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शनिवार, 16 जनवरी 2021

👉 वे जिन्होंने मोह को जीता

गुरु गोविंद सिंह उन दिनों चमकौर के किले में रहकर, मुगलों से युद्ध कर रहे थे। मुखवाल से जाते समय उनकी माता और दो नन्हें बच्चे फतहसिंह और जोरावरसिंह बिछुड गये थे। लेकिन गुरु गोविंदसिह को काम में व्यस्त होने के कारण उनको खोजने का समय न मिल पाया था। वे अपने बड़े लडकों अजीतसिंह और जुझारसिंह के साथ चमकौर के किले में रहकर आगे की योजनाएं बनाने और कार्यान्वित करने में व्यस्त थे। तभी एक दिन कुछ दूत उनके पास संदेश लेकर आए। वे मुखवाल और आनंदगढ़ की तरफ से ही आए थे।

गुरु गोविंदसिंह ने दूतों का स्वागत किया और हँसकर पूछा-बताओ भाई हमें छोड़कर गए हुए सिक्खों और बिछुडी़ हुई माता एवं दोनों कुमारों का कोई समाचर है और अगर शत्रुओं का कोई समाचार हो तो बतलाऔ। दूतों ने कहा गुरुजी! जो सिक्ख मुखवाल से आपका साथ छोड़कर चले गए उनके गाँव पहुँचने पर उनके परिवार वालों तक ने उन्हें धिक्कार कर विश्वासघाती कहा। उनको अपनी गलती अनुभव हुई, और अब वे सब आपसे क्षमा माँगने के लिये इधर चल पडे है।" गुरु गोविंदसिंह ने हर्षपूर्वव कहा-यह तो बडा शुभ समाचार है, उनको अब भूला नही कहा जा सकता और आगे के समाचार बतलाओ।"

दूतों ने आगे कहा- "यह जानकर कि आप चमकौर में विराजमान हैं मुगलों की एक बडी़ भारी सेना चमकौर पर आक्रमण करने आ रही है।" गुरु गोविंद सिंह ने कहा- यह तो और भी अच्छा समाचार है। धर्म युद्ध तो तब तक चलता ही रहना चाहिए, जब तक अधर्म का नाश न हो जाए।'' आगे बतलाओ माता और कुमारों का क्या समाचार है क्या कुमारों या माता ने शत्रुओं की शरण ले ली अथवा प्राणो के मोह में धर्म मार्ग से विचलित हो गए,  दूत तत्काल बोल उठ महाराज ऐसा न कहे। कुमारों ने धर्म के नाम पर बलिदान दे दिया है। यह कहकर दूत रोने लगे, गुरु गोविंद सिंह ने उत्सुकतापूर्वक कहा- ''अरे भाई तुम ऐसा शुम समाचार सुनाते वक्त इस प्रकार रो रहे हो। यह तो ठीक नहीं। शुभ समाचार तो हँसते हुए उत्साहपूर्वक सुनाना चाहिए। जल्दी बताओ उन सिंह संतानों ने कहाँ और क्स प्रकार धर्म पर अपना बलिदान दे दिया ?  

दूतों ने बतलाया-गुरुजी मुखवाल से बिछुडकर माता और कुमार गंगू रसोइये के साथ उसके घर चले गए, कितु गंगू ने माता जी के साथ विश्वासघात करके कुमारों को गिरफ्तार कराकर सरहिंद के नवाब के हवाले कर दिया। सरहिंद के नवाब ने उनसे कहा-बालकों अगर तुम मुसलमान हो जाओ तो तुम्हारी जान बख्स दी जायेगी, शाहजादियों से तुम्हारी शादी करा दी जायेगी, और एक बहुत बडी़ जागीर इनाम में दे दी जायेगी, किन्तु वे दोनों कुमार न तो मौत से डरे और न लालच में आये। 

उन्होंने नबाव से साफ-साफ कह दिया कि धर्म की महत्ता एक प्राण क्या करोडो़ं प्राणों से भी अधिक है और न धर्म बिकने वाली चीज है, जो आप लोभ देकर खरीदना चाहते हैं। आप बेशक हमारे प्राण ले लीजिए। लेकिन हम अपना धर्म नही छोड़ सकते। इस पर नबाव ने सरदारों को बच्चों के मार डालने का हुक्म दिया, लेकिन वे तैयार न हुए। तब नबाव ने उन बच्चों को किले की दीवार में जिन्दा चुनवा दिया लेकिन वे दोनों कुमार अंत तक हँसते और धर्म की जय बोलते रहे। माता ने यह समाचार सुना तो छत से कूदकर प्राण दे दिए। गुरु गोविंदसिंह खुशी से उछल पड़े, फतह सिंह और जोरावर सिंह सच्चे धर्म वीर थे। हम सबको उनसे शिक्षा लेनी चाहिए, इसी प्रकार निर्भय बलिदान देकर ही धर्म की रक्षा की जाती है। वीरों तुमने धर्म की साख बढाई।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 97, 98

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

👉 बुरी स्मृतियाँ भुला ही दी जाएँ

दो भाई थे। परस्पर बडे़ ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे। बड़े भाई कोई वस्तु लाते तो भाई तथा उसके परिवार के लिए भी अवश्य ही लाते, छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता।

पर एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा सुनी हो गई। बात बढ़ गई और छोटे भाई ने बडे़ भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था ? दोनों के बीच दरार पड़ ही तो गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और कोई किसी से नहीं बोला। कई वर्ष बीत गये। मार्ग में आमने सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते, छोटे भाई की कन्या का विवाह आया। उसने सोचा बडे़ अंत में बडे़ ही हैं, जाकर मना लाना चाहिए।

वह बडे़ भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा। बोला अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए।

पर बड़ा भाई न पसीजा, चलने से साफ मना कर दिया। छोटे भाई को दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाकर लगा जाए इधर विवाह के भी बहित ही थोडे दिन रह गये थे। संबंधी आने लगे थे।

किसी ने कहा-उसका बडा भाई एक संत के पास नित्य जाता है और उनका कहना भी मानता है। छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बात बताते हुए अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और प्रार्थना की कि ''आप किसी भी प्रकार मेरे भाई को मेरे यही आने के लिए तैयार कर दे।''

दूसरे दिन जब बडा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने पूछा क्यों तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है ? तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो ?

बड़ा भाई बोला- "मैं विवाह में सम्मिलित नही हो रहा। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।'' संत जी ने कहा जब सत्संग समाप्त हो जाए तो जरा मुझसे मिलते जाना।'' सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा, उन्होंने पूछा- मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था उसमें क्या बतलाया था ?

बडा भाई मौन ? कहा कुछ याद नहीं पडता़ कौन सा विषय था ?

संत ने कहा- अच्छी तरह याद करके बताओ।
पर प्रयत्न करने पर उसे वह विषय याद न आया।

संत बोले 'देखो! मेरी बताई हुई अच्छी बात तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रहीं और छोटे भाई के कडवे बोल जो एक वर्ष पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे है। जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते, तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे और जब जीवन नहीं सुधारा तब सत्सग में आने का लाभ ही क्या रहा? अतः कल से यहाँ मत आया करो।''

अब बडे़ भाई की आँखें खुली। अब उसने आत्म-चिंतन किया और देखा कि मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ। छोटों की बुराई भूल ही जाना चाहिए। इसी में बडप्पन है।

उसने संत के चरणों में सिर नवाते हुए कहा मैं समझ गया गुरुदेव! अभी छोटे भाई के पास जाता हूँ, आज मैंने अपना गंतव्य पा लिया।''

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 91, 92

शुक्रवार, 5 मई 2017

👉 अंधविश्वास का पर्दाफाश

🔵 सिक्ख संप्रदाय के दसवें गुरु गोविंदसिंह एक महान् योद्धा होने के साथ बडे बुद्धिमान् व्यक्ति थे। धर्म के प्रति उनकी निष्ठा बडी गहरी थी। वह धर्म के लिए ही जिए और धर्म के लिए ही मरे। धर्म के प्रति अडिग आस्थावान् होते हुए भी वे अंधविश्वासी जरा भी न थे और न अंधविश्वासियों को पसंद करते थे।

🔴 गुरु गोविंदसिंह का संगठन और शक्ति बढा़ने की चिता में रहते थे। उनकी इस चिंता से एक पंडित ने लाभ उठाने की सोची। वह गुरु गोविंदसिंह के पास आया और बोला-यदि आप सिक्खो की शक्ति बढाना चाहते हैं, तो दुर्गा देवी का यज्ञ कराइए। यज्ञ की अग्नि से देवी प्रकट होगी और वह सिक्खों को शक्ति का वरदान दे देगी। गुरु गोविंदसिंह यज्ञ करने को तैयार हो गये। उस पंडित ने यज्ञ कराना शुरू किया।

🔵 कई दिन तक यज्ञ होते रहने पर भी जब देवी प्रकट नही हुइ तो उन्होंने पंडित से कहा-" महाराज! देवी अभी तक प्रकट नहीं हुई।'' धूर्त पंडित ने कहा-देवी अभी प्रसन्न नहीं हुई है। वह प्रसन्नता के लिये बलिदान चाहती है। यदि आप किसी पुरुष का वलिदान दे सकें तो वह प्रसन्न होकर दर्शन दे देगी और बलिदानी व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

🔴 देवी की प्रसन्नता के लिए नर बलि की बात सुनकर गुरु गोविंदसिंह उस पंडित की धूर्तता समझ गए। उन्होंने उस पडित को पकडकर कहा- 'बलि के लिए आपसे अच्छा आदमी कहाँ मिलेगा। आपका बलिदान पाकर देवी तो प्रसन्न हो ही जायेगी, आपको भी स्वर्ग मिल जायेगा। इस प्रकार हम दोनों का काम बन जाएगा। गुरु गोविंदसिंह का व्यवहार देखकर पंडित घबरा गया, गुरु गोविंदसिंह ने बलिदान दूसरे दिन के लिए स्थगित करके पंडित को एक रावटी में रख दिया।

🔵 पंडित घबराकर गुरु गोबिंदसिंह के पैरों पर गिर पड़ा और गिडगिडाने लगा-'मुझे नहीं मालूम था कि बलिदान की बात मेरे सिर पर ही आ पडेगी, गुरु जी, मुझे छोड़ दीजिए। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। गुरु गोविंदसिंह ने कहा क्यों घबराते हो ? बलिदान से तो स्वर्ग मिलेगा, क्यों पंडित जी, बलिदान की बातें तभी तक अच्छी लगती हैं न जब तक वह दूसरों के लिए होती हैं? अपने सिर आते ही असलियत खुल गई न।''

🔴 पंडित बोला- इस बार क्षमा कर दीजिए महाराज। अब कभी ऐसी बातें नहीं करूँगा।'' गुरु गोविंदसिंह ने उसे छोड़ दिया और समझाया-इस प्रकार का अंध-विश्वास समाज में फैलाना ठीक नही। देवी अपने नाम पर किसी के प्राण लेकर प्रसन्न नहीं होती। वह प्रसन्न होती है अपने नाम पर किए गए अच्छे कामो से। '' बाद में गुरु गोविंदसिंह ने उसे रास्ते का खर्च देकर भगा दिया। गोविदसिंह ने सिक्खों को समझाया। किसी देवी-देवता के नाम पर जीव हत्या करने से न तो पुण्य है और न शक्ति। धर्म के नाम पर किसी जीव का प्राण लेना घोर पाप है। शक्ति बढती आपस में प्रेम रखने से, धर्म का पालन करने से। शक्ति बढ़ती है-ईश्वर की उपासना करने से और उसके लिए त्याग-करने से। शक्ति बढ़ती है-अन्याय और अत्याचार का विरोध और निर्बल तथा असहायों की सहायता करने से। सभी लोग एक मति और एक गति होकर संगठित हो जाएँ और धर्म रक्षा में रणभूमि में अपने प्राणो की बलि दें। देवी इसी सार्थक बलिदान से प्रसन्न होगी और आज के इसी मार्ग से मुक्ति मिलेगी। अंध-विश्वास के आधार पर अपनी जान देने अथवा किसी दूसरे जीव की जान लेने से न तो देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और न सद्गति मिलती है।

