शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

👉 वासना की परत

🔷 एक धनी व्यक्ति किसी फकीर के पास गया और कहने लगा कि, 'मैं प्रार्थना करना चाहता हूं, लेकिन तमान कोशिशों के बावजूद प्रार्थना नहीं होती। वासना बनी रहती है। चाहे जितना आंख बंद कर लूं लेकिन परमात्मा के दर्शन नहीं होते।' इसीलिए आप बताइए कि मैं क्या करूं? क्या कारण है इसका?

🔶 फकीर उस धनी को एक खिड़की के पास ले गया जिसमें कांच लगे हुए थे। उसके पार वृक्ष, बादल और सूरज सभी का दर्शन संभव था। फकीर उसे फिर दूसरी खिड़की पर ले गया। जिसमें चांदी की चमकीली परत लगी हुई थी। यहां लाकर फकीर ने धनी व्यक्ति ने पूछा, चांदी की चमकीली परत और कांच में कुछ में तुम क्या अंतर पाते हो ?

🔷 धनी ने बताया चमकीली परत पर सिवाय खुद की शक्ल के कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। बाहर की दुनिया तो एक सिरे से गायब है।

🔶 फकीर ने समझाया, 'जिस चमकीली परत के कारण तुमको सिर्फ अपनी शक्ल दिखाई दे रही है वह तुम्हारे मन के चारों तरफ भी है। इसीलिए तुम ध्यान में जिधर भी देखते हो केवल खुद को ही देखते हो। जब तक तुम्हारे ऊपर वासना की चांदी रूपी परत है कुछ दिखाई नहीं देगा इसीलिए इस परत को हटाना होगा। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम्हें प्रार्थना करने में कभी कोई परेशानी नहीं होगी।

👉 आज का सद्चिंतन 6 Jan 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Jan 2018


👉 आत्मा की उन्नति

🔷 जीवन की वास्तविक सफलता और समृद्घि आत्मभाव में जागृत रहने में है। जब मनुष्य, अपने को आत्मा अनुभव करने लगता है तो उसकी इच्छा, आकांक्षा और अभिरूचि उन्हीं कामों की ओर मुड़ जाती है, जिनसे आध्यात्मिक सुख मिलता है। हम देखते हैं कि चोरी, हिंसा, व्यभिचार, छल एवं अनीति भरे दुष्कर्म करते हुए अन्त:करण में एक प्रकार का कोहराम मच जाता है, पाप करते हुए पाँव काँपते हैं और कलेजा धडक़ता है इसका तात्पर्य है कि इन कामों को आत्मा नापसन्द करता है। यह उसकी रुचि एवं स्वार्थ के विपरीत है । किन्तु जब मनुष्य परोपकार, परमार्थ, सेवा, सहायता, दान, उदारता, त्याग, तप से भरे हुए पुण्य कर्म करता है, तो हृदय के भीतरी कोने में बड़ा ही सन्तोष, हलकापन, आनन्द एवं उल्लास उठता है। इसका अर्थ है कि यह पुण्य कर्म आत्मा के स्वार्थ के अनुकूल है। वह ऐसे ही कार्यों को पसन्द करता है। आत्मा की आवाज सुनने वाले और उसके अनुसार चलने वाले सदा पुण्य कर्म ही करते हैं। पाप की ओर उनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती, इसलिए वैसे काम उनसे बन भी नहीं पड़ते।

🔶 आत्मा को तात्कालीन सुख सत्कर्मों में आता है। शरीर की मृत्यु होने के उपरान्त जीव की सद्ïगति मिलने में भी हेतु सत्कर्म ही हैं। लोक और परलोक में आत्मिक सुख शान्ति सत्कर्मो के ऊपर ही निर्भर है। इसलिए आत्मा का स्वार्थ पुण्य प्रयोजन में है। शरीर का स्वार्थ इसके विपरीत है। इन्द्रियाँ और मन संसार के भोगों को अधिकाधिक मात्रा में चाहते हैं। इस कार्य प्रणाली को अपनाने से मनुष्य नाशवान शरीर की इच्छाएँ पूर्ण करने में जीवन को खर्च करता है और पापों का भार इकठ्ठा करता रहता है। इससे शरीर और मन का अभिरंजन तो होता है, पर आत्मा को इस लोक और परलोक में कष्ट उठाना पड़ता है। तप, त्याग, संयम, ब्रह्मïचर्य, सेवा, दान आदि के कार्यों से शरीर को कसा जाता है। तब ये सत्कर्म सधते हैं।

