गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

Gayatri Upasana | गायत्री उपासना | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 भगवान का अस्तित्व

एक दिन कोई व्यक्ति नाई की दुकान में अपने सिर के बाल कटवाने गया। नाई और उस व्यक्ति के बीच में ऐसे ही बातें शुरु हो गईं और वे लोग बातें करते करते 'भगवान' के विषय पर बातें करने लगे।

तभी नाई ने कहा - "मैं भगवान के अस्तित्व को नहीं मानता और इसीलिए तुम मुझे नास्तिक भी कह सकते हो?"

"तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?" उस व्यक्ति ने पूछा।

नाई ने कहा - "बाहर जब तुम सड़क पर जाओगे तो तुम समझ जाओगे कि भगवान का अस्तित्व नहीं है। अगर भगवान होते तो क्या इतने सारे लोग भूखे मरते ? क्या इतने सारे लोग बीमार होते ? क्या दुनिया में इतनी हिंसा होती? क्या कष्ट या पीड़ा होती? मैं ऐसे निर्दयी ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता, जो इन सबकी अनुमति दे।"

उस व्यक्ति ने थोड़ा सोचा, लेकिन वह कोई वाद-विवाद नहीं करना चाहता था। इसलिए चुप रहा और नाई की बातें सुनता रहा। नाई ने अपना काम खत्म किया और वह व्यक्ति नाई को पैसे देकर दुकान से बाहर आ गया। वह जैसे ही नाई की दुकान से बाहर निकला तो उसने सड़क पर एक लम्बे घने बालों वाले एक व्यक्ति को देखा, जिसकी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी और ऐसा लगता था शायद उसने कई महीनों तक अपने बाल नहीं कटवाए हों।

अब वह व्यक्ति वापिस मुड़कर दोबारा नाई की दुकान में गया और उसने नाई से कहा - "क्या तुम्हें पता है? नाइयों का अस्तित्व नहीं होता?"

नाई ने कहा - "तुम कैसी बेकार की बातें कर रहे हो? क्या तुम्हें मैं दिखाई नहीं दे रहा हूँ ? मैं यहाँ हूँ और मैं एक नाई हूँ और मैंने अभी अभी तुम्हारे सिर के बाल काटे हैं।"

उस व्यक्ति ने कहा - "नहीं, नाई होते ही नहीं हैं, अगर होते तो क्या बाहर उस व्यक्ति के जैसे कोई भी लम्बे बाल व बढ़ी हुई दाढ़ी वाला होता क्या?"

नाई ने कहा - "अगर वह व्यक्ति किसी नाई के पास बाल कटवाने जाएगा ही नहीं तो नाई कैसे उसके बाल काटेगा?"

उस व्यक्ति ने कहा - "तुम बिल्कुल सही कह रहे हो, यही बात है। भगवान भी होते हैं, लेकिन कुछ लोग भगवान पर विश्वास ही नहीं करते तो भगवान उनकी सहायता करेंगे कैसे? विश्वास ही सत्य है, जो लोग भगवान पर विश्वास करते हैं, उन्हें उसकी अनिभूति हर पल होती है और जो विश्वास नहीं करते उनके लिए वो कहीं भी नहीं हैं।"

भगवान दूध में मक्खन की तरह विराजमान हैं, जो दिखाई नहीं देते। दूध में मक्खन होते हुए भी दिखाई नहीं देता, पर मक्खन दिखाई भी दे सकता है, जब हम दूध बिलोयेंगे, तब। इसी तरह भगवान भी हैं, पर वे होते हुए भी दिखाई नहीं देते । लेकिन भगवान दिखाई दे सकते हैं, जब हम अपनी आत्मा का मंथन करेंगे, तब। इसके लिए हमें आत्म मंथन करने की आवश्यकता है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 19 Dec 2019



👉 प्रवाह में न बहें, उत्कृष्टता से जुड़े (भाग ३)

