरने तो क्या, साँस तक लेने में दिक्कत होने लगी थी।                     
    
🔵 जब देखा कि इधर-उधर की दवाओं से रोग ठीक होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है, तो गम्भीरता से इलाज कराने की बात सोची गई। 
    
🔴 शहर के एक बड़े नर्सिंग होम में इलाज शुरू हुआ। कई तरह की जाँच के बाद डॉक्टर ने बताया कि अल्सरेटिव कोलाइटिस होगया है।             
🔵 यह एक अमेरिकन बीमारी है, जो करोड़ों में किसी एक आदमी को होती है। इस रोग के लिये कोई कारगर दवा नहीं निकल पाई है। रोग का कारण क्या है, यह भी आज तक मालूम नहीं किया जा सका है। 
    
🔴 लक्षणों के आधार पर जो भी दवाएँ इसमें प्रयुक्त होती हैं, उनके साइड इफेक्ट बहुत ही खतरनाक हैं। इन दवाओं के प्रयोग से हड्डियाँ कमजोर होने लगती हैं और धीरे धीरे जीवनी शक्ति कम हो जाती है।             
🔵 लेकिन मरता क्या न करता? जब ऐसी बीमारी हो गई, तो इलाज तो कराना ही पड़ेगा। डॉक्टर के परामर्श से उन्हीं दवाओं का सेवन शुरू किया। जब तक दवा लेती रहती तभी तक रोग कुछ हद तक नियंत्रण में रहता और दवा छोड़ते ही फिर से बढ़ना शुरू हो जाता।इसी तरह आठ वर्षों तक दवा चलती रही। इतने वर्षों तक काफी महँगे इलाज के बाद भी स्वस्थ होना तो दूर रहा, उल्टे शरीर की नस-नस कमजोर होती गई। हड्डियाँ तो इतनी कमजोर हो गई थीं कि हल्के से दबाव से भी असहनीय दर्द होने लगता।                         
    
🔴 जीवन भार-सा लगने लगा। मेरी बीमारी ठीक हो जाए, इस कामना से मेरे पिता जी टाटानगर में महामृत्युंजय मंत्र का जप-अनुष्ठान आदि भी करते-कराते रहे। इन प्रयासों से मैं जीवित तो रही, पर हमेशा यही सोचती रहती कि ऐसा जीना भी किस काम का।    

🔵 एक दिन पेट में इतना असहनीय दर्द होने लगा कि मैं बुरी तरह छटपटाने और चीखने-चिल्लाने लगी। सभी ऐसा सोचने लगे कि अब अंतिम समय आ गया है। घर में रोना-धोना शुरू हो गया।                 
          
🔴 माता-पिता पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करने लगे, रो-रोकर उनसे मेरे जीवन की भीख माँगने लगे। पर मुझे लगता था कि ऐसी मौत से बदतर जिन्दगी के लिए क्या रोना। यह जितनी जल्दी समाप्त हो जाए, उतना अच्छा है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि गुरुदेव से की गई दिन भर की प्रार्थना के बाद उस रात मुझे बहुत अच्छी नींद आई।                                                             
🔵 अगले ही दिन हमारे एक पारिवारिक मित्र घर आये। वे गायत्री परिवार के परिजन हैं, जो हाल में ही शान्तिकुञ्ज से वापस आए थे। उन्हें मेरी बीमारी के बारे में जानकारी थी। 
    
🔴 शान्तिकुञ्ज में उन्होंने मेरे स्वास्थ्य लाभ के लिए सामूहिक जप करवाया, और कुछ जड़ी-बूटियाँ भी ले आए। उन्होंने कहा कि माँ गायत्री का नाम लेकर जड़ी-बूटियों की यह दवा खा लीजिए। परम पूज्य गुरुदेव जरूर आपकी रक्षा करेंगे।  
     
🔵 सचमुच ही उस दवा के सेवन से मुझे काफी राहत मिली। पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि मैं पूर्ण स्वस्थ भी हो सकती हूँ। कुछ आशान्वित होकर माता पिता के साथ मैं नवम्बर 2010 में शान्तिकुञ्ज गई। 
    
