मंगलवार, 1 सितंबर 2020

👉 अच्छे कर्म करते रहिए

एक राजा की आदत थी, कि वह भेस बदलकर लोगों की खैर-ख़बर लिया करता था, एक दिन अपने वज़ीर के साथ गुज़रते हुए शहर के किनारे पर पहुंचा तो देखा एक आदमी गिरा पड़ा हैl

राजा ने उसको हिलाकर देखा तो वह मर चुका था! लोग उसके पास से गुज़र रहे थे, राजा ने लोगों को आवाज़ दी लेकिन लोग राजा को पहचान ना सके और पूछा क्या बात है? राजा ने कहा इस को किसी ने क्यों नहीं उठाया? लोगों ने कहा यह बहुत बुरा और गुनाहगार इंसान है

राजा ने कहा क्या ये "इंसान" नहीं है? और उस आदमी की लाश उठाकर उसके घर पहुंचा दी, उसकी बीवी पति की लाश देखकर रोने लगी, और कहने लगी "मैं गवाही देती हूं मेरा पति बहुत नेक इंसान है" इस बात पर राजा को बड़ा ताज्जुब हुआ कहने लगा "यह कैसे हो सकता है? लोग तो इसकी बुराई कर रहे थे और तो और इसकी लाश को हाथ लगाने को भी तैयार ना थे?"

उसकी बीवी ने कहा "मुझे भी लोगों से यही उम्मीद थी, दरअसल हकीकत यह है कि मेरा पति हर रोज शहर के शराबखाने में जाता शराब खरीदता और घर लाकर नालियों में डाल देता और कहता कि चलो कुछ तो गुनाहों का बोझ इंसानों से हल्का हुआ, उसी रात इसी तरह एक बुरी औरत यानी वेश्या के पास जाता और उसको एक रात की पूरी कीमत देता और कहता कि अपना दरवाजा बंद कर ले, कोई तेरे पास ना आए घर आकर कहता भगवान का शुक्र है,आज उस औरत और नौजवानों के गुनाहों का मैंने कुछ बोझ हल्का कर दिया, लोग उसको उन जगहों पर जाता देखते थे।

मैं अपने पति से कहती "याद रखो जिस दिन तुम मर गए लोग तुम्हें नहलाने तक नहीं आएंगे,ना ही कोई तुम्हारा क्रियाकर्म करेंगा ना ही तुम्हारी चिता को कंधा देंगे वह हंसते और मुझसे कहते कि घबराओ नहीं तुम देखोगी कि मेरी चिता खुद राजा और भगवान के नेक बंदे उठायेंगे..

यह सुनकर बादशाह रो पड़ा और कहने लगा मैं राजा हूं, अब इसका क्रियाकर्म में ही करूँगा ओर इसको कंधा भी में ही दूंगा

हमेशा याद रखिये अपना किया कर्म कभी खाली नही जाता

इसलिए अच्छे कर्म करते रहिए

👉 स्वार्थपरता और संकीर्णता

राष्ट्रीय दृष्टि से स्वार्थपरता, व्यक्तिवाद, असहयोग, संकीर्णता हमारा एक प्रमुख दोष है। सारी दुनियाँ परस्पर सहयोग के आधार पर आगे बढ़ रही है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह परस्पर सहयोग के आधार पर ही बढ़ा और समुन्नत हुआ है। जहाँ प्रेम, ममता, एकता, आत्मीयता, सहयोग और उदारता है वहीं स्वर्ग रहेगा। समाजवाद और साम्यवाद की मान्यता यही है कि व्यक्ति को अपने लिए नहीं समाज के लिए जीवित रहना चाहिए। सामूहिक सुख-शान्ति बढ़ाने के लिए अपनी समृद्धि और सुविधा का त्याग करना चाहिए। धर्म और अध्यात्म की शिक्षा भी वही है कि व्यक्ति अपने लिए धन, वैभव जमा न करके अपनी प्रतिभा, बुद्धि, क्षमता और सम्पदा को जीवन निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए ही उपयोग करे और शेष जो कुछ बचता हो सबको सामूहिक उत्थान में लगा दे।

