बुधवार, 18 जनवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 Jan 2017


👉 आज का सद्चिंतन 19 Jan 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 12) 19 Jan

🌹 त्रिविध भवबन्धन एवं उनसे मुक्ति

🔴 साधना से तात्पर्य है- साध लेना, सधा लेना। पशु प्रशिक्षक यही करते हैं। अनगढ़ एवं उच्छृंखल पशुओं को वे एक रीति-नीति सिखाते हैं, उनको अभ्यस्त बनाते हैं और उस स्थिति तक पहुँचाते हैं, जिसमें उस असंस्कृत प्राणी को उपयोगी समझा जा सके। उसके बढ़े हुए स्तर का मूल्यांकन हो सके। पालने वाला अपने को लाभान्वित हुआ देख सके। सिखाने वाला भी अपने प्रयास की सार्थकता देखते हुए प्रसन्न हो सके।           

🔵 देखा यह जाता है कि भक्त भगवान् को साधता है। उसको मूर्ख समझते हुए उसकी गलतियाँ निकालता है। तरह-तरह के उलाहने देता है। साथ ही गिड़गिड़ाकर, नाक रगड़कर, खींसें निपोरकर अपना-अपना अनुचित उल्लू सीधा करने के लिये जाल-जंजाल बुनता है। प्रशंसा के पुल बाँधता है। छिटपुट भेंट चढ़ाकर उसे फुसलाने का प्रयत्न करता है। समझा जाता है कि सामान्य लोगों से व्यावहारिक जगत में आदान-प्रदान के आधार पर ही लेन-देन चलता है, पर ईश्वर या देवता ऐसे हैं जिन्हें वाणी की वाचालता तथा शारीरिक-मानसिक उचक-मचक करने भर से वशवर्ती नहीं किया जा सकता है। यह दार्शनिक भूल मनुष्य को एक प्रकार से छिपा हुआ नास्तिक बना देती है। प्रकट नास्तिक वे हैं जो प्रत्यक्षवाद के आधार पर ईश्वर की सत्ता स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने पर उसकी मान्यता से इंकार कर देते हैं।

🔴 दूसरे छिपे नास्तिक वे हैं जो उससे पक्षपात की, मुफ्त में लम्बी-चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति चाहते रहते हैं। मनुष्य विधि व्यवस्था को तोड़ता-छोड़ता रहता है, पर ईश्वर के लिये यह सम्भव नहीं कि अपनी बनाई कर्मफल व्यवस्था का उल्लंघन करे या दूसरों को ऐसा करने के लिये उत्साहित करे। तथाकथित भक्त लोग ऐसी ही आशाएँ किया करते हैं। अन्तत: उन्हें निराश ही होना पड़ता है। इस निराशा की खीज और थकान से वे या तो साधना-विधान को मिथ्या बताते हैं या ईश्वर के निष्ठुर होने की मान्यता बनाते हैं। कई पाखण्डी कुछ भी हस्तगत न होने पर भी प्रवंचना रचते हैं और नकटा सम्प्रदाय की तरह अपनी सिद्धि-सफलता का बखान करते हैं। आज का आस्तिकवाद इसी विडम्बना में फँसा हुआ है और वह लगभग नास्तिकवाद के स्तर पर जा पहुँचा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पत्नी त्याग - महापाप

🔵 उत्तानपाद के पुत्र और तपस्वी ध्रुव के छोटे भाई का नाम उत्तम था। यद्यपि वह धर्मात्मा राजा था फिर भी उसने एक बार अपनी पत्नी से अप्रसन्न होकर उसे घर से निकाल दिया और अकेला ही घर में रहने लगा।

