शनिवार, 18 नवंबर 2017

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!

🔶 अब्राहम लिंकन ने पार्लियामेण्ट की मेज पर एक बौनी-सी महिला को खड़ा कर परिचय देते हुआ कहा—‘‘यह महिला वह है, जिसने मेरे संकल्प को पूरा करके दिखा दिया।’’ अब्राह लिंकन ने अपनी आत्मा व अपने भगवान् के सामने कसम खाई थी कि हम अमेरिका पर से एक कलंक हटाकर रहेंगे। कौन-सा कलंक? कलंक यह कि अमेरिका के दक्षिणी भाग में नीग्रो-लोगों को गुलाम बनाकर उनसे जानवर के तरीके से काम लिया जाता था। कानून मात्र गोरों की हिमायत करता था। ऐसी स्थिति में एक महिला लिंकन की कसम को पूरा करने उठ खड़ी हुई। उसका नाम था हैरियट स्टो। लिंकन ने पार्लियामेंट के मेम्बरों से कहा—‘‘यही वह महिला है जिसकी लिखी किताब ने अमेरिका में तहलका मचा दिया। लाखों आदमी फूट-फूट कर रोए हैं। लोगों ने कह दिया जो लोग ऐसे कानून का चलाते हैं, इस तरह जुल्म करते हैं, हम उनसे लड़ेंगे।’’
            
🔷 आप क्या समझते हैं नीग्रो व नीग्रो की लड़ाई की बात लिंकन कह रहे थे? नहीं। नीग्रोज के पास न हथियार थे, न ताकत। उनके पास तो आँसू ही आँसू थे। वे तो रो भर सकते थे। लड़ाई गोरों व गोरों में हुई। उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका में गृहयुद्ध हो गया। इतना खौफनाक युद्ध हुआ कि व्यापक संहार हुआ पर इसका परिणाम यह हुआ कि कालों को उनके अधिकार मिल गए। इतना बड़ा काम, इतना बड़ा विस्फोट करा देने वाली महिला थी—हैरियट स्टो जिसने किताब लिखी थी—‘अंकल टाम्स कैबिन’ ‘टाम काका की कुटिया’।
 
🔶 एक छोटी-सी महिला के अन्तःकरण की पुकार से लिखी गई इस किताब ने जन-जन के मर्म को, अन्तःकरण को छुआ और अमेरिका ही नहीं, सारे विश्व में तहलका मचा दिया। हर आदमी ने इसे पढ़ा और कहा कि जहाँ ऐसे जुल्म होते हैं, इनसान, इनसान पर अत्याचार करता है, हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे और उसे उखाड़ फेकेंगे। लिंकन ने कसम तो खाई थी पर वे अकेले कुछ कर नहीं सकते थे, क्योंकि उनके पास गोरों का शासन तन्त्र था। कालों का कोई हिमायती नहीं था। उनका हुकुम किस पर चलता? पर उस महिला की लिखी उस किताब ने हर नागरिक के दिल में ऐसी आग पैदा कर दी, ऐसी टीस पैदा कर दी कि आदमी कानून को अपने हाथ में लेकर दूसरे आदमियों को ठीक करने पर आमादा हो गया। गृहयुद्ध तब समाप्त हुआ, जब वह कानून खत्म हो गया और सबको समान अधिकार दिला दिए गए।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 'परमवीर' मेजर शैतान सिंह की वीरता का कर्जदार रहेगा देश

1962 में भारत-चीन युद्ध को भारत के इतिहास के सबसे भीषण युद्ध के तौर पर जाना जाता है। इस युद्ध में हजारों भारतीय सैनिक शहीद हुए, बंदी बनाए गए और कई लापता हो गए। मगर इसी युद्ध में लड़ने वाले कुछ वीरों की कहानियां अक्सर सुनने को मिल जाती हैं, उन्हीं में से बहादुरी की एक अमरगाथा 'परमवीर' मेजर शैतान सिंह और उनकी सैन्य टुकड़ी की भी है। आज ही के दिन 18 नवंबर 1962 को मेजर शैतान सिंह वीरगति को प्राप्त हुए थे।

