मंगलवार, 20 जुलाई 2021

👉 प्रेम ही सुख-शांति का मूल है

भगवान ने अपनी सृष्टि को सुंदर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए जड़ और चेतन पदार्थों को एक दूसरे से संबंधित कर रखा है। निखिल विश्वब्रह्मांड के ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने सौरमंडलों में आकर्षण शक्ति के द्वारा एक-दूसरे से संबंधित हैं। यदि ये संबंध-सूत्र टूट जाएँ, तो किसी की कुछ स्थिरता न रहे। सारे ग्रह-नक्षत्र एक दूसरे से टकरा जाएँ और संपूर्ण व्यवस्था नष्ट हो जाए।

इसी प्रकार आपसी प्रेम संबंध न हों तो जीवधारियों की सत्ता भी स्थिर न रह सकेगी। जरा कल्पना तो कीजिए, माता का बालक से प्रेम न हो, पति का पत्नी से प्रेम न हो, भाई से प्रेम न हो तो कुटुंब की कैसी दयनीय अवस्था हो जाए? यह भ्रातृ-भाव, स्नेह-संबंध नष्ट हो जाए तो सहयोग के आधार पर चलने वाली सारी सामाजिक व्यवस्था पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट हो जाए। सृष्टि का सारा सौंदर्य जाता रहे।

हर एक प्राणी हृदय में प्रेम की अजस्र धारा बह रही है। यदि हम सुख, शांति और संपदा पसंद करते हैं, तो आवश्यक है कि प्रेमभाव को अपनाएँ। दूसरों से उदारता, दया, मधुरता, भलमनसाहत और ईमानदारी का बरताव करें। जिन लोगों ने अपनी जीवन नीति प्रेममय बना रखी है, वे ईश्वरप्रदत्त मानवोचित आज्ञा का पालन करने वाले धर्मात्मा हैं। ऐसे लोगों के लिए हर घड़ी सतयुग है। चूँकि वे स्वयं सतयुगी हैं, इसलिए दूसरे भी उनके साथ सतयुगी आचरण करने को विवश होते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1944

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रह...