रविवार, 16 अप्रैल 2017

👉 कर्ताऽहमिति मन्यते

🔵 सन् १९७८ ई.में मेरे होम टाउन हजारीबाग में एक पंचकुण्डीय गायत्री महायज्ञ हुआ था। वहीं सद्वाक्यों और पुस्तकों से आकृष्ट होकर मैं पहले पहल गायत्री परिवार से जुड़ा। शहर में गल्ले किराने की दुकान चलाता था। वहीं किताबें ले जाकर रखने लगा। आचार्यश्री की इन किताबों से जो प्रेरणा मिली उससे अपनी स्वार्थी सोच में कुछ हद तक बदलाव आया था कि केवल अपने पोषण तक ही सीमित न रहकर लोक मंगल का कार्य भी करना चाहिए।

🔴 मैं दुकान में आने वाले ग्राहकों को ये छोटी- छोटी किताबें पढ़ने के लिए देने लगा। गुरुदेव की इन किताबों में लिखे क्रांतिकारी और मूल्यवान विचारों को लोग इतना पसंद करने लगे कि बार- बार मेरी दुकान पर आने लगे। कहते हैं, भगवान का काम करनेवालों को यश, कीर्ति, सहयोग, धन इत्यादि की प्राप्ति स्वतः होती है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ होने लगा। धीरे- धीरे ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी। अच्छे दुकानदार के रूप में पहचान बनने लगी तो आय भी बढ़ती गई। धीरे- धीरे गायत्री परिवार से मेरी संबद्धता अंतरंगता में बदलने लगी। दीक्षा ले ली और नियमित साधना भी करने लगा। गोष्ठियों- बैठकों में नियमित रूप से जाने लगा।

🔵 उसी वर्ष सितम्बर में राँची से मिशन के केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में श्री जे.पी.शर्मा जी हजारीबाग आए। मिशन की गतिविधियों को अधिकाधिक प्रसारित किए जाने के विषय में चर्चा के लिए गोष्ठी बुलाई गई थी, जिसमें उन्होंने बताया कि जहाँ- जहाँ २४ कुण्डीय यज्ञ होगा, वहाँ- वहाँ युग निर्माण योजना की शाखा खोली जाएगी। मिशन का प्रचार- प्रसार अधिक से अधिक हो, यह मेरी दिली इच्छा थी। क्योंकि इस मिशन से जुड़कर जो आनन्द और आत्म- संतोष मुझे प्राप्त हुआ था, मैं चाहता था उसे और लोगों तक पहुँचा सकूँ। उसी समय से मन ही मन सोचने लगा कि हजारीबाग में यदि २४ कुण्डीय यज्ञ करा सकूँ, तो कितना अच्छा हो! इस क्षेत्र का कल्याण हो जाए। कई दिनों की यह विचार प्रक्रिया अंत में जब निर्णय में बदली, तो अगली बैठक में मैंने अपने क्षेत्र में २४ कुण्डीय यज्ञ आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। जो सभी को पसंद आया।

🔴 इस बैठक में मौजूद केन्द्रीय प्रतिनिधि आदरणीय कपिल जी ने बताया कि २४ कुण्डीय यज्ञ के लिए संकल्प शान्तिकुंज जाकर लेना होगा। अब प्रश्न यह था कि शान्तिकुंज कौन- कौन जाए? उन दिनों गायत्री परिवार का यहाँ उतना प्रसार नहीं था, गिने- चुने सदस्य थे। ऊपर से यह भी एक बड़ी समस्या थी कि किसी के पास धन की कमी थी, तो किसी के पास समय की। कोई इतनी दूर जाने को तैयार नहीं था। अंत में दो परिजन जाने के लिए तैयार हुए, वह भी इस शर्त पर कि उनका यात्रा खर्च कोई और वहन करे। मैं व्यय भार उठाने के लिए तुरंत तैयार हो गया, क्योंकि इस कार्य के लिए मैं मन ही मन पहले से ही संकल्पित हो चुका था; लेकिन जैन समुदाय का होने के कारण खुलकर सामने नहीं आना चाहता था। खैर, यह चिन्ता तो दूर हो गई, लेकिन दूसरी बड़ी चिन्ता यह थी कि इतने बड़े यज्ञ के  लिए अपेक्षित धनराशि कहाँ से आएगी!

