मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

👉 अपने ब्राह्मण एवं संत को जिन्दा कीजिए (भाग 2)

🔴 दूसरा वाला प्रयोग हमने किया- साधु का। जिसका नाम तपस्वी है। हमने अपने सारे छिद्रों को बन्द कर दिया। यह दूसरा कदम है। काँटे पर चलने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। ठण्डे पानी से नहाने वाले का नाम तपस्वी नहीं है। उस आदमी का नाम साधु और तपस्वी है, जिसने अपने आप का तपाया, उसका नाम तपस्वी है, उसका नाम साधु है। हमने अपने आप को तपाया है। अक्ल की दृष्टि से आदमी से ज्यादा बेईमान, बहुरूपिया कोई नहीं है। हमने अपनी अक्ल को ठीक कर लिया है। आप भी मारे डण्डों से अपनी अक्ल को ठीक करें। हमने अपनी हर चीज को तपाया, भीतर वाले हिस्से को भी तपाया। हमने अपने मन को, बुद्धि को तपाया है, पर आपकी बुद्धि तो ऐसी चाण्डाल है, ऐसी पिशाचिनी है कि क्या कहें?
      
🔵 किसी के जिन्दगी की समस्या को हल करने का सवाल था तो आपकी अक्ल, आपकी बुद्धि ने ऐसी मक्कारी की कि क्या कहना? पैसे से लेकर समय तक हमने केवल समाज के लिए खर्च किया। यह कसा हुआ जीवन हमारा तपस्वी का जीवन है। मन्त्रों में शक्ति है, गलत बात नहीं है। देवताओं में शक्ति है, यह भी गलत नहीं है, किन्तु, अगर कोई आदमी तपस्वी है तो वह हर काम को कर सकता है। अपने अनुष्ठान काल में हमने किसी से बात नहीं की, कोई भी अन्य चीज नहीं खायी। जौ की रोटी एवं छाछ, बस यही दो चीजें हम खाते रहे।

🔴 जैसे हमने अनुष्ठान खत्म किया कि एक व्यक्ति आये जो नकली रेशम बनाते थे, उन्होंने कहा कि हम आपको गुरु बनायेंगे। उन्होंने सवा रुपया हमारे हाथ पर रखा। इस पर हमने सोचा कि तब तो हम ब्राह्मण नहीं हो सकते हैं, हम मजदूर हैं। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण को तो लेना चाहिए। यह आज से लगभग ३५-४० साल पहले सन् १९४५-४६ की बात है, उस सज्जन को लेकर हम बाजार गये। उस जमाने में ठण्डी में बिछाने के लिए पुराने कपड़ों के तथा रूई की हाथ से बनी दरियाँ दो रुपये में मिलती थीं। उससे वहीं चीजें खरीदकर जरूरतमन्दों में बाँट दी, पर अपने लिए हमने उसे स्वीकार नहीं किया। हमारी अक्ल एवं जो भी चीज हमारे पास थी, उसे हम हमेशा बाँटते चले गये। उस आदमी ने कुछ दिनों के बाद हमारे पास दो सौ रुपये भेजे। हमने उसे गायत्री तपोभूमि के मन्दिर बनाने में लगा दिया। यह वह पहला आदमी था जिसने हमें पैसा भेजा था। यह घटनाएँ सुना रहा हूँ मैं आपको अपने तपस्वी जीवन की। इसी तरह हमारे सारे कार्य होते चले गये। कोई काम हमारा रुका नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Oct 2017

🔵 अपनी आदतों का सुधार, स्वभाव का निर्माण, दृष्टिकोण का परिष्कार करना जीवन विद्या का आवश्यक अंग है। ओछी आदतें, कमीने स्वभाव, और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति सभ्य नहीं गिना जा सकता। उसे किसी का सच्चा प्रेम और गहरा विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। कोई बड़ी सफलता उसे कभी न मिल सकेगी। कहते है कि बड़े आदमी सदा चौड़े दिल और ऊँचे दिमाग के होते है।” यहाँ लम्बाई चौड़ाई से मतलब नहीं वरन् दृष्टिकोण की ऊँचाई का ही अभिप्राय है।

