शनिवार, 5 मई 2018

👉 भगवान बुद्ध

🔷 भगवान् बुद्ध अनाथ पिण्डक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य अनाथ पिण्डक भी समीप ही बैठा, धर्म चर्चा का लाभ ले रहा था।

🔶 तभी सामने से महाकाश्यप मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुन्द और देवदत्त आदि आते हुए दिखाई दिये। उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा-वत्स! उठो, यह ब्राह्मण मण्डली आ रही है, उसके लिये योग्य आसन का प्रबन्ध करो।

🔷 अनाथ पिण्डक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा- भगवन्! आप सम्भवतः इन्हें जानते नहीं। ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और कोई अस्पृश्य भी हैं।

🔶 गौतम बुद्ध अनाथ पिण्डक के वचन सुनकर हंसे और बोले- तात! जाति-जन्म से नहीं, गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ, रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवाभावी होने के कारण ही इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1970

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 May 2018


👉 पुस्तक-प्रेम

🔷 दार्शनिक एमर्सन कहा करते थे, कि “पुस्तकों का स्नेह ईश्वर के राज्य में पहुँचने का विमान है।” निस्संदेह मनुष्य की अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाने में, अज्ञ से विज्ञ बनाने में जितना काम पुस्तक ने किया उतना और पदार्थ द्वारा नहीं हुआ। निस्संदेह मनुष्य की अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाने में, अज्ञ से विज्ञ बनाने में जितना काम पुस्तक ने किया उतना और पदार्थ द्वारा नहीं हुआ। श्रेष्ठ महापुरुषों, दिव्य दार्शनिकों और खोज करने वाले तपस्वियों के घोर परिश्रम द्वारा प्राप्त हुए बहुमूल्य रत्न पुस्तकों की तिजोरी में बन्द हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि इतने अनुभव पूर्ण ज्ञान को हम इतनी आसानी से पुस्तकों द्वारा प्राप्त कर लेते हैं।

🔶 सिसरो ने कहा है कि अच्छी पुस्तकों को घर में इकट्ठा करना मानो घर को देव मंदिर बना लेना है। कार्लाईल ने लिखा है—”जिन घरों में अच्छी किताबें नहीं वे जीवित मुर्दों के रहने के कब्रिस्तान हैं।” जीवन कला एवं सरसता का समावेश पुस्तकों की सहायता से होता है। जिन्दगी की पेचीदा समस्याओं के ऊपर विचार करने के लिए पुस्तकें प्रोत्साहन देती हैं और प्रकाश—दीप की भाँति सत्मार्ग की ओर हमारा पथ प्रदर्शन करती हैं।

🔷 कैम्पिस ने एक बार लोगों को उपदेश दिया था कि—’अपना कोट बेचकर भी अच्छी किताबें खरीदो।’ उनका कहना था कि कोट के अभाव में जाड़े के कारण आपके शरीर को कुछ कष्ट होगा, परन्तु पुस्तकों के अभाव में आत्मा को भूखा मरना पड़ेगा। भौतिक जगत की जड़ता नीरसता ओर बहिरंगता की कर्कशता से छुड़ाने की शक्ति पुस्तकों में हैं उन्हीं में जीवन का अमृत रस भरा हुआ है जिसे पान करके तुच्छ जीव से ऊँचे उठकर हम महामानव बनते हैं। हर मनुष्य को पुस्तक प्रेमी होना चाहिए विचारपूर्ण सत ग्रन्थों का संग्रह और स्वाध्याय करना अपने को पशुता से देवत्व की ओर ले जाना का स्पष्ट चिन्ह है।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1944 पृष्ठ 8

👉 Humanity: Our Precious Heritage – Part 2

🔷 There was an era during which ennobling feelings of helping others reigned. A person used to think, “How could I be of help to others? Whom should I offer my services to so as to uplift his condition?” This was considered a measure of superiority. People did not yearn as much for riches, glory, etc as they did for sacrificing themselves in the interest of the society and the world. They considered it honourable to give up life for ideals and whosoever got this opportunity considered it God’s grace bestowed upon them.