🔴 शांतिकुंज में आदरणीय डॉक्टर साहब से मिली। रोग के बारे में सुनकर उन्होंने भी कहा कि इसका सही इलाज एलोपैथी में है ही नहीं। पर निराश होने की जरूरत नहीं है। इसका आध्यात्मिक उपचार संभव है। उन्होंने मुझे देव संस्कृति विश्वविद्यालय में जाकर डॉ. वन्दना से मिलने की सलाह दी। 
    
🔵 डॉ. वन्दना ने कहा कि एकमात्र यज्ञोपैथी से ही इसका इलाज सम्भव है। उन्होंने विशेष रूप से तैयार की गई हवन सामग्री से नित्य हवन करने के लिये कहा और निर्गुण्डी तथा गिलोय सेवन करने के लिये दिया।     
    
🔴 नित्य हवन तथा इन दवाओं के सेवन से एक महीने में ही इतनी राहत मिली कि मैं दंग रह गई। पेट का दर्द बिल्कुल ठीक हो गया। शारीरिक कमजोरी काफी हद तक कम हो गई। फिर से जीने की इच्छा जाग उठी। ऐसा अनुभव होने लगा कि नया जीवन मिला हो।                         
🔵 अंग्रेजी दवा लेना छोड़ चुकी थी। एक पखवाड़े के अन्दर ही न केवल शारीरिक कमजोरी दूर हो गई, अपितु मानसिक स्तर पर भी मैं अपने-आपको काफी मजबूत महसूस करने लगी। 
    
🔴 मानसिक अवसाद का नामो-निशान नहीं रह गया था। इस प्रकार आध्यात्मिक शक्तियों के अनुदान से तीन महीने बीतते-बीतते मैं पूरी तरह से स्वस्थ हो गई। 
    
🔵 परम पूज्य गुरुदेव ने मुझ अकिंचन पर असीम कृपा करके यह जो नई जिन्दगी दी है, अब इसे उन्हीं के काम में लगाने का संकल्प ले चुकी हूँ।  

🌹  डॉ. अनीता शरण चैम्बूर, मुम्बई (महाराष्ट्र)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 धर्म जीतेगा अधर्म हारेगा

🔶 दीपक बुझने को होता है तो एक बार वह बड़े जोर से जलता है, प्राणी जब मरता हे तो एक बार बड़े जोर से हिचकी लेता है। चींटी को मरते समय पंख उगते हैं, पाप भी अपने अन्तिम समय में बड़ा विकराल रूप धारण कर लेता। युग परिवर्तन की संध्या में पाप का इतना प्रचंड, उग्र और भयंकर रूप दिखाई देगा जैसा कि सदियों से देखा क्या सुना भी न गया था। दुष्टता हद दर्जे को पहुँच जायगी, एक बार ऐसा प्रतीत होगा कि अधर्म की अखंड विजयदुन्द भी बज गई और धर्म बेचारा दुम दबा कर भाग गया, किन्तु ऐसे समय भयभीत होने का कोई कारण नहीं, यह अधर्म की भयंकरता अस्थायी होगी, उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना मात्र होगी। अवतार प्रेरित धर्म भावना पूरे वेग के साथ उठेगी और अनीति को नष्ट करने के लिए विकट संग्राम करेगी। रावण के सिर कट जाने पर भी फिर नये उग आते थे फिर भी अन्ततः रावण मर ही गया।                           

🔷 अधर्म से धर्म का, असत्य से सत्य का, अनीति से नीति का, अन्धकार से प्रकाश का, दुर्गन्ध से मलयानिल का, सड़े हुए कुविचारों से नवयुग निर्माण की दिव्य भावना का घोर युद्ध होगा। इस धर्म युद्ध में ईश्वरीय सहायता न्यायी पक्ष को मिलेगी। पाँडवों की थोड़ी सेना कौरवों के मुकाबले में, राम का छोटा सा वानर दल विशाल असुर सेना के मुकाबले में, विजयी हुआ था, अधर्म अनीति की विश्व व्यापी महाशक्ति के मुकाबले में सतयुग निर्माताओं का दल छोटा सा मालूम पड़ेगा, परन्तु भली प्रकार नोट कर लीजिए, हम भविष्यवाणी करते हैं कि निकट भविष्य में सारे पाप प्रपंच ईश्वरीय कोप की अग्नि में जल-जल कर भस्म हो जायेंगे और संसार में सर्वत्र सद्भावों की विजय पताका फहरा वेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 16

