बुधवार, 6 मई 2026

👉 उपासना में इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता (अंतिम भाग)

शूरवीर पंडित वही, सदा प्रशंसागार।
चारित्र धन जाको नहीं, हरत अक्ष-वटमार॥

दूसरी गाथा में कहा गया है कि इन्द्रिय चपल तुरंग के समान है। दुर्गति के गर्त में वे खींच ले जाती है। यह जानकर सत्पुरुषों के वचन रूपी लगाम से इन्द्रिय रूपी घोड़ों को वश में करना चाहिये। इन्द्रियों को थोड़ी सी ढीली छोड़ने पर बहुत दुःख उठाना पड़ता है। तुच्छ विषय भोगों में सुख नाम मात्र का है, दुःख का पार नहीं। देवलोक के देव, इन्द्रिय दमन नहीं कर सकने के कारण ही मोक्ष नहीं पा सकते। विषय भोगों में ही वे लगे रहते हैं अतः व्रत नियम ग्रहण नहीं कर पाते! मनुष्य व्रती बनने के कारण मोक्ष पा सकता है।
सभी व्रतों-नियमों का भी उद्देश्य है- इन्द्रियों का निग्रह। जब तक इन्द्रियाँ वश में नहीं, तब तक न तो अहिंसा धर्म का पालन हो सकता है, न अपरिग्रह आदि का। अधिकाँश पाप इन इन्द्रियों के विषयों की आसक्ति के कारण ही किये जाते हैं। साधना में चित्त की एकाग्रता और अन्तर्मुखता की बड़ी आवश्यकता है और विषयासक्ति वाले व्यक्ति की चंचलता मिट नहीं सकती क्योंकि कभी अच्छा खाने की इच्छा होती है, कभी देखने, सुनने आदि की। इच्छाओं का अंत नहीं, एक की पूर्ति हुई नहीं, दूसरी अनेक इच्छाएं तैयार। अतः उपासक को इन्द्रिय निग्रह अवश्य करना चाहिये।

इन्द्रिय-निग्रह का अर्थ है बाह्य पदार्थों के आकर्षण को कम करना अंतर्मुखी बनना विषयों की ओर दौड़ने वाली इन्द्रियों को रोकना, इन्द्रियों का निग्रह करके हमें उन्हें अपने बस में लाना है। वे स्वेच्छाचारी न रहकर हमारे आधीन हो जायं और हम उनसे जो काम लेना चाहें, जहाँ लगाना चाहें वहीं वे लग जायं ऐसा अभ्यास कर लेने से इन्द्रियाँ हमारी उपासना में बाधक न बनकर साधक बन सकती हैं। जैन-आगमों में कहा गया है कि- “जे आसवा ते परिसवा” अर्थात् जो कर्म बंधन के कारण हैं वे मुक्ति के कारण भी बन सकते हैं। अपनी इन्द्रियों के सदुपयोग करने की कला यदि हम सीख लें तो इस शरीर और इन्द्रिय के द्वारा हम आत्मोत्थान कर सकते हैं। कानों का विषय है सुनना अतः यदि हम विषय विकार-वर्धक और मन को चंचल करने वाली क्रोधादि काषाय-रागद्वेष उत्पन्न करने वाली बातों को न सुनकर सत्पुरुषों की वाणी को सुनें तो हमारा उद्धार सहज ही हो सकता है। इसी तरह अन्य इन्द्रियों का भी हम सदुपयोग करके अपनी उपासना को आगे बढ़ा सकते हैं।

एक एक इन्द्रिय के संयम से मनुष्य में कितनी अद्भुत-शक्तियों का विकास होता है इसका कुछ विवरण पातंजलि के ‘योग सूत्र’ में पाया जाता है। वास्तव में इन्द्रियाँ अपने आप में भली बुरी कुछ भी नहीं हैं। उनको प्रेरणा देने वाला मन और आत्मा है। अतः हमें अपने मन को वश में करना आवश्यक है और वह वश में होगा आत्मा द्वारा। क्योंकि सर्वोपरि सत्ता आत्मा ही है। उसने अपना मान भुला दिया है अपनी अनंत शक्तियों को वह भूल बैठा है इसीलिये मन उस पर हावी हो गया है। पर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा विवेक और ज्ञान की लगाम में मन रूपी घोड़े को वश में किया जा सकता है। यदि हम अपनी इन्द्रियों और मन की एकाग्रता के साथ उपासना करेंगे तो सच्ची उपासना होगी और वैसी उपासना से ही हमारा कल्याण हो सकेगा। परमात्मा और आत्मा की दूरी को कम कर उसके साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 2)

