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मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (अन्तिम भाग) 28 Dec

🌹 सद्व्यवहार की आवश्यकता

🔵 गृह-कलह की चिनगारी जिस घर में सुलग जाती है, उसमें बड़ा अप्रिय, कटु और दुखदायी वातावरण बना रहता है। इसका कारण अधिकांश में यह होता है कि एक दूसरे के प्रति उचित शिष्टता और सम्मान का खयाल नहीं रखा जाता। आर्थिक, हानि-लाभ के आधार पर उतने कलह नहीं होते जितने शिष्टता, सम्मान, सभ्यता, मधुरता के अभाव के कारण होते हैं। यह कमी दूर की जानी चाहिये। परिवार के हर सदस्य को उचित सम्मान प्राप्त करने का अधिकार है, किसी के अधिकारों पर अनावश्यक कुठाराघात न होना चाहिए। जो कोई अशिष्टता, उच्छृंखलता, उद्दण्डता, अपमान या कटु भाषण की नीति अपनाना हो उसे प्रेमपूर्वक समझाया बुझाया जाना चाहिये और आपसी स्नेह भाव में कमी के कारणों को ढूंढ़कर उचित समाधान करना चाहिये।

🔴 जरासी बात पर तुनककर न्यारे साझे की तुच्छता नहीं फैलने देनी चाहिये। जहां तक सम्भव हो सम्मिलित परिवार ही रहना चाहिए। सम्मिलित रहने में आत्मिक विकास की जितनी सुविधा है उतनी अलग रहने में नहीं है। परन्तु यदि ऐसा लगे कि आपसी मनोमालिन्य बढ़ रहा है, गृह-कलह शांत होने में सफलता नहीं मिलती या अलग रहने में अधिक सुख-शांति की सम्भावना ही हो तो प्रेमपूर्वक अलग अलग ही जाना चाहिए।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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सोमवार, 26 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 46) 27 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 मधुर भाषण, प्रसन्न रहना, दूसरों को प्रसन्न रखना आवश्यक है और इन सबसे अधिक आवश्यक यह है कि परिवार का खर्च चलाने के लिये ईमानदारी से परिश्रमपूर्वक पैसा कमाया जाय। अनुचित रूप से कमाया हुआ अन्न सब की मन बुद्धि को दूषित करता है और फिर वे दोष नाना प्रकार के कलह, दुर्भाव और दुर्गुणों के रूप में प्रकट होते हैं। ईमानदारी से कमाये हुए अन्न से ऐसा सात्विक रक्त बनता है कि उससे शारीरिक और मानसिक स्वस्थता एवं सात्विकता अपने आप प्रचुर परिमाण में प्राप्त होती है और उसके आधार पर बिना अधिक परिश्रम के सद्भाव बढ़ते रहते हैं।

🔴 गृहस्थ योगी का चाहिये कि अपने परिवार को सेवा-क्षेत्र बनावे। परिजनों को ईश्वर की प्रतिमूर्तियां समझकर उनकी सेवा में दत्तचित्त रहे, उन्हें भीतरी और बाहरी स्वच्छता से समन्वित करके सुशोभित बनावे। इस प्रकार अपनी सेवा-वृत्ति और परमार्थ-भावना का जो नित्य पोषण करता है, उसकी अन्तःचेतना वैसी ही पवित्र हो जाती है जैसे अन्य योग साधकों की। गृहस्थ योगी को वही सद्गति उपलब्ध होती है जिसे अन्य योगी प्राप्त करते हैं।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 45) 26 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 यदि कोई गलती कर रहा हो तो एकान्त में उसे प्रेम पूर्वक उसकी ऊंच, नीच, लाभ, हानि समझनी चाहिए। सबके सामने कड़ा विरोध करना, अपमान करना, गाली बकना, मारना पीटना बहुत अनुचित है। इससे सुधार कम और बिगाड़ अधिक होता है। द्वेष दुर्भाव और घृणा की वृद्धि होती है, यह सब होना एक अच्छे परिवार के लिए लज्जाजनक है। समझाने से आदमी मान जाता है और अपमानित करने से वह क्रुद्ध होकर प्रतिशोध लेता एवं उपद्रव खड़े करता है।

🔴 दूसरों की आंख बचाकर अपने लिये अधिक लेना बुरा है। बाजार में चुपके से स्वादिष्ट पदार्थ चट कर आना, चुपके चुपके निजी कोष बनाना, अपने मनोरंजन, शौक या फैशन के लिए अधिक खर्च करना घर भर को ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, आत्मसंतोष और निन्दा के लिए आमंत्रित करना है। बाहर व्यवसाय क्षेत्र में काम करने के लिए यदि बढ़िया कपड़ों की आवश्यकता है तो सब लोगों को यह अनुभव करना चाहिए कि यह शौक या फैशन के लिए नहीं आवश्यकता के लिए किया गया है।

🔵 अधिक परिश्रम की क्षतिपूर्ति के लिए यदि कुछ विशेष खुराक की जरूरत है तो दूसरों को यह महसूस होने देना चाहिए कि यह चटोरेपन के लिए नहीं जीवन-रक्षा के लिये किया गया है। भावनाएं छिपती नहीं, चटोरापन या फैशनपरस्ती बात-बात में टपकती है, विशेष आवश्यकता की विशेष पूर्ति केवल विशेष अवसर पर ही रहती है शेष आचरण सबके साथ घुला−मिला और समान रहता है। जिसे जो विशेष सुविधा प्राप्त करनी हो वह प्रकट रूप से होनी चाहिये।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 24 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 44) 25 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 सास बहुओं में, ननद भौजाइयों में, देवरानी जिठानियों, में अक्सर छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई हुआ करती है। स्त्री जाति को मानसिक विकास के अवसर प्रायः कम ही उपलब्ध होते हैं इसलिए उनकी उदारता संकुचित होती है। निस्संदेह पुरुष की अपेक्षा आत्म-त्याग और स्नेह की मात्रा स्त्रियों में बहुत अधिक होती है पर वह अपने बच्चे या पति में अत्यधिक लग जाने के कारण दूसरों के लिए कम बचती है।

