शनिवार, 30 सितंबर 2017

👉 व्यवहारिक ज्ञान भी चाहिए।

🔴 एक पण्डित जी को नाव से नदी पार करनी थी। कोई और यात्री था नहीं। अकेले पण्डित जी को लेकर चलने में मल्लाह तैयार नहीं हो रहा था। पंडित जी का जाना आवश्यक था। मल्लाह ने कहा- कुछ अतिरिक्त मजदूरी मिले तो चलूँ। पंडित जी ने कहा- उतराई के पैसों के अतिरिक्त तुम्हें बड़े सुन्दर ज्ञान भरे उपदेश भी दूँगा। मल्लाह ने बैठे से बेगार भली वाली बात सोचकर नाव खोली और पंडित जी को उस पर ले चला।

🔵 रास्ते में पंडित जी उपदेश करने लगे। उन्होंने मल्लाह से पूछा- तुम कुछ पूजा पाठ जानते हो? उसने उत्तर दिया, "नहीं महाराज"। पंडित जी बोले- तब तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग व्यर्थ चला गया। पंडित ने फिर पूछा- कुछ पढ़ना लिखना जानते हो? मल्लाह ने कहा- नहीं महाराज। पंडित जी ने कहा- तो तुम्हारे जीवन का एक तिहाई भाग और व्यर्थ चला गया। अब दो तिहाई जीवन व्यर्थ गँवा देने के बाद एक तिहाई ही शेष है, उसका सदुपयोग करो।

🔴 पंडित जी का उपदेश चल ही रहा था कि नाव एक चट्टान से टकराकर टूट गई और पंडित जी पानी में डूबने लगे। उन्हें पकड़ते हुए मल्लाह ने पूछा- महाराज तैरना जानते हो? उनने कहा- नहीं मल्लाह उन्हें पीठ पर रखकर पार लगाने लगा और बोला- महाराज! तैरना न जानने के कारण आपका तो पूरा ही जीवन व्यर्थ चला गया होता। उपदेश करना सीखने के साथ-साथ कुछ हाथ पैर चलाना भी सीखना चाहिए था।

🔵 केवल दार्शनिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, मनुष्य को जीवन समस्याओं को सुलझाने की व्यवहारिक योग्यता भी प्राप्त करनी चाहिए।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 2)

🔴 संसार में सभी प्रकार के मनुष्य हैं। मूर्ख-विद्वान, रोगी-स्वस्थ, पापी-पुण्यात्मा, कायर-वीर, कटुवादी नम्र, चोर-ईमानदार, निन्दनीय-आदरास्पद, स्वधर्मी-विधर्मी, दया पात्र-दंडनीय, शुष्क-सरस, भोगी-त्यागी आदि परस्पर विरोधी स्थितियों के मनुष्य भरे पड़े हैं। उनकी स्थिति को देखकर तदनुसार उनसे भाषण, व्यवहार एवं सहयोग करें। उनकी स्थिति के आधार पर ही उन के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित करें।

🔵 कपट और असहिष्णुता यह दो बहुत बड़े पातक हैं। इन दोनों से बचने के लिए गायत्री के ‘गो’ अक्षर में निर्देश किया गया है। धोखा, विश्वासघात, छल, ढोंग, पाखण्ड यह मनुष्यता को कलंकित करने वाली सबसे निकृष्ट कोटि की कायरता एवं कमजोरी है। जिसको हम बुरा समझते हैं उससे लड़ाई रखें तो इतना हर्ज नहीं, परन्तु मित्र बनकर, मिले रहकर, मीठी-मीठी बातों से धोखे में रखकर उसका अनर्थ कर डालने में जो पाप है वह निष्कृष्ट कोटि का है। अनेक व्यक्ति ऊपर से मिले रहते हैं, हितैषी बनते हैं और भीतर ही भीतर छुरी चलाते हैं। बाहर से मित्र बनते हैं भीतर से शत्रु का काम करते हैं। विश्वास देते हैं कि हम तुम्हारे प्रति इस प्रकार का व्यवहार करेंगे परन्तु पीछे अपने वचन को भंग करके उसके विपरीत कार्य कर डालते हैं।

🔴 आजकल मनुष्य बड़ा कायर हो गया है। उसकी दुष्टता अब मैदानी लड़ाई में दृष्टिगोचर नहीं होती। प्राचीन काल में लोग जिनसे द्वेष करते थे, जिसका अहित करना चाहते थे, उसे पूर्व चेतावनी देकर मैदान में लड़ते निपटते थे। पर आज तो वीरता का दर्शन दुर्लभ हो रहा है। विश्वास दिलाकर, मित्र बनकर, बहका-फुसलाकर, किसी को अपने चंगुल में फँसा लेना और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उसके प्राणों तक का ग्राहक बन जाना, आज का एक व्यापक रिवाज हो गया है। जिधर दृष्टि उठाकर देखिए उधर ही छल, कपट, धोखा, विश्वासघात का बोल बाला दीखता है। गायत्री कहती है कि यह आत्मिक कायरता, मनुष्यता के पतन का निकृष्टतम चिन्ह है। इससे ऊपर उठे बिना कोई व्यक्ति ‘सच्चा मनुष्य’ नहीं कहला सकता।

🔵 किसी की धरोहर मार लेना, विष खिला देना, पहले से कोई वचन देकर समय पर उसे तोड़ देना, असली बताकर नकली चीज देना, मित्र बनकर शत्रुता के काम करना, यह बातें मनुष्यता के नाम पर कलंक हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1952/December/v1.2

👉 आज का सद्चिंतन 30 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Sep 2017


👉 जीवन के दुःख

🔴 एक बार एक नवयुवक किसी संत के पास पहुंचा और बोला.......
                 
🔵 “महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं...

🔴 संत बोले, “पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो ” युवक ने ऐसा ही किया...

🔵 “इसका स्वाद कैसा लगा?”, संत ने पुछा...?

🔴 “बहुत ही खराब … एकदम खारा .” – युवक थूकते हुए बोला .

🔵 संत मुस्कुराते हुए बोले , “एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक लेलो और मेरे पीछे -पीछे आओ.. “दोनों धीरे -धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए ...

🔴 चलो, अब इस नमक को पानी में दाल दो .”, संत ने निर्देश दिया।

🔵 युवक ने ऐसा ही किया...

🔴 “अब इस झील का पानी पियो .” , संत बोले...

🔵 युवक पानी पीने लगा …,

🔴 एक बार फिर संत ने पूछा ,: “ बताओ इसका स्वाद कैसा है , क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है...?”

🔵 “नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है ”, युवक बोला....

🔴 संत युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, “जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं; न इससे कम ना ज्यादा . जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है, बिलकुल वही. लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं. इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो… ग़्लास मत बने रहो झील बन जाओ !!!

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

👉 सभी जीव ईश्वर के प्यारे

🔵 फारस के सन्त नूरी अनल-हक (मैं ही ईश्वर हूँ) मंत्र का जप करते और दूसरों को भी ऐसा ही करने को कहते। यह बात कट्टरपन्थियों को बहुत बुरी लगी। वे लोग इस शिकायत को लेकर बादशाह के पास पहुँच गये। परन्तु सन्त और उनके अनुयायियों पर इसका जरा भी असर नहीं हुआ। बादशाह ने नाराज होकर सन्त तथा उसके सभी अनुयायियों को गिरफ्तार करके उन्हें मृत्युदण्ड की सजा सुना दी।

🔴 दण्ड के लिये नियत दिन सबको एक पंक्ति में खडा़ कर दिया गया। बादशाह ने जल्लाद से एक-एक करके सबका सिर तलवार से उडाने की आज्ञा की। जल्लाद जब पहले अनुयायि के पास गया और उसका सिर उडाने के लिए उसने ज्योंही तलवार उठाई, सन्त नूरी वहाँ जा पहुँच और उन्होंने जल्लाद बोला, "उतावले क्यों हो, मलंग! तुम्हारी बारी आने पर तुम्हारा भी सिर कलम कर दिया जाएगा।"

🔵 सन्त ने कहा, "मेरे गुरु ने मुझे नसीहत दी है कि दुनिया का हर इंसान एक समान है - न कोई बडा़ है, न कोई छोटा, इसलिए हर एक के साथ भाई जैसा बरतना चाहिए, किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं बरतना चाहिए। अपने प्यार को परिवार के सदस्यों पर ही नहीं उडे़लना चाहिए, बल्कि खुदा ने जिसको भी इस संसार में भेजा है, वे सभी मेरे प्यार के कबिल हैं। जिस आदमी का सिर तुम काट रहे थे, वह भी खुदा द्वारा भेजा हुआ है; वह मेरा सिर काटो और उसके बाद दूसरों पर तलवार उठाना।"

🔴 जल्लाद ने सुना, तो सोचने लगा - उलाह ने मुझे भी तो इस संसार में भेजा है, इसलिए ये सब मेरे भी तो भाई ही हुए और मैं जो इन भाइयों को मौत के घाट उतारने जा रहा हूँ - यह ठीक नहीं। उसने तलवार नीचे रख दी और बादशाह से कहा, "मैं अपने भाइयों का कत्ल करके दोजख में नहीं जाना चाहता। आप मेरा सिर उडा़ सकते हैं, मगर मैं इनका सिर नहीं उडा़ सकता।" इन शब्दों का बादशाह पर बडा़ गहरा असर पडा़ । उसे पछतावा होने लगा कि बेवजह ही उसके द्वारा इतने लोगों के कत्ल का गुनाह उसके द्वारा होने जा रहा था, लेकिन बेरहम माने जाने वाले जल्लाद ने उसकी आँखे खोल दी हैं। बादशाह ने सन्त से माफी माँगी और सबको सम्मान के साथ विदा किया।

🌹 राम कृष्ण वचनामृत से

👉 Cat sees a dream

🔴 A cat dreams that she has become a tiger and is hunting a fat goat. Barely had she tasted it when a fat dog came pouncing on her. She left the goat and ran and hid near her owner.

🔵 In the second dream she saw that she was a dog and has entered into her owner’s kitchen to taste the dishes kept there. Just then the owner came and started beating it black and blue. The owner came and woke up the crying cat. The cat woke up and realized that it was a dream. She said to her owner, “I’ll be what I am. Changing identity is full of dangers.”