🔶 History contains several examples of sacrifices of highest stature. Pannadai sacrificed her son for the security of the royal throne. Sukanya had accidentally damaged the eyes of Rishi Chyavan. In repentance, she married him and shared all his hardships. Is such sacrifice less than ideal? Gandhari’s husband Dhritrashtra was blind; she could not bear the difficulties he was going through due to his blindness. Hence she voluntarily chose blindness by covering her eyes with a strip of cloth. Can anyone forget this piece of history? Such glorious examples of unbelievable sacrifices have been the backbone of the Hindu culture. It is the reason why India’s fame radiates even today like a brilliant constellation in the sky.

📖 Akhand Jyoti Jan 2001

👉 साँचे बनें, सम्पर्क करें

🔷 प्रज्ञा परिवार  सृजन का संकल्प लेकर चला है। उसके सदस्यों, सैनिकों का स्तर ऊँचा होना चाहिए। ऐसा ऊँचा इतना अनुशासित कि उसके कृ र्तृत्व को देखकर अनेक की चेतना जाग पड़े और पीछे चलने वालों की कमी न रहे। बढ़िया साँचों में ही बढ़िया आभूषण, पुर्जे या खिलौने ढलते हैं। यदि साँचे ही आड़े-तिरछे हों तो उनके संपर्क क्षेत्र में आने वाले भी वैसे ही घटिया—वैसे ही फूहड़ होंगे। इसी प्रयास को संपन्न करने के लिए कहा गया है। इसी को उच्चस्तरीय आत्म परिष्कार कहा गया है। यही महाभारत जीतना है। जन-नेतृत्व करने वालों को आग पर भी, कसौटी पर भी खरा उतरना चाहिए। लोभ, मोह और अंहकार पर जितना अंकुश लगाया जा सके लगाना चाहिए। तभी वर्तमान प्रज्ञा परिजनों से यह आशा की जा सकेगी कि वे अपनी प्रतिभा से अपने क्षेत्र को आलोकित कर सकें गे और सृजन का वातावरण बना सकेंगे।

🔶 दूसरा कार्य यह है कि नवयुग के संदेश को और भी व्यापक बनाया जाए। इसके लिए जन-जन से संपर्क  साधा जाए। घर-घर अलख जगाया जाए। मिशन की पृष्ठभूमि से अपने समूचे संपर्क क्षेत्र को अवगत कराया जाए। पढ़ाकर भी और सुनाकर भी। इन अवगत होने वालों में से जो भी उत्साहित होते दिखाई पड़ें उन्हें कुछ छोटे-छोटे काम सौंपे जाएँ। भले ही वे जन्मदिन मनाने जैसे अति सुगम और अति साधारण ही क्यों न हों। पर उनमें कुछ श्रम करना, कुछ सोचना और कुछ कहना पड़ता है। तभी वह व्यवस्था जुटती है। ऐसे छोटे आयोजन संपन्न कर लेने पर मनुष्य की झिझक छूटती है, हिम्मत बढ़ती है और वह क्षमता उदय होती है, जिसके माध्यम से नव सृजन प्रयोजन के लिए जिन बड़े-बड़े कार्यों की आवश्यकता है, उन्हें पूरा किया जा सके।
  
🔷 जो कार्य अगले दिनों करने हैं, वे पुल खड़े करने, बाँध बाँधने, बिजली घर तैयार करने जैसे विशालकाय होंगे। इसके लिए इंजीनियर नहीं होंगे, और न ऊँचे वेतन पर उनकी क्षमता को खरीदा जा सकेगा। वे अपने ही रीछ वानरों में से होंगे। समुद्र पर पुल बाँधने जैसे कार्य में नल-नील जैसे प्रतिभावान भावनाशील ही चाहिए। इसके लिए बुद्ध, गाँधी, विनोबा जैसे चरित्र भी चाहिए और प्रयास भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, अगस्त 1985 पृष्ठ 65   

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 2)

🔷 अज्ञान, आसक्ति, अहंकार वासना एवं संकीर्णता के बंधनों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं। आत्मा-परमात्मा का अंश होने के कारण स्वभावतः युक्त है, उसे यह कुप्रवृत्तियाँ ही अपने बंधन में बाँधकर मायाबद्ध जीव बना लेती है। इन बंधनों से छुटकारा मिलते ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है और जीवन मुक्ति का अनिर्वचनीय उपलब्ध करने लगता है।

