मंगलवार, 23 जनवरी 2018

👉 “संगत बुरी असाधु की- आठों पहर उपाधि”

🔷 सम्राट चमूपति ने राजपुरोहित महामंत्री और अनेक विद्वान व्यक्तियों से परामर्श किया किन्तु वे राजकुमार श्रीवत्स की उद्दण्डता न छुड़ा पाये। महामंत्री के सुझाव पर उन्होंने राजकुमार का विवाह कर दिया- सोचा यह गया था कि नये उत्तरदायित्व राजकुमार के स्वभाव में परिवर्तन ला देंगे किन्तु स्थिति में कुछ परिवर्तन के स्थान पर राजकुमार का स्वभाव और भी उग्र हो गया। जबकि दूसरे सभी राजकुमारों की- सौम्यता, सौजन्यता के घर-घर गीत गाये जाते थे श्रीवत्स का स्वभाव राज-कुल का कलंक सिद्ध हो रहा था।

🔶 उन्हीं दिनों महर्षि श्यावाश्व ने वाजि- मेधयज्ञ का आयोजन किया था। सम्राट चमूपति उस आयोजन के प्रमुख यजमान के रूप में आमंत्रित किये गये। आचार्य प्रवर का सन्देश पाकर एक दिन वे आश्रम की ओर चल पड़े। प्रथम विराम, उन्होंने राजधानी से 5 योजन की दूरी पर स्थित अरण्यजैत ग्राम में किया। महाराज का विराम-शिविर प्रमुख परिचारकों के साथ- ग्राम के बाहर एक देव स्थान के पास किया गया। दिनभर के थके परिचारकों को जल्दी ही नींद आ गई किन्तु सम्राट किसी विचार में खोये अब भी जाग रहे थे।

🔷 तभी किसी विलक्षण आवाज ने उन्हें चौंका दिया। आवाज एक नन्हें से तोते की थी। वह मनुष्य की बोली में अपनी स्वामी से बोला-तात! आज तो बहुत अच्छा शिकार पास आ गया। इसके पास तो सोने का मुकुट, रजत की अम्बारियाँ और मणि-मुक्ताओं से जड़ित बहुमूल्य वस्त्र भी हैं- एक ही दाव में जीवन भर का हिसाब पूरा कीजिए स्वामी- ऐसा समय फिर हाथ नहीं आयेगा।

🔶 तोते का मालिक- अरण्यजीत का खूँखार दस्यु नायक- महाराज को पहचानता था। उसने तोते को चुप करना चाहा किन्तु ढीठ तोता- चुप न रहा- फिर बोला- आर्य! महाराज हैं तो क्या हुआ डरो मत सिर धड़ से अलग कर दो और चुपचाप इनका सारा सामान अपने अधिकार में ले लो।

🔷 सम्राट चमूपति- रात के अन्धकार की नीरवता से पहले ही सहमे हुए थे तोते की भयंकर मन्त्रणा ने उन्हें और डरा दिया- उन्हें नीति वचन याद आया “जहाँ मनुष्य को कुछ आशंका हो उस स्थान का तत्काल परित्याग कर देना चाहिए” सो उन्होंने अंग रक्षकों को जगाया और अविलम्ब वहाँ से चल पड़े।

🔶 प्रातःकाल होने को थी महाराज ने श्यावाश्व के आश्रम में प्रवेश किया उधर भगवान रश्मि-माल ने अपनी प्रथम किरण से उनका अभिषेक किया। आश्रम के द्वार पर महाराज पहुँचे ही थे कि एक अति मधुर ध्वनि कानों में पड़ी- आज के मंगलमूर्ति अतिथि- आइये, पधारिये आपका स्वागत है, आपका स्वागत है। आश्चर्य से महाराज श्री ने दृष्टि ऊपर उठाई। समीप के वृक्ष पर बैठा एक नन्हा सा शुक बोल रहा था। महाराज ने ऊपर की ओर देखा और रात की घटना सजीव हो मानस पटल पर गूँज उठी- सम्राट बोले- तात! तुम्हारा स्वर कितना मधुर, कितना मोहक है और एक वह स्वर था जिसने मुझे रात में डरा ही दिया।