🔷 इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर के स्वार्थ और आत्मा के स्वार्थ आपस में मेल नहीं खाते, एक के सुख में दूसरे का दु:ख होता है। दोनों के स्वार्थ आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। इन दो विरोधी तत्वों में से हमें एक को चुनना होता है। जो व्यक्ति अपने आपको शरीर समझते हैं, वे आत्मा के सुख की परवाह नहीं करते और शरीर सुख के लिए भौतिक सम्पदायें, भोग सामग्रियाँ एकत्रित करने में ही सारा जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे लोगों का जीवन पशुवत् पाप रूप, निकृष्ट प्रकार का हो जाता है। धर्म, ईश्वर, सदाचार, परलोक, पुण्य, परमार्थ की चर्चा वे भले ही करें, पर यथार्थ में उनका पुण्य परलोक स्वार्थ साधन की ही चारदीवारी के अन्दर होता है। यश के लिए, अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए, दूसरों पर अपना सिक्का जमाने के लिए वे धर्म का कभी-कभी आश्रय ले लेते हैं।

🔶 वैसे उनकी मन:स्थिति सदैव शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्वार्थ साधनों में ही निमग्न रहती है। परन्तु जब मनुष्य आत्मा के स्वार्थ को स्वीकार कर लेता है, तो उसकी अवस्था विलक्षण एवं विपरीत हो जाती है। भोग और ऐश्वर्य के प्रयत्न उसे बालकों की खिलवाड़ जैसे प्रतीत होते हैं। शरीर जो वास्तव में आत्मा का एक वस्त्र या औजार मात्र है, इतना महत्वपूर्ण उसे दृष्टिगोचर नहीं होता है कि उसी के ऐश-आराम में जीवन जैसे बहुमूल्य तत्व को बर्बाद कर दिया जाय। आत्म भाव में जगा हुआ मनुष्य अपने आपको आत्मा मानता है और आत्मकल्याण के, आत्म सुख के कार्यों में ही अभिरुचि रखता और प्रयत्नशील रहता है। उसे धर्म संचय के कार्यों में अपने समय की एक-एक घड़ी लगाने की लगन लगी रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 3)

🔷 जीवन में उदासी, खिन्नता एवं अप्रसन्नता के वास्तविक कारण बहुत कम ही होते हैं, अधिकाँश का कारण घबराहट से उत्पन्न भय ही होता है। मनुष्य नहीं जानता कि वह इससे अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का कितना बड़ा भाग व्यर्थ गँवाता रहता है? जिन्होंने जीवन में बड़ी सफलताएं पाई हैं, उन सबके जीवन बड़े सुचारु, क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित रहे हैं। जिनके जीवन में विश्रृंखलता होती है, उनके पास सदैव “समय कम होने” की शिकायत बनी रहती है फिर भी अन्त तक कुल मिलाकर एक-दो काम ही कर पाते हैं, पर जिन लोगों ने विधि-व्यवस्था से, धैर्य से चिन्ता-विमुक्त कार्य सँवारे उन्होंने असंख्य कार्य किये। इतनी सफलतायें अर्जित कीं, जो सामान्य व्यक्ति के लिये चमत्कार जैसी लग सकती हैं।

🔶 यह भी संभव है कि आपकी दुर्बलता पैतृक हो। आप यह अनुभव करते हों कि जिस परिवार में पैदा हुए हैं, वहाँ की परिस्थितियाँ उतनी अच्छी नहीं थीं। उस घर के लोग असफल, निराश, निर्धन, अपढ़ या किसी अन्य बुराई से ग्रसित रहे हैं और उनका प्रभाव आपके संस्कारों पर भी पड़ा है। पारिवारिक जीवन का व्यक्ति के जीवन पर निःसंदेह बहुत प्रभाव होता है किन्तु अपने मनोबल को ऊँचा उठाकर गई-गुजरी स्थिति में भी आशातीत सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं।

🔷 कदाचित आप में ऐसी कमजोरियाँ हों, जिनके कारण आपको घबड़ाहट आती हो। उन कमियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिये। उन्हें अपने माता-पिता, सहपाठियों मित्रों से प्रकट कीजिये और उनसे सहायता लीजिये। जिन लोगों ने छोटी अवस्थाओं से बढ़कर बड़े कार्य किये हों, उनके जीवन चरित्र पढ़िये। अपनी मानसिक कमजोरियों को दूर करने के लिये अपने सहृदय अभिभावकों और मित्रों के प्रति आपका जीवन एक खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए, जिसका हर अच्छा-बुरा अध्याय पाठक आसानी से समझ सकता हो। आप अपनी कमजोरियों का हल औरों से पूछिये और उन्हें दूर करने का प्रयत्न किया कीजिये। अब तक आप आत्म-प्रशंसा के लिये अधीर रहते रहे, अब आप आत्मलोचन से प्रसन्न हुआ करिये, तो आपका जीवन प्रतिदिन निखरता हुआ चला जायगा। उसमें शक्ति , साहस और सफलता की कमी न रहेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.7

👉 Building a Person, his Family and his Society (Part 2)

🔶 These three are such jobs that if you could do, must be understood that you have begun taking steps to develop self-life and satiate the hunger of soul. Otherwise obviously you have been living and dying for the body, only pleasure of your organs have so far been your requirements and desires. Only the body has been your ISHT-DEV (a god we target to satiate). Only worldly illusions and attachments have so far been your fantasies. Is not so that all your life so far has been expended in these fantasies, if not then tell me in what else?