🔴 एक दिन एक ब्राह्मण राजा उत्तम के पास आया और कहा- मेरी पत्नी को कोई चुरा ले गया है। यद्यपि वह स्वभाव की बड़ी क्रूर वाणी से कठोर, कुरूप और अनेक कुलक्षणों से भरी हुई थी, पर मुझे अपनी पत्नी की रक्षा, सेवा और सहायता करनी ही उचित है। राजा ने ब्राह्मण को दूसरी पत्नी दिला देने की बात कही पर उसने कहा- पत्नी के प्रति पति को वैसा ही सहृदय और धर्म परायण होना चाहिए जैसा कि पतिव्रता स्त्रियाँ होती है।

🔵 राजा ब्राह्मण की पत्नी को ढूँढ़ने के लिए चल दिया। चलते -चलते वह एक वन में पहुँचा जहाँ एक तपस्वी महात्मा तप कर रहे थे। राजा का अपना अतिथि ज्ञान ऋषि ने अपने शिष्य को अर्घ्य, मधुपर्क आदि स्वागत का समान लाने को कहा। पर शिष्य ने उनके कान में एक गुप्त बात कही तो ऋषि चुप हो गये और उनने बिना स्वागत उपचार किये साधारण रीति से ही राजा से वार्ता की।

🔴 राजा का इस पर आश्चर्य हुआ। उनने स्वागत का कार्य स्थगित कर देने का कारण बड़े दुःख, विनय और संकोच के साथ पूछा। ऋषि ने उत्तर दिया- राजन् आप ने पत्नी का त्याग कर वही पाप किया है। जो स्त्रियाँ किसी कारण से अपने पति का त्याग कर करती हैं। चाहे स्त्री दुष्ट स्वभाव की ही क्यों न हो पर उसका पालन और संरक्षण करना ही धर्म तथा कर्तव्य है। आप इस कर्तव्य से विमुख होने के कारण निन्दा और तिरस्कार के पात्र हैं। आपके पत्नी त्याग का पाप मालूम होने पर आपका स्वागत स्थगित करना पड़ा।

🔵 राजा को अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण की स्त्री के साथ ही अपनी स्त्री को भी ढूँढ़ा और उनको सत्कार पूर्वक राजा तथा ब्राह्मण ने अपने अपने घर में रखा।
🔴 देवताओं की साक्षी में पाणिग्रहण की हुई पत्नी में अनेक दोष होने पर भी उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने सद् व्यवहार से दुर्गुणी पति को सुधारती है वैसे ही हर पुरुष को पत्नीव्रती होना चाहिए और प्रेम तथा सद् व्यवहार से उसे सुधारता चाहिए। त्याग करना तो कर्तव्यघात है।

👉 झूठा वैराग्य

🔵 कितने ऐसे मनुष्य हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी मौलिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्भय, निष्ठुर होते हैं। निस्संदेह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों से, मुसीबतों से, बच जाते हैं, किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती, लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर से कर सकते हैं? जो वज्र वत कठोर हृदय होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा जीवन भी भला कोई जीवन है? वैरागी वह है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम को पूरा कर, सब की सेवा कर, सबसे प्रेम कर, फिर भी सबसे अलग रहता है।

🔴 हम लोगों को यह एक विचित्र आदत सी पड़ गई है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने पड़ते हैं, जो भी कठिनाइयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिए हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरे के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यह हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं। यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायेगा कि यदि हम स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आप का वास असंभव था। हम बुरे हैं तो संसार भी बुरा प्रतीत होगा लेकिन लोग वैराग्य का झूठा ढोल पीटकर अपने को अच्छा और संसार को बुरा बताने की आत्म वंदना किया करते हैं।

🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 5

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 Jan 2017

🔴 हमें मूक सेवा को महत्त्व देना चाहिए। नींव के अज्ञात पत्थरों की छाती पर ही विशाल इमारतें तैयार होती हैं। इतिहास के पन्नों पर लाखों परमार्थियों में से किसी एक का नाम संयोगवश आ पाता है। यदि सभी स्वजनों का नाम छापा जाने लगे तो दुनिया का सारा कागज इसी काम में समाप्त हो जाएगा। यह सोचकर हमें प्रशंसा की ओर से उदास ही नहीं रहना चाहिए, वरन् उसको तिलांजलि भी देनी चाहिए। नामवरी के लिए जो लोग आतुर हैं उनको निम्न स्तर का स्वार्थी ही माना जाना चाहिए।