🔵 मेरी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। दुकान से ही आजीविका चलती थी। एक आटा चक्की थी, वह भी आदमी के अभाव में बन्द पड़ी थी। सोचा, किसी को साझेदारी में दे दूँ तो उससे जो आमदनी होगी, वह यज्ञ में लगा दूँगा। एक हमारे स्वजातीय व्यक्ति थे, काफी अनुभवी। मेरी दुकान का लेखा-जोखा वही रखते थे। साझेदारी के लिए मुझे वे उपयुक्त व्यक्ति लगे। आमदनी का नया रास्ता दिखने लगा था। अतः उन दोनों भाइयों को साथ लेकर शान्तिकुंज जाने की तैयारियाँ करने लगा। अब एक ही अड़चन सामने खड़ी थी- पिताजी से अनुमति कैसे मिले? दो माह पूर्व ही सत्र करने के लिए शान्तिकुंज गया था। उस समय १२ दिनों तक दुकान बंद रही और अब फिर वहीं जाने के लिए तैयार था, वह भी यज्ञ का संकल्प लेने। पिताजी ऐसी अनुमति कभी नहीं देंगे। यह सोचकर मैंने एक तरकीब निकाली। बहन को एक वर्ष के प्रशिक्षण के लिए शान्तिकुंज छोड़ आया था। मैंने पिताजी से कहा नियमानुसार दो माह बाद देख-भाल के लिए जाना होता है। यह सुनते ही उन्होंने कहा- मैं ही चला जाता हूँ, तुम्हारे जाने से दुकान बन्द हो जाएगी। बात बिगड़ती देख मैंने गुरुदेव का स्मरण किया- हे गुरुदेव, पिता के साथ प्रवंचना माफ करना। फिर मैंने उससे भी जोरदार बहाना बनाया। कहा- जो छोड़कर आया है, उसी को जाना होगा। इस तरह पिताजी को पट्टी पढ़ाकर शान्तिकुंज के लिए रवाना हुआ। 

🔴 वहाँ पहुँचकर गुरुदेव से भेंट करने गया, तो परिवार का हाल-चाल जानने के बाद उन्होंने पूछा- बेटे, कैसे आना हुआ? मैंने बताया कि २४ कुण्डीय यज्ञ का संकल्प लेने आया हूँ। एक नया उद्योग शुरू कर रहा हूँ। उससे जो आमदनी होगी उसे यज्ञ में लगाऊँगा। अभी पूरी बात भी नहीं हो पायी थी कि गुरुदेव ने जोर से डाँट लगायी-‘‘थोथी बात बोलता है, मतलब की बात नहीं बोलता है’’। मैं डाँट खाकर चुपचाप एक किनारे बैठ गया। गुरुदेव की एक-एक कर अन्य परिजनों से बातें होती रहीं। तब तक मैं सोचने लगा, गुरुजी ने पूरी बात सुनीं नहीं, इसलिए डाँट दिया। यज्ञ तो मुझे करना ही है, जब गुरुजी नाराज हो रहे हैं तो उद्योग की बात फिलहाल न ही करें।

🔵 थोड़ी देर बाद मुझे बोलने का मौका मिला, तो दुबारा हिम्मत करके मैंने कहा-ठीक है गुरुदेव उद्योग की बात जब होगी, तब होगी, मैं अभी केवल २४ कुण्डीय यज्ञ पर ही ध्यान दूँगा। वे प्रसन्न हुए। बोले-हाँ बेटा, अब तू २४ कुण्डीय कर लेगा। थोथी बात नहीं बोलनी चाहिए। संकल्प लेने के बाद तू चैन से नहीं बैठेगा। यज्ञ को लेकर गुरुदेव की रजामंदी पर मेरी साँस अटकी हुई थी, उनकी प्रसन्न मुद्रा से मेरा भी मन हल्का हो गया।

