गुरुवार, 13 जुलाई 2017

👉 आज का सद्चिंतन 14 July 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 July 2017


👉 संघर्ष से बनती है जिंदगी बेहतर

🔴 हर किसी के जीवन में कभी ना कभी ऐसा समय आता है जब हम मुश्किलों में घिर जाते हैं और हमारे सामने अनेकों समस्यायें एक साथ आ जाती हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं और हमें खुद पर भरोसा नहीं रहता और हम अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। और खुद प्रयास करने के बजाय दूसरों से उम्मीद लगाने लग जाते हैं जिससे हमें और ज्यादा नुकसान होता है तथा और ज्यादा तनाव होता है और हम नकारात्मकता के शिकार हो जाते हैं और संघर्ष करना छोड़ देते हैं।

🔵 एक आदमी हर रोज सुबह बगीचे में टहलने जाता था। एक बार उसने बगीचे में एक पेड़ की टहनी पर एक तितली का कोकून (छत्ता) देखा। अब वह रोजाना उसे देखने लगा। एक दिन उसने देखा कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद हो गया है। उत्सुकतावश वह उसके पास जाकर बड़े ध्यान से उसे देखने लगा। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि एक छोटी तितली उस छेद में से बाहर आने की कोशिश कर रही है लेकिन बहुत कोशिशो के बाद भी उसे बाहर निकलने में तकलीफ हो रही है। उस आदमी को उस पर दया आ गयी। उसने उस कोकून का छेद इतना बड़ा कर दिया कि तितली आसानी से बाहर निकल जाये | कुछ समय बाद तितली कोकून से बाहर आ गयी लेकिन उसका शरीर सूजा हुआ था और पंख भी सूखे पड़े थे। आदमी ने सोचा कि तितली अब उड़ेगी लेकिन सूजन के कारण तितली उड़ नहीं सकी और कुछ देर बाद मर गयी।

🔴 दरअसल भगवान ने ही तितली के कोकून से बाहर आने की प्रक्रिया को इतना कठिन बनाया है जिससे की संघर्ष करने के दौरान तितली के शरीर पर मौजूद तरल उसके पंखो तक पहुँच सके और उसके पंख मजबूत होकर उड़ने लायक बन सकें और तितली खुले आसमान में उडान भर सके। यह संघर्ष ही उस तितली को उसकी क्षमताओं का एहसास कराता है।

🔵 यही बात हम पर भी लागू होती है। मुश्किलें, समस्यायें हमें कमजोर करने के लिए नहीं बल्कि हमें हमारी क्षमताओं का एहसास कराकर अपने आप को बेहतर बनाने के लिए हैं अपने आप को मजबूत बनाने के लिए हैं।

🔴 इसलिए जब भी कभी आपके जीवन में मुश्किलें या समस्यायें आयें तो उनसे घबरायें नहीं बल्कि डट कर उनका सामना करें। संघर्ष करते रहें तथा नकारात्मक विचार त्याग कर सकारात्मकता के साथ प्रयास करते रहें। एक दिन आप अपने मुश्किल रूपी कोकून से बाहर आयेंगे और खुले आसमान में उडान भरेंगे अर्थात आप जीत जायेंगे।

🌹 आप सभी मुश्किलों, समस्यायों पर विजय पा लेंगे।

👉 हारिय न हिम्मत दिनांक :: १४

🌹  असफलताओं का कारण

🔵 हम दूसरों को बरबस अपनी तरह विश्वास, मत, स्वभाव एवं नियमों के अनुसार कार्य करने और जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करते हैं। दूसरों को बरबस सुधार डालने, अपने विचार या दृष्टिकोण को जबरदस्ती थोपने से न सुधार होता है न आपका ही मन प्रसन्न होता है।

🔴 यदि हम अमुक व्यक्ति को दबाए रखेंगे तो अवश्य परोक्ष रूप से हमारी उन्नति हो जायेगी। अमुक व्यक्ति हमारी उन्नति में बाधक है। अमुक हमारी चुगली करता है, दोष निकालता है, मानहानि करता है। अत: हमें अपनी उन्नति न देखकर पहले अपने प्रतिपक्षी को रोके रखना चाहिए -ऐसा सोचना और दूसरों को अपनी असफलताओं का कारण मानना, भ्रम मूूलक है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Lose Not Your Heart Day 14

🌹  The Cause of Failure

🔵 We are constantly trying to force others to think and act according to our own beliefs. These attempts to correct others' behavior neither change their minds nor satisfy us.