🔴 समझा-बुझाकर, एक दूसरे के उदारता प्रकट करने का अवसर देकर, उन्हें यह अनुभव करना चाहिए कि परिवार के सब सदस्य बिलकुल निकटस्थ, बिलकुल सगे हैं। विरानेपन या परायेपन की दृष्टि से सोचने की दुर्भावना को हटाकर आत्मीयता की दृष्टि से सोचने योग्य उनकी मनोभूमि को तैयार करना चाहिये। बड़े बूढ़े यह आशा न करें कि हमारे साथ शिष्टाचार की अति बरती जानी चाहिये, उन्हें छोटों के प्रति क्षमा, उदारता, प्रेम और और सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिये। दास, नौकर या गुलाम जैसा नहीं।

🔵 इसी प्रकार छोटों को बड़ों के प्रति आदर-भाव रखना चाहिये, घर के अन्य कामों की अपेक्षा पहिले आवश्यकता और इच्छाओं को पूरा करना चाहिये। घर का काम धंधा आमतौर से बंटा हुआ रहना चाहिये। बीमारी, कमजोरी, गर्भावस्था या अन्य किसी कठिनाई की दशा में दूसरों को उसका काम आपस में बांटकर उसे हलका कर देना चाहिये। नित्य पहनने के जेवरों को छोड़कर अन्य जेवर सम्मिलित रखे जा सकते हैं जिनका आवश्यकतानुसार सब उपयोग कर लें। आपको यदि पैसे की सुविधा हो तो सबके लिये अलग-अलग जेवर भी बन सकते हैं पर वे सब के पास करीब करीब समान होने चाहिये। नई शादी होकर आने वाली बहू के लिये अपेक्षाकृत कुछ अधिक चीजें होना स्वाभाविक है। विशेष अवस्था को छोड़कर साधारणतः सबका भोजन वस्त्र करीब करीब एक सा ही होना चाहिये। इस प्रकार स्त्रियों में एकता रह सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 43) 24 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 ‘अनावश्यक संकोच’ पारिवारिक कलह की वृद्धि में सबसे प्रधान कारण हैं। बाहर के आदमियों से तो हम घुल घुल कर बात करते हैं, परन्तु घर वालों से सदा उदासीन रहते हैं, बहुत ही संक्षिप्त वार्तालाप करते हैं। बहुत कम परिवार ऐसे देखे जाते हैं, जिनमें घर के लोग एक दूसरे से अपने मन की बातें कह सकें। शिष्टाचार, बड़प्पन, लिहाज, लाज, पर्दा आदि का वास्तविक रूप नष्ट होकर उसका ऐसा विकृत स्वरूप बन गया है कि घर के सब लोग अपनी मनोभावनायें, आवश्यकताएं और अनुभूतियां एक दूसरे के सन्मुख रखते हुए झिझकते हैं।

🔴 इस गलती का परिणाम यह होता है कि एक दूसरे को ठीक तरह समझ नहीं पाते। किसी बात पर मतभेद हो तो उस भेद को अवज्ञा, अपमान या विरोध मान लिया जाता है ऐसा न होना चाहिये। किसी बात का निर्णय करना हो तो घर के सभी सलाह दे सकने के योग्य स्त्री पुरुषों की सलाह लेनी चाहिए। अपने अभाव प्रकट करने का हर एक को अवसर दिया जाय। जो काम करना हो उसे इस प्रकार अच्छी भूमिका के साथ, तर्क और उदाहरणों के साथ रखना चाहिए कि उस पर घर वालों की सहमति मिल जावे।

🔵  हर व्यक्ति यह अनुभव करे कि मेरे आदेश से ही यह कार्य हुआ। जिस प्रकार राज्य संचालन में प्रजा की सहमति आवश्यक है उसी प्रकार गृह व्यवस्था में परिजनों की सहमति रहने से शान्ति और सुव्यवस्था रहती है। राजनीतिक स्वराज्य से देश में अमनोअमान कायम रहता है। पारिवारिक स्वराज्य से परिवार में सुव्यवस्था रहती है। परिवार की प्रजा यह न समझे कि किसी की इच्छा जबरदस्ती हमारे ऊपर थोपी जा रही है वरन् उसे यह भान होना चाहिए कि सबसे लाभ और सब के हित के लिए विचार विनिमय और विवेक के साथ नीति निर्धारित की गई है तथा औचित्य एवं ईमानदारी को व्यवस्था संचालन में प्रधान स्थान दिया जा रहा है। इस सरल, स्वाभाविक और बिना किसी कठिनाई की नीति का जिस परिवार में पालन किया जाता है वहां सब प्रकार सुख-शान्ति बनी रहती है।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 42) 23 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 भीतर और बाहरी जीवन के दोनों पहलू निरन्तर विकसित होते रहें ऐसा कार्यक्रम सदा जारी रहना चाहिए। भविष्य में उन्नति कर सकने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है उन साधनों को जुटाने के लिये सदैव ध्यान रखना आवश्यक कर्तव्य है। अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक कठिनाई को हल करने योग्य शिक्षा, योग्यता और अनुभव संपादन किये बिना जीवन सुखमय नहीं बन सकता।

🔴 इसलिये पढ़ने लिखने की, कमाने की, स्वस्थ रहने की, बीमारी से बचे रहने की, बोलने-चलाने की, लेने देने की योग्यताएं एकत्रित करने के अवसर हर एक को मिलने चाहिए। अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी योग्यता से अपना निर्वाह कर लेने की क्षमता संपादन करने का आरम्भ से ही ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि दुर्भाग्यवश ऐसे अवसर भी जीवन में आ सकते हैं जब नियत सम्पत्ति से या स्वजनों से हाथ धोना पड़े। ऐसे समय में वही मनुष्य विजयी होता है जिसने विपत्ति से लड़ने योग्य शास्त्रों से अपने को पहले से ही सुसज्जित कर रखा हो।