🔴 दो दिन बाद २४ कुण्डीय यज्ञ की उद्घोषणा मेरे नाम से हो गई। यह मेरे लिए एक नई मुसीबत थी। मैंने सोच रखा था कि साथ आये परिजन से ही संकल्प करवाऊँगा, क्योंकि जैन समुदाय का होने के कारण मैं जाहिरी तौर पर संकल्प लेकर अपनी बिरादरी वालों का कोपभाजन नहीं बनना चाहता था। जब बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा, तो संकल्प के समय मैं सबसे नजर बचाकर पीछे जा बैठा। मुझे नहीं देखकर साथी परिजन चिरंजीव लालजी अग्रवाल संकल्प के लिए बैठ गए। उनके साथ वासुदेव महतो जी भी थे। खुद को छिपाने के प्रयास में मैं कार्यक्रम भी ठीक से नहीं देख पा रहा था। कुछ लोगों के संकल्प के बाद स्थान थोड़ा खाली हुआ, तो चिरंजीव जी की नजर मुझ पर पड़ गई। उन्होंने मुझे हाथ के इशारे से बुलाया। अब मेरे बचने के सारे रास्ते बन्द हो चुके थे। चोरी पकड़ा गई देख हकबकाया हुआ उनके पास पहुँचा। उन्होंने कहा- आप वहाँ क्यों जा बैठे? संकल्प तो आप ही के नाम से हुआ है। 

🔵 लाचार होकर मुझे आगे बढ़ना पड़ा। हाथ में अक्षत पुष्प लिया। जब मेरी बारी आई, तो गुरुजी ने तिलक लगाकर आशीर्वाद दिया, माताजी ने रक्षा सूत्र बाँधा। दूसरे ही पल मैंने अनुुभव किया कि मेरा वह डर, वह संकोच कहीं गायब हो गया था। एक अपूर्व उल्लास और उमंग से अन्तर्मन भर उठा। गुरुजी के तिलक-चंदन लगाने भर से यह आश्चर्यजनक परिवर्तन देख मैं समझ गया कि वे जिससे जो काम कराना चाहते हैं, वैसी परिस्थिति पैदा कर उससे करवा ही लेते हैं। 

🔴 मन का संशय दूर हो जाने के बाद अब मैंने अपनी पूरी शक्ति इस कार्य में झोंक देने का निर्णय ले लिया। वापस हजारीबाग लौटा तो एक चौंकानेवाली बात सामने आई। जिसे मैं इतना विश्वासपात्र समझ रहा था-जिसे लेन-देन की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी दे रखी थी- जिसके साथ साझा उद्योग शुरू करने जा रहा था, उसी ने मेरी अनुपस्थिति में पीठ पर छुरी घोंपने जैसा काम किया। मेरे व्यवसाय की जिन अन्दरूनी बारीकियों से वह अवगत था, उन्हें अन्यत्र पहुँचाकर मुझे नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया।

🔵 साझे उद्योग का मेरा निर्णय कितना गलत था इसका आभास होते ही बिजली की तरह गुरुजी की बातें दिमाग में कौंध गईं। नया उद्योग खड़ा करने की बात पर मिली उस डाँट के अन्दर मेरे लिए जो चेतावनी थी, वह पूरी तरह अब समझ में आई। मैं चारों तरफ से ध्यान हटाकर पूरी तरह यज्ञ की तैयारियों में जुट गया। मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या धन की थी। लेकिन वास्तव में जब कार्य आरंभ हुआ तो मैंने देखा यह कोई समस्या ही नहीं थी। चारों ओर से धन की जैसे वर्षा होने लगी और सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह रही कि समाज के जिन भाई-बन्धुओं के विरोध का मुझे डर था, उन लोगों ने अपने आप सहयोग के हाथ बढ़ा दिए। जब यज्ञ का पूरा कार्यक्रम इतनी आसानी से सम्पन्न हो गया, तो मैं उस सर्वद्रष्टा, सर्वकर्त्ता गुरुसत्ता के आगे नतमस्तक हो गया। मन बार-बार यही कहता रहा-हे गुरुदेव! तुम्हारा काम तो तुमने कर ही रखा था। मुझे तो सिर्फ  इसलिए माध्यम बनाया कि असम्भव से दिखने वाले इस महायज्ञ के आयोजन का श्रेय मुझ अकिंचन और मेरे जैसे अन्य स्वजनों को मिल सके।                     
    
