सोमवार, 6 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (भाग 3)

जीवन की पूर्णता और सफलता के लिए मनुष्य को सबसे पहले निराशा, असंतोष, चिन्ता अथवा उद्वेग आदि के दोषों का परिमार्जन करके उनके स्थान पर आशा, निश्चिन्तता, संतोष तथा गम्भीरता के गुण विकसित करने होंगे। यह गुण सृजनात्मक प्रकृति के होते है। इनके द्वारा मनुष्य की शक्तियों का क्षय नहीं अभिवर्धन होता है। उनकी कार्य क्षमता बढ़ती, दक्षता तथा उत्साह की प्राप्ति होती है।

आशा का विकास सद्विचारों द्वारा आसानी से क्रिया जा सकता है। मनुष्य को सोचना चाहिये कि उसकी जीवन इसलिये नहीं मिला कि उसे निराशा के अन्धकार में इस प्रकार बिता दिया जाये। वह संसार में आनन्द खोजने पर और पाने के लिए भेजा गया है। उसका लक्ष्य प्रकाश है अन्धकार नहीं। वह एक आत्मवान् प्राणी है। उसकी आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश की किरणें भरी हैं। उसे संसार की जरा-जरा-सी प्रतिकूलताओं से निराश होकर इस प्रकार बैठे न रहना चाहिये। उसे जीवन की सफलता और प्रगति के उद्देश्य से परिस्थितियों से संघर्ष करना चाहिये। लोहा लेना चाहिये। निराश हो जाने का अर्थ है जीवन-समर में हथियार डाल देना। हार मानकर पीछे हट जाना।

इस प्रकार हथियार डाल कर पीछे हट जाने से भी प्रयोजन पूरा नहीं होता। निराश होने से आज तक किसी का दुःख दूर नहीं हुआ है। दुःख-कष्टों से उन्हीं को छुटकारा मिलता है, जो वीर पुरुष की तरह हजार बार हारने पर भी साहस नहीं हारते। हर बार एक नई तैयारी के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य में लग जाते हैं और अन्ततः परिस्थितियों, प्रतिकूलताओं तथा विषमताओं पर विजय प्राप्त ही कर लेते है। असफलताओं से निराश होकर बैठे रहने के बजाय, आँख खोलकर संसार में देखना चाहिये। देखने में आएगा कि अपने जैसे न जाने कितने मनुष्य नित्य ही असफलताओं और विषमताओं में फँसते है। किन्तु वे हार मानकर बैठे नहीं रहते और न निराश होकर संघर्ष से मुख मोड़ लेते हैं। वे नये उत्साह, नये साहस और नये उपाय के साथ फिर मैदान में जाते हैं, और अन्त में विजय प्राप्त ही कर लेते है। 

संसार में सफलताओं के जो भी उन्नत स्तम्भ खड़े दीखते हैं, वे सब योंही एक साथ उठते नहीं चले गये हैं। पूरा होने तक उन पर हजारों बार पड़े हैं, अनेक बार गिरे हैं, टूटे और मिटे हैं, किन्तु उनको उठाने वाले इन सब विपरीतताओं से निराश अथवा हतोत्साह नहीं हुए। वे सारे आघात सहते हुए अपने निर्माण कार्य में लगे रहे और अंत में इन उन्नत स्तम्भों को स्थित करने में सफल हो ही गये। संसार में ऐसे उदाहरण होते हुये आपको निराश हो जाने का कोई कारण नहीं दीखता। उन्हीं की तरह आपमें भी शक्ति तथा क्षमता है। निराशा छोड़िये और आशावाद के साथ पुनः मैदान में आइये आपके सारे दुःख दूर होंगे, आप एक सफल व्यक्ति बन जायेंगे।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 दृष्टिकोण का सम्यक् परिष्कार (अंतिम भाग )

सम्यक् दृष्टि प्राप्त होने पर संसार अपना नहीं भगवान का प्रतीत होता है। उस पर स्वामित्व जमाने की भ्रान्ति नहीं उभरती है। आत्मीयता तो किसी पर भी आरोपित की जा सकती है पर ममता के आँचल में सबको नहीं समेटा जा सकता। वस्तुओं को व्यक्तियों को मेरा कहने पर उनके संदर्भ में अनेकानेक जिम्मेदारियों सिर पर लदती है और बदलाव आते ही रौब जमाने का सिलसिला चल पड़ता है। अधिकार जमाने के कारण ही बैल भैंसे, भेड़ें और कुत्ते आपस में लड़ते है। वस्तुएं जहाँ की तहाँ रहती है पर अधिकार जमाने वाले खून–खराबा करते और कराते देखे जाते है।

सम्यक् दृष्टि न होने के कारण ही मनुष्य अपने को शरीर मान बैठता है और उसकी ललक लिप्साओं के लिए सारा प्रयत्न खपा देता है। इतना ही नहीं नीति मर्यादाओं के उल्लंघन में भी नहीं हिचकता। यदि उसे भगवान का मंदिर माना जा सके और संयम एवं पुण्य द्वारा उसकी अभ्यर्थना की जा सके तो यह शरीर न केवल स्वस्थ समर्थ रहता है, पर पुण्य यश और वैभव कमाते हुए लोक परलोक को सब प्रकार सुसम्पन्न बनाता है। छोटी दृष्टि शरीर या घर-परिवार का ही सब कुछ मानती है और उसी छोटे परिवार के लिए मरती खपती रहती है पर विशाल दृष्टिकोण के लिए सब अपने होते है। मनुष्य ही नहीं अन्यान्य प्राणी भी प्रकृति के सभी पक्ष और घटक भी इस अपनेपन के दायरे में आ जाते है। तब दूसरों का दुख बंटाने और अपना सुख बाँटने की आकाँक्षा सहज उठती है। आत्मीयता के चरितार्थ होने का यही एक मात्र आधार भर है।

सम्यक्-दृष्टि परिणाम को देखने, परखने के उपरान्त कार्य आरम्भ करती है। वर्तमान को सुखद सम्भावनाओं के लिए आरंभ करती है। वर्तमान को सुखद संभावनाओं के लिए न्यौछावर भी कर सकती है। वृक्ष बनने के लिए बीज को अपना वर्तमान स्वरूप गलाना पड़ता है। विज्ञजन भी आज की सुविधाओँ की इसलिए उपेक्षा करते है कि उज्ज्वल भविष्य का दिग्दर्शन हो सके। अदूरदर्शी .... वर्तमान की सुविधा देखते हैं और उसके लिए आतुर होकर भविष्य को अन्धकारमय बनाते है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 July 2026



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👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (अंतिम भाग)

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