👉 वे जिन्होंने मोह को जीता

🔴 गुरु गोविंद सिंह उन दिनों चमकौर के किले में रहकर, मुगलों से युद्ध कर रहे थे। मुखवाल से जाते समय उनकी माता और दो नन्हें बच्चे फतहसिंह और जोरावरसिंह बिछुड गये थे। लेकिन गुरु गोविंदसिह को काम में व्यस्त होने के कारण उनको खोजने का समय न मिल पाया था। वे अपने बड़े लडकों अजीतसिंह और जुझारसिंह के साथ चमकौर के किले में रहकर आगे की योजनाएं बनाने और कार्यान्वित करने में व्यस्त थे। तभी एक दिन कुछ दूत उनके पास संदेश लेकर आए। वे मुखवाल और आनंदगढ़ की तरफ से ही आए थे।

🔵 गुरु गोविंदसिंह ने दूतों का स्वागत किया और हँसकर पूछा-बताओ भाई हमें छोड़कर गए हुए सिक्खों और बिछुडी़ हुई माता एवं दोनों कुमारों का कोई समाचर है और अगर शत्रुओं का कोई समाचार हो तो बतलाऔ। दूतों ने कहा गुरुजी! जो सिक्ख मुखवाल से आपका साथ छोड़कर चले गए उनके गाँव पहुँचने पर उनके परिवार वालों तक ने उन्हें धिक्कार कर विश्वासघाती कहा। उनको अपनी गलती अनुभव हुई, और अब वे सब आपसे क्षमा माँगने के लिये इधर चल पडे है।" गुरु गोविंदसिंह ने हर्षपूर्वव कहा-यह तो बडा शुभ समाचार है, उनको अब भूला नही कहा जा सकता और आगे के समाचार बतलाओ।"

🔴 दूतों ने आगे कहा- "यह जानकर कि आप चमकौर में विराजमान हैं मुगलों की एक बडी़ भारी सेना चमकौर पर आक्रमण करने आ रही है।" गुरु गोविंद सिंह ने कहा- यह तो और भी अच्छा समाचार है। धर्म युद्ध तो तब तक चलता ही रहना चाहिए, जब तक अधर्म का नाश न हो जाए।'' आगे बतलाओ माता और कुमारों का क्या समाचार है क्या कुमारों या माता ने शत्रुओं की शरण ले ली अथवा प्राणो के मोह में धर्म मार्ग से विचलित हो गए,  दूत तत्काल बोल उठ महाराज ऐसा न कहे। कुमारों ने धर्म के नाम पर बलिदान दे दिया है। यह कहकर दूत रोने लगे, गुरु गोविंद सिंह ने उत्सुकतापूर्वक कहा- ''अरे भाई तुम ऐसा शुम समाचार सुनाते वक्त इस प्रकार रो रहे हो। यह तो ठीक नहीं। शुभ समाचार तो हँसते हुए उत्साहपूर्वक सुनाना चाहिए। जल्दी बताओ उन सिंह संतानों ने कहाँ और क्स प्रकार धर्म पर अपना बलिदान दे दिया ?  

🔵 दूतों ने बतलाया-गुरुजी मुखवाल से बिछुडकर माता और कुमार गंगू रसोइये के साथ उसके घर चले गए, कितु गंगू ने माता जी के साथ विश्वासघात करके कुमारों को गिरफ्तार कराकर सरहिंद के नवाब के हवाले कर दिया। सरहिंद के नवाब ने उनसे कहा-बालकों अगर तुम मुसलमान हो जाओ तो तुम्हारी जान बख्स दी जायेगी, शाहजादियों से तुम्हारी शादी करा दी जायेगी, और एक बहुत बडी़ जागीर इनाम में दे दी जायेगी, किन्तु वे दोनों कुमार न तो मौत से डरे और न लालच में आये। 