🌹 डुंगरमल जैन, हजारीबाग (झारखण्ड) 
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से


http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/karta.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 83)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 यह दैवी उपलब्धि किस प्रकार सम्भव हुई। इसका एक ही उत्तर है पात्रता का अभिवर्धन। उसी का नाम जीवन साधना है। उपासना के साथ उसका अनन्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। बिजली धातु में दौड़ती है, लकड़ी में नहीं। आग सूखे को जलाती है, गीले को नहीं। माता बच्चे को गोदी तब लेती है, जब वह साफ-सुथरा हो। मल, मूत्र सना हो तो पहले उसे धोएगी, पोछेगी। इसके बाद ही गोदी में लेने और दूध पिलाने की बात करेगी। भगवान की समीपता के लिए शुद्ध चरित्र आवश्यक है। कई व्यक्ति पिछले जीवन में तो मलीन रहे हैं, पर जिस दिन से भक्ति की साधना अपनाई, उस दिन से अपना कायाकल्प कर लिया। बाल्मीकि, अंगुलिमाल, बिल्वमंगल, अजामिल आदि पिछले जीवन में कैसे ही क्यों न रहे हों, जिस दिन से भगवान की शरण में आए, उस दिन से सच्चे अर्थों में संत बन गए। हम लोग ‘‘राम-नाम जपना पराया माल अपना’’ की नीति अपनाते हैं। कुकर्म भी करते रहते हैं, पर साथ ही भजन-पूजन के सहारे उनके दण्ड से छूट मिल जाएगी, ऐसा सोचते रहते हैं, यह कैसी विडम्बना है?

🔵 कपड़े को रंगने से पूर्व धोना पड़ता है। बीज बोने से पूर्व जमीन जोतनी पड़ती है। भगवान का अनुग्रह अर्जित करने के लिए शुद्ध जीवन की आवश्यकता है। साधक ही सच्चे अर्थों में उपासक हो सकता है। जिससे जीवन साधना नहीं बन पड़ी, उसका चिंतन, चरित्र, आहार, विहार, मस्तिष्क अवांछनीयताओं से भरा रहेगा। फलतः मन लगेगा ही नहीं। लिप्साएँ और तृष्णाएँ जिनके मन को हर घड़ी उद्विग्न किए रहती हैं, उससे न एकाग्रता सधेगी और न चित्त की तन्मयता आएगी। कर्मकाण्ड की चिह्न पूजा भर से कुछ बात बनती नहीं। भजन का भावनाओं से सीधा सम्बन्ध है। जहाँ भावनाएँ होंगी, वहाँ मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव में सात्विकता का समावेश अवश्य करेगा।

🔴 सम्भ्रान्त मेहमान घर में आते हैं, कोई उत्सव होते हैं, तो घर की सफाई पुताई करनी पड़ती है। जिस हृदय में भगवान को स्थान देना है, उसे कषाय-कल्मषों से स्वच्छ किया जाना चाहिए। इसके लिए आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारों ही दिशा धाराओं में बढ़ना आवश्यक है। इन तथ्यों को हमें भली-भाँति समझाया गया। सच्चे मन से उसे हृदयंगम भी किया गया। सोचा गया कि आखिर गर्हित जीवन बनता क्यों है? निष्कर्ष निकाला कि इन सभी के उद्गम केंद्र तीन हैं-लोभ, मोह, अहंकार। जिसमें इनकी जितनी ज्यादा मात्रा होगी, वह उतना ही अवगति की ओर घिसटता चला जाएगा।