🔴 We justify controlling others in several ways. We believe that if we control them we may acquire some immediate gain, or that the person is a hindrance to our progress, or that the person is constantly criticizing us, spreading rumors about us, etc. Using such reasoning to blame others for your own failure will not benefit you.

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 July

🔴 धर्म प्रवचन अच्छी बात है। उसको ध्यानपूर्वक सुनना और भी अधिक अच्छा है। क्योंकि इससे जन साधारण को कर्त्तव्य बोध होता है। पर इतना ही पर्याप्त नहीं। विद्यालयों में शिक्षा सम्वर्धन का कार्य होता है। पर उस भवन में पागल कुत्ता घुस आवे या साँप किसी बिल में से निकल पड़े तो उसे लाठी से ही पाठ पढ़ाया जा सकता है। धर्मोपदेश सुनकर वे आक्रमण करना छोड़ देंगे ऐसी आशा करना नासमझी की बात है।

🔵 काशी करवट लेकर स्वर्ग जाने की मान्यता सही हो सकती है पर गीता का कृष्ण का अर्जुन को दिया गया सन्देश भी मिथ्या नहीं है जिसमें अनीति के विरुद्ध लड़ मरने की बात कही गई है। रामराज्य स्थापना से पूर्व भगवान को असुरों का दमन करना पड़ा था। धर्म की स्थापना एक इमारत उठाने की तरह है और अधर्म का नाश उससे भी अधिक आवश्यक नींव खोदने की तरह धर्म का पालन और संरक्षण योद्धा ही करते हैं। कायर तो उसकी दुहाई भर देते हैं रहते हैं।

🔴 आतंकों का दमन सशस्त्र सैनिकों का काम है। पर सामाजिक अवाँछनीयताओं, कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं से जूझना तो उन भावनाशीलों का कार्य है जिसमें शौर्य और पराक्रम के तत्व भी जीवित हैं। धर्मोपदेश जितना आवश्यक हैं उतना ही अभीष्ट यह भी है कि शोषण उत्पीड़न से नारी वर्ग या पिछड़े समुदायों को मुक्ति दिलाने के लिए आधार किये जायें। भले ही वे झगड़े झंझट उकसाने जैसे प्रतीत होते हों।                                          

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का उत्तरदायित्व (भाग 3)

🔴 स्त्रियों में सभ्यता के नाम पर बढ़ता हुआ फैशन बनाव, शृंगार, चमकीले, भड़कीले वस्त्र आभूषण आदी गृहस्थ-जीवन की स्थिति और मर्यादाओं पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। और इसके प्रभाव से समाज में अनेकों बुराइयाँ फैलती जा रही हैं। हालाँकि सौंदर्य, स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यवस्थित रहन-सहन जीवन के आवश्यक अंग हैं। किन्तु कृत्रिमता, बाह्य साधनों के प्रयोग से नित-नूतन मेकअप बनाना अस्वाभाविक और गलत रास्ता है इससे गृहस्थ-जीवन में आर्थिक समस्यायें बढ़ गयी हैं। हर व्यक्ति आर्थिक तंगी महसूस करता है। एक सौ रुपये कमाता है, डेढ़ सौ का खर्च तैयार रहता है पुरुष के पसीने की कमाई इन सौंदर्य प्रसाधन तड़कीले-भड़कीले वस्त्र जेवर आदि में पानी की तरह बहाई जाती है। और अधिकाँश परिवारों को बजट घाटे में ही चलता है। इसका स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

🔵 इन विभिन्न साज-सज्जा, तड़क-भड़क युक्त फैशनपरस्ती का सबसे बुरा प्रभाव सामाजिक जीवन पर पड़ता है। लोगों की दुष्प्रवृत्तियों, चारित्रिक दुर्बलताओं को प्रोत्साहन देने में सबसे बड़ी जिम्मेदारी इन अस्वाभाविक बनाव शृंगारों पर है। एक साधारण वेशभूषा में जार ही सती-साध्वी नारी को देखकर बुरे-से-बुरे व्यक्ति में भी सद्भावों का जागरण हो जाता है। जबकि इन चमकती-दमकती तितलियों को देखकर अपरिपक्व लोगों का मन स्वतः ही चलायमान हो सकता है। समाज में बढ़ते हुए अनाचार दुराचार के प्रोत्साहन में नारी के ये बनाव शृंगार भी कम जिम्मेदार नहीं हैं।