🔵 गुरु गोविंदसिंह के इन सार वचनों को सभी सिक्खों ने हृदयगम किया। उस पर आचरण किया और अपने जीवन का कण-कण देश धर्म की रक्षा में लगाकर ऐतिहासिक यश प्राप्त किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 151, 152

गुरुवार, 4 मई 2017

👉 हिम्मत इंसान की मदद भगवान् की

🔵 सन् १९३९ तब रूस के मुखिया स्टालिन थे। फिनलैंड के कई बंदरगाह रूस के लिए सामरिक महत्त्व के थे, इसलिये उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर फिनलैंड को धमकी दी-यह बंदरगाह रूस को दे दिये जाएँ? यदि फिनलैंड ने बात न मानी तो रूस शक्ति प्रयोग करना भी जानता है।''

🔴 वह वैसा ही अपराध था जैसे चोरी, डकैती, अपहरण या लूटपाट। यदि संसार में शक्ति और सैन्यबल ही सब कुछ हो तो फिर न्याय-नीति आदि सद्भावनाओ को प्रश्रय कहॉ मिले? पर किया क्या जाए? ऐसे लोग भी इस दुनिया में हैं, जो केवल शक्ति और उद्दंडता की भाषा समझते हैं। इनसे रक्षा भी हिम्मत से ही करनी पडती है। स्वल्प क्षमता के लोग साहसपूर्वक संघर्ष कर बैठते हैं तो उनकी मदद भगवान् करता है। बाहर से दिखाई देने वाला राक्षसी बल तब जीतता है, जब अच्छाई की शक्तियॉ भले ही सीमित सही-संघर्ष करने से भय खा जाती है।

🔵 फिनलैण्ड़ की कुल २ लाख सेना रूस की ४० लाख की विशाल सेना और आधुनिक शस्त्र सज्जा के सामने जा डटी। रूसियों को अनुमान था- प्रात: होते देर है, फिनलैंड को जीतना देर नहीं, उनको यह आशा महंगी पडी।

🔴 एक स्थान पर फिनलैंड के एक सेनाधिकारी लेफ्टिनेंट हीन सारेला को नियुक्त किया गया। साथ में कुल ४९ सिपाही थे। हथियार भी उस समय के जब बंदूके बनना प्रारभ हुईं थीं। रात से ही रूसी टैंको की गडगडा़हट सुनाई देने लगी। रूसी सेना मार्च करती हुई बढी चली आ रही थी।

🔵 ४९ सैनिकों के आगे हजारों की सेना। सैनिकों ने हाथ ढीले कर दिए और कहा- भेड़िये-भेड का युद्ध नहीं होता। लडाना है तो हमें आप ही मार डालिये। युद्ध के मोर्चे पर आगे बढ़ना तो एक प्रकार से जानबूझकर हमारी हत्या कराना है। लेफ्टिनेंट सारेला का माथा ठनक गया। यह बात उसके अपने मन में आई होती तो वह गोली मार लेता-उसने कडककर कहा-सैनिको! यह मत भूलो संसार में वही जातियाँ जीवित रहती है, जो संघर्ष से नहीं घबडातीं। जो बाह्य आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकते वह अपने सामाजिक जीवन में दृढ़ नही हो सकते। प्रतिरोध से घबडाने वाले लोगों में अपने से ही उद्दंड और अभद्र लोग पैदा हो जाते हैं और सामाजिक शांति एवं व्यवस्था को चौपट कर डालते हैं। पाप, दुर्भाव, उद्दंडता और उच्छृंखलता मुर्दा जातियों के जीवन में पाई जाती है। साहसी शूर-वीरो के राज्य में चोर, उठाईगीर क्या-डकैत, आतताई लोग भी मजदूरी करते है। उनमें अंधविश्वास और रूढिवादिता नहीं, पौरुष और पराक्रम का विकास होता है, इसलिये वे थोड़े-से भी हों तो भी संसार में छाए रहते हैं। निश्चय करो, तुम्हें पराधीनता का जीवन जीना है या फिर शानदार जीवन की प्राप्ति के लिए संधर्ष की तैयारी करनी है।

🔴 सैनिको के हृदयों में सारेला का तेजस्वी भाषण सुनकर विद्युत् कौंध गई। हथियार उठा-उठाकर उन्होंने प्रतिज्ञा की लडे़ंगे और रक्त की आखिरी बूंद तक संघर्ष करेंगे।

🔵 मुट्ठी-मर जवान विकराल दानवी सेना से जूझ पडे। ४९ जवान दिन भर कुछ खाए-पिए बिना जमीन में रैंगते शत्रुओ को मारते हुए आगे बढते गए और जब उस दिन का युद्ध समाप्त हुआ तो संसार के अखबारो ने बडे़ बडे़ अक्षरों में छापा-मुट्ठी भर फिनलैण्ड़ के सिपाहियो ने रूसी सेना की अग्रिम पंक्ति के बीस हजार सैनिकों को कुचलकर रख दिया। ५० गाडियों और १२० टेंकों को भी उन्होंने ध्वस्त करके रख दिया था।

🔴 सच है जिंदा दिल कौमें बुराइयों और अपराधों के आगे घुटने नही टेकती, उनसे लड पडती है और विजय पाती हैं। हिम्मत करने वाले इंसान की मदद भगवान् करता है। स्टालिन जैसे सशक्त व्यक्ति ने भी इस पराजय को चमत्कार ही माना था।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 149, 150

बुधवार, 3 मई 2017

👉 शंकर मिश्र की माँ की प्रतिज्ञा

🔵 दरभंगा में एक तालाब है। उसे 'दाई का तालाब' कहते है। तालाब के निर्माण का इतिहास सज्जनता और ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता और नैतिकता का जीता-जागता आदर्श है। उसे पढ़कर जीवन के निष्काम प्रेम की अनुभूति का आनंद मिलता है।

🔴 शंकर मिश्र जन्मे तब इनकी माता जी के स्तनों में दूध नहीं आता था। बच्चे को प्रारंभ से ही ऊपर का दूध दिया नही जा सकता था, इसलिए उसे किसका दूध दिया जाए? यह एक संकट आ गया।

🔵 एक धाय रखनी पड़ी। इस धाय ने शंकर को अपना बच्चा समझकर दूध पिलाया। मातृत्च का जो भी लाड़ और स्नेह एक माँ अपने बच्चे को दे सकती है, धाय ने वही स्नेह और ममता बच्चे को पिलाई। आज के युग में जब भाई-भाई एक-दूसरे को स्वार्थ और कपट की दृष्टि सें देखते हैं, तब एक साधारण स्त्री का यह भावनात्मक अनुदान स्वर्गीय ही कहा जा सकता है। संसार के सब मनुष्य जीवन के कठोर कर्तव्यों का पालन करते हुए भी यदि इस सुरह प्रेम कर्तव्यशीलता का व्यवहार कर सकें तो संसार स्वर्ग बन जाए।

🔴 शंकर मिश्र बढ़ने लगे। धाय उनकी सब प्रकार सेवा सुश्रूषा करती, नीति और सदाचार की बातें भी सिखाती। सामान्य कर्तव्य पालन में कभी ऐसा समझ में नहीं आया, जब बाहर से देखने वालों को यह पता चला हो कि यह असली माँ नही है। धाय के इस आत्म-भाव से शंकर की माँ बहुत प्रभावित हुई। एक दिन उन्होंने धाय की सराहना करते हुए वचन दिया तुमने मेरे बच्चे के अपने बच्चे जैसा पाला है, जब वह बडा हो जायेगा तो इसकी पहली कमाई पर तुम्हारा अधिकार होगा।'' कुछ दिन यह बात आई गई हो गई।

🔵 शंकर मिश्र बाल्यावस्था से ही संस्कृत के प्रकाड विद्वान् दिखाई देने लगे। बाद में तो उनकी प्रतिभा ऐसी चमकी कि उनका यश चारों ओर फैलता गया। उनकी एक काव्य-रचना पर तल्ललीन दरभंगा नरेश बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने दरबार में बुलाकर उनका बडा सम्मान किया और उपहार स्वरूप एक हार भेंट किया। इसे लेकर शंकर घर आए और हार अपनी माँ को सौंप दिया।

🔴 हार बहुत कीमती था उसे देखकर किसी के भी मन में लोभ और लालच आ सकता था, पर यह सब सामान्य मनुष्यों के आकर्षण की बातें है। उदार हृदय व्यक्ति, कर्तव्यपरायण और आदर्शों को ही जीवन मानने वाले सज्जनों के लिए रुपये पैसे का क्या महत्व, मानवता जैसी वस्तु खोकर धन, संपत्ति, पद, यश प्रतिष्ठा कुछ भी मिले निरर्थक है, उससे आत्मा का कभी भला नही होता।

🔵 शंकर मिश्र की माता ने धाय को बुलाया और अपनी प्रतिज्ञा की याद दिलाते हुए हार उसे दे दिया। धाय हार लेकर घर आई। उसे शक हुआ हार बहुत कीमती है, तो उसकी कीमत जंचवाई। जौहरियों से पता चला कि उसकी कीमत लाखों रुपयों की है। लौटकर धाय ने कहा- माँ जी मुझे तो सौ-दो सौ की भेंट ही उपयुक्त थी। इस कीमती हार को लेकर मैं क्या करूँगी ? कहकर हार लौटाने लगी।

🔴 पर शंकर की माँ ने भी दृढता से कहा- जो भी हो एक बार दे देने के बाद चाहे वह करोड़ की संपत्ति हो मेरे लिए उसका क्या महत्व ? हार तुम्हारा हो गया-जाओ। उन्होंने किसी भी मूल्य पर हार स्वीकार न किया।

🔵 विवश धाय उसे ले तो गई पर उसने कहा- जो मेरे परिश्रम की कमाई नहीं उसका उपयोग करूँ तो वह पाप होगा। अतएव उसने उसे बेचकर एक पक्का तालाब बनवा दिया।

🔴 यही तालाब 'धाय का तालाब' के नाम से शंकर की माँ के वचन और धाय की उत्कृष्ट नैतिकता के रूप में आज भी लोगों को प्रेरणा देता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 146, 147

रविवार, 23 अप्रैल 2017

👉 वह व्यक्तित्व-जिसने सबका हृदय जीता

🔴 महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व में एक विशेषता यह थी कि वह हर स्तर के व्यक्ति को प्रभावित कर लेते थे। बडे लोगों के प्रति लोगों में सम्मान एवं श्रद्धा का भाव तो होता है, किंतु आत्मीयता नहीं होती। इसी प्रकार छोटों की विशेषताओं की प्रशंसा तो करते हैं किंतु उनके प्रति समानता का व्यवहार नहीं कर पाते। गाँधी जी में वह गुण था जिसके कारण वह समाज के हर वर्ग के साथ आत्मीयता का भाव स्थापित कर लेते थे तथा स्नेह एवं सम्मान दोनों समान रूप से प्राप्त कर लेते थे। वह वास्तव में जन नेता कहे जा सकते थे और उनका जादू सर चढ़कर बोलता था। प्रस्तुत घटना से उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष पर प्रकाश पड़ता है।

🔵 घटना दिसंबर सन् १९४५ की है। भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त होना लगभग निश्चित हो गया था। किसी परामर्श वार्ता के सिलसिले में बंगाल के गवर्नर श्री आर० जी० केसी ने गाँधीजी को राजभवन में बुलाया था। श्री केसी प्रतिष्ठित आस्ट्रेलियायी राजनीतिज्ञ थे।