🔵 इन चारों बातों को घर के हर मनुष्य के ऊपर लागू करके देखना चाहिए कि इन आवश्यकताओं में से कौन सी बात किसे प्राप्त नहीं हो रही है। जो बात जिसे प्राप्त नहीं हो रही हो उसे प्राप्त कराने का यथा शक्ति अवश्य ही उद्योग करना चाहिये। यदि घर के दस आदमियों का जीवन किसी हद तक सुखी और समृद्ध बनाया जा सका तो समझिये कि विश्व कल्याण में, परमार्थ में, धर्म विस्तार में वृद्धि हुई और अपने को पुण्य फल मिला। यदि प्रथम प्रयास प्रत्यक्ष रूप से सफल न भी हो तो भी लाभ ही है क्योंकि अपनी सद्भावनायें सदा अपने मस्तिष्क में काम करती रहेंगी और वे शुभ संस्कारों के रूप में अन्तःक्षेत्र में अपनी जड़ जमा लेंगी। यह शुभ संस्कार चुपचाप पल्लवित होते रहते हैं और अपने लोक परलोक को नाना विधि से आनंदित एवं सुख समृद्धि युक्त बनाते रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 41) 22 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 पौधे को विकसित होने के लिए अच्छी जमीन और पानी की जरूरत है, पर साथ ही हवा भी चाहिए। इसी प्रकार जीवन विकास के लिए भोजन, शिक्षा तथा मनोरंजन से वंचित रहते हैं वे एक बड़ा अन्याय करते हैं। नीतिकारों का वचन है कि ‘जो संगीत, साहित्य तथा कला से विहीन है वह बिना सींग पूंछ का पशु है, इस कथन का तात्पर्य मनोरंजन रहित, शुष्क, नीरस जीवन की भर्त्सना करना है। निश्चय ही मनोरंजन एक आवश्यक भोजन है जिसके बिना जीवन मुरझाने लगता है। कुरुचि पूर्ण, दूषित, अश्लील, मनोरंजन से बचना ठीक है। सादा और सात्विक मनोरंजनों को तलाश करना चाहिए।

🔴 संगीत, गायन, वाद्य, भ्रमण, सम्मिलन, सहभोज, उत्सव, मेला, प्रतियोगिता, चित्र कला, व्याख्यान, देशाटन, प्रदर्शनी सजावट, अद्भुत और ऐतिहासिक वस्तुओं का निरीक्षण, खेल, यात्रा, आदि अनेक मार्गों से यथा अवसर मनोरंजन के छोटे मोटे साधन प्राप्त किये जा सकते हैं। घर के पुरुषों को तो ऐसे अवसर मिलते रहते हैं पर स्त्रियों और बालकों को इससे वंचित रहना पड़ता है। यह उचित नहीं, उन्हें भी यथाशक्त ऐसे अवसर देने चाहिए। छोटे बालकों के लिए खिलौने जुटाते रहना चाहिए। मनोविनोद के कार्य में यदि थोड़ा पैसा खर्च होता हो तो उसमें कंजूसी न करनी चाहिए क्योंकि इस मार्ग में जो उचित खर्च होता है वह फिजूल खर्ची नहीं वरन् जीवन की एक वास्तविक आवश्यकता की पूर्ति है।

🔵 चौथी बात भविष्य निर्माण की है। आज की जरूरत किसी प्रकार पूरी हो जाय, केवल मात्रा इतने से सन्तुष्ट न हो जाना चाहिए वरन् यह देखना चाहिये कि हर व्यक्ति का भविष्य उन्नत, सुखमय, समृद्ध, प्रकाशवान एवं उज्ज्वल कैसे हो सकता है? प्राणी के जन्म धारण का उद्देश्य किसी प्रकार दिन काटते रहना नहीं वरन् यह है कि वह अपनी स्थिति को ऊंचा उठावे, आगे बढ़े और अधिक साधन सम्पन्न होता हुआ नीर-विकसित हो। ऊंचा, ऊंचा और अधिक ऊंचा जीवन बने, इसके लिए सदैव सोचते और प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 40) 21 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 शरीर की भूख बुझाने के लिये जैसे भोजन आवश्यक है उसी प्रकार मानसिक भूख को बुझाने के लिये शिक्षा आवश्यक है। घर के हर व्यक्ति को शिक्षित बनाना चाहिए। जो स्कूल जा सकते हों वे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करें, जिनके लिये यह संभव न हो वे घर पर पढ़ें। बच्चे, जवान या बूढ़े कोई भी क्यों न हों सभी को पढ़ने की रुचि उत्पन्न करनी चाहिये और उसके लिये साधन तथा व्यवस्था का प्रबन्ध करना चाहिए। एक दो घंटे नियमित रूप से गृह पाठशाला चलती रहे। अक्षर ज्ञान हो जाने के उपरान्त ऐसी चुनी हुई पुस्तकें उन्हें देनी चाहिये जिससे शारीरिक, मानसिक, समाजिक, धार्मिक आदि विषयों का आवश्यक ज्ञान क्रमशः बढ़ता रहे।

🔴 जीवन विज्ञान की आवश्यक समस्याओं को वे समझें और उन पर बारीकी के साथ विचार करना सीखें तथा प्रामाणिक व्यक्तियों की उस विषय पर सम्मतियां पढ़ें। रामायण आदि धार्मिक पुस्तकें पढ़ना ठीक है, परन्तु केवल मात्र इतिहास, पुराणों तक ही सीमित न रहना चाहिये। जीवन संग्राम की प्रत्यक्ष समस्याओं को समझना और सुलझाना भी आवश्यक है। यह भी धर्म का ही अंग है। अक्षर ज्ञान शब्द-कोष, व्याकरण आदि द्वारा भाषा का ज्ञान बढ़ाना चाहिये, साथ-साथ आवश्यक विषयों पर सत्संग, विवाद, प्रश्नोत्तर, शंका-समाधान, प्रवचन आदि उपायों की जानकारी, बुद्धिमता, विचार-शक्ति की भी वृद्धि होनी चाहिये। शिक्षा एवं विद्या की वृद्धि का अवसर हर एक को आवश्यक रूप से उसी प्रकार मिलना चाहिये जैसे कि भोजन की व्यवस्था जरूरी होती है।

🔵 स्वास्थ्य और शिक्षा के बाद मनोरंजन का प्रश्न आता है। वह भी एक अनावश्यक प्रश्न है। यदि मनुष्यों को आनन्दित होने, उल्लसित होने, हंसने, प्रसन्न होने, खेलने, मनोविनोद करने का अवसर न मिले तो उसकी मनोभूमि बड़ी कर्कश, चिड़चिड़ी, असहिष्णु और निराशा मय बन जायेगी। जो सदा कोल्हू के बैल की तरह काम में जुते रहते हैं, कैदी की तरह एक नियत क्षेत्र में काम करते रहते हैं, भोजन, मजूरी और निद्रा यही तीन कार्यक्रम जिनके रहते हैं उनकी मानसिक चेतना की सरसता धीरे धीरे सूखती जाती है और वे भीतर बाहर से अनुदार, विरोधी, दोषारोपण करने वाले, अविश्वासी, डरपोक और कायर बन जाते हैं। ऐसे लोगों को दुनियां के प्रति सदा अविश्वास और असन्तोष रहता है। इन प्रवृत्तियों के कारण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होने लगता है, आयु घटने लगती है और बुढ़ापा घेर लेता है।