🔴 We should always remember our original identity.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Sep 2017

🔵 लोगों की बुराई-भलाई इतना महत्व नहीं रखती जितनी हमारी दृष्टि, दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाए तो हर चीज अटपटी दिखाई देगी। रंगीन काँच का चश्मा पहन लिया जाए तो हर चीज उसी रंग की दिखाई देगी। पीलिया रोग वाले का चेहरा खून एवं मल-मूत्र ही पीला नहीं होता वरन् सभी चीजें उसे पीली दिखाई देने लगती हैं। कई व्यक्ति हर घड़ी किसी न किसी की निन्दा करते सुने जाते हैं, दूसरों के दोषों का वर्णन करने में उन्हें बड़ा मजा आता है, ऐसे लोग बहुधा अपने आपको आलोचक या सुधारक कहते हैं पर वस्तुतः बात दूसरी ही होती है। उनके मन में दूसरों के प्रति घृणा और द्वेष के भाव भरे होते हैं, वे ही दूसरों की निन्दा के रूप से बाहर निकलते रहते हैं।

🔴 जो आदमी लहसुन खाकर या शराब पीकर आया है, उसके मुँह में से इन पदार्थों की दुर्गन्ध स्पष्ट रूप से आती है। इसी प्रकार दुर्भावना युक्त ओछे आदमियों के मुख में से निन्दा, बुराई, दोष दर्शन, छिद्रान्वेषण की धारा ही प्रवाहित होती रहेगी। ऐसे लोग किसी की भलाई या सद्भावना पर विश्वास नहीं कर सकते, उन्हें सभी धूर्त या दुष्ट दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों को दोष दृष्टा ही कहा जायेगा। उनकी अपनी दुर्बलता उनके चारों ओर धूर्तता दुष्टता के रूप में बिखरी दिखाई पड़ती है।

🔵 दोषदर्शी दृष्टिकोण मनुष्य के लिए एक भारी विपत्ति के समान है। प्रेम और द्वेष छिपाये नहीं छिपते। दुर्भावों में वह शक्ति है कि जिसके प्रति उस तरह के भाव रखे जायें तो उस तक किसी न किसी प्रकार जा ही पहुँचते हैं और वह किसी दिन जान ही लेता है कि अमुक व्यक्ति मेरा निन्दक या द्वेषी है। यह जान लेने पर उसके मन में भी प्रतिक्रिया होती ही, वह भी शत्रुता करेगा। इस प्रकार उस दोष दर्शी के शत्रु ही चारों ओर बढ़ते जायेंगे। शत्रुता के साथ विपत्ति जुड़ी हुई है, जिसके जितने ज्यादा शत्रु होंगे वह उतना ही चिंतित, परेशान एवं आपत्तिग्रस्त रहेगा। उसके मार्ग में समय-समय पर अनेकों बाधाएं आती ही रहेंगी। उन्नति के मार्ग में सहयोग देने वालों की अपेक्षा रोड़े अटकाने वाले ही अधिक होंगे। ऐसी स्थिति अपने लिए उत्पन्न कर लेना कोई बुद्धिमता की बात नहीं है। निन्दात्मक दृष्टिकोण अपनाये रखना एक अबुद्धिमत्ता पूर्ण कार्य ही कहा जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 29 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Sep 2017


👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 1)

गोप्याः स्वायाँ मनोवृत्तीर्नासहिष्णुर्नरो भवेत्।
स्थिति मज्यस्य वै वीक्ष्य तदनुरुप माचरेत्॥

🔴 अर्थ— अपने मनोभावों को छिपाना नहीं चाहिए। मनुष्य को असहिष्णु नहीं होना चाहिए। दूसरों की परिस्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए।

🔵 अपने मनोभाव और मनोवृत्ति को छिपाना ही छल, कपट और पाप है। जैसा भाव भीतर है वैसा ही बाहर प्रकट कर दिया जाय तो वह पाप निवृत्ति का सबसे बड़ा राजमार्ग है। स्पष्ट और खरी कहने वाले, पेट में जैसा है वैसा ही मुँह से कह देने वाले लोग चाहे किसी को कितने ही बुरे लगें पर वे ईश्वर और आत्मा के आगे अपराधी नहीं ठहरते।

🔴 जो आत्मा पर असत्य का आवरण चढ़ाते रहते हैं, वे एक प्रकार के आत्म हत्यारे हैं। कोई व्यक्ति यदि अधिक रहस्यवादी हो, अधिक अपराधी कार्य करता हो तो भी उसके अपने कुछ ऐसे विश्वासी मित्र अवश्य होने चाहिए जिसके आगे अपने सब रहस्य प्रकट करके मन को हलका कर लिया करे। और उनकी सलाह से अपनी बुराइयों का निवारण कर सके।

🔵 प्रत्येक मनुष्य का दृष्टिकोण, विचार, अनुभव अभ्यास, ज्ञान, स्वार्थ, रुचि एवं संस्कार अलग-अलग होते हैं। इसलिए सबका सोचना एक प्रकार से नहीं हो सकता। इस तथ्य को समझते हुए हर व्यक्ति को दूसरों के प्रति सहिष्णु एवं उदार होना चाहिए। अपने से किसी भी अंश में मतभेद रखने वाले को मूर्ख, अज्ञानी, दुराग्रही, दुष्ट या विरोधी मान लेना उचित नहीं। ऐसी असहिष्णुता ही बहुधा झगड़ों की जड़ होती है। एक दूसरे के दृष्टिकोण के अन्तर को समझते हुए यथासंभव समझौते का मार्ग निकालना चाहिए। फिर जो मतभेद रह जायँ, उन्हें पीछे धीरे-धीरे सुलझाते रहने के लिए छोड़ देना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1952/December/v1.2

👉 सबसे बड़ा पुण्य:-

🔴 एक गांव मे एक बहुत गरीब सेठ रहता था जो कि किसी जमाने बहुत बड़ा धनवान था जब सेठ धनी था उस समय सेठ ने बहुत पुण्य किए। गउशाला बनवाई गरीबों को खाना खिलाया अनाथ आश्रम बनवाए और भी बहुत से पुण्य किए थे लेकिन जैसे जैसे समय गुजरा सेठ निर्धन हो गया।
                 
🔵 एक समय ऐसा आया कि राजा ने ऐलान किया कि यदि किसी व्यक्ति ने कोई पुण्य किए हैं तो वह अपने पुण्य बताए और अपने पुण्य का जो भी उचित फल है ले जाए।

🔴 यह बात जब सेठानी ने सुनी तो सेठानी सेठ को क़हा कि हमने तो बहुत पुण्य किए हैं तुम राजा के पास जाओ और अपने पुण्य बताकर उनका जो भी फल मिले ले आओ।

🔵 सेठ इस बात के लिए सहमत हो गया और दुसरे दिन राजा के महल जाने के लिए तैयार हो गया।

🔴 जब सेठ महल जाने लगा तो सेठानी ने सेठ के लिए चार रोटी बनाकर बांध दी कि रास्ते मे जब भुख लगी तो रोटी खा लेना.सेठ राजा के महल को रवाना हो गया गर्मी का समय दोपहर हो गई सेठ ने सोचा सामने पानी की कुंड भी है वृक्ष की छाया भी है क्यों ना बैठकर थोड़ा आराम किया जाए व रोटी भी खा लूंगा।

🔵 सेठ वृक्ष के नीचे रोटी रखकर पानी से हाथ मुंह धोने लगा।

🔴 तभी वहां पर एक कुतिया अपने चार पांच छोटे छोटे बच्चों के साथ पहुंच गई और सेठ के सामने प्रेम से दुम हिलाने लगी क्यों कि कुतिया को सेठ के पास के अनाज की खुशबु आ रही थी।

🔵 कुतिया को देखकर सेठ को दया आई सेठ ने दो रोटी निकाल कुतिया को डाल दी अब कुतिया भुखी थी और बिना समय लगाए कुतिया दोनो रोटी खा गई और फिर से सेठ की तरफ देखने लगी।

🔴 सेठ ने सोचा कि कुतिया के चार पांच बच्चे इसका दुध भी पीते है दो रोटी से इसकी भुख नही मिट सकती और फिर सेठ ने बची हुई दोनो रोटी भी कुतिया को डाल कर पानी
पीकर अपने रास्ते चल दिया।

🔵 सेठ राजा के दरबार मे हाजिर हो गया और अपने किए गए पुण्य के कामों की गिनती करने लगा और सेठ ने अपने द्वारा किए गए सभी पुण्य कर्म विस्तार पुर्वक राजा को बता दिए और अपने द्वारा किए गए पुण्य का फल देने बात कही।

🔴 तब राजा ने कहा कि आपके इन पुण्य का कोई फल नही है यदि आपने कोई और पुण्य किया है तो वह भी बताएं शायद उसका कोई फल मै आपको दे पाऊं।

🔵 सेठ कुछ नही बोला और यह कहकर बापिस चल दिया कि यदि मेरे इतने पुण्य का कोई फल नही है तो और पुण्य गिनती करना बेकार है अब मुझे यहां से चलना चाहिए।

🔴 जब सेठ वापिस जाने लगा तो राजा ने सेठ को आवाज लगाई कि सेठ जी आपने एक पुण्य कल भी किया था वह तो आपने बताया ही नही, सेठ ने सोचा कि कल तो मैनें कोई पुण्य किया ही नही राजा किस पुण्य की बात कर रहा है क्यों कि सेठ भुल चुका था कि कल उसने कोई पुण्य किया था।

🔵 सेठ ने कहा कि राजा जी कल मैनें को ई पुण्य नहीं किया, तो राजा ने सेठ को कहा कि कल तुमने एक कुतिया को चार रोटी खिलाई और तुम उस पुण्य कर्म को भुल गए?

🔴 कल किए गए तेरे पुण्य के बदले तुम जो भी मांगना चाहते हो मांग लो वह तुझे मिल जाएगा।

🔵 सेठ ने पूछा कि राजा जी ऐसा क्यों मेरे किए पिछले सभी कर्म का कोई मूल्य नही है और एक कुतिया को डाली गई चार रोटी का इतना मोल क्यों?

🔴 राजा ने कहा हे सेठ! जो पुण्य करके तुमने याद रखे और गिनकर लोंगों को बता दिए वह सब बेकार है क्यों कि तेरे अन्दर मै बोल रही है कि यह मैनें किया।

🔵 तेरा सब कर्म व्यर्थ है जो तू करता है और लोगों को सुना रहा है, जो सेवा कल तुमने रास्ते मे कुतिया को चार रोटी पुण्य करके की वह तेरी सबसे बड़ी सेवा है, उसके बदले तुम मेरा सारा राज्य भी ले लो वह भी बहुत कम है।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (अन्तिम भाग)

🌹  तो फिर हमें क्या करना चाहिए?

🔴 भोग प्रधान आकांक्षाएँ रखने से मनुष्यों की अतृप्ति बढ़ जाती है और वे अधिक सुख सामग्री की माँग करते हैं। स्वार्थ के कारण ही छीना झपटी और चालाकी बेईमानी बढ़ती है। श्रम से बचने और मौज करने की इच्छाएँ जब तीव्र हो जाती है, तो उचित-अनुचित का विचार छोड़कर लोग कुमार्ग पर चलने लगते हैं, जिसका परिणाम उनके स्वयं के लिए ही नहीं सारे समाज के लिए भी घातक होता है। इस अदूरदर्शितापूर्ण प्रक्रिया को अपनाने से ही संसार में सर्वत्र दुःख-दैन्य का विस्तार हुआ है।
     
🔵 पतन का निवारण करने के लिए मानवीय दृष्टिकोण में परिवर्तन करना आवश्यक है और उस परिवर्तन के लिए मनुष्य का जीवन-दर्शन भी ऊँचा बनाया जाना चाहिए। पतित भावनाओं वाले व्यक्ति के लिए लाँछना एवं आत्म-ग्लानि की व्यथा कष्टदायक नहीं होती, वह निर्लज्ज बना कुकर्म करता रहता है। जब लोक मानस का स्तर भावनात्मक दृष्टि से ऊँचा उठेगा तब ही जीवन में श्रेष्ठता आएगी और उसी के आधार पर विश्व शांति की मंगलमय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी।

🔴 आज का मनुष्य सभ्यता के क्षेत्र में विकास करने के साथ-साथ इतना विचारशील भी बना है कि यदि उसे तथ्य समझाए जाएँ, तो वह उन्हें समझने और मानने के लिए तैयार हो जाता है। लोकसेवियों को इस प्रयोजन के लिए घर-घर जाना चाहिए और लोगों की आस्थाएँ, मान्यताएँ तथा विचारणाएँ परिष्कृत करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

🔵 प्रत्येक व्यक्ति इतना बुद्धिमान और प्रतिभाशाली नहीं होता कि वह तथ्यों को सही-सही समझा सके और किस परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए, इसका मार्गदर्शन कर सके। इसके लिए सुलझी विचारधारा का साहित्य लेकर निकलना चाहिए तथा लोगों को उसे पढ़ने तथा विचार करने की प्रेरणा देनी चाहिए, उसके साथ अशिक्षित व्यक्तियों के लिए पढ़कर सुनाने या परामर्श द्वारा प्रेरणा देने की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए। आरंभ में सभी लोगों की रुचि इस ओर नहीं हो सकती। अतः जो लोग ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता समझते हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसा विचार-साहित्य लोगों तक स्वयं लेकर पहुँचें।