🔴 सादगी में ही स्वाभाविक सौंदर्य का निवास है। जो सजीव और आकर्षण होता है। सहज सौंदर्य मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों को भड़काता नहीं वरन् उनको तृप्त करके पुरोगामी भी बनाता है। कृत्रिम बनाव शृंगार बचकानी प्रवृत्ति है। फूहड़पन असभ्यता की निशानी है। शालीनता सादगी में ही निवास करती है। नारी जाति का गौरव सादगी, प्रकृत सौंदर्य और लज्जायुक्त नम्रता में ही है और इसी से वह मानव-जीवन में सत् तत्वों की प्रेरणा स्रोत, देवी बन सकती है। पूज्य बन सकती है। मनुष्य की भावनाओं को पुरोगामी बना सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1963 पृष्ठ 37

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1963/July/v1.37

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भवानीशंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वासरूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम्।।   


🔵 गोस्वामी तुलसीदास जी जब रामायण का निर्माण करने लगे तो उनके मन में एक विचार आया कि इतना बड़ा ग्रंथ जिसके जहाज पर बिठा करके संसार के प्राणियों का उद्धार किया जा सकता है, उसे बनाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? इसके लिए किस शक्ति की सहायता लेनी चाहिए? उन्होंने यह कहा कि भवानी-शंकर की वंदना करनी चाहिए और उनकी सहायता लेनी चाहिए। उनकी शक्ति के बिना इतना बड़ा रामचरितमानस, जिस पर बिठा करके अनेक मनुष्यों को भवसागर से पार किया जा सकता है, कैसे सम्भव होगा? उन्होंने भवानी और शंकर की वंदना की। जैसे कि सायंकाल आरती के समय हमने और आप लोगों ने भगवान शंकर और पार्वती की वंदना की। पश्चात् उनके जी में एक और विचार आया कि आखिर भगवान शंकर हैं क्या? शक्ति कहाँ से आ जाती है?  क्यों आ जाती है? उद्धार कैसे हो सकता है? ऐसे अनेक प्रश्न तुलसीदास जी के मन में उत्पन्न हुए। उनका समाधान भी उसी श्लोक में हुआ जिसका कि मैंने आप लोगों के सम्मुख विवेचन किया—‘भवानी शंकरौ वन्दे’ भवानी शंकर की हम वंदना करते हैं।

🔴 ये कौन हैं? ‘श्रद्धा विश्वास रूपिणौ’ अर्थात् श्रद्धा का नाम पार्वती और विश्वास का नाम शंकर। श्रद्धा और विश्वास—इन दोनों का नाम ही शंकर-पार्वती है। इनका प्रतीक, विग्रह मूर्ति हम मंदिरों में स्थापित करते हैं। इनके चरणों पर अपना मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, बेल-पत्र चढ़ाते हैं, आरती करते हैं। यह सब क्रिया-कृत्य करते हैं, लेकिन मूलतः शंकर क्या है? श्रद्धा और विश्वास। ‘याभ्यां बिना न पश्यन्ति’— जिनकी पूजा किए बिना कोई सिद्धपुरुष भी भगवान को प्राप्त नहीं हो सकते। भवानी शंकर की इस महत्ता और माहात्म्य पर मैं विचार करता रहा तब एक और पौराणिक कथा मेरे सामने आई।