🔴 उन्होंने नबाव से साफ-साफ कह दिया कि धर्म की महत्ता एक प्राण क्या करोडो़ं प्राणों से भी अधिक है और न धर्म बिकने वाली चीज है, जो आप लोभ देकर खरीदना चाहते हैं। आप बेशक हमारे प्राण ले लीजिए। लेकिन हम अपना धर्म नही छोड़ सकते। इस पर नबाव ने सरदारों को बच्चों के मार डालने का हुक्म दिया, लेकिन वे तैयार न हुए। तब नबाव ने उन बच्चों को किले की दीवार में जिन्दा चुनवा दिया लेकिन वे दोनों कुमार अंत तक हँसते और धर्म की जय बोलते रहे। माता ने यह समाचार सुना तो छत से कूदकर प्राण दे दिए। गुरु गोविंदसिंह खुशी से उछल पड़े, फतह सिंह और जोरावर सिंह सच्चे धर्म वीर थे। हम सबको उनसे शिक्षा लेनी चाहिए, इसी प्रकार निर्भय बलिदान देकर ही धर्म की रक्षा की जाती है। वीरों तुमने धर्म की साख बढाई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 97, 98

👉 आप का मन

🔴 मन की शरीर पर क्रिया एवं शरीर की मन पर प्रतिक्रिया निरंतर होती रहती है। जैसा आप का मन, वैसा ही आप का शरीर, जैसा शरीर, वैसा ही मन का स्वरूप। यदि शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा है, तो मन भी क्लांत, अस्वस्थ एवं पीड़ित हो जाता है। वेदांत में यह स्पष्ट किया गया है कि समस्त संसार की गतिविधि का निर्माण मन द्वारा ही हुआ है।

🔵 जैसा हमारी भावनाएँ, इच्छाएँ, वासनाएँ अथवा कल्पनाएँ हैं, तदनुसार ही हमें शरीर और अंग-प्रत्यंग की बनावट प्राप्त हुई है। मनुष्य के माता-पिता, परिस्थितियाँ, जन्मस्थान, आयु, स्वास्थ्य, विशेष प्रकार के भिन्न शरीर प्राप्त करना, स्वयं हमारे व्यक्तिगत मानसिक संस्कारों पर निर्भर है। हमारा बाह्य जगत हमारे प्रसुप्त संस्कारों की प्रतिच्छाया मात्र है।

🔴 संगम अपने आप में न निकृष्ट है, न उत्तम। सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन के पश्चात् हमें प्रतीत होता है कि यह वैसा ही है, जैसी प्रतिकृति हमारे अंतर्जगत में विद्यमान है। हमारी दुनियाँ वैसी ही है, जैसा हमारा अंत:करण का स्वरूप।

🔵 भलाई, बुराई, उत्तमता, निकृष्टता, भव्यता, कुरूपता, मन की ऊँची नीची भूमिकाएँ मात्र हैं। हमारे अपने हाथ में है कि हम चाहे ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ की भट्टी में भस्म होते रहें और अपना जीवन शूलमय बनाएँ अथवा सद्गुणों का समावेश कर अपने अंत:करण में शांति स्थापित करें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
🌹 -अखण्ड ज्योति-फरवरी 1946 पृष्ठ 4

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 March

🔴 आत्मा परमात्मा का अंश है। जिन भोगों से शरीर को आनन्द मिलता है। उन्हीं से आत्मा को भी मिले आवश्यक नहीं। जिस क्षण से हम इस दुनिया में आते हैं उससे लेकर मृत्यु तक आत्मा हमारे शरीर में उपस्थित है। शरीर के भिन्न भिन्न अवयवों की क्षमता विशेषता एवं क्रिया कलाप के बारे में बहुत सी बातें जानते हैं और अधिक जानने का प्रयास करते हैं। लेकिन अपने ही अन्दर छिपी आत्म को जानने पहचानने समझने एवं विकसित करने की बात हम नहीं जानते।

🔵 जीवन के समग्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह आवश्यक है कि हम शरीर एवं आत्मा दोनों के समन्वित विकास परिष्कार एवं तुष्टि पुष्टि का दृष्टिकोण बनावे। एक को ही सिर्फ विकसित करे और एक को अपेक्षित करें ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से सच्चा आनन्द नहीं मिल सकता। सिर्फ आत्मा का ही परिष्कार एवं विकास करें और शरीर को उपेक्षित करें इससे भी अपना कल्याण नहीं हो सकता। उसी प्रकार जब आत्म को कष्ट पहुँचता है तो मन दुःखी होकर शरीर को प्रभावित करता है।