🔵 यह ठीक है कि कुआँ प्यासे के पास नहीं जाता, प्यासे को ही कुआँ के पास जाकर पानी पीना पड़ता है। गर्मियों में जब व्यापक जल संकट उत्पन्न हो जाता है, तो बादलों को ही जगह-जगह जाकर बरसना पड़ता है। लोक-सेवियों को भी सद्विचारों और सद्प्रेरणाओं की शीतल सुखद जलवृष्टि के लिए जन-जन तक पहुँचना चाहिए। उसके लिए उन व्यक्तियों में पहल सद्विचारों के प्रति भूख जगाना आवश्यक है। भूख उत्पन्न करने का यह कार्य सम्पर्क द्वारा ही संभव होता है। उसके बाद सद्विचारों और सत्प्रेरणाओं को उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता साहित्य और निम्न सेवा कार्यों द्वारा पूरी की जा सकती है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का निर्मल अन्तःकरण (अंतिम भाग)

🔴 स्त्री को जीतने और सुधारने का एकमात्र अस्त्र उनके प्रति गहरी ममता, आत्मीयता, उदारता, करुणा, एवं हित कामना ही है। जिसके मन में यह भावना होंगी वह नारी की बुरी से बुरी आदतों को स्वल्प प्रयास से दूर करके उसके पूर्ण अनुकूल एवं उपयोगी बना सकेगा। इसके विपरीत जो उससे विरानेपन का, बदले का, अनुदारता का, स्वामित्व का एवं उसकी कमजोरों से नाजायज लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं वे उसे कदापि नहीं सुधार सकते हैं और वरन् ऐसे प्रयत्नों से उलटा विद्वेष बढ़ाते हैं और अपने भविष्य को अन्धकारमय बना लेते हैं।

🔵 गृहस्थ जीवन की 90 प्रतिशत सफलता नारी की अनुकूलता पर निर्भर रहती है। और नारी की अनुकूलता पुरुष की उदारता एवं सच्ची आत्मीयता पर निर्भर है। यदि नारी में कोई कमी भी है तो उसके निर्मल हृदय को प्रेम से जीता जा सकता है। हीरे के अंगूठी से यदि कोई अशुद्ध वस्तु लग जाय तो उसे कोई तोड़ नहीं डालता वरन् उस अशुद्धि को हटाकर उस मूल्यवान वस्तु को पूर्ववत् प्रेमपूर्वक रखा जाता है, इसी प्रकार नारी की छोटी-मोटी त्रुटियों, बुराइयों से निराश या विक्षुब्ध होने की आवश्यकता नहीं है, वरन् रोगी के प्रति डॉक्टर या परिचर्या करने वाले की जो भावना होती है उसी भावना के साथ उसे सुधारने की आवश्यकता है।

🔴 गायत्री के ‘रे’ अक्षर में नारी के प्रति उदारता और सहृदयता का व्यवहार करने के लिए आदेश दिया गया है। इस आदेश को पालन करने से हमारे गृहस्थ जीवन में स्वर्गीय शान्ति, समृद्धि एवं उन्नति के अनेकों अवसर उत्पन्न हो सकते हैं। आज लड़की के पिता से दहेज माँगा जाता है, ठहराव कम दहेज मिलने पर वधू का अपमान किया जाता है, कन्याओं की शिक्षा पर, उनके स्वास्थ पर माँ बाप पूरा ध्यान नहीं देते, ससुराल में लड़की को छोटी-छोटी बातों पर अपमानित होना पड़ता है, उसकी इच्छा को कोई महत्व नहीं दिया जाता, उसे स्वावलम्बी तथा उन्नतिशील बनाने के लिए भी किसी का ध्यान नहीं होता, केवल उससे अधिकाधिक सेवा लेने की ही सबकी दृष्टि रहती है। इस प्रकार की अनुदारता बन्द करके ओर उदार एवं सहृदय व्यवहार करने का आदेश गायत्री मन्त्र में दिया गया है। यदि हम इस आदेश को मानें तो निस्सन्देह नारी अन्तःकरण निर्मल नर्मदा नदी के समान स्वच्छ, शीतल एवं शान्तिमय बन सकता है और वह साक्षात् लक्ष्मी बन कर हमारे जीवन को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण कर सकती है।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ 

👉 आज का सद्चिंतन 28 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Sep 2017


बुधवार, 27 सितंबर 2017

👉 अल्पाहार करने वाला

चौ कम खुदन तवीअत शुद कसेरा।
चौ सख्ती पेशश आयद सहस गीरद॥ (1)॥

वगर तन पर दरस्त अन्दर फराखी।
चौ तंगी वीनद अज सख्ती बमीरद ॥ (2)॥

🔵 ‘अल्पाहार करने वाला आसानी से तकलीफों को सहन कर लेता है। पर जिसने सिवाय शरीर पालने के और कुछ किया ही नहीं, उस पर सख्ती की जाती है तो वह मर जाता है।” खुरासान के दो फकीरों में खूब गाढ़ी दोस्ती थी। वे साथ-साथ सफर करते थे। उनमें से एक दुर्बल और दूसरा हट्टा-कट्टा था। जो दुर्बल था वह दो दिन तक उपवास करता और जो पुष्ट था, वह दिन में तीन बार खाता। दैव योग से ऐसा हुआ कि वे दोनों जासूस समझे जाकर, नगर के फाटक पर गिरफ्तार कर लिये गये और एक ही कोठरी में कैद कर लिये गये जिस कोठरी में वे दोनों कैद किए गए, उसका द्वार भी मिट्टी से बंद कर दिया गया।

🔴 पंद्रह दिन पीछे मालूम हुआ, कि वे दोनों निर्दोष ही कैद किये गये हैं। इसलिए द्वार खोल कर बाहर निकाले गये। उनमें से जो मोटा-ताजा था वह तो मरा हुआ मिला और जो दुबला-पतला था, वह जिंदा मिला। इस घटना से लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। इस पर एक हकीम ने कहा कि यदि मोटा मनुष्य जीता रहता और दुर्बल मर जाता तो और भी अधिक आश्चर्य की बात होती, क्योंकि वह शख्स जो बहुत खाने वाला था उपवास नहीं कर सकता था। जो मनुष्य दुर्बल था, वह उपवासों का अभ्यासी था और अपनी काया को वश में रख सकता था, इसी से वह बच गया।

🔵 जो मनुष्य थोड़ा खाने का आदी होता है वह सुख से संकट सह लेता है, लेकिन जो सुख के दिनों में नाक तक ठूँस-ठूँस कर खाता है, उसके दुख के दिनों में अपनी आदत में डूब कर मरना पड़ता है। तात्पर्य यह है कि जो थोड़े ही में संतुष्ट रहते हैं, उन्हें संसारी यातनाएं नहीं सताती।

🌹 अखण्ड ज्योति 1950 नवम्बर

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 141)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 यह सूक्ष्म शरीरों की, सूक्ष्म लोक की सामान्य चर्चा हुई। प्रसंग अपने आपे को विकसित करने का है। यह विषम वेला है। इसमें प्रत्यक्ष शरीर वाले, प्रत्यक्ष उपाय-उपचारों से जो कर सकते हैं, सो कर ही रहे हैं। करना भी चाहिए, पर दीखता है कि उतने भर से काम चलेगा नहीं। सशक्त सूक्ष्म शरीरों को बिगड़ों को अधिक न बिगड़ने देने के लिए अपना जोर लगाना पड़ेगा। सँभालने के लिए जो प्रक्रिया चल रही है, वह पर्याप्त न होगी। उसे और भी अधिक सरल-सफल बनाने के लिए अदृश्य सहायता की आवश्यकता पड़ेगी। यह सामूहिक समस्याओं के लिए भी आवश्यक होगा और व्यक्तिगत रूप से सत्प्रयोजनों में संलग्न व्यक्तित्वों को अग्रगामी-यशस्वी बनाने की दृष्टि से भी।

🔴 जब हमें यह काम सौंपा गया तो उसे करने में आना-कानी कैसी? दिव्य सत्ता के संकेतों पर चिरकाल से चलते चले आ रहे और जब तक आत्मबोध जागृत रहेगा तब तक यही स्थिति बनी रहेगी। यही गतिविधि चलेगी। यह विषम बेला है, इन दिनों दृश्य और अदृश्य क्षेत्र में जो विषाक्तता भरी हुई है, उसके परिशोधन का प्रयास करना अविलम्ब आवश्यक हो गया है, तो संजीवनी बूटी लाने के लिए पर्वत उखाड़ लाने और सुषेन वैद्य की खोज में जाने के लिए जो करना पड़े करना चाहिए। यह कार्य स्थूल शरीर को प्रसुप्त से जाग्रत स्थिति में लाने के लिए हमें अविलम्ब जुटना पड़ा और विगत दो वर्षों में कठोर तपश्चर्या का-एकांत साधना का अवलंबन लेना पड़ा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.160

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.20

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 75)

🌹  तो फिर हमें क्या करना चाहिए?
🔴 इस पुस्तक को पढ़कर आपके मन एवं अंतःकरण में स्वयं के लिए, देश, धर्म और संस्कृति के लिए कुछ करने की उत्कंठा अवश्य जाग्रत हुई होगी। आप सोच रहे होंगे, आखिर हम क्या करें? घबराइए नहीं, श्रेष्ठ जीवन के लिए दैनिक जीवन में बहुत जटिलता की आवश्यकता नहीं होती। सरल सहज जीवन जीते हुए भी आप सुख-शांति अनुभव कर सकते हैं। व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास के लिए तीन उपक्रम अपनाने होंगे-उपासना साधना, आराधना। उपासना के लिए नित्य १५ मिनट अथवा ३० मिनट का समय प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर निकालें। देव मंदिर में ईश्वर के सान्निध्य में बैठें और देव शक्तियों के आशीर्वाद एवं कृपा की वर्षा का भाव रखते हुए अपने अंदर देवत्व की वृद्धि कर अनुभव करें।
     
🔵 आपकी श्रद्धा जिस देवता, जिस मंत्र, जिस उपासना में अपने इष्ट के दैवीय गुणों के अपने अंदर वृद्धि का भाव अवश्य रखें। साधना प्रतिपल करनी होती है। ज्ञान और विवेक का दीपक निरंतर अपने अंतर में प्रज्ज्वलित रखें। निकृष्टता से बचने एवं उत्कृष्टता की ओर बढ़ने हेतु मनोबल रहें। दुर्गुणों से बचने एवं उत्कृष्टता की ओर बढ़ने हेतु मनोबल बढ़ाते रहें। दुर्गुणों से बचने एवं सद्गुणों को धारण करने में समर्थ बनें। यही साधना का स्वरूप है। इसके लिए प्रतिपल सतर्कता एवं जागृति आवश्यक है। देश, समाज, धर्म और संस्कृति के उत्थान के हेतु किए गए सेवा कार्य आराधना कहलाते हैं।

🔴 पतन का निराकरण ही सर्वोत्कृष्ट सेवा है। सेवा साधना से पतन का निराकरण तब ही संभव है, जब व्यक्ति के चिंतन में आई आकृतियों और अवांछनीयताओं का उन्मूलन हो जाए। सेवा की उमंग है और सर्वोत्कृष्ट रूप की सेवा करने के लिए लगन है, तो इसी स्तर का सेवा कार्य आरंभ करना और चलाना चाहिए।

🔵 प्रश्न यह उठता है कि इस स्तर की सेवा साधना किस प्रकार की जाए? मनुष्य के स्तर में आए हुए पतन को किस प्रकार मिटाया जाए और उसे उत्थान की ओर अग्रसर किया जाए। स्पष्ट है कि यह कार्य विचारों और भावनाओं के परिष्कार द्वारा ही किया जा सकता है। इसके लिए विचार परिष्कार की प्रक्रिया चलानी चाहिए तथा उत्कृष्ट और प्रगतिशील सद्विचारों को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। यह सच है कि समाज में जो कुछ भी अशुभ और अवांछनीय दिखाई देता है, उसका कारण लोगों के व्यक्तिगत दोष ही हैं। उन दोषों की उत्पत्ति व्यक्ति की दूषित विचारणाओं तथा विकृत दृष्टिकोणों से होती है।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Cub between wolves

🔴 A wolf found a lion’s child in a very infant stage and kept it with his own children. The cub never recognized himself growing in the community of wolves. Once this family went for hunting. As they pounced over a dead elephant, a lion appeared. The lion asked the cub the reason for him being with the wolves and why was he getting afraid of him.