🔷 शुक के पूछने पर महाराज ने रात का सारा वृत्तांत कह सुनाया। वेदनासिक्त प्रच्छ्वास छोड़ते हुये शुक ने कहा- तात! अरण्यजैत का वह शुक मेरा सगा ही भाई है उसके कृत्य के लिये क्षमा याचना करता हूँ।

🔶 महाराज बोले- वत्स! एक ही उदर से जन्मे तुम दोनों भाइयों में यह विसंगति कैसी? नन्हे शुक ने उत्तर दिया- महाराज! सब संगति का फल है। मेरा भाई दस्युओं के गाँव में रहता है सो स्वाभाविक ही है कि उसमें वहाँ के लोगों जैसी क्रूरता हो, मुझे जो ज्ञान मिला वह महर्षि श्यावाश्व के इस संस्कार भूत आश्रम के वातावरण का प्रतिफल है। महाराज- श्री राजकुमार श्रीवत्स के बुरे होने का कारण समझ गये और उन्हें सुधारने का सूत्र भी मिल गया- सत्संगति।

📖 अखण्ड ज्योति 1984 नवम्बर
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 24 Jan 2018


👉 अपनी यथार्थता जानें

🔷 मानव जीवन एक प्रकार से देवत्व प्राप्ति का अवसर है। इस अवसर का सदुपयोग कर मानव से महामानव, नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम तक बना जा सकता है। मानव शरीर की संरचना भगवान्ï की श्रेष्ठïतमï कृति है। इस सृष्टिï में मनुष्य से बढक़र अन्य कोई प्राणी उसने इतना अद्ïभुत एवं प्रतिभावान्ï नहीं बनाया। इस मानव जीवन में ही शिक्षा, कला, विज्ञान, आवास के सुंदर-सुंदर भवन, जल, थल एवं नभ में विचरण का अवसर प्राप्त हुआ है। नाना प्रकार के रंग-बिरंगे सपनों को साकार करने का अवसर इसी जीवन में उपलब्ध है। यह सुविधा तो देवयोनि में भी संभव नहीं है।
  
🔶 पूर्णता की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय आदर्श एवं पवित्रतम दैवी जीवन यापन किया जाय तथा अपनी उपार्जित शक्ति-सम्पदा का न्यूनतम अपने लिए तथा अधिकतम दूसरों के लिए खर्च किया जाय, इसी को मानव जीवन का श्रेष्ठïतम उपयोग माना गया है। राजा का बड़ा पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाता है, किन्तु उसका कत्र्तव्य है कि वह अपने अन्य छोटे भाई-बहिनों की देखरेख व सुरक्षा का समुचित प्रबंध करे। परम पिता का सर्वश्रेष्ठï युवराज होने के नाते मनुष्य का भी उत्तरदायित्व यही है कि अपने से अविकसित, पिछड़े प्राणियों को, जो हमारे छोटे भाई-बहिन के समान हैं, उनको विकसित करने, आगे बढ़ाने में उदारतापूर्वक सहयोग करे। उनको सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करे।
  
🔷 शरीर और मन जीवन रूपी रथ के दो पहियों के समान हैं। इन दोनों का अपना स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। यह अंत:करण की आस्था एवं आकांक्षा के अनुरूप दोनों स्वामिभक्त सेवक के समान सदैव उसकी आज्ञा का पालन मात्र करते रहते हैं। शरीर द्वारा क्रिया मन द्वारा विचारणा उसी ओर घूमती एवं चलती है, जिधर अंतरात्मा की भावना प्रेरित करती है। भावनाएँ ही श्रद्धा, आस्था, निष्ठïा एवं मान्यता आदि नामों से जानी जाती हैं। इन्हीं सबके समन्वय से आकांक्षाएँ उभरती हैं और फिर उन्हीं के अनुरूप मन अपना तर्क, वितर्क, चिंतन एवं क्रिया प्रणाली निर्धारित करता है। तदुपरान्त गुलाम की तरह शारीरिक हलचलें क्रिया रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। ऐसे में शरीर और मन दोनों को निर्दोष ही माना जाएगा। भला या बुरा, उत्थान या पतन जिस भी  मार्ग में बढ़ जाता है, उसका सारा दारोमदार अंत:करण पर ही जाता है।
  