🔴 वचन का पालन, समय की पाबन्दी, नियमित दिनचर्या, शिष्टाचार, आहार विहार की नियमितता, सफाई व्यवस्था आदि कितनी ही बातें ऐसी है जो सामान्य प्रतीत होते हुए भी जीवन की सुव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पाश्चात्य देशों में इन छोटी बातों पर बहुत ध्यान दिया जाता है, फलस्वरूप भौतिक उन्नति के रूप में उन्हें उसका लाभ भी प्रत्यक्ष मिल रहा है। स्वास्थ्य, समृद्धि और ज्ञान की दृष्टि से पाश्चात्य देशों ने जो उन्नति की है उसमें इन छोटी बातों का बड़ा योग है। इन बातों के साथ-साथ यदि आध्यात्मिक सद्गुणों का समन्वय भी हो जाय तो फिर सोना और सुगन्धि वाली कहावत ही चरितार्थ हो जाती है।

🔵 आज चारों ओर अगणित कठिनाइयाँ, परेशानियाँ और उलझने दिखाई पड़ती है उनका कारण एक ही है- अनैतिक, असंस्कृत जीवन। समस्याओं को ऊपर-ऊपर से सुलझाने से काम न चलेगा वरन् भूल कारण का समाधान करना पड़ेगा मनुष्य के जीवन दिव्य देवालयों की तरह पवित्र, ऊँचे और शानदार हों तभी क्लेश और कलह से, शोक और संताप से, अभाव और आपत्ति से छुटकारा मिलेगा। व्यक्ति यदि भगवान के दिव्य वरदान मानव जीवन का समुचित लाभ उठाना चाहता हो तो उसे जिन्दगी जीने की समस्याओं पर विचार करना होगा और सुलझे हुए दृष्टिकोण से अपनी गति विधियों का निर्माण करना होगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 महान कर्मयोगी स्वामी विवेकानन्द (भाग 3)

🔴 अपनी इस भावना को कार्य रूप में परिणित करने के लिये स्वामी जी सन् 1893 में, जब कि उन की आयु केवल 30 वर्ष की थी, और बहुत थोड़े साधन उनको प्राप्त थे, अमरीका जा पहुँचे। वहाँ कुछ ही दिनों में हजारों व्यक्तियों को हिन्दू-धर्म का प्रेमी बना दिया और सैंकड़ों ही उनके पास रह कर भारतीय साधन प्रणाली का अनुसरण करके आध्यात्मिक प्रगति में दत्तचित्त हो गये। स्वामी जी लगातार कई वर्ष तक अमरीका में और इंग्लैण्ड में धर्म-प्रचार करते रहे और फिर अपने निश्चय के अनुसार वहाँ के अनेक सुयोग्य तथा साधन सम्पन्न व्यक्तियों को लेकर भारतवर्ष वापस आये। पहले उन्होंने देश भर का दौरा करके जनता को जागृति का सन्देश सुनाया, मुक्ति का मार्ग दिखलाया और फिर अपने गुरु के नाम पर राम कृष्ण मिशन’ की स्थापना की जिसका एकमात्र लक्ष स्वामी जी की भावना के अनुसार भारतीय जनता की हर प्रकार से सहायता और उन्नति का प्रयत्न करना था।
 
🔵 स्वामी जी संकीर्णता की भावना से भी बहुत परे थे और वास्तव जिस किसी को धर्म के सत्य स्वरूप के दर्शन हुये है, वह चाहे किसी भी महत्व का अनुयायी क्यों न हो उसमें सब के प्रति सहिष्णुता, उदारता, प्रेम की भावना अवश्य पाई जाएगी। अमरीका की ‘सर्वधर्म महासभा’ में स्वामी जी ने सबसे पहले दिन जो संक्षिप्त भाषण दिया उसमें उन्होंने अपनी इस भावना को पूर्ण रूप से व्यक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि “मुझे यह कहते गर्व होता है कि मैं जिस सनातन हिन्दू धर्म का अनुयायी हूँ उसने जगत को उदारता और विश्व को अपना समझने की उच्च भावना सिखाई है। इतना ही नहीं हम सब धर्मों को सच्चा मानते है और हमने प्राचीन काल में यहूदी और पारसी जैसे भिन्न धर्म वालों को भी अपने यहाँ आश्रय दिया था। मैं छोटेपन से नित्य कुछ श्लोकों का पाठ करता रहा हूँ और अन्य लाखों हिन्दू भी उनका पाठ करते है।