🔵 The cub was not able to understand what was going on. The lion understood the situation looking at the situation. He showed him his image in water and then again his face. Then he roared and asked him to do so. Then he realized of his original self and went back to his community and roamed fearlessly.

🔴 There are a large number of people who forget their self and wander in dreams.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Sep 2017

🔵 सड़े गले कूड़े करकट का जब खाद रूप से सोना कमाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि घटिया स्वभाव के आदमियों से भी यदि हम बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवहार करें तो उनसे सज्जनता की प्रतिक्रिया प्राप्त न हो। जब साँप, रीछ और बन्दर जैसे अनुपयोगी जानवरों को सिखा पढ़ा कर लोग उनसे तमाशा कराते और धन कमाते हैं तो कोई कारण नहीं कि हम बुरे, ओछे और मूर्ख समझे जाने वाले लोगों को अपने लिए हानिकारक सिद्ध होने देने की अपेक्षा उन्हें उपयोगी लाभ दायक न बना सकें। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हमारा निज का दृष्टिकोण और स्वभाव सही हो।

🔴 हम अपनी निज की दुर्बलताओं के प्रवाह में बहते हैं और छोटे-छोटे कारणों को बहुत बड़ा रूप देकर कुछ-कुछ समझने लगने की भूल करते हैं, सामने वाले में केवल दोष ही दोष ढूँढ़ते हैं, तो वही मिलेगा जो हमने ढूँढ़ा था। दोष विहीन कोई वस्तु नहीं, यदि हम दोष ढूंढ़ने की आदत से ग्रसित हो रहे हैं और किसी के प्रति दुर्भावपूर्ण भावना बनाये हुए हैं तो उसके जितने दोष हैं वे सब बहुत ही बड़े-बड़े रूप में दिखाई देंगे और वह व्यक्ति दोषों के पर्वत जैसा दीखेगा। यदि इसके विपरीत हमारा दृष्टिकोण उसी व्यक्ति के प्रति आत्मीयता पूर्ण रहा होता, उसकी सज्जनता पर विश्वास करते तो उसमें अनेकों गुण ऐसे दिखाई देते जिससे उसे सज्जन एवं सत्पुरुष कहने को ही जी चाहता।

🔵 भूल हर किसी से होती है। दुर्गुणों और दुर्बलताओं से रहित भी कोई नहीं है। पर जिसे हम प्यार करते हैं, उनकी भूलों पर ध्यान नहीं देते या उन्हें बहुत छोटी मानते हैं, यदि कोई बड़ी भूल भी होती है तो उसे हंसकर सहन कर लेते हैं और उदारतापूर्वक क्षमा कर देते हैं। यह अपनी भावनाओं का ही खेल है कि दूसरों की बुराई या भलाई बहुत छोटी हो जाती है या अनेकों गुनी बढ़ी-चढ़ी दीखती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 27 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Sep 2017


👉 नारी का निर्मल अन्तःकरण (भाग 2)

🔴 नारी के द्वारा अनन्त उपकार एवं असाधारण सहयोग प्राप्त करने के उपरान्त नर के ऊपर अनेक पवित्र उत्तरदायित्व आते हैं, उसे स्वावलम्बी, सुशिक्षित, स्वस्थ, प्रसन्न एवं सन्तुष्ट बनाने के लिए नर को सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। मारना पीटना, अपमानजनक व्यवहार करना, हीन दृष्टि से देखना, उसे अपनी सम्पत्ति समझना सर्वथा अधार्मिक व्यवहार है ऐसा गायत्री के ‘रे’ अक्षर में स्पष्ट किया गया है।

🔵 नारी के स्वाभाविक असाधारण गुणों के कारण यही सम्भावना सदा ही बनी रहती है उसके छोटे मोटे दोषों को आसानी से सुधारा जा सकता है। गाय में दैवी तत्व अधिक होने से उसे अवध्य माना गया है। ब्राह्मण को सताना अन्य जीवों को सताने की अपेक्षा अधिक पाप है। इसी प्रकार नारी और बालक को भी गौ ब्राह्मण की तुलना में रखा गया है। बच्चों से कोई गलती हो या उसके स्वभाव में कोई दोष हो तो उसके प्रति क्षमा, उदारता और वात्सल्य पूर्ण तरीकों से ही सुधारा जाता है।

🔴 कोई सहृदय अभिभावक अपने पथभ्रष्ट बालक के प्रति प्रतिहिंसा का भाव नहीं रखता और न उसे सताने या पीड़ित करने का भाव मन में लाता है, हमारी यही भावना नारी के प्रति होनी चाहिये। क्योंकि मुद्दतों से नारी जाति जिन परिस्थितियों में रहती आ रही है उन्होंने उसे भी बौद्धिक दृष्टि से एक प्रकार का बालक ही बना दिया है। नारी पर हाथ उठाना कायरता का लक्षण माना गया है। उसके स्त्रीधन का अपहरण करना, उसकी प्रतिष्ठा को नष्ट करना या घातक आक्रमण करना तो अत्यन्त ही निकृष्ट कोटि का, पुरुषत्व को कलंकित करने वाला कुकृत्य है।

🔵 आज नारी जाति में भी जहाँ तहाँ चरित्र दोष, कटु व्यवहार आदि बुराइयाँ दृष्टिगोचर होने लगी हैं। इसमें प्रधान दोष उन परिस्थितियों का है जो उनमें यह विकार पैदा करती हैं। पुरुष समाज चारित्रिक दृष्टि से नारी की अपेक्षा हजार गुना अधिक पतित है उसी की छाया से नारी भी अपवित्र बनती है तब लोग उन कारणों तथा पुरुषों का तो दोष नहीं देखते बेचारी बालबुद्धि नारी पर बरस पड़ते है और उस पर अमानुषिक अत्याचार करते हैं इस प्रक्रिया से अविश्वास, असन्तोष, कटुता, द्वेष, पाप और प्रतिहिंसा की ही वृद्धि होती है। इन तत्वों को पारिवारिक जीवन में बढ़ाने वाले लोग अपना और समाज का अहित ही करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ 2

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1952/September/v1.2

👉 हमारा लक्ष्य

🔴 एक बार की बात है एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी! इस घोषणा को सुनकर सभी नगरवासी रात को ही नगर के दरवाज़े पर बैठ गए और सुबह होने का इंतजार करने लगे! सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊंगा! कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे, कुछ लोग कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग कह रहे थे कि राजा की रानियाँ बहुत सुन्दर है मैं राजा की रानीयों को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग राजकुमारी को हाथ लगाने की बात कर रहे थे! कल्पना कीजिये कैसा अद्भुत दृश्य होगा वह!!
                 
🔵 उसी वक्त महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े! सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे!

🔴 राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था! कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था और कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था! उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी! राजा उस लड़की को देखकर सोच में पड़ गया और फिर विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने आ रही है! वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया! राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी!

🔵 जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हर रोज मौका देता है और हम हर रोज गलती करते है! हम ईश्वर को हाथ लगाने अथवा पाने की बजाएँ ईश्वर की बनाई हुई संसारी वस्तुओं की कामना करते है और उन्हें प्राप्त करने के लिए ही यत्न करते है पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी !

🔴 ईश्वर बिलकुल माँ की तरह ही है, जिस प्रकार माँ अपने बच्चे को गोदी में उठाकर रखती है कभी अपने से अलग नहीं होने देती ईश्वर भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही खेल खेलते है! जब कोई बच्चा अपनी माँ को छोड़कर अन्य खिलौनों के साथ खेलना शुरू कर देता है तो माँ उसे उन खिलौनों के खेल में लगाकर अन्य कामों में लग जाती है ठीक इसी प्रकार जब हम ईश्वर को भूलकर ईश्वर की बनाई हुई वस्तुओं के साथ खेलना शुरू कर देते है तो ईश्वर भी हमे उस माया में उलझाकर हमसे दूर चले जाते है पर कुछ बुद्धिमान मनुष्य ईश्वर की माया में ना उलझकर ईश्वर में ही रमण करते है और उस परम तत्व में मिल जाते है फिर उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रहता! इसी बात को गुरु ग्रन्थ साहिब में इन शब्दों में कहा गया है–

"जाके वश खान सुलतान, ताके वश में सगल जहान"

अर्थ – जिसके वश में ईश्वर होते है, उसके वश में सारी दुनिया होती है ।

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (अंतिम भाग)

🔴 हमें यह बात किसी भी तरह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि ‘नारी’ अर्थात् ‘माँ’ इस जगती का सबसे सुकोमल, संवेदनशील एवं श्रेष्ठतम तत्त्व है। यह उन्हीं जगन्माता की अभिव्यक्ति का सबसे सार्थक माध्यम है, जिनकी उपासना हम नवरात्रि के दिनों में कर रहे हैं। यदि हमें अपना स्वत्व प्राप्त करना है अपने संकल्प को सिद्ध करना है तो हमें इस सत्य को पहचानना होगा। जो तरल प्रेम, वात्सल्य, ममता और परमेश्वरीय करुणा का विग्रह है, उस माँ को और उसके मातृत्व भाव को दूषित, प्रदूषित करने की प्रक्रिया, आधुनिकता के नाम से जानी जाने वाली परम्परा नहीं रुकी, तो पशुवत् मनुष्य ही जन्मेंगे, मनुष्यवत् देवता नहीं।

🔵 मातृत्व का सम्यक् बोध, माँ के सही स्वरूप की पहचान नवरात्रि की साधना का सार ही नहीं, हमारी संस्कृति का निष्कर्ष भी है। वेदों की घोषा, अपाला, लोपामुद्रा आदि मंत्रदृष्टाओं में अभ्भृण ऋषि की कन्या ‘वाक्’ का स्थान महिमामय है। उसके द्वारा रचित देवीसूक्त में भावी युगों की शक्ति उपासना का अंकुरण मिलता है। ‘अहं राष्ट्रीय संगमनी वसूनाँ’ एवं ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि’ आदि मंत्रों में वह कहती है कि ‘मैं राष्ट्र को बाँधने वाली शक्ति हूँ। मैं ही उसे ऐश्वर्यों से सम्पन्न करती हूँ। मैं ही ब्रह्मद्वेषियों के संहार के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होकर मनुष्य के लिए संहार करती हूँ।’ स्पष्ट ही इस सूक्त में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली के विविध आयाम प्रकट हुए हैं।

🔴 यही है हमारे देश में व्याप्त होने वाला मातृभाव। यही है नवरात्रि के दिनों में सारे देश में होने वाला प्रेम, करुणा, ममता, वात्सल्य, सृजन एवं पालन, संरक्षण का मातृरूप अवतरण। इस दिव्य भावाभिव्यक्ति को प्रकट करना ही नवरात्रि के नौ दिनों में की जाने वाली साधना का सार है। इसी में निहित है मातृत्व की सम्यक् पहचान। जिसे हम अपनी मानसिक एवं सामाजिक बुराइयों को दूर करके ही पा सकते हैं। नवरात्रि के दिनों में गायत्री महामंत्र के 24 हजार अक्षरों वाले मंत्र के 24,000 जप का अनुष्ठान तो करें ही, पर साथ ही अपने संवेदनशून्य मन को माँ के प्रेम से भी संवेदित करें। अपनी माँ को सच्ची और सम्यक् प्रतिष्ठ प्रदान करने के अधिकारी बनने का अनुष्ठान भी करें। नारी के जीवन में- देश की व्यापकता में, धरती के कण-कण में व्याप्त माँ को यदि हम पहचान सके, उसकी भावभरी पूजा कर सके, तभी हमें सुख-समृद्धि एवं भक्ति-शक्ति के सारे सुफल मिल सकेंगे। माँ की अपार करुणा हम पर बरसेगी और देश ही नहीं हमारा अपना जीवन भी मातृमय हो सकेगा।

🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2002/April/v1.14

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 74)

🌹  छोटे संकल्प- बड़ी सफलताएँ

🔴 आज इतनी मात्रा में ही भोजन करेंगे, इतनी दूर टहलने जाएँगे, इतना व्यायाम करेंगे, आज तो ब्रह्मचर्य रखेंगे ही, बीड़ी पीने आदि का कोई व्यसन हो तो रोज जितना बीड़ी पीते थे, उसमें एक कम कर देंगे, इतने समय तो भजन या स्वाध्याय करेंगे ही, सफर एवं व्यवस्था में आज इतनी देर का अमुक समय तो लगाएँगे ही, इस प्रकार की छोटी- छोटी प्रतिज्ञाएँ नित्य लेनी चाहिए और उन्हें अत्यंत कड़ाई के साथ उस दिन तो पालन कर ही लेना चाहिए। दूसरे दिन की स्थिति समझते हुए फिर दूसरे दिन की सुधरी दिनचर्या बनाई जाए। इसमें शारीरिक क्रियाओं का ही नहीं, मानसिक गतिविधियों का सुधार करने का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। प्रतिदिन छोटी- छोटी सफलताएँ प्राप्त करते चलने से अपना मनोबल निरंतर बढ़ता है और फिर एक दिन साहस एवं संकल्प बल इतना प्रबल हो जाता है कि आत्मशोधन की किसी कठोर प्रतिज्ञा को कुछ दिन ही नहीं वरन् आजीवन निबाहते रहना सरल हो जाता है।
     
🔵 दैनिक आत्मचिंतन एवं दिनचर्या निर्धारण के लिए एक समय निर्धारित किया जाए। दिनचर्या निर्धारण के लिए, प्रातः सोकर उठते ही जब तक शय्या त्याग न किया जाए, वह समय सर्वोत्तम है। आमतौर से नींद खुलने के कुछ देर बाद ही लोग शय्या त्यागते हैं, कुछ समय तो ऐसे ही आलस में पड़े रहते हैं। यह समय दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिए सर्वोत्तम है। शय्या पर जाते समय ही किसी को नींद नहीं आ जाती, इसमें कुछ देर लगती है। इस अवसर को आत्म- चिंतन में, अपने आपसे १० प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने में लगाया जा सकता है। जिनके पास अन्य सुविधा के समय मौजूद हैं, पर उपरोक्त दो समय व्यस्त से व्यस्त सज्जनों के लिए भी सुविधाजनक रह सकते हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं को अपनाकर हम आसानी से आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत आगे बढ़ सकते हैं।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी का निर्मल अन्तःकरण (भाग 1)

🔴 रेवेव निर्मला नारी पूजनीया सदा मता।
यतो हि सैव लोकेऽस्मिन् साक्षात्लक्ष्मी मताबुधैः॥

 
अर्थ—नारी सदैव नर्मदा नदी के समान निर्मल है। वह पूजनीय है। क्योंकि संसार में वही साक्षात् लक्ष्मी है।

🔵 जैसे नर्मदा नदी का निर्मल जल सदा निर्मल रहता है उसी प्रकार ईश्वर ने नारी को स्वभावतः निर्मल अन्तःकरण प्रदान किया है। परिस्थिति तथा संगति से दोष होने के कारण कभी-कभी उसमें भी विकार पैदा हो जाते हैं पर यदि उन कारणों को बदल दिया जाय तो नारी हृदय पुनः अपनी शाश्वत निर्मलता पर लौट आता है।

🔴 स्फटिक मणि को रंगीन मकान में रख दिया जाय या उसके निकट कोई रंगीन पदार्थ रख दिया जाय तो वह मणि भी रंगीन छाया के कारण रंगीन ही दिखाई पड़ने लगती है। परन्तु यदि उन कारणों को हटा दिया जाय तो वह शुद्ध निर्मल एवं स्वच्छ रूप में ही दिखाई देती है। इसी प्रकार नारी जब बुरी परिस्थिति में पड़ी होती है तब वह बुरी, दोषयुक्त दिखाई पड़ती है परन्तु जैसे ही उस परिस्थिति का अन्त होता है वैसे ही वह निर्मल एवं निर्दोष हो जाती है।

🔵 नारी लक्ष्मी का साक्षात अवतार है। भगवान् मनु का कथन पूर्ण सत्य है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं अर्थात् सुख शान्ति के समस्त उपकरण उपस्थित रहते हैं। सम्मानित एवं सन्तुष्ट नारी अनेक सुविधाओं तथा सुव्यवस्थाओं का केन्द्र बन जाती है। उसके साथ गरीबी में भी अमीरी का आनन्द बरसता है। धन दौलत निर्जीव लक्ष्मी है। किन्तु स्त्री तो लक्ष्मी जी की सजीव प्रतिमा है उसके प्रति समुचित आदर का, सहयोग का एवं सन्तुष्ट रखने का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए।

🔴 नारी में नर की अपेक्षा सहृदयता, दयालुता, उदारता, सेवा, परमार्थ एवं पवित्रता की भावना अत्यधिक है। उसका कार्यक्षेत्र संकुचित करके घर तक ही सीमाबद्ध कर देने के कारण ही संसार में स्वार्थपरता, हिंसा, निष्ठुरता, अनीति एवं विलासिता की बाढ़ आई हुई है। यदि राष्ट्रों का सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व नारी के हाथ में हो तो उसका मातृ हृदय अपने सौंदर्य के कारण सर्वत्र सुख शान्ति की स्थापना कर दे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1952/September/v1.2

👉 आज का सद्चिंतन 26 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Sep 2017


सोमवार, 25 सितंबर 2017

👉 साधना कब प्रारंभ करें:-

🔴  एक अवधूत बहुत दिनों से नदी के किनारे बैठा  था,  एक दिन किसी व्यकि ने उससे पुछा आप नदी के किनारे बैठे-बैठे क्या कर रहे है अवधूत ने कहा, "इस नदी का जल पूरा का पूरा बह जाए इसका इंतजार कर  रहा हूँ."
                 
🔵 व्यक्ति ने कहा यह कैसे हो सकता है. नदी तो बहती हीं रहती हैं सारा पानी अगर बह भी जाए तो आपको क्या करना है।

🔴  अवधूत ने कहा मुझे दुसरे पार जाना है. सारा जल बह जाए  तो मै चल कर उस पार जाऊगा।

🔵 उस व्यक्ति ने गुस्से में कहा, आप पागलों और नासमझों जैसी बात कर रहे है, ऐसा तो हो ही नही सकता।

🔴  तव अवधूत ने मुस्कराते हुए कहा यह काम तुम लोगों को देख कर ही  सीखा  है. तुम लोग हमेशा सोचते रहते हो कि जीवन मे थोड़ी बाधाएं कम हो जाये, कुछ शांति मिले, फलाना काम खत्म हो जाए, तो सेवा, साधन -भजन, सत्कार्य करेगें. जीवन भी तो नदी के समान है यदि जीवन मे तुम यह आशा लगाए बैठे हो तो मैं इस नदी के पानी के पूरे बह जाने का इंतजार क्यों न करू।

🔵 सारः जो करना है आज ही अभी करो बढते जाओ चलते जाओ।

👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग 4)

🔴 माँ की इच्छा है कि हमारा प्राण और हमारी प्रतिज्ञा समान हो। माँ की चाहत है कि वह जिस सृष्टि और जिस ब्रह्मांड की मंगलमयी अधिष्ठात्री देवी है, उसका किसी भी तरह अमंगल न हो। जिस दैवी सम्पदा, संस्कृति और परम्परा की रक्षा के लिए वह अपने सम्पूर्ण तप, संकल्प, सिद्धि, शक्ति, ममता, करुणा और मातृत्व का पुँज बनकर समय-समय पर प्रकट होती आयी है, हम उसकी प्राण-पण से रक्षा करें। नवरात्रि अनुष्ठान के साथ यदि हम इस महासत्य के लिए संकल्पित नहीं है, तो हमारा अनुष्ठान अधूरा है। और विडम्बना यही है कि बहुसंख्यक जनों की स्थिति ऐसी ही है। निजी स्वार्थ में वे सर्वभूत हितेरतः का बीज मंत्र या मातृ मंत्र भूल गए हैं।

🔵 सवाल यह है कि ऐसी स्थिति आयी ही क्यों? तो जवाब यह है कि हमारी यह प्रतीति ही खो गयी है कि हम किससे हैं? हम जिसके कारण हैं, वह कौन है? वह हमारी क्या है और सबसे बढ़कर हम उसके क्या हैं? हमने जननी को, माँ को केवल स्त्री मान लिया है। धरती माता, भारत माता हमारे लिए केवल एक मिट्टी का टुकड़ा बनकर रह गयी है। हमें यह तो याद है कि हमारे लिए माँ को राष्ट्रमाता को क्या-क्या करना चाहिए। लेकिन उसके प्रति किए जाने वाले हमारे कर्म-धर्म हमको अब याद नहीं रहे। स्थिति इतनी विकृत एवं बिगड़ी हुई है कि हम केवल प्रकृति एवं प्रवृत्ति को ही प्रदूषित नहीं कर रहे, नारी और उसके मातृत्व को भी अपवित्र बनाते जा रहे हैं। यही कारण है कि आज सन्तानों का जन्म किसी सद्संकल्प के कारण नहीं वासना के वशीभूत होकर होता है।

🔴 आज हर घर-आँगन में तुलसी के बिरवे की जगह यह प्रश्न रोपित-आरोपित है कि हमारे बच्चे बिगड़ैल एवं हमारा परिवार आतंकित क्यों है? इसका जवाब एकदम सीधा-सपाट है कि हमें मातृत्व का सम्यक् बोध नहीं रहा। हमारे देश की नारी ने आधुनिकता की दौड़ में जो पश्चिमी बालक बना रही है, उसके परिणाम में वह जननी तो बन जाती हैं, पर माँ नहीं बन पाती। यही स्थिति जन्म देने वाले की है। ध्यान रहे कि कभी भी वासना जीवन का वन्दनवार नहीं बन सकती। पश्चिमी आधुनिकतावादी कोख से जन्मी हमारी सन्तानें यदि विलासी, लम्पट एवं उच्छृंखल बन रही हैं, तो इसमें भला अचरज ही क्या है? उन्हें जन्म तो मिला पर संस्कार प्रदान करने वाली माँ नहीं मिली।

🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 74)

🌹  अपना मूल्यांकन भी करते रहें
🔴 आत्म सुधार के लिए क्रमिक परिष्कार की पद्धति को अपनाने से भी काम चल सकता है। अपने सारे दोष-दुर्गुणों को एक ही दिन में त्याग देने का उत्साह तो लोगों में आता है, पर संकल्प शक्ति के अभाव में बहुधा वह प्रतिज्ञा निभ नहीं पाती, थोड़े समय में वही पुराना कुसंस्कारी ढर्रा आरंभ हो जाता है। प्रतिज्ञाएँ करने और उन्हें न निभा सकने से अपना संकल्प बल घटता है और फिर छोटी-छोटी प्रतिज्ञाओं को निभाना भी कठिन हो जाता है। यह क्रम कई बार चलाने पर तो मनुष्य का आत्मविश्वास ही हिल उठता है और वह सोचता है कि हमारे कुसंस्कार इतने प्रबल हैं कि जीवनोत्कर्ष की दिशा में बदल सकना अपने लिए संभव ही न होगा। यह निराशाजनक स्थिति तभी आती है जब कोई व्यक्ति आवेश और उत्साह में अपने समस्त दोष-दुर्गुणों को तुरंत त्याग देने की प्रतिज्ञा करता है और मनोबल की न्यूनता के कारण चिर-संचित कुसंस्कारों से लड़ नहीं सकता।
     