🔶 आत्मज्ञान, आत्म बोध का अभिप्राय अंतराल के गहन स्तर में यह अनुभूति एवं विश्वास उत्पन्न करते रहना कि हम सत्ï, चित्ï, आनंद स्वरूप परमात्मा के ही अभिन्न अंग हैं। हमें यह भावना भी उत्पन्न करनी चाहिए कि संकीर्ण स्वार्थपरता त्याज्य है। व्यक्तिवादी आपाधापी अंततोगत्वा पतन के ही मार्ग में धकेलती है। अस्तु व्यक्ति से उठकर समष्टिï पर ध्यान दिया जाना चाहिए। भगवान्ï बुद्ध को जब आत्मबोध प्राप्त हुआ था, तब वे संकीर्ण स्वार्थ युक्त राजपाट को त्यागकर समष्टिïगत हित साधना में लग गए थे। स्वयं ही नहीं अपने अबोध बालक एवं पत्नी को भी लोकहित के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया था। इससे स्पष्टï हो जाता है कि आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति की क्रिया पद्धति में आदर्शवादिता ही आदर्शवादिता उभरती, उछलती रहती है। ऐसे लोग स्वयं तो कृतकृत्य होते ही हैं, समाज के लाखों-करोड़ों सामान्यजनों के लिए मार्गदर्शन का भी कार्य कर जाते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अहिंसा और हिंसा

🔶 अहिंसा को शास्त्रों में परम धर्म कहा गया है, क्योंकि यह मनुष्यता का प्रथम चिन्ह है। दूसरों को कष्ट, पीड़ा या दुःख देना निःसंदेह बुरी बात है, इस बुराई के करने पर हमें भयंकर पातक लगता है। और उस पातक के कारण नारकीय रारव यातनायें सहन करनी पड़ती हैं। बौद्ध और जैन धर्म तो अहिंसा को ही संपूर्ण धर्म मानते हैं। अन्य धर्मों में भी अहिंसा के लिए बहुत ऊँचा स्थान है।

🔷 ऐसे प्रधान धर्म का पालन करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके तत्वज्ञान पर एक विवेचनात्मक दृष्टि डाली जाय। हमें जानना चाहिए कि हिंसा क्या है। और दूसरों को दुःख की व्याख्या क्या है। किसी को दुख न देने की मोटी कहावत तो इतनी स्थूल है कि उसका आचरण करने पर एक घंटे भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता और एक दिन भी ऐसी अहिंसा काम में आने लगे तो सृष्टि सर्वनाश ही समझना चाहिए। सिंह, व्याघ्र और सर्प, बिच्छुओं को दुख न देने की नीति ग्रहण की जाय तो सहस्रों निरपराध प्राणियों के प्राण संकट में पड़ते रहें।

🔶 हत्यारे और डाकुओं को न सताया जाय, तो समाज की सुख, शान्ति ही चली जावें जुँए, चीलर, रक्तजुँए, खटमल आदि को पाल कर रखा जाय, तो चैन से बैठना मुश्किल हो जाय। मक्खी, मच्छर, पिस्सू, बीमारियों के कीड़े फसल के शत्रु कीड़े आदि को न सताया जाय तो जीवनयापन होना कठिन है। शरीर के हिलने जुलने साँस लेने पानी पीने भोजन करने में अनिवार्यतः हिंसा होती है। इससे चार भाई भी उपाय नहीं है।