🌹 *क्रमशः जारी*
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 39) 20 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 समय को फिजूल कार्यों में से बचा कर शरीर वस्त्र और मकान को साफ, निर्मल एवं उज्ज्वल रखा जा सकता है। यदि असमानता और पक्षपात चलता रहे तो अमीरी में भी कलह, वैमनस्य और दुर्भाव रहेंगे। यदि निष्पक्षता, समानता और आत्म त्याग रहे तो गरीबी में भी प्रेम एवं संतोष का जीवन व्यतीत होगा। दुनियां में बहुत से अमीर हैं, ठाट-बाट से रहते हैं, शान-शौकत रखते हैं, मौज मजा करते हैं, उनके ऐश-आराम और रहन-सहन की नकल करने की जरूरत नहीं, उनकी तीक्ष्ण बुद्धि, चतुरता, परिश्रम शीलता और जागरूकता की नकल करनी चाहिये, जिन गुणों से उन्हें वैभव मिला है उन गुणों की तरफ देखना चाहिए, उनकी दूषित नीति या फैशनपरस्ती के दोषों को अपनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिये। सादगी और गरीबी पारिवारिक आनन्द को कायम रखने में किसी प्रकार बाधक नहीं हो सकती। 

🔴 स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन तथा भविष्य-निर्माण का हर एक को अवसर मिलना चाहिये। यह देखते रहना चाहिए कि किसी के ऊपर ऐसा शारीरिक या मानसिक दबाव तो नहीं पड़ रहा है, जिसके कारण उसका स्वास्थ्य नष्ट होता हो। आहार विहार के असंयम के कारण कोई अपने को अस्वस्थता के मार्ग पर तो नहीं बढ़ाये लिये जा रहा है यह ध्यान रखने की बात है। यदि बहुमूल्य, बढ़िया, पौष्टिक भोजन प्राप्त न होता हो, मोटा खोटा खाकर गुजारा करना पड़ता हो तो इसमें कोई चिन्ता की बात नहीं, इससे स्वास्थ्य नष्ट नहीं हो सकता, आहार विहार की व्यवस्था ही वह दोष है जिसके कारण स्वास्थ्य नष्ट होता है। 

🔵 कीमती से कीमती भोजन इस दोष से होने वाले नुकसान को पूरा नहीं कर सकता। भोजन, शयन, व्यायाम, मल त्याग, स्नान सफाई, ब्रह्मचर्य, नियत-परिश्रम आदि का ध्यान रखा जाय तो अस्वस्थता से बचा रहा जा सकता है। यदि कभी बीमारी का अवसर आवे और रोग साधारण हो तो बड़े बड़े डाक्टरों की लम्बी फीसें चुकाने और विलायती दवाओं के लिये घर खाली कर देने की आवश्यकता नहीं है। किसी अनुभवी और सहृदय व्यक्ति की सलाह से मामूली दवादारू के द्वारा रोग-निवारण की कोशिश करनी चाहिये। तेज और जहरीली दवाओं की भरमार से उस समय तो लाभ हो जाता है पर पीछे अनेक उपद्रव उठ खड़े होते हैं। इसलिये उपवास, फलाहार एवं मामूली चिकित्सा से रोग को दूर करना चाहिए। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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रविवार, 18 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 38) 19 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 सूक्ष्म दृष्टि से यह निरीक्षण करते रहना चाहिये कि घर के हर एक स्त्री, पुरुष, बालक को शारीरिक और मानसिक उन्नति का समुचित अवसर मिल रहा है या नहीं? जीवन विकास और भविष्य निर्माण के स्वाभाविक अधिकार से कोई वंचित तो नहीं हो रहा है? किसी अनावश्यक सुविधा और किसी पर अनुचित दबाव तो नहीं पड़ रहा है? इन तीनों प्रश्नों पर बारीकी से नजर डालते रहने से यह बात मालूम होती रहती है कि  किस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।

🔴 कुछ ऐसी प्रथा चल पड़ी हैं कि लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को, स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों को, और बिना कमाने वालों या कम कमाने वालों की अपेक्षा अधिक कमाने वाले को, अधिक सुविधा दी जाती है। खाने, पहनने, मनोरंजन तथा सम्मान पाने में वे आगे रहते हैं। बेचारी लड़कियां और स्त्रियां तो एक प्रकार के फालतू प्राणी समझे जाते हैं, उनकी सुविधा एवं आवश्यकता और विकास की ओर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। यह अन्याय मिटना और मिटाया जाना चाहिए। स्त्रियों, लड़कियों, न कमाने वालों और रोगी, वृद्ध या असमर्थों को भी उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप समुचित सुविधायें मिलनी चाहिये।

🔵 यह चिन्ता करना गलत है कि कम आमदनी होने के कारण घर के सब लोगों की आवश्यकता किस प्रकार पूरी की जा सकेगी? छोटी आमदनी होने पर जीवन निर्वाह का व्यवस्था क्रम मितव्ययी और सादगीपूर्ण बना लेना चाहिए। मोटा कपड़ा, मोटा अनाज, साधारण रहन-सहन रखने और टीपटाप, फैशन, तड़क-भड़क, दिखावट की अनावश्यक चीजों का स्वेच्छा और प्रसन्नता पूर्वक त्याग कर देने से थोड़ी आमदनी में अच्छी तरह काम चल सकता है। अमीर, फिजूल खर्च, फैशन परस्त, छैल छबीले लोगों की नकल करने में अनावश्यक पैसा खर्च करने में कुछ भी बुद्धिमानी नहीं है। सादगी में सात्विकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 17 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 37) 18 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 परमार्थ का यह कार्य अनेक रीतियों से किया जाता है। उन रीतियों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण रीति यह भी है कि मनुष्यों में सत् तत्व की वृद्धि की जाय। यही रीति सर्वोपरि है। किसी को अन्न जल वस्त्र आदि दान देने की अपेक्षा उसके विचार और कार्यों को उत्तम बना देना अनेक गुना पुण्य है। कारण यह है कि जो व्यक्ति सद्गुणी, सदाचारी और सद्भावी बन जाता है वह सुगन्धित पुष्प की भांति जीवन भर हर घड़ी समीपवर्ती लोगों को शांति प्रदान किया जाता है।