🔵 पौराणिक कथा आती है कि एक संकट का समय था जब भगवान परशुराम को यह मालूम पड़ा कि सब जगह अन्याय, अत्याचार फैल गया, अनाचार फैल गया। इसके निवारण के लिए क्या करना चाहिए? परशुराम जी उत्तरकाशी गए और वहाँ भगवान शिव का तप करने लगे। तप करने के पश्चात् भगवान शंकर ने उन्हें एक परशु दिया और कहा—अनीति का, अन्याय का और अत्याचार का इस संसार में से उच्छेदन किया जा सकता है और आपको करना चाहिए। भगवान शंकर की ऐसी महत्ता और ऐसी शक्ति का वर्णन पुराणों में पाया गया है, पर आज हम देखते हैं कि वह शक्ति कुंठित कैसे हो गई? हम शंकर की पूजा करते हैं, पर समस्याओं से घिरे हुए क्यों हैं? शंकर की शक्ति वरदान हो करके सामने क्यों नहीं आती? शंकर के भक्त होते हुए भी हम किस तरीके से पिछड़ते और पददलित होते चले जा रहे हैं? भगवान हमारी कब सहायता करेंगे? यह विचार मैं देर तक करता रहा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 124)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 पिछले दिनों बार-बार हिमालय जाने और एकांत साधना करने का निर्देश निबाहना पड़ा। इसमें क्या देखा? इसकी जिज्ञासा बड़ी आतुरता पूर्वक सभी करते हैं। उनका तात्पर्य, किन्हीं यज्ञ, गंधर्व, राक्षस, बेताल, सिद्ध पुरुष से भेंट वार्ता रही हो। उनकी उछल-कूद देखी हो। अदृश्य और प्रकट होने वाले कुछ जादुई गुटके लिए हों। इन जैसी घटनाएँ सुनने का मन होता है। वे समझते हैं कि हिमालय माने जादू का पिटारा। वहाँ जाते ही कोई करामाती बाबा डिब्बे में से भूत की तरह उछल पड़ते होंगे और जो कोई उस क्षेत्र में जाता है, उसे उन कौतूहलों-करतूतों को दिखाकर मुग्ध करते रहते होंगे। वस्तुतः हिमालय हमें अधिक अंतर्मुखी होने के लिए जाना पड़ा।

🔴 बहिरंग जीवन पर घटनाएँ छाई रहती हैं और अंतःक्षेत्र पर भावनाएँ। भावनाओं का वर्चस्व ही अध्यात्मवाद है। कामनाओं और वस्तुओं की घुड़दौड़, भौतिकवाद। चूँकि अपना जीवन क्रम दोनों का संगम रहा है, इसलिए बीच-बीच में एकांत में बहिरंग के जमे हुए प्रभावों को निरस्त करने की आवश्यकता पड़ती रही है। आत्मा को प्रकृति सान्निध्य से जितना बन पड़ा उतना हटाया है और आत्मा को परमात्मा के साथ जितना निकट ला सकना सम्भव था, उतना हिमालय के अज्ञातवास में किया है।

🔵 आहार-विहार में परिस्थितिवश अधिक सात्त्विकता का समावेश होता ही रहा है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात हुई है-उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं का उन्नयन और रसास्वादन। इसके लिए व्यक्तियों की, साधनों की, परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। जैसा भी भला-बुरा सामने प्रस्तुत है, उसी पर अपने भाव-चिंतन का आरोपण करके ऐसा स्वरूप बनाया जा सकता है, जिससे कुछ का कुछ दीखने लगे। कण-कण में भगवान् की, उसकी रस संवेदना की झाँकी होने लगे।
  
🔴 जिनने हमारी ‘‘सुनसान के सहचर’’ पुस्तक पढ़ी है, उनने समझा होगा कि सामान्य घटनाओं और परिस्थितियों में भी अपनी उच्च भावनाओं का समावेश करके किस प्रकार स्वर्गीय उमंगों से भरा पूरा वातावरण गठित किया जा सकता है और उसमें निमग्न रहकर सत-चित्, आनंद की अनुभूति हो सकती है। यह भी एक उच्चस्तरीय सिद्धि है। इसे हस्तगत करके हम इसी सर्वसाधारण जैसी जीवनचर्या में निरत रहते हुए स्वर्ग में रहने वाले देवताओं की तरह आनंदमग्न रहते रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.18

👉 स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। (अन्तिम भाग)

🔵 तप का एक मात्र कार्य आत्मा पर पड़े हुए मल को-या आवरण को दूर करने मात्र का ही है। व्यास ने स्वाध्याय को परमात्मा का साक्षात्कार करने वाला इसी लिए बतलाया है क्योंकि जो आवरण के अन्धकार में चला गया है उसे प्रकट करने के लिए अन्धकार को दूर करने की आवश्यकता है।