🔴 गाँधी जी के वार्तालाप में उन्हें इतना रस आया कि वे भोजन का समय भी भूल गये। वार्ता के मध्य किसी का जाना मना था, अत: कोई याद दिलाने भी न जा सका। वार्ता समाप्त हुई तो बापू उठकर चल दिए। उन्हें पहुंचाने पीछे-पीछे गवर्नर महोदय भी चल रहे थे। सामान्य शिष्टाचार के नाते भी तथा व्यक्तिगत रूप से गाँधी जी से प्रभावित होने के कारण भी उनका ऐसा करना स्वाभाविक था।

🔵 बाहर जाने के मार्ग में जब वह दोनों बडे़ हाल मे छँचे तो गवर्नर चौंक पडे़। उन्होंने देखा कि हाल में राजभवन के सारे के सारे कर्मचारी उपस्थित है। धोबी से रसोइए तक चौकीदार व अन्य कर्मचारियों से लेकर माली तक, सब मिलाकर लगभग जिनकी संख्या २०० थी, सबके सब उपस्थित थे। सभी शांति के साथ दो लंबी कतारों में खडे़ थे, मानो किसी को गार्ड ऑफ आनर देने की तैयारी है। निश्चित रूप से उन्हें किसी ने एकत्र होने को नही कहा था। वह तो बापू के प्रति सहज इच्छा के कारण उनके दर्शनार्थ एकत्र हो गये थे। उनमें से अनेक तो काम करते-करते वैसे ही भागकर आ गये थे। ऐसी पोशाक में थे कि उस अवस्था मे गवर्नर के सामने आना अनुशासनहीनता के रूप मे दंडनीय था, किंतु यहाँ वह गवर्नर के लिये नहीं, अपने प्यारे बापू के लिये आए थे। बापू यहाँ से गुजरे तो सबने श्रद्धा के साथ अभिवादन किया। उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए बापू अपनी मुस्कान से सबको संतोष देते हुए आगे बड गए।

🔴 श्री केसी खोये-खोये से साथ थे। उन्हें कुछ कहते न बन पड़ रहा था। विचित्र वेशभूषा में कर्मचारियों को देख संकुचित भी थे तथा गाँधी जी के प्रति अनुराग देखकर चकित भी। बोले गाँधीजी! यकीन रखिये, मैंनै उन्हें एकत्र होने के लिए नहीं कहा था। बापू उत्तर न देते हुए, केवल मुस्कुराकर विदा माँगकर चल दिए। श्री केसी को उस समय तक इस विषय में शंका थी कि भारत में विभिन्न संप्रदायों को एक सूत्र में बिना भय के बॉधा जा सकता है, किंतु गाँधी जी का वह अनोखा गार्ड ऑफ आनर देखकर उनकी मान्यता बदल गई। उनके कर्मचारियों में अधिकांश मुसलमान व कुछ इसाई भी थे। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के हर वर्ग के हृदय में गाँधी ने इतना गहरा स्थान बना लिया है इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं थी।

🔵 जन-जन के अंतःकरण मे गाँधी जी ने इतना महत्वपूर्ण स्थान कैसे पा किया था यह अध्ययन का विषय है। उन्होंने जी जान से सबके हित का प्रयास किया था। अपना सब कुछ जनता को देकर ही उन्होने वह स्थान बनाया था, जो किसी भी जन नेता कहलाने वाले के लिए शोभनीय है। बिना उसके थोथी वाह-वाही भले ही कोई पा ले, न तो सही अर्थों में सबका स्नेह पा सकता है और न ही सफल नेतृत्व कर सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 141, 142

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

👉 घृणास्पद व्यक्ति नहीं, दुष्प्रवृति

🔵 खेतडी नरेश ने स्वामी विवेकानंद को एकबार अपनी सभा में आमंत्रित किया। स्वामीजी वहाँ गये भी और लोगों को तत्त्वज्ञान का उपदेश भी किया। समाज सेवा का प्रसंग आया और वे समझाने लगे कि मनुष्य छोटा हो या बड़ा, शिक्षित हो या अशिक्षित उसका अस्तित्व समाज में टिका हुआ है, इसलिए बिना किसी भेदभाव के ईश्वर उपासना की तरह ही समाज-सेवा का व्रत भी पालन करना चाहिए। उसमें कोई व्यक्ति छोटा नहीं होता, वरन् उपासना की तरह सेवा भी मानव अंतकरण को विशाल ही बनाती है।

🔴 आगे की बात स्वामी जी पूरी नहीं कर सके, क्योंकि उधर से नर्तकियों का एक दल आ पहुँचा। सामंतों का स्वभाव ही कुछ ऐसा होता है कि उनका ध्यान उधर चला गया, इसलिये प्रवचन अपने आप समाप्त हो गया। इधर नर्तकियों के नृत्य की तैयारी होने लगी। जैसे ही एक नर्तकी ने सभा मंडप में प्रवेश किया कि स्वामी जी का मन धृणा और विरक्ति से भर गया। वे उठकर वहाँ से चल दिए। स्वामी जी की यह उदासीनता और किसी के लिए कष्टकारक प्रतीत हुई हो या नही, पर उस नर्तकी के हृदय को आघात अवश्य पहुँचा।

🔵 घृणा चाहे जिस व्यक्ति के प्रति हो, अच्छी नहीं। बुरे कर्मों का फल कर्ता आप भोगता है, भगवान् की सृष्टि ही कुछ ऐसी है कि खराब काम के दंड से कोई भी बच नहीं सकता, पर यह दंड-व्यवस्था उसी के हाथों तक सीमित रहनी चाहिए, वह सर्वद्रष्टा है पर मनुष्य की पहुँच किसी के सूक्ष्म अंतःकरण तक नहीं, इसलिए उसे केवल कानूनी दण्ड़ का ही अधिकार एक सीमा तक प्राप्त है। घृणा तो दुश्मनी ही पैदा करती है, भले ही वह कोई दलित या अशक्त व्यक्ति क्यों न हो। प्रतिशोध कभी भी अहित कर सकता है। स्वामी दयानंद जी के घात का कारण पूछो तो ऐसी ही घृणा थी, जो मनुष्य के लिए कभी अपेक्षित नहीं।

🔴 नृत्य प्रारंभ हुआ। नर्तकी ने अलाप किया- "प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो" और वह ध्वनि स्वामी जी के कानों में पडी़। स्वामी जी चौंक पडे। मस्तिष्क में जोर के झटके से विचार उठा-परमात्मा का अवगाहन हम इसीलिये तो करते है कि पाप परिस्थितियों के कारण हमारे अंतकरण कलुषित हुए पडे हैं, हम उनमे निर्मल और निष्पाप बने। सामाजिक परिस्थितियों से कौन बचा है' यह बेचारी नर्तकी ही दोषी क्यों ? मालूम नहीं समाज की किस अवस्था के कारण इस बेचारी को इस वृत्ति का सहारा लेना पडा़ अन्यथा वह भी किसी प्रतिष्ठित घराने की बहू और बेटी होती।

🔵 अब तक मस्तिष्क में जो स्थान घृणा ने भर रखा था, वह अब भस्मीभूत हो गया। अब स्वच्छ करुणा और विवेक का उदय हुआ-संसार में व्यक्ति घृणा का पात्र नहीं, वृत्ति को ही धृणित मानना चाहिए।

🔴 स्वामी विवेकानंद वापस लौटे, अपना स्थान पुन-ग्रहण किया। लोगों के मन में उनके प्रति जो श्रद्धा थी वह और द्विगुणित हो उठी। स्वामी जी जब तक नृत्य हुआ, कला की सूक्ष्मता और उससे होने वाली मानसिक प्रसन्नता का अध्ययन करते रहे। विद्यार्थी के समान उन्होंने संपूर्ण रास केवल अध्ययन दृष्टि से देखा, न कोई मोह था न आसक्ति। नृत्य समाप्त होने पर ही वापस अपने डेरे को लौटे।

🔵 इतनी भूल सुधार के कारण उन्होंने सभी सभासदो और नर्तकी को भी यह शिक्षा तो दी ही दी कि "व्यक्ति को घृणास्पद मानने का अर्थ यह नहीं कि वृत्ति को भी घृणा न की जाए। उससे तो बचना ही चाहिए। आजीविका के लिए वह नर्तकी कला प्रदर्शन तो करती रही, पर उस दिन उसे स्वामी जी के प्रति श्रद्धा ने वासना से विरक्ति दे दी और उसने आजीवन व्रतशील जीवनयापन किया। सभासदों में से अनेक ने अपनी दोष दृष्टि का परित्याग किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 139, 140

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

👉 गुरु नानक की ईश्वर निष्ठा

🔵 भौतिक अथवा आध्यात्मिक कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, उसमें उन्नति करने के लिए लगन और एकाग्रता के साथ निष्ठा की आवश्यकता होती है। बिना सच्ची लगन और एकनिष्ठा के सिद्धि पा लेना संभव नही होता। गुरुनानक ने अपने लिये भक्ति का मार्ग चुना और अपनी निष्ठा के बल पर वे एक महान् संत बने और समाज में उनकी पूजा-प्रतिष्ठा हुई। उनके जीवन की तमाम घटनाएं उनकी इस निष्ठ की साक्षी हुई है।

🔴 नानक जब किशोरावस्था में थे, तभी से वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लग गये थे। यह आयु खेलने-खाने की होती है। नानक भी खेला करते थे, पर उनके खेल दूसरों से भिन्न होते थे। जहाँ और लडके गुल्लीडंडा, गेंद बल्ला, कबड्डी आदि का खेल खेला करते थे, वहाँ नानक भगवान् की पूजा, उपासना का खेल और साथियों को प्रसाद बाँटते थे।

🔵 एक बार वे इस प्रकार के खेल मे संलग्न थे। भोजन का समय हो गया था। कई बार बुलावा आया, लेकिन वे खेल अधूरा छोड्कर नहीं गए। अंत मे उनके पिता उन्हें जबरदस्ती उठा ले गए। भोग लगाकर प्रसाद बाँटने का खेल बाकी रह गया। नानक को खेल में विघ्न पड़ने का बडा दुःख हुआ, लेकिन उन्होंने न तो किसी से कुछ कहा और न रोए-धोए ही, तथापि वे गंभीरतापूर्वक मौन हो गये और भोजन न किया। बहुत कुछ मनाने, कहने और कारण पूछने पर भी जब नानक ने कुछ उत्तर नहीं दिया और खिलाने पर भी जब ग्रास नहीं निगला तो उनके पिता को चिंता हुई कि बालक को कहीं कोइ बीमारी तो नहीं हो गई।

🔴 वैद्य बुलाकर नानक को दिखलाया गया। वैद्य आया और उसने भी जब पूछताछ करने पर कोई उत्तर न पाया और खिलाने से ग्रास स्वीकार नहीं किया तो उसने उनके मुँह में उँगली डालकर यह परीक्षा करनी चाही कि लडके का गला तो कहीं बंद नहीं हो गया है। इस पर नानक से न रहा गया। वे बोले वैद्य जी, आप अपनी बीमारी का उपचार करिए। मेरी बीमारी तो यही ठीक करेगा जिसने लगाई है। नानक की गूढ़ बात सुनकर उनके पिता ने उनकी मानसिक स्थिति समझ ली और फिर उन्हें उनके प्रिय खेल से कभी नहीं उठाया।

🔵 इस प्रकार जब वे पाठशाला में पढ़ने के लिए भेजे गए, तब अध्यापक ने उन्हें तख्ती पर लिखकर वर्णमाला पढा़नी शुरू की। उन्होंने 'अ' लिखा और नानक से कहा-कहो 'अ'। नानक ने कहा 'अ'। उसके बाद अध्यापक ने 'अ' लिखा और कहा- कहो 'अ'। नानक ने कहा-'अ' नाम भगवान् का रूप। जब यही पढ़ लिया तो अब आगे पढ़कर क्या करूँगा?''