🔷 मूढ़ता के कारण अज्ञानी व्यक्ति जिन कार्यों को अहिंसा माने लेते हैं। असल में वह एक भ्रम मात्र है। जीवित पदार्थों में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है कहा गया है कि जीवो जीवस्य भोजनम शाक अन्न दूध जल, वायु से जीवित प्राणियों को खाकर हम भी जीवित रहते है। ऐसी अनिवार्य हिंसा जो स्वाभाविक है,वह हिंसा नहीं कही जा सकती। अमुक शाक खाने में हिंसा हो जायगा या मुख पर पट्टी बाँधे बिना साँस लेने से हिंसा हो जायेगी। ऐसी सनक के लिए अपना समय और शक्ति बर्बाद करना व्यर्थ है क्योंकि यह अनिवार्य है। ढकोसले बनाने पर भी उसका बचाव नहीं हो सकता। मुँह पर पट्टी बाँध लेने से भी जीव पेट में पहुँचेगा, यह न पहुंचेंगे तो वह खुद ही मर जायगा।  

📖 अखण्ड ज्योति 1942 जुलाई

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1942/July/v2.14

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (अन्तिम भाग)

🔷 भय और मलीनता से मुक्त रहने वालों की आत्मा तेजोपूत और उज्ज्वल रहा करती है। उसकी शक्ति बढ़ती और प्रभावपूर्ण बनती जाती है। उज्ज्वल और सत्यपूत आत्मा वाला व्यक्ति हजार दुष्टों तथा धूर्तों में भी ठीक उसी प्रकार प्रचण्ड और निर्भय बना रहता है जिस प्रकार एक अकेला केसरी शृंगालों और शूकरों के झुण्ड में। निर्भयता में अनन्त व अनिवर्चनीय आनन्द है। इसकी प्राप्ति सत्याचरण, सत्य वचन और सत्य व्यवहार द्वारा ही होती है। सत्य जीवन की सर्वोत्तम नीति है। इसका पालन करने वाला निश्चय ही किसी भी क्षेत्र में अपना श्रेष्ठतम निर्माण कर सकने में सफल हो जाता है।

🔶 मनुष्य की आत्मा ही सर्वोत्तम तत्व और उसका सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व है। आत्मा की रक्षा करना मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म बताया गया है। जिसने परमात्मा के प्रधान अंश आत्मा की रक्षा कर ली, उसे अपने आचरण, व्यवहार और क्रियाओं की सत्यता द्वारा पुष्ट और बलिष्ठ बना लिया और उसे मल विक्षेप अथवा कुटिलता के कलुष से मुक्त कर उसके मूल तत्व परमात्मा की ओर उत्सुक कर दिया। उसने मानों अपना ठीक-ठीक निर्माण कर लिया। वह अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व में पूरी तरह उत्तीर्ण माना जाता है, जिसके पुरस्कार स्वरूप उसे भवसागर से पार उतार कर सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा की गोद में पहुंचा दिया जाता है।

🔷 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। वह स्वयं ही अपना निर्माण करता है। उत्कृष्ट निर्माण ही निर्माण है। आत्म-तत्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है। इस निर्माण के लिये मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिये। सत्य मानव-जीवन की सफलता के लिये सर्वोत्तम नीति है। इसको अपनाकर चलने वाले किसी भी दिशा और किसी भी क्षेत्र में अपना स्थान बनाकर अन्त में परम पद के अधिकारी बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 18

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.18

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

👉 Amrit Chintan 24 Jan

🔷 For moral development those who enchant Gayatri mantra should know that mantra becomes only active and effective when other descipline of Character is also strictly followed a cruel, evil or characterless person can not got any benefit by simply enchanting any mantra. Even tantric perfections also need great salvacy so when one needs devine virtues he will have to observe great sacredness and pious life.
 
🔶 In our mental plane whatever ill thoughts flave up. We must direct them on right path. One should not envolve on sensual pleasure rather he must think deeply his inner conscious. We must spend our material earning in right way. Any devotee who follows this path of restrain and service will lead a successful life.