🔴 सज्जन पुरुष एक प्रकार का जीवित और चलता फिरता सदावर्त है जो प्रति दिन प्रचुर परिणाम के आत्मिक भोजन देकर अनेक व्यक्तियों को सच्चा प्राण दान देता है। दस हजार सदावर्त या जलाशय स्थापित करने की अपेक्षा एक पुण्यात्मा मनुष्य तैयार कर देना अधिक सुफल प्रदान करने वाला है।

🔵 अपने परिवार में यदि अच्छी भावना और विचारधारा ओत प्रोत कर दी जाय तो कुटुम्बियों के स्वभाव और चरित्र में सात्विकता की वृद्धि होगी और फिर उसके द्वारा अनेक लोगों को पथ-प्रदर्शन मिलेगा। एक पेड़ के बीज अनेकों नये पौधे उत्पन्न करते हैं और फिर उन नये पौधों को बीज और नये नये पेड़ उपजाते हैं, एक से दस, दस से सौ, सौ से हजार, इस प्रकार यह श्रृंखला फैलती है और आगे निरन्तर बढ़ती ही रहती है। इस प्रकार यदि सत स्वभाव के चार मनुष्य बना दिये गये तो उनका प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हजारों लाखों मनुष्यों पर पड़ता है।

🔴 हरिश्चन्द्र, शिव, दधीचि, शिवाजी, राणाप्रताप आदि की तरह कोई कोई तो ऐसे निकल आते हैं, जिनका शरीर मर जाने पर भी ‘यश शरीर’ जीवित रहता है और लाखों करोड़ों वर्ष तक वह यश शरीर संसार में धर्म भावना का संचार करता रहता है। मनुष्य को सात्विक, उच्च, महान बनाना इतना महान् पुण्य कार्य है जिसकी ईंट पत्थर से बनने वाले छोटे छोटे कार्यों से कोई तुलना नहीं की जा सकती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 36) 17 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 यह लोग मेरे आत्म त्याग की कद्र करते हैं या नहीं? इन प्रश्नों को मन में कभी प्रवेश न करने देना चाहिए। वरन् सदा यह सोचना चाहिए कि एक ईमानदार माली की तरह मैं अपनी वाटिका को सुरभित बनाने में शक्ति भर प्रयत्न कर रहा हूं या नहीं? अपनी योग्यता और सामर्थ्य में से कुछ चुराता तो नहीं हूं? मेरी निस्वार्थता और निष्पक्षता में किसी प्रकार की कमी तो नहीं आ रही है? कर्तव्य पालन में किसी प्रकार का आलस्य प्रमाद तो नहीं हो रहा है? यदि इन प्रश्नों का सन्तोष जनक, उत्तर मिलता हो तो यह बड़ी ही आनन्ददायक और शान्तिप्रद बात समझी जानी चाहिये।

🔴 प्रशंसा होती है या नहीं? कोई अहसान मिलता है या नहीं? सफलता मिलती है या नहीं? ऐसे प्रश्नों का लेखा लेना अपनी साधना को चौपट करना है। इन प्रश्नों का सन्तोषजनक या असन्तोषजनक उत्तर देना दूसरों के हाथ की बात है। साधक को अपनी प्रसन्नता दूसरों के हाथ नहीं बेचनी चाहिए? दूसरों के कुछ देने से प्रसन्नता मिले, यह एक कंगाली की स्थिति है। हमें आनन्द का स्रोत अपनी आत्मा में ढूंढ़ना चाहिये। यदि ठीक प्रकार कर्तव्य का पालन किया गया हो तो इससे अधिक आनन्ददायक दुनियां की और कोई बात नहीं हो सकती।

🔵 संसार की सुख शान्ति में वृद्धि करना यही तो परमार्थ का लक्षण है। प्याऊ, धर्मशाला, कुंआ, तालाब, बावड़ी, बगीचा, सड़क, पाठशाला, औषधालय आदि का निर्माण करने वाले धर्मात्मा लोग इन कार्यों द्वारा दूसरे लोगों के कष्ट निवारण और सुख में वृद्धि करना चाहते हैं। अनेक प्रकार की संस्थाओं के स्थापन और संचालन का भी यही उद्देश्य है। महात्मा, त्यागी, वैरागी, तपस्वी, देशभक्त, लोक सेवक, परोपकारी सत्पुरुषों की साधना भी इसी उद्देश्य के लिये होती है। शास्त्रकारों ने विश्व की सुख शान्ति बढ़ाने वाले कार्यों का करना ही धर्म तथा ईश्वर प्राणिधान बताया है और कहा है कि ऐसे कार्यों से ही मनुष्य को लोक परलोक में पुण्यफल प्राप्त होता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 35) 16 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा
🔵 ऐसी दुखदायी स्थिति उत्पन्न न होने पाये इसके लिये समझौते ही नीति से काम लेना पड़ता है। अपनी मर्जी पर अड़ने, या उसे दूसरों पर बलात् थोपने की अपेक्षा अपने आपको नरम बनना पड़ता है। जिस सीमा तक कोई दुष्परिणाम उपस्थित न होता हो उस सीमा तक समझौता कर लेना चाहिए। यह ठीक है कि घर के लोगों को ठीक मार्ग पर रखना अपना कर्तव्य है। पर यह भी ठीक है कि पूर्ण रूप से किसी को तत्काल इच्छानुवर्ती बना लेना भी सुगम नहीं। थोड़ा झुकने से ही काम चलता है। समझौते की नीति से गुजर होती है।

🔴 सरकस के लिये जानवरों को साधने वाले मास्टर जानते हैं कि उजड़ जंगली जानवरों को रास्ते पर लाने में, इच्छित खेल सिखाने में, कितनी देर लगती है, कितना नरम गरम होना पड़ता है। बिल्कुल कड़ाई और बिल्कुल ढील यह दोनों ही बातें उपयोगी नहीं। बीच के रास्ते से चलना, उदारता और सहनशीलता के आधार पर काम करना ही हितकर होता है इसी आधार पर घर की सुख शान्ति कायम रह सकती है।