🔴 अध्यापक ने समझाया तुम मेरे पास पढ़ने और ज्ञान सीखने आए हो। बिना विद्या पढे ज्ञानी कैसे बनोगे ? नानक ने कहा कि आप तो मुझे समझ में आने वाली विद्या पढाइए, जिससे परमात्मा का ज्ञान हो, उसके दर्शन मिलें। आपकी यह शिक्षा मेरे लाभ की नहीं है। अध्यापक ने फिर कहा- यह विद्या यदि तुम नही पढो़गे तो संसार मै खा-कमा किस तरह सकोगे ? खाने कमाने के लिए तो यह विद्या पडनी जरूरी है।' नानक ने उत्तर दिया-'गुरुजी! आदमी को खाने के लिए चाहिए ही कितना "एक मुट्ठी अन्न। वह तो सभी आसानी से कमा सकते ही हैं, उसकी चिंता में भगवान् को पाने की विद्या छोडकर और विद्याएँ पढने की क्या आवश्यकता", "मुझे तो वह विद्या सिखाइए, जिससे मै मूल तत्व परमात्मा के पाकर सच्ची शांति पा सकूं।"

🔵 गुरु नानक की बातों में उनका हृदय, उनकी आत्मा और भगवान् के प्रति उनकी सच्ची निष्ठा बोल रही थी। उनकी बातों का प्रभाव अध्यापक पर पडा़ जिससे कि वे दुनियादारी से विरत होकर भगवान के सच्चे भक्त बन गए। ऐसी थी नानक की निष्ठा और परमात्मा को प्राप्त करने की लगन। इसी आधार पर उनकी उपासना और साधना सफल हुई। वे एक उच्चकोटि के महात्मा बने। उनकी वाणी बोलती थी और उनका हृदय उसका मंदिर बन गया था। वे दिन-रात भगवान् की भक्ति में तन्मय रहकर लोक-कल्याण के लिए उपदेश करते और लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान् की भक्ति और संसार का कल्याण करने में लगा दिया। हजारों-लाखों लोग उनके शिष्य बने। आज जो सिक्ख संप्रदाय दिखलाई देता है, वह गुरुनानक के शिष्यो द्वारा ही बना है। निष्ठा और लगन में बडी शक्ति होती है। उसके बल पर सांसारिक उन्नति तो क्या भगवान् तक को पाया जा सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 137, 138

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

👉 महामानव बनने में चरित्रबल का योगदान

🔵 मेसीडोन के राजा फिलिप अपने पुत्र सिकंदर को एक महान् पुरुष के रूप में देखना चाहते थे। उनकी प्रतिभा, शक्ति, सामर्ध्य, क्रियाशीलता, धैर्य, साहस और सूझ-बूझ से वे अच्छी तरह परिचित हो गये थे। अब इस बात की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे कि किस व्यक्ति के पास अपने बच्चे को शिक्षा हेतु भेजा जाए, जो इसकी इन शक्तियों को कुमार्गगामी बनने से रोके और महामानव बनने की प्रबल प्रेरणा उत्पन्न कर सके। सोचते-सोचते उसकी नजर तत्कालीन महान् दार्शनिक अरस्तु पर पडी, जो इस कार्य को कुशलतापूर्वक सपन्न कर सकते थे। सिकंदर उनकी पाठशाला में भेज दिया गया।

🔴 अरस्तू सिकंदर की विलक्षण प्रतिभा देखकर फूले न समाये। उनकी यह प्रबल इच्छा हुई कि इस बच्चे की शक्तियों को सन्मार्ग में विकसित करना चाहिए। यदि ऐसा हो सका तो निश्चय ही यह संसार के महान् व्यक्तियों में से एक होगा।

🔵 शिक्षा के साथ-साथ गुरु का ध्यान गुण, स्वभाव और चरित्रबल की तरफ विशेष था। दार्शनिक अरस्तु यह जानते थे कि जीवन के महान् विकास के लिए इन गुणों के विकास की नितांत आवश्यकता है। जिन दुर्गुणों से मनुष्य की शक्तियों का क्षरण होता रहता है, यदि उनका उन्मूलन न हो सका तो फिर शक्ति का स्रोत किसी अन्य मार्ग से निकलकर व्यर्थ हो जायेगा। फिर जीवन विकास के सारे प्रयास निर्बल, निस्तेज और निष्प्राण हो जायेंगे।

🔴 इन्हीं बातों को सोच-सोचकर अरस्तु अन्य विद्यार्थियों के साथ-साथ सिकंदर की हर क्रिया-कलाप पर विशेष ध्यान रखते थे। उन्हें सिकंदर का उतना ही ध्यान रहता था जितना किसी पिता को अपने एक होनहार पुत्र का रहता है।

🔵 एक बार सिकंदर का किसी स्त्री से अनुचित संबंध हो गया। अरस्तु को पता चल गया। उन्होंने सिकंदर को समझाया और डॉटा तथा इस रास्ते को छोडने का आग्रह किया। उस स्त्री को यह पता चला तो सोचने लगी कि यह अरस्तु ही मेरे संबंध में रोडे अटका रहा है, अत: ऐसा करना चाहिए, जिससे गुरु-शिष्य में शत्रुता हो। फिर बुरा काम आसानी से चलता रहेगा, वह कुटिल नारी एक दिन अरस्तु के पास पहुँची और एकांत में मिलने का प्रस्ताव रखा। अरस्तु ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जिस उद्यान में उन्हें मिलने के लिए बुलाया गया था उसमें ठीक समय पर पहुँच गए।

🔴 मनोवैज्ञानिक अरस्तु यह जानते थे कि कोरी शिक्षा की अपेक्षा प्रमाणों का मनोभूमि पर अधिक प्रभाव पडता है। उन्होंने कुटिल चाल से लाभ उठाया। अरस्तु ने अपने अन्य शिष्यों द्वारा इस घटना की सूचना सिकंदर तक भी पहुंचवा दी। साथ ही सूचना अरस्तु ने भिजवाई है, यह भेद न खुलने की कडी मनाही कर दी। सिकंदर आकर एक छिपे स्थान में टोह मे बैठ गया।

🔵 कुछ समय बाद वह तरुणी आई। उसने अरस्तु के गले में बाहुपाश डाले और कहा क्या ही अच्छा होता, थोडी देर तक हम लोग क्रीडा-विनोद का आनंद लेते। अरस्तू की स्वीकृति मिल गई। युवती ने दार्शनिक अरस्तू को घोडा़ बनाया और पीठ पर चडकर उन्हें चलाने लगी। बूढा घोडा़ युवती को अपनी पीठ पर बिठाकर घुटनों के बल चल रहा था। स्वाभिमानी सिकंदर जो जीवन में कभी झुकना नहीं जानता था अपने गुरु की यह स्थिति अधिक देर तक सहन न कर सका और तुरंत सामने आकर कहा- "क्यों गुरुदेव! यह सब क्या हो रहा है ?"

🔴 अरस्तू ने कहा देखते नहीं। मुझे यह माया किस तरह घुटनों के बल चलने को विवश कर रही है, फिर तुमको तो वह पेट के बल रँगने को विवश कर देगी। सिकंदर को वस्तुस्थिति समझ में आ गई। उसने अपना मुँह मोड़कर चरित्र गठन में अपना सारा ध्यान लगा दिया, जिससे वह संसार का एक महान् पुरुष- 'सिकंदर महान्' कहलाया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 135, 136

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

👉 आदर्श पर अडिग- श्री विद्यासागर

🔵 बंगाल के लैफ्टिनेंट गवर्नर सर फ्रेड्रिक हैडिले अपनी बैठक में उद्विग्न से टहल रहे थे। उनके मन में तरह-तरह के संकल्प विकल्प उठ रहे थे। श्री ईश्वरचंद्र विद्यासागर को दिए हुए उनके आश्वासन के शब्द उन्हें बार-बार याद आ रहे थे। भारत के वायसराय लार्ड एलेनबरा के आज के पत्र ने उनको परेशानी में डाल दिया था। थोडी देर टहलने के बाद उन्होंने अपने प्राईवेट सेक्रेटरी को बुलाकर श्री विद्यासागर जी को बुलावा भिजवा दिया।

🔴 ईश्वरचंद्र जी की शिक्षण संबंधी सूझ-बूझ तथा व्यवहारिक योजनाओं से सारा देश परिचित हो चुका था। शिक्षा निदेशक से कुछ सैद्धांतिक मतभेद हो जाने के कारण उन्होंने सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया था। उनकी योग्यता से प्रभावित गवर्नर फ्रैड्रिक ने उन्हें समझाकर समझौता कराने का प्रयास किया। वह इतने दुर्लभ व्यक्ति को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे, किंतु ईश्वरचंद्र सैद्धांतिक व्यक्ति थे। उन्होंने नम्रतापूर्वक समझौते की बात से इन्कार कर दिया। उनका कहना था कि-कार्य-पद्धति में हेर-फेर किया जा सकता है-सिद्धांतो में नहीं। अनुशासन के नाते मुझको बडे अधिकारी की बात माननी चाहिए, किंतु अपनी आंतरिक प्रेरणा की उपेक्षा भी तो नहीं की जा सकती है, अतः अकारण अप्रिय प्रसंगों से वातावरण विषाक्त बनाने की अपेक्षा मैंने स्वयं मार्ग से हट जाना ही अच्छा समझा। इस विषय में मुझ पर दबाव न डाला जाए यही ठीक होगा। वैसे मैं हर सेवा के लिए तैयार हूँ।''

🔵 हारकर सर फ्रैड्रिक उनसे बंगाल में शिक्षा-प्रसार के लिए कोई अच्छी योजना बनाने का आग्रह कर रहे थे। योजना को राजकीय स्तर पर कार्यान्वित करने का अपना विचार भी उन्होंने व्यक्त कर दिया। ईश्वरचंद जी ने यह कार्य सहर्ष स्वीकार भी कर लिया। एक विषय में किसी से मतभेद होने का यह अर्थ तो नहीं होता कि अन्य संभावित सहयोग के कार्यो में भी विरोध किया जाए विचारक का विचार साधन-संपन्नों द्वारा प्रसारित किया जाना लाभकारी ही है। देश के उत्थान के लिए यदि विरोधी के साथ मिलकर भी कार्य करने में लाभ दिखता है तो किसी विचारशील को हिचकना नहीं चाहिए। विरोध व्यक्तियों से नहीं, विचारों से ही मानना उचित है। दस विचारों में मतभेद होने पर भी यदि एक में साम्य है, तो कोई कारण नहीं कि उसकी पूर्ति हेतु सम्मिलित प्रयास न करें। यह बात यदि आज के कथित देशसेवियों की समझ में आ सके तो आधी से अधिक समस्याओं का समाधान देखते-देखते निकल आए।

🔴 श्री ईश्वरचंद्र जी ने बडी मेहनत के साथ एक योजना बनाकर गवर्नर साहब को दी। गवर्नर साहब ने उसे देखा तो बहुत प्रसन्न हुए। योजना की व्यवहारिकता देखकर उन्होंने आश्वासन दे दिया कि इसे राज्य के व्यय पर क्रियान्वित किया जा सकेगा और उस योजना को स्वीकृति हेतु वायसराय के पास भेज दिया। उन्हें पूरी आशा थी कि इतनी अच्छी योजना अवश्य स्वीकार कर ली जायेगी।