🔵 आत्मशोधन का कार्य एक प्रकार का देवासुर संग्राम है। कुसंस्कारों की आसुरी वृत्तियाँ अपना मोर्चा जमाए बैठी रहती हैं और वे सुसंस्कार धारण के प्रयत्नों को निष्फल बनाने के लिए अनेकों छल-बल करती रहती हैं। इसलिए क्रमशः आगे बढ़ने और मंथर किंतु सुव्यवस्थित रीति से अपने दोष-दुर्गुणों को परास्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। सही तरीका यह है कि अपनी सभी बुराइयों एवं दुर्बलताओं को एक कागज पर नोट कर लेना चाहिए और प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर उसी दिन का ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए कि आज अपनी अमुक दुर्बलता को इतने अंशों में तो घटा ही देना है।

🔴 उस दिन को जो कार्यक्रम बनाया जाए, उसके संबंध में विचार कर लेना चाहिए कि इनमें कब, कहाँ, कितने, किन कुसंस्कारों के प्रबल होने की संभावना है। उन संभावनाओं के सामने आने पर हमें कम से कम कितनी आदर्शवादिता दिखानी चाहिए, यह निर्णय पहले ही कर लेना चाहिए और फिर सारे दिन प्रातःकाल की हुई प्रतिज्ञा के निबाहने का दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी सफलता भी आत्म-सुधार की दिशा में प्राप्त होती चले तो अपना साहस बढ़ेगा और धीरे-धीरे सभी दोष-दुर्गुणों को छोड़ सकना संभव हो जाएगा।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.105

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.19

👉 Properly plan where you have to go

🔴 There was a rule on a land in which a person who was chosen as king from among common people, would have to go to a lone and barren island after serving the term for ten years. So many kings had lost their lives in this manner. Those who ruled became concerned at the end of their terms but then it would be too late for them.

🔵 Once, a wise man became king when no one else was willing to do so. He had future at the back of his mind. He examined the island and started planting trees, making ponds and populating with people. In ten years, that barren island had become a very beautiful place. After his term as the king, he went there and started living happily.

🔴 Every one gets some days in life for free choice. In this one who plans his present and future well lives life satisfactorily and happily as the wise king.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Sep 2017

🔵 संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोष-मय है। न तो कोई ऐसा पदार्थ है जिससे किसी प्रकार का दोष न हो और कोई चीज ऐसी जिसमें केवल दोष ही दोष भरे हों। मनुष्य के भीतर स्वयं दैवी और आसुरी दोनों प्रकार की वृत्तियाँ काम करती हैं। परिस्थिति के अनुसार उनमें से कभी कोई दबती है तो कभी उभरती है। जिससे एक मनुष्य जो एक समय से बुरा प्रतीत होता था दूसरे समय में अच्छा लगने लगता है।

🔴 हर वस्तु के बुरे और भले दोनों ही पहलू हैं। उन्हें हम अपनी दृष्टि के अनुसार देखते और अनुभव करते हैं। हंस के सामने पानी और दूध मिला कर रखा जाए तो केवल दूध ही ग्रहण करेगा और पानी छोड़ देगा। फूलों में शक्कर होती तो है पर उसकी मात्रा बहुत स्वल्प है, हम लोग किसी फूल को तोड़ कर चखें तो उसमें जरा सी मिठास प्रतीत होती है पर शहद की मक्खी को देखिए वह फूलों में से केवल मिठास ही चूसती है शेष अन्य स्वादों का जो बहुत सा पदार्थ फूल में भरा पड़ा है, उसे व्यर्थ समझ कर छोड़ देती है।

🔵 स्वाति की बूँद एक ही प्रकार की होती है पर उससे अलग-अलग जीव अपनी आंतरिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग प्रकार के लाभ उठाते हैं। साँप के मुख में जाकर स्वाति बूँद हलाहल विष बन जाती है, सीप के मुख में पड़ने से वह मूल्यवान मोती बनती है, बाँस के छेदों में जाने से वंशलोचन उपजता है और पपीहे के मुख में जाने से उसकी प्यास-मात्र लुप्त होती है। वस्तु एक ही थी पर अलग-अलग जीवों ने उसका उपयोग अपने-अपने ढंग से किया और उसका लाभ भी अलग-अलग उठाया।
 
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (अंतिम भाग)

🔴 ध्यान की छठी कसौटी है श्वास की संख्या का कम होना। इस सत्य को हम सभी ने कई बार अनुभव किया होगा कि आवेग-आवेश में श्वास की संख्या बढ़ जाती है। इसी तरह शारीरिक असामान्यता में भी श्वास की गति बढ़ जाती है। ध्यान साधक की न केवल अन्तश्चेतना में स्थिरता और आवेग शून्यता आती है, बल्कि उसके शरीर में धातु साम्यता बनी रहती है। ऐसी स्थिति में स्वभावतः श्वास की गति कम हो जाती है। कभी-कभी तो श्वास की गति बड़ी आश्चर्यजनक ढंग से कम हो जाती है। ध्यान सिद्धि की इस कसौटी पर कोई भी साधक स्वयं को परख सकता है।
 
🔵 इस क्रम में एक चमत्कारी स्थिति और उत्पन्न होती है। वह यह है कि ध्यान साधक के सामने स्वरोदय शास्त्र स्वयं ही प्रकट हो जाता है। अनुभवी जन जानते हैं कि स्वरोदय शास्त्र का समग्र विकास श्वास की गति के आधार पर हुआ है। जो श्वास की गति को समझ जाता है, वह ऐसी चमत्कारी भविष्यवाणियाँ कर देता है, जिसकी सामान्य व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकते। इस बारे में विशिष्ट चर्चा यहाँ इन पंक्तियों में स्थानाभाव के कारण सम्भव नहीं है। पर श्वास की गति का सूक्ष्म ज्ञान और इसका कम होना ध्यान सिद्धि की एक ऐसी कसौटी है- जिस पर स्वयं को साधक गण जाँच-परख सकते हैं।

🔴 ध्यान साधना की सातवीं और श्रेष्ठतम कसौटी है- संवेदनशीलता यानि कि भाव संवेदना का जागरण। जिसका ध्यान जितना प्रगाढ़ होगा उसमें भाव संवेदना भी उतनी ही सघन होगी। उसकी करुणा भी उतनी ही तीव्र होगी। करुणा जागी है तो जानना चाहिए कि ध्यान सध रहा है। यदि अपनी संवेदनशीलता में पहले की तुलना में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई तो समझना चाहिए कि अभी अपनी ध्यान की प्रगति भी शून्य है। ध्यान सध रहा है- तो परिवार के प्रति, पड़ोसी के प्रति, मिलने-जुलने वालों के प्रति व्यवहार अपने आप ही करुणापूर्ण हो जायेगा। स्वार्थ और अहं में भारी कमी और करुणा का निरन्तर विस्तार ध्यान सिद्धि की श्रेष्ठतम कसौटी है।

🔵 उपर्युक्त वर्णित इन सभी कसौटियों का एक ही मर्म है कि ध्यान- मानव चेतना के रूपांतरण का सबसे समर्थ प्रयोग है। ध्यान ठीक से हो रहा है, तो रूपांतरण भी होगा। यदि पाँच-दस साल ध्यान करने के बाद भी जीवन चेतना में रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो समझना चाहिए कि हमने ध्यान किया ही नहीं। हमने केवल ध्यान के स्थान पर धर्म की रूढ़ि भर निभायी। जबकि ध्यान किसी भी तरह से रूढ़ि नहीं है। यह तो एक बहुत ही गहन वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसे ऊपर बतायी गयी सात कसौटियों के आधार पर कभी भी परखा जा सकता है। यदि आप ध्यान साधक हैं तो आज और अभी इस बात की जाँच कीजिए कि आप की ध्यान साधना सिद्धि के किस सोपान तक पहुँच सकी है। जाँच का यह क्रम एक नियमित अन्तराल में हमेशा बना रहे- इसकी सावधानी हममें से हर एक ध्यान साधक को रखनी चाहिए।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 2003 पृष्ठ 5

👉 आज का सद्चिंतन 25 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Sep 2017


👉 मंदबुद्धि वरदराज

🔴 विद्यालय में वह मंदबुद्धि कहलाता था। उसके अध्यापक उससे नाराज रहते थे क्योंकि उसकी बुद्धि का स्तर औसत से भी कम था। कक्षा में उसका प्रदर्शन सदैव निराशाजनक ही होता था। अपने सहपाठियों के मध्य वह उपहास का विषय था।

🔵 विद्यालय में वह जैसे ही प्रवेश करता, चारों ओर उस पर व्यंग्य बाणों की बौछार सी होने लगती। इन सब बातों से परेशान होकर उसने विद्यालय आना ही छोड़ दिया।

🔴 एक दिन वह मार्ग में निर्थक ही भ्रमण कर रहा था। घूमते हुए उसे जोरों की प्यास लगी। वह इधर-उधर पानी खोजने लगा। अंत में उसे एक कुआं दिखाई दिया। वह वहां गया और प्यास बुझाई। वह काफी थक चुका था, इसलिए पानी पीने के बाद वहीं बैठ गया। उसकी दृष्टि पत्थर पर पड़े उस निशान पर गई जिस पर बार-बार कुएं से पानी खींचने के कारण रस्सी के निशान पड़ गए थे। वह मन ही मन विचार करने लगा कि जब बार-बार पानी खींचने से इतने कठोर पत्थर पर रस्सी के निशान पड़ सकते हैं तो निरंतर अभ्यास से मुझे भी विद्या आ सकती है। उसने यह विचार गांठ में बांध लिया और पुन: विद्यालय जाना आरंभ कर दिया। उसकी लगन देखकर अध्यापकों ने भी उसे सहयोग किया। उसने मन लगाकर अथक परिश्रम किया। कुछ सालों बाद यही विद्यार्थी उद्भट विद्वान वरदराज के रूप में विख्यात हुआ, जिसने संस्कृत में मुग्धबोध और लघुसिद्धांत कौमुदी जैसे ग्रंथों की रचना की।

🔵 आशय यह है कि दुर्बलताएं अपराजेय नहीं होतीं। यदि धैर्य, परिश्रम और लगन से कार्य किया जाए तो उन पर विजय प्राप्त कर प्रशंसनीय लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है।

रविवार, 24 सितंबर 2017

👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग 3)

🔴 आरती का मतलब होता है श्रद्धास्पद का, पूज्य का, देवी माँ का, भगवान् का दुःख बाँटना। उसकी पीड़ा को अपने माथे पर लेना। उनका भार हल्का कर देना। अपने भिखारीपन को भुलाकर उनकी सेवा में अर्पित होना। उनके साथ अपनी एकात्मता की अनुभूति एवं प्रतीति पाना कि जैसे हम दुःखी-पीड़ित होते हैं, थकते हैं, वैसे ही माँ भी थकती होगी। उसे भूख सताती होगी। इसलिए उनका कष्ट अपने माथे पर लेने के लिए आरती उतारी जाती है। दीपों की लहराती जगमग ज्योति के बीच यह भाव व्यक्त किया जाता है कि ‘मैं प्रस्तुत हूँ माँ। जो तू चाहेगी, कहेगी, वही करूंगा।’ लेकिन हम हैं कि उनसे माँगते ही रहते हैं, उनको सताते ही चले जाते हैं।

🔵 माँ मुझे धन दो, यश दो, सन्तान दो, क्या नहीं माँगते। मजे की बात तो यह है कि हमारे पास माँ से माँगने के लिए समय है, उसके पास बैठने के लिए समय नहीं है। इसके लिए बहुत हुआ तो किसी पण्डित, पुजारी को नौकर रख लेंगे। ठीक किसी कुपुत्र या कुपुत्री की तरह, जो अपनी माँ की सेवा न करके, इसके लिए किसी नर्स को रख देती है। भला नर्स की नौकरी और सन्तान की सेवा का सुख या परिणाम क्या समान हो सकता है?