🔴 जीवन का उद्देश्य कुछ भी हो, उस उद्देश्य तक जाने के लिए भी स्वाध्याय की आवश्यकता होती है। स्वाध्याय जीवन के उद्देश्य तक पहुँचने की खामियों को भी दूर कर सकती है। जो स्वाध्याय नहीं करते, वे खामियों को दूर नहीं कर सकते इसलिए चाहे ब्राह्मण हो-चाहे शूद्र प्रत्येक व्यक्ति अपने लक्ष्य से गिर सकता है।

🔵 स्वाध्याय को श्रम की सीमा कहा गया है। श्रम में ही पृथ्वी से लेकर अन्तरिक्ष तथा स्वर्ग तक के समस्त कर्म प्रतिष्ठित हैं। बिना स्वाध्याय के साँगोपाँग रूप से कर्म नहीं हो सकते और साँगोपाँग हुए बिना सिद्धि नहीं मिल सकती। इसलिए सम्पूर्ण सिद्धियों का एक मात्र मूल मंत्र है स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण।

🔴 आत्म निरीक्षण में अपनी शक्ति का निरीक्षण और अपने कर्म का निरीक्षण किया जाता है। शक्ति अनुसार कर्म करने में ही सफलता मिलती है। कौन सी शक्ति किस कर्म की सफलता में सहायक हो सकती है यह बिना ज्ञान हुए भी सफलता नहीं मिलती। ज्ञान का साधन भी स्वाध्याय ही है। इसी कारण ज्ञान हो और प्रमाद से वह विस्मृत हो गया हो तब भी स्वाध्याय की आवश्यकता है। अग्रसर होकर जिस कार्य को किया जाता है, सम्पूर्ण शक्ति जिस कार्य में लगी रहती है, उसकी सिद्धि में किंचित भी सन्देह नहीं करना चाहिए इसीलिए इहलौकिक और पारलौकिक दोनों स्थानों की सिद्धि के लिए, आत्मकल्याण के लिए निरन्तर स्वाध्याय न करने से शरीर में मन तथा बुद्धि में एवं प्राणों में भी जड़ता स्थान बना लेती है, मनुष्य प्रमादी हो जाता है। प्रमाद मानव का सबसे बड़ा शत्रु है यह उसे बीच में ही रोक लेता है सिद्धि तक पहुँचने ही नहीं देता। इसीलिए आर्य ऋषियों ने कहा है-

🔵 स्वाध्यायान्माप्रमदः -स्वाध्याय में प्रमाद न करो और अहरहः स्वाध्यायमध्येतव्यः -रात दिन स्वाध्याय में लगे रहो।

🌹 समाप्त
🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1948 दिसम्बर पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/December/v1.4

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 28)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 केले, नारंगी आदि के छिलके लोग यों ही फेंकते रहते हैं और आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। कितने ही लोग गाय पालते हैं और दूध दुहकर उन्हें आवारा यह समझकर छोड़ देते हैं कि किसी की चीज खाकर अपना पेट भर लाएगी और हमें दूध देगी। गौ माता के प्रति प्रचलित श्रद्धा के आधार पर कोई उसे मारेगा नहीं और अपना काम बन जाएगा। इस तरह वह गाय लोगों की वस्तुएँ खाकर, बिखेर कर, दूसरों का रोज नुकसान करती और पिटती, कुटती रहती है।

🔵 इस तरह दूसरों को कष्ट देने तथा स्वयं लाभ उठाने को क्या कहा जाए? स्वयं कीर्तन करने का मन है तो अपने घर में पूजा के उपयुक्त मंद स्वर में प्रसन्नतापूर्वक करें, पर लाउडस्पीकर लगाकर रात भर धमाल मचाने और पड़ोस के बीमारों, परीक्षार्थियों तथा अन्य लोगों की नींद नष्ट करने वाली ईश्वरभक्ति से भी पहिले हमें अपनी नागरिक मर्यादाओं और जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। जिसका अर्थ है कि दूसरों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपनी इच्छा को स्वेच्छापूर्वक सीमाबद्ध करना।