🔵 किंतु उनकी आशा के विपरीत जब वायसराय ने उस पर नकारात्मक आदेश लिख दिया तो उन्हें बहुत चोट पहुँची। ईश्वरचंद्र जी ने उन्हें सांत्वना दी और कहा-''आप दुःख न मानो। मेरे कार्य अपनी सचाई के आधार पर स्वयं खडे हो सकते हैं।" मेरी योजना में समाज के हित की शक्ति होगी तो वह अपने बल पर भी चल जायेगी और वास्तव में उनकी सार्वजनिक घोषणा पर उस योजना का जनता ने भारी स्वागत किया। शिक्षा प्रेमियों ने भी अपना हर प्रकार का सहयोग उस हेतु दिया। योजना में बंगाल में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। उपयोगी योजना ने अपना मार्ग स्वयं बना लिया। ईश्वरचंद्र की वह बात आज भी सही है। अपने लाभ की बात जनता अभी भी स्वीकार कर सकती है। आवश्यकता है ऐसी योजना बनाने तथा उसे जनता को समझाने की।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 132, 133

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

👉 मूर्तिमान् सांस्कृतिक स्वाभिमानी

🔴 एक बडे विद्यालय में, जिसमें अधिकांश छात्र अप दू डेट फैशन वाले दिखाई पडते थे। एक नये विद्यार्थी ने प्रवेश लिया। प्रवेश के समय उसकी पोशाक धोती, कुर्ता, टोपी, जाकेट और पैरों में साधारण चप्पल।

🔵 विद्यालय के छात्रों के लिए सर्वथा नया दृश्य था। कुछ इस विचित्रता पर हँसे, कुछ ने व्यंग्य किया- तुम कैसे विद्यार्थी हो ? तुम्हें अप टू डेट रहना भी नहीं आता ? कम-से-कम अपना पहनावा तो ऐसा बनाओ, जिससे लोग इतना तो जान सकें कि तुम एक बड़े विद्यालय के विद्यार्थी हो।

🔴 छात्र ने हँसकर उत्तर दिया अगर पोशाक पहनने से ही व्यक्तित्व ऊपर उठ जाता है तो पैंट और कोट पहनने वाले हर अंग्रेज महान् पंडित होते, मुझे तो उनमें ऐसी कोई
विशेषता नहीं देती। रही शान घटने की बात तो अगर सात समुद्र पार से आने वाले और भारतवर्ष जैसे गर्म देश में ठंडे मुल्क के अंग्रेज केवल इसलिए अपनी पोशाक नही बदल सकते कि वह इनकी संस्कृति का अंग। है, तो मैं ही अपनी संस्कृति को क्यों हेय होने दूँ ? मुझे अपने मान, प्रशंसा और प्रतिष्ठा से ज्यादा धर्म प्यारा है, संस्कृति प्रिय है, जिसे जो कहना हो कहे, मैं अपनी संस्कृति का परित्याग नहीं कर सकता। भारतीय पोशाक छोड देना मेरे लिए मरणतुल्य है।''

🔵 लोगों को क्या पता था कि साधारण दिखाई देने वाला छात्र लौहनिष्ठा का प्रतीक है। इसके अंतःकरण मे तेजस्वी विचारों की ज्वालाग्नि जल रही है। उसने व्यक्तित्व और विचारों से विद्यालय को इतना प्रभावित किया कि विद्यालय के छात्रों ने उसे अपना नेता बना लिया, छात्र-यूनियन का अध्यक्ष निर्वाचित किया। इस विद्यार्थी को सारा देश गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम से जानता है।

🔴 गणेश शंकर अपनी संस्कृति के जितने भक्त थे उतने ही न्यायप्रिय भी थे। इस मामले में किसी भी कठोर टक्कर से वह नही घबराते थे और न ही जातीय या सांप्रदायिक भेदभाव आने देते थे।

🔵 उन दिनो पोस्टकार्ड का टिकट काटकर कागज में चिपका कर भेजना कानून-विरुद्ध न था। गणेश शंकर विद्याथी ने ऐसा ही एक टिकट चिपकाया हुआ पोस्ट कार्ड प्रेषित किया। पोस्टल डिपार्टमेंट ने उसे बैरंग कर दिया। युवक ने इसके लिये फड़फडाती लिखा-पढी की, जिससे घबराकर अधिकारियों को अपनी भूल स्वीकार करनी पडी।

🔴 न्याय और निष्ठा के पुजारी विद्यार्थी जी मानवीय एकता और सहृदयता के भी उतने ही समर्थक थे। इस दृष्टि से तो यह युवक-संत कहलाने योग्य हैं। अत्याचार वे किसी पर भी नहीं देख सकते थे। १९३१ में जब हिंदू-मुसलमानों के बीच दंगा फैला तो गणेश शंकर जी ने बडी बहादुरी के साथ उसे मिटाने का प्रयास किया। जिन मुसलमान बस्तियों में अकेले जाने की हिम्मत अधिकारियों की भी न होती थी वहाँ विद्यार्थी जी बेखटके चले जाते थे। कानपुर मे उन्होंने हजारों हिंदू-मुसलमानों को कटने से बचाया।

🔵 दुर्भाग्य से एक धर्मांध मुसलमान के हाथों वह शहीद हो गये, पर अल्पायु में ही वह मानवीय एकता न्याय और संस्कृतिनिष्ठा का जो पाठ पढा गये वह अभूतपूर्व है। उससे अंनत भविष्य तक हमारे समाज में गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे युवक जन्म लेते रहेगे, तब तक भारतीय संस्कृति का मुख भी उज्जल बना रहेगा।

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

👉 ज्योतिष पुरुषार्थ का प्रबल शत्रु

🔵 नेपोलियन बोनापार्ट की प्रेमिका जेसोफाइन ने एक बार उसे एक पत्र लिखा-मैं देखती हूँ, जो फ्रांस एक दिन पुरुषार्थ के ढाँचे में पूरी तरह ढल चुका था, जिसे आपने पराक्रम का पाठ पढा़या था, आज उसी फ्रांस की नसें आपके देववाद के आश्रय के कारण शिथिल पडती जा रही है। मनुष्य अपनी भुजाओं, अपने शस्त्र पर भरोसा न करे और यह सोचे कि घडी, शकुन, देवता उसकी सहायता कर जायेंगे। मैं समझती इससे बड़कर मानवीय शक्ति का और कोई दूसरा अपमान नहीं ही सकता।

🔴 ऐसा पत्र लिखने का खास कारण था। एक समय था, जब नेपोलियन ज्योतिष पर बिल्कुल भी विश्वास नही करता था। उसके सेनापति चाहते थे कि नेपोलियन ज्योतिषियों से पूछकर कोई कदम बढा़या करे, किंतु नेपोलियन ने उनको डाँटकर कहा-ईश्वर यदि सहायक हो सकता है तो वह पराक्रमी और पुरुषार्थियों के लिए है। भाग्यवाद का आश्रय लेने वालों को पिसने और असफलता का मुँह देखने के अतिरिक्त हाथ कुछ नहीं लगता।

🔵 जब तक नेपोलियन अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहा, तब तक वह अकेला ही दुश्मनों के छक्के छुड़ाता रहा, पर दुर्भाग्य, एक दिन वह स्वयं भी देववाद पर विश्वास करने लगा। वह पत्र उसी संदर्भ में लिखा गया था। नेपोलियन की यही ढील अंतत उसके पराजय का कारण बनी।

🔴 भारतीय तत्वदर्शन की अनेक शाखाओं में ज्योतिष का भी विधान है, पर वह विशुद्ध गणित के रूप है और उसका विकास होना चाहिए, किंतु उसके फलितार्थ सामूहिक रूप से सारी पृथ्वी और मानव जाति के जीवन को प्रभावित करते हैं। व्यक्तिगत जीवन में स्थान-स्थान पर ज्योतिष और भाग्यवाद के पुँछल्ले असफलता और पतन के ही कारण हो सकते है। नेपोलियन बोनापार्ट की तरह हमारे देश भारतवर्ष के साथ भी ऐसा ही हुआ। फलित के चक्कर में पड़कर सारे देश के पराक्रम की नसे ढीली पड गई और हमें सर्वत्र पराजय का मुँह देखना पडा। सोमनाथ का मंदिर लुटा तब ज्योतिषियों के अनुसार मुहूर्त नहीं था। यदि सैनिक उस पाखंड को न मानते तो भारत देश की यह दुर्गति न होती। आज भी ज्योतिष के चक्कर में पड़कर हमारी सफलता के सोमनाथ लुटते रहते है और हम अपनी उन्नति के लिये भाग्य का मुख ताकते खडे रहते हैं।

🔵 आज हमारे देश को अब्राहम लिंकन जैसे औंधे भाग्य को अपने पुरुषार्थ और पराक्रम से सीधा करने वाले होनहारों की आवश्यकता है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में गृह-युद्ध शुरू हो गया था। लगता था दोनों राज्य अलग-अलग होकर ही रहेंगे। तभी अब्राहम लिंकन ने अपना एक ऐतिहासिक निर्णय दिया कि दोनों प्रदेशों की एकता सैनिक शक्ति के द्वारा अक्षुण्ण रखी जायेगी। उसने युद्ध की सारी तैयारी कर भी ली।

🔴 उसी समय उनका एक मित्र आया। उसने कहा-महोदय! अपने निर्णय पर अमल करने से पूर्व आप ज्योतिषियों से भी राय ले लें, मैं तीन ज्योतिषियों को लेकर आया हूँ। वे पास के कमरे मैं ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे है।

🔵 लिंकन ने सोचा ज्योतिषी कभी एक राय के नही होते इसी से सिद्ध है कि वे अंतिम सत्य नही। लिंकन ने अपने सैनिक बुलाए और कहा-इस बगल के कमरे में राष्ट्र के तीन शत्रु बैठे हैं, दरवाजा बंद कर ताला लगा दो जब तक हम विजयी होकर नहीं लौटते ताला न खोला जाए। ज्योतिषवाद के भ्रम में पड़कर लिंकन अपने पराक्रम ओर पुरुषार्थ के पथ से विचलित हो जाते तो अमेरिका एकता के युद्ध का और ही दृश्य होता। हमारे जीवन में जो पग-पग पर असफलताएँ दिखाई दे रही हैं, वह हमारे भाग्यवाद के कारण ही है, यदि हम हीन भाव को भगा दें तो जीवन संग्राम में हम भी लिंकन के समान ही सर्वत्र सफलता अर्जित कर सकते है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 127, 128

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

👉 परंपरा जब अंधी हो जाती है

🔵 बात उन दिनों की है जब रूस में जार अलेक्जेंडर का शासन था। उसके व्यक्तिगत निवास में बहुत थोडे और विश्वसनीय लोग ही पहुँच सकते थे, इसलिए कितने ही रहस्य ऐसे थे, जो औरो तक कभी प्रकट नहीँ नहीं हो सके।

🔴 एक दिन प्रशा के राजदूत बिस्मार्क जार से भेंट करने उनके महल पर गये। बिरमार्क जहाँ बैठे थे उसके ठीक सामने खिड़की पडती थी बहुत पीछे तक का बाहरी दृश्य भी वहाँ से अच्छी तरह दिखाई दे रहा था। बिस्मार्क ने देखा कि बहुत देर से एक रायफलधारी संतरी मैदान मे खडा है जबकि रक्षा करने जैसी कोई वस्तु वहाँ पर नहीं है। शांतिकाल था- इसलिये सैनिक गश्त जैसी कोई बात भी नहीं थी।

🔵 बडी़ देर हो गई तब बिस्मार्क ने जार से पूछा-यह संतरी क्यों खडा़ है? जार को स्वयं भी पता नहीं था कि संतरी वहाँ किस बात का पहरा दे रहा है ?