जीवन को शान्तिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँके। वरन् उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में है तो हमारी अनेकों दुश्चिंताएं आसानी से नष्ट हो सकती हैं।

एक विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। फेल होने के समाचार से उसका मानसिक सन्तुलन डगमगा जाता है। वह इस असफलता को वज्रपात जैसी मानता है। सोचता है सारी दुनिया मुझे धिक्कारेगी, मूर्ख या आलसी समझेगी, मित्रों के सामने मेरी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जायगी, अभिभावक कटु शब्द कह कर मेरा तिरस्कार करेंगे, यह कल्पना उसे असह्य लगती है, चित्त में भारी क्षोभ उत्पन्न होता है और रेल के आगे कटकर, नदी में कूद कर या और किसी प्रकार वह अपनी आत्महत्या कर लेता है। घर भर में कुहराम मच जाता है। वृद्ध माता-पिता रो-रो कर अन्धे हो जाते हैं। एक उल्लास पूर्ण हंसते खेलते घर का वातावरण शोक, क्षोभ और निराशा में परिणत हो जाता है। इस विपन्न स्थिति को उत्पन्न करने में सारा दोष उस गलत दृष्टिकोण का है जिसके अनुसार एक छोटी सी असफलता का मूल्य इतना बढ़ा-चढ़ा कर आँका गया।

एक दूसरा विद्यार्थी भी उसी कक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। उसे भी दुख होता है पर वह वस्तुस्थिति का सही मूल्याँकन कर लेता है और सोचता है इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा फल 43 प्रतिशत ही तो रहा। मेरे समान अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या 57 प्रतिशत है। वर्तमान परिस्थितियों में अनुत्तीर्ण होना एक साधारण सी बात है इसमें सदा विद्यार्थी ही दोषी नहीं होता वरन् प्रायः शिक्षकों की उदासीनता बिना पढ़े हुए विषयों के पर्चे आ जाना और नम्बर देने वालों की लापरवाही भी उसका कारण होती हैं। इस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गये तो अगले वर्ष अधिक परिश्रम करने से अच्छे डिवीजन में उत्तीर्ण होने की आशा रहेगी आदि बातों से अपने मन को समझा लेता है और अनुत्तीर्ण होने की खिन्नता को जल्दी ही अपने मन में से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है।

दोनों ही छात्र एक ही समय एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे। एक ने आत्महत्या कर ली दूसरे ने उस बात को मामूली मान कर अपना साधारण क्रम जारी रखा। अन्तर केवल समझ का था परिस्थिति का नहीं। यदि परिस्थिति का होता तो दोनों को समान दुख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी। पर ऐसा होता नहीं, इससे स्पष्ट है कि परिस्थितियों के मूल्याँकन में गड़बड़ी होने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।

हमें चाहिए कि अपनी कठिनाइयों को बड़ा चढ़ा कर न देखें, वरन् उनको दूसरे अधिक आपत्ति ग्रस्त लोगों के साथ तुलना करके अपने आपको अपेक्षाकृत कम दुखी अनुभव करें। आपको आर्थिक कठिनाई रहती है, सभ्य सोसाइटी के लोगों जैसा जीवन यापन करने में वर्तमान आर्थिक स्थिति कुछ दुर्बल मालूम पड़ती है। थोड़ा आर्थिक अभाव अनुभव होता है और चिन्ता रहती है। इस स्थिति से छुटकारा प्राप्त करने के कई उपाय हो सकते हैं एक यह कि कुछ अधिक उपार्जन करने का प्रयत्न किया जाय। वर्तमान समय में जितना श्रम, समय और मनोयोग व्यवसाय में लगाया जाता है उससे अधिक लगाया जाए, कोई और सहायक धंधा ढूंढ़ा जाए या वर्तमान व्यवसाय में ही जो आय बढ़ने के उपाय संभव हों और दौड़-धूप करके जुटाया जाए। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि अपने खर्चे कम किये जाएं। दुनिया में सभी तरह के गरीब-अमीर लोग रहते हैं, अपनी-अपनी आमदनी के अनुसार जीवन यापन करने की योजना बनाते हैं। यदि अपनी आमदनी कम है तो क्यों न कम खर्च का बजट बनाकर काम चलाया जाए? खर्चा घटा लेने से कुछ सुविधाएं कम हो सकती हैं पर उस कमी का दुख उतना न होगा जितना बढ़े हुए खर्च की पूर्ति न होने पर दिन रात चिन्तित रहने के कारण होता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 May 2026


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शूरवीर पंडित वही, सदा प्रशंसागार। चारित्र धन जाको नहीं, हरत अक्ष-वटमार॥ दूसरी गाथा में कहा गया है कि इन्द्रिय चपल तुरंग के समान है। दुर्गति ...