गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 23)

👉 भक्ति से जुड़ी शक्ति
    
🔷 १९५८ के सहस्रकुण्डीय महायज्ञ के सफल प्रयोग परीक्षण ने अपनी श्रद्धा-विश्वास असंख्य गुना बढ़ा दिया और बाद में निर्देशित हुए कामों का सिलसिला चल पड़ा, जिनका कि उल्लेख पहले भी हो चुका है। साहित्य सृजन, संगठन, केन्द्रों की खर्चीली व्यवस्था, अभावग्रस्तों की सहायता जैसे काम इस प्रकार चलते रहे, मानो वे सभी कार्य किसी दूसरे ने किए हों और अपने सिर पर श्रेय अनायास ही लद गया हो। यह वैयक्तिक सफलता का प्रसंग नहीं माना जाना चाहिए कि यह किसी के पुरुषार्थ का प्रतिफल सामने आया, वरन् यह समझा जाना चाहिए कि भक्ति के साथ शक्ति का भी अविच्छिन्न सामंजस्य हैं। निर्देशक शक्ति अपने संकेतों पर चलने वाले समर्पित व्यक्ति के लिए वैसी ही व्यवस्था भी करती है, जैसी कि मोर्चे पर लड़ने जाने वाले सैनिक के लिए आवश्यक सुविधा सामग्री का प्रबन्ध सेनापति या रक्षा विभाग द्वारा किया जाता है।
  
🔶 वैयक्तिक प्रयास से बन पड़ने में जिन्हें संभव समझा जा सकता है, उन छिटपुट कामों को संपन्न करने के उपरांत निर्देशक ने अपनी कठपुतली में इतनी क्षमता भर दी कि वह संकेतों के इशारे भर से मनमोहक नृत्य अभिनय कर सके। इतना बन पड़ने के उपरान्त वह भारी वजन लादा गया, जिसे सम्पन्न करने की कोई व्यक्ति विशेष कल्पना तक नहीं कर सकता, जिसे वह अदृश्य सत्ता ही कर सकती है, जिसने इतना बड़ा पसारा बनाकर खड़ा किया है और जो मनुष्य को एक सीमा तक नटखटपन बरतने तक की छूट देने के उपरांत जब देखती है कि उद्दण्डता मर्यादा से बाहर जा रही है, तब उसके कान पकड़कर सीधी राह अपनाने के लिए बाधित ही नहीं, प्रताड़ित भी कर सकती है। इसी को युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। यही है इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पना, महाक्रान्ति की अभूतपूर्व परियोजना।
  
🔷 प्रस्तुत प्रयोजन के लिए जितना कुछ दृश्य रूप में मानवी प्रयत्नों के अन्तर्गत सम्भव था, उसे युग निर्माण योजना के अन्तर्गत पिछले कई वर्षों से किया जाता रहा है। उसमें जो सफलता मिली है, वह लगभग इसी स्तर की मानी जा सकती है जितनी की मानवी पुरुषार्थ के अंतर्गत आने की परिकल्पना की जा सकती है। मानवी पुरुषार्थ और साधना के समन्वय से संसार के इतिहास में बहुत कुछ ऐसा बन पड़ा है, जिसे असाधारण भी कहा जा सकता है और आश्चर्यजनक भी। इसी आधार पर मिशन के दृश्य प्रयास जिस प्रकार बन पड़े हैं और उसके प्रतिफल जिस प्रकार के सामने आए, उन्हीं में इन्हें भी एक गिना जा सकता है।

  .... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 25

👉 सद्गुरु का स्मरण

🔷 राजगृह नगर प्रायः भगवान् तथागत के श्री चरणों के स्पर्श से पावन होता रहता था। नगरवासियों में भगवान् के प्रति सहज प्रीति थी। वे सब उठते, बैठते एक-दूसरे से मिलने पर ‘नमो बुद्धस्स’ कहकर तथागत का स्मरण कर लेते थे। इस नगर में दो बालकों की मित्रता बड़ी चर्चित थी। सुवीर और सुयश यही नाम थे उनके। किशोरवय के ये दोनों बालक भाँति-भाँति के खेल-खेला करते। अचरज की बात यह थी सुयश हमेशा जीतता था और सुवीर हमेशा हार जाता। इसमें सबसे अचरज तो इस बात का था कि जो सदा जीतता था, वह हारने वाले से सभी दृष्टियों से कमजोर था।

🔶 सुवीर ने अपने जीतने के लिए सभी उपाय किये। खेलने का ज्यादा अभ्यास किया, परन्तु सफलता न मिली। लेकिन परिणाम पहले की ही भाँति बना रहा। सुवीर को इस बात की भारी चिन्ता था कि आखिरकार सुयश के लगातार जीतने का कारण क्या है? हाँ एक बात सुयश में बड़े ही साफ तौर पर नजर आती थी, कि वह आश्चर्यजनक ढंग से शान्त रहता था। उसमें जीत के लिए कभी कोई आतुरता नहीं झलकती थी। उसमें जीतने के लिए कभी कोई आग्रह नहीं था। वह बस खेलता था, सम्पूर्ण मनोयोग से किन्तु अनाग्रह से।