🔷 5000 चीनी सैनिकों के सामने थे केवल 123 भारतीय सैनिक

1962 के युद्ध के दौरान 13वीं कुमाऊं रेजिमेंट के जवान रणनीतिक तौर पर अहम चुशुल सेक्टर के पास हवाईपट्टी की सुरक्षा में तैनात थे। तभी करीब 5000 चीनी सैनिकों ने रेजांग ला दर्रे के पास हमला कर दिया। चीन की ओर से हजारों की संख्या में सैनिक और इधर मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में सिर्फ 123 सैनिक मोर्चा ले रहे थे।

🔶 दिखाया अदम्य साहस और पराक्रम

रेजांग ला दर्रे के युद्ध को मेजर शैतान सिंह के पराक्रम की वजह से जाना जाता है। युद्ध के दौरान मेजर शैतान सिंह ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने सैनिकों का हौसला बनाए रखा और गोलियों की बौछार के बीच एक प्लाटून से दूसरी प्लाटून जाकर सैनिकों का नेतृत्व किया। इसी दौरान उनके कई गोलियां लग गईं।

🔷 मरते दम तक नहीं छोड़ी बंदूक
 
ज्यादा खून बह जाने पर उनके दो साथी जब उन्हें उठाकर ले जा रहे थे तभी चीनी सैनिकों ने उन पर मशीन गन से हमला कर दिया। मेजर को लगा कि उन सैनिकों की जान भी खतरे में है, इसलिए उन दोनों को पीछे जाने का आदेश दिया। मगर उन सैनिकों ने उन्हें एक पत्थर के पीछे छिपा दिया। बाद में इसी जगह पर उनका पार्थिव शरीर मिला। जिस वक्त उन्हें ढूंढा गया, उस वक्त भी उनके हाथ में उनकी बंदूक थी और पकड़ ढीली नहीं हुई थी।

🔶 चीन को हटना पड़ा था पीछे

रेजांग ला युद्ध में चीनी सैनिकों से लोहा लेने के बाद जब भारतीय सैनिकों के हथियार खत्म हो गए, तो उन्होंने हाथों से लड़ना शुरू कर दिया और 1300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। 123 में से 114 सैनिक शहीद हो गए, इन्हीं में मेजर शैतान सिंह भी थे। बाकी 9 सैनिक बंदी बना लिए गए थे। भारतीय सैनिकों के इस पराक्रम के आगे चीनी सेना को भी झुकना पड़ा और अंततः 21 नवंबर को उसने सीजफायर का ऐलान कर दिया।

🔷 मरणोपरांत मिला सर्वोच्च वीरता सम्मान

मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर स्थित उनके पैतृक गांव ले जाया गया, जहां पूरे सैनिक सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। उनकी इस बहादुरी के लिए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। उनका पराक्रम आज भी भारतीय सेना के इतिहास का गौरवशाली हिस्सा है।






👉 Possible in the mist of Impossible

🔶 The life is filled so much with uncertainty, doubt and obstructions that it appears almost impossible to overcome these roadblocks. Every moment, a person has to wage a Mahabharat-like war within himself.

🔷 In Srimad Bhagwadgita, Kurukshetra (the battlefield of Mahabharat) has been called Dharmakshetra (the field of righteousness), because it is here that the battle for the victory of the divine over the devil, light over darkness and love over hate has to be accomplished. In the war of Mahabharat, the army of Yadavas – Sri Krishna’s clan lost in sensual indulgence and hence instruments of evil - was with the Kauravas (symbol of evil). Krishna (The Divine Incarnate) alone, that too weaponless, was with Pandavas (chosen instruments of the Divine). Life too is like that. All the powers of the physical world (rhetorically the mighty army of Yadavas) are allies of Adharma. A sadhak has to choose between the Divine and his mighty army.

🔶 It is not that Krishna was the charioteer of Arjun alone; He is eternally sitting in the heart of everyone of us and controlling our chariots of life. However, when we as sadhaks face the legions of devilish tendencies of greed, selfishness, cunningness, etc in our surroundings and evil traditions in the society, our nervousness is but natural. Arjun, too, was initially nervous and unsure of victory but he did win, once he unconditionally offered himself to serve as an instrument of the Divine Charioteer – in response to the Divine Teacher’s assurance – Ma ekam sharanam vrij.-----. Similarly, when a sadhak puts aside all ego-based self-effort and surrenders to the Divine alone and trusts His sole guidance with all his soul, mind and body, he is sure to overcome all the obstacles of the path and reach the ultimate goal. It is such sadhaks who can make possible all the impossible –looking tasks.