🔵 युग परिवर्तन का श्रीगणेश इस प्रकार होगा कि जिनकी अंतरात्मा में भगवान् ने देश, धर्म की बात सोचने-समझने की दूरदृष्टि दी हो वे अपना जीवन लक्ष्य भोग से बदलकर त्याग कर लें। समृद्ध बनने की महत्त्वाकाँक्षा को पैरों तले कुचल दें और प्रबुद्ध बनने में गर्व गौरव अनुभव करने लगे।

🔴 आज प्रबुद्ध लोगों की स्थिति भी यह है कि वे लम्बी चौड़ी योजनाएँ बनाने, वाद-विवाद एवं आलोचना करने में तो बहुत सिर खपाते हैं, पर रचनात्मक कार्य करने के लिए जब समय आता है तो बगलें झाँकते हैं, दाँत निपोरते हैं और तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। इस स्थिति को बदला जाना चाहिए। भावनाशील लोगों को आदर्शवाद की चर्चा करते रहने की परिधि तोड़कर अब कुछ करने के लिए आगे आना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पराक्रम और पुरुषार्थ (भाग 21) 18 Jan

🌹 कठिनाइयों से डरिये मत, जूझिये

🔵 यह तो एक उदाहरण मात्र है जिसमें एक ने अपने आत्मविश्वास के कारण शरीर क्षमता में असमर्थ होते हुए भी दूसरे समर्थ और बलिष्ठ व्यक्ति पर विजय पाई जबकि दूसरा सक्षम और समर्थ होते हुए भी आत्मविश्वास खो देने से असफल रहा। आत्मविश्वास को जीवन और निराशा को मृत्यु कहा गया है। आत्मविश्वासी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी अपनी इस विशेषता के कारण उनसे जूझने एवं अनुकूल बनाने में समर्थ होते हैं। उनकी सफलता में परिस्थितियों का शरीर बल एवं बुद्धिबल का उतना महत्व नहीं होता, जितना कि स्वयं के मनोबल का।

🔴 सामान्यतः समझा यह जाता है कि साधनों के अभावों, गई-गुजरी परिस्थितियों और प्रतिकूलताओं के कारण ही मनुष्य असफल होता है। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। अपनी क्षीण निस्तेज अनुत्साही मनोवृत्ति के कारण ही लोग पग-पग पर ठोकरें खाते और असफलताओं का मुंह देखते हैं। कठिनाइयां प्रतिकूलतायें उन व्यक्तियों के लिए बाधक हैं जिन्हें अपने आप पर विश्वास नहीं। कुछ करने के लिए एक कदम बढ़ाने से पूर्व उनका मन अनिष्ट की आशंका से डरने लगता है। सफलता मिलेगी भी कि नहीं। इसके विपरीत आत्मविश्वास और मनोबल के धनी व्यक्ति पहाड़ जैसी विपदाओं को भी पैरों तले रौंदने की हिम्मत रखते हैं। प्रतिकूलताओं से प्रगति क्रम में विलम्ब तो हो सकता है पर यह कहना गलत है कि सफलता ही नहीं मिलेगी। यदि प्रचण्ड इच्छा शक्ति, तत्परता और साहसिकता बनी रहे तो अभीष्ट लक्ष्य तक अवश्य पहुंचा जा सकता है।

