मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 3)

🔶 इसकी तुलना में दूसरी बात है जिनके पास अपार सम्पदाएँ थीं और रावण जैसों के पास सम्पदाओं की क्या कमी थी, उसकी सोने की लंका बनी हुई थी, लेकिन वह स्वयं भी दुःख में रहा, स्वयं भी क्लेश-चक्र में पड़ा रहा, उसके सम्पर्क में जो लोग आये, जहाँ कहीं भी वह गया, वहाँ उसने दुःख फैलाया है और संकट फैलाया। सम्पत्ति से क्या लाभ रहा? विद्या से मैं चैन से रहा हूँ, लेकिन उसके पास विद्या होने से भी क्या लाभ हुआ? उसके पास धन था, विद्या थी, बल था, सब कुछ तो था, लेकिन एक ही बात की कमी थी भावनात्मक स्तर का न होना।
                
🔷 बस, एक ही समस्या का आधार है, जिसे यों हम समझ लें तो फिर हम उपाय भी खोज लेंगे और विजय भी मिलेगी। उपाय भी खोज लेंगे और विजय भी मिलेगी। उपाय हम अनेक ढूँढ़ते रहते हैं, पर मैं समझता हूँ कि इतने पर भी समाधान नहीं हो पाते। खून अगर खराब हो तो खराब खून के रहते हुए फिर कोई दवा-दारू कुछ काम नहीं करेगी। फुन्सियाँ निकलती रहती हैं। एक फुन्सी पर पट्टी बाँधी, दूसरा घाव फिर पैदा हो जाएगा। बराबर कोई न कोई शिकायत पैदा होती रहेगी। खून खराब हो तब खून साफ हो जाए तब, न कोई फुन्सी उठने वाली न कोई चीज उठने वाली है। ठीक इसी प्रकार से अगर हमारा भावनात्मक स्तर ऊँचा हो तो न कोई समस्या पैदा होने वाली है और न कोई गुत्थी पड़ने वाली है। इसके विपरीत हमारी मनःस्थिति और हमारा दृष्टिकोण गिरा हुआ हो तो हम जहाँ कहीं भी रहेंगे अपने लिए समस्या पैदा करेंगे और दूसरों के लिए भी समस्या पैदा करेंगे। यही वस्तुस्थिति है और यही इसका आज की परिस्थितियों का दिग्दर्शन है।
    
🔶 भूतकाल में भारतवर्ष का इतिहास उच्चकोटि का रहा है, समुन्नत रहा, सुखी रहा है। इस पृथ्वी पर देवता निवास करते थे, स्वर्ग की परिस्थितियाँ थीं, इसका और कोई कारण नहीं था, न आज के जैसे साधन उस जमाने में थे। आज जितनी नहरें हैं उतनी उस जमाने में थीं कहाँ? आज बिजली का जितना साधन-शक्ति प्राप्त है, उस जमाने में कहाँ थी? आज जितने अच्छे पक्के मकान और दूसरे यातायात के साधन हैं, उस जमाने में कहाँ थे? लेकिन इस पर भी यह देश सम्पदा का स्वामी था। इस देश के नागरिक देवताओं के शिविर में चले जाते थे। यह भूमि तब ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ मानी जाती थी। यद्यपि आज की तुलना में अभावग्रस्त थी, उस जमाने में इसका क्या कारण था? इसका कारण एक ही था कि उस जमाने के लोग उच्चकोटि का दृष्टिकोण अपनाये हुए थे। उनकी भावनाएँ उच्चस्तर की थीं। उसका परिणाम यह था कि लोग परस्पर स्नेहपूर्वक रहते थे, सहयोगपूर्वक रहते थे, परस्पर विश्वास करते थे, एक-दूसरे के प्रति वफादार होते थे, संयमी होते थे, सदाचारी होते थे, मिल-जुलकर रहना जानते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (भाग 2)

🔶 स्वर्ग संसार से अलग बसा हुआ कोई देश अथवा स्थल नहीं है। जहां संसार समर जीतने वाले लोग जाकर रहते हैं। वास्तव में स्वर्ग मानव-जीवन की एक स्थिति है, जो इसी भूमि और इसी जीवन में पाई जा सकती है। जो इसी जीवन में उस स्थिति को नहीं पा सकता, वह लोकान्तर में, यदि कोई है भी, तो उस स्वर्ग को पा सकता है, यह सर्वथा संदिग्ध है। इस जीवन में भूमि का स्वर्ग पाने वाले ही उस स्वर्ग को पा सकने के अधिकारी हो सकते हैं। यदि वह स्वर्ग प्राप्ति है तो उनकी पात्रता इसी भूमि और इसी जीवन में उपार्जित करनी होती है।
     
🔷 स्वर्ग क्या है? स्वर्ग वह स्थिति है, जिसमें मनुष्य के आस-पास आनन्ददायक प्रियता ही प्रियता बनी रहे। संसार के सारे धर्म साहित्य में स्वर्ग का वर्णन आता है। उसके सम्बन्ध में न जाने कितनी कथायें पढ़ने को मिलती हैं। लोगों का स्वर्ग के लिये लालायित रहना, उसको पाने के लिये पुण्य तथा पुरुषार्थ का उपक्रम करना, परमार्थ तथा अध्यात्म का अनुसरण करना आदि पढ़ने को मिलता है। किसी धर्म अथवा मत सम्प्रदाय में स्वर्ग के स्वरूप और उसकी विशेषताओं के विषय में कोई भी मान्यता अथवा धारणा क्यों न रही हो, लेकिन उस सबका सार यही है कि वहां सब कुछ प्रिय तथा आनन्ददायक ही है।

🔶 वहां पर ऐसे कारण नहीं हैं, जिनसे मनुष्य को कष्ट, क्लेश अथवा दुःख प्राप्त हो। ऐसा स्वर्ग जिसकी विशेषता आनन्द तथा प्रियता है, मनुष्य स्वयं अपने लिये इस पृथ्वी और इस जीवन में जी रच सकते हैं। अपने अन्दर तथा बाहर की परिस्थितियां इस प्रकार से निर्मित करली जायं, जिससे न तो प्रतिकूलता का जन्म हो और न दुःख अथवा शोक-संताप का। वरन् इसके विपरीत प्रियता तथा आनन्द की अवस्थायें बनी रहें। यह मनुष्य के अपने वश की बात है। वह इस प्रकार का वांछित स्वर्ग अपने लिये यहीं पर बना सकता है और निश्चित रूप से बना सकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 7
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/December/v1.7

👉 पतन नहीं उत्थान का मार्ग अपनायें

🔷 पालतू पशुओं के बंधन में बँधकर रहना पड़ता है, पर मनुष्य को यह सुविधा प्राप्त है कि स्वतन्त्र जीवन जियें और इच्छित परिस्थितियों का वरण करें। 

🔶 उत्थान और पतन के परस्पर विरोधी दो मार्गों में से हम जिसको भी चाहें अपना सकते हैं। पतन के गर्त में गिरने की छूट है। यहाँ तक कि आत्महत्या पर उतारू व्यक्ति को  भी बलपूर्वक बहुत दिन तक रोके नहीं रखा जा सकता। 

🔷 यही बात उत्थान के सम्बन्ध में भी है। वह जितना चाहे उतना ऊँ चा उठ सकता है। पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करते, लम्बी दूरी पार करते, सृष्टि के सैन्दर्य का दर्शन करते हैं। पतंग भी हवा के सहारे आकाश चूमती है। आँधी के सम्पर्क में धूलिकण और तिनके तक ऊँची उड़ानें भरते हैं। फिर मनुष्य को उत्कर्ष की दिशाधारा अपनाने से कौन रोक सकता है?

🔶 आश्चर्य है कि लोग अपनी क्षमता और बुद्धिमत्ता का उपयोग पतन के गर्त में गिरने लिए करते हैं। यह तो अनायास भी हो सकता है। ढेला फेंकने पर नीचे गिरता है और बहाया हुआ पानी नीचे की दिशा में बहाव पकड़ लेता है।

🔷 दूरदर्शिता इसमें है कि ऊँचा उठने की बात सोची और वैसी योजना बनाई जाय। जिनके कदम इस दिशा में बढ़ते हैं, वे नर पशु न रहकर महामानव बनते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 5 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Dec 2017