🔵 शान्ति, सन्तोष और व्यवस्था कायम रखने का तरीका यह है कि आत्म त्याग की नीति को प्रधानता दी जाय। आप अपना उदाहरण ऐसा रखें, जिसे देखकर घर के अन्य लोगों को भी आत्म-त्याग की प्रेरणा मिले। ‘‘मुझे कम आपको ज्यादा’’ यह भाव जितनी ही प्रधानता प्राप्त करेंगे उतनी ही शान्ति और सुव्यवस्था कायम रहेगी। गृहस्थ योगी को अपने को एक निस्वार्थ, निष्पक्ष एवं सद्भावी सेवक के रूप में घर वालों के सामने उपस्थित करना चाहिए। घर के लोगों से मुझे क्या लाभ मिलता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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बुधवार, 14 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 34) 15 Dec

🌹 परिवार की चतुर्विधि पूजा

🔵 स्वार्थ बुद्धि से व्यवहृत होने वाले गृहस्थ को माया बन्धन कहा गया है, ‘‘मैं घर का स्वामी हूं। घर के प्रत्येक सदस्य को मेरी आज्ञाओं का पालन करना चाहिये, प्रत्येक को मेरी इच्छानुसार चलना चाहिए, प्रत्येक को मेरी मर्जी और सुविधा का आचरण करना चाहिए, मैं जिस तरह देखना चाहूं उस तरह रहना चाहिये’’ इस प्रकार की इच्छा और आकांक्षाओं को लेकर जो गृहस्थ में प्रवेश करता है, उसे निस्सन्देह उसमें नरक, दुःख, क्लेश, भार, बन्धन या माया के अतिरिक्त और कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

🔴 यह संभव नहीं कि सब लोग अपनी मन मर्जी के बन जावें। गुण कर्म और स्वभाव की भिन्नता हर मनुष्य में पाई जाती है, अनेक जन्मों के संचित संस्कारों के समूह द्वारा स्वभाव बनता है, प्रयत्न करने पर उसमें सुधार हो तो जाता है पर यह सम्भव नहीं कि कोई प्राणी अपनी मौलिकता को बिलकुल खोदे। हर व्यक्ति की रुचि-इच्छा, वृत्ति, भावना एवं प्रवृत्ति भिन्न होती है, मिट्टी के पुतले की तरह चुपचाप हर एक आज्ञा को मन, वचन और कर्म से कोई शिरोधार्य करले यह सम्भव नहीं।

🔵 इस प्रकार कुछ न कुछ मतभेद रहे ही, अपने स्वार्थों का संघर्ष नहीं मिट सकता, इस प्रकार आपकी आज्ञा मानने में जहां उसके निजी स्वभाव में स्वार्थ में संघर्ष होता होगा, वह व्यक्ति आज्ञा पालन में आनाकानी करेगा। इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि अपनी मर्जी यदि पारिवारिक स्थिति की अपेक्षा बहुत आगे बढ़ गई तो भी दूसरे उसे मानने में तत्पर न होंगे। ऐसी दशा में जो असन्तोष, मन मुटाव, क्रोध, कलह एवं संघर्ष होगा वह अशान्ति का कारण बनेगा। घर में दुख ही दुख दिखाई देगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 गृहस्थ-योग (भाग 33) 14 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 आप सब आत्म निरीक्षण द्वारा अपनी भूलों को देखें तो देखकर निराश न हों वरन् इस भावना को मनःक्षेत्र में स्थान दें— ‘‘वीर योद्धा की तरह मैं जीवन युद्ध में रत हूं। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते समय के जो बुरे संस्कार अभी हम लोगों में लगे हुए शेष रह गये हैं, वे बार बार मार्ग में विघ्न उपस्थित करते हैं, कभी मैं गलती कर बैठता हूं कभी दूसरे गलती कर देते हैं, आये दिन ऐसे विघ्न सामने आते रहते हैं, परन्तु मैं उससे जरा भी विचलित नहीं होता, मैं नित्य इन कठिनाइयों से लड़ूंगा।

🔴  ठोकर या चोट खाकर भी चुप न बैठूंगा। गिर पड़ने पर फिर उठूंगा और धूलि झाड़कर फिर युद्ध करूंगा। लड़ने वाला ही गिरता और घायल होता है, कुसंस्कार यदि मुझे गिरा देते हैं तो भी मुझे उनके विरुद्ध युद्ध जारी रखना चाहिए। मैं सत्य मार्ग का पथिक हूं सच्चिदानन्द आत्मा हूं, अपने और दूसरे के कुसंस्कारों से निरन्तर युद्ध जारी रखना और उन्हें परास्त कर देने तक दम न लेना ही मेरा कर्तव्य है। मैं अपने संकल्प, व्रत, साधन और उद्देश्य के प्रति सच्चा हूं। अपनी सच्चाई की रक्षा करूंगा और इन कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करके रहूंगा। भूलों को नित्य परखने, पकड़ने और उन्हें हटाने का कार्य मैं सदा एक रस उत्साह के साथ जारी रखूंगा।’’

🔵 उपरोक्त मन्त्र की सफलता के निरीक्षण के साथ मनन करना चाहिए। इससे निराशा नहीं आने पाती। गृहस्थ योग के मूलभूत सिद्धान्तों का बीज मन्त्र, दृढ़ता का संकल्प और त्रुटियों में धर्म युद्ध जारी रखने की प्रतिक्षा यह तीनों ही महामंत्र साधक की मनोभूमि में खूब गूंजने चाहिये। अधिक से अधिक समय इन विचारधाराओं में ओत-प्रोत रहना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 32) 13 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 गृहस्थ योग की अपनी साधना आरम्भ करते हुए आप इस बात के लिए कमर कस कर तैयार हो जाइए कि भूलों त्रुटियों कठिनाइयों और असफलताओं का आपको नित्य सामना करना पड़ेगा, नित्य उनसे लड़ना पड़ेगा, नित्य उनका संशोधन और परिमार्जन करना होगा, और अन्त में एक ना एक दिन सारी कठिनाइयों को परास्त कर देना होगा।