🔷 Now please oblige. Pursue simple life-high thinking. Pursue simplicity, simplicity, simplicity and an economical life-style. Much of your concerns will be addressed automatically if you adopt these principles in your life. Much of your time will be saved with you and you will be able to find enough time to address any issue touching your life otherwise your personal ambitions spread over like earth and sky will not let you to satiate your own issues what to talk of issues of family and society. Your own earning may not be sufficient to meet demands unnecessarily grown compelling you to earn through undesirable ways.

🔶 You will then find it essential to under weigh commodities, to seek unsolicited support and to cheat others and to ask loans from others. I mean to say that then you may be doing the meanest of mean jobs giving example of general scenario. Then you will be put to such a state of circumstances that when you cannot reduce your yearning, cannot control undue ambitions of material expenditure and of pomp-show, how you will be able to think about requirements of your soul? Where is the question of rise of soul in such a scenario? Therefore consider your soul also.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (अन्तिम भाग)

🔷 मंदिरों को अगर ठीक तरीके से काम में लाया जा सके और उनमें लगी पूँजी को ठीक तरीके से इस्तेमाल किया जाता रहे और इन दोनों का उपयोग लोकमंगल के लिए किया जाता रहे। उनमें ऐसे पुजारियों की, कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की जा सकती हो, जो अपना एक-दो घंटे का समय पूजा-पाठ में लगाने के बद बचा हुआ सारा समय समाज को ऊँचा उठाने में लगाएँ, तो मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि सरकार और दूसरी संस्थाओं के द्वारा जो लंबे-लंबे प्लान, योजनाएँ बनती हैं धन लगाती हैं, कार्यकर्ता नियुक्त करती हैं, फिर भी सारी योजनाएँ असफल हो जाती हैं, उसकी तुलना में यह योजना इतनी बड़ी, इतनी महत्त्वपूर्ण इतनी मार्मिक और सार्थक है कि हम राष्ट्र को पुनः उसके शिखर पर पहुँचा सकते हैं।

🔶 इसके लिए हमें केवल मंदिरों की दिशाएँ मोड़ने की जरूरत है। लोगों को सपने की जरूरत है, प्रचार करने की जरूरत है, धमकाने की जरूरत है। अगर ये काबू में न आते हो, तो घिराव करने से लेकर बहिष्कार करने तक की जरूरत है। यह समझाने की जरूरत है कि इस धन का और इमारतों का हम अपव्यय नहीं होने देंगे। मंदिरों को हम अंधश्रद्धा का केंद्र नहीं बनने देंगे। हम धर्मभीरुता का पोषण करने वाले केंद्र के रूप में नहीं, वरन इन्हें धर्म की स्थापना का केंद्र बनाएँगे। यदि इन मंदिरों को धर्म की स्थापना का केंद्र बनाया जा सका, तो राष्ट्र की महती आवश्यकता पूरी की जा सकती है। तब नया युग लाने में, नया समाज बनाने में, समाज की विकृतियों को दूर करने में और एक समर्थ राष्ट्र-समर्थ समाज बनाने के लिए इतने बड़े साधन हमारे हाथ सहज ही लग सकते है। इन बने-बनाए साधनों को विवेकशील को अपने अधिकार में, कब्जे में लेना ही चाहिए और उनको वह दिशा देनी चाहिए, जिससे कि भगवान वास्तव में प्रसन्न हों।

🔷 भगवान की जो सद्वृत्तियाँ इस विश्व में फैली हुई हैं, जिनसे कि शांति आती है और धार्मिक-भावना की वृद्धि होती है और समाज समृद्ध होता है, उन भावनाओं को आगे बढ़ाने के लिए मंदिरों को केंद्र बनाया ही जाना चाहिए ताकि वास्तविक भगवान अपनी वास्तविक पूजा को देखकर प्रसन्न हो जाए और भक्ति करने, पूजा पाठ करने का उद्देश्य लोगों को समक्ष आ सके और लोग उसका समुचित फायदा उठा सकें। यह करने को बहुत अधिक आवश्यकता है और हमको करना चाहिए। मंदिरों को जनजागरण का केंद्र बनाया जाना चाहिए, उनका कायाकल्प किया जाना चाहिए। इतना करना यदि संभव हो गया, तो समझना चाहिए कि हमने लोक मंगल के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर ली और बहुत बड़े साधनों को हमने अपने आप इकट्ठा कर लिया।

ॐ शान्तिः!