🔷 Your practice of working hard in life your tolerance will bring all sorts of success in life. It is your austerity that you can earn every thing in this world. One who can observe penance and austerity will be able to achieve every thing in this world and world beyond.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 5)

🔷 साथियो! हमने आपको जो थोड़े समय तक शिक्षण दिया है, उस शिक्षण को आपको कर्तव्य रूप में परिणत करना चाहिए और क्रियारूप में परिणत करना चाहिए।* अब आप यहाँ से विदा हो रहे हैं। जब भी हमको आवश्यकता होगी हम आपको दुबारा बुला लेंगे। इस समय हम जो आपको विदा कर रहे हैं, उसका एक ही उद्देश्य है—पीड़ा और पतन का निवारण। इसने समूची मानव जाति को तबाह कर डाला है। इसने सारे-के संसार को मूर्ख बना दिया, अंधकार में डुबो दिया है। इसे हमें मिटाना है। इस अंधकार और दर्द को, दुःख और पाप को मिटाना है।

🔶 इसने भगवान के वरिष्ठ राजकुमार मानव जाति को पशुओं से भी गया-बीता, पापियों से भी गया बीता बना दिया है। अब करना यह पड़ेगा कि हम आपको वहाँ भेजेंगे जहाँ भूकम्प आया हुआ है। जहाँ बाढ़ आयी हुई है। जहाँ पतन छाया हुआ है। मैंने आपको हजार बार कहा है और लाख बार फिर कहूँगा कि मनुष्य के सामने जो गुत्थियाँ दिखाई पड़ती हैं, जो कुछ भी अशांति दिखाई पड़ती है, जो कुछ भी अभाव दिखाई पड़ता है और जो भी कुछ दुःख दिखाई पड़ता है, उसका और कोई कारण नहीं है। उसका एक ही कारण है कि मनुष्य अपनी विचारधारा को विकृत बना चुका है। विकृत विचार धारायें ही पतन का मुख्य कारण हैं।

🔷 मित्रो! पतन जहाँ कहीं भी रहेगा, पीड़ायें हजार जगह से आ जायेंगी। इन्हें आप रोक नहीं सकते। इसलिए हमको क्या करना पड़ेगा? हमको वही करना पड़ेगा, जो ऋषियों ने, संतों ने, महात्माओं ने, ब्राह्मणों ने हमेशा से किया है। उन्हें जहाँ कहीं भी पीड़ा और पतन दिखाई पड़ा है, वहाँ वे सीधे भागकर गये हैं और उस पतन का निवारण करने के लिए, निराकरण करने के लिए अपने आपका बलिदान कर दिया। अपने आपको शहीद कर दिया। पतन अज्ञान के रूप में, लोभ के रूप में, मोह के रूप में आता है। मनुष्य कैसा लोभी होता जा रहा है, आप देख ही रहे हैं। आदमी कैसे मोह के वश में होता जा रहा हैं, यह भी सर्वत्र ही देखा जा सकता है। लोभ और मोह जहाँ कहीं भी पाया जायेगा, वहाँ हजार तरह के पाप, हजार तरह की पीड़ा और हजार तरह के दुःख होते चले जायेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 22)

👉 सब कुछ गुरु को अर्पित हो

🔷 गुरुगीता के महामंत्र साधनापथ के प्रदीप हैं। इनसे निःसृत होने वाली ज्योति किरणें साधकों को भटकन और उलझन से बचाती है। वैदिक ऋषिगण, अनुभवी महासाधक सभी एक स्वर से कहते हैं कि साधनापथ महादुर्गम है। इस पर निरन्तर चलते रहना महाकठिन है। फिर चलते रहकर लक्ष्य को पा लेना गुरु कृपा के बिना नितान्त असम्भव है। उपनिषद् की श्रुतियों में साधकों के लिए ऐसे ही चेतावनी भरे वचन हैं। कठोपनिषद् की श्रुति कहती है- ‘क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति’ अर्थात्- यह साधना पथ छुरे की धार की भाँति अति दुष्कर है। यह पथ अति दुर्गम है, ऐसा अनुभवी कवियों (ऋषियों) का कहना है। गुरुकृपा ही इस दुर्गम पथ को सुगम बनाती है। गुरु-करुणा का सम्बल पाकर ही शिष्य इस पथ पर चलने में सफल होता है। सद्गुरु के स्नेह सिंचन से ही साधक की साधना पूर्ण होती है।
  