🔵 क्रियाएँ वृत्तियों से उत्पन्न होती है। शरीर मन के द्वारा संचालित होता है। मन में जैसी उमंगें उठती हैं, शरीर वैसी ही गतिविधियाँ अपनाने लगता है। इसलिए अवांछनीय कृत्यों-दुष्कृत्यों के लिए शरीर को नहीं मन को उत्तरदायी समझा जाना चाहिए। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विष वृक्ष की जड़ काटना उपयुक्त समझा गया है और जीवन साधना को आधार भूत क्षेत्र मन से ही आरम्भ किया गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 84)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 सुना है कि आत्मज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्म- ज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्मज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा- पूरा सन्देह है। जब तक व्यथा वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा नहीं। जब भी प्रार्थना का समय आया, तब भगवान से निवेदन यही किया- हमें चैन नहीं, वह करूणा चाहिए, जो पीड़ितों की व्यथा वेदना अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके। हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए, जो आँखों से आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके।             

🔵 बस इतना ही अनुदान वरदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र देकर उसकी लज्जा बचाने वाले भगवान हमें करूणा की अनन्त सम्वेदनाओं से ओत- प्रोत करते चले जाते हैं। अपने को क्या सुख साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया ?? केवल पीड़ित मानवता की व्यथा -वेदना ही रोम- रोम में समाई रही यही सोचते रहे कि अपने विश्वव्यापी कलेवर परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या किया जा सकता है। जो पाया उसका एक- एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया, जिससे शोक- सन्ताप की व्यापकता हटाने और सन्तोष की साँस ले सकने की स्थिति उत्पन्न करने में थोड़ा योगदान मिल सके।  

🔴 हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं, कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख- बिलख कर, फूट- फूटकर रोये हैं। इसे कोई कहाँ जानता हैं ?? लोग हमें सन्त, सिद्ध, ज्ञाने मानते हैं कोई लेखक, विद्वान्, वक्ता, नेता    समझते हैं, पर किसने हमारा अन्त:करण खोलकर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता, तो मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करूण, कराह से हा- हाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हडिडयों के ढाँचे में बैठी बिलखती ही दिखाई पड़ती। कहाँ तथाकथित आत्मज्ञान की निश्चिन्तता, एकाग्रता और समाधि सुख दिला सके। हमसे बहुत दूर है शायद वह कभी मिले भी नहीं, क्योंकि इस दर्द में जो भगवान की झाँकी होती है। पीड़ितों के आँसू पोंछने में ही जब चैन अनुभव होता हो, तो उस निष्क्रिय मोक्ष और समाधि को प्राप्त करने के लिए कभी मन चलेगा ऐसा लगता नही। जिसकी इच्छा ही नहीं, वह मिला भी किसे है ?? 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 37)

🌹 सद्बुद्धि का उभार कैसे हो?
🔵 निजी जीवन में आन-बान-शान पर मर मिटने वालों की लंबी कहानी है। जयचंद, मीरजाफर के उदाहरण ऐसे ही लोगों में सम्मिलित हैं। शत्रु से बदला चुकाने के नाम पर न जाने-क्या-क्या अनर्थ होते रहे हैं। ईर्ष्या ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को धूल चटाने में कमी नहीं रखी-ऐसे बहुत हैं, जो भयंकर अग्निकाण्ड रचने की ललक में अपने को भी घास-फूस की तरह जला बैठे। युद्धों की कथा-गाथाओं के पीछे भी इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों की भूमिका काम करती रही है। कहने को तो उन्हें भी दुस्साहस ही कह सकते हैं। अनाचारी, आतंकवादी और षड्यंत्रकारी ऐसा ही ताना-बाना बुनते रहते हैं।  