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 कभी कभी एक अच्छाई भी जीवन को बदल जाती है

🔷 एक नगर का राजा बड़ा ही तामसिक प्रवृत्ति का था और उस राजा का अधिकाँश समय निद्रा और भोग विलास मे ही व्यतीत हो जाता था!

🔶 पर उसके जीवन मे एक बड़ी अच्छाई थी की वो जब तक गौ माता को अपने हाथों से रोटी न दे देता तब तक वो चाहे भूखा मर जाता पर कुछ भी ग्रहण नही करता था!

🔷 एक बार शिकार खेलते खेलते घनघोर जंगल मे जा पहुँचा उसके साथ उसके कुछ साथी भी थे पूरी रात वो जंगल मे इधर उधर भटकते रहे पर रास्ता न मिला!

🔶 फिर वो उसी जंगल मे सो गये जब सुबह हुई तो चलते चलते बहुत दुर निकल गये और सभी भुख से व्याकुल थे उधर से कोई सन्तों का दल आ रहा था सभी उनके पास पहुँचे सन्तों के पास खाने की कुछ सामग्री थी तो सन्तों ने उन्हे खाने को दिया पर राजा ने कहा हॆ महात्माओं मेरे जीवन मे अनेक दुर्गुण है पर मेरा एक नियम है की जब तक मैं अपने हाथों से गौ माता को रोटी न खिलाऊँ तब तक मैं कुछ ग्रहण नही करूँगा और फिर वो सभी जैसे तैसे अपने नगर पहुँचे फिर राजा ने गौ माता को रोटी खिलाई और फिर स्वयं ने भोजन ग्रहण किया!

🔷 और इस दिन के बाद राजा को रोज एक स्वपन आने लगा फिर राजा किसी पहुँचे हुये सन्त के पास गये और राजा ने कहा हॆ महात्मन मैं रोज एक स्वपन देखता हुं की तीन व्यक्ति घोडे के साथ चल रहे है जिसमे पहला व्यक्ति घोड़े पर बैठकर आनन्दमय मुद्रा मे जा रहा है और वो घोड़े को कोडो से पिट रहा है और दूसरा जो है वो घोड़े पर बैठा है पर वो नीचे गिरता है फिर घोड़े पर बैठता है और घोड़े की कौडे से पिटाई करता है और तीसरा जो व्यक्ति है उसे घोड़े खींच रहे है और वो लहूलुहान हो रहा है कभी घोड़ा  इधर भगाये तो कभी उधर भगाये और घोड़ा भी रो रहा है और वो व्यक्ति भी रो रहा है।

🔶 पर सबसे बड़े आश्चर्य की बात ये है की जिन घोडो की पिटाई हो रही है वो बड़े ही आनंदमुद्रा मे चल रहे है और वो घुड़सवार भी आनन्द मे है और जो कभी नीचे गिरता कभी वापिस बैठता वो थोड़ा सा दुःखी होते है पर जैसे ही घोड़े को कौडे लगाता है घोड़ा और घुड़सवार दोनो खुश हो जाते है और तीसरा जो है घोड़े को बहुत ही लाड़प्यार से रख रहा है पर घोडा भी दुःखी और घोड़ेवाला भी दुःखी है ये क्या रहस्य है देव आप मुझ पर दया कीजिये और समझाये नाथ!

🔷 महात्माजी ने कहा हे राजन तीन तरह की प्रवर्तियां और तीन तरह के व्यक्ति है। सात्विक, राजसिक और तामसिक जिनके जीवन मे सात्विकता की प्रधानता है वो संयम रूपी कौडे से इन्द्रिय रूपी घोडो की पिटाई करते है और जो इन्द्रियों पर राज करते है वही आनन्द मे है घोड़ा और घुड़सवार दोनो ही आनन्द मे है!

🔶 दूसरे वो है जो इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने की पूरी पूरी कोशिश कर रहे है और वो भी संयम रूपी कौडे से पिटाई कर रहे है! और तीसरे वो जिनके जीवन मे तामसिकता प्रधान है जो भोग और विलास मे डूबे हुये है इंद्रियों ने उन्हे अपना गुलाम बना रखा है और ऐसे लोग रोते रोते ही चले जाते है!

🔷 राजा - क्षमा हॆ नाथ पर मैं तो एक तामसिक प्रवर्ति का मानव हुं और ऐसा दिव्य स्वपन मुझे कैसे आया?

🔶 महात्मा जी - हॆ राजन आपने जो गाय को रोटी देकर फिर कुछ खाने का जो नियम बना रखा है और परीक्षा काल मे भी जब आप अपने नियम के प्रति अडिग रहे तो श्रीभगवान ने आप पर दया करके आपको बार बार ये स्वपन दिखाया है!