🔴 जार ने अपने अंगरक्षक सेनाधिकारी को बुलाया और पूछा- यह संतरी इस पीछे के मैदान में किसलिए नियुक्त किया जाता है ? सेनाधिकारी ने बताया-सरकार! यह बहुत दिनों से ही यही खड़ा होता चला आ रहा है। जार ने थोडा कडे़ स्वर में कहा- यह तो मैं भी देख रहा हूँ मेरा प्रश्न यह है कि संतरी यहाँ किसलिए खडा होता है ' जाओ और पता लगाकर पूरी बात मालूम करो।''

🔵 सेनाधिकारी को कई दिन तो यह पता लगाने में ही लग गए थे। चौथे दिन सारी स्थिति का पता कर वह जार के सम्मुख उपस्थित हुआ और बताया- 'पुराने सरकारी कागजात देखने से पता चला कि ८० वर्ष पहले महारानी कैथरीन के आदेश से एक संतरी वहां खडा किया गया था। बात यह थी कि एक दिन जब वे घूमने के लिए निकली, तब इरा मैदान में बर्फ जमा थी। सारे मैदान में एक ही फूल का पौधा था और उसमें एक बहुत सुंदर फूल खिला हुआ था। कैथरीन को वह फूल बेहद सुंदर लगा सो उसकी सुरक्षा के लिए तत्काल वहाँ एक संतरी खडा़ करने का आदेश दिया और इस तरह वहाँ संतरी खडा़ करने की परपरा चल पडी़। ८० वर्ष हो गए न किसी ने आदेश को बदला, न किसी ने उसकी आवश्यकता अनुभव की, सो उस स्थान पर व्यर्थ ही पहरेदारी बराबर चलती आ रही है। जार को गुस्सा भी आया और हँसी भी। गुस्सा इसलिए कि परंपराओं का निरीक्षण न होने से यह खर्च व्यर्थ ही होता रहा और हँसी इसलिये कि पहले तो एक भी फूल था पर ८० वर्ष से तो उस मैदान में अच्छी घास भी नहीं है, न जाने संतरी किसकी रखवाली कर रहा है ?

🔴 कहानी यहाँ समाप्त नहीं हो गई वरन् सही कहानी अब प्रारंभ होती है और वह यह है कि समाज में स्वय आज दहेज, पर्दा प्रथा जाति-पाँति ऊँच-नीच, मृतक भोज स्वस्थ परंपरा के रूप में प्रचलित किए गये थे। अब अंध परंपरा बन चुके हैं। वर्तमान परिस्थितियों में न तो उनकी आवश्यकता है और न उपयोगिता फिर भी न तो कोई यह देख रहा कि यह परंपराऐं आखिर किस उद्देश्य से बनी थी और न ही कोई उन्हें मिटाने का साहस कर रहा है। हम व्यर्थ ही उपहास और अपव्यय के पात्र बने उन्हें अपने छाती से वैसे ही चिपकाए है जैसे-रूस का यह बिना कारण-पहरा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 125, 126

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 पीड़ितों के अनन्य सेवक माणिक्यलाल वर्मा

🔵 राजस्थान के लब्ध प्रतिष्ठ समाजसेवी श्री माणिक्यलाल वर्मा की जीवन कहानी अनोखी है। बैलगाडी पर अपनी सारी गृहस्थी सहित सपेरे नगर-नगर और ग्राम-ग्राम भटकने वाले गाडिया लुहार उनको खूब जानते थे। रेलवे स्टेशन से सैकडों मील दूर घने जंगलों में पहाडी की टेकरियों पर झोपड़ी बनाकर रहने वाले अधनंगे भील भी उनसे अपरिचित नहीं थे। कंजर और खारी, जिनके माथे पर समाज ने जन्म-जात अपराधी होने का टीका लगा दिया था, उन्हें अपना समझते थे। कालबेलिये जो साँपों को पालते हैं और बनजारे, जो बैलों की पीठ पर अनाज लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाते हैं, उन्हें अच्छी तरह पहचानते थे। राजस्थान और पाकिस्तान की सीमा पर रेत के टीलों के बीच रहने वाले हरिजनों और गोपालक मुसलमानों से उनकी मित्रता थी।

🔴 जो अभावग्रस्त हैं, भूख और गरीबी के शिकार है दलित और शोषित हैं, पिछडे हुए हैं, अझान और अंधविश्वास के पाश में जकड़े हुए है, ऐसे लाखों स्त्री पुरुषों और बच्चों का माणिक्यलाल जी ने प्यार और आदर पाया था। उनकी मृत्यु पर उन सबने यह महसूस कि उनकी सुध लेने वाला उनका आत्मीय और उनका सहारा उनसे छिन गया।

🔵 माणिक्यलाल वर्मा के निधन पर राजस्थान में सरकारी दफ्तरों पर झंडे झुका दिए गए और उनकी अत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की गई। राष्ट्रपति ने उन्हें पद्ग भूषण की उपाधि से अलंकृत था। यह राजकीय सम्मान की बात विस्मृत हो जायेगी, किंतु गरीबों के लिए उनके दिल में जो तड़प थी, वह बिजली की तरह कौंधती रहेगी। राजस्थान में बिजोलिया ने हिंदुस्तान में सत्याग्रह का शंख सबसे पहले फूँका था और माणिक्यलाल जी राजस्थान को और देश को इसी बिजोलिया को देन थे।

🔴 उन्होंने सामंती अत्याचारों से मोर्चा लिया और अकथनीय कष्ट झेलै। उनका एक पाँव जेल के भीतर और दूसरा बाहर रहा। स्वराज्य आया, तब भी वे चैन से नहीं बैठे। पिछड़ी जातियों को ऊँचा उठाने के लिये रात-दिन भटकते रहे। गाड़िया लुहारों को वसाने का उन्होंने भगीरथ प्रयत्न किया। गाड़िया लुहार राणा प्रताप के लिए तोप-बंदूक बनाते थे। चित्तौड़ दुर्ग पर जब मुगलों ने अधिकार कर लिया तब वे यह प्रतिज्ञा करके निकल पडे कि जब तक यह दुर्ग पुन: स्वतंत्र न होगा वे कहीं घर बनाकर नहीं रहेंगे। माणिक्य लाल जी ने गाडिया लुहारों के वनवास को समाप्त कराया। वह नेहरू जी को खींचकर चित्तौड दुर्ग पर ले गए और हजारों गाडिया लुहारों की उपस्थिति में दुर्ग पर राष्ट्रीय झंडा फहराकर उन्हें विश्वास दिलाया कि सैकडों वर्षों बाद उनकी प्रतिज्ञा पूरी हुई और वे अब घर बनाकर बस सकते है।

🔵 आज से कोई ३५ वर्ष पहले की बात है। रेलवे स्टेशन से करीब एक सौ मील दूर भूतपूर्व डुंगरपुर रियासत में भीलों की बस्ती के मध्य खड़लाई की पाल में एक पहाड़ी की टेकरी पर माणिक्य लाल जी ने अपना डेरा डाला था। ऊपर खुला आकाश, उसकी तलहटी में एक नाला बहता था। माणिक्य लाल जी में यह चमत्कारी गुण था कि बात ही बात में लोगों के घरों और उनके दिलों में प्रविष्ट हो जाते थे। आते-जाते भीलों ने जल्दी ही जंगल से लकडी़ काटकर उनके लिए झोंपडा खडा़ कर दिया और एकाएक दो-दो मील दूर से भी बालक और बालिकाऐं उनके विद्यालय में पढ़ने आने लगे। अंधेरी रात में शेर पहाड़ी नाले पर पानी पीने के लिए पास से गुजर जाता, परंतु माणिक्य लाल जी निर्भय होकर अपनी झोंपडी में सोते रहते।

🔴 वे अपने पीछे ऐसे समर्पित जीवन की मशाल जला गए, जो चिरकाल तक बराबर रोशनी देती रहेगी, उनका सेवाभावी जीवन तरुणों को अन्याय और अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष के लिये सदैव प्रेरणादायी सिद्ध होगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 123, 124

👉 सच्चे जीवन की झलक

🔵 श्रीमती लस्सीचेस इंगलैंड की निवासी थीं। उनके पति भारतीय सेना में मेजर के पद पर थे। भौतिकवाद की समर्थक ब्रिटिश सभ्यता में पली नारी और फिर एक फौजी मेजर की पत्नी-लस्सीचेस, बडे़ ठाठ-बाट से रहतीं और सैर-सपाटा करती। जिंदगी उनके लिए एक उत्सव के समान थी और उसे उसी प्रकार जी भी रही थीं।

🔴 श्रीमती लस्सीचेस को दो खास शौक थे। एक फिल्म देखना और दूसरा मित्रों को दावत देना। उनके घर आए दिन मित्रों की दावत होती रहती थी और हर नयी फिल्म को वे देखे बिना नहीं रहती थी। पैसे के संबंध मे लस्सीचेस पति पर ही निर्भर न रहती थी। उन्हें अपने पिता से वसीयत में एक लबी रकम मिली हुई थी। पैसे की उन्हें जरा भी कमी नहीं थी।

🔵 एक लंबे अरसे तक यह जीवन चलता रहा, फिर सहसा बदल गया। यह परिवर्तन उनमें तब हुआ, जब वे कुछ दिन भारत मे पति के साथ रहकर लंदन वापिस आ गई। भारत प्रवास के बाद उन्होंने शराब पीना छोड दिया। रंगीन कीमती और तड़क भड़क वाले कपडों से उन्हें अरुचि हो गई। रहन-सहन और आचार, विचार में शालीनता आ गई। उनका प्रतिमास खर्च हजारों से घटकर सैकडों मे आ गया। भारत से आने के बाद श्रीमती लस्सीचेस में एक अप्रत्याशित संतत्व आ गया।

🔴 परिचितों, मित्रों और सखी-सहेलियों को श्रीमती चेस के इस आमूल एवं आकस्मिक परिवर्तन पर बडा आश्चर्य हुआ, वे अपने लिए इस आश्चर्य से व्यग्र होकर पूछ ही बैठे- ''श्रीमती चैस! आप जब से भारत प्रवास से वापस आई है, तब से आपका जीवन ही बदल गया है। आखिर ऐसा कौन-सा शोक आपके हृदय मे घुस बैठा है, जिससे आप जिंदगी से उदासीन हो गई हैं ?"

🔵 श्रीमती लस्सीचेस ने मित्रों को धैर्यपूर्वक सुना और उत्तर दिया- ''भारत-प्रवास के समय मैं उसके प्राचीन साहित्य को पढ़ चुकी हूँ और उसकी प्रेरणा से मुझे यह प्रकाश मिला है, जो शांति सादगी में है, उसका रंचमात्र प्रदर्शन में नहीं है। फिर भी अभी मेरा जीवन अपूर्ण है। कुछ ही समय में मैं उसकी पूर्ति करने का कार्यक्रम चलाने वाली हूँ।'

🔴 और वास्तव में कुछ ही समय बाद लोगों ने देखा कि श्रीमती लस्सीचेस ने समाज-सेवा का कार्यक्रम शुरू कर दिया। उन्होने लंदन की मजदूर तथा गरीब बस्तियों में जाना और स्वच्छता तथा शिक्षा का प्रचार करना प्रारंभ कर दिया। वे गरीब तथा महिला-मजदूरों और उनके बच्चों को स्वयं पढातीं और शराब य सिगरेट पीने से विरत करती। अपने जीवन का उदाहरण देकर उन्हें जीवन का सच्चा मार्ग बतलाती और अनुभव कराती कि गरीबी में भी सुंदरतापूर्वक रहा जा सकता है, यदि उसे दुर्व्यसनों से दूषित न किया जाए।

🔵 श्रीमती लस्सीचेस अपने शौक आदि पर जो रुपया खर्च करती थीं, वह अब अपने पर खर्च न करके समाज-सेवा व गरीबों की सेवा में खर्च करने लगीं जिससे उन्हें न केवल आत्म-शांति ही मिलती बल्कि वे अपने सेवा-क्षेत्र में देवी के रूप मे पूजी जाने लगीं।