🔴 उनका आशय यही है कि- “जिस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों से उत्पन्न होने वाली नदियाँ अन्त में एक ही समुद्र में इकट्ठी हो जाती है, इसी प्रकार हे प्रभु! मनुष्य अपनी भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुकूल पृथक्-पृथक् धर्म-मार्गों से अन्त में तेरे ही पास पहुँचते है” इसी प्रकार गीता में भी भगवान ने यही कहा है कि “मेरे पास कोई भी व्यक्ति चाहे जिस तरह का आये, तो भी मैं उसे मिलता हूँ। लोग जिन भिन्न-भिन्न मार्गों से अग्रसर होने का प्रयत्न करते है, वे सब रास्ते अन्त में मुझ में ही मिल जाते है।” पंथ-द्वेष धर्मान्धता और इनसे उत्पन्न क्रूरतापूर्ण पागलपन के जोश ने इस सुन्दर धरती को दीर्घकाल से नष्ट कर रखा है; बार-बार भूमि को मानव रक्त से तर कर दिया है, और संस्कृति को छार-छार कर दिया है। पर अब इन बातों का समय पूरा हो चुका है और मैं आशा करता हूँ कि आज प्रातः इस सभा को आरम्भ करने का जो घण्टा बजाया गया था वह सब प्रकार की अनुदारता, संकीर्णता और तलवार तथा कलम द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का अन्त करने वाला ‘मृत्यु घण्टा’ सिद्ध होगा।”

🌹 क्रमशः जारी
🌹 श्री भारतीय योगी
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1945 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.28

👉 आज का सद्चिंतन 24 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Oct 2017


👉 साफ नीयत

🔵 एक नगर में रहने वाले एक पंडित जी की ख्याति दूर-दूर तक थी। पास ही के गाँव में स्थित मंदिर के पुजारी का आकस्मिक निधन होने की वजह से, उन्हें वहाँ का पुजारी नियुक्त किया गया था। एक बार वे अपने गंतव्य की और जाने के लिए बस में चढ़े, उन्होंने कंडक्टर को किराए के रुपये दिए और सीट पर जाकर बैठ गए। कंडक्टर ने जब किराया काटकर उन्हें रुपये वापस दिए तो पंडित जी ने पाया कि कंडक्टर ने दस रुपये ज्यादा दे दिए हैं।

🔴 पंडित जी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूंगा। कुछ देर बाद मन में विचार आया कि बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे है, आखिर ये बस कंपनी वाले भी तो लाखों कमाते हैं, बेहतर है इन रूपयों को भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए। वह इनका सदुपयोग ही करेंगे।

🔵 मन में चल रहे विचारों के बीच उनका गंतव्य स्थल आ गया. बस से उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके, उन्होंने जेब मे हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा, भाई तुमने मुझे किराया काटने के बाद भी दस रुपये ज्यादा दे दिए थे। कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला, क्या आप ही गाँव के मंदिर के नए पुजारी है?

🔴 पंडित जी के हामी भरने पर कंडक्टर बोला, मेरे मन में कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा थी, आपको बस में देखा तो ख्याल आया कि चलो देखते है कि मैं अगर ज्यादा पैसे दूँ तो आप क्या करते हो..!

🔵 अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है। जिससे सभी को सीख लेनी चाहिए" बोलते हुए, कंडक्टर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। पंडितजी बस से उतरकर पसीना-पसीना थे।

🔴 उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया कि हे प्रभु आपका लाख-लाख शुक्र है जो आपने मुझे बचा लिया, मैने तो दस रुपये के लालच में आपकी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी। पर आपने सही समय पर मुझे सम्हलने का अवसर दे दिया। कभी कभी हम भी तुच्छ से प्रलोभन में, अपने जीवन भर की चरित्र पूँजी दाँव पर लगा देते हैं।

👉 सुनिये ही नहीं समझिये भी

एक पण्डित किसी को भागवत की कथा सुनाने जाया करते थे। वे बड़े प्रकाण्ड विद्वान थे। शास्त्रज्ञ थे। राजा भी बड़ा भक्त और निष्ठावान था। पण्डित कथ...