🔷 महात्मा जी ने राजा को एक पाठ पढाया।

देखना इन्द्रियों के न घोड़े भगे
इनपे दिन रात संयम के कौडे पड़े
मन को विषयों से तुम हटाते चलो
हर दिन और हर पल हटाते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो
साधना- मार्ग पे आगे बढ़ते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो,
राह मे आयेगी बाधायें बहुत
पर यु हार मान के रुकना कही
बहती नदी की तरह तुम लड़ते चलो
कृष्ण गोविन्द गोपाल गाते चलो
देखना इन्द्रियों के न घोड़े भगे
इन पे दिन रात संयम के कौडे पड़े!!

उस दिन से राजा ने जीवन को सात्विकता की ओर मोड़ दिया!

🔷 मित्रों राजा था तो तामसिक पर उसने अथक प्रयासों से पूरे जीवन को बदलकर रख दिया क्योंकि कोशिश करने वालो की हार नही होती!

🔶 नियम के बिना कुछ नही है जीवन मे एक सारगर्भित नियम जरूर बनाना और उस नियम को कभी भंग मत होने देना फिर देखना एक दिन वो हमारे बन्द भाग्य के दरवाजे कैसे खोलता है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 5 Jan 2018


👉 आत्म बल और परमात्मा की प्राप्ति

🔷 जिस विचारधारा में मनुष्य परिभ्रमण करता है, वैसा ही स्वयं बनने लगता है, जो आदर्श, सिद्धांत, लक्ष्य, श्रद्धापूर्वक अंत:भूमि में धारण किये जाते हैं, उनका एक साँचा तैयार हो जाता है। इस साँचे में गीली मिट्टी की तरह मनुष्य ढलने लगता है और यदि कुछ समय लगातार, दृढ़ता एवं श्रद्धापूर्वक यह प्रयत्न जारी रहे, तो जीवन पकी हुई प्रतिमूर्ति की तरह ठीक उसी प्रकार का बन जाता है।

🔶 चोरी, डकैती, ठगी, व्यभिचार, बेईमानी आदि दुष्कर्म कोई व्यक्ति यकायक नहीं कर बैठता। विचार बहुत पूर्व से उसके मन में चक्कर लगाते हैं, इससे धीरे-धीरे उसकी प्रवृत्ति इस ओर ढलती जाती है और एक दिन सफल बदमाश बन जाता है। यही बात भलाई के मार्ग में होती है। बहुत समय तक स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन करने के उपरान्त उत्तम विचारों के संस्कार दृढ़ होते हैं, तब कहीं प्रत्यक्ष जीवन में वे लक्षण प्रगट होते हैं और वह वैसा बन जाता है।
  
🔷 पदार्थ विज्ञान के ज्ञाताओं को विदित है कि समान श्रेणी के पदार्थों की सहायता से सूक्ष्म तत्त्वों का आकर्षण और प्रगटीकरण हो सकता है। गन्धक, फास्फोरस, पुटाश, सरीखे अगिनतत्त्व प्रधान पदार्थों का अमुक प्रक्रिया के साथ संघर्ष करने से विश्वव्यापी सूक्ष्म अगिनतत्त्व चिनगारी के रूप में प्रगट हो जाता है। इसी प्रकार शब्द और विचारों की सहायता से चैतन्य तत्त्वों का आकर्षण और प्रगटीकरण हो सकता है।

🔶 एक लेखक या वक्ता एक विशेष अनुभूति के साथ लोगों के सामने अपने विचार इस प्रकार रखता है कि वे विविध भाववेशों में डूबने, उतराने लगते हैं। हँसते को रुला देनाा और रोते को हँसा देना कुशल वक्ता के बायें हाथ का खेल है। इसी प्रकार क्रोध, घृणा, प्रतिहिंसा या दया, क्षमा, उपकार आदि के भावावेश शब्द और विचारों की सहायता से किसी व्यक्ति में पैदा किये जा सकते हैं।
  
🔷 भावनाओं का आवागमन, शब्द और विचारों की सहायता से होता है, संगीत, नृत्य, गान, रोदन, हुंकार, गर्जना, गाली, ललकार, विनय, मुस्कराहट, अट्टïहास, तिरस्कार, अहंकार से सने हुए शब्द सुनने वालों के मन में विविध प्रकार के भाव उत्पन्न करते हैं और उन भावों से उत्तेजित होकर मनुष्य बड़े-बड़े दुस्साहसपूर्ण कार्य कर डालते हैं। शब्द और विचार मिलकर एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम बन जाते हैं जो सूक्ष्म चैतन्य जगत में से उसी प्रकार के तत्त्वों को खींच लाते हैं और जिस स्थान पर उन्हें पटका गया था वहाँ प्रगट हो जाते हैं। दूसरों के ऊपर ही नहीं-अपने ऊपर भी अमुक प्रकार के चैतन्य तत्त्वों को इसी माध्यम द्वारा भराा जा सकता है। इससे प्रगट है कि परमाणुमय भौतिक जगत की भाँति, संकल्पमय चैतन्य जगत में भी वैसे माध्यम मौजूद हैं जो अदृश्य तत्त्वों और शक्तियों को खींच लाते हैं और उनका प्रत्यक्षीकरण कर देते हैं।
  