🔴 कुछ समय बाद उनके पति का देहांत हो गया। उनके मित्रों तथा संबंधियो ने बहुत कुछ समझाया कि वे फिर विवाह कर लें और अपनी संपत्ति का जी भरकर उपभोग करें। श्रीमती चेस इसके लिए किसी प्रकार भी तैयार न हुई। उन्होंने बार-बार यही उत्तर दिया कि मै समाज की हूँ मेरी संपत्ति समाज की है, उसे फूँकने और बहाने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। अब इसका व्यक्तिगत जीवन में उपभोग करने का प्रश्न ही नही उठता। हाँ इसका सामाजिक हित में सदुपयोग अवश्य करूगी। श्रीमती चेस की इस दृढ़ता एवं उच्चता से प्रप्रगिवत होकर उनके संपर्क में अन्ने वाली कितनी ही महिलाओं का जीवन बदला तथा सुधर गया।

🔵 कुछ समय बाद जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी वसीयत के अनुसार उनकी लाखों की संपत्ति इंग्लैंड के गिरजाघरों को बाँट दी गई जिन्हें उस देश में सच्चे धर्म, गरीबों की सहायता तथा उन विधवाओं की मदद में खर्च करने के लिए निर्देश दिया गया था, जो पुन: विवाह न कर शेष जीवन उन्हीं की तरह समाज की सेवा में लगाने की इच्छूक हों।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 121, 122

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

👉 न्याय सबके लिए एक जैसा

🔵 राज-कर्मचारियों को विशेष अधिकर मिलते है, वह पद का कर्तव्य सुविधापूर्वक निभा सकने के लिये होते हैं। व्यक्ति की प्रतिष्ठा से उन अधिकारों का कोई संबध नहीं रहता। इस तथ्य को सिद्धांत रूप में मानने वाले अधिकारीगण ही अपने कर्तव्यों का पालन नेकी और ईमानदारी से कर सकते हैं। अधिकारों से अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता या प्रतिष्ठा को ऊंचा दिखाने की स्वार्थपूर्ण भावना के कारण ही भ्रष्टाचार बढ़ता है और जन-साधारण में बुराइयों के प्रसार का साहस बढ़ता है।

🔴 लोकतंत्र मे कर्तव्य के पालन की अवहेलना की जाती है, तभी वह जनता के लिए घातक बनता है। इसलिए उसकी सफलता का सारा भार उन अधिकारियों पर आता है, जो कानून और व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के लिए नियुक्त किए जाते हैं। इनमे जितनी अधिक ईमानदारी और इंसाफ पसंदगी होगी लोकतंत्र उतना ही खुशहाल होगा, उतना ही अधिक जनता को सुविधाएं मिलेंगी। राष्टीय जीवन में व्यापक तौर पर नैतिकता का प्रसार भी बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि अधिकारी वर्ग अपने उत्तरदायित्वों का पालन किस निष्ठा के साथ करते हैं?

🔵 ऐसे उदाहरणों में एक उदाहरण कोंडागिल (मद्रास) के सत्र न्यायाधीश श्री के० एम० सजीवैया का भी है, जिन्होंने कर्तव्य पालन में सर्वोत्कृष्ट ईमानदारी का परिचय दिया। कसौटी का समय तय आया, जब उनकी अदालत में एक ऐसा अभियुक्त पेश किया गया जो उन्हीं का पुत्र था और एक मित्र के फर्म में चोरी करने के आरोप में पकडा गया था। अभियुक्त की पैरवी उसके चाचा कर रहे थे। पुलिस केस था, इसलिये मामले का सारा उत्तरदायित्व भी सरकार पर ही था।

🔴 सरकारी वकील ने मुकदमा प्रारंभ होने पर आपत्ति कि चूँकि अभियुक्त का सबंध सीधे जज महोदय से है इसलिये उसे दूसरी अदालत में बदल दिया जाना चाहिए। माननीय जज के लिये यह परीक्षा का समय था। उन्होंने विचार किया कि यदि अपने प्रभाव का उपयोग करना हो तो वह दूसरी अदालत में भी संभव है, पर यदि ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्य पालन की परीक्षा ही होती है तो अभियुक्त के रूप मे भले ही उनका पुत्र प्रस्तुत हो, उन्हें मुकदमा करना चाहिए और उसमें उतनी ही कठोरता बरती जानी चाहिए जितनी अन्य अभियुक्तों के साथ होती है।

🔵 विद्वान जज ने दलील दी कि मामला दूसरी अदालत में तभी जा सकता है, जब यहाँ का फैसला असंतोषजनक हो, अपने कार्य को दूसरे पर टालने की अनावश्यकता का उन्होंने विरोध किया, जिससे मामले की सुनवाई उसी अदालत में हुई। प्रत्येक तारीख के बाद जब जज साहब घर लौटते तो उनकी धर्मपत्नी आग्रह करती- ''आपका ही पुत्र है, इसे बचाने की जिम्मेदारी भी तो आप पर ही है।'' अपने उत्तर में जज साहब हलकी-सी मुस्कान के साथ आश्वासन देते, वे इसके लिए प्रयत्नशील रहेंगे।

🔴 आखिर वह दिन आया जब फैसले की तिथि आ पडी। कचहरी में जज साहब की पत्नी के अतिरिक्त उनके बहुत-से संबंधी भी एकत्रित थे। फैसला करने से पहले उन पर दबाव भी डाला गया, पर जब उन्होंने अपराधी बेटे को २ वर्ष सख्त कैद की सजा सुनाई तो सारे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया। न्यायालय की कार्यवाही पर सरकारी कर्मचारियों ने जहाँ संतोष व्यक्त किया और जज साहब की न्यायप्रियता की प्रशंसा हुई, वही उनकी धर्मपत्नी और संबंधियो ने उन पर तीखे आक्षेप भी किए। जज साहब ने अपने कुटुंबियों से कहा-अभियुक्त का पिता होने के कारण मेरी उसके साथ सहानुभूति थी, किंतु न्यायालय में मेरा उसका सबंध अपराधी और न्यायाधीश का होता था। वह स्थान मुझे न्याय के लिए मिला है, उसमे अपने-पराये का प्रश्न नही उठता।। सब चुप हो गये। सभी ने जज साहब के कर्तव्य पालन पर संतोष ही अनुभव किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 119, 120

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

👉 राष्ट्र निर्माण के लिए राष्ट्र भाषा की प्रगति अनिवार्य है

🔵 बाबू राजेंद्र प्रसाद का विद्यारंभ संस्कार उस समय के अनुसार एक मौलवी के पास उर्दू-फारसी में कराया गया था। नतीजा यह हुआ कि वे स्कूल और कालेज में भी इंटर तक अंग्रेजी के साथ उर्दू-फारसी ही पढ़ते चले गए। पर जब वे कलकत्ता जाकर बी० ए० में भर्ती हुए, तो उनके सामने कई भाषाओं में से एक चुनने का प्रश्न आया। यद्यपि उन्होंने अब तक हिंदी नही पढी़ थी और कालेज में हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था नहीं थी, तो भी उनका सुझाव विशेष रूप से हिंदी की ही तरफ हुआ। संभवत: इसका कारण उनकी राष्ट्रीय और जातीय भावनाएँ ही थी। उनके कई मित्रों ने कहा कि तुम हिंदी लेकर बडी़ गलती कर रहे हो। जब अब तक तुमने हिंदी नहीं पढी़ तब एकाएक बी० ए० में लेने का नतीजा यह होगा कि तुम्हे बहुत कम नंबर मिलेंगे और तुम्हारा डिवीजन खराब हो जायेगा। पर राजेंद्र बाबू ने उनका समाधान यह कहकर दिया कि हिंदी तो हमारी मातृभाषा है उसके न सीख सकने या नंबर कम आने का संदेह करना व्यर्थ है। हमको आखिर अपनी इस मातृभूमि और मातृभाषा की हृदय से सेवा करके अपना कर्तव्य पालन करना ही होगा। तब उसको बिना सीखे किस प्रकार काम चल सकता है ?

🔴 उन्होंने सब विचार त्यागकर हिंदी ही ली और घर पर निजी तौर पर अध्ययन करके बहुत अच्छे नंबरों से पास हो गये।

🔵 राजेद्र बाबू ने जैसा सोचा था, वही कुछ समय पश्चात् सामने आया। राष्ट्रीय आंदोलन के साथ देश में राष्ट्रभाषा की आवश्यकता और उसके प्रचार के लिये प्रयत्न करने की तरफ नेताओं का ध्यान गया। श्री पुरुषोत्तमदास जी टंडन तथा उनके सहयोगियों ने प्रयाग मे हिंदी-साहित्य सम्मेलन की स्थापना की जिसका उद्देश्य राष्ट्रभाषा के रूप मे समस्त भारत में हिंदी का प्रचार करना था।

🔴 सम्मेलन का तीसरा वार्षिकोत्सव सन् १९१३ मे कलकता में हुआ और राजेंद्र बाबू को स्वागत समिति का प्रधानमंत्री बनाया गया। उसी समय पटना में आल इंडिया कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था,। पर आप हिदी साहित्य सम्मेलन की व्यवस्था में इतने व्यस्त रहे कि पटना न जा सके। सन् १९२३ में "हिंदी साहित्य सम्मेलन" के , सभापति भी बनाए गए। प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलनों के कई अधिवेशनों में आपने अध्यक्षता की थी।

🔵 आपने जो हिंदी प्रचार का काम १९१३ मे उठाया था वह आजन्म चलता ही रहा। आगे चलकर आप ही सम्मेलन की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष बनाए गए और उसके द्वारा मदास तथा आसाम जैसे दूरवर्ती प्रांतो में वर्षों तक हिंदी के पठनपाठन और प्रचार की व्यवस्था की गई। कुछ लोग उस समय इस प्रचार की उपयोगिता न समझकर, उसकी विपरीत आलोचना करते थे। ऐसे लोगों को उत्तर देते हुए आपने लिखा था- "राष्ट्र के लिये राष्ट्रभाषा आवश्यक है और वह भाषा हिंदी ही हो सकती है।" इसमें दक्षिण वालों ने पूरा सहयोग दिया। इधर कई वर्षों से इस कार्य में होने वाला वहाँ का सारा खर्च वहाँ के लोगों से ही मिल जाता है और उत्तर भारत से वहाँ पर धन नहीं भेजना पडता। मैं समझता हूँ कि इसी प्रकार अन्य हिंदी प्रांतों में भी कुछ दिनों काम करने के बाद हमारा वैसा ही अनुभव होगा। हिंदी-प्रचार को मैं भीख की झोली नही मानता और न यह मानता हूँ कि इसके पीछे कोई द्वेष बुद्धि है। इसका एक उद्देश्य है सारे देश के लिए एक राष्ट्रभाषा का प्रचार। किसी भी प्रांतीय भाषा को मिटाने ता कमजोर करने की इच्छा किसी के दिल में स्वप्न में भी नहीं आई और न आएगी। हम राष्ट्र के प्रति अपना कर्त्तव्य मात्र कर रहे है और उसे करते रहने में ही हमारा और देश का कल्याण है।''

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 118, 119

रविवार, 2 अप्रैल 2017

👉 अक्का महादेवी- जिसने वासना पर विजय पाई

🔵 कर्नाटक प्रांत के एक छोटे-से ग्राम उद्रुतडी में एक साधारण गृहस्थ के घर एक कन्या ने जन्म लिया-अक्का महादेवी उसका नाम रखा गया।

🔴 अक्का को उनके पिता श्री निर्मल ने संस्कृत की शिक्षा दिलाई। उससे धार्मिक संस्कार बल पा गए, उनके मन मे आध्यात्मिक जिज्ञासाएँ जोर पकड़ गई, उन्होंने सत्य की शोध का निश्चय कर लिया और उसी के फलस्वरूप वे ईश्वर-भक्ति, साधना और योगाभ्यास में लग गई।