🔵 ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जिसमें प्रतिकूलताओं के ऊपर आत्म-विश्वास ने विजय पाई। आत्मविश्वास के अभाव के कारण कितने ही व्यक्ति सामान्यतः पिछड़ेपन से ग्रस्त रहते और अवनति के गर्त में पड़े रहते हैं। कितने ही ऐसे भी होते हैं जो कठिनाइयों को चुनौती देते संघर्षों का आलिंगन करते अन्ततः अभीष्ट तक पहुंचते हैं। अन्तराल में छिपी क्षमतायें उन्हें किसी के आगे हाथ पसारने, गिड़गिड़ाने, दीन-हीन बने रहने के लिए बाध्य नहीं करती। सोया आत्मविश्वास जब जागता है छिपी क्षमतायें जब उभरती हैं— उत्साह जब उमड़ता है तो वह बाहरी सहयोग को भी अपनी आकर्षण शक्ति द्वारा खींच लेता है। तब वह हवाओं का रूप बदलने, दिशाओं को पलट देने, प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल देने की सामर्थ्य रखता है। सीमित सामर्थ्यों के होते हुए भी आत्मविश्वास के बल पर कितने ही व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचे, इतिहास में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 अध्यात्म एक प्रकार का समर (अमृतवाणी) भाग 10

दृष्टि बदले, अपने आपे को संशोधित करें

🔴 बेटे, इन आँखों से देखने की जिस चीज की जरूरत हैं, वह माइक्रोस्कोप तेरे पास होना चाहिए। क्या देखना चाहता है? गुरुजी! सब कुछ देखना चाहता हूँ। बेटे, इन आँखों से नहीं देखा जा सकता। इसको देखने के लिए माइक्रोस्कोप के बढ़िया वाले लेंस चाहिए। कौन से बढ़िया वाले लेंस 'दिव्यं ददामि ते चक्षुः' तुझे अपनी आँखों में दिव्यचक्षु को फिट करना पड़ेगा। फिर देख कि तुझे भगवान दिखाई पड़ता है कि नहीं पड़ता। 'सीय राममय सब जग जानी' की अनुभूति होती है कि नहीं। फिर जर्रे- जर्रे में भगवान, पत्ते- पत्ते में भगवान तुझे दिखाई पड़ सकता है, अगर तेरी आँखों के लेंस सही कर दिए जाएँ तब। अगर लेंस यही रहें तो बेटे, फिर तुझे पाप के अलावा, शैतान के अलावा, हर जगह चालाकी, बेईमानी, हर जगह धूर्तता और दुष्टता के अलावा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ सकता।

🔵 मित्रो! अध्यात्म पर चलने के लिए आत्मसंशोधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। पूजा- उपासना के सारे कर्मकाण्ड, सारे के सारे क्रियाकृत्य आत्मसंशोधन की प्रक्रिया की ओर इशारा करते है। मैंने आपको जो समझाना था, यह सूत्र बता दिया। हमारा अध्यात्म यहीं से शुरू होता है। इसलिए यह जप नहीं हो सकता, भजन नहीं हो सकता, कुछ नहीं हो सकता। केवल यहीं से अर्थात आत्मसंशोधन से हमारा अध्यात्म शुरू होता है। आत्मसंशोघन के बाद ही देवपूजन होता है। देवता बनकर ही देवता की पूजा की जाती है।

🌹 आज की बात समाप्त ।।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ।। ॐ शांति: ।।
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 75)

🌹 गीता के माध्यम से जन-जागरण

🔴 शाखाओं में, साप्ताहिक सत्संगों में गीता-कथा हुआ करे तो कितना अच्छा रहे। प्रतिदिन सायंकाल गीता के दो श्लोकों की व्याख्या का क्रम कहीं चलने लगे तो एक वर्ष में वह धर्मानुष्ठान विधिवत् पूरा हो सकता है। कुल 700 श्लोक हैं, दो श्लोक से 350 दिन में पूरे हो सकते हैं। बाहर के किसी को न सही अपने घर के लोगों को ही उसे नित्य सुनाया जाया करे तो परिवार-निर्माण की समस्या सुलझाने में महत्वपूर्ण योग मिल सकता है। इस प्रकार प्रचार कार्य के लिए बाहर न जा सकने वाले लोगों के लिए भी यह प्रशिक्षण बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।