🔷 कोई फलाकाँक्षा नहीं थी उसमें। इसे देखकर ऐसा लगता था, जैसे वह अपने आप में केन्द्रित है, स्वयं में ठहरा हुआ है। उसमें एक अनोखी गहराई थी। वह ओछा नहीं था, न ही उसमें कोई छिछलापन था। उसके अंतस् में जैसे कोई लौ निष्कम्प जलती थी। उसके चारों ओर एक प्रसादपूर्ण प्रभामण्डल था। शायद इसीलिए बार-बार हारने पर भी सुवीर उसका शत्रु न बन पाया था। उसकी मित्रता कायम थी। सुयश चाहे जितनी बार जीतता, परन्तु उसमें कभी कोई अहंता न आती थी। जीतना जैसे उसके लिए कुछ खास था ही नहीं। खेलना ही उसके लिए सब कुछ था, फिर जीतें या हारें, इससे उसको कोई प्रयोजन नहीं था। फिर भी वह जीतता था।

🔶 सुवीर, सुयश के प्रत्येक व्यवहार को बारीकी से देखता था। इस क्रम में उसने देखा कि सुयश प्रत्येक खेल शुरू करने से पहले आँख बन्द करके एक क्षण को निस्तब्ध हो जाता था। कुछ इस तरह जैसे कि सारा संसार रुक गया हो। हाँ वह अपने होठों में जरूर कुछ बुदबुदाता था। जैसे कि वह कोई प्रार्थना कर रहा हो या कि फिर कोई मंत्रोच्चार करता हो अथवा अपने ईष्ट का स्मरण कर रहा हो।

🔷 अन्ततः एक दिन सुवीर ने सुयश से यह रहस्य पूछा- प्रिय मित्र, तुम खेल शुरू करने से पहले यह क्या करते हो? हर खेल शुरू होने से पहले तुम किस दुनिया में खो जाते हो। सुयश ने कहा- प्रिय मित्र! मैं तो बस भगवान् का स्मरण करता हूँ। ‘नमो बुद्धस्स’ का पाठ करता हूँ। शायद इसीलिए मैं जीत जाता हूँ। परन्तु मुझे हर बार-हर समय यही लगता है कि यह जीत मेरी नहीं, भगवान् की है। मैं नहीं जीत रहा, भगवान् जीत रहे हैं।

🔶 सुयश की बातें सुनकर उस दिन से सुवीर ने भी नमो बुद्धस्स का पाठ शुरू कर दिया। हालाँकि उसे पहले से कोई अभ्यास नहीं था, फिर भी उसे इसमें धीरे-धीरे रस आने लगा। शुरुआत तो तोता रटन्त से ही हुई थी, पर मंत्रोच्चार के परिणाम मन पर दिखाई देने लगे। गहराई में न सही पर सतह पर इसके स्पष्ट फल दिखाई देने लगे। वह थोड़ा शान्त होने लगा। उसकी उच्छृंखलता कम होने लगी। थोड़ा छिछलापन कम होने लगा। उसकी हार की पीड़ा कम होने लगी। जीतने की महत्त्वाकाँक्षा भी थम सी गयी। खेल बस खेलने के लिए है, ऐसा भाव उसमें जागने लगा।

🔷 भगवान् के स्मरण में वह अनजाने ही अपनी अन्तश्चेतना में डूबने लगा। शुरू तो किया था इसलिए कि खेल में जीत जाऊँ। लेकिन धीरे-धीरे जीत-हार की बात ही बिसर गयी। अब तो बस स्मरण में आनन्द बरसने लगा। पहले तो खेल के शुरू-शुरू में याद करता था, पर बाद में जब कभी एकान्त मिल जाता तो बैठकर नमो-बुद्धस्स-नमो बुद्धस्स का जाप करने लगता। यहाँ तक कि कुछ दिन बीतने पर खेल गौण हो गया और जाप प्रमुख हो गया। एक मिश्री सी उसके मुँह में घुलने लगी। सुवीर बुद्ध स्मरण में विभोर होने लगा। नमो बुद्धस्स का जप करते हुए उसे एक खुला आकाश दिखाई पड़ने लगा। धीरे-धीरे उसकी आकाँक्षाएँ खो गयीं। सब समय एक शान्त धारा उसके भीतर बहने लगी।

🔶 एक दिन वह अपने पिता के साथ लकड़ी काटने के लिए जंगल गया। लौटने पर पिता-पुत्र दोनों ही रास्ते में श्मशान के पास बैलों को खोलकर थोड़ी देर विश्राम के लिए रुके। भरी दोपहरी थी और वे थक गए थे, इसलिए सो गए। जगने पर देखा उनके बैल नगर में चले गए हैं। पिता ने सुवीर से कहा, बेटा! तुम यहीं रुककर गाड़ी और लकड़ी की रखवाली करो, मैं बैलों को लेकर आता हूँ। काफी खोज-बीन करने पर बैल तो मिल गए, पर तब तक सूर्य ढल चुका था। सूर्य ढलने के साथ ही नगर द्वार बन्द हो गया। अमावस की अंधेरी रात, इकलौता पुत्र अकेला श्मशान में। पिता को भारी चिन्ता हुई, पर क्या करे, विवशता ने उसे जकड़ दिया।