🔴 जैसे भूख, निद्रा, मल त्याग आदि नित्य कर्मों में रोज करते हैं तो भी दूसरे दिन फिर उनकी जरूरत पड़ती है, इस रोज रोज के झमेले से कोई निराशा या अनुत्साहित नहीं होता वरन् धैर्य पूर्वक नित्य ही उसकी व्यवस्था की जाती है। इसी प्रकार गृहस्थ योग की साधना में अपनी या दूसरों की कमजोरी से जो भूलें हों उनसे डरना या निराश न होना चाहिए वरन् अधिक दृढ़ता एवं उत्साह से परिमार्जन का धैर्य पूर्वक प्रयत्न करते रहना चाहिए।

🔵 पूर्ण रूप से सुधार हुआ है या नहीं यह देखने की उपेक्षा यह देखना चाहिए कि पहले की अपेक्षा सात्विकता में कुछ वृद्धि हुई है या नहीं? यदि थोड़ी बहुत भी बढ़ोतरी हुई हो तो यह आशा, उत्साह, प्रसन्नता और सफलता की बात है। बूंद बूंद से घड़ा भर जाता है, कन कन जमा होने से मन जमा हो जाता है, राई राई इकट्ठा करने से पर्वत बन जाता है, यदि प्रति दिन थोड़ी थोड़ी सफलता भी मिले तो हमारे शेष जीवन के असंख्य दिनों में वह सफलता बड़ी भारी मात्रा में जमा हो सकती है। यह सम्पत्ति किसी प्रकार नष्ट होने वाली नहीं है। यह जमा होने का क्रम अगले जन्म में भी जारी रहेगा और लक्ष तक एक न एक दिन पहुंच ही जाया जायेगा, धीरे धीरे सफलता मिले तो अधिक उत्साह से काम करना चाहिए। निराश होकर छोड़ बैठने की कोई आवश्यकता नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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सोमवार, 12 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 31) 12 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 साधक सोचता है, इतने दिन से प्रयत्न कर रहा हूं, पर स्वभाव पर विजय ही नहीं मिलती, नित्य गलतियां होती है, ऐसी दशा में साधना चल नहीं सकती। कभी सोचता है हमारे घर वाले उजड्ड, गंवार, मूर्ख और कृतघ्न हैं यह लोग मुझे परेशान और उत्तेजित करते हैं और मेरे जीवन को साधना की नियत दिशा में चलने देते तो साधन व्यर्थ है, इस प्रकार के निराशाजनक विचारों से प्रेरित होकर वह अपने व्रत को छोड़ देता है।

🔴 उपरोक्त कठिनाई से हर साधक को आगाह हो जाना चाहिए। मनुष्य स्वभाव में त्रुटियां और कमजोरियां रहना निश्चित है। जिस दिन मनुष्य पूर्ण रूपेण त्रुटियों से परे हो जायेगा उसी दिन वह परम पद को प्राप्त कर लेगा, जीवन मुक्त हो जायेगा। जब तक उस मंजिल तक नहीं पहुंच जाता, जब तक मनुष्य योनि में है, देव योनि से पीछे है, तब तक यही मानना पड़ेगा कि मनुष्य त्रुटिपूर्ण हैं। जहां कई ऐसे व्यक्तियों का सम्मिलन है जिसमें कोई तो आध्यात्मिक भूमिका में बहुत आगे, कोई बहुत पीछे है ऐसे क्षेत्र में नित नई त्रुटियों का कठिनाइयों का सामने आना स्वाभाविक है। इन में से कुछ अपनी गलती के कारण उत्पन्न हुई होंगी कुछ अन्यों की गलती से।

🔵 यह क्रम धीरे दूर होता जाता है पर यह कठिन है कि अपना परिवार पूर्ण रूपेण देव परिवार हो जाय, इसके लिए बहुत कठिनाई से डरने घबराने या विचलित होने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। समाज का अर्थ ही— ‘‘त्रुटियों के सुधार का अभ्यास’’ है। अभ्यास को निरन्तर जारी रखना चाहिए। योगीजन नित्य प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा-ध्यान आदि की साधना करते हैं, क्योंकि उनको मनोभूमि अभी दोषपूर्ण है, जिस दिन उनके दोष सर्वथा समाप्त हो जायेंगे उसी दिन, उसी क्षण वे ब्रह्म निर्वाण को प्राप्त कर लेंगे।

🔴 दोषों का सर्वथा अभाव, यह अन्तिम सीढ़ी का सिद्ध अवस्था का लक्षण है। वहां तक पहुंच जाने पर तो कुछ करना ही बाकी नहीं रह जाता। साधकों को यह आशा न करनी चाहिये कि थोड़े ही समय में इच्छित भावनाएं पूर्ण रूप से क्रिया में आ जायेंगी। विचार क्षण भर में बन जाता है पर उसे संस्कार का रूप धारण करने में बहुत समय लगता है हथेली पर सरसों नहीं जमती। पत्थर पर निशान करने के लिए रस्सी की रगड़ बहुत समय तक जारी रहनी चाहिए। स्मरण रखिए से सर्वथा मुक्ति—लक्ष है, ध्येय है, सिद्ध अवस्था है। साधक का आरंभिक लक्षण यह नहीं है। आम का पौधा उगते ही यदि मीठे आम तोड़ने के लिए उसके पत्तों को टटोलेंगे तो मनोकामना पूर्ण न होगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 30)

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 रात्रि को सोने से पूर्व दिन भर के कार्यों पर विचार करना चाहिए।
(1) आज परिवार से सम्बन्ध रखने वाले क्या क्या कार्य किये?
(2) उसमें क्या भूल हुई?
(3) स्वार्थ से प्रेरित होकर क्या अनुचित कार्य किया?
(4) भूल के कारण क्या अनुचित कार्य हुआ
(5) क्या क्या कार्य अच्छे, उचित और गृहस्थ योग की मान्यता के अनुरूप हुए?