🔵 गीता समारोहों की श्रृंखला— कुछ समय पूर्व जिस प्रकार गायत्री-यज्ञ होते थे, अब उसी उत्साह से यह ‘गीता कथा सप्ताहों’ के आयोजन जगह-जगह होने चाहिए। शाखाओं को उसकी तैयारी में अभी से लग जाना चाहिए।

🔴 इन गीता सप्ताहों के धर्मानुष्ठानों में बहुत स्वल्प व्यय होगा। अनुमानित व्यय इस प्रकार है—गीता प्रवचन कर्त्ता को 7 दिन का पारिश्रमिक 40 रु. उसका मार्ग व्यय 10 रु. अन्तिम दिन सामूहिक गायत्री यज्ञ का अनुमानित व्यय 30 रु. कन्या भोज 30 रु. प्रचार, मण्डप, रोशनी आदि विविध खर्च 40 रु. इसका कुछ व्यय 150 रु. बैठता है। इसमें किफायत की जाय तो 100 रु. भी हो सकता है और थोड़ा अधिक फैल-फूट कर किया जाय तो यह 200 रु. तक पहुंच सकता है। इतने महत्वपूर्ण आयोजन के लिए इतनी रकम कोई अधिक नहीं है और ऐसी भी नहीं है, जो छोटे गांवों में भी इकट्ठी न की जा सके। शाखाओं के वार्षिकोत्सव इसी रूप में होते रह सकते हैं। इसके लिए कोई तिथियां हर साल के लिये निश्चित भी रह सकती हैं ताकि उन दिनों अवकाश निकालने की बात सदस्यों के मन में पहले से ही बनी रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 26)

🌞 मार्गदर्शक द्वारा भावी जीवन क्रम सम्बन्धी निर्देश

🔴  पूर्वकाल में ऋषिगण गोमुख से ऋषिकेश तक अपनी-अपनी रुचि और सुविधाओं के अनुसार रहते थे। वह क्षेत्र अब पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और व्यवसाइयों से भर गया है। इसलिए उसे उन्हीं लोगों के लिए छोड़ दिया गया है। अनेक देव मंदिर बन गए हैं, ताकि यात्रियों का कौतूहल, पुरातन काल का इतिहास और निवासियों का निर्वाह चलता रहे।’’

🔵 हमें बताया गया कि थियोसोफी की संस्थापिका व्लैवेट्स्की सिद्ध पुरुष थीं। ऐसी मान्यता है कि वे स्थूल शरीर में रहते हुए भी सूक्ष्म शरीरधारियों के संपर्क में थीं। उनने अपनी पुस्तकों में लिखा है कि दुर्गम हिमालय में ‘‘अदृश्य सिद्ध पुरुषों की पार्लियामेंट’’ है। इसी प्रकार उस क्षेत्र के दिव्य निवासियों को ‘‘अदृश्य सहायक’’ भी कहा गया है। गुरुदेव ने कहा कि ‘‘वह सब सत्य है, तुम अपने दिव्य चक्षुओं से यह सब उसी हिमालय क्षेत्र में देखोगे, जहाँ हमारा निवास है।’’ तिब्बत क्षेत्र उन दिनों हिमालय की परिधि में आता था। अब वह परिधि घट गई है, तो भी व्लैवेट्स्की  का कथन सत्य है। स्थूल शरीरधारी उसे देख नहीं पाते, पर हमें अपने मार्गदर्शक गुरुदेव की सहायता से उसे देख सकने का आश्वासन मिल गया।