जिस समाज में ऐसे परमार्थी लोग होंगे वही फलेगा, फूलेगा और वही सुखी रहेगा। जहाँ स्वार्थपरता आपाधापी, जमाखोरी की प्रवृत्ति पनप रही होगी वहाँ अनैतिकता के सभी कुकर्म बढ़ेंगे और फैलेंगे। सामान्य नागरिकों के स्तर से अत्यधिक ऊँचे स्तर का सुखोपभोग करने की प्रवृत्ति जहाँ भी पनपेगी वहीं शोषण, अन्याय, दुराचार, द्वेष, संघर्ष, ईर्ष्या आदि बुराइयाँ विकसित होंगी। प्राचीनकाल में जिनकी प्रतिभा अधिक कमाने की होती थी वे अपने राष्ट्रीय स्तर से अधिक उपलब्ध धन को लोकहित के कार्यों में दान कर देते थे। जीवन की सार्थकता, सेवा कार्यों में लगी हुई शक्ति के आधार पर ही आँकी जाती थी।

आज जो जितना धनी है वह उतना बड़प्पन पाता है, यह मूल्याँकन गलत है। जिसने राष्ट्रीय स्तर से जितना अधिक जमा कर रखा है वह उतनी ही बड़ी गलती कर रहा है। इस गलती को प्रोत्साहित नहीं, निरुत्साहित किया जाना चाहिए, अन्यथा हर व्यक्ति अधिक धनी, अधिक सुख सम्पन्न, अधिक विलासी होने की इच्छा करेगा। इससे संघर्ष और पाप बढ़ेंगे। सहयोग, प्रेम, त्याग, उदारता और परमार्थ की सत्प्रवृत्तियों का उन्मूलन व्यक्तिगत स्वार्थपरता ही कर रही है। इसे हटाने और उदारता, सहकारिता, लोकहित, परमार्थ की भावनाओं को पनपाने के लिए हमें शक्ति भर प्रयत्न करना होगा, तभी हमारा समाज सभ्य बनेगा। अन्यथा शोषण और विद्रोह की, जमाखोरी और चोरी की, असभ्यता फैलती ही रहेगी और मानव जाति का दुख बढ़ता ही रहेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १६)

अनूठी हैं—मन की पाँचों वृत्तियाँ
  
गुरुदेव कहा करते थे कि वृत्तियों का खेल समझ में न आये, तो सब कुछ किया-धरा बेकार चला जाता है। सारा जोग-जाप व्यर्थ हो जाता है। तपस्या-साधना रावण, कुम्भकर्ण, हिरण्यकश्यपु एवं हिरण्याक्ष ने भी कम नहीं की थी। इनकी घोर तपस्या के किस्सों से पुराणों के पन्ने भरे पड़े हैं। पुराण कथाएँ कहती हैं कि इनकी तपस्या से मजबूर होकर स्वयं विधाता इन्हें वरदान देने के लिए विवश हुए। परन्तु वृत्तियों के शोधन के अभाव में समस्त तप की परिणति अन्ततः क्लेश का ही स्रोत साबित हुई। अपनी तमाम उम्र ये वासनाओं की अतृप्ति की आग में जलते-झुलसते रहे। इन्हें जो कुछ भी मिला, इन्होंने जो भी अर्जित किया, उसने इनकी अतृप्ति की पीड़ा को और अधिक चरम तक पहुँचा दिया।
  
इसके विपरीत उदाहरण भी हैं। सन्त कबीर और महात्मा रैदास के पास साधारण जीवन यापन के साधन भी मुश्किल से थे। बड़ी मुश्किल से इनकी गुजर-बसर चलती थी। इनके जीवन का ज्यादातर भाग कपड़ा बुनने और जूता गाँठने में चला जाता था। इनमें से किसी ने अद्भुत एवं रोमांचकारी तपस्या भी नहीं की। परन्तु एक काम अपनी हर श्वास के साथ किया। आने-जाने वाली हर श्वास के साथ मन और उसकी वृत्तियों के शोधन में लगे रहे। अपनी प्रगाढ़ भगवद्भक्ति से अपनी प्रत्येक मानसिक वृत्ति को परिष्कृत कर डाला। इसकी परिणति भी इनके जीवन में अति सुखद हुई। सभी पाँचों वृत्तियों इनके जीवन में अक्लेश का, आनन्द का स्रोत बन गयी। वृत्तियों की निर्मलता की इसी अनुभूति को पाकर महात्मा कबीर गा उठे थे- ‘कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर। पाछे-पाछे हरि फिरैं कहत कबीर-कबीर॥’
  