🔶 गायत्री की शब्दावली एक ऐसा ही माध्यम है। इसकी शब्द शृंखला का गुंथन इस प्रकार हुआ है कि भावना ग्रंथियाँ उत्तेजित होती हैं और यह मंत्रोच्चारण एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम सूत्र बन जाता है जिसके द्वारा गायत्री की ब्राह्मी शक्ति सूक्ष्म लोक से खींच-खींच कर मनुष्य के अन्त:करण में जमा होने लगती है और वह दिव्य तत्त्वों से ओत-प्रोत होने लगता है। गायत्री की साधना से सतोगुण की ब्राह्मी भावनाएँ अन्त: प्रदेश में अपना केन्द्र स्थापित करती हैं। उन भावनाओं के अनुरूप आन्तरिक जीवन बन जाता है उसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ बाह्यï जीवन में भी दृष्टिïगोचर होती हैं। आत्मा की समीप सत्, चित्त और आनन्दमय तत्त्वों का भण्डार प्रचुर मात्रा में जमा होने लगता है। यह संचय ही आत्मबल कहलाता है। इस प्रकार वेदमाता गायत्री की कृपा के साधक आत्म-बल सम्पन्न बन जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जिन्दगी जीनी हो तो इस तरह जिये (अन्तिम भाग)

🔷 उत्साह और उल्लास बना रहने के लिए यह आवश्यक है कि अपने सामने कोई दूरगामी लक्ष्य रहे और यहाँ तक पहुँचने के लिए सोचने और करने के लिए बहुत कुछ काम सामने रहे। जीवन का आनन्द तभी तक है जब तक उसने सामने कुछ काम है। जिस दिन व्यक्ति पूर्णतया निश्चित होता है उस दिन या तो वह परमहंस होता है या जड़ मध्यवृत्ति के व्यक्ति के लिए यह स्थिति निरानन्द है और उसमें निराशा एवं निष्क्रियता मिश्रित थकान की ही अनुभूति होगी। उसे सोचना या करना भले ही कुछ न पड़े पर साथ ही आशा एवं तत्परता की ओर प्रेरित करने वाले उल्लास भरे प्रकाश से वंचित ही रहना पड़ेगा

🔶 जिम्मेदारियाँ दूसरों पर डालने की इच्छा इसलिए होती है कि उत्तरदायित्व का वजन उठाना कायर और कमजोरों को बहुत भारी प्रतीत होता है। वे पगडंडी ढूँढ़ते हैं और ऐसे सरल रास्ते बच निकलने की बात सोचते हैं जिसमें अपने ऊपर कुछ बोझ न पड़े पर वस्तुतः इसमें भटकाव के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। उत्थान और पतन का ही नहीं।, सुख और दुःख का उत्तरदायित्व भी हमें अपने ऊपर लेना चाहिए और सफलता असफलता की अपनी ही जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं है।

🔷 वर्तमान में जो परिस्थितियाँ सामने खड़ी है उनमें यत्किंचित् दूसरे भी निमित्त हो सकते हैं पर अधिकतर अपनी ही रीति-नीति और गतिविधियों की प्रतिक्रिया सामने रहती है। भविष्य में भी जो कुछ होना या बनना है उस में भी अपने ही क्रिया-कलापों के प्रतिफल सामने होगे। दूसरों का सहयोग अवरोध एक सीमा तक ही हमारा भला बुरा कर सकता है। तथ्य यह है कि अपना व्यक्तित्व ही हर दिशा में प्रतिध्वनि की तरह गूँजता है।

🔶 किन्हीं असफलताओं के लिए दूसरों को दोष देने की अपेक्षा यह अधिक लाभदायक है कि हम अपनी उन त्रुटियों को ढूँढ़े जिनके कारण सफलता से वंचित रहना पड़ा इसी तरह प्रगति की दिशा में जितने कदम बढ़ सके उनके पीछे उस सुव्यवस्थित रीति-नीति को समझे जिसे अपना कर हम स्वयं ही नहीं और भी कितने ही लोग आगे बढ़ सकने में समर्थ हुए हैं। सद्गुण ही किसी को ऊँचा उठा सकते ओर आगे बढ़ा सकते हैं। यह रहस्य जिन्हें विदित हो सका वे अपने को परिष्कृत करने में जुटते हैं ताकि एक के बाद दूसरी उत्कर्ष की परतें खुलती चलें।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जनवरी 1973 पृष्ठ 35
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.35

👉 मन का भार हल्का रखिये (भाग 2)

🔷 अपना क्रम अपनी व्यवस्थायें ठीक रखिये तो आप पायेंगे कि घबराहट के सारे कारण निराधार हैं। आप अपना काम ठीक रखिये, आपको कोई नौकरी से नहीं निकालेगा। दुकान पर रोज बैठते हैं, तो खाने की क्या चिन्ता? दूसरों की बच्चियों की शादियाँ होती हैं,फिर आप की बच्ची कुमारी थोड़ी ही बैठी रहेगी। लड़का स्वस्थ और सदाचारी मिल जाय तो निर्धनता की घबराहट क्यों हो? आप अपनी व्यवस्था के साथ अपना दृष्टिकोण ठीक रखिये, आपकी सारी कठिनाइयाँ अपने आप हल होती रहेंगी।

🔶 घबड़ाना तो उन्हें चाहिए, जो हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। कर्मशील व्यक्ति के लिये असफलता की आशंका नहीं होनी चाहिए।

🔷 कार्य करते हुए मानसिक असंतुलन रखना एक बड़ी कमजोरी है। इसी से सारी परेशानियाँ पैदा होती हैं। मन का झुकाव कभी इस ओर , कभी उस ओर होगा तो आप कभी एक काम हाथ में लेंगे और वह पूरा नहीं हो पायेगा, दूसरे काम की ओर दौड़ेंगे। इस गड़बड़ी में आपका न पहला काम पूरा होगा, न दूसरा। सब अधूरा पड़ा रहेगा। आपका मानसिक असंतुलन सब गड़बड़ करता रहेगा और आपकी परेशानियाँ भी बढ़ती जायेंगी।

🔶 विचार लड़खड़ा जाते हैं, तो दिनचर्या और कार्यक्रम भी गड़बड़ हो जाते हैं और उल्टे परिणाम निकलते हैं। सवारी पाने की जल्दी में पीछे सामान छूट जाता है। स्वागत की तैयारी में ध्यान ही नहीं रहता और खाना जल जाता है। स्त्रियाँ इसी झोंक में इतनी बेसुध हो जाती हैं कि चूल्हे या स्टोव की आग से उनके कपड़े जल जाते हैं या मकान में आग लग जाती है। प्रत्येक कार्य को एक व्यवस्था के साथ करने का नियम है। एक काम जब चल रहा है, तो दूसरी तरह के विचार को मस्तिष्क में स्थान मत दीजिये। एक बार में एक ही विचार और एक ही कार्य। हड़बड़ाये नहीं, अन्यथा आपका सारा खेल चौपट हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Building a Person, his Family and his Society (Part 1)

🔶 You please include few new jobs in your life. Which job to include?  These are person building, family building and society building. Out of these only one is your job- person building. You go back from here with determination to build your personality. We should change our temperament, our thinking-style. One, let us change our character, the second change that is to be done after going from here is the change in your convictions you have by now about your family for members of family cannot be changed. It is not possible to change or dislodge family members to include new ones as also not possible is to change their education, homes and nature, but what you can surely change is the way you treat your family members. You can easily change the way you think.

🔷 You have some duties, responsibilities towards society. You cannot ignore those duties and responsibilities. The society will give no weight to you and ignore you if you do the same with it. You will not be able to garner respect or support. If Keep ignoring, keep centralising, remain alone to eat and enjoy singly, just forget to get any support or respect from society, simple.

🔶 The very respect and support is the hunger and the thirst of the soul. Fulfilling your obligations for your society is purchasing respect and support to satiate the hunger and thirst of the soul leading you to add to your happiness and progress. There were two jobs- building yourself and your family. The third one is to contribute something or the other for betterment of society.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 धर्मतंत्र का दुरुपयोग रुके (भाग 10)

🔷 इन मंदिरों में पुजारी के रूप में सिर्फ लोकसेवियों की नियुक्ति हो, जिनके मन में समाज के लिए दर्द है और समाज को ऊँचा उठाना चाहते हैं। जो मनुष्य के भीतर धर्मवृत्तियाँ पैदा करना चाहते हैं, उसी तरह के पुजारी वहाँ रहें। वे अपने पूजा-पाठ का एक-दो घंटा पूरा करने के बाद, अपने गुजारे की व्यवस्था करने के बाद जो समय उनके पास बच जाता है, उसका इस्तेमाल इस तरह से करें, जिससे कि हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एवं व्यक्तिगत चरित्र की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।

🔶 मंदिरों में जहाँ दूसरी तरह के खरच होते हैं-कभी बँगले बनते हैं कभी उत्सव होते हैं, कभी झाँकी बनती है, कभी क्या बनता है और उसी में लाखों रुपये खरच हो जाता हैं। उन सारे-के क्रियाकलापों में आंशिक किफायत की जा सकती है और इससे जो पैसा बचता है, उसको लोकमंगल की अनेक प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है और करना भी चाहिए। इस तरीके से धन की आवश्यकता, इमारतों की आवश्यकता, जनसहयोग की आवश्यकता मंदिरों के आधार पर ठीक तरीके से पूरी की जा सकती है।

🔷 मित्रो! जो व्यक्ति ऐसा ख्याल करते हैं कि भगवान निराकार हैं उसकी मूर्तिपूजा की जरूरत नहीं है, उन लोगों से भी मेरी यह प्रार्थना है कि वे उस शक्तिशाली माध्यम की उपेक्षा नहीं करें। ये मंदिर हिंदू धर्म की श्रद्धा के केंद्र हैं। उनको अब दिशा दी जानी चाहिए, नया मोड़ दिया जाना चाहिए। अब उनके विरोध करने की जरूरत नहीं रहीं। अब उनका खंडन करने की जरूरत नहीं रही। किसी जमाने में ऐसा रहा होगा कि लोगों के मनों में मूर्तिपूजा की बात, जो गहराई तक जम गई थी उसको कमजोर करने के लिए संभव है, किसी ने मंदिर का विरोध किया हो और यह कहा हो कि इसमें मूर्तिपूजा की जरूरत नहीं है। उस आधार पर धन खरच करने की जरूरत नहीं है। हो सकता है, किसी जमाने में धर्म सुधारकों ने अपनी बात समय के अनुरूप कही हो, लेकिन मैं अब यह कहता हूँ कि हिंदुस्तान में गाँव-गाँव में छोटे-बड़े मंदिर बने हुए है। उनको आप उखाड़िएगा क्या? भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण जिनको हमारी असंख्य जनता श्रद्धापूर्वक प्रणाम करती है, क्या उनका आप विरोध करेंगे?

🔶 साथियो! ठीक है, जैसा भी अब तक चला आ रहा है, उसे अब हमें सुधार की दिशा में मोड़ देना चाहिए। यह एक बहुत बड़ा काम है। विरोध करके नई चीज को खड़ा करना कितना मुश्किल है। एक चीज को गिराया जाए और फिर एक नई इमारत बनाई जाए, इसकी अपेक्षा यह क्या बुरा है कि जो बनी-बनाई इमारत है, उसको हम ठीक तरीके से इस्तेमाल करना सीख लें और उसी को काम में लाएँ।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 9)

👉 सद्गुरु की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कार

🔷 भगवान् महादेव गुरुगीता के अगले मंत्र में स्पष्ट करते हुए कहते हैं- इस तरह के संकल्प के साथ किए गए पवित्र कर्मों के अनुष्ठान गूढ़ विद्या हैं।
गूढविद्या जगन्माया देहेचाज्ञानसम्भवा।
उदयो यत्प्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते॥ १०॥

🔶 माया से आवृत जगत् और अज्ञान से उत्पन्न शरीर के लिए यह गूढ़विद्या है। जिसके प्रकाशित होने से सत्यज्ञान का उदय होता है। इसी तत्त्व को ‘गुरु’ संज्ञा दी गयी है।
  
🔷 सद्गुरु प्राप्ति की अभीप्सा के संकल्प को भगवान् सदाशिव गूढ़विद्या इसलिए कहते हैं; क्योंकि यह तत्त्व साधारणतया किसी की समझ में नहीं आता। कामनाओं और वासनाओं के अँधेरे से घिरे लोग ‘गुरु’ शब्द का महत्त्व ही नहीं समझ पाते। ‘गुरु’ में पहला अक्षर ‘गु’ अंधकार का वाचक है। और ‘रु’ प्रकाश का वाचक है। इस तरह गुरु वह तत्त्व है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञानरूपी तेज का प्रकाश करता है। ऐसे सद्गुरु के लिए लगन,उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपने सर्वस्व समर्पण के लिए आतुरता में ही इस मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

🔶 यद्यपि यह कार्य आसान नहीं है। आसान न होने का पहला कारण है कि यह समस्त जगत् अपने वास्तविक रूप में है, तो ब्रह्ममय, किन्तु इस पर माया का छद्म आवरण है। इस दुनिया में प्रायः सभी लोग इसी कारण मेरा-तेरा करने में लगे हुए हैं। गुरु प्राप्ति की लगन में अगली बाधा है शरीर। यहाँ शरीर का अर्थ केवल देह मात्र से नहीं है। बल्कि इसके अर्थ में दैहिक कष्ट और दैहिक वासना भी शामिल है। जो मनुष्य की आत्म चेतना को अपने से कसे-जकड़े रहती है। इन बाधाओं और अवरोधों को परे हटाकर जो सद्गुरु की प्राप्ति के लिए संकल्पित होते हैं, वे धन्य हैं, वे कृतार्थ और कृतकृत्य होते हैं, जो सद्गुरु के चरणों में भक्तिपूर्वक अपने को न्यौछावर करने के लिए आगे बढ़ते हैं; क्योंकि गुरुचरणों की महिमा अपार है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 19