जीवन की पूर्णता और सफलता के लिए मनुष्य को सबसे पहले निराशा, असंतोष, चिन्ता अथवा उद्वेग आदि के दोषों का परिमार्जन करके उनके स्थान पर आशा, निश्चिन्तता, संतोष तथा गम्भीरता के गुण विकसित करने होंगे। यह गुण सृजनात्मक प्रकृति के होते है। इनके द्वारा मनुष्य की शक्तियों का क्षय नहीं अभिवर्धन होता है। उनकी कार्य क्षमता बढ़ती, दक्षता तथा उत्साह की प्राप्ति होती है।
आशा का विकास सद्विचारों द्वारा आसानी से क्रिया जा सकता है। मनुष्य को सोचना चाहिये कि उसकी जीवन इसलिये नहीं मिला कि उसे निराशा के अन्धकार में इस प्रकार बिता दिया जाये। वह संसार में आनन्द खोजने पर और पाने के लिए भेजा गया है। उसका लक्ष्य प्रकाश है अन्धकार नहीं। वह एक आत्मवान् प्राणी है। उसकी आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश की किरणें भरी हैं। उसे संसार की जरा-जरा-सी प्रतिकूलताओं से निराश होकर इस प्रकार बैठे न रहना चाहिये। उसे जीवन की सफलता और प्रगति के उद्देश्य से परिस्थितियों से संघर्ष करना चाहिये। लोहा लेना चाहिये। निराश हो जाने का अर्थ है जीवन-समर में हथियार डाल देना। हार मानकर पीछे हट जाना।
इस प्रकार हथियार डाल कर पीछे हट जाने से भी प्रयोजन पूरा नहीं होता। निराश होने से आज तक किसी का दुःख दूर नहीं हुआ है। दुःख-कष्टों से उन्हीं को छुटकारा मिलता है, जो वीर पुरुष की तरह हजार बार हारने पर भी साहस नहीं हारते। हर बार एक नई तैयारी के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य में लग जाते हैं और अन्ततः परिस्थितियों, प्रतिकूलताओं तथा विषमताओं पर विजय प्राप्त ही कर लेते है। असफलताओं से निराश होकर बैठे रहने के बजाय, आँख खोलकर संसार में देखना चाहिये। देखने में आएगा कि अपने जैसे न जाने कितने मनुष्य नित्य ही असफलताओं और विषमताओं में फँसते है। किन्तु वे हार मानकर बैठे नहीं रहते और न निराश होकर संघर्ष से मुख मोड़ लेते हैं। वे नये उत्साह, नये साहस और नये उपाय के साथ फिर मैदान में जाते हैं, और अन्त में विजय प्राप्त ही कर लेते है।
संसार में सफलताओं के जो भी उन्नत स्तम्भ खड़े दीखते हैं, वे सब योंही एक साथ उठते नहीं चले गये हैं। पूरा होने तक उन पर हजारों बार पड़े हैं, अनेक बार गिरे हैं, टूटे और मिटे हैं, किन्तु उनको उठाने वाले इन सब विपरीतताओं से निराश अथवा हतोत्साह नहीं हुए। वे सारे आघात सहते हुए अपने निर्माण कार्य में लगे रहे और अंत में इन उन्नत स्तम्भों को स्थित करने में सफल हो ही गये। संसार में ऐसे उदाहरण होते हुये आपको निराश हो जाने का कोई कारण नहीं दीखता। उन्हीं की तरह आपमें भी शक्ति तथा क्षमता है। निराशा छोड़िये और आशावाद के साथ पुनः मैदान में आइये आपके सारे दुःख दूर होंगे, आप एक सफल व्यक्ति बन जायेंगे।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969
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