🔶 उपर्युक्त मंत्रों में बताया गया है कि शिष्य को यह तथ्य जान लेना चाहिए कि सद्गुरु का चिन्तन स्वयं आराध्य का ही चिन्तन है। इसलिए कल्याण की कामना को करने वाला साधक इसे अवश्य करे। तीनों लोकों में निवास करने वाले सभी इस सत्य को कहते हैं कि गुरुमुख में ही ब्रह्मविद्या स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। गुरु ही अज्ञान के अन्धकार को हटाने वाले प्रकाश स्रोत हैं। शास्त्र वचनों से भी यही सिद्ध होता है कि गुरुकृपा से ही माया की भ्रान्ति नष्ट होती है। गुरु से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है।
  
🔷 गुरुभक्ति की इस तत्त्वकथा में नयी कड़ी जोड़ते हुए भगवान् सदाशिव माता पार्वती को समझाते हैं-
  
ध्रुवं तेषां च सर्वेषां नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्।     आसनं शयनं वस्त्रं भूषणं वाहनादिकम्॥ २६॥
साधकेन प्रदातव्यं गुरुसन्तोषकारकम्। गुरोराराधनं कार्यं स्वजीवित्वं निवेदयेत्॥ २७॥
कर्मणा मनसा वाचा नित्यमाराधयेद् गुरुम्। दीर्घदण्डम् नमस्कृत्य निर्लज्जोगुरुसन्निधौ॥ २८॥
शरीरमिन्द्रियं प्राणान् सद्गुरुभ्यो निवेदयेत्। आत्मदारादिकं सर्वं सद्गुरुभ्यो निवेदयेत्॥ २९॥
कृमिकीट भस्मविष्ठा-दुर्गन्धिमलमूत्रकम्। श्लेष्मरक्तं त्वचामांसं वञ्चयेन्न वरानने॥ ३०॥

🔶 हे श्रेष्ठमुख वाली देवी पार्वती! शिष्य को यह सत्य भली भाँति जान लेना चाहिए कि यह ध्रुव (अटल) है कि गुरु से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व नहीं है। ऐसे लोक कल्याण में निरत परम कृपालु गुरु के कार्य के लिए आसन, वस्त्र, आभूषण, वाहन आदि देते रहना शिष्य का कर्त्तव्य है। साधक द्वारा इस तरह लोक कल्याणकारी कार्यों में सहयोग से सद्गुरु को सन्तोष होता है। भगवान् शिव का कथन है कि गुरु  कार्य के लिए साधक को अपनी जीविका को भी अर्पण करना चाहिए॥ २६-२७॥ कर्म, मन और वचन से नित्य गुरु आराधना करना ही शिष्य का कर्त्तव्य है। गुरु के कार्य में तनिक भी लज्जा करने की जरूरत नहीं है। गुरु को साष्टांग नमस्कार करना चाहिए॥ २८॥ शिष्य का शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण सभी कुछ गुरु कार्य के लिए अर्पित होना चाहिए। यहाँ तक कि अपने साथ पत्नी आदि परिवार के सदस्यों को गुरु कार्य में अर्पण कर देना चाहिए॥ २९॥ भगवान् सदाशिव कहते हैं कि हे पार्वती! यह अपना शरीर कृमि, कीट, भस्म, विष्ठा, मल-मूत्र, त्वचा, मांस आदि का ही तो ढेर है। यह यदि गुरु कार्य के लिए अर्पित हो जाए, तो इससे श्रेष्ठ भला और क्या हो सकता है॥ ३०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 41

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...