🔴 इन पांच प्रश्नों के अनुसार दिन भर के पारिवारिक कार्यों का विभाजन करना चाहिए और आगे से त्रुटियों के सुधार का उपाय सोचना चाहिए।

(1) भूल की तलाश करना
(2) उसे स्वीकार करना,
(3) गलती के लिए लज्जित होना और
(4) उसे सुधारने का सच्चे मन से प्रयत्न करना

🔵 यह चार बातें जिसे पसन्द हैं, जो इस मार्ग पर चलता है, उसकी गलतियां दिन दिन कम होती जाती हैं और वह शीघ्र ही दोषों से छुटकारा पा लेता है।

🔴 गृहस्थ योग की साधना के मार्ग पर चलते हुए साधक के मार्ग में नित नई कठिनाइयां आती रहती हैं। कभी अपनी भूल से, कभी दूसरों की भूल से, ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं जिनका नियत सिद्धान्त से मेल नहीं खाता। इच्छा रहती है कि अपना हर एक आचरण ठीक रहे, हर प्रक्रिया सिद्धान्तानुकूल हो, परन्तु अक्सर भूलें होती रहती हैं, साधक कुछ दिन तक सोचता है कि दस बीस दिन में या महीने में यह दूर हो जायेगी और मेरी सम्पूर्ण क्रियायें सिद्धान्ताकूल होने लगेंगी, पर जब काफी समय बीत जाता है और तब भी भूलें समाप्त नहीं होती तो चिन्ता, निराशा और पराजय की भावनाएं मन में घूमने लगती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 29) 10 Dec

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र
🔵 उपरोक्त मंत्र हर गृहस्थ योगी को भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिये। दिन में कई बार इस मन्त्र को दुहराना चाहिए। एक छोटे कार्ड पर सुन्दर अक्षरों में लिखकर इस मन्त्र को अपने पास रख लेना चाहिये और जब भी अवकाश मिले एक एक शब्द का मनन करते हुए इस मन्त्र को पढ़ना चाहिये। हो सके तो अक्षरों में लिख कर सुन्दर चित्र की भांति इसे अपने कमरे में लगा लेना चाहिए।

🔴  प्रातः निद्रा त्यागने पर पलंग पर पड़े-पड़े ही कई बार इस मन्त्र को मन ही मन दुहराना चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि आज दिन भर इन भावनाओं को अधिक से अधिक मात्रा में सतर्कता पूर्वक ध्यान रखूंगा। इस निश्चय के साथ शय्या त्याग करने का अवसर दिन भर रहता है प्रातःकाल जो आदेश अन्तर्मन को दिये हैं अधिक गहरे उतर जाते हैं, वे जल्दी विस्मरण नहीं होते और यथा अवसर वे ठीक समय पर स्मरण हो आते हैं। इसलिए प्रातःकाल इस मन्त्र का नियमित रूप से अवश्य ही दुहराना चाहिए—

🔵 ‘‘मैं गृहस्थ योगी हूं। मेरा जीवन साधनामय है। दूसरे कैसे हैं क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं, इसकी मैं तनिक भी परवाह नहीं करता। अपने आप में सन्तुष्ट रहता हूं, मेरी कर्तव्य पालन की सच्ची साधना इतनी महान है, इतनी शांतिदायिनी, इतनी तृप्तिकारक है कि उसमें मेरी आत्मा आनन्द में सराबोर हो जाती है। मैं अपनी आनन्दमयी साधना को निरन्तर जारी रखूंगा गृह क्षेत्र में परमार्थ भावनाओं के साथ ही काम करूंगा।’’ यह संकल्प दृढ़तापूर्वक मन में जमा रहना चाहिए। जब भी मन विचलित होने लगे, जब भी पैर पीछे डिगने की संभावना प्रतीत हो तभी इस संकल्प को मनोयोग पूर्वक दृढ़ करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

👉 गृहस्थ-योग (भाग 28)

🌹 गृहस्थ योग के कुछ मन्त्र

🔵 गृहस्थ योग के साधक के मन में यह विचारधारा चलती रहनी चाहिये कि— ‘‘यह परिवार मेरा स्थान क्षेत्र है। इस वाटिका को सब प्रकार सुन्दर, सुरभित और पल्लवित बनाने के लिये सच्चे हृदय से सदा शक्ति भर प्रयत्न करते रहना मेरा कर्मकाण्ड है। भगवान ने जिस वाटिका को सींचने का भार मुझे दिया है, उसे ठीक तरह सींचते रहना मेरी ईश्वर परायणता है। घर का कोई भी सदस्य ऐसा हीन दर्जे का नहीं है जिसे मैं तुच्छ समझूं, उपेक्षा करूं या सेवा से जी चुराऊं, मैं मालिक, नेता, मुखिया या कमाऊं होने का अहंकार नहीं करता यह मेरा आत्म निग्रह है।

🔴 हर एक सदस्य के विकास में अपनी सेवाएं लगाते रहना मेरा परमार्थ है। बदले की जरा सी भी इच्छा न रखकर विशुद्ध कर्तव्य भाव से सेवा में तत्पर रहना मेरा आत्म त्याग है। अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह न करते हुए, औरों को सुख सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न करना मेरा तप है। घर के हर सदस्य को सद्गुणी, सत् स्वभाव का, सदाचारी एवं धर्म परायण बना कर विश्व की सुख शान्ति में वृद्धि करना मेरा यज्ञ है। सबके हृदयों पर जिसका मौन उपदेश हो, अनुकरण से सुसंस्कार बनें, अपना आचरण ऐसा पवित्र एवं आदर्शमय रखना मेरा व्रत है।

🔵  धर्म उपार्जित अन्न से जीवन निर्वाह करना और कराना यह मेरा संयम है। प्रेम उदारता सहानुभूति की भावना से ओत-प्रोत रहना और रखना, प्रसन्नता, आनन्द और एकता की वृद्धि करना मेरी आराधना है। मैं अपने गृह-मन्दिर में भगवान की चलती फिरती प्रतिमाओं के प्रति अगाध भक्ति भावना रखता हूं। सद्गुण, सत् स्वभाव और सत् आचरण के दिव्य श्रृंगार से इन प्रतिमाओं को सुसज्जित करने का प्रयत्न ही मेरी पूजा है। मेरा साधन सच्चा है, साधना के प्रति मेरी भावना सच्ची है, अपनी आत्मा के सम्मुख मैं सच्चा हूं। सफलता असफलता की जरा भी परवाह न करके सच्चे निष्काम कर्मयोगी की भांति मैं अपने प्रयत्न की सचाई में संतोष अनुभव करता हूं। मैं सत्य हूं, मेरी साधना सत्य है। मैंने सत्य का आश्रय ग्रहण किया है उसे सत्यता पूर्वक निबाहने का प्रयत्न करूंगा।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 2)

सम्पत्ति के लिए रोने और चिन्तित होने वाला व्यक्ति यदि यह सोच ले कि अधिक सम्पत्ति उपार्जन के लिए मनुष्य को उचित एवं अनुचित साधनों का प्रयोग क...