🔴 गुरुदेव ने कहा-‘‘हमारे बुलावे की प्रतीक्षा करते रहना। जब परीक्षा की स्थिति के लिए उपयुक्तता एवं आवश्यकता समझी जाएगी, तभी बुलाया जाएगा। अपनी ओर से उसकी इच्छा या प्रतीक्षा मत करना। अपनी ओर से जिज्ञासावश उधर प्रयाण भी मत करना। वह सब निरर्थक रहेगा। तुम्हारे समर्पण के उपरांत यह जिम्मेदारी हमारी हो जाती है।’’ इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 26)

🌞  हिमालय में प्रवेश

अपने और पराये

🔵 लगातार की यात्रा ने पैरों में छाले डाल दिये। आज ध्यान पूर्वक पैरों को देखा तो दोनों पैरों में कुल मिलाकर छोटे-बड़े दस छाले निकले। कपड़े का नया जूता इसलिये पहना था कि कठिन रास्ते में मदद देगा पर भले मानस ने भी दो जगह काट खाया। इन छाले और जख्मों में से जो कच्चे थे वे सफेद और जिनमें पानी पड़ गया यहां वे पीले हो गये हैं। चलने में दर्द करते हैं और दुखते हैं। लगता है पैर अपने सफेद पीले दांत निकाल कर चलने में लाचारी प्रकट कर रहे हैं।

🔴 मंजिल दूर है। गुरु पूर्णिमा तक हर हालत में नियत स्थान पर पहुंचना है। पर अभी से दांत दिखाएंगे तो कैसे बनेगी? लंगड़ा लंगड़ा कर कल तो किसी प्रकार चल लिया गया, पर आज मुश्किल मालूम पड़ती है। दो तीन छाले जो फूट गये, जख्म बनते जा रहे हैं। बढ़ गये तो चलना कठिन हो जायगा और न चला जा सका तो नियत समय पर लक्ष्य तक पहुंचना कैसे सम्भव होगा? इस चिन्ता ने आज दिन भर परेशान रखा।

🔵 नंगे पैर चलना और भी कठिन है। रास्ते भर ऐसी पथरीली कंकड़ियां बिछी हुई हैं कि वे जहां पैर में गढ़ जाती हैं कांटे की तरह दर्द करती हैं। एक उपाय करना पड़ा। आधी धोती फाड़ कर दो टुकड़े किये गये और उन्हें पैरों से बांध दिया गया। जूते उतार कर थैले में रख लिये। काम चल गया। धीरे-धीरे रास्ता कटने लगा।

🔴 एक ओर तो यह अपने पैर हैं जो आड़े वक्त में दांत दिखाने लगे दूसरी ओर यह बांस की लाठी है, जो बेचारी न जाने कहां जन्मी, कहां बड़ी हुई और कहां से साथ हो ली। यह सगे भाई जैसा काम दे रही है। जहां चढ़ाई आती है तीसरे पैर का काम करती है। जैसे बूढ़े बीमार को कोई सहृदय कुटुम्बी अपने कन्धे का सहारा देकर आगे ले चलता है वैसे ही थकान से जब शरीर चूर चूर होता है तब यह लाठी सगे सम्बन्धी जैसा ही सहारा देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 27) 18 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम

🔴 अनुष्ठान के दिनों में पांच तप-संयम साधने पड़ते हैं— [1] उपवास [2] ब्रह्मचर्य [3] अपनी सेवा अपने हाथ से [4] भूमिशयन [5] चमड़े का प्रयोग त्याग। अनुष्ठान के दिनों चमड़े के जूते आदि का प्रयोग न किया जाय। प्लास्टिक, रबड़, कपड़ा आदि की बनी वस्तुएं आजकल चमड़े के बजाय हर स्थान पर प्रयुक्त होती हैं। वही किया जाय। भूमि शयन सर्वोत्तम है। सीलन, कीड़े आदि का भय हो तो तख्त पर सोया जा सकता है। हजामत, कपड़े धोना जैसी दैनिक जीवन की शारीरिक आवश्यकताएं नौकरों से न करायें, स्वयं करें। भोजन अपने हाथ से बना सकना सम्भव न हो तो स्त्री, माता, बहिन आदि उन्हीं अति निकटवर्ती स्वजनों के हाथ का बनाया स्वीकार करें, जिनके साथ आत्मीयता का आदान-प्रदान चलता है।

