मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

👉 तृप्‍ति के क्षण

🔶 एक छोटा सा फकीर का झोंपड़ा था। रात थी, जोर से वर्षा होती थी। रात के बारह बजे होंगे फकीर और उसकी पत्‍नी दोनों सोते थे। किसी आदमी ने दरवाजे पर दस्‍तक दी। छोटा सा झोंपड़ा कोई शायद शरण चाहता था। उसकी पत्‍नी से उसने कहा कि द्वार खोल दें, कोई द्वार पर खड़ा है, कोई यात्री कोई अपरिचित मित्र। सुनते है उसकी बात, उसने कहां, कोई अपरिचित मित्र, हमारे तो परिचित है, वह भी मित्र नहीं है। उसने कहां की कोई अपरिचित मित्र, प्रेम का भाव है।

🔷 कोई अपरिचित मित्र द्वार पर खड़ा है, द्वार खोल उसकी पत्‍नी ने कहां, लेकिन जगह तो बिलकुल नहीं है। हम दो के लायक ही मुश्‍किल से है। कोई तीसरा आदमी भीतर आयेगा तो हम क्‍या करेंगे।

🔶 उस फकीर ने कहा, पागल यह किसी अमीर का महल नहीं है, जो छोटा पड़ जाये। यह गरीब को झोंपड़ा है। अमीर का महल छोटा पड़ जाता है। हमेशा एक मेहमान आ जाये तो महल छोटा पड़ जाता है। यह गरीब की झोपड़ी है।

🔷 उसकी पत्‍नी ने कहां—इसमे झोपड़ी.. अमीर और गरीब का क्‍या सवाल है? जगह छोटी है। उस फकीर ने कहा कि जहां दिल में जगह बड़ी हो वहां, झोपड़ी महल की तरह मालूम हो जाती है। और जहां दिल में छोटी जगह हो, वहां झोंपड़ा तो क्‍या महल भी छोटा और झोंपड़ा हो जाता है।द्वार खोल दो, द्वार पर खड़े हुए
आदमी को वापस कैसे लौटाया जा सकता है? अभी हम दोनों लेटे थे, अब तीन लेट नहीं सकेंगे,तीन बैठेंगे। बैठने के लिए काफी जगह है।

🔶 मजबूरी थी, पत्‍नी को दरवाजा खोल देना पडा। एक मित्र आ गया, पानी से भीगा हुआ। उसके कपड़े बदले और वे तीनों बैठ कर गपशप करने लग गये। दरवाजा फिर बंद कर दिया।

🔷 फिर किन्‍हीं दो आदमियों ने दस्‍तक दी। अब उस मित्र ने उस फकीर को कहा, वह दरवाजे के पास था, कि दरवाजा खोल दो। मालूम होता है कि कोई आया है। उसी आदमी ने कहा, कैसे खोल दूँ दरवाजा, जगह कहां हे यहां।

🔶 वह आदमी अभी दो घड़ी पहले आया था खुद और भूल गया वह बात की जिस प्रेम ने मुझे जगह दी थी। वह मुझे जगह नहीं दी थी, प्रेम था उसके भीतर इस लिए जगह दी थी। अब कोई दूसरा आ गया जगह बनानी पड़ेगी। लेकिन उस आदमी ने कहा, नहीं दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं; मुश्‍किल से हम तीन बैठे हे। वह फकीर हंसने लगा। उसने कहां, बड़े पागल हो। मैंने तुम्‍हारे लिए जगह नहीं की थी। प्रेम था, इसलिए जगह की थी। प्रेम अब भी है, वह तुम पर चुक नहीं गया और समाप्‍त नहीं हो गया। दरवाजा खोलों, अभी हम दूर-दूर बैठे है।

🔷 फिर हम पास-पास बैठ जायेंगे।  पास-पास बैठने के लिए काफी जगह है। और रात ठंडी है, पास-पास बैठने में आनंद ही और होगा।

🔶 दरवाजा खोलना पडा। दो आदमी भीतर आ गये। फिर वह पास-पास बैठकर गपशप करने लगे। और थोड़ी देर बीती है और रात आगे बढ़ गयी है और वर्षा हो रही है ओर एक गधे ने आकर सर लगाया दरवाजे से। पानी में भीग गया था। वह रात शरण चाहता था।

🔷 उस फकीर ने कहा कि मित्रों, वे दो मित्र दरवाजे पर बैठे हुए थे जो पीछे आये थे; दरवाजा खोल दो, कोई अपरिचित मित्र फिर आ गया। उन लोगों ने कहा, वह मित्र वगैरह नहीं है, वह गधा है। इसके लिए द्वार खोलने की जरूरत नहीं है। उस फकीर ने कहा कि तुम्‍हें शायद पता नहीं, अमीर के द्वार पर आदमी के साथ भी गधे जैसा व्‍यवहार किया जाता है। यह गरीब की झोपड़ी है, हम गधे के साथ भी आदमी जैसा व्‍यवहार करेने की आदत भर हो गई है। दरवाजा खोल दो। पर वे दोनों कहने लगे, जगह। उस फकीर ने कहा, जगह बहुत है; अभी हम बैठे है, अब खड़े हो जायेंगे। खड़े होने के लिए काफी जगह है। और फिर तुम घबडाओं मत, अगर जरूरत पड़ेगी तो मैं हमेशा बहार होने के लिए तैयार हूं। प्रेम इतना कर सकता है।