🔴 जिन्होंने अपनी आत्म को दीन हीन स्थिति में रखा है और उसकी प्रचण्ड शक्ति से परिचित नहीं है वे मुर्दों जैसा जीवन जीने के लिए मजबूर होते हैं। वे शारीरिक सामर्थ्य रहते हुए भी बड़ी गयी गुजरी स्थिति में रहते हैं और निराशा चिन्ता एवं निरर्थक जीवन बिताते रहते हैं। जबकि अपाहिज अपंग क्षीणकाय रुग्ण एवं दुर्बल व्यक्तियों ने भी अपने आत्मबल के द्वारा ऐसे कार्य सम्पादित किये है जिनसे वे इतिहास में अमर हो गये है। सैकड़ों लोगों के लिए वे प्रेरणा के स्रोत बने है। 

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://awgpskj.blogspot.in/2017/03/24-march.html

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 45)

🌹 सर्वश्रेष्ठ साधना

🔴 प्राचीन भारतीयों की आयु औसतन सौ वर्ष कही होती थी। जो व्यक्ति संयोगवश सामान्य जीवन में सौ वर्ष से कम जीता था, उसे अल्प आयु का दोषी माना जाता था, उसकी मृत्यु को अकाल मृत्यु कहा जाता था। इस शतायुष्य का रहस्य जहां उनका सात्विक तथा सौम्य रहन-सहन, आचार-विचार और आहार-विहार होता था, वहां सबसे बड़ा रहस्य उनकी तत्सम्बन्धी विचार साधना रहा है। वे वेदों में दिये— ‘प्रव्रवाम शरदः शतम्। अदीनः स्याम शरद शतम्।’ जैसे अनेकों मन्त्रों का जाप किया करते थे। यह मन्त्र जाप आयु सम्बन्धी विचार साधना के सिवाय और क्या होता था।

🔵 गायत्री मन्त्र की साधना का भी यही रहस्य है। इस मन्त्र का जाप करने वालों को बहुधा ही तेजस्वी समृद्धिवान् तथा ज्ञानवान् क्यों देखा जाता है? इसीलिए कि इस मन्त्र के माध्यम से सविता देव की उपासना के साथ, सुख समृद्धि तथा ज्ञान परक विचारों की साधना की जाती है। मनुष्य जीवन में जो कुछ पाता या खोता है, उसका हेतु मान भले ही किन्हीं और कारणों को लिया जाये, किन्तु उसका वास्तविक कारण मनुष्य के अपने विचार ही होते हैं, जिन्हें धारण कर वह जान अथवा अनजान दशा में प्रत्यक्ष से लेकर गुप्त मन तक चिन्तन तथा मनन करता है। 

🔴 विचार साधना मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है। इसके समान सरल तथा सद्यः फलदायनी साधना दूसरी नहीं है। मनुष्य जो कुछ पाना चाहता है, उसके अनुरूप विचार धारण कर उनकी साधना करते रहने से वह अपने मन्तव्य में निश्चय ही सफल हो जाता। यदि किसी में स्वावलम्बन की कमी है और वह स्वावलम्बी बनकर आत्मनिर्भरता की सुखद स्थिति पाना चाहता है तो उसे चाहिए कि वह तदनुरूप विचारों की साधना करने के लिए इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, ‘‘मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है। मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 24)

🌹 प्रखर प्रतिभा का उद्गम-स्रोत 

🔵 अनगढ़ और पुरुषार्थी, दो स्तर के लोग आम जनता के बीच पाये जाते हैं। उन्हीं को गरीब-अमीर व सफल-असफल भी कहते हैं, किंतु इन सबसे ऊँचा एक और स्तर है, जिसे देवमानव कहकर सराहा जाता है। प्रतिभाशाली उपयुक्त सफलताएँ पाते हैं; भले ही उसका दुरुपयोग करके अपयश के भाजन ही क्यों न बनें, किंतु जिनने अपने गुुण-कर्म-स्वभाव को सुनियोजित व सुसंस्कृत बना लिया है, उनके लिये आत्मिक संतोष, लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह, तीनों ही सुरक्षित रहते और दिन-दिन समुन्नत होते जाते हैं।                