🔴 वचन का पालन और ईमानदारी का व्यवहार मनुष्य का प्राथमिक एवं नैतिक कर्तव्य है। जिस समय पर जिससे मिलने का, कोई वस्तु देने, काम पूरा करने का वचन दिया है, उस सच को ठीक समय पर पूरा करने का ध्यान रखना चाहिए ताकि दूसरों को असुविधा का सामना न करना पड़े। यदि हम दर्जी या मोची हैं तो उचित हे कि वायदे के समय पर उसे देने का शक्ति भर प्रयत्न करें। बार-बार तकाजे करने और निराश वापिस लौटने में जो समय खर्च होता है और असुविधा होती है उसे देखते हुए ऐसे दर्जी, धोबी अपनी प्राप्त मजदूरी से ग्राहक का चौगुना-दस गुना नुकसान कर देते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 123)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 अगणित व्यक्ति गायत्री तीर्थ में आकर अनुष्ठान साधना करते रहे हैं। इससे उनके व्यक्तित्व में परिष्कार हुआ है। मनोविकारों से मुक्ति मिली है एवं भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करने में मदद मिली है। विज्ञान सम्मत पद्धति से ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में उनका पर्यवेक्षण कर इसे सत्यापित भी किया गया है।

🔴 उपरोक्त प्रमुख कार्यों और निर्धारणों को देखकर सहज बुद्धि यह अनुमान लगा सकती है कि इनके लिए श्रम, मनोयोग, साधन कितनी बड़ी संख्या में कितने लोगों के लगे होंगे, इसकी कल्पना करने पर प्रतीत होता है कि सब सरंजाम पहाड़ जितना होना चाहिए। उसे उठाने, आमंत्रित, एकत्रित करने में एक व्यक्ति की अदृश्य शक्ति भर काम करती रही है। प्रत्यक्ष याचना की, अपील की, चंदा जमा करने की प्रक्रिया कभी अपनाई नहीं गई। जो कुछ चला है स्वेच्छा से सहयोग से चला है।

🔵 सभी जानते हैं कि आजकल धन जमा करने के लिए कितने दबाव, आकर्षण और तरीके काम में लाने पड़ते हैं, पर मात्र यही एक ऐसा मिशन है, जो दस पैसा प्रतिदिन के ज्ञानघट और एक मुट्ठी अनाज वाले धर्मघट स्थापित करके अपना काम भली प्रकार चला लेता है। जो इतनी छोटी राशि देता है, वह यह भी अनुभव करता है कि संस्था हमारी है, हमारे श्रम सहयोग से चल रही है फलतः उसकी आत्मीयता भी सघनता पूर्वक जुड़ी रहती है। संचालकों को भी इतने लोगों के सामने उत्तरदायी होने, जबाब देने का ध्यान रखते हुए एक-एक पाई का खर्च फूँक-फूँक कर करना पड़ता है। कम पैसे में इतने बड़े काम चल पड़ने और सफल होने का रहस्य यह लोकप्रियता ही है।
  
🔴 निःस्वार्थ, निस्पृह और उच्चस्तरीय व्यक्तित्व वाले जितने कार्यकर्ता इस मिशन के पास हैं, उतने अन्य किसी संगठन के पास कदाचित ही हों। इसका कारण एक ही है, संचालन सूत्र को अधिकाधिक निकट से परखने के उपरांत यह विश्वास करना कि यहाँ ब्राह्मण आत्मा सही काम करती है। बुद्ध को लोगों ने परखा और लाखों परिव्राजक घर-बार छोड़कर इनके अनुयायी बने। गाँधी के सत्याग्रहियों ने भी वेतन नहीं माँगा। इन दिनों हर संस्था के पास वैतनिक कर्मचारी काम करते हैं, तब मात्र प्रज्ञा अभियान ही एक मात्र ऐसा तंत्र है जिसमें हजारों लोग उच्चस्तरीय योग्यता होते हुए भी मात्र भोजन-वस्त्र पर निर्वाह करते हैं।
  
🔵 इतने व्यक्तियों का श्रम-सहयोग बूँद-बूँद करके लगने वाला इतना धन-साधन किस प्रकार चुंबकत्व से खिंचता हुआ चला आता है, वह भी एक सिद्धि का चमत्कार है, जो अन्यत्र कदाचित् कहीं दिखाई पड़े।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.18

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 27)

🌹  मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।

🔴 घरों की गन्दगी लोग अक्सर गली या सड़क पर डाल देते हैं, उससे रास्ता निकलने वालों को असुविधा है और सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता अस्त-व्यस्त होती है। उचित यही है कि घरों में कूड़ेदान रखें और जब सफाई कर्मचारी आए, तब उसे उठवा दें। अशोभनीय अस्वच्छता से उस गली में रहने वाले तथा निकलने वालों को कष्ट न पहुँचाएँ। सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और व्यवस्था नष्ट करना यह बताता है कि इन घिनौने व्यक्तियों को मनुष्यता के आरंभिक कर्तव्य नागरिकता तक का ही ज्ञान नहीं है।