🔵 बाजार से पका हुआ तो नहीं ही खरीदें। ब्रह्मचर्य अनुष्ठान के दिनों में आवश्यक है। शारीरिक ही नहीं मानसिक भी पाला जाना चाहिए। कामुक कुदृष्टि पर नियन्त्रण रखा जाय। सम्पर्क में आने वाली नारियों को माता, बहिन या पुत्रीवत् पवित्र भाव से देखा जाय। यही बात पुरुषों के सम्बन्ध में नारियों पर लागू होती है। पांचवीं तपश्चर्या भोजन की है। यह उपवास काल है। उपवास कई स्तर के होते हैं— [1] छाछ, दूध आदि पेय पदार्थों पर रहना [2] शाक, फल के सहारे काम चलाना [3] नमक, शकर का त्याग अर्थात् अस्वाद [4] एक समय आहार [5] दो खाद्य पदार्थों पर अनुष्ठान की अवधि काटना।

🔴 अनुष्ठान के यही मोटे नियम हैं। इसके अतिरिक्त जो तरह-तरह की बातें कही जाती हैं और परस्पर विरोधी नियम बताये जाते हैं उन पर ध्यान न दिया जाय।

🔵 अनुष्ठान में कोई भूल हो जाने पर, त्रुटि रहने पर भी किसी अनिष्ट की आशंका न करनी चाहिए फिर भी उन दिनों कोई विघ्न उत्पन्न न होने पाये इसके लिए संरक्षण और ज्ञात-अज्ञात में रही हुई त्रुटियों का परिमार्जन करने के लिए अनुष्ठान साधना के लिए कोई समर्थ संरक्षक नियुक्त कर लेना चाहिए। यह सेवा शांतिकुंज हरिद्वार से भी ली जाती है। अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति का परिचय तथा समय लिख भेजने से संरक्षण, परिमार्जन सर्वथा निस्वार्थ भाव से होता रहता है। यह व्यवस्था करने पर साधना की सफलता और भी अधिक सुनिश्चित हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Jan 2017

🔴 युग निर्माण के सत्संकल्प में विवेक को विजयी बनाने का शंखनाद है। हम हर बात को उचित-अनुचित की कसौटी पर कसना सीखें, जो उचित हो वही करें, जो ग्राह्य हो वही ग्रहण करें, जो करने लायक हो उसी को करें। लोग क्या कहते हैं, क्या कहेंगे इस पर ध्यान न दें।

🔵 यदि किसी के दिल में वस्तुतः देश, धर्म, समाज, संस्कृति की दुर्दशा पर दुःख होता हो और यदि वस्तुतः उसकी आकाँक्षा इस विषमता को बदल देने की हो तो उसे अपनी सारी शक्ति लगाकर देश में प्रबुद्ध वर्ग उत्पन्न करने की-जो है उसे संगठित एवं सक्रिय बनाने की चेष्टा करनी चाहिए। यदि ऐसा हो सका तो समझना चाहिए कि अनेक क्षेत्रों में बिखरी हुई एक से एक बढ़कर विपन्नताओं में से प्रत्येक का हल ढूँढ लेना संभव हो गया।

🔴 ऐसे परिजन जो हमारी वाणी को सुनना नहीं चाहते, जिन्हें हमारे विचारों और प्रेरणाओं की आवश्यकता नहीं, जो हमारे सुझावों और संदेशों का कोई मूल्य नहीं मानते वे हमसे छल करतेह ैं और उनसे सहयोग की आशा हम नहीं कर सकते। शरीर को पूजने वालों के प्रति नहीं, हमारी आत्मा को संतोष देने के लिए जो प्रयत्न करते हैं, उन्हीं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा से हमारा मस्तक नत हो सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...