🔷 उधर सुवीर अमावस की अंधेरी रात में मरघट में अकेला था। इतना अकेलापन उसे पहली बार मिला था। पर उसे यहाँ डर लगने के बजाय बड़े आनन्द की अनुभूति हुई। वह भक्ति और प्रीति के साथ ‘नमो बुद्धस्स’ का जप करने लगा। जप करते-करते हृदय के तार जुड़ गए, भक्ति की संगीत जम गया, अन्तश्चेतना की वीणा बजने लगी। पहली दफा उसे ध्यान की झलक मिली। धीरे-धीरे वह ध्यान में डूब गया। यह बड़ी गहरी अनुभूति थी। सब तरफ से सुख बरस रहा था, पर शान्ति उसे भिगो रही थी। शरीर सोया था, अन्तर में जागरण का पर्व था। उजियारा ही उजियारा था। जैसे हजार-हजार सूरज एक साथ जग गए। जीवन सब तरफ से प्रकाशित हो गया। जो घटना किसी के लिए अभिशाप बन सकती थी, उसके लिए वरदान बन गयी।

🔶 अमावस की उस रात्रि में महानिशाकाल होते ही श्मशान जाग्रत् हो उठा। ब्रह्मराक्षस, पिशाच, योगिनियाँ, डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी के यूथ वहाँ नृत्य करने लगे। श्मशान का सम्पूर्ण वातावरण भयावह हो गया। परन्तु सुवीर की आत्मचेतना किसी अलौकिक राज्य में निमग्न थी। एक आध्यात्मिक प्रभामण्डल उसे घेरे था। नृत्य कर रही इन सूक्ष्म सत्ताओं ने जब उसकी यह भावदशा देखी, तो उन्होंने अपने को धन्य माना। वे भागे हुए गए और सम्राट के महल से सोने के बर्तनों में भोजन लेकर आए। उन सबने मिलकर उसे भोजन कराया एवं सेवा की। प्रातः होते ही वे सभी सूक्ष्म सत्ताएँ अदृश्य हो गयीं।

🔷 इधर सम्राट के सिपाहियों ने महल के खोये हुए बर्तनों की खोज की। और खोजते हुए उन्होंने सुवीर को पकड़ लिया। बन्दी सुवीर को सम्राट के सामने लाया गया। उन दिनों बिम्बसार का शासन था। वह स्वयं भगवान् तथागत के भक्त थे। उन्होंने सुवीर से सारी बात जाननी चाही। सुवीर ने भी उत्तर में सम्राट बिम्बसार को प्रारम्भ से सारी कथा कह सुनायी। चकित और हतप्रभ सम्राट उस बालक को लेकर भगवान् के पास पहुँचे। भगवान् इन दिनों राजगृह में ही ठहरे हुए थे। सारी बातें सुनकर भगवान् ने कहा- सम्राट! यह बालक ठीक कह रहा है। बुद्धानुस्मृति स्वयं के ही परम रूप की स्मृति है। जब तुम कहते हो ‘नमो बुद्धस्स’ तो तुम अपने ही परम दशा का स्मरण कर रहे हो।

🔶 यह सतह के द्वारा गहराई की पुकार है। यह परिधि के द्वारा केन्द्र का स्मरण है। यह कहते हुए उन्होंने यह धम्म गाथा कही-

🔷 सुप्पबुद्धं पबुज्झति सदा गोतम सावका। येसं दिवा च रत्तो च निच्चं बुद्धगता सति॥

🔶 ‘जिनकी स्मृति दिन-रात सदा बुद्ध में लीन रहती है, वे गौतम के शिष्य सदा सुप्रबोध के साथ सोते और जागते हैं।’ भगवान् की इस बात ने सम्राट बिम्बसार को यह बोध दिया कि सद्गुरु के स्मरण से शिष्य सहज ही परम भावदशा को उपलब्ध हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 2003

👉 आज का सद्चिंतन 11 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 October 2018


👉 आश्विन नवरात्रि:- शक्ति आराधना की है यह वेला

🔷 नवरात्रि शक्ति साधना का पर्व है। वैसे तो माता का प्रेम अपनी संतान पर सदा ही बरसता रहता है, पर कभी-कभी यह प्रेम छलक पड़ता है, तब वह अपनी संतान को सीने से लगाकर अपने प्यार का अहसास कराती है। संरक्षण का आश्वासन देती है। नवरात्रि की समयावधि भी आद्यशक्ति की स्नेहाभिव्यक्ति का ऐसा ही विशिष्ट काल है। यही शक्ति विश्व के कण-कण में विद्यमान है। इसी तथ्य को इंगित करते हुए कहा गया है-

🔶 तेजोयस्य विराजते स बलवान स्थूले बुकः प्रत्ययः। - देवी भागवत्

🔷 अर्थात्- शक्ति व तेज से प्रत्येक स्थूल पदार्थ में विद्यमान अतुलित बलशाली परमेश्वरी हमारी रक्षा और विकास करे।