🔵 आज हमें पाश्चात्य सभ्यता बंदी बना रही है। उन दिनों भारतवर्ष में मुस्लिम संस्कृति और सभ्यता की आँधी आई हुई थी। मुसलमान शासकों की दमन नीति से भयभीत भारतीय अपने धर्म अपनी संस्कृति को तेजी से छोड़ते जा रहे थे। ऐसे लोग थोडे़ ही रह गये जिनके मन में इस धार्मिक अवसान के प्रति चिंता और क्षोभ रहा हो, जिन्होंने अपने धर्म और संस्कृति के प्रति त्याग भावना का प्रदर्शन किया हो।

🔴 अक्का महादेवी-एक साधारण-सी ग्राम्य बाला ने प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर, ईश्वर उपासना और समाज सेवा में रत रहकर अपने धार्मिक गौरव को बढायेगी।

🔵 अक्का का सौंदय वैसे ही अद्वितीय था, उस पर संयम और सदाचार की तेजस्विता की कांति सोने में सुहागा बन गई। उनके सौदर्य की तुलना राजकुमारियों से की जाने लगी।

🔴 तत्कालीन कर्नाटक के राजा कौशिक को अक्का महादेवी के अद्वितीय सौदर्य का पता चला तो उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। साधारण लोगों ने इसे अक्का का महान् सौभाग्य समझा पर अक्का ने उस प्रलोभन को भगवान् की उपस्थित की हुई परीक्षा अनुभव की। उन्होंने विचार करके देखा-सांसारिकता और धर्म-सेवा दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती। भोग और योग में कोई संबंध नहीं। यदि अपनी संस्कृति को जीवन देना है तो सांसारिक सुखोपभोग को बढ़ाया नहीं जा सकता।

🔵 इच्छाओं को बलिदान करके ही उस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। यह विचार आते ही उन्होने कौशिक का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

🔴 जिनके उद्देश्य छोटे और तृष्णा-वासनाओं से घिरे हुए हों, वह बेचारे त्याग तपश्चर्या का महत्त्व क्या जान सकते हैं, कौशिक ने इसे अपना अपमान समझा। उसने अक्का के माता-पिता को बंदी बनाकर कारागार में डलवाकर एक बार पुन: संदेश भेजा- ''अब भी संबंध स्वीकार कर लो अन्यथा तुम्हारे माता-पिता का वध कर दिया जायेगा। ''

🔵 अक्का ने विचार किया-लोक में अपने माता-पिता, भाई-बंधु भी आते है। सबके कल्याण की बात सोंचें तो उनके ही कल्याण को क्यों भुलाऐं ? सचमुच यह बडा सार्थक भाव था उसे भुलाने का भाव ही पलायनवाद के रूप में इस देश में पनपा तो भी उन्होंने सूझ से काम लिया-इन्होंने एक शर्त पर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया कि वह समाज-सेवा, संयम और साधना का परित्याग न करेगी। कौशिक ने यह बात मान ली।

🔴 विवाह उन्होंने कर लिया पर अपनी निष्ठा से अपने कामुक पति को बदलकर संत वना दिया। अक्का और कौशिक दोनों ने मिलकर अपने धर्म, अपनी संस्कृति का सर्वत्र खूब प्रसार किया, उसी का यह फल है कि कर्नाटक प्रांत अभी भी पाश्चात्य सभ्यता के बुरे रंग से बहुत कुछ बचा हुआ है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

👉 रवींद्र की काव्य-साधना-गीतांजलि

🔴 आठ-नौ साल की आयु के रवींद्रनाथ को जब स्कूल में पढ़ने को भेजा गया तो शीघ्र ही एक दिन वहाँ से लौटने पर उन्होंने कहा- पिताजी मैं कल से स्कूल में पढ़ने नहीं जाऊंगा। वह तो कारागार है। वहाँ बालकों को दंड दिया जाता है, उन्हें बेंचों पर खडा कर दिया जाता है और फिर उन पर कक्षा की सभी स्लेटों का बोझ लाद दिया जाता है और फिर वहाँ कोई आकर्षण भी तो नहीं है। वही डेस्क, वही बेंच, सुबह से शाम तक एक-सी ही बातें होती रहती हैं।

🔵 पिता ने पुत्र की व्यथा को समझ लिया और शिक्षकों से कह दिया- यह बालक पढने के लिए पैदा नहीं हुआ। हम स्कूल वालों को जो वेतन देते हैं, वह केवल इसलिये है कि यह वहाँ बैठा रहे।'' पुस्तकों को याद करने और रटने के बजाय बाल्यावस्था में रविबाबू अपने विशाल भवन के एक बरामदे में रखी हुई पुरानी पालकी में घुसकर बैठ जाते। उस अँधेरे स्थान में पहुँचकर वे कल्पनाओं में निमग्न हो जाते। उस अवस्था में उनकी पालकी सैकडों कहारों के कंधों पर लदी हुई अनेक वन, पर्वतों को पार करती पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक जा पहुँचकर स्थल का मार्ग समाप्त हो जाता और कहार कहने लगते है- अब आगे रास्ता नहीं है, अन्नदाता! सब तरफ जल ही जल ही दीख पड़ता है।'' पर बालक रवींद्र कल्पना की उडान में कब मानने वाला था ? उसकी पालकी असीम जलराशि पर तैरने लगती। कितनी ही प्रचंड लहरें पालकी से टकराती कितने ही भीषण तूफान आते, किंतु उसकी पालकी बराबर आगे बढ़ती हुई उस पार पहुँच जाती। उस प्रदेश के सुंदर भवन, बाग, संगीत और गान-वाद्य की स्वर लहरी नृत्य आदि उसे आनंद विभोर कर देते। वह स्वयं भी मस्त होकर कुछ गुनगुनाने लगता।

🔴 और कुछ साल बाद वास्तव में ऐसा समय आया जब बाल्यावस्था का स्वप्न साकार होने लगा। कवि अपनी रचनाओं के बल पर जहाज रूपी पालकी द्वारा योरोप, अमरीका तक जा पहुँचे, वहाँ के बडे-बडे विद्वानों, गुणवानों, श्रीमानों ने आपका स्वागत-सत्कार बडे प्रेम से किया। वहाँ के नर-नारी आपकी प्रतिभा और अपूर्व सौंदर्य पर मुग्ध हो गये और सैकड़ों विशाल सभाओं और गोष्ठियों में उन देशों के सर्वोत्तम संगीत और कला-प्रदर्शन द्वारा आपका स्वागत किया गया। धार्मिक जनों को आप ईसाइयों के किसी प्राचीन संत की तरह जान पडते थे और वे बड़ी श्रद्धा से आपके चोगे (लबादा) का दामन चूमने लगते थे।

🔵 कवि जब अपनी "गीतांजलि" की कविताओं को गाकर सुनाने लगते तो श्रोता मुग्ध होकर भाव-विभोर हो जाते और चारों तरफ से रवि बाबू पर साधुवादों की वर्षा होने लगती। अंत में वहाँ का विद्वान् समाज इनकी बहुमुखी प्रतिभा और योग्यता से इतना प्रभावित हुआ कि उस महाद्वीप का सर्वश्रेष्ठ समझा जाने वाला सवा लाख डॉलर का "नोबल पुरस्कार" "गीतांजलि" के उपलक्ष्य में उन्हीं को प्रदान किया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने विद्या की सबसे बडी़ उपाधि डी० लिट० (डॉक्टर आफ लिटरेचर) प्रदान की और समस्त देश ने एक स्वर से उनको "विश्वकवि" घोषित कर दिया। "गीतांजलि'' की महिमा-गान करते हुए कहा गया-

🔴 'यह आध्यात्मिक भावनाओं का सार है। इसमें वैष्णव कवियों की प्रेम भावना का अनुपम सम्मिश्रण है। उपनिषदों के सारगर्भित विचारों का इसमें बड़ी मार्मिकता से समावेश किया गया है और बताया गया है कि जो मनुष्य संपूर्ण प्राणियों में ईश्वर को देखता है। वह कभी न तो पाप कर सकता है और न पाप से प्रभावित हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को मृत्यु तक का भय नहीं जान पडता, क्योंकि भगवान् को अपने अंतर में देख लेने पर वह अमर जीवन हो जाता है। आज भी गीतांजलि से यही वाणी मुखरित हो रही है।

 🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ ११६, ११७

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

👉 अनावश्यक वस्तुओं का क्या करूँ?

🔴 बल्लभाचार्य के समय में अनेक वैष्णव भक्त हुए पर उनमें कुंभनदास का नाम आज भी बडी़ श्रद्धा से लिया जाता है। यद्यपि वह परिवार में रहते थे पर परिवार उनमें नहीं। कषि कार्य करने के बाद भी वह इतना समय बचा लेते थे कि जिसमें भक्ति के अनेक सुंदर-सुंदर गीतों की रचना कर सकें।

🔵 जब वे अपने भक्ति-रस से पूर्ण गीतों को मधुर कंठ से गाते थे तो राह चलते लोग खड़े होकर सुनने लगते थे। भगवान् के भक्त निर्धनता को वरदान समझते हैं। उनका विश्वास है कि अभाव का जीवन जीने वाले भक्तों की ईश्वर को याद सदैव आती रहती है।

🔴 हाँ कुंभनदास भी भौतिक संपदाओं से वंचित थे। वह इतने निर्धन थे कि मुख देखने के लिए एक दर्पण तक न खरीद सकते थे। स्नान के बाद जब कभी चंदन लगाने की आवश्यकता होती तो किसी पात्र में जल भरकर अपना चेहरा देखते थे।

🔵 जल से भरे पात्र को सामने रखे कुंभनदास तिलक लगा रहे थे कि महाराजा मानसिंह उनके दर्शन हेतु पधार गये। महाराजा ने आकर अभिवादन में 'जय श्रीकृष्ण' कहा-उत्तर में भक्त ने भी उन्हें पास बैठने का संकेत देते हुए 'जय श्री कृष्ण' कहा। पर जल्दी में उस पात्र का जल फैल गया। अतः कुंभनदास ने अपनी पुत्री से पुनः जल भरकर लाने को कहा। राजा को वस्तु स्थिति समझते देर न लगी। उन्हें यह जानकर बडा दुःख हुआ कि भगवान् का भक्त एक छोटी-सी वस्तु दर्पण के अभाव में कैसा कष्ट उठा रहा है ? राजा मानसिंह ने अपने महल में एक सेवक भेजकर स्वर्णजटित दर्पण मँगवाया और भक्त के चरणों मे अर्पित कर क्षमा माँगी।

🔴 कुंभनदास बोले-'राजन्! हम जैसे निर्धन व्यक्ति के घर में इतनी मूल्यवान वस्तु क्या शोभा दे सकती है ?
 
🔵 मेरी तरफ से यह तुच्छ भेंट तो आपको स्वीकार ही करनी पडेगी। आपको जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता हो उनकी सूची दे दीजिए। घर जाकर मैं आपकी सुख-सुविधा का पूर्ण ध्यान रखकर समस्त वस्तुओं की व्यवस्था करवा दूँगा। राजा मानसिंह ने आग्रह के स्वर में अपनी बात कही।

🔴 'राजन् निश्चिंत रहिए और अपनी जनता के प्रति उदार तथा कर्तव्य की भावना बनाए रखिए। मुझे किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं, भगवान् की कृपा से सब प्रकार आनंद है। आप देखते नहीं भगवान का नाम स्मरण हेतु माला, आचमन और पूजन के लिए पंचपात्र बैठने के लिए आसन आदि सभी उपयोगी वस्तुऐं तो हैं। कृपया आप यह दर्पण वापिस ले जाइए। जिस दिन भक्त भी इसी प्रकार का भोग विलासमय जीवन व्यतीत करने लगेंगे उन दिन उनकी भक्ति समाप्त हो जायेगी।

👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच ...