शनिवार, 29 दिसंबर 2018

👉 शिकंजी का स्वाद

एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था रवि। वह बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक मोहदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा। क्लास खत्म होते ही रवि अध्यापक मोहदय के कमरे में पहुंचा। रवि मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक मोहदय ने पुछा।

रवि बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ….. अध्यापक मोहदय ने ध्यान से रवि की बातें सुनी और उसे रविवार को घर पे बुलाया। रवि नियत समय पर अध्यापक मोहदय के घर पहुँच गया। रवि क्या तुम शिकंजी पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पुछा। जी।  रवि ने कहा।

अध्यापक मोहदय ने शिकंजी बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा  कम ही रखी। शिकंजी का एक घूँट पीते ही रवि ने अजीब सा मुंह बना लिया। अध्यापक मोहदय ने पुछा,  क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या? जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. रवि अपनी बात कह ही रहा था की अध्यापक मोहदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम की नहीं…

ऐसा कह कर अध्यापक मोहदय गिलास उठा ही रहे थे कि रवि ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा। बिलकुल ठीक रवि यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था….अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो, शिकंजी में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है…. और अब इस बात को समझो, शिकंजी का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते, इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते, पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शिकंजी का स्वाद ठीक कर सकते हैं उसी तरह पुरानी कड़वाहट मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

यदि तुम अपने भूत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्जवल हो पायेगा। अध्यापक मोहदय ने अपनी बात पूरी की। रवि को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

👉 सदाचार का महान धन

सदाचार-श्रेष्ठ आचरण-अच्छा चालन चलन, यह मानव जीवन का बहुमूल्य खजाना है। सृष्टि के आदि काल से ऋषि मुनियों से लेकर आधुनिक विद्वानों तक यह बात स्वीकार होती आई है कि मनुष्य का गौरव इसमें हैं कि उसका आचरण श्रेष्ठ हो। भलाई, नेकी, उदारता, सेवा, सहायता, सहानुभूति से परिपूर्ण हृदय वाला व्यक्ति सदाचारी कहा जाता है, उसके बाह्य आचरण ऐसे होते हैं, जो दूसरों को स्थूल या सूक्ष्म रीति से निरन्तर लाभ ही पहुँचाते रहते हैं। वह एक भी कार्य ऐसा नहीं करता, जिससे उसकी आत्मा को लज्जित होना पड़े, पश्चाताप करना पड़े या समाज के सामने आँखें नीची झुकानी पड़ें।

मनुष्य चाहे जितना विद्वान् चतुर धनवान, स्वरूप वान, यशस्वी तथा उच्च आसन पर आसीन हो, परन्तु यदि उसका व्यवहार उत्तम नहीं तो वह सब व्यर्थ है, धूलि के बराबर है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा है, उस पर मीठे फल भी लगते हैं पर उससे दूसरों को क्या लाभ या धूप में तपा हुआ पथिक न तो उसकी छाया में शान्ति लाभ कर सकता है और न भूख से व्याकुल को उसका एक फल प्राप्त हो सकता है। जिसका आचरण श्रेष्ठ है वह किसी की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं धार्मिक उन्नति में जरा भी बाधा पहुँचाने वाला कार्य न करेगा वरन् उससे सहायता ही देगा।

आप अपने आचरणों को ऐसा रखिये, जिससे आपके माता पिता की कीर्ति में वृद्धि हो। आपको अपना मित्र कहते हुए दूसरे लोग गर्व अनुभव करें। छोटे लोग आपका उदाहरण सामने रख कर अपने आचरण को उसी साँचे में ढालने का प्रयत्न करें। स्मरण रखिए, सदाचार मानव जीवन का महान धन है। जो सदाचारी है, असल में वही सच्चा धनी है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943 पृष्ठ 14

👉 Look Introvert for Peace

If you are looking for introvert peace, you must follow the path to spirituality. For this you must turn your extrovert sight inwardly. A bewildered fellow deluded and tired of wandering in the hazy mist of external world, finds immense peace and light in the inner world.

When we understand the illusory nature of the gamut of things and activities in the world around and get introvert, ponder over our inner self, only then we realize that we had lost our way all these days; our cravings, materialistic needs and passions were driving our life and we were running behind the mirage of happiness. But nor we know that nothing can ever satisfy the passions, no one can ever fulfill his ambitions. Attempting to do so is like pouring petrol in fire. Thus, instead of running behind the shadow to catch it, we must turn our back to it. Having a glimpse of the inner treasure detaches us from the perishable pennies for which we had been wasting all our potentials and time. Introvert search takes us near the God and shows the key to infinite joy and peace.

Once we know our real self, grasp the reality of the world, and see the inner light, the nectar-spring of unprecedented peace erupts from within and extinguishes the flames of discontent, desperations and tensions forever. With the rise of the feeling of true fulfillment, there hardly remains any worldly need or desire; every thing in hand or gifted by Nature for survival suffices and every circumstance becomes a source of expanding you.

📖 Akhand Jyoti, March 1941

👉 अंतर्मुखी होने पर ही शांति

अपनी दृष्टि को बाहर से हटाकर अंदर डालना चाहिए, अध्यात्म-पथ का अवलंबन लेना चाहिए। जगत् में इधर-उधर भटकने वाला प्राणी इसी शीतल वृक्ष के नीचे शांति प्राप्त कर सकता है।

जब बाहर की माया रूपी वस्तुओं के भ्रम से विमुख होकर हम अंतर्मुखी होते हैं, आत्मचिंतन करते हैं, तो प्रतीत होता है कि हम अपने स्थान से बहुत दूर भटक गए थे। आवश्यकताएँ कभी पूर्ण नहीं हो सकती हैं, उन्हें जितना ही तृप्त करने का प्रयत्न किया जाएगा, उतना ही वे अग्नि में घृत डालने की तरह और अधिक बढ़ती जाएँगी। इसलिए इस छाया के पीछे दौड़ने की अपेक्षा उसकी ओर से पीठ फेरनी चाहिए और सोचना चाहिए कि हम कौड़ियों के लिए क्यों मारे-मारे फिर रहे हैं, जब कि हमारे अपने घर में भंडार भरा हुआ है। अंतर में मुँह देखने पर, परमात्मा के निकट उपस्थित होने पर, वह ताली मिल जाती है, जिससे सुख और शांति के अक्षय भंडार का दरवाजा खुलता है।

अपनी वास्तविक स्थिति को जानने से, आत्मस्वरूप को पहचानने से, संसार के स्वरूप का सच्चा ज्ञान होने से, शांति की शीतल धारा प्रवाहित होती है, जिसके तट पर असंतोष की ज्वाला जलती हुई नहीं रह सकती। सच्चा संतोष उपलब्ध होे पर उसकी बाह्य आवश्यकताएँ बहुत ही थोड़ी रह जाती हैं और जब थोड़ा चाहने वाले को बहुत मिलता है, तो उसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है।

📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1941 पृष्ठ 19

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Dec 2018

◾ जो अपनी समीक्षा करने और अपना सुधार कर सकने की आवश्यकता को समझता है और उसके लिए ईमानदारी से तत्पर रहता है, वह गिरी हुई स्थिति में नहीं पड़ा रह सकता। उसके जीवन का विकास होने ही वाला है। उसे प्रगति के पथ पर चलते हुए एक दिन महापुरुषों की श्रेणी में अपनी गणना कराने का अवसर मिलने ही वाला है।

◾ उतावले और जल्दबाज, असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति एक प्रकार के अधपगले कहे जा सकते हैं। वे जो कुछ चाहते हैं उसे तुरन्त ही प्राप्त हो जाने की कल्पना किया करते हैं। यदि जरा भी देर लगती है तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते है और प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण मानसिक स्थिरता को खोकर असंतोष रूपी उस भारी विपत्ति को कंधे पर ओढ़े लेते हैं, जिसका भार लेकर उन्नति की दिशा में कोई आदमी देर तक नहीं चल सकता।

◾ स्वतंत्र बुद्धि की कसौटी पर आप जिस निष्कष्र पर पहुँचते हैं उसे साहस के साथ प्रकट कीजिए, दूसरों को सिखाइए। चाहे आपको कितने ही विरोध-अवरोधों का सामना करना पड़े, आपकी बुद्धि जो निर्णय देती है, उसका गला न घोटें। आप देखेंगे कि इससे आपकी बौद्धिक तेजस्विता, विचारों की प्रखरता बढ़ेगी और आपकी बुद्धि अधिक कार्य कुशल और समर्थ बनेगी।

◾ आनंद का सबसे बड़ा शत्रु है-असंतोष। हम प्रगति के पथ पर उत्साहपूर्वक बढ़ें, परिपूर्ण पुरुषार्थ करें। आशापूर्ण सुंदर भविष्य की रचना के लिए संलग्न रहें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि असंतोष की आग में जलना छोड़ें। इस दावानल में आनंद ही नहीं, मानसिक संतुलन और सामर्थ का स्रोत भी समाप्त हो जाता है। असंतोष से प्रगति का पथ प्रशस्त नहीं, अवरुद्ध ही होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पिशाच प्रेमी या पागल (भाग 2)

देखते हैं कि अबोध किशोर बालकों को लालच या बहकावे में डालकर उन्हें अपनी लिप्सा का साधन बनाने वाले मुहब्बत का दम भरते हैं। उन लड़कों को अपने ही जैसा पतित जीवन बिताने की शिक्षा देने वाले एवं उनका शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य नष्ट कर देने वाले यह कुकर्मी अपने कार्य में प्रेम की गन्ध ढूँढ़ते फिरते हैं!

देखते हैं कि रूप रंग की चटक-मटक पर लोभित होकर स्त्री-पुरुष इन्द्रिय-प्रेरणा से व्याकुल होते हैं, और एक दूसरे को पाने के लिए बेचैन रहते हैं, पत्र व्यवहार चलता है, गुप्त संदेश दौड़ते हैं, और न जाने क्या क्या होता है, प्रेम रस चखने में उनकी बड़ी व्याकुलता होती है और सोचते हैं कि हमारे यह कार्य प्रेम के परिणाम है।

देखते हैं कि बालकों को अमर्यादित भोजन करके उन्हें बीमार बनाने वाली माता बेटे के फोड़े को सड़ने देकर हड्डी गल जाने तक डॉक्टर के पास न ले जाने वाला पिता, भाई के अन्याय में सहायता करने वाला भाई, मित्र को पाप पंक में पड़ने से न रोकने वाला मित्र, बीमार को मनचाहा भोजन देने वाला अविवेकी परिचारक समझता है कि मैं प्रेमी हूँ, मैं दूसरे पक्ष के साथ प्रेम का व्यवहार कर रहा हूँ।

देखते हैं कि साँप को छोड़ देने वाले, चोर को सजा कराने का विरोध कराने वाले, अत्याचारी को क्षमा करने वाले, पाजी की हरकतें चुपचाप सह लेने वाले समझते हैं कि हमने बड़ी दया की है, पुण्य कमा रहे हैं, प्रेम का प्रदर्शन कर रहे हैं।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1942 पृष्ठ 11

http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/May.11

👉 आज का सद्चिंतन 29 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Dec 2018


शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

👉 मूर्ख कौन?

किसी गांव में एक सेठ रहता था. उसका एक ही बेटा था, जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था. सेठ की बहू एक दिन कुएँ पर पानी भरने गई. घड़ा जब भर गया तो उसे उठाकर कुएँ के मुंडेर पर रख दिया और अपना हाथ-मुँह धोने लगी. तभी कहीं से चार राहगीर वहाँ आ पहुँचे. एक राहगीर बोला, "बहन, मैं बहुत प्यासा हूँ. क्या मुझे पानी पिला दोगी?"

सेठ की बहू को पानी पिलाने में थोड़ी झिझक महसूस हुई, क्योंकि वह उस समय कम कपड़े पहने हुए थी. उसके पास लोटा या गिलास भी नहीं था जिससे वह पानी पिला देती. इसी कारण वहाँ उन राहगीरों को पानी पिलाना उसे ठीक नहीं लगा.

बहू ने उससे पूछा, "आप कौन हैं?"

राहगीर ने कहा, "मैं एक यात्री हूँ"

बहू बोली, "यात्री तो संसार में केवल दो ही होते हैं, आप उन दोनों में से कौन हैं? अगर आपने मेरे इस सवाल का सही जवाब दे दिया तो मैं आपको पानी पिला दूंगी. नहीं तो मैं पानी नहीं पिलाऊंगी."

बेचारा राहगीर उसकी बात का कोई जवाब नहीं दे पाया.

तभी दूसरे राहगीर ने पानी पिलाने की विनती की.

बहू ने दूसरे राहगीर से पूछा, "अच्छा तो आप बताइए कि आप कौन हैं?"

दूसरा राहगीर तुरंत बोल उठा, "मैं तो एक गरीब आदमी हूँ."

सेठ की बहू बोली, "भइया, गरीब तो केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?"

प्रश्न सुनकर दूसरा राहगीर चकरा गया. उसको कोई जवाब नहीं सूझा तो वह चुपचाप हट गया.

तीसरा राहगीर बोला, "बहन, मुझे बहुत प्यास लगी है. ईश्वर के लिए तुम मुझे पानी पिला दो"

बहू ने पूछा, "अब आप कौन हैं?"

तीसरा राहगीर बोला, "बहन, मैं तो एक अनपढ़ गंवार हूँ."

यह सुनकर बहू बोली, "अरे भई, अनपढ़ गंवार तो इस संसार में बस दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?'

बेचारा तीसरा राहगीर भी कुछ बोल नहीं पाया.

अंत में चौथा राहगीह आगे आया और बोला, "बहन, मेहरबानी करके मुझे पानी पिला दें. प्यासे को पानी पिलाना तो बड़े पुण्य का काम होता है."

सेठ की बहू बड़ी ही चतुर और होशियार थी, उसने चौथे राहगीर से पूछा, "आप कौन हैं?"

वह राहगीर अपनी खीज छिपाते हुए बोला, "मैं तो..बहन बड़ा ही मूर्ख हूँ."

बहू ने कहा, "मूर्ख तो संसार में केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?"

वह बेचारा भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका. चारों पानी पिए बगैर ही वहाँ से जाने लगे तो बहू बोली, "यहाँ से थोड़ी ही दूर पर मेरा घर है. आप लोग कृपया वहीं चलिए. मैं आप लोगों को पानी पिला दूंगी"

चारों राहगीर उसके घर की तरफ चल पड़े. बहू ने इसी बीच पानी का घड़ा उठाया और छोटे रास्ते से अपने घर पहुँच गई. उसने घड़ा रख दिया और अपने कपड़े ठीक तरह से पहन लिए.

इतने में वे चारों राहगीर उसके घर पहुँच गए. बहू ने उन सभी को गुड़ दिया और पानी पिलाया. पानी पीने के बाद वे राहगीर अपनी राह पर चल पड़े.

सेठ उस समय घर में एक तरफ बैठा यह सब देख रहा था. उसे बड़ा दुःख हुआ. वह सोचने लगा, इसका पति तो व्यापार करने के लिए परदेस गया है, और यह उसकी गैर हाजिरी में पराए मर्दों को घर बुलाती है. उनके साथ हँसती बोलती है. इसे तो मेरा भी लिहाज नहीं है. यह सब देख अगर मैं चुप रह गया तो आगे से इसकी हिम्मत और बढ़ जाएगी. मेरे सामने इसे किसी से बोलते बतियाते शर्म नहीं आती तो मेरे पीछे न जाने क्या-क्या करती होगी. फिर एक बात यह भी है कि बीमारी कोई अपने आप ठीक नहीं होती. उसके लिए वैद्य के पास जाना पड़ता है. क्यों न इसका फैसला राजा पर ही छोड़ दूं. यही सोचता वह सीधा राजा के पास जा पहुँचा और अपनी परेशानी बताई. सेठ की सारी बातें सुनकर राजा ने उसी वक्त बहू को बुलाने के लिए सिपाही बुलवा भेजे और उनसे कहा, "तुरंत सेठ की बहू को राज सभा में उपस्थित किया जाए."

राजा के सिपाहियों को अपने घर पर आया देख उस सेठ की पत्नी ने अपनी बहू से पूछा, "क्या बात है बहू रानी? क्या तुम्हारी किसी से कहा-सुनी हो गई थी जो उसकी शिकायत पर राजा ने तुम्हें बुलाने के लिए सिपाही भेज दिए?"

बहू ने सास की चिंता को दूर करते हुए कहा, "नहीं सासू मां, मेरी किसी से कोई कहा-सुनी नहीं हुई है. आप जरा भी फिक्र न करें."

सास को आश्वस्त कर वह सिपाहियों से बोली, "तुम पहले अपने राजा से यह पूछकर आओ कि उन्होंने मुझे किस रूप में बुलाया है. बहन, बेटी या फिर बहू के रुप में? किस रूप में में उनकी राजसभा में मैं आऊँ?"

बहू की बात सुन सिपाही वापस चले गए. उन्होंने राजा को सारी बातें बताई. राजा ने तुरंत आदेश दिया कि पालकी लेकर जाओ और कहना कि उसे बहू के रूप में बुलाया गया है.

सिपाहियों ने राजा की आज्ञा के अनुसार जाकर सेठ की बहू से कहा, "राजा ने आपको बहू के रूप में आने के ले पालकी भेजी है."

बहू उसी समय पालकी में बैठकर राज सभा में जा पहुँची.

राजा ने बहू से पूछा, "तुम दूसरे पुरूषों को घर क्यों बुला लाईं, जबकि तुम्हारा पति घर पर नहीं है?"

बहू बोली, "महाराज, मैंने तो केवल कर्तव्य का पालन किया. प्यासे पथिकों को पानी पिलाना कोई अपराध नहीं है. यह हर गृहिणी का कर्तव्य है. जब मैं कुएँ पर पानी भरने गई थी, तब तन पर मेरे कपड़े अजनबियों के सम्मुख उपस्थित होने के अनुरूप नहीं थे. इसी कारण उन राहगीरों को कुएँ पर पानी नहीं पिलाया. उन्हें बड़ी प्यास लगी थी और मैं उन्हें पानी पिलाना चाहती थी. इसीलिए उनसे मैंने मुश्किल प्रश्न पूछे और जब वे उनका उत्तर नहीं दे पाए तो उन्हें घर बुला लाई. घर पहुँचकर ही उन्हें पानी पिलाना उचित था."

राजा को बहू की बात ठीक लगी. राजा को उन प्रश्नों के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता हुई जो बहू ने चारों राहगीरों से पूछे थे.

राजा ने सेठ की बहू से कहा, "भला मैं भी तो सुनूं कि वे कौन से प्रश्न थे जिनका उत्तर वे लोग नहीं दे पाए?"

बहू ने तब वे सभी प्रश्न दुहरा दिए. बहू के प्रश्न सुन राजा और सभासद चकित रह गए. फिर राजा ने उससे कहा, "तुम खुद ही इन प्रश्नों के उत्तर दो. हम अब तुमसे यह जानना चाहते हैं."

बहू बोली, "महाराज, मेरी दृष्टि में पहले प्रश्न का उत्तर है कि संसार में सिर्फ दो ही यात्री हैं– सूर्य और चंद्रमा. मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि बहू और गाय इस पृथ्वी पर ऐसे दो प्राणी हैं जो गरीब हैं. अब मैं तीसरे प्रश्न का उत्तर सुनाती हूं. महाराज, हर इंसान के साथ हमेशा अनपढ़ गंवारों की तरह जो हमेशा चलते रहते हैं वे हैं– भोजन और पानी. चौथे आदमी ने कहा था कि वह मूर्ख है, और जब मैंने उससे पूछा कि मूर्ख तो दो ही होते हैं, तुम उनमें से कौन से मूर्ख हो तो वह उत्तर नहीं दे पाया." इतना कहकर वह चुप हो गई.

राजा ने बड़े आश्चर्य से पूछा, "क्या तुम्हारी नजर में इस संसार में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं?"

"हाँ, महाराज, इस घड़ी, इस समय मेरी नजर में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं."

राजा ने कहा, "तुरंत बतलाओ कि वे दो मूर्ख कौन हैं."

इस पर बहू बोली, "महाराज, मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं इसका उत्तर दूं."

राजा को बड़ी उत्सुकता थी यह जानने की कि वे दो मूर्ख कौन हैं. सो, उसने तुरंत बहू से कह दिया, "तुम निःसंकोच होकर कहो. हम वचन देते हैं तुम्हें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी."

बहू बोली, "महाराज, मेरे सामने इस वक्त बस दो ही मूर्ख हैं." फिर अपने ससुर की ओर हाथ जोड़कर कहने लगी, "पहले मूर्ख तो मेरे ससुर जी हैं जो पूरी बात जाने बिना ही अपनी बहू की शिकायत राजदरबार में की. अगर इन्हें शक हुआ ही था तो यह पहले मुझसे पूछ तो लेते, मैं खुद ही इन्हें सारी बातें बता देती. इस तरह घर-परिवार की बेइज्जती तो नहीं होती."

ससुर को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने बहू से माफ़ी मांगी. बहू चुप रही.

राजा ने तब पूछा, "और दूसरा मूर्ख कौन है?"

बहू ने कहा, "दूसरा मूर्ख खुद इस राज्य का राजा है जिसने अपनी बहू की मान-मर्यादा का जरा भी खयाल नहीं किया और सोचे-समझे बिना ही बहू को भरी राजसभा में बुलवा लिया."

बहू की बात सुनकर राजा पहले तो क्रोध से आग बबूला हो गया, परंतु तभी सारी बातें उसकी समझ में आ गईं. समझ में आने पर राजा ने बहू को उसकी समझदारी और चतुराई की सराहना करते हुए उसे ढेर सारे पुरस्कार देकर सम्मान सहित विदा किया.

👉 आज का सद्चिंतन 28 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Dec 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Dec 2018

◾ हमें सफलता के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए, पर असफलता के लिए जी में गुंजाइया रखनी चाहिए। प्रगति के पथ पर चलने वाले हर व्यक्ति को इस धूप-छाँव का सामना करना पड़ा है। हर कदम सफलता से ही भरा मिले ऐसी आशा केवल बाल बुद्धि वालों को शोभा देती है, विवेकशीलों को नहीं।  जीवन विद्या का एक महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि हम न छोटी-मोटी सफलताओं से हर्षोन्मत्त हों और न असफलताओं को देखकर हिम्मत हारें।

◾ हर आदमी की अपनी मनोभूमि, रुचि, भावना और परिस्थिति होती है। यह उसी आधार पर सोचता, चाहता और करता है। हमें इतनी उदारता रखनी ही चाहिए कि दूसरों की भावनाओं का आदर न कर सकें तो कम से कम उसे सहन कर ही लें। असहिष्णुता मनुष्य का एक नैतिक दुर्गुण है। जिसमें अहंकार की गंध आती है।  हर किसी को अपनी मर्जी का बनाना-चलाना चाहें तो यह एक मूर्खता भरी बात ही होगी।

◾ जैसे को तैसा-यह नीति अपना लेने पर तो बड़ा भी छोटा हो जाता है। गाली का जवाब गाली से और घूँसे का जवाब घूँसे से देने में कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो पशु भी आपस में लड़कर द्वंद्वयुद्ध कर लेते हैं। क्षमा और सहनशीलता हर किसी का काम नहीं है। उसे बड़े आदमियों में ही देखा जा सकता है। वे नेकी कर कुएँ में डाल की नीति अपनाते हैं।

◾ यह मान्यता है कि भाग्य की कर्म रेखाएँ मस्तक की खोपड़ी के भीतर लिखी होती हैं। जो कुछ उसमें लिखा हुआ है वही होकर रहता है-यह मान्यता इस अर्थ में तो सर्वथा सत्य मालूम पड़ती है कि खोपड़ी के भीतर रहने वाले मस्तिष्क में जिस तरह की भावना, विचारधारा, मान्यता तथा अभिरुचि जम गई होगी उसी दिशा में उसका जीवन मुड़ेगा और वैसी ही परिस्थितियाँ उसे उपलब्ध हो जायेंगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पिशाच प्रेमी या पागल (भाग 1)

देखते हैं कि आजकल गली कूचों में प्रेम की आँधी सी आई हुई है। मुहब्बत के तूफान उड़ रहे हैं। सिनेमाबाज, मनचले, शौकीन फिल्म अभिनेत्रियों से प्रेम करते हैं, उनकी तस्वीरों को आँखों में छिपाये फिरते हैं। सूरत मन में बसी हुई है, उनके हाव-भाव और भाव-भंगी का ऐसा स्मरण करते रहते हैं मानो ये ही इनकी उपास्य देवता हैं। “प्रेम का घर हो प्रेम की छत हो” के गीत उनकी जबान पर गुनगुनाते रहते हैं, उन्हीं की प्रतिध्वनि उनके कानों में गूँजती रहती है।

देखते हैं कि गलियों में कमर लचकाकर चलने वाले छैल चिकनियाँ पराई बहिन-बेटियों पर कुदृष्टि डालते हैं। उन्हें बहकाकर पाप पंक में घसीटने का प्रयत्न करते हैं, मौका लगे तो उनका धन, धर्म ले भागते हैं। कलेजा थामे फिरते हैं, कोई नयन बाण से बिधा हुआ बनता है, किसी को इश्क का ज्वर है, किसी को मुहब्बत मर्ज। बुलबुल के तराने, सैयाद कफस, शमा, परवाना, कातिल, शमशीर दिल, छुरी और न जाने क्या-क्या उन्हें याद आता है। वेश्याओं के उपासक, दुराचारिणी स्त्रियों के गुलाम, यह रंगीले मनचले इधर से उधर मटर-गश्ती करते हैं और अपने को प्रेमी बताते हैं।

देखते हैं कि घासलेटी कथाकार, आशिक माशूकी के अफसाने कहने वाले, लैला मजनू के नवीन संस्करण तैयार करते हैं। भोगेच्छा को अनियंत्रित रूप से भड़काने के लिए प्रेम को बन्धन रहित बताते हैं। “काबू में जिसका दिल न हो-वह गरीब क्या करे?” का नारा इसलिए लगाया जाता है कि इनकी शोहदाई को छूट मिल जाय, दुनिया इन्हें निर्दोष समझे। चार मनचले मिले कि गन्दी-गन्दी चर्चा चली, खूबसूरत औरतों की चर्चा, अपने कुकर्मों का बढ़ा-चढ़ा वर्णन, इन्द्रिय सुख की अनर्गल कल्पनाएं करने वाले अपने को प्रेमी मानते हैं।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1942 पृष्ठ 11
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/May.11

👉 Thirst for What?

Instead of giving content, the worldly desires – even if fulfilled, always lead to newer ones with greater thirst. It is said that a human life is just a sojourn in the endless journey of the individual self in its quest for completeness. However, if a human being gets rid of all cravings then he can attain absolute evolution in this life itself. Trisna (thirst for fulfillment of desires, ambitions) is the root cause of all thralldoms, which entraps the individual self in the cycle of life and death. How a person enslaved by cravings would ever be liberated? Salvation means freedom from all worldly desires and expectations. Those having quest for realization of absolute knowledge, truth should best begin with a vigilant watch on their own aspirations and control them prudently.

It is said that inner content is the biggest fulfillment. No amount of wealth could match it. One may be free and independent in worldly terms, but in reality, he, like most of us is the slave of his mind. The one whose mind is captured by trisna cannot be free for any moment. Even the most affluent man of the world is like a beggar because of his trisna: because he would always expect something from the world in terms of greater success, wealthier resources and what not.

So if you want to rise and make proper use of your life, you will have to restrain your desires, selfish ambitions. Don’t escape from your duties, you must be constructive and must transact your duties sincerely; only you leave out the expectations or attachments with the results. Every action has a corresponding reaction here. The Law of appropriate consequences of your karma is absolute. So don’t be desperate for any result, don’t think that the world or the circumstance would conform to your expectations. Renounce your trisna and be a free being…

Akhand Jyoti, Mar. 1942

👉 सत्यस्वरूप आत्मा

आत्मा के संबंध में वास्तविकता की जानकारी प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि उसके बिना जीवन-यात्रा का ठीक स्वरूप ही सामने नहीं आता, कोई उद्देश्य स्थिर नहीं होता और परिस्थितियों के प्रवाह में इधर-उधर उड़ते फिरते हैं।

यदि आप अपने को महान् बनाना चाहते हैं, तो अपनी आत्मा की महानता स्वीकार कीजिए। यदि संसार में सम्मानपूर्वक जीना चाहते हैं, तो आत्मा का सम्मान कीजिए। यदि परमात्मा के साथ आत्मा को जोड़ना चाहते हैं, तो अपने को इस रिश्तेदारी के योग्य बनाने का प्रयास कीजिए।

आप परमात्मा को तब तक नहीं प्राप्त कर सकते, जब तक कि अपनी आत्मा को उसी की बिरादरी का न बनाएँ। नीचता से उच्चता की ओर, तुच्छता से महानता की ओर बढ़ने का एकमात्र उपाय यह है कि आप अपनी आत्मा को ईश्वर का अंश समझते हुए पवित्र मानें और उसका पूरा-पूरा सम्मान करें। सम्मान का अर्थ घमंड करना, अहंकार से भर जाना, ऐंठे रहना, अकड़ कर चलना, उद्धत हो जाना या दूसरों को नीच समझना नहीं है वरन् यह है कि अपने अंदर ईश्वर का पवित्रतम अंश बैठा हुआ देख कर उसकी पूजा-अर्चना करें, उसके आदेशों को ध्यानपूर्वक सुनकर ऐसे श्रेष्ठ आचरण करें, जैसे कि परमात्मा के दरबार में जाकर करना उचित है।

अखण्ड ज्योति -जून 1942

👉 प्रेम ही सर्वोपरि है।

ईश्वरीय ज्ञान और निस्वार्थ प्रेम के अनुभव से प्रेम का भाव नष्ट हो जाता है, तमाम बुराइयां रफू चक्कर हो जाती हैं। और वह मनुष्य उस दिव्य आत्मा को प्राप्त कर लेता है जिसमें प्रेम, न्याय और अधिकार ही सर्वोपरि दिखलाई पड़ते है।

अपने मस्तिष्क को दृढ़ निष्पक्ष तथा उदार भावों की खान बनाइए, अपने हृदय में पवित्रता और उदारता की योग्यता लाइए, अपनी जबान को चुप रहने तथा सत्य और पवित्र भाषण के लिए तैयार कीजिए। पवित्रता और शक्ति प्राप्त करने का यही मार्ग है और अन्त में अनन्त प्रेम भी इसी तरह प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार जीवन बिताने से आप दूसरों पर विश्वास जमा सकेंगे, उनको अपने अनुकूल बनाने की कोशिश की दरकार न होगी। बिना विवाद के आप उनको सिखा सकेंगे, बिना अभिलाषा तथा चेष्टा के ही बुद्धिमान लोग आपके पास पहुँच जायेंगे, लोगों के हृदय को अनायास ही आप अपने वश में कर लेंगे क्योंकि प्रेम सर्वोपरि, सबल और विजयी होता है। प्रेम के विचार, कार्य और भाषण कभी व्यर्थ नहीं जाते।

इस बात को भली प्रकार जान लीजिए कि प्रेम विश्वव्यापी है, सर्व प्रधान है और हमारी हर एक जरूरत को पूरा करने की शक्ति रखता है। बुराइयों को छोड़ना अन्तःकरण की अशान्ति को दूर भगाता है। निस्वार्थ प्रेम में ही शान्ति है, प्रसन्नता है, अमरता है और पवित्रता है।

अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/October/v1.4

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

👉 कैसे मज़बूत बनें (अंतिम भाग)

9 बातों को दिल से न लगायें:

चार्ली चैपलिन को कॉमेडी के बारे बहुत कुछ पता था। उनका यह कथन मशहूर हैं- "नजदीक से देखने पर जिंदगी त्रासदी है, परंतु यदि इसको समझने की कोशिश करें तो यह कॉमेडी है।" अपनी छोटी-छोटी परेशानियों से बुरी तरह प्रभावित हो जाना आसान है। यह परिस्थिति हमारी हर क्रिया-प्रतिक्रिया को सूक्ष्म रूप से प्रभावित करती है। इसलिए जरा सोचिये और जीवन को थोड़ा शांतचित्त होकर, आनंदभाव और थोड़ा ज्यादा प्यार से देखिये। जीवन की अनूठी विविधताओं, अपार संभावनाओं, के साथ-साथ इसकी इसकी विसंगतियां भी आपके चेहरे पर मुस्कान बिखेरने के लिए और आपको यह अहसास कराने के लिए कि आप कितने भाग्यशाली हैं, काफी हैं।

इस बात को स्वीकार करें की जीवन को अगर जरूरत से ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाए तो इसमें आनंद ज्यादा है। हाँ, सिर्फ हँसते रहना और आनंद उठाते रहने का नाम जीवन नहीं है, पर जीवन में इनका स्थान निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।

10 हमेशा याद रखें-

कुछ भी स्थायी नहीं है: अगर आप किसी ऐसे संकट या दुख से घिरे है जिससे आप उबर नहीं पा रहे हैं, तो बस शांतचित्त हो जाइये और जो हो रहा है, उसको होने दीजिये। अगर आपकी तकलीफ कुछ ज्यादा ही लंबी खिच रही है, तभी भी याद रखिये जैसे सब कुछ गुजर जाता है, वैसे यह भी गुजर जायेगा।

.....समाप्त

👉 आज का सद्चिंतन 27 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Dec 2018

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

👉 परेशानियों का हल

एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है, उसे बहुत ज्यादा INCOME TAX देना पड़ता है आदि - आदि।

इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था।

एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी।

होमवर्क का टाइटल था ••• वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं। इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था

मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं। मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं।

मैं सुबह - सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ। मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं।

बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह last वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया।

मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है। मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं।

मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं। मैं बहुत ज्यादा INCOME TAX भरता हूँ, इसका मतलब है कि मेरे पास अच्छी नौकरी/व्यापार है और मैं उन लोगों से बेहतर हूँ जो बेरोजगार हैं या पैसों की वजह से बहुत सी चीजों और सुविधाओं से वंचित हैं।

हे! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया••• मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।

इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।

हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए - नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।

👉 कैसे मज़बूत बनें (भाग 5)

7 काम और मनोरंजन, आराम और काम में समन्वय बिठाएँ:

यह काम तो कर सकते हैं न आप? लोग इसकी ओर ध्यान नहीं देते क्योंकि उनको यह भ्रम रहता है कि यह बहुत मुश्किल काम है। या तो हम इतना काम करते हैं कि उसके बोझ तले ही दब जाते हैं, या फिर आराम से, हिप्पो के अंदाज में, बेकार बैठे रह कर अवसर का इंतजार करते रहते हैं। काम और मनोरंजन, आराम और काम में अच्छा समन्वय बैठाने से आपको इन सबका महत्त्व समझ में आएगा। आपको नदी के दूसरे तरफ की घास ज्यादा हरी है, ऐसा दिखना बंद हो जायेगा।

8 आपके पास जो है उसके लिए शुक्रगुजार बनें, कृतज्ञ रहें:


जिंदगी कठिन है, परंतु यदि आप जिंदगी को नजदीक से देखेंगे तो पाएंगे कि आपके पास ऐसी अनगिनत चीजें हैं जिनके लिए आपको शुक्रगुजार होना चाहिए। वह बातें जो बीते समय में आपको खुश रखती थीं, उनको याद करने से आपको वर्तमान समय में भी अच्छी अनुभूति होगी। अपने इर्द-गिर्द की दुनिया से आनंद आप प्राप्त करते हैं, वही आपको वो शक्ति प्रदान करती है जिससे कि मुश्किल हालातों का सामना कर लेते हैं। इसलिए, आपके पास जो है, उसपर ध्यान दीजिये और उसका भरपूर आनंद उठाईये। हो सकता है आपके पास आपकी पसंद का वह नया शर्ट नहीं हो, या ऐसा और भी कुछ हो सकता जिसकी आप इच्छा रखते हैं, परंतु वह आपके पास नहीं है, तो कम से कम यह कंप्यूटर तो है जो इंटरनेट से जुड़ा है और जिसका उपयोग करना आप जानते हैं। कुछ लोगों के पास घर नहीं, कंप्यूटर नहीं, शिक्षा-दीक्षा नहीं। उनके विषय में सोचिये।

.....क्रमशः जारी

👉 आज का सद्चिंतन 26 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Dec 2018

👉 In the Shrine of the Heart

Whenever you feel woeful, distressed or helpless in tragic circumstances or adversities around, whenever you feel demoralized by failures, whenever you see despair and darkness all around and are anxious about your future, whenever you are trapped in a dilemma and unable to think discreetly – don’t astray anymore in negativity. Remember, when a fox is surrounded by wild dogs and sees no rescue, it runs swiftly back in to its den and feels relaxed and safe.

You should also throw away all thoughts and worries of your mind instantly and take shelter in the depths of your heart (the inner core of emotions, the inner self). Take a deep breath and just forget about everything; think as though nothing, not even your existence is there. As you would leave out these things at its doorsteps and enter deeper into the ‘shrine’ or your heart, you would that all the burden, all the worries and sufferings that were troubling you have evaporated. You have become light and floating like a thin piece of cotton. The calmness of your heart will sooth you like a moonlight shadow or a snow chamber to someone dying of heat in the sun of summer.

The purity of inner self is an edifice of peace and spiritual light. It is the source of ultimate realization and is therefore likened with “Brahmloka”. God has graciously endowed us with this paradise to experience divine bliss. But we remain unaware of it and astray externally because of our ignorance.

📖 Akhand Jyoti, March 1941

👉 हृदय-मंदिर के अंदर संतोष

जब कभी किसी दु:खद घटना से तुम्हारा मन खिन्न हो रहा हो, निराशा के बादल चारों ओर से छाए हों, असफलता के कारण चित्त दु:खी बना हुआ हो, भविष्य की भयानक आशंका सामने खड़ी हुई हो, बुद्धि किंकर्त्तवयविमूढ़ हो रही हो, तो इधर-उधर मत भटको। उस लोमड़ी को देखो, जो शिकारी कुत्तों से घिरने पर भाग कर अपनी गुफा में घुस जाती है और वहाँ संतोष की साँस लेती है।

ऐसे विषय अवसरों पर सब ओर से अपने चित्त को हटा लो और अपने हृदय-मंदिर में चले आओ। बाहर की समस्त बातों को बिलकुल भूल जाओ। पाप-तापों को द्वार पर छोड़ कर जब भीतर जाने लगोगे तो मालूम पड़ेगा कि एक बड़ा भारी बोझ, जिसके भार से गरदन टूटी जा रही थी, उतर गया और तुम बहुत ही हलके, रुई के टुकड़े की तरह हलके हो गए हो। हृदय-मंदिर में इतनी शांति मिलेगी, जितनी ग्रीष्म से तपे हुए व्यक्ति को बर्फ से भर हुए कमरे में मिलती है। कुछ ही देर में आनंद की झपकियाँ लेने लगोगे।

हृदय के इस सात्विक स्थान को ब्रह्मलोक या गोलोक भी कहते हैं क्योंकि इसमें पवित्रता, प्रकाश और शांति का ही निवास है। परमात्मा ने हमें स्वर्ग-सोपान सुख प्राप्त करने के लिए दिया है, किंतु अज्ञानतावश मनुष्य उसे जान नहीं पाते।

📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1941

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 Dec 2018

◾ ईश्वर मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर क्षणों के रूप में देता है। एक नया क्षण देने के पूर्व वह पुराना क्षण वापस ले लेता है। अतएव मिले हुए प्रत्येक क्षण का ठीक-ठीक सदुपयोग करो, जिससे तुम्हें नित्य नये क्षण मिलते रहें।

◾ सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।

◾ जीवन के आधार स्तम्भ सद्गुण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को श्रेष्ठ बना लेना अपनी आदमों को श्रेष्ठ सज्जनों की तरह ढाल लेना वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है, जिसकी तुना किसी भी अन्य सांसारिक लाभ से नहीं की जा सकती। इसलिए सबसे अधिक ध्यान हमें इस बात पर देना चाहिए कि हम गुणहीन ही न बने रहें। सद्गुणों की शक्ति और विशेषताओं से अपने को सुसज्जित करने का प्रयत्न करें।

◾ अपव्ययी अपनी ही बुरी आदतों से अपनी संपत्ति गँवा बैठता है और फिर दर-दर का भिखारी बना ठोकरें खाता फिरता है। व्यसनी अपना सारा समय निरर्थक के शौक पूरे करने में बर्बाद करता रहता है। जिस बहुमूल्य समय में वह कुछ कहने लायक काम कर सकता था, वह तो व्यसन पूरे करने में ही चला जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (अन्तिम भाग)

सृष्टि के मुकुटमणि कहे जाने वाले मनुष्य का गौरव इसमें है कि उसकी चेतना व्यापक क्षेत्र में सुविस्तृत हो। शरीर और परिवार का उचित निर्वाह करते हुए भी श्रम, समय, चिन्तन और साधनों का इतना अंश बचा रहता है कि उससे परमार्थ प्रयोजनों की भूमिका निबाही जाती रह सके। आत्मीयता का विस्तार होने से शरीर और कुटुम्बियों की ही तरह सभी प्राणी अपनेपन की भावश्रद्धा में बँध जाते हैं और सबका दुःख अपना दुःख और सबका सुख अपना सुख बन जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की विश्व परिवार की आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावनाएँ बलवती होने पर मनुष्य का स्वार्थ-परमार्थ में परिणत हो जाता है।

जो अपने लिए चाहा जाता था वही सब को मिल सके ऐसी आकांक्षा जगती है। जो व्यवहार, सहयोग दूसरों से अपने लिए पाने का मन रहता है। उसी को स्वयं दूसरों के लिए देने की भावना उमड़ती रहती है। लोक-मंगल की- जन-कल्याण की- सेवा साधना की इच्छाएँ जगती हैं और योजनाएँ बनती है। ऐसी स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति ससीम न रह कर असीम बन जाता है और उसका कार्यक्षेत्र व्यापक परिधि में सत्प्रवृत्तियों को संवर्धन बन जाता है।  ऐसे व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं को पैरों तले कुचल कर फेंक देते हैं। अपनी आवश्यकताओं को घटाते हैं ओर निर्वाह को न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी करने के उपरान्त अपनी सत्प्रयोजनों में लगाये रहते हैं। देश, धर्म, समाज, संस्कृति के उत्कर्ष के लिए किये गये प्रयत्नों में उन्हें इतना आनन्द आता है जितना स्वार्थ परायण व्यक्तियों को विपुल धन प्राप्त करने पर भी नहीं मिल सकता।

संसार के इतिहास में- आकाश में महामानवों के जो उज्ज्वल चरित्र झिलमिला रहें हैं वे सभी इसी आत्म-विकास के मार्ग का अवलम्बन करते हुए महानता के उच्च शिखर पर पहुँचे थे। सन्त सुधारक, शहीद यह तीन सामाजिक जीवन के सर्वोच्च सम्मान है। महात्मा, देवात्मा और परमात्मा यह तीन अध्यात्म जीवन की समग्र प्रगति के परिचायक स्तर हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए आत्मविकास के सिवाय और कोई मार्ग नहीं। व्यक्तिवाद को समूहवाद में विकसित कर लेना विश्वशान्ति को आधार माना गया है। अपनेपन को हम जितने व्यापक क्षेत्र में विस्तृत कर लेते हैं उतने ही विश्वास पूर्वक यह कह सकते हैं कि मनुष्य जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का सुनिश्चित मार्ग मिल गया।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/January/v1.12

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

👉 परमात्मा के साथ

एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर परमात्मा से मिलने की जिद किया करता था। उसे परमात्मा के बारे में कुछ भी पता नही था पर मिलने की तमन्ना, भरपूर थी। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो परमात्मा के सांथ खाये।

एक दिन उसने 1 थैले में 5,6 रोटियां रखीं और परमात्मा को को ढूंढने निकल पड़ा। चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया। उसने देखा नदी के तट पर एक बुजुर्ग बूढ़ा बैठा हैं,जिनकी आँखों में बहुत गजब की चमक थी, प्यार था,और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठा उसका रास्ता देख रहा हों।

वो 6 साल का मासूम बालक बुजुर्ग बूढ़े के पास जा कर बैठ गया, अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।और उसने अपना रोटी वाला हाँथ बूढे की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा, बूढे ने रोटी ले ली, बूढ़े के झुर्रियों वाले चेहरे पे अजीब सी ख़ुशी आ गई आँखों में ख़ुशी के आंसू भी थे,,

बच्चा बुढ़े को देखे जा रहा था , जब बुढ़े ने रोटी खा ली बच्चे ने 1 और रोटी बूढ़े  को दी। बूढ़ा अब बहुत खुश था। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।,,,,

जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाजत ले घर की ओर चलने लगा वो बार बार पीछे मुड  कर देखता ! तो पाता बुजुर्ग बूढ़ा उसी की ओर देख रहा था। बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देख जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी, बच्चा बहूत खुश था। माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो ख़ुशी का कारण पूछा, तो बच्चे ने बताया!

माँ,....आज मैंने परमात्मा के साथ बैठ क्ऱ रोटी खाई, आपको पता है उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,, माँ परमात्मा् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,, मैं आज बहुत खुश हूँ माँ उस तरफ बुजुर्ग बूढ़ा भी जब अपने गाँव पहूँचा तो गाव वालों ने देखा बूढ़ा बहुत खुश हैं,तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा??

बूढ़ा बोलां,,,, मैं 2 दिन से नदी के तट पर अकेला भूखा बैठा था,, मुझे पता था परमात्मा आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे। आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे सांथ बैठ के रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई, बहुत प्यार से मेरी और देखते थे, जाते समय मुझे गले भी लगाया, परमात्मा बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।

👉 कैसे मज़बूत बनें (भाग 4)

5  परेशानियों को पहचानें:

यह समझने की कोशिश करें कि जो बात आपको परेशान कर रही है, क्या वह सचमुच परेशान होने वाली बात है? किसी साथी ने कोई सवाल किया, या सड़क पर किसी ड्राईवर ने अपनी गाड़ी को गलत तरीके से चला कर आपको परेशानी दी, तो देखें कि क्या यह सचमुच इतना परेशान होने की बात है? यह देखें कि ऐसी बातें आपके लिए क्या मायने रखती हैं। अपना ध्यान सिर्फ उन बातों पर केंद्रित रखें जो आपके जीवन के लिए सही मायने में महत्वपूर्ण हैं और इसके अलावा किसी और बात की व्यर्थ चिंता न करें। जैसा कि सिल्विया रॉबिंसन ने कहा है- "कुछ लोग सोचते हैं कि बात को दिल में बिठाए रखने से इंसान मजबूत बनता है, पर इसके उलट बहुत बार ऐसा, बातों को भुला देने से होता है।"

6  जो लोग आपके जीवन में अहम् हैं, उनसे संपर्क बनायें:

परिवार और दोस्तों के साथ-साथ, उन लोगों के साथ भी समय व्यतीत करें जो सकारात्मक और सहयोगी स्वभाव के हैं। अगर इस तरह के लोग आपके इर्द-गिर्द न हों, तो नए दोस्त बनाएं। अगर इस तरह के दोस्त न मिलें, तो उनको मदद करिये जिनको आपसे ज्यादा मदद की जरूरत हो। कभी-कभी, जब हम अपनी स्थिति को सुधार पाने की स्थिति में नहीं होते, तो ऐसे में बहुत बार दूसरों के लिए कुछ करने से इंसान न सिर्फ अच्छा महसूस करता है, बल्कि इससे उसको अपने अंदर की ताकत का भी अहसास होता है। ऐसा करने से इंसान को अपने आप को, अपनी ताकतों को पहचानने में मदद मिलती है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है- इसमें शक की गुंजाईश नहीं। विभिन्न अध्यन और विज्ञानं, सभी बताते हैं कि इंसान का सामाजिक स्वास्थ्य उसके भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर आपको समाज के साथ घुल-मिल कर रहने में दिक्कत होती है, तो यह एक समस्या है। आपको इसका इलाज ढूंढना चाहिए। कैसे, यह हम आपको नीचे बताते हैं:

◾ किसी के साथ बहुत ही अच्छी, सकारात्मक और विचारोत्तेजक बातचीत करें।
◾ आपसे जो गलतियां हुईं, उनको भूलिए- उनको दिलो-दिमाग में घर मत बनाने दीजिये।
◾ जब कोई रिश्ता टूटे, तो अपने आप को संभालिये और इस ग़म से बाहर आएं।
◾ शर्मीलापन, हिचक, झिझक से पीछा छुड़ाईए।
◾ बहिर्मुखी व्यक्ति बनिए।

.... क्रमशः जारी

👉 आज का सद्चिंतन 25 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Dec 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Dec 2018

◾ भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों ही विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाय अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है, तो इसमें किसी और का दोष नहीं है। दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिंतन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिंतन को ही अपनाया।

◾ निर्बलता कोई स्थिति नहीं है, बल्कि वह आलस्य और अकर्मण्यता की ही परिणति है। यही कारण है कि निर्बलता चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक मनुष्य किसी भी दृष्टि से निर्बल हो तो उसे संबंधित क्षेत्र में प्रत्येक प्रयत्न का विपरीत परिणाम भुगतना पड़ता है।

◾ बेईमानी और चालाकी से अर्जित किये गये वैभव का रौब और दबदबा बालू की दीवार ही होता है। जो थोड़ी सी हवा बहने पर ढह जाता है तथा यह भी कि वह प्रतिष्ठा, दिखावा, छलावा मात्र होती है, क्योंकि स्वार्थ सिद्ध करने के उद्देश्य से कतिपय लोग उनके मुँह पर उनकी प्रशंसा अवश्य कर देते हैं, परन्तु हृदय में उनके भी आदर भाव नहीं होता।

◾ किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते हैं और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते हैं, तो एक ओर का पुण्य दूसरे ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही यह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Awakening the Inner Strength

Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his inner self, knowing his soul, is the biggest loser. He cannot attain peace – neither in this life, nor in the life beyond. Thus, if we are truly desirous of ascent, beatifying bliss and peace, we must begin to look inwards. Joy is not there in the outer world, not in any achievement or possession of power and enormous resources. It is the soul, which is the origin and ultimate goal of this intrinsic quest.

Just think! Happiness is a virtue of consciousness, how could then the inanimate things of this world give us joy? It is after all the “individual self”, which aspires for unalloyed joy and enjoys it. Then how could it be so dependent upon others for this natural spirit of the Consciousness Force? How could the world, which is ever changing and perishable, be the source of fulfilling our eternal quest? On the contrary, the sensual pleasures, the worldly joys, which delude us all the time, mostly consume our strength and weaken the life force of our sense organs and our mind.

This fact should be remembered again and again that the quest, the feeling of blissfulness are there because of the soul and it is only the awakened force of the soul, the inner strength that can lead the evolution of the individual self to the highest realms of eternal beatitudeous bliss.

📖 Akhand Jyoti, Oct. 1940

👉 आत्मशक्ति का विकास

मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना है। जो प्राणी इस मनुष्य देह को धारण करके भी अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास नहीं करता, अपनी आत्मा के समीप नहीं पहुँचता, वह न इस संसार में शांति प्राप्त कर सकता है और न परलोक को ही सुखमय बना सकता है। इसलिए यदि मनुष्य चाहता है कि उसे सच्ची शांति प्राप्त हो, उसका जीवन सुखमय बने, तो उसे अवश्य अपनी आत्मिक शक्तियों का विकास करना चाहिए, क्योंकि आत्मा ही पूर्ण शांति और सुख का भंडार है।

हम भूल करके संसार के विषयों में सुख का अन्वेषण करते हैं, किन्तु संसार के विषयों में सुख कहाँ? वे तो जड़ हैं। भला जड़ पदार्थों में सुख कहाँ? जबकि `सुख’ गुण की चेतन पदार्थ का है, जड़ का नहीं, तो वह बेचारा जड़ पदार्थ हमें कैसे दुख देगा? जो वस्तु स्वयं ही क्षणभंगुर है, वह हमें शाश्वत शांति कैसे देगी?

संसार के विषय-भोग तो बालक नचिकेता के कथनानुसार, ``कल तक रहने वाले हैं।’’ उनसे सुख मिलना तो दूर, वे तो हमारी इंद्रियों के तेज और सामर्थ्य को भी नष्ट करने वाले हैं। सांसारिक विषयों में जो कुछ थोड़ा सुख का भाव भी होता है, वह भी हमारी आत्मा का ही सुख है, उन जड़ पदार्थों का नहीं। हम अपनी आत्मा के ही सुख को संसार का सुख समझकर उनमें भटकते फिरते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति-अक्टूबर 1940

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 8)

धन उपार्जन में जितनी तत्परता बरतनी पड़ती है उससे कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही तत्परता सद्गुणों का, स्वभाव का अंग बनाने में बरतनी पड़ती है। धन तो उत्तराधिकार में- स्वरूप श्रम से- संयोगवश अथवा ऋण अनुदान से भी मिल सकता है, पर सद्गुणों की सम्पदा एकत्रित करने में तो तिल-तिल करके अपने ही प्रयत्न जुटाने पड़ते हैं। यह पूर्णतया अपने ही अध्यवसाय का प्रतिफल है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाये रहने पर यह सम्पदा क्रमिक गति से संचित होती है। चंचल बुद्धि वाले नहीं संकल्प-निष्ठ सतत् प्रयत्नशील और धैर्यवान् व्यक्ति ही इस वैभव का उपार्जन कर सकने में समर्थ होते हैं। चक्की के दोनों पाटों के बीच में गुजरने वाला अन्न ही आटा बनता है। सद्विचार और सत्कर्म के दबाव से व्यक्तित्व का सुसंस्कृत बन सकना सम्भव होता है। अपना लक्ष्य यदि आदर्श मनुष्य बनना हो तो इसके लिए आवश्यक उपकरण अलंकार जुटाये जाते रहेंगे इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम समयानुसार आत्म-निर्माण के रूप में परिलक्षित होता दिखाई देगा।

आत्मोत्कर्ष की अन्तिम सीढ़ी आत्म-विकास है। इसका अर्थ होता है आत्मभाव की परिधि का अधिकाधिक विस्तृत क्षेत्र में विकसित होना। जिनका स्वार्थ अपने शरीर और मन की सुविधा तक सीमित है उन्हें नर-कीटक कहा जाता है। जो इससे कुछ आगे बढ़ कर ममता को परिवार के लोगों तक सीमाबद्ध किये हुए हैं, वे नर-पशु की श्रेणी में आते हैं। आमतौर से सामान्य मनुष्य इन्हीं वर्गों में गिने जाने योग्य चिन्तन एवं क्रिया-कलाप अपनाये रहते हैं। उनका स्वार्थ इस परिधि से आगे नहीं बढ़ता। जीवन सम्पदा का इसी कुचक्र में भ्रमण करते हुए कोल्हू के बैल जैसी जिन्दगी पूरी कर लेते हैं। मनुष्य का पद बड़ा है।

अन्य प्राणियों की तुलना में ईश्वर ने उसे अनेकों असाधारण क्षमता दिव्य धरोहर की तरह दी है और अपेक्षा की है कि उन्हें इस संसार को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रयुक्त किया जाय। मानवी कलेवर ईश्वर की इस संसार की सबसे श्रेष्ठ कलाकृति है। इसका सृजन उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुआ है। इस निर्माण के पीछे जो श्रम लगा है उसमें सृष्टा का यह उद्देश्य है कि मनुष्य उसके सहयोगी की तरह सृष्टि की सुव्यवस्था में संलग्न रह कर उसका हाथ बटाये। यदि इस जीवन रहस्य को भुला दिया जाय और पेट प्रजनन के लिए-लोभ-मोह के लिए-वासना-तृष्णा के लिए ही इस दिव्य अनुदान को समाप्त कर दिया जाय तो समझना चाहिए पिछड़ी योनियों के तुल्य ही बने रहा गया और जीवन का उद्देश्य नष्ट हो गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 11
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/January/v1.11

रविवार, 23 दिसंबर 2018

👉 प्रतिस्पर्धा :-

राजा ने मंत्री से कहा- मेरा मन प्रजाजनों में से जो वरिष्ठ हैं उन्हें कुछ बड़ा उपहार देने का हैं। बताओ ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहाँ से और किस प्रकार ढूंढ़ें जाय?

मंत्री ने कहा - सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं, पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टाँग पकड़कर खींचते हैं। न खुद कुछ पाते हैं और न दूसरों को कुछ हाथ लगने देते हैं। ऐसी दशा में आपकी उदारता को फलित होने का अवसर ही न मिलेगा।

राजा के गले वह उत्तर उतरा नहीं। बोले! तुम्हारी मान्यता सच है यह कैसे माना जाय? यदि कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हो तो करो।

मंत्री ने बात स्वीकार करली और प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बना ली। उसे कार्यान्वित करने की स्वीकृति भी मिल गई।

एक छः फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खड़े होने की जगह थी। घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आवेगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा।

बीसों प्रथम चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दीखता उसकी टाँगें पकड़कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुँह गिर पड़ता। इसी प्रकार सबेरे आरम्भ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गयी। बीसों को असफल ही किया गया और रात्रि होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।

मंत्री ने अपने मत को प्रकट करते हुए कहा - यदि यह एकता कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सकें। एक दूसरे की टाँग खींचते रहे और सभी खाली हाथ रहे।

संसार में प्रतिभावानों के बीच भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती हैं और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गँवा देते है। अस्तु उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।

👉 आज का सद्चिंतन 24 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Dec 2018


👉 कैसे मज़बूत बनें (भाग 3)

3 जीवन के प्रति अपने उत्साह को पुनर्जीवित करें:

भावनात्मक रूप से मजबूत व्यक्ति हर और हरेक दिन को एक तोहफा, एक सौगात समझते हैं। वो अपने समय का उपयोग इतने सकारात्मक ढ़ंग से करते हैं कि उनके इस तोहफे का समुचित और भरपूर उपयोग होता है। याद करें की बचपन में आप कितनी छोटी-छोटी बातों से रोमांचित हो जाते थे- पतझड़ के मौसम में पत्तों से खेलना, किसी जानवर की काल्पनिक तस्वीर बनाना, किसी चीज को ज्यादा खा लेना- इन छोटी-छोटी बातों में कितना आनंद आता था! अपने अंदर के उस बच्चे को ढूँढिये। अपने अंदर के उस बच्चे को जीवित रखिये। आपकी मानसिक और भावनात्मक मजबूती इस पर निर्भर करती है।

4 अपने ऊपर भरोसा रखिये:

आपने इतना कुछ किया है जीवन में: आप एक बार फिर ऐसा कर सकते हैं। आज की आज सोचेंगे, कल की कल- इस सोच के साथ आप मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति से पार पा सकते हैं। ऐसी सोच को विकसित करना आसान काम नहीं है; ऐसा कहना बहुत आसान है, करना उतना ही मुश्किल। मगर, जब आप अभ्यास करेंगे तो यह संभव हो जायेगा। जब कभी आपको ऐसा लगे कि बस अब सब कुछ खत्म होने वाला है, तो आँखें बंद करिये और एक गहरी सांस लीजिये। आप अपने प्रयास में अवश्य ही सफल होंगे, बस नीचे लिखी इन बातों का ध्यान रखिये:

नकारात्मक सोच वालों की बातों को अनसुनी करिये। कुछ लोग आदतन आप पर, आपकी क्षमताओं पर संदेह करते रहेंगे। आपको बस उनकी अनदेखी करनी है, उनको अनसुना करना है और उनको गलत सिद्ध करना है। नाउम्मीद लोग आपको भी नाउम्मीद और निराश न बना दें- इसका ख्याल रखना है। वास्तविकता तो यह है कि दुनिया आपसे कह रही है कि आओ, मुझे बदलो! फिर किस बात का इंतजार कर रहे हैं आप?

अपनी सफलताओं को याद करिये। यह आपके आत्मविश्वास को जगायेगा, आपके सफ़र में उत्साह लाएगा। चाहे वह आपके पढाई-लिखाई की सफलता हो, चाहे किसी मशहूर व्यक्ति से की गयी आपकी बातचीत या फिर आपके बच्चे के जन्म लेने की खुशी- इन सभी अच्छे पलों को अपने आप को मजबूत बनाने के अपने प्रयासों में मददगार बनाइये। सफल होने के लिए सकारात्मक होना जरूरी है और जैसी हमारी सोच होती है, दरअसल, हमारी जिंदगी वैसी ही होती है।

किसी भी हाल में प्रयास करना न छोड़ें। ऐसा कई बार होगा कि आपको अपने क्षमताओं पर संदेह होगा, क्योंकि कई बार ऐसा होगा कि आप प्रयास करेंगे परंतु आपको सफलता नहीं मिलेगी। इस बात का ध्यान रखिये की यह इस प्रक्रिया में होने वाली सामान्य सी बात है। सिर्फ इस वजह से कि आपको अपने प्रयासों में एकाध बार असफलता मिली, निराश मत होइए और प्रयास करना मत छोड़िये। दीर्घकालिक नजरिया रखिये और सोच को विशाल बनाये रखिये। फिर से प्रयास करिये। याद रखें, असफलता की सीढियाँ ही इंसान को सफलता के शिखर पर ले जाती हैं।

.... क्रमशः जारी

👉 "Honesty in Thoughts and Transactions

Innocent nature is essential for development of mental power. One well-known English proverb describes stupidity of clever people, reflecting two contradictory forms of a personality. Only he can understand his true self, who has uniformity and harmony in thoughts and actions. Truthfulness in these two aspects only can lead him to the highest standard of behavior.

A person, who never tries to hide his own faults, naturally clears away all flaws of his character. Results of old mistakes and sins also vanish once truth prevails in our attitude and mentality. Concealed sin corrupts our mind, but once disclosed and confessed, the sin can do no harm. Deliberating over one’s own behavior again and again refines the nature making one more generous and kind. Only such a person can acquire higher spiritual powers.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Atmagyaan aur Atmakalyaan (Self-realization and Self-benefit), Page 22

👉 विचार और व्यवहार में सत्यता

मानसिक शक्तियों के विकास के लिए भोले स्वभाव का होना ही श्रेयकर है। अंग्रेजी में कहावत है कि शैतान गधा होता है। यह कहावत चतुर लोगों की मूर्खता को प्रदर्शित करती है। जो मनुष्य बाहर भीतर एक रूप रहता है, वास्तव में वही अपने स्वरूप को पहिचानता है। यदि मनुष्य अपने विचारों और व्यवहार में सत्यता ले आवे तो उसका आचार अपने आप ही उच्चकोटि का हो जावे।

जो व्यक्ति अपने किसी प्रकार के दोष को छिपाने की चेष्टा नहीं करता, उसके चरित्र में कोई दोष भी नहीं रहता। पुराने पापों के परिणाम भी सचाई की मनोवृत्ति के उदय होने पर नष्ट हो जाते हैं। ढका हुआ पाप लगता है, खुला पाप मनुष्य को नहीं लगता। जो स्वयं के प्रति जितना अधिक सोचता है, वह उतना ही अधिक अपने आप को पुण्यात्मा बनाता है। ऐसा ही व्यक्ति दूसरी आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
📖 आत्मज्ञान और आत्मकल्याण, पृष्ठ 22

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Dec 2018

◾ दोष दिखाने वाले को अपना शुभ चिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर कु्रद्ध होता है, शत्रुता मानता और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।

◾ ऐसे विश्वास और सिद्धान्तों को अपनाइये जिनसे लोक कल्याण की दशा में प्रगति होती हो। उन विश्वासों और सिद्धान्तों सको हृदय के भीतरी कोने में गहराई तक उतार लीजिए। इतनी दृढ़ता जमा लीजिए कि भ्रष्टाचार और प्रलोभन सामने उपस्थित होने पर भी आप उन पर दृढ़ रहें, परीक्षा देने एवं त्याग करने का अवसर आवे तब भी विचलित न हों। वे विश्वास श्रद्धास्प्द होने चाहिए, प्राणों से अधिक प्यारे होने चाहिए।

◾ अपने को असमर्थ, अशक्त एवं असहाय मत समझिये। ऐसे विचारों का परित्याग कर दीजिए कि साधनों के अभाव में हम किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे। स्मरण रखिए, शक्ति का स्रोत साधन में नहीं, भावना में है। यदि आपकी आकाँक्षाएँ आगे बढ़ने के लिए व्यग्र हो रही हैं, उन्नति करने की तीव्र इच्छाएँ बलवती हो रही हैं, तो विश्वास रखिये साधन आपको प्राप्त होकर रहेंगे।

◾ ईश्वर को इस बात की इच्छा नहीं कि आप तिलक लगाते हैं या नहीं, पूजा-पत्री करते हैं या नहीं, भोग-आरती करते हैं या नहीं, क्योंकि उस सर्वशक्तिमान प्रभु का कुछ भी काम इन सबके बिना रुका हुआ नहीं है। वह इन बातों से प्रसन्न नहीं होता, उसकी प्रसन्नता तब प्रस्फुटित होती है जब अपने पुत्रों को पराक्रमी, पुरुषार्थी, उन्नतिशील, विजयी, महान् वैभव युक्त, विद्वान, गुणवान्, देखता है और अपनी रचना की सार्थकता अनुभव करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 7)


छोटी बुरी आदतों से लड़ाई आरम्भ करनी चाहिए और उनसे सरलतापूर्वक सफलता प्राप्त करते हुए क्रमशः अधिक कड़ी- अधिक पुरानी और अधिक प्रिय बुरी आदतों से लड़ाई आरम्भ करनी चाहिए। छोटी सफलताएँ प्राप्त करते चलने से साहस एवं आत्म-विश्वास बढ़ता है और इस आधार पर अवांछनीयताओं के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संस्थापन में सफलता मिलती चली जाती है। यह प्रयास देर तक जारी रहना चाहिए। थोड़ी-सी सफलता से निरास नहीं हो जाना चाहिए। लाखों योनियों के कुसंस्कार विचार मात्र से समाप्त नहीं हो जाते। वे मार खाकर अन्तःकरण के किसी कोने में जा छिपते हैं और अवसर पाते ही छापामारों की तरह घातक आक्रमण करते हैं। इनसे सतत् सजग रहने की आवश्यकता है। आजन्म यह सतर्कता अनवरत रूप से बरती जानी चाहिए कि कहीं बेखबर पाकर दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति की घातें फिर न पनपने लगें।

आत्म-निर्माण का तीसरा चरण इस प्रयोजन के लिए है कि श्रेष्ठ सज्जनों में गुण, कर्म, स्वभाव की जो विशेषताएँ होनी चाहिए उनकी पूर्ति के लिए योजनाबद्ध प्रयत्न किया जाय। दुर्गुणों की प्रतिष्ठापना भी तो होनी चाहिए। कटीली झाड़ियाँ उखाड़ कर साफ कर दी गई यह तो आधा ही प्रयोग पूरा हुआ। आधी बात तब बनेगी जब उस भूमि पर सुरम्य उद्यान लगाया जाय और उसे पाल-पोस कर बड़ा किया जाय। बीमारी दूर हो गई यह आधा काम है। दुर्बल स्वास्थ्य को बलिष्ठता की स्थिति तक ले जाने के लिए जिस परिष्कृत आहार-बिहार को जुटाया जाना आवश्यक है। उसकी ओर भी तो ध्यान देने और प्रयत्न करने में लगना चाहिए।

आलस्य दूर करने की प्रतिक्रिया श्रम-शीलता में समुचित रुचि एवं तत्परता के रूप में दृष्टिगोचर होना चाहिए। प्रमाद से पिण्ड छूटा हो- लापरवाही और गैर जिम्मेदारी हटा दी तो उसके स्थान पर जागरूकता, तन्मयता, नियमितता, व्यवस्था जैसे मनोयोग का परिचय मिलना चाहिए। मधुरता शिष्टता, सज्जनता, दूरदर्शिता, विवेकशीलता, ईमानदारी संयमशीलता, मितव्ययिता, सादगी, सहृदयता, सेवा भावना जैसी सत्प्रवृत्तियों में ही मानवी गरिमा परिलक्षित होती है। उन्हें अपनाने स्वभाव का अंग बनाने के लिये सतत् प्रयत्नशील रहा जाना चाहिये। आमतौर से लोग धन उपार्जन को प्रमुखता देते हैं और उसी के लिये अपना श्रम, संयम, मनोयोग लगाये रहते हैं। उत्कर्ष के इच्छुकों को सम्मति से भी अधिक महत्त्व सद्गुणों की विभूतियों को देना चाहिए परिष्कृत व्यक्तित्व ही वह कल्प वृक्ष है जिस तक जा पहुँचने वाला भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों की सफलता प्राप्त करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 11

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/January/v1.11

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

👉 हमारी सोच :-

बहुत समय पहले की बात है, किसी गाँव में एक किसान रहता था। उस किसान की एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी। दुर्भाग्यवश, गाँव के जमींदार से उसने बहुत सारा धन उधार लिया हुआ था। जमीनदार बूढा और कुरूप था।

किसान की सुंदर बेटी को देखकर उसने सोचा क्यूँ न कर्जे के बदले किसान के सामने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा जाये। जमींदार किसान के पास गया और उसने कहा – तुम अपनी बेटी का विवाह मेरे साथ कर दो, बदले में मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा।

जमींदार की बात सुन कर किसान और किसान की बेटी के होश उड़ गए। वो कुछ उत्तर न दे पाये। तब जमींदार ने कहा – चलो गाँव की पंचायत के पास चलते हैं और जो निर्णय वे लेंगे उसे हम दोनों को ही मानना होगा।

वो सब मिल कर पंचायत के पास गए और उन्हें सब कह सुनाया। उनकी बात सुन कर पंचायत ने थोडा सोच विचार किया और कहा- ये मामला बड़ा उलझा हुआ है अतः हम इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं।

जमींदार सामने पड़े सफ़ेद और काले रोड़ों के ढेर से एक काला और एक सफ़ेद रोड़ा उठाकर एक थैले में रख देगा।  फिर लड़की बिना देखे उस थैले से एक रोड़ा उठाएगी, और उस आधार पर उसके पास तीन विकल्प होंगे:

1. अगर वो काला रोड़ा उठाती है तो उसे जमींदार से शादी करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा।

2. अगर वो सफ़ेद पत्थर उठती है तो उसे जमींदार से शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्फ़ भी माफ़ कर दिया जायेगा।

3. अगर लड़की पत्थर उठाने से मना करती है तो उसके पिता को जेल भेज दिया जायेगा। पंचायत के आदेशानुसार जमींदार झुका और उसने दो रोड़े उठा लिए। जब वो रोड़ा उठा रहा था तो तब किसान की बेटी ने देखा कि उस जमींदार ने दोनों काले रोड़े ही उठाये हैं और उन्हें थैले में डाल दिया है।

लड़की इस स्थिति से घबराये बिना सोचने लगी कि वो क्या कर सकती है, उसे तीन रास्ते नज़र आये:-

1. वह रोड़ा उठाने से मना कर दे और अपने पिता को जेल जाने दे।

2. सबको बता दे कि जमींदार दोनों काले पत्थर उठा कर सबको धोखा दे रहा हैं।

3. वह चुप रह कर काला पत्थर उठा ले और अपने पिता को कर्ज से बचाने के लिए जमींदार से शादी करके अपना जीवन बलिदान कर दे।

उसे लगा कि दूसरा तरीका सही है, पर तभी उसे एक और भी अच्छा उपाय सूझा।

उसने थैले में अपना हाथ डाला और एक रोड़ा अपने हाथ में ले लिया और बिना रोड़े की तरफ देखे उसके हाथ से फिसलने का नाटक किया, उसका रोड़ा अब हज़ारों रोड़ों के ढेर में गिर चुका था और उनमे ही कहीं खो चुका था।

लड़की ने कहा – हे भगवान! मैं कितनी बेवकूफ हूँ। लेकिन कोई बात नहीं आप लोग थैले के अन्दर देख लीजिये कि कौन से रंग का रोड़ा बचा है, तब आपको पता चल जायेगा कि मैंने कौन सा उठाया था जो मेरे हाथ से गिर गया।

थैले में बचा हुआ रोड़ा काला था, सब लोगों ने मान लिया कि लड़की ने सफ़ेद पत्थर ही उठाया था। जमींदार के अन्दर इतना साहस नहीं था कि वो अपनी चोरी मान ले।

लड़की ने अपनी सोच से असम्भव को संभव कर दिया ।

मित्रों, हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जहाँ सब कुछ धुंधला दीखता है, हर रास्ता नाकामयाबी की ओर जाता महसूस होता है पर ऐसे समय में यदि हम सोचने का प्रयास करें तो उस लड़की की तरह अपनी मुशिकलें दूर कर सकते हैं।

👉 कैसे मज़बूत बनें भाग 2

2 अपने रवैये पर गौर करें:

कभी कभी हम ऐसी परिस्थितियों में होते हैं, जिनको हम बदल नहीं सकते। हालाँकि ऐसी स्थितियां बहुत कष्टप्रद होती हैं, परंतु फिर भी जिंदगी के प्रति सकारात्मक रवैया रख कर आप इस स्थिति में भी अपने आप को संभाल सकते हैं। जैसा कि विक्टर फ्रैंक ने कहा है- "हम सब, जो बंदी शिविरों में रहे हैं, हमारी झोपड़ियों के बीच घूम-घूमकर सभी को सांत्वना और अपनी रोटी के आखिरी टुकड़े को दे देने वाले उन इंसानों को भूल नहीं सकते। भले ही वो संख्या में कम रहे हों, पर वो इस सच्चाई का पर्याप्त प्रमाण देते थे कि इंसान से उसका सब कुछ छीना जा सकता है, परंतु इंसान से उसके किसी भी परिस्थिति में अपने नियत को अपने तरह से निर्धारित करने की स्वतंत्रता कोई नहीं छीन सकता। ऐसा करने से उसको कोई नहीं रोक सकता।" आपके साथ चाहे जो कुछ भी हो रहा हो, सकारात्मक बने रहने में ही बुद्धिमानी है।

जो इंसान आपकी जिंदगी को दुखी बना रहा है, उसे भी आप अपने उत्साह को तोड़ने की इजाजत मत दीजिये। आश्वस्त रहिये, आशावान रहिये और हमेशा इस बात को याद रखिये कि कोई भी आपकी नियत और सोच को आपसे नहीं छीन सकता है। एलिनोर रूज़वेल्ट ने कहा है- "आप दोयम दर्जे के हैं, ऐसा आपके इजाजत के बगैर आपको कोई महसूस नहीं करा सकता।"

जीवन में चल रहे किसी एक कष्ट या परेशानी का असर अपने जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर मत पड़ने दीजिये। उदाहरण के लिए, यदि आप अपने काम से भीषण परेशान है, तो उद्वेलित होकर अपने इर्द-गिर्द रहने वाले उन महत्वपूर्ण लोगों से ख़राब बर्ताव मत करिये जो और कुछ नहीं करते, सिर्फ आपकी मदद करने की कोशिश करते हैं। अपने सोचने-समझने के ढंग को नियंत्रित रख कर आप अपने कष्टों से उत्पन्न हो रहे दुष्प्रभावों को कम कर सकते हैं। दृढ़ निश्चयी लोग अपनी हर मुसीबत को तबाही में नहीं बदलने देते, न ही वो नकारात्मक घटनाओं के प्रभाव को जीवन पर्यन्त दिल में बिठाये रखते हैं।

अगर इससे आपको मदद मिलती हो, तो इस शांति-पाठ को याद करें और पढ़ें - मुझे ऐसी सोच और ऐसा शांतचित्त मिले जिससे मै उन बातों को स्वीकार कर पाऊँ जिन्हें मैं बदल नहीं सकता, वह शक्ति मिले जिससे मैं उन परिस्थितियों को बदल पाऊँ जिन्हें बदल सकता हूँ, और ऐसा विवेक मिले जिससे मैं अलग-अलग परिस्थितियों के बीच का फर्क समझ पाऊँ।

.... क्रमशः जारी

👉 आज का सद्चिंतन 23 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Dec 2018

👉 उदात्त वृत्तियों का अभिवर्द्धन

देखा गया है कि जो सचमुच आत्म-कल्याण एवं ईश्वर प्राप्ति के उद्देश्य से सुख सुविधाओं को त्याग कर घर से निकले थे, उन्हें रास्ता नहीं मिला और ऐसे जंजाल में भटक गये, जहाँ लोक और परलोक में से एक भी प्रयोजन पूरा न हो सका। परलोक इसलिए नहीं सधा कि उनने मात्र कार्य कष्ट सहा और उदात्त वृत्तियों का अभिवर्द्धन नहीं कर सके। उदात्त वृत्तियों का अभिवर्द्धन तो सेवा-साधना का जल सिंचन चाहता था, उसकी एक बूँद भी न मिल सकी।

पूजा-पाठ की प्रक्रिया दुहराई जाती रही, सो ठीक, पर न तो ईश्वर का स्वरूप समझा गया और न उसकी प्राप्ति का आधार जाना गया। ईश्वर मनुष्य के रोम-रोम में बसा है। स्वार्थपरता और संकीर्णता की दीवार के पीछे ही वह छिपा बैठा है। यह दीवार गिरा दी जाय तो पल भर में ईश्वर से लिपटने का आनन्द मिल सकता है। यह किसी ने उन्हें बताया होता तो निस्सन्देह इन तप, त्याग करने वाले लोगों में से हर एक को सचमुच ही ईश्वर मिल गया होता और वे सच्चे अर्थों में ऋषि बन गये होते।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम, वांग्मय 66 पृष्ठ 1.33

👉 वास्तविक सौंदर्य

राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कईं राजकुमार व राजा उसके साथ विवाह करना चाहते थे, लेकिन वह किसी को पसन्द नहीं करती थी। आखिरकार उन र...