🔴 प्रश्न इन दिनों सर्वथा दूसरी प्रकार का है-सृजन और उन्नयन के लिए किसकी सद्भावना किस हद तक उभरती है? देखा जाना है-स्वार्थ के मुकाबले में परमार्थ सुहाता किसे है? ध्वंस करने वाले जिस प्रकार मूँछों पर ताव देेते हैं और शेखी बघारते हैं, वैसा सृजनकर्मियों को नहीं सुहाता है। निर्माणकर्ताओं की मंद गंध चंदन जैसी होती है, जो बहुत समीप से ही सूँघी जा सकती है, पर ध्वंस की दुर्गंध तो अपने समूचे क्षेत्र को ही कुरुचि से भर देती है और अपनी उपस्थिति का दूर-दूर तक परिचय देती है। दुष्टता भरी दुर्घटनाएँ दूर-दूर तक चर्चा का विषय बन जाती हैं, पर सेवा-सद्भावना भरे कार्य कुछेक लोगों की जानकारी में ही आते हैं। इतने पर भी उन्हें वैसा विज्ञापित होने की आवश्यकता नहीं होती है, जैसी कि दुष्ट-दुराचारी अपने नाम की चर्चा दूर-दूर तक होती सुन लेते हैं और अहंकार को फलितार्थ हुआ देखते हैं।                         

🔵 इन परिस्थितियों में सत्प्रवृत्ति-संवर्धन जैसे सत्प्रयोजनों के लिए किन्हीं दूरदर्शी और सद्भावना-संपन्नों के कदम ही उठते हैं। अनुकरण के प्रत्यक्ष उदाहरण सामने न होने पर अपना उत्साह भी ठण्डा होता रहता है। संचित कुसंस्कारों से लेकर वर्तमान प्रचलनों के अनेक अवरोध इस मार्ग में अड़ते हैं कि फूटे खंडहरों जैसी व्यवस्थाओं को किस प्रकार नये सिरे से भव्यभवन का विशाल रूप देने की योजना बनाई जाए तथा इसके लिये निरंतर कार्यरत और आवश्यक साधन जुटाने की हिम्मत कैसे जुटाई जाए?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 9)

🌹 समय का सदुपयोग करिये, यह अमूल्य है

🔴 स्वास्थ्य और धनोपार्जन के अतिरिक्त जो वक्त शेष रहता है उसका सदुपयोग समाज कल्याण के लिये करना चाहिये। वक्त का अभाव किसी के पास नहीं पर अधिकांश व्यक्ति उसे बेकार के कार्यों में व्यतीत किया करते हैं। ताश, चौपड़, शतरंज, मटरगस्ती आदि में वक्त बर्बाद करने से शरीर और मन की शक्ति का पतन होता है। इस वक्त का सदुपयोग सामाजिक उत्थान के कार्यों में करना हमारा धर्म है।

🔵 समय का महत्त्व अमूल्य है। उसके समुचित सदुपयोग की शिक्षा ग्रहण करें तो इस मनुष्य जीवन में स्वर्ग का-सा सुखोपभोग प्राप्त किया जा सकता है। आवश्यक है कि अपने वक्त को उचित प्रकार से दिन भर के कार्यों में बांट लें जिससे जीवन के सब काम सुचारु रूप से होते चले जायं। हमें इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिये कि वक्त ही जीवन है। यदि हमें अपने जीवन से प्रेम है तो अपने वक्त का सदुपयोग भी करना चाहिए।

🔴 हम अपना वक्त आलस्य और निरर्थक कार्यों में खर्च न करें। आलस्य दुनिया की सबसे भयंकर बीमारी है। आलस्य समस्त रोगों की जड़ है। उसे साक्षात् मृत्यु कहें तो इसमें अत्युक्ति न होगी। अन्य बीमारियों से तो शरीर सारे मनुष्य जीवन को ही खा डालता है। आलस्य में पड़कर मनुष्य की क्रिया शक्ति कुण्ठित होने लगती है जिससे न केवल शरीर शिथिल पड़ता है वरन् आर्थिक आय के साधन भी शिथिल पड़ जाते हैं।