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Nov 2017

🔶 अपने सुधार के बिना परिस्थितियाँ नहीं सुधर सकतीं। अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियाँ नहीं बदली जा सकतीं। इस तथ्य को मनुष्य जितना जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है। हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं, पर इसके लिए समर्थ वही हो सकता है, जो पहले सुधार के प्रयोग को अपने ऊपर आजमाकर अपनी योग्यता की परीक्षा दे। दूसरे लोग अपना कहना न मानें यह हो सकता है; पर हम अपनी बात स्वयं ही न माने इसका क्या कारण है? अपनी मान्यताओं को यदि हम स्वयं ही कार्यरूप में परिणत न करें, तो फिर सभी स्त्री-बच्चों से, मित्र-पड़ोसियों से या सारे संसार से यह आशा कैसे करेंगे कि वे अपनी बुरी आदतों को छोड़कर उस उत्तम मार्ग पर चलने लगें, जिसकी कि आप शिक्षा देते हैं।         

🔷 हम भारतीय संस्कृति को मेज पर खड़ा करके यह कहना चाहते हैं कि यह वह संस्कृति है, जिसने दुनिया का कायाकल्प कर दिया। आज भी यह पूरी तरह से मार्गदर्शन देने में सक्षम है। मनीषी इसने ही पैदा किए। यदि मनीषी जाग जाएँ, तो देश, समाज, संस्कृति व सारे विश्व का कल्याण होगा। भगवान् करे मनीषी जगे, जागे, जगाए व जमाना बदले-हमारा यह संकल्प है।   

🔶 भगवान् के द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते हैं; पर अब की बार भगवान् ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए साथी-सहयोगियों को पुकारा है। जो इसके लिए साहस जुटायेंगे, वे लोक और परलोक की, सिद्धियों, विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे। शांतिकुंज के संचालकों ने यही सम्पन्न किया और अपने को अति सामान्य होते हुए भी अत्यन्त महान् कहलाने का श्रेय पाया है। जाग्रत आत्माओं से भी इन दिनों ऐसा अनुकरण करने की अपेक्षा की जा रही है।      

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 यूपी के एक आईपीएस अफसर ने सरकारी स्कूल को बना दिया कॉन्वेंट

गोरखपुर के पिपरौली ब्लॉक के जीतपुर प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय को देखकर सरकारी और कॉन्वेंट स्कूल में अंतर करना मुश्किल है। स्कूल में छात्र-छात्राओं के पढ़ने के लिए बेहतरीन क्लासरूम, बेंच, चारों ओर हरियाली और साफ-सुथरे टॉइलट। कक्षा 8 तक के इस विद्यालय की सूरत बदली है, गोरखपुर के आईजी मोहित अग्रवाल ने।

आईजी मोहित अग्रवाल ने इस विद्यालय को जून-2017 में गोद लिया था। महज 4 महीने में न सिर्फ स्कूल की इमारत का कायाकल्प हुआ है बल्कि पढ़ाई-लिखाई का पूरा सिस्टम ही बदल गया है। कॉन्वेंट स्कूलों की तरह छात्र-छात्राओं को यलो, ग्रीन, रेड व ब्लू हाउसों में बांटा गया है। हर महीने टेस्ट लिया जाता है।

🔷 बदला माहौल तो बढ़ गए बच्चे
स्कूल को आईजी के गोद लेने के पहले कक्षा एक से पांच तक के बच्चों की संख्या 275 थी। वर्तमान में बच्चों की कुल संख्या 304 है। वहीं कक्षा छह से आठ तक बच्चों की पहले संख्या पहले 120 थी। जो कि वर्तमान में बढ़कर 174 हो गयी है। आईजी मोहित अग्रवाल कहते हैं कि इस स्कूल को पूरी तरह से 'हैपी स्कूल' बनाना है। छात्र-छात्राओं को खुद की सुरक्षा के लिए सेल्फ डिफेंस का कोर्स भी करवाया जाएगा।

🔶 शनिवार को नो बैग डे
स्कूल में हर शनिवार को नो बैग डे होता है। इस दिन खेल-कूद, निबंध, वाद-विवाद और नैतिक शिक्षा की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, ताकि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का भी विकास हो।