🔶 वर्षा अपने साथ-साथ हरियाली की छटा लेकर आता है। ग्रीष्म की तपती दोपहरी में वृक्षों की छाया मन को कितना सुकून पहुँचाती है। पर कितने लोग वृक्षों की हरियाली को बनाये रखने में योगदान देते हैं। मनुष्य की दुर्बुद्धि तो क्षणिक लाभ के लिए छाया देने वाली वृक्ष को भी जड़ से काटने पर जुटी हुई है। यही व्यवहार हम उस आद्यशक्ति जगन्माता के साथ कर रहे हैं। परिणाम में हमें उनके प्यार-दुलार के बदले उनका प्रलयंकारी विध्वंस देखने को मिल रहा है। जब पुत्र बार-बार समझाने पर भी नहीं मानता तो माता को अपना रौद्र रूप दिखाने के लिए विवश होना ही पड़ता है। आद्यशक्ति जगन्माता भी इन दिनों हमें बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि अब आत्मसुधार एवं सत्कर्म के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।

🔷 उस परम शक्ति की आशा एवं अपेक्षा के अनुरूप स्वयं को गढ़े बिना हमारा त्राण संभव नहीं है। यह पृथ्वी सदाचार पर ही टिकी हुई है। न्याय को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सारा विश्व गणित के समीकरण जैसा है, इसे चाहे जैसा उलटो-पलटो, वह अपना संतुलन बनाए रखता है।

🔶 मनुष्य पर दैवी और आसुरी दोनों ही चेतनाओं का प्रभाव है, वह जिस ओर उन्मुख होगा वैसा ही उसका स्वरूप बनता जाएगा। जड़ता एवं माया में लिप्त होते चलने पर वह अधोगति का अधिकारी होता है और पाप, पतन और नर्क की दुर्गति में गिर जाता है। परन्तु यदि वह अपनी मूल प्रकृति सदाचार का निर्वाह करे तो बंधन से मुक्ति निश्चित है। फिर उसे पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती। आवश्यकता अपना सही स्वरूप जानने भर की है।

🔷 इसके लिए प्रयास करने का सबसे उपयुक्त समय यही है। शास्त्रकारों से लेकर ऋषि-मनीषियों सभी ने एकमत होकर शारदीय नवरात्रि की महिमा का गुणगान किया है। सामान्यतः गायत्री परिवार से जुड़ा प्रत्येक साधक इस समयावधि में गायत्री महामंत्र के 24 हजार का लघु अनुष्ठान अवश्य ही करता है। अनुष्ठान की विधि-व्यवस्था से भी परिजन अपरिचित नहीं हैं। वैसे इसे गायत्री महाविज्ञान के प्रथम भाग से पढ़कर भी जाना जा सकता है। जप के लिए गायत्री महामंत्र से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। इसे गुरुमंत्र भी कहा गया है। यह महामंत्र बाह्य परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के साथ-साथ अन्तः चेतना के परिष्कार के लिए भी सर्वश्रेष्ठ है। वेदों में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान का सारा वैभव बीज रूप में इन थोड़े से अक्षरों में विद्यमान है। साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें गायत्री महामंत्र के जप को प्रथम स्थान दिया गया है।

🔶 इस बार हमारी साधना बाह्य जड़ता को दूर करने तक ही सीमित न हो। हम अपनी आँतरिक जड़ता को मिटाने का प्रयास करें। व्यर्थ के ईर्ष्या, द्वेष, प्रपंच में निमग्न मन की गतिविधियों को ‘स्व’ की ओर उन्मुख करें। क्योंकि जो जड़ पदार्थों से अधिक प्रेम करेगा, उसे उनका स्वामित्व, संग्रह, उपभोग भी उतना ही उच्चतर लगेगा। मोह और अहंकार के पाश में वे उतनी ही दृढ़ता से बंधेंगे। निर्जीव जड़ पदार्थों से जड़ता ही बढ़ेगी।

🔷 नवरात्रि के पावन पर्व पर देवता अनुदान-वरदान देने के लिए स्वयं लालायित रहते हैं। ऐसे दुर्लभ समय का उपयोग हम जड़ता में अनुरक्त होकर न बिताएँ, चेतना के करीब जाएँ। ईश्वर चेतन है इसीलिए उसका अंश जीव भी चैतन्य स्वरूप है। साथ ही उसमें वे सब विशेषताएँ मौजूद हैं, जो उसके मूल उद्गम परमात्मा में है। वह अपने उद्गम केन्द्र का सत्गुण अपने में गहराई तक धारण किए हुए है। जब भी वह चेतना अशक्त या अस्त-व्यस्त होती है तो शरीर का ढाँचा भी लड़खड़ाने लगता है। यदि सच्ची जिज्ञासा का सहारा लिया जाय, तो इस सत्य को अनुभव भी किया जा सकता है। दैवी अनुशासन के अनुरूप जो अपनी जीवनचर्या का निर्धारण करने में सक्षम होता है वही इस सत्य का साक्षात्कार कर पाता है। इस यात्रा में स्वयं से कठोर संघर्ष करना पड़ता है, पर आत्मबल सम्पन्न साधक लक्ष्य तक पहुँच ही जाते हैं।