🔵 हमारी जीवन व्यवस्था के लिए समय रूपी बहुमूल्य उपहार परमात्मा ने दिया। इसका एक-एक क्षण एक-एक मोती के समान कीमती है जो इन्हें बटोरकर रखता है सदुपयोग करता है वह यहां सुख प्राप्त करता है। गंवाने वाले व्यक्ति के लिए वक्त ही मृत्यु है। वक्त के दुरुपयोग से जीवनी शक्ति का दुरुपयोग होता है और मनुष्य जल्दी ही काल के गाल में समा जाता है। इसलिये हमें चाहिए कि समय का उपयोग सदैव सुन्दर कार्यों में करें और इस स्वर्ग तुल्य संसार में सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जियें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 April

🔴 यदि सचमुच ही आनन्दित रहने की इच्छा हो तो फूलों से कुछ सीखो। वे स्वयं खिलते हैं और जो उधर से निकलता है, उसके होठों को खिलाते हैं। अपना सौरभ उदारतापूर्वक वायुमण्डल में बखेरते हैं। यह नीति अपनाकर कोई भी भीतरी आत्म-सन्तोष और बाहरी सम्मान का भाजन बन सकता है। मधु मक्षिकाएँ अनवरत श्रम करती हैं। वे उसका लाभ नहीं उठातीं। उपभोग तो दूसरे ही करते हैं, पर इस श्रम में संलग्न उनकी कर्मनिष्ठा सहज ही आनन्द का उपहार देती रहती है। यदि ऐसा न होता तो दूसरों द्वारा मधु निचोड़ लिये जाने के उपरान्त वे दूसरे दिन फिर क्यों उसी प्रयास में संलग्न होतीं। उद्देश्यपूर्ण सत्कर्मों की प्रतिक्रिया ही आनन्द के रूप में अनुभव की जाती है। जिन्हें सरसता की खोज है, उन्हें इसी राह पर चलना पड़ेगा।

🔵 आनन्द का चिन्तन बुरा नहीं, पर उसे बीज की तरह गलना और उगना चाहिए अन्यथा नयनाभिराम वट वृक्ष की छाया में बैठकर सरसता का आस्वादन संभव न हो सकेगा। ध्यान और योग की अपनी उपयोगिता है, पर उतने भर से सच्चिदानन्द का सान्निध्य सम्भव नहीं। भगवान का कोई स्थिर रूप नहीं, वे सक्रियता के रूप में गतिशील हो रहे हैं। इस विश्व की शोभा, स्वच्छता जिस दिव्य गतिशीलता पर निर्भर है। हम उसका अनुसरण करके ही प्रभु प्राप्ति के राजमार्ग पर चल सकते हैं। चिन्तन इसके लिए प्रेरणा देता है, लक्ष्य तक पहुँचने के लिए चलना तो पैरों को ही पड़ेगा। भावनाओं में प्राणों की प्रतिष्ठापना कर्मनिष्ठा ही काम करती है। सत्कर्मों में निरत हुए बिना आनन्द की अनुभूति आज तक किसी को भी नहीं हो सकी है।

🔴 नीरसता क्या है? निष्क्रियता, उद्विग्नता क्या है? अनर्थ में अभिरुचि। हमारे जन्मजात आनन्द अधिकार को इन दो ने ही छीना है। जीवन नीरस लगता है क्योंकि सत्प्रयोजन की दिशा में हम निष्क्रिय बने रहते हैं। हम उद्विग्न रहते हैं क्योंकि अकर्म और कुकर्म करके आत्मा को चिढ़ाते और बदले में चपत खाते हैं। यदि आनन्द अभीष्ट हो− तो निरानन्द की दिशा में चल रही अपनी दिग्भ्रांत यात्रा का क्रम बदलना पड़ेगा। एक क्षण के लिए रुकें और देखें कि जो चाहते हैं उसे पाने की दिशा और चेष्टा सही भी है कि नहीं। चिन्तन के फलस्वरूप आनन्द की प्राप्ति का जो माहात्म्य बताया गया है उसका आधार यही है कि वस्तु स्थिति को नये सिरे से समझें और जीवन−नीति का नये सिरे से निर्धारण करें।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 भाग्य विधाता है मनुष्य अपने आपका