🔷 हफ्ते में दो दिन पढ़ाते भी हैं आईजी
आईजी मोहित अग्रवाल खुद मंगलवार और शुक्रवार को एक-एक घंटे बच्चों को पढ़ाते हैं। इसके लिए वह बाकायदा नोट्स भी बनाते हैं, ताकि बच्चों को विषय ठीक से समझाया जा सके और उन्हें रटना न पड़े। छात्र-छात्राओं का हर महीने टेस्ट लिया जाता है। आईजी स्वयं इन बच्चों का पेपर सेट करते हैं। अटेंडेंस व नंबर के आधार पर हर महीने अव्वल आने वाले छात्र-छात्राओं को 'स्टार ऑफ द मंथ' चुना जाता है। दो माह लगातार अव्वल आने वाले बच्चे को 'सुपरस्टार ऑफ द मंथ' का तमगा दिया जाता है।

🔶 मेधावियों को इंटर तक फ्री शिक्षा
इस स्कूल से कक्षा आठ पास कर निकलने वाले टॉप पांच बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में इंटरमीडिएट तक मुफ्त शिक्षा दिलवाई जाएगी। इसके लिये शहर के एलएफस स्कूल (लिटिल फ्लावर स्कूल) ने हाथ बढ़ाया है। स्कूल का प्रबंधन टॉप पांच बच्चों की इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की जिम्मेदारी लेगा। 
 
 

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 2)

🔶 देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।

🔷 दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।

🔶 उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 22

👉 आज का सद्चिंतन 18 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Nov 2017


👉 दूसरों के दुख को समझो

🔷 “तुम्हारे पाँव के नीचे दबी चींटी का वही हाल होता है, जो यदि तुम हाथी के नीचे दब जाओ तो तुम्हारा हो। दूसरे के दुख को अपने दुख से तुलना किये बिना, हम उसकी प्रकृत अवस्था का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।”

🔶 किसी बादशाह को भयंकर रोग था। कई यूनानी हकीमों ने मिल कर यह राय ठहराई कि एक खास तरह के आदमी के खून के सिवाय इस बीमारी का और इलाज नहीं है। बादशाह ने इस तरह के आदमी की तलाश करने का हुक्म दिया। लोगों ने एक किसान के लड़के में वह सब गुण मौजूद पाये। बादशाह ने उस लड़के के माँ-बाप को बुलवाया और उन्हें बहुत सा इनाम देकर राजी कर लिया। काजी ने यह फैसला किया कि बादशाह को बीमारी से आराम करने के लिए एक रिआया का खून बहाना न्याय संगत है।

🔷 जब जल्लाद ने उसे मारने की तैयारी की, तब वह बालक आकाश की ओर देख कर हँसा। बादशाह ने उस बालक से पूछा, “इस अवस्था में ऐसी क्या बात हुई, जिससे तुझे खुशी हुई? “उसने जवाब दिया “बालक माँ-बाप के प्रेम पर निर्भर रहते हैं, मुकदमों का समावंश काजी करता है। मेरे माता-पिता की मति थोथे साँसारिक लोभ से भ्रष्ट हो गई है कि मेरा खून बहाने पर राजी हो गये हैं। काजी ने मुझे प्राण दण्ड की सजा दे दी है और बादशाह, अपनी स्वास्थ्य-रक्षा के लिये, मेरी मृत्यु पर राजी हो गये हैं। ऐसी दशा में, अब ईश्वर के सिवाय किसकी शरण जाऊं?

🔶 “बादशाह इस बात को सुनकर बहुत ही दुखी हुये और आंखों में आंसू भर कर बोला, “निर्दोष मनुष्य का खून बहाने की अपेक्षा मेरा ही मर जाना अच्छा है।” बादशाह ने उस बालक के सिर और आंखें चूम कर गले से लगाया और उसको बहुत सा इनाम देकर छोड़ दिया।

🔷 लोग कहते हैं, कि बादशाह उसी सप्ताह रोग मुक्त हो गया।

🔶 “अगर तुम्हें अपने पैर के नीचे दबी हुई चींटी की अवस्था का ज्ञान हो, तो तुमको समझना चाहिए कि चींटी की वैसी हालत है जैसी हाथी के पैर के नीचे दबने पर तुम्हारी हो।”

🔷 तात्पर्य यह है कि हमें सब जीवों को अपने समान समझना चाहिये। दूसरों को कष्ट न पहुँचाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिये, कि यदि हमें कोई ऐसा ही कष्ट दे तो हमें कैसा दुख होगा।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1951

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...