शूरवीर पंडित वही, सदा प्रशंसागार।
चारित्र धन जाको नहीं, हरत अक्ष-वटमार॥
दूसरी गाथा में कहा गया है कि इन्द्रिय चपल तुरंग के समान है। दुर्गति के गर्त में वे खींच ले जाती है। यह जानकर सत्पुरुषों के वचन रूपी लगाम से इन्द्रिय रूपी घोड़ों को वश में करना चाहिये। इन्द्रियों को थोड़ी सी ढीली छोड़ने पर बहुत दुःख उठाना पड़ता है। तुच्छ विषय भोगों में सुख नाम मात्र का है, दुःख का पार नहीं। देवलोक के देव, इन्द्रिय दमन नहीं कर सकने के कारण ही मोक्ष नहीं पा सकते। विषय भोगों में ही वे लगे रहते हैं अतः व्रत नियम ग्रहण नहीं कर पाते! मनुष्य व्रती बनने के कारण मोक्ष पा सकता है।
सभी व्रतों-नियमों का भी उद्देश्य है- इन्द्रियों का निग्रह। जब तक इन्द्रियाँ वश में नहीं, तब तक न तो अहिंसा धर्म का पालन हो सकता है, न अपरिग्रह आदि का। अधिकाँश पाप इन इन्द्रियों के विषयों की आसक्ति के कारण ही किये जाते हैं। साधना में चित्त की एकाग्रता और अन्तर्मुखता की बड़ी आवश्यकता है और विषयासक्ति वाले व्यक्ति की चंचलता मिट नहीं सकती क्योंकि कभी अच्छा खाने की इच्छा होती है, कभी देखने, सुनने आदि की। इच्छाओं का अंत नहीं, एक की पूर्ति हुई नहीं, दूसरी अनेक इच्छाएं तैयार। अतः उपासक को इन्द्रिय निग्रह अवश्य करना चाहिये।
इन्द्रिय-निग्रह का अर्थ है बाह्य पदार्थों के आकर्षण को कम करना अंतर्मुखी बनना विषयों की ओर दौड़ने वाली इन्द्रियों को रोकना, इन्द्रियों का निग्रह करके हमें उन्हें अपने बस में लाना है। वे स्वेच्छाचारी न रहकर हमारे आधीन हो जायं और हम उनसे जो काम लेना चाहें, जहाँ लगाना चाहें वहीं वे लग जायं ऐसा अभ्यास कर लेने से इन्द्रियाँ हमारी उपासना में बाधक न बनकर साधक बन सकती हैं। जैन-आगमों में कहा गया है कि- “जे आसवा ते परिसवा” अर्थात् जो कर्म बंधन के कारण हैं वे मुक्ति के कारण भी बन सकते हैं। अपनी इन्द्रियों के सदुपयोग करने की कला यदि हम सीख लें तो इस शरीर और इन्द्रिय के द्वारा हम आत्मोत्थान कर सकते हैं। कानों का विषय है सुनना अतः यदि हम विषय विकार-वर्धक और मन को चंचल करने वाली क्रोधादि काषाय-रागद्वेष उत्पन्न करने वाली बातों को न सुनकर सत्पुरुषों की वाणी को सुनें तो हमारा उद्धार सहज ही हो सकता है। इसी तरह अन्य इन्द्रियों का भी हम सदुपयोग करके अपनी उपासना को आगे बढ़ा सकते हैं।
एक एक इन्द्रिय के संयम से मनुष्य में कितनी अद्भुत-शक्तियों का विकास होता है इसका कुछ विवरण पातंजलि के ‘योग सूत्र’ में पाया जाता है। वास्तव में इन्द्रियाँ अपने आप में भली बुरी कुछ भी नहीं हैं। उनको प्रेरणा देने वाला मन और आत्मा है। अतः हमें अपने मन को वश में करना आवश्यक है और वह वश में होगा आत्मा द्वारा। क्योंकि सर्वोपरि सत्ता आत्मा ही है। उसने अपना मान भुला दिया है अपनी अनंत शक्तियों को वह भूल बैठा है इसीलिये मन उस पर हावी हो गया है। पर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा विवेक और ज्ञान की लगाम में मन रूपी घोड़े को वश में किया जा सकता है। यदि हम अपनी इन्द्रियों और मन की एकाग्रता के साथ उपासना करेंगे तो सच्ची उपासना होगी और वैसी उपासना से ही हमारा कल्याण हो सकेगा। परमात्मा और आत्मा की दूरी को कम कर उसके साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।
.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी
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