🔶 अपनी भूल आप समझ में नहीं आती, यदि समझ में आ जाय तो उसे तुरन्त सुधार लें। रोगी यह नहीं समझता कि मैं कुपथ्य कर रहा हूँ यदि उसे ऐसा पता होता तो कुपथ्य करके प्राणों को संकट में क्यों डालता? यों तो कहने सुनने को हर एक भूल करने वाला और कुमवृध करने वाला यह जानता है कि जो कर रहे हैं वह ठीक नहीं पर ऐसा केवल बाहरी रूप से ही सोचा जाता है, यदि अन्तःकरण के गहन अन्तराल को सच्चे हृदय से या कुपंथ की बुराई मालूम हो जाय तो उसे छोड़ते हुए देर न लगे।

🔷 बात माया बन्धन के बारे में है। स्वार्थ, वासना के निकृष्ट सुख में लोग वैसे ही अनुभव करते रहते हैं जैसे कुत्ता सूखी हड्डी चबा कर मसूड़े छिलने से निकलने वाले ही रक्त को ही चाटता है और रक्तपान का अनुभव करता है। यदि मानव मन को अनुभूति अंतःकरण के गहरे अन्तराल में होना कि माया बन्धन के कटघरे में जो सुख है क्रमवश सुख लगता है वस्तुतः वह भारी घाटे विपत्ति का कारण है तो उसे अपने बन्धनों को तोड़ने में निश्चय ही तत्परता हो जाएगी।

🔶 इस अनुभूति के लिए ही आध्यात्मवाद समस्त शिक्षा और साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15

👉 गुरुगीता (भाग 102)

👉 सच्चे शिष्य का एक ही स्वर- निष्काम कर्म

🔷 गुरूगीता के पिछले क्रम में भगवान् भोलेनाथ ने जगन्माता से ऐसे सिद्ध साधक के विषय में कहा था कि ऐसा मुक्त पुरूष स्वयं सर्वमय होकर परम तत्त्व को देखता है। वह इस सत्य का अनुभव करता है कि आत्म तत्त्व ही श्रेष्ठ है। श्री गुरूकृपा से इस परम तत्त्व का अवलोकन करने के बाद वह शिष्य ,साधक सभी आसक्तियों से रहित, एकाकी, निःस्पृह, शान्त और स्थिर हो जाता है। उसे अभीष्ट मिले या फिर न मिले, उसे ज्यादा मिले या कम मिले, इस चिन्ता को छोड़कर वह सभी कामनाओं से
रहित, संतुष्ट चित्त होकर जीवन यापन करता है। उसे यह सब मिलता है- गुरू द्वारा प्रदर्शित मार्ग का अनुसरण करने से।

🔶 इस गुरू मार्ग की महिमा को बताते हुए भगवान् शिव माता पार्वती से कहते हैं-

उपदेशः तथा देवि गुरूमार्गेण मुक्तिदः। गुरूभक्तिस्तथा ध्यानं सकलं तव कीर्तितम्॥ १२८॥
अनेन यदभवेत् कार्य तद्वदामि महामते। लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ॥ १२९॥
लौकिकात्कर्मणो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवम्। ज्ञानी तू भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म यत्कृतम्॥ १३०॥

🔷 हे देवि! उपदेशित गुरू मार्ग मुक्ति दायक है। गुरू की भक्ति, गुरू का ध्यान और वह सब जो आपसे कहा गया है॥ १२८॥ इस सबका उपयोग साधक को लोक कल्याण के लिए करना चाहिए न कि लौकिक कामनाओं को पूरा करने के लिए॥ १२९॥ जो ज्ञानहीन लोग इन सबका लौकिक कामनाओं के लिए उपयोग करते हैं, उन्हें बार- बार भवसागर में गिरना पड़ता है, परन्तु जो ज्ञानी अपने कर्म का निष्काम भाव से प्रतिपादन करते हैं, वे सभी कर्म बन्धनों से मुक्त रहते हैं॥ १३०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 155

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...