🔶 एक लिविंग एटीट्यूड, एक प्रेमपूर्ण ह्रदय बनाने की जरूरत है। जब प्रेम पूर्ण ह्रदय बनता है।तो व्‍यक्‍तित्‍व में एक तृप्‍ति का भाव एक रसपूर्ण तृप्‍ति.....।

🔷 क्‍या आपको कभी ख्‍याल है कि जब भी आप किसी के प्रति जरा-से प्रेमपूर्ण हुए, पीछे एक तृप्‍ति की लहर छूट गयी है। क्‍या आपको कभी भी खयाल है कि जीवन में तृप्‍ति के क्षण वही रहे है। जो बेशर्त प्रेम के क्षण रहे होंगे। जब कोई शर्त न रही होगी प्रेम की। और जब आपने रास्‍ते चलते एक अजनबी आदमी को देखकर मुस्कुरा दिया होगा - उसके पीछे छूट गयी तृप्‍ति का कोई अनुभव है? उसके पीछे साथ आ गया एक शांति का भाव। एक प्राणों में एक आनंद की लहर का कोई पता है। जब राह चलते किसी आदमी को उठा लिया हो, किसी गिरते को संभाल लिया हो, किसी बीमार को एक फूल दे दिया हो। इसलिए नहीं कि वह आपकी मां है, इसलिए नहीं की वह आपका पिता है। नहीं वह आपका कोई नहीं है। लेकिन एक फूल किसी बीमार को दे देना आनंद पूर्ण है।

🔶 व्‍यक्‍तित्‍व में प्रेम की संभावना बढ़ती जानी चाहिए। वह इतनी बढ़ जानी चाहिए—पौधों के प्रति, पक्षियों के प्रति पशुओं के प्रति, आदमी के प्रति, अपरिचित के प्रति, अंजान लोगों के प्रति, विदेशियों के प्रति, जो बहुत दूर है उसके प्रति, प्रेम हमारा बढ़त चला जाए..........................................

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 28 Feb 2018


👉 सुखद और सरल सत्य ही है

🔶 नि:संदेह सत्य का मार्ग उतना कठिन नहीं है। जितना दीखता है। जो वस्तु व्यवहार में नहीं आती, जिससे हम दूर रहते हैं, वह अजनबी, विचित्र तथा कष्टïसाध्य लगती है, पर जब वह समीप आती है, तो वह स्वाभाविक एवं सरल बन जाती है। चूँकि हमारे जीवन में झूठ बोलने की आदत ने गहराई तक अपनी जड़ जमा ली है। बात-बात में झूठ बोलते हैं। बच्चों की हँसी-जिन्दगी में, शेखी बघारने के लिए, लोगों को आश्चर्य में डालने के लिए अक्सर अतिरंजित बात कही जाती है। इनसे कुछ विशेष लाभ होता हो, या कोई महत्त्वपूर्ण स्वार्थ सधता हो, सो बात भी नहीं है, पर यह सब आदत में सम्मिलित हो गया है, इसलिए अनजाने ही हमारे मुँह से झूठ निकलता रहता है।
  
🔷 वेदों में स्थान-स्थान पर सत्य की महत्ता को समझाया गया है और सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठï बनने के लिए प्रेरणा दी गयी है। सत्य का मार्ग चलने में सरल है। यह मार्ग संसार सागर से तरने के लिए बनाया गया है। यही मार्ग द्युलोक तक गया है।
  
🔶 स्वार्थ के लिए, आर्थिक लाभ के लिए, व्यापार में झूठ बोलना तो आज उचित ही नहीं, एक आवश्यक बात भी समझी जाने लगी है। ग्राहक को भाव बताने में अक्सर दुकानदार झूठ बोलते हैं। घटिया को बढिय़ा बताते हैं, चीज के दोषों को छिपाते हैं और गुणों को अतिरंजित करके बताते हैं, जिनसे भोला ग्राहक धोखे में आकर सस्ती और घटिया चीज को बढिय़ा समझ कर अधिक पैसे में खरीद ले। दुकानदार की इस आमप्रवृत्ति को, ग्राहक भी समझने लगे हैं और वे मन ही मन दुकानदार को झूठा, ठग तथा अविश्वस्त मानते हैं। उसकी बात पर जरा भी विश्वास नहीं करते। अपनी निज की समझ का उपयोग करते हैं, दुकानदार की सलाह को ठुकरा देते हैं, दस जगह घूमकर भाव-ताव मालूम करते हैं। चीजों का मुकाबला करते हैं, तब अंत में वस्तु को खरीदते हैं।

🔷 यह व्यापारी के लिए एक बड़ी लज्जा की बात है कि उसे आमतौर से झूठा और बेईमान समझा जाय, उसकी प्रत्येक बात को अविश्वास और संदेह की दृष्टि से देखा जाय। ऐसे