यदि आत्मबोध से उत्पन्न प्रकाश ज्योति को स्थिर रखना हो तो उस दीपक में स्वाध्याय का तेल निरन्तर डालते रहना चाहिये। यह तेल जब तक पड़ता रहेगा तब तक उसके बुझने की आशंका न रहेगी। एक बार भावावेश में बहुत कुछ सोच डाला और आदर्शवाद की उड़ान उड़ ली, पर उस उमंग को नियमित परिपोषण न मिला तो हवा के साथ उड़ने वाले बादलों की तरह वह जोश आवेश भी कुछ समय में तिरोहित हो जायेगा तब अपनी प्रतिज्ञा न निभ सकने की, इच्छा के कार्यान्वित न होने की कमजोरी निश्चित ही अपने रहे बचे मनोबल को भी तोड़ देगी और आगे फिर उन दिव्य आकाँक्षाओं को पुनर्जीवित करना भी कठिन हो जायेगा। इस स्थिति से बचने के लिए प्रत्येक आदर्शवादी को स्वाध्याय को अपना जीवन साथी एवं अभिन्न सहचर बना लेना चाहिए।

स्वाध्याय भी आजकल एक रूढ़ि बन गई है। कथा पुराणों की पुस्तकों को बार-बार उलटते पलटते रहने का नाम स्वाध्याय कहलाता है और आमतौर से लोग इसी लकीर को पीटकर आत्म प्रवंचना कर लेते हैं। स्वाध्याय उन्हीं पुस्तकों का होना चाहिए जो आज की उलझनों से भरे हुए मनुष्य को बुद्धि संगत और व्यावहारिक मार्गदर्शन कर सके। इस तरह का प्रखर साहित्य यों बहुत ही कम मात्रा में मिलता है। पर उसका सर्वथा अभाव नहीं है। तलाश करने पर वह अपने आसपास भी मिल सकता है। स्नान, भोजन, शयन आदि की ही तरह स्वाध्याय को भी अन्तःकरण की एक महती आवश्यकता मानना चाहिए और इस आत्मिक भोजन को जुटाने के लिए समय और पैसा निकालना चाहिए।

स्वाध्याय का प्रयोजन महामानवों द्वारा लिखित जीवन विद्या के समग्र स्वरूप पर प्रकाश डालने वाले साहित्य को पढ़ने से ही पूरा होता है। उसका एक दूसरा पक्ष है उसे सत्संग कहते हैं। अशिक्षित व्यक्ति सत्संग से ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। वे दूसरे की आँखों से ग्रन्थों को पढ़ाकर कानों से सुनते रहें तो भी वह आवश्यकता पूरी हो जाती है। कभी-कभी सुलझे हुए विचारों के और परिष्कृत दृष्टिकोण सम्पन्न व्यक्ति परामर्श एवं प्रवचन के लिये भी उपलब्ध हो जाते हैं। पर यह उपलब्धि सदा सम्भव नहीं। धर्म और अध्यात्म के नाम पर जहाँ-तहाँ कूड़ा कचरा ही बिखरा पड़ा है। मूढ़ता, अन्ध श्रद्धा, अत्युक्ति और असम्मति से भरे हुए विचार ही अक्सर सत्संग के नाम पर सुनने को मिलते हैं। विक्षिप्त एवं सनकी स्तर के लोग एकाकी बातें सुनाकर अक्सर सुनने वाले को और अधिक उलझन में डाल देते हैं। सही सत्संग भी आज की परिस्थिति में यदा-कदा ही किसी को मिल सकता है। तो उसका उपयोग भी करना चाहिये और जो सुना या बताया गया है उसमें से जो उपयोगी तत्व हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 श्रद्धा, सिद्धान्तों के प्रति हो (भाग २)

भस्मासुर का पुराना नाम बताऊँ आपको। मारीचि का पुराना नाम बताऊँ आपको। ये सभी योग्य तपस्वी थे। पहले जब उन्होंने उपासना-साधना शुरू की थी, तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गए थे। तप और पूजा-उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था, तब वे बहुत मेधावी थे, लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गए। भस्मासुर का क्या हो गया? जिसको प्रलोभन सताते हैं, वे भटक जाते हैं और कहीं के मारे कहीं चले जाते हैं।