🔵 ‘‘मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है।’’ यह उक्ति एक ही तथ्य को इंगित करती है कि मनुष्य चाहे तो कोई भी असम्भव से असम्भव कार्य इस दुनिया में किसी के भी द्वारा किया जा सकता है। वह उसके जीवट के बलबूते सम्भव है। प्रारब्ध, संचित, क्रियमाण के सिद्धान्त अपनी जगह सही होते हुए भी एक तथ्य अपनी जगह सुनिश्चित एवं अटल है कि मनुष्य अपनी संकल्प-शक्ति के सहारे अपने भाग्य को बदल पाने में समर्थ है। ऐसा बहुतों ने किया है, वर्तमान में भी अनेकानेक उसी दिशा में संलग्न है और भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।

🔴 मनुष्य को ईश्वर का श्रेष्ठतम एवं वरिष्ठ पुत्र युवराज कहकर सम्बोधित किया गया है। उससे यह भी अपेक्षा रखी गयी है कि वह अपने कर्मों के सहारे इस सृष्टि रूपी बगिया को सुरम्य, सुरुचिपूर्ण और अनुशासित बनाये रखे। यह मनुष्य का सौभाग्य है कि वह इस सुरदुर्लभ मानव तन को पाकर इस धरती पर आया है। उसे एक अवसर दिया गया है कि वह श्रेष्ठ कर्म करता हुआ भव-बन्धनों से मुक्त होता चले। जो अवसर किसी को भी प्राप्त नहीं है वह देवताओं को व अन्यान्य योनियों में रहने वाले प्राणियों को उस परम पिता परमात्मा ने मनुष्य को अपना युवराज होने के नाते प्रदान किया है। अब वह उस पर निर्भर है कि वह दिये गये दायित्व का निर्वाह कर रहा है अथवा अपने दुष्कर्मों द्वारा इस विश्व-वसुधा रूपी अपने कार्य-क्षेत्र में अव्यवस्था पैदा कर रहा है।

🔵 स्वर्ग-नरक जो कुछ भी हैं, सब इसी धरती पर मौजूद हैं। परिष्कृत उदात्त मनःस्थिति का नाम ही स्वर्ग है। यही ऐसा वातावरण विनिर्मित करती है कि चारों ओर स्वर्गोपम परिस्थितियाँ स्वतः बनने लगती हैं। मनुष्य यदि चाहे तो निषेधात्मक चिंतन, ईर्ष्या-द्वेष का भाव रखते हुए अथवा नर-पशु, नर-पिशाच का जीवन जीते हुए नारकीय मनःस्थिति में भी रह सकता है। इस धरती को स्वर्ग जैसा सुन्दर-ऐश्वर्ययुक्त बनाये रखना ही ईश्वर को मनुष्य से अभीष्ट है। इसीलिए उसे पूरी छूट दी गई है कि वह अपने मानव शरीर वाली इस योनि में जितना भी कुछ श्रेष्ठतम सम्भव हो सकता है, वह दी हुई अवधि में कर दिखाये। इसी को कहते हैं-‘‘अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करना।’’

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 29
 
 
5th Convocation Ceremony 2017 | 5वां दीक्षान्त समारोह 2017 DSVV 15th April, 2017)

https://youtu.be/nN0Kt7Fiak0

5th Convocation 2017 with Dr. Chinmay Pandya @ DSVV Haridwar 15 April 2015

https://youtu.be/-N9qtRZKq-U
Inauguration of 5th Convocation Ceremony 2017 | DSVV 14th April, 2017

https://youtu.be/aeXj7Om-uQc

5th Convocation Ceremony 2017 | Culture Programme at  Dev Sanskriti Vishwavidyalaya, Haridwar 15 April 2015

https://youtu.be/I-dqq_yNESQ

5th Convocation Ceremony 2017 | Shri Kailash Satyarthi, Nobel Peace Prize winner Speech

https://youtu.be/KB3MYXStQKw
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 16 April 2017