🔶 मनुष्य का जीवन प्रतिक्षण गतिशील है, वह जो कुछ है वह नहीं रहता है। उसे जितना भी हो सके आगे बढ़ना है। अपनी वर्तमान परिधि से निकलकर अधिक विस्तृत सीमाओं में प्रवेश करना है। एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाना है। एक स्तर से चलकर दूसरे स्तर तक पहुँचना है। अपने चेतन होने का प्रमाण देना है। उसे इस महापुरुषार्थ को कर दिखाना होगा कि सुरदुर्लभ मानव जीवन तृष्णा एवं वासनाओं की वेदी पर चढ़ा देने के लिए नहीं है, वरन् उच्च आदर्शों की पवित्र वेदिका पर उत्सर्ग कर देने के लिए है। यदि संकल्पपूर्ण पुरुषार्थ एवं लगन हो तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़कर श्रेय प्राप्त न कर सकें।

🔷 नवरात्रि की बेला शक्ति आराधना की बेला है। माता के विशेष अनुदानों से लाभान्वित होने की बेला है। अपनी साधना तपस्या द्वारा हम स्वयं ही अपने बाह्य एवं अंतर को साफ-सुथरा कर लें। अन्यथा जगन्माता को यह कार्य बलपूर्वक करना पड़ेगा। हम चाहें या न चाहें परिवर्तन तो होना ही है, सृष्टि की संचालिनी शक्ति इस विश्व-वसुन्धरा के कल्याण के लिए कटिबद्ध है। आत्मसुधार कर हम भी उसके उद्देश्य में सहयोगी बनें, यही इस नवरात्रि का संदेश है।

📖 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 2003 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2003/September/v1.37

👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि विधान

🔷 नवरात्रि साधना को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार−विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है।

🔶 जप संख्या के बारे में विधान यह है कि 9 दिनों में 24 हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। चूँकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से 45 मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। वस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।

🔷 आज कल हर बात में नकलीपन की भरमार है मालाएँ भी बाजार में नकली लकड़ी की बिकती हैं अच्छा यह कि उस में छल कपट न हो जिस चीज की है उसी की जानी और बताई जाय। कुछ के बदले में कुछ मिलने का भ्रम न रहे। तुलसी, चन्दन और रुद्राक्ष की मालाएँ अधिक पवित्र मानी गई हैं। इनमें से प्रायः चन्दन की ही आसानी से असली मिल सकती है। गायत्री तप में तुलसी की माला को प्रधान माना गया है, पर वह अपने यहाँ बोई हुई सूखी लकड़ी की हो और अपने सामने बने तो ही कुछ विश्वास की बात हो सकती है। बाजार में अरहर की लकड़ी ही तुलसी के नाम पर हर दिन टनों की तादाद में बनती और बिकती देखी जाती है। हमें चन्दन की माला ही आसानी से मिल सकेगी यों उससे भी सस्ती लकड़ी पर चन्दन का सेन्ट चुपड़ कर धोखे बाजी खूब चलती है। सावधानी बरतने पर यह समस्या आसानी से हल हो सकती है और असली चन्दन की माला मिल सकती है।

🔶 एक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारण तथा एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। अनुष्ठान में 27 मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती हैं। देखा जाय कि अपनी गति से इतना जप करने में कितना समय लगेगा। यह हिसाब लग जाने पर यह सोचना होगा कि प्रातः इतना समय मिलता है या नहीं। उसी अवधि में यह विधान पूरा हो सके प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए। पर यदि अन्य अनिवार्य कार्य करने हैं, तो समय का विभाजन प्रातः और सायं दो बार में किया जा सकता है। उन दिनों प्रायः 6 बजे सूर्योदय होता है। दो घण्टा पूर्व अर्थात् 4 बजे से जप आरम्भ किया जा सकता है सूर्योदय से तीन घण्टे बाद तक अर्थात् 9 बजे तक यह समाप्त हो जाना चाहिएं। इन पाँच घण्टों के भीतर ही अपने जप में जो 2॥−3 घण्टे लगेंगे वे पूरे हो जाने चाहिए। यदि प्रातः पर्याप्त समय न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से 1 घण्टा पहले से लेकर 2 घण्टे बाद तक अर्थात् 5 से 8 तक के तीन घण्टों में सबेरे का शेष जप पूरा कर लेना चाहिए। प्रातः 9 बजे के बाद और रात्रि को 8 के बाद की नवरात्रि तपश्चर्या निषिद्ध है। यों सामान्य साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। पर अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करना पड़ता है।

🔷 उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरम्भ हो जाता है। आरम्भ में सोहम और अन्त में खेचरी मुद्रा का नियम इसमें भी निवाहना पड़ता है। अन्तर इतना ही पड़ता है कि नित्य आधा घण्टा जप करना पड़ता था, वह अब बढ़ कर प्रायः ढाई−तीन घण्टे हो जाता है। जप के साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जायगा। सूर्य अर्घ्य आदि अन्य सब बातें उसी प्रकार चलती हैं, जैसी दैनिक साधना में। हर दिन जो आधा घण्टा जप करना पड़ता था वह अलग से नहीं करना होता वरन् नहीं 27 मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।