तो श्रद्धा आदमी को टिकाऊ बनाए रखने के लिए एक रस्सी या एक सम्बल है, जिसके सहारे, जिसको पकड़ करके मनुष्य सीधी राह पर चलता हुआ चला जाता है। भटक नहीं पाता। आप भटकना मत। घर से आप चले थे न, यह विचार लेकर चले थे न कि हम लोककल्याण के लिए, जनमंगल के लिए घर छोड़कर चले गए हैं। आप जब कभी भी भटकन आए तो आप अपने उस दिन को, उस समय की मनःस्थिति को याद कर लेना जबकि आपके भीतर से श्रद्धा का एक अंकुर उगा था और अंकुर उगकर के फिर आपके भीतर एक उमंग पैदा हुई थी और उमंग को लेकर आप यहाँ आ गए थे। आपको याद है जब आप यहाँ आए थे, जिस दिन आप आए थे उसी मन को याद रखना।

साधु-बाबाजी जिस दिन घर से निकलते हैं, उस दिन यह श्रद्धा लेकर निकलते हैं कि हमको संत बनना है, महात्मा बनना है, ऋषि बनना है, तपस्वी बनना है। लेकिन थोड़े दिनों बाद वह जो उमंग होती है, वह ढीली पड़ जाती है और ढीली पड़ने के बाद में संसार के प्रलोभन उनको खींचते है। किसी की बहिन-बेटी की ओर देखते हैं, किसी से पैसा लेते हैं। किसी को चेला-चेली बनाते हैं। किसी की हजामत बनाते हैं। फिर जाने क्या से क्या हो जाता है? पतन का मार्ग यहीं से आरम्भ होता है। ग्रैविटी—गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की हर चीज को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। संसार भी एक ग्रैविटी है, जो ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। आप लोगों से सबसे मेरा यह कहना है कि आप ग्रैविटी से खिंचना मत। रोज सवेरे उठकर भगवान् के नाम के साथ में यह विचार किया कीजिए कि हमने किन सिद्धान्तों के लिए समर्पण किया था? और पहला कदम जब उठाया था तो किन सिद्धान्तों के आधार पर उठाया था? उन सिद्धान्तों को रोज याद कर लिया कीजिए। रोज याद किया कीजिए कि हमारी उस श्रद्धा में, और उस निष्ठा में, उस संकल्प और उस त्यागवृत्ति में कही फर्क तो नहीं आ गया। संसार ने हमको खींच तो नहीं लिया। वातावरण ने हमको गलीज तो नहीं बना दिया। कहीं हम कमीने लोगों की नकल तो नहीं करने लगे। आप यह मत करना।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 1)

Q.1. How does the ‘Gayatri Mantra’ as a Vedmantra differ from other ‘Laukik mantras’?        

Ans. Gayatri Mantra is the primordial Mantra self-manifested by the projection of the will (sankalp) of Omnipotent Divine to bring into existence the present cycle of creation (Varah Kalpa). According to Hindu mythology there are infinite cosmic cycles of expansion and contraction known as Shrishti and Pralaya. At the time of  Mahapralaya or Doom’s Day, all matter and energy present in the cosmos gets contracted into elementary ‘Akash’ and ‘Pran”. In the succeeding cycle, these expand to constitute the multitude of energies and forces which operate on the elemental Akash to produce animate and inanimate objects of the ‘Creation’.
  
Vedas, in which Gayatri Mantra is mentioned several times (Rigveda 3.62.10, Yajurveda 3.35.22.9, 36.3, Samveda 462) are considered divine revelation (Apaurusheya).  The Laukik Mantras, are, on the other hand, composition of rishis – i.e. they are man-made (Paurusheya). Hence the supremacy of Gayatri Mantra.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 36