🔴 वस्तुत: व्यक्तित्व का परिष्कार और उदात्तीकरण ही वह योगाभ्यास है, जिसके माहात्म्य को लोक और परलोक की अभीष्ट सफलताएँ देने वाला बताया गया है। प्रखर प्रतिभा का उद्गम-स्रोत ईश्वर है। जिसे दूसरे शब्दों में सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय भी कहा जा सकता है। मनुष्य-जीवन में वह गरिमामयी आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के रूप में अवतरित होता है। पूजा-उपासना के समस्त कर्मकाण्डों का उद्देश्य इसी आंतरिक वरिष्ठता का सम्पादन और अभिवर्द्धन करना है।  

🔵 मशीनों में बिजली का करेंट कम मात्रा में पहुँचता है तो उनकी चाल बहुत धीमी पड़ जाती है, पर जैसे-जैसे वह विद्युत् प्रवाह बढ़ता है, वैसे-वैसे ही उन सब में तेजी, गति और शक्ति बढ़ती जाती है। चेतना का कामचलाऊ अंश तो प्राणिमात्र में रहता है, जिससे वह किसी प्रकार अपनी जीवनचर्या चलाता रह सके। यह जन्मजात है, किंतु जब कभी इसकी अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता पड़ती है तो वह योग और तपपरक साधना करता है। इन दोनों का तात्पर्य प्रकारांतर से प्रतिभा और सेवा-साधना में सरलता अनुभव होने की प्रवृत्ति ही समझी जा सकती है।     
    
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 25)

🌹 प्रगति के कदम-प्रतिज्ञाएँ

पुण्य बढ़ाएँ-

🔴 इसी प्रकार से आदमी को एक और बात शुरू करनी चाहिए कि हम अपनी संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग जो बहुत छोटा है, उसको हम पालन किया करेंगे, पूरा किया करेंगे। एक महत्त्वपूर्ण अंग ये है कि हमको अपने बड़ों की- बुजुर्गों की इज्जत करनी सीखना चाहिए। मैं उनकी हर बात मानने के लिए नहीं कहता। जो बात मुनासिब नहीं है, बिलकुल नहीं मानना चाहिए। लेकिन बड़ों की इज्जत जरूर करनी चाहिए। बड़ों के पैर छूना चाहिए। सबेरे उठना चाहिए। ये हमारी शालीनतापरक प्रक्रिया है। इससे पारिवारिक वातावरण अच्छा होता है। छोटे और बड़ों के बीच प्रेम भाव पैदा होता है। परिवार प्रणाली में जहाँ जरा- जरा सी बात के ऊपर बार- बार मोह- मालिन्य पैदा होते रहते हैं, वह इससे दूर हो जाते हैं और हमारे बच्चों को ये सीखने का मौका मिलता है कि हमको बड़ों की इज्जत करना चाहिए।          

🔵 अगर हम पिताजी, माताजी, बड़े भाई, चाचाजी सबके पैर छूयेंगे, तो हमारे छोटे बच्चे भी वैसा अनुकरण करेंगे और हमारे घर में श्रेष्ठ परम्पराएँ पैदा हो जायेंगी। इस तरीके से कोई न कोई काम करना चाहिए और कोई अच्छाई शुरू करनी चाहिए, कोई बुराई दूर करनी चाहिए। यही गायत्री मंत्रदीक्षा की गुरु दक्षिणा है और यही यज्ञोपवीत पहनने की गुरु दक्षिणा है। इस तरह की प्रतिज्ञा की जानी चाहिए।        

🔴 साधक को मन ही मन में ये भाव करना चाहिए कि मन में अमुक बुराई जो हमारे भीतर अब तक थी, उस बुराई को हम त्याग कर रहे हैं और अमुक अच्छाई जो हमारे भीतर नहीं थी, उसको हम प्रारम्भ कर रहे हैं। बहुत सी अच्छाइयाँ हैं- दया करना, प्रेम करना, समाज की सेवा करना, क्या- क्या हजारों अच्छाइयाँ हैं। कम से कम एक अच्छाई कि हम बड़ों के पैर छूआ करेंगे, स्त्री अपने पति और सास के पैर छूआ करें और पुरुष अपने भाई और बहिन और माता- पिता और चाचा- ताऊ और बड़ा भाई, बड़ी भाभी के पैर छूआ करेंगे। हमारे घर में उत्तम और श्रेष्ठ परम्पराएँ कायम हों।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...