🔶 अगरबत्ती के स्थान पर यदि इन दिनों जप के तीन घण्टे घृतदीप जलाया जा सके तो अधिक उत्तम है। धृत का शुद्ध होना आवश्यक है। मिलावट के प्रचलित अन्धेर में यदि शुद्धता पर पूर्ण विश्वास हो तो ही बाहर से लिया जाय अन्यथा दूध लेकर अपने घर पर भी निकालना चाहिए। तीन घण्टे नित्य नौ दिन दीपक जले तो उसमें प्रायः दो ढाई सौ ग्राम घी लग जाता है। इतने घी का प्रबंध बने तो दीपक की बात सोचनी चाहिए अन्यथा अगरबत्ती, धूपबत्ती आदि से काम चलाना चाहिए। इनमें भी शुद्धता का ध्यान रखा जाय। सम्भव हो तो यह वस्तुएँ भी घर पर बना ली जाएं।

🔷 नवरात्रि अनुष्ठान नर−नारी कर सकते हैं। इसमें समय, स्थान एवं संख्या की नियमितता रखी जाती है इसलिए उस सतर्कता और अनुशासन के कारण शक्ति भी अधिक उत्पन्न होती है। किसी भी कार्य में ढील−पोल शिथिलता अनियमितता और अस्त−व्यस्तता बरती जाय उसी में उसी अनुपात से सफलता संदिग्ध होती चली जायगी। उपासना के सम्बन्ध में भी यह तथ्य काम करता है। उदास मन से ज्यों−त्यों− जब, तब वह बेगार भुगत दी जाय तो उसके सत्परिणाम भी स्वल्प ही होंगे, पर यदि उसमें चुस्ती, फुर्ती की व्यवस्था और तत्परता बरती जायगी तो लाभ कई गुना दिखाई पड़ेगा। अनुष्ठान में सामान्य जप की प्रक्रिया को अधिक कठोर और अधिक क्रमबद्ध कर दिया जाता है अस्तु उसकी सुखद प्रतिक्रिया भी अत्यधिक होती है।

🔶 प्रयत्न यह होना चाहिए कि पूरे नौ दिन यह विशेष जप संख्या ठीक प्रकार कार्यान्वित होती रहे। उसमें व्यवधान कम से कम पड़े। फिर भी कुछ आकस्मिक एवं अनिवार्य कारण ऐसे आ सकते हैं जिसमें व्यवस्था बिगड़ जाय और उपासना अधूरी छोड़नी पड़े। ऐसी दशा में यह किया जाना चाहिए कि बीच में जितने दिन बन्द रखना पड़े उसकी पूर्ति आगे चलकर कर ली जाय इस व्यवधान की क्षति पूर्ति के लिए एक दिन उपासना अधिक की जाय जैसे चार दिन अनुष्ठान चलाने के बाद किसी आकस्मिक कार्यवश बाहर जाना पड़ा। तब शेष पाँच दिन उस कार्य से वापस लौटने पर पूरे करने चाहिए। इसमें एक दिन व्यवधान का अधिक बढ़ा देना चाहिए अर्थात् पाँच दिन की अपेक्षा छह दिन में उस अनुष्ठान को पूर्ण माना जाय। स्त्रियों का मासिक धर्म यदि बीच में आ जाय तो चार दिन या शुद्ध न होने पर अधिक दिन तक रोका जाय और उसकी पूर्ति शुद्ध होने के बाद करनी जाय। एक दिन अधिक करना इस दशा में भी आवश्यक है।

🔷 अनुष्ठान में पालन करने के लिए दो नियम अनिवार्य हैं। शेष तीन ऐसे हैं जो यथा स्थिति एवं यथा सम्भव किये जा सकते हैं। इन पाँचों नियमों का पालन करना पंच तप कहलाता है, इनके पालन से अनुष्ठान की शक्ति असाधारण रूप से बढ़ जाती है।

🔶 इन दो दिन ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। शरीर और मन में अनुष्ठान के कारण जो विशेष उभार आते हैं उनके कारण कामुकता की प्रवृत्ति उभरती है। इसे रोका न जाय तो दूध में उफान आने पर उसके पात्र से बाहर निकल जाने के कारण घाटा ही पड़ेगा। अस्तु मनःस्थिति इस सम्बन्ध में मजबूत बना लेनी चाहिए। अच्छा तो यह है कि रात्रि को विपरीत लिंग के साथ न सोया जाय। दिनचर्या में ऐसी व्यस्तता और ऐसी परिस्थिति रखी जाय जिससे न शारीरिक और न मानसिक कामुकता उभरने का अवसर आये। यदि मनोविकार उभरें भी तो हठपूर्वक उनका दमन करना चाहिए और वैसी परिस्थिति नहीं आने दी जाय। यदि वह नियम न सधा, ब्रह्मचर्य अखंडित हुआ तो वह अनुष्ठान ही अधूरा माना जाय। करना हो तो फिर नये सिरे से किया जाय। यहाँ यह स्पष्ट है कि स्वप्नदोष पर अपना कुछ नियन्त्रण न होने से उसका कोई दोष नहीं माना जाता। उसके प्रायश्चित्य में दस माला अधिक जप कर लेना चाहिए।