🔴 नवरात्रि के दिनों में देश तो मातृमय हो रहा है, हम मन्दिरों और घरों में जुट भी रहे हैं। लेकिन उस परमानन्द के आदिस्रोत से नहीं जुड़ पा रहे, जहाँ से जीवन मिलता और चलता है। कहाँ है मेलों में मिलन का मूलभाव? किधर है विलग के विलीन होने की स्थिति? हमारे अपने-अपने अहं की दीवारें तो यथावत है। माँ को वाणी से तो माँ कह रहे हैं, जोर-जोर से कह रहे हैं, लेकिन हृदय से उसे माँ मान नहीं पा रहे। लगता है कि हम सिर्फ प्रतीक की परिक्रमा, पूजा एवं कर्मकाण्ड तक ही ठहर गए हैं। हम प्रतीति, प्रीति, श्रद्धा, संवेदना, प्रेम एवं माँ के चरणों में अनुराग की एक सच्ची सन्तान की भाँति निष्कपट हो जी नहीं पा रहे। अगर ऐसा होता तो हमारी यह नवरात्रि लोक परम्परा एवं लोक व्यवहार की लीक न रहकर माँ की अलौकिक प्रभा से जगमग कर रही होती। हमारे जीवनों में माँ का दिव्य ज्योति अवतरण हो रहा होता।

🔵 कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले वर्ष की ही भाँति हम इस वर्ष की नवरात्रि में फिर से चूक रहे हैं। हम माँ के होकर भी माँ के बन नहीं पा रहे। हम केवल रोटी बनकर उसके सामने माथा नवाते हैं। सुख-साधन, दाम, दुकान की कामना का दम्भ लेकर माँ के पास आते हैं। और यह जबरदस्ती करते हैं कि हम जो चाहते हैं, वह तो तुम्हें देना ही पड़ेगा। हाँ हमें तुम्हारे दुःख से कोई सरोकार नहीं रहा। रोज-मर्रा की तरह नवरात्रि के दिनों में भी हम यह नहीं जान पा रहे कि माँ हमसे यह चाहती है कि हम सब उसकी सन्तानें मिल-जुलकर, एक मन और एक प्राण होकर रहें।

🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 73)

🌹  अपना मूल्यांकन भी करते रहें
🔴 यह निर्विवाद सत्य है कि धर्म और सदाचार के आदर्शवादी सिद्धांतों का प्रशिक्षण भाषणों और लेखों से पूरा नहीं हो सकता। ये दोनों माध्यम महत्त्वपूर्ण तो हैं, पर इनका उपयोग इतना ही है कि वातावरण तैयार कर सकें। वास्तविक प्रभाव तो तभी पड़ता है, जब अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करके किसी को प्रभावित किया जाए। चूँकि हमें नए समाज की, नए आदर्शों, जनमानस में प्रतिष्ठापना करनी है, इसलिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि युग निर्माण परिवार के सदस्य दूसरों के सामने अपना अनुकरणीय आदर्श रखें। प्रचार का यही श्रेष्ठ तरीका है। इस पद्धति को अपनाए बिना जनमानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावित एवं प्रेरित किया जाना संभव नहीं। इसलिए सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करे कि उसके जीवन में आलस्य, प्रमाद, अव्यवस्था एवं अनैतिकता की जो दुर्बलताएँ समाई हुई हों, उनका गंभीरतापूर्वक निरीक्षण करे और इस आत्म-चिंतन में जो-जो दोष दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने के लिए एक क्रमबद्ध योजना बनाकर आगे बढ़ चले।
     
🔵 आत्म चिंतन के लिए हम में से हर एक हो अपने से निम्न १० प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तरों को नोट करना चाहिए।
   
🔴 (१) समय जैसी जीवन की बहुमूल्य निधि का हम ठीक प्रकार सदुपयोग करते हैं या नहीं? आलस्य और प्रमाद में उसकी बरबादी तो नहीं होती?

🔵 (२) जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का हमें ध्यान है या नहीं? शरीर सज्जा में ही इस अमूल्य अवसर को नष्ट तो नहीं कर रहे? देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के पुनीत कर्तव्य की उपेक्षा तो नहीं करते?

🔴 (३) अपने विचारधारा एवं गतिविधियों को हमने अंधानुकरण के आधार पर बनाया है या विवेक, दूरदर्शिता एवं आदर्शवादिता के अनुसार उनका निर्धारण किया है?

🔵 (४) मनोविकारों और कुसंस्कारों के शमन करने के लिए हम संघर्षशील रहते हैं या नहीं? छोटे-छोटे कारणों को लेकर हम अपनी मानसिक शांति से हाथ धो बैठने और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध करने की भूल तो नहीं करते।

🔴 (५) कटु भाषण, छिद्रान्वेषण एवं अशुभ कल्पनाएँ करते रहने की आदतें छोड़कर सदा संतुष्ट, प्रयत्नशील एवं हँसमुख रहने की आदत हम डाल रहे हैं या नहीं?

🔵 (६) शरीर, वस्त्र, घर तथा वस्तुओं को स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखने का अभ्यास आरंभ किया या नहीं? श्रम से घृणा तो नहीं करते?

🔴 (७) परिवार को सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक ध्यान एवं समय लगाते हैं या नहीं?

🔵 (८) आहार सात्विकता प्रधान होता है न? चटोरपन की आदत छोड़ी जा रही है न? सप्ताह में एक समय उपवास, जल्दी सोना, जल्दी उठना, आवश्यक ब्रह्मचर्य का नियम पालते हैं या नहीं?

🔴 (९) ईश्वर उपासना, आत्मचिंतन एवं स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम में स्थान दे रखा है या नहीं?

🔵 (१०) आमदनी से अधिक खर्च तो नहीं करते? कोई दुर्व्यसन तो नहीं? बचत करते हैं न?

उपरोक्त दस प्रश्न नित्य अपने आपसे पूछते रहने वाले को जो उत्तर आत्मा दे, उन पर विचार करना चाहिए और जो त्रुटियाँ दृष्टिगोचर हों, उन्हें सुधारने का नित्य ही प्रयत्न करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.104

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.19

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (भाग 3)

🔴 ध्यान की तीसरी कसौटी- जागरुकता है। जागरुकता का अर्थ है- बाह्य जागृति के साथ अन्तः जागृति एक साथ। ध्यान सध रहा है, तो जागरुकता भी अपने आप ही सध जाती है। ध्यान साधक की प्रगाढ़ता में साधक के अन्दर एक गहरी समझ पैदा होती है। वह बाह्य जीवन को भी अच्छी तरह से समझता है और आन्तरिक जीवन को भी। उसे अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों का भली प्रकार बोध हो जाता है। वह जिन्दगी की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को यहाँ तक कि आसानी से नजर अन्दाज कर दी जाने वाली बातों को न केवल समझता है, बल्कि उनका समुचित उपयोग भी कर लेता है। उसे आन्तरिक एवं सूक्ष्म प्रकृति के संकेतों की भी बहुत गहरी समझ होती है। ध्यान की प्रगाढ़ता साधक में जिस क्रम में बढ़ती है, त्यों-त्यों वह मानवीय चेतना के सभी आयामों में जागरुक एवं सक्रिय हो जाता है।
 
🔵 ध्यान की चौथी कसौटी- दौर्मनस्य का समाप्त हो जाना है। सामान्य क्रम में देखा यही जाता है कि मन में एक के बाद एक नयी-नयी इच्छाएँ अंकुरित होती रहती हैं। इनमें से सभी का पूरी हो पाना प्रायः असम्भव होता है। इच्छा पूरी न होने की स्थिति में मनुष्य या तो स्थिति को उसका दोषी मानता है अथवा फिर किसी सम्बद्ध व्यक्ति को। और मन ही मन उससे बैर ठान लेता है। यही दौर्मनस्य की भावदशा है। ध्यान साधना करने वाले व्यक्ति के मन में इच्छाओं की बाढ़ नहीं आया करती है। उसके अन्तःकरण में निरन्तर जलने वाली ज्योति उसके सामने इस सत्य को प्रकाशित करती रहती है कि यहाँ अथवा किसी अन्य लोक में कुछ भी पाने योग्य नहीं है। इसके अलावा उसे इस महासत्य का हमेशा बोध होता है कि सृष्टि में सब कुछ भगवान् महाकाल की इच्छानुसार हो रहा है, फिर भला दोष किसका? जब दोष ही नहीं तब द्वेष क्यों? ये भावनाएँ उसे हमेशा दौर्मनस्य से बचाए रखती है।

🔴 ध्यान की पांचवीं कसौटी है- दुःख का अभाव। ध्यान साधक की चेतना में स्थिरता और नीरवता का इतना अभेद्य कवच चढ़ा रहता है कि उसे दुःख स्पर्श ही नहीं कर पाते। महर्षि पतंजलि ने दुःख को चित्त की चंचलता का परिणाम कहा है। जिसका चित्त जितना ज्यादा चंचल है, वह दुःखी भी उतना ही ज्यादा होता है। जहाँ चंचलता ही नहीं वहाँ दुःख कैसा? चंचल चित्त वाले व्यक्ति एक छोटी सी घटना से भी भारी दुःखी हो जाते हैं। किन्तु जिनका चित्त स्थिर है, उन्हें भारी से भारी दुःख भी विचलित नहीं कर पाते। श्रीमद्भगवद्गीता की भाषा में ‘न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 2003 पृष्ठ 3
http://beta.literature.awgp.in/akhandjyoti/2003/September/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 24 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Sep 2017


शनिवार, 23 सितंबर 2017

👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग 2)

🔴 जगन्माता की श्रद्धा में डूबे, अपने अनुष्ठान संकल्प-साधना में निमग्न सब ऐसे होते हैं, जैसे वे एक ही वृक्ष के पत्ते हों, फूल हों, फल हों, फल में निहित बीज हों। वे सिर्फ पहचान पाना चाहते हैं, अपने अस्तित्व के मूल की पहचान। अपनी सबकी माँ की पहचान, जो सब कुछ देती है, सतत् अविराम। जीवन भी उससे मिलता है, जीवन यापन के साधना की दात्री भी वही है। हम असंख्य इच्छाओं की पूर्ति की अछोर कल्प वल्ली हैं। लेकिन हमारी ये सभी इच्छाएँ माँ से जुड़कर ही पूर्ण होती है। जब हम अपने अन्तर का सब कुछ माँ के चरणों में न्यौछावर कर देते हैं और एक आन्तरिक शून्यता की अनुभूति पाते हैं, तो माँ बरबस ही इस शून्यता में पूर्णता भर देती है। क्योंकि शून्यता में ही पूर्णता भरती है। और जब अनेक एक साथ मिलकर मेला बनकर, माला की तरह गुँथकर, आन्तरिक शून्यता को पाते हैं, जो जीवन की परम सम्भावना प्रकट होती है।

