गुरुवार, 25 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 2)

अस्तु इस जीवन का कुछ पता नहीं कि यह किस समय अपनी गति को मति में बदल दे। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि इसकी क्षणभंगुरता को स्वीकार कर तुरन्त इसी क्षण से अपने पारलौकिक जीवन की तैयारी में संलग्न जो जाया जाये। जो बिना संबल, संचय किये अनन्त प्रवास में चला जायेगा, उसे अनन्त कष्ट होंगे, यह निश्चय है। वहाँ यहाँ जैसी स्वाधीनता और सुविधा नहीं है, जो यहाँ से न भी ने जायें, वहाँ बना लेंगे, संचय कर लेंगे। वहाँ तो यहाँ साथ लिये पाथेय के बल पर ही अवधि यापन करनी होगी। वहाँ न सत्कर्म का अवसर मिलेगा और न अपकर्म का। वहाँ तो केवल यहीं के कर्मों के अनुसार आपको आपका संचय दे दिया जायेगा, जिसके ड़ड़ड़ड़ पर फिर चाहे आपको आनन्द भोगना पड़े और चाहें यातनाएँ।

यहाँ का संचय किया हुआ वह सम्बल क्या है, जो वहाँ काम आना है? वह सम्बल है पुण्य-परमार्थ निर्मोह और निर्लिप्तता पुण्य परमार्थ का अर्जन सत्कर्म और उसके साथ लगी हुई, सद्भावना से होता है। यदि सत्कर्म के साथ सद्भावना का संयोग नहीं है तो उस सत्कर्म का पुण्य परास्त हो जायेगा। एक मनुष्य किसी दुःखी की सहायता करता है पर भावना यह रखता कि ऐसा करने से यह मनुष्य मुझे अमीर और उदार समझेगा, मेरा आभारी होगा और यथासम्भव मेरी पूजा-प्रतिष्ठा करेगा। समाज में जो देखे, सुनेगा, वह मुझे सम्मान देगा, मेरा आदर करेगा, जिससे समाज में मेरा स्थान बनेगा। बस उसका सत्कर्म दूषित हो गया, उसका पुण्य ऋणी हो गया, ऐसा सत्कर्म पारलौकिक जीवन में सम्बल बन कर काम न आ सकेगा।

यह पुण्य बन कर सम्बल तब बनेगा, जब सहायता करने के पीछे कोई भाव ही न रहे और यदि रहे तो यह भाव रहे कि अमुक व्यक्ति हमारी तरह ही मनुष्य है। हमारा भाई है। उसकी आवश्यकता, उसकी तकलीफ और उसका कष्ट हमारा कष्ट है। हमारी सहायता पाना उसका नैसर्गिक अधिकार है और सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। मेरे पास जो कुछ है, वह सब प्राणी मात्र की धरोहर है, जो सबको उचित प्रकार से मिलनी ही है। मेरा इस पर कोई आभार नहीं, बल्कि इसका ही आभार मुझ पर है, जो यह मेरी सेवा, मेरी सहायता स्वीकार करने की कृपा कर रहा है। इस प्रकार के अहंकार रहित सत्कर्म ही पारलौकिक जीवन के सम्बल बना करते है।

किन्तु यह निरहंकार भावना प्राप्त कैसे हो? इसके लिये भी उपाय करना होगा। और वह उपाय है उपासना ईश्वर पुनीति। सम्पूर्ण आत्म-समर्पण के साथ परमात्मा की उपासना करते करते जब व्यक्ति के हृदय में उसका प्रकाश आ विराजेंगे, तब उसे सारा जड़-चेतन संसार परमात्मा रूप ही दीखने और अनुभव होने लगेगा। उसका ‘स्व’ सार्वभौम हो जायेगा। ऐसी स्थिति में उसे किसी से पृथकता का अनुभव ही न होगा। स्वयं सहायक, समानार्थी, सहायता और परिणाम सबका सब ईश्वर रूप ही दिखाई देगा। ऐसी दशा में उसे न तो यह पता चलेगा कि वह किसी की सहायता कर रहा है या कोई उससे सहायता पा रहा है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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