🔷 दूसरा अनिवार्य नियम है उपवास। जिनके लिए सम्भव हो वे नौ दिन फल, दूध पर रहें। ऐसे उपवासों में पेट पर दबाव घट जाने से प्रायः दस्त साफ नहीं हो पाता और पेट भारी रहने लगता है इसके लिए एनीमा अथवा त्रिफला−ईसबगोल की भूसी−कैस्टोफीन जैसे कोई हलके विरेचन लिए जा सकते हैं।

🔶 महंगाई अथवा दूसरे कारणों से जिनके लिए वह सम्भव न हो वे शाकाहार−छाछ आदि पर रह सकते हैं। अच्छा तो यही हैं कि एक बार भोजन और बीच−बीच में कुछ पेय पदार्थ ले लिए जायँ, पर वैसा न बन पड़े तो दो बार भी शाकाहार, दही आदि लिया जा सकता है।

🔷 जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं, पर नमक और शकर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन उन्हें भी करना चाहिए। भोजन में अनेक वस्तुएँ न लेकर दो ही वस्तुएँ ली जाएं। जैसे−रोटी, दाल। रोटी−शाक, चावल−दाल, दलिया, दही आदि। खाद्य−पदार्थों की संख्या थाली में दो से अधिक नहीं दिखाई पड़नी चाहिए। यह अन्नाहार एक बार अथवा स्थिति के अनुरूप दो बार भी लिया जा सकता है। पेय पदार्थ कई बार लेने की छूट है। पर वे भी नमक, शक्कर रहित होने चाहिएं।

🔶 जिनसे उपवास और ब्रह्मचर्य न बन पड़े वे अपनी जप संख्या नवरात्रि में बढ़ा सकते हैं इसका भी अतिरिक्त लाभ है, पर इन दो अनिवार्य नियमों का पालन न कर सकने के कारण उसे अनुष्ठान की संज्ञा न दी जा सकेगी और अनुशासन साधना जितने सत्परिणाम की अपेक्षा भी नहीं रहेगी। फिर भी जितना कुछ विशेष साधन−नियम पालन इस नवरात्रि पर्व पर बन पड़े उत्तम ही है।

🔷 तीन सामान्य नियम हैं [1] कोमल शैया का त्याग [2] अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना [3] हिंसा द्रव्यों का त्याग। इन नौ दिनों में भूमि या तख्त पर सोना तप तितीक्षा के कष्ट साध्य जीवन की एक प्रक्रिया है। इसका बन पड़ना कुछ विशेष कठिन नहीं है। चारपाई या पलंग छोड़कर जमीन पर या तख्त पर बिस्तर लगाकर सो जाना थोड़ा असुविधाजनक भले ही लगे, पर सोने का प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो जाता है।

🔶 कपड़े धोना, हजामत बनाना, तेल मालिश, जूता, पालिश, जैसे छोटे−बड़े अनेक शारीरिक कार्यों के लिए दूसरों की सेवा लेनी पड़ती है। अच्छा हो कि यह सब कार्य भी जितने सम्भव हों अपने हाथ किये जायं। बाजार का बना कोई खाद्य पदार्थ न लिया जाय। अन्नाहार पर रहना है तो वह अपने हाथ का अथवा पत्नी, माता जैसे सीधे शरीर सम्बन्धियों के हाथ का ही बना लेना चाहिए नौकर की सहायता इसमें जितनी कम ली जाय उतना उत्तम है। रिक्शे, ताँगे की अपेक्षा यदि साइकिल, स्कूटर, बस, रेल आदि की सवारी से काम चल सके तो अच्छा है। कपड़े अपने हाथ से धोना− हजामत अपने हाथ बनाना कुछ बहुत कठिन नहीं है। प्रयत्न यही होना चाहिए कि जहाँ तक हो सके अपनी शरीर सेवा अपने हाथों ही सम्पन्न की जाय।

🔷 तीसरा नियम है हिंसा द्रव्यों का त्याग। इन दिनों 99 प्रतिशत चमड़ा पशुओं की हत्या करके ही प्राप्त किया जाता हैं। वे पशु माँस के लिए ही नहीं चमड़े की दृष्टि से भी मारे जाते हैं। माँस और चमड़े का उपयोग देखने में भिन्न लगता है, पर परिणाम की दृष्टि से दोनों ही हिंसा के आधार हैं। इसमें हत्या करने वाले की तरह उपयोग करने वाले को भी पाप लगता है। अस्तु चमड़े के जूते सदा के लिए छोड़ सकें तो उत्तम है अन्यथा अनुष्ठान, काल में तो उनका परित्याग करके रबड़, प्लास्टिक कपड़े आदि के जूते चप्पलों से काम चलाना चाहिए।