🔵 जीवन की समस्त सम्भावनाओं की कोख क्या है? जिस कोख में ये सम्भावनाएँ, इस प्रकार के भाव और प्रतीति पलती हैं और जहाँ से वह प्रसवित होती है, वह है मनुष्य के लिए जननी की कोख और सृष्टि के लिए धरती की कोख। इसमें फर्क कोख का नहीं, क्रम का है, कर्म का है, ज्ञान का है। हमारी जननी का माँ होना ही हमारे लिए और सृष्टि के लिए विशिष्ट बात है। जन्म देना और जन्म लेना एक भौतिक एवं प्राकृतिक बात है। पर उसका अच्छा या बुरा होना, मंगलमय या अमंगलपूर्ण होना हमारी और प्रकृति की प्रवृत्ति, संकल्प और संस्कार पर निर्भर है। नारी जननी क्यों बनी? धरती पर अंकुर क्यों उगा? यदि वह ऊटपटांग ढंग से उगा होता तो जंगली होगा और यही किसी माली ने जतन से उगाया होगा तो उपवन और उद्यान की महक लिए होगा। यही क्रम है सृष्टि का, यही सार है मनुष्य के जन्मने और जीने का।यही है जननी के माँ होने का पुण्य प्रताप। अनादि को भी अपना आदि माँ से ही मिलता है।

🔴 नवरात्रि के नौ दिन इसी अनादि की आदि ‘माँ’ की पहचान करने के लिए है। अपवाद की बात छोड़ दें तो प्रायः किसी को यह सच्ची पहचान मिल नहीं पायी। हम माँ के द्वार दरबार में आते हैं, घर पर पूजा बेरी के ऊपर रखे माँ के चित्र के सामने माथा नवाते हैं, पर हृदय नहीं उड़ेलते। आन्तरिक शून्यता की अनुभूति नहीं कर पाते। और शून्यता के बिना माँ पूर्णता दे भी तो कैसे? हम दिखावे के लिए माँ की आरती उतारते हैं, पर दरअसल हम अपना आरत (दुःख) माँ के माथे मढ़ते हैं। भूखे रहकर मढ़ते हैं, कीर्तन करके मढ़ते हैं, जप करके मढ़ते हैं। उसकी पूजा करने का धोखा देकर मढ़ते हैं। जैसे माँ नहीं अपना दुःख, पीड़ा फेंकने का कोई कूड़ा-घर हो। भला यह कैसी पूजा, जिसमें श्रद्धा कम, लोभ और भय अधिक समाया रहता है। तनिक निहारें तो सही अपने अंतर्मन को कि नवरात्रि के ये नौ दिन हमारी श्रद्धा के हैं या स्वार्थ के? प्रार्थना के हैं अथवा फिर कामना या वासना के।

🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2002/April/v1.12

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 72)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  
🔴 यह आवश्यकता हम लोगों को ही पूरी करनी होगी। दूसरों लोग इस मोर्चे से पीछे हट रहे हैं। उन्हें नेतागिरी यश, प्रशंसा और मान प्राप्त करने की ललक तो है, पर अपने को आदर्शवाद की प्रतीक प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत करने का साहस नहीं हो रहा है। आज के अगणित तथाकथित लोकसेवी अवांछनीय लोकमान्यताओं के ही अनुगामी बने हुए हैं। धार्मिक क्षेत्र के अधिकांश नेता, संत-महंत जनता की रूढ़ियों, मूढ़ताओं और अंध-परम्पराओं का पोषण उनकी अवांछनीयताओं को समझते हुए भी करते रहते हैं। राजनैतिक नेता अपना चुनाव जीतने के लिए वोटरों की अनुचित माँगें पूरी करने के लिए भी सिर झुकाए रहते हैं।
     
🔵 इस स्थिति में पड़े हुए लोग जनमानस के परिष्कार जैसी लोकमंगल की मूलभूत आवश्यकता पूर्ण कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। इस प्रयोजन की पूर्ति वे करेंगे, जिनमें लोकरंजन की अपेक्षा लोकमंगल के लिए आगे बढ़ने का, निंदा, अपयश और विरोध सहने का साहस हो। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने बंदूक की गोलियाँ खाई थीं। बौद्धिक पराधीनता के विरुद्ध छेड़े हुए अपने विचार क्रांति संग्राम में भाग लेने वाले सेनानियों को कम से कम गाली खाने के लिए तैयार रहना ही होगा, जो गाली खाने से डरेगा, वह अवांछनीयता के विरुद्ध आवाज कैसे उठा सकेगा?
   
🔴 अनुचित से लड़ कैसे सकेगा? इसलिए युग परिवर्तन के महान् अभियान का नेतृत्व कर सकने की आवश्यकता शर्त यह है कि इस क्षेत्र में कोई यश और मान पाने के लिए नहीं विरोध, निंदा और तिरस्कार पाने की हिम्मत लेकर आगे आए। नव निर्माण का सुधारात्मक अभियान गतिशील बनाने में मिलने वाले विरोध और तिरस्कार को सहने के लिए आगे कौन आए? इसके लिए प्रखर मनोबल और प्रचंड साहस की आवश्यकता होती है। इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मूर्धन्य स्तर के लोग भी साहस विहीन लुंज-पुंज दिखाई दे रहे हैं और शौर्य पराक्रम के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों से डरकर आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

🔵 आज सच्चे अध्यात्म को कल्पना लोक से उतार कर व्यावहारिक जीवन में उतारे जाने की नितांत आवश्यकता है। इसके बिना हम आत्मिक प्रगति न कर सकेंगे। अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित न कर सकेंगे और यदि यह न किया जा सका, तो समाज के नव निर्माण का, धरती पर स्वर्ग के अवतरण का प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपना समस्त साहस बटोर कर अपनी वासनाओं, तृष्णाओं, संकीर्णताओं और स्वार्थपरताओं से लड़ पड़ें। इन भव बंधनों को काट डालें और जीवन को ऐसा प्रकाशवान् बनाएँ, जिसकी आभा से वर्तमान युग का सारा अंधकार तिरोहित हो सके और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ आलोकित हो उठें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.102

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.18

👉 Shrutayudh and Bhasmasur

🔴 Both the devils had got boons due to their austerities. It was their immoral intelligence, which made them to choose such things that ultimately became the cause of their deaths. Shrutayudh had got a Gada, which he had got by the boon from Lord Shiva on the condition that he would not misuse it. If he did then it would in turn destroy him. In the battle of Mahabharata, in a fit of anger he used it on Shri Krishna who was charioteer of Arjun. The Gada returned from midway and tore him apart. Bhasmasur had asked for a boon that the person would be destroyed if he places his hand on his head. When he started misusing this power, God created illusion and made him keep his hand on his own head, which resulted in his death.

🔵 It is the direction of choice that decides our destiny and future.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Sep 2017

🔵 प्रेमास्पद के प्राणों में अपने प्राण, अपनी इच्छा और आकाँक्षायें घुलाकर व्यक्ति उस “अहंता” से बाहर निकल आता है तो पाप और पतन की ओर प्रेरित कर ऐसे दिव्य मनुष्य को नष्ट करता रहता है। प्रेमी कभी यह नहीं चाहता मुझे कुछ मिले वरन् वह यह चाहता है कि अपने प्रेमी के प्रति अपनी निष्ठा कैसे प्रतिपादित हो इसलिये वह अपनी बातें भूलकर केवल प्रेमी की इच्छाओं में मिलकर रहता है, जब हम अपने आपको दूसरों के अधिकार में डाल देंगे तो पाप और वासना जैसी स्थिति आवेगी ही क्यों और तब मनुष्य अपने जीवन-लक्ष्य से पतित ही क्यों होगा? सच्चा प्रेम तो प्रेमी की उपेक्षा से भी रीझता है। प्रेम की तो व्याकुलता भी मानव अन्तःकरण को निर्मल शान्ति प्रदान करती है।

🔴 मन जो इधर-उधर के विषयों और तुच्छ कामनाओं में भटकता है, प्रेम उसके लिये बाँध देने को रस्सी की तरह है। प्रेम की सुधा पिये हुये मन कभी भटक नहीं सकता, वह तो अपना सब कुछ त्याग करने को तैयार रहता है। जो समर्पित कर सकता है, पाने का सच्चा सुख तो उसे ही मिलता है। प्रेमी को भोग तो क्या स्वर्ग भी आसक्त नहीं कर सकते और परमात्मा को पाने के लिये भी तो यह सन्तुलन आवश्यक है। प्रेम साधना द्वारा मनुष्य लौकिक जीवन का पूर्ण रसास्वादन करता हुआ पारमार्थिक लक्ष्य पूर्ण करता है। इसलिये प्रेम से बड़ी मनुष्य-जीवन में और कोई उपलब्धि नहीं।

🔵 स्वाति नक्षत्र के बादल चातक के मुख पर क्या चुपचाप जल बरसा जाते हैं? नहीं, वे गरज कर कठोर ध्वनि करते और डराते हैं। पत्थर ही नहीं कई बार तो रोष में भरकर बिजली भी गिराता है, वर्षा और आँधी के थपेड़े क्या कम कष्ट देते हैं किन्तु चातक के मन में अपने प्रियतम के प्रति क्या कभी नाराजी आती है? तुलसी दास ने बताया कि यह प्रेम की ही महिमा है कि चालक पयोद के इन दोषों में भी उसके गुण ही देखता है। अमंगल सी दिखने वाली भगवान की सृष्टि में कठिनाइयों के झंझावात कम हैं, न अभाव और कष्ट-पीड़ायें, एक-एक पग भार है और लक्ष्य प्राप्ति का बाधक है, पर यह केवल उनके लिये है जिन्होंने प्रेम तत्व को जाना नहीं। प्रेम तो समुद्र की तरह अगाध है, उसमें जितने गहरे पैठा जाये उतने ही बहुमूल्य उपहार मिलते और मानव-जीवन को धन्य बनाते चले जाते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (भाग 2)

🔴 महासिद्ध सरहपा कहते हैं कि साधक यदि अपने ध्यान को जाँचना चाहता है तो उसे निम्न मानदण्डों पर अपने को परखना चाहिए।- 1. आहार संयम, 2. वाणी का संयम, 3. जागरुकता, 4. दौर्मनस्य का न होना, 5. दुःख का अभाव, 6. श्वास की संख्या में कमी हो जाना और 7. संवेदनशीलता। ये सात ऐसे मानदण्ड हैं- जिनके आधार पर कोई भी साधक कभी भी अपने को जाँच सकता है कि उसकी ध्यान साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ़ हो रही है।
 
🔵 पहली कसौटी आहार संयम की है। ध्यान साधक में यदि आहार संयम सध रहा है तो समझना चाहिए उसका ध्यान भी सध रहा है। यह आहार संयम है क्या? तो इसके उत्तर में महान् योगी आचार्य शंकर कहते हैं- साधक को आहार कुछ इस तरह से लेना चाहिए जैसे कि औषधि ली जाती है। यानि की आहार वही हो और उतना ही हो जितना कि देह के पोषण के लिए पर्याप्त है। भगवद्गीता सात्त्विक आहार को परिभाषित करते हुए ध्यान साधक को ‘लघ्वाशी’ यानि कि कम खाने का निर्देश देती है। संक्षेप में ज्यों-ज्यों ध्यान प्रगाढ़ होता है साधक की स्वाद में रुचि समाप्त होती जाती है। ध्यान द्वारा मिलने वाली ऊर्जा बढ़ने के कारण उसका आहार भी बहुत न्यून हो जाता है।

🔴 दूसरी कसौटी है- वाणी संयम। वाणी संयम का अर्थ प्रायः लोग मौन होना समझ लेते हैं। लेकिन ऐसा उसी तरह से नहीं है जिस तरह से आहार संयम का अर्थ उपवास करना नहीं है। इसका अर्थ इतना भर है कि ध्यान साधना ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों अध्यात्म लोक के द्वार खुलते जाते हैं। ज्ञान और प्रकाश का एक नया लोक उसे मिल जाता है। फिर उसकी रुचि बेवजह की बातों में अपने आप ही समाप्त हो जाती है। इस क्रम में एक बड़ी रहस्यपूर्ण स्थिति भी आती है, जिसे केवल ध्यान साधक ही समझ सकते हैं कि ध्यान की प्रगाढ़ता में वाणी की अपेक्षा अन्तश्चेतना कहीं अधिक सक्रिय एवं प्रभावी होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 2003 पृष्ठ 3

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