🔵 मुसाफिरखाने, धर्मशाला, पाक्र, नदी-किनारे सिनेमाघर आदि सबके काम में आने वाले स्थानों में लोग जहाँ-तहाँ रद्दी कागज, दोने, पत्ते, सिगरेट के खोखे, मूँगफली के छिलके आदि पटकते रहते हैं और देखते-देखते ये स्थान गंदगी से भर जाते हैं। रेलगाड़ियों के डिब्बे में जहाँ हर आदमी को घिचपिच बैठना पड़ता है, ऐसी गंदगी बहुत अखरती है। संडासों में मलमूत्र का विसर्जन गलत स्थानों पर करने से वहाँ की स्थिति ऐसी हो जाती है कि दूसरों को उसका उपयोग करना कठिन पड़ता है। जबकि कितने ही मुसाफिर खड़े चल रहे हैं, तब कुछ लोग बिस्तर बिछाए, टाँग लम्बी किए लेटे रहते हैं और उठाने पर झगड़ते हैं।

🔴 इन लोगों को मनुष्यता की आरंभिक शिक्षा सीखनी ही चाहिए कि सार्वजनिक उपयोग के स्थान या वस्तुओं का उतना ही उपयोग करें जितना कि अपना हक है। सामान्य डिब्बे बैठने भर के लिए हैं। खाली हो तो कोई लेट भी सकता है, पर जबकि अनेक मुसाफिर खड़े या लटकते चल रहे हैं और चंद लोग लेटने को ऐसा आनंद उठाएँ, जिसे प्राप्त करने का हक उन्हें नहीं है तो उसे ढीठता या पशुता ही कहा जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.38

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.6

👉 स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। (भाग 2)

🔵 अपने आपको जानने के लिए स्वाध्याय से बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है। यहाँ तक इससे बढ़कर कोई पुराण भी नहीं है। शतपथ में लिखा है कि :-
जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है।

🔴 मानवजीवन का धर्म ही एक मात्र अध्ययन है। इस धर्म के यह अध्ययन एवं दान के ये ही तीन आधार हैं :-

त्रयोधर्मस्कन्धा यशोऽध्ययनं दानमिति।
छान्दो॰ 2।32।1
अपने स्वत्व को छोड़ना दान कहलाता है और अपना कर्त्तव्य करना यश। लेकिन स्वत्व छोड़ने तथा कर्त्तव्य करने का ज्ञान देने वाला तथा उसकी तैयारी कराकर उस पथ पर अग्रसर कराने वाला स्वाध्याय या अध्ययन है।

🔵 किन्हीं महापुरुषों का कहना है कि स्वाध्याय तो तप है। तप के द्वारा शक्ति का संचय होता है। शक्ति के संचय से मनुष्य शक्तिवान बनता है। चमत्कार को नमस्कार करने वाले बहुत हैं, जिसके पास शक्ति नहीं है उसे कोई भी नहीं पूछता। इसलिए जो तपस्वी हैं उनसे सभी भयभीत रहते हैं और उनके भय से समाज अपने अपने कर्त्तव्य का साँगोपाँग पालन करता रहता है।

🔴 तप का प्रधान अंग है एकाग्रता। निरन्तरपूर्वक एकाग्रता के साथ निश्चित समय पर जिस कार्य को किया जाता है उसमें अवश्य सफलता मिलती है। उत्कंठा से प्रेरणा मिलती है, और मन के विश्वास में दृढ़ता आती है। बिना दृढ़ता के दुनिया का कोई कार्य कभी भी सफल नहीं हुआ है। अनेकों में दृढ़ता की व्यक्ति की एकाग्रता के लिए अपेक्षा रहती है। और जब नियमितता आ जाती है तो ये सब मिलकर तप का रूप धारण कर लेती है। यह तप आत्मा पर पड़े हुए मल को दूर करेगा और उसे चमका देगा।

🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1948 दिसम्बर पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/December/v1.4

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 July 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 July 2017


👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...