🔶 माँस, अण्डा जैसे हिंसा द्रव्यों का इन दिनों निरोध ही रहता है। आज−कल एलोपैथी दवाएँ भी ऐसी अनेक है जिनमें जीवित प्राणियों का सत मिलाया जाता है। इनसे बचना चाहिए। रेशम, कस्तूरी, मृगचर्म आदि प्रायः पूजा प्रयोजनों में उपयोग किया जाता है, ये पदार्थ हिंसा से प्राप्त होने के कारण अग्राह्य ही माने जाने चाहिए। शहद यदि वैज्ञानिक विधि से निकाला गया है तो ठीक अन्यथा अण्डे बच्चे निचोड़ डालने और छत्ता तोड़ फेंकने की पुरानी पद्धति से प्राप्त किया गया शहद भी त्याग समझा जाना चाहिए।

🔷 न केवल जप उपासना के लिए ही समय की पाबन्दी रहे वरन् इन दिनों पूरी दिनचर्या ही नियमबद्ध रहे। सोने, खाने नहाने आदि सभी कृत्यों में यथासम्भव अधिक से अधिक समय निर्धारण और उसका पक्का पालन करना आवश्यक समझा जाय। अनुशासित शरीर और मन की अपनी विशेषता होती है और उससे शक्ति उत्पादन से लेकर सफलता की दिशा में द्रुत गति से बढ़ने का लाभ मिलता है। अनुष्ठानों की सफलता में भी यही तथ्य काम करता है।

🔶 अनुष्ठान के दिनों में मनोविकारों और चरित्र दोषों पर कठोर दृष्टि रखी जाय और अवाँछनीय उभारों को निरस्त करने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील रहा जाय। असत्य भाषण, क्रोध, छल, कटुवचन अशिष्ट आचरण, चोरी, चालाकी, जैसे अवाँछनीय आचरणों से बचा जाना चाहिए, ईर्ष्या, द्वेष, कामुकता, प्रतिशोध जैसी दुर्भावनाओं से मन को जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। जिनसे बन पड़े वे अवकाश लेकर ऐसे वातावरण में रह सकते हैं जहाँ इस प्रकार की अवाँछनीयताओं का असर ही न आय। जिनके लिए ऐसा सम्भव नहीं, वे सामान्य जीवन यापन करते हुए अधिक से अधिक सदाचरण अपनाने के लिए सचेष्ट बने रहें।

🔷 नौ दिन की साधना पूरी हो जाने पर दसवें दिन अनुष्ठान की पूर्णाहुति समझी जानी चाहिए इन दिनों (1) हवन (2) ब्रह्मदान (3) कन्याभोज के तीन उपचार पूरे करने चाहिएं।

🔶 संक्षिप्त गायत्री हवन पद्धति की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। उन मन्त्रों को एवं विधानों को बताने वाली पुस्तिका गायत्री तपोभूमि मथुरा से मिलती है। पुराने उपासकों में से अधिकाँश उस कृत्य से परिचित हैं। अपनी जानकारी न हो तो किसी पुराने गायत्री उपासक की सहायता से 240 आहुतियों का हवन किया जा सकता है। जहाँ वैसे साधन न हों वहाँ घी और शकर मिलाकर गायत्री मन्त्र से उसकी आहुतियाँ दी जा सकती हैं। मिट्टी की छोटी चबूतरी बना कर पतली समिधाओं में अग्नि उच्चारण कर सकने वाले घर के अन्य लोगों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। यदि चार व्यक्ति मिल कर हवन करें तो मिलकर 60 बार आहुति देने से ही 240 आहुतियाँ हो जायेंगी। जितने आहुति देने वाले हों उसी हिसाब से यह निर्धारण करना चाहिए। 240 से कम आहुतियाँ नहीं होनी चाहिएं, अधिक हो जाए तो ठीक है। जिनके लिए इतना भी सम्भव न हो वे शाँति−कुँज को लिख देंगे तो उनकी 240 आहुतियाँ यहाँ की यज्ञशाला में विधिवत् कर दी जायेंगी।

🔷 गायत्री आद्य शक्ति−मातृ शक्ति है। उसका प्रतिनिधित्व कन्या करती है। अस्तु अन्तिम दिन कम से कम एक और अधिक जितनी सुविधा हो कन्याओं को भोजन कराना चाहिए।

🔶 ब्रह्मदान में सत्साहित्य का वितरण आता है। जन−मानस का परिष्कार करने वाला सस्ता प्रचार साहित्य युग−निर्माण योजना मथुरा और शांति−कुंज हरिद्वार से मिलता है अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ पैसा इसे मँगाने और विचारशील लोगों में उसे वितरण करने का प्रयत्न करना चाहिए। लागत से कम मूल्य में बेचना भी वितरण के समान ही श्रेष्ठ है।

🔷 दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन−प्रेरक पोस्टरों का चिपकाया जाना जैसे प्रेरणाप्रद कृत्य ब्रह्मदान की संज्ञा में ही गिने जाते हैं।

🔶 अनुष्ठान करने वाले इसकी सूचना हरिद्वार भेज देंगे तो उनकी साधना का संरक्षण एवं परिमार्जन भी वहाँ से किया जाता रहेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1976 पृष्ठ 60

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/February/v1.60

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