वृत्तियों की दुर्गन्ध मिटाने वाली, इन्हें शोधित, सुरभित एवं सुगंधित करने वाली बयार विराट् से आती है। यह बयार हमारे अपने जीवन में आए, इसके लिए हमें स्वार्थ एवं अहं के दोनों कपाट खोलने पड़ेंगे। आनन्द तो समस्त सृष्टि में, विराट् ब्रह्माण्ड में सर्वत्र बिखरा पड़ा है। यह उमड़-घुमड़कर हमारे भीतर आने के लिए आतुर है। बस हमीं अपने कपाट बन्द किए बैठे हैं। इस बात को हम कुछ इस तरह भी समझ सकते हैं कि सुबह होने पर भी यदि हम अपने कमरे की खिड़कियाँ, दरवाजे न खोलें, तो सूर्य की किरणें चाहकर भी हमारे कक्ष में घुस न पाएँगी। जबकि खिड़कियाँ खोलते ही हजारों-हजार किरणें एक साथ आकर कक्ष को उजाले से भर देती हैं। खिड़की खोलने से पहले भी सूर्य यथावत था। यदि वह वहाँ नहीं होता, तो भला किरणें कहाँ से आती। बस खिड़कियों के अवरोध के अवरोधक हटते ही अँधेरा उजाले में रूपान्तरित हो गया।
  
कुछ ऐसा ही रूपान्तरण वृत्तियों का भी होता है। स्वार्थ और अहं के कपाट खुले, वासना की तृप्ति की जगह भक्ति की अनुरक्ति में लगा कि वृत्तियाँ बदलने लगती हैं। जो पहले कभी केवल दुःखों को, पीड़ा को, सन्ताप को, अतृप्ति को जन्म देती थीं, वही अब आनन्द की, तृप्ति की, सुखों की उफनती बाढ़ की जन्मदात्री बन जाती हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Everlasting happiness is within us.

Happiness is the natural characteristic of soul. When man is happy his soul becomes happy. Development of spiritual self increases the span of life and gives us an insight to life. The body languages, the radiant face, the romantic body speaks of the happiness. All of us in our lifetime experience such a bliss.

When we think of the passage from life to death, a point becomes clear that the center of happiness changes with the phases of life. At the time of birth in the lap of mother, childhood amongst toys and books, young age with wife and creation of wealth and fame and old age with grandchildren. When we think deeply we realize that we have spent our time in seeking happiness in worldly matters; in reality they are devoid of happiness. If there were true happiness the mind would be engrossed in it. But the center of happiness is always changing and that itself denotes that happiness is not there in worldly pleasures.
 
The center of our happiness and peace is our soul and is within us. Soul creates a state of happiness and makes us realize that state of happiness. Though happiness is within us we are seeking it outside in worldly pleasures and we accept it as a means of happiness.

Light rays of the soul, penetrate into things and create beauty, we try to own and enjoy the beauty but in vain. For some time it gives happiness but after some time it no longer gives us happiness. Then it is neither attractive nor feisty. The moment the light of the soul disappears from worldly things it ceases to be beautiful and does not give any happiness or enjoyment.

What kind of irony this is? The mockery of life goes on life long. From the time of birth, we try to find various ways of enjoyment and happiness. Though all of us have a flow of happiness within us we fail to realize it.  It is like exploring the jungle for the musk, instead of looking for a deer; similarly we look for happiness in the world outside. We must look for happiness within us and to do so one must use spiritual means. Happiness is the natural characteristic of soul; we can reach it only by knowing our soul through spiritual means.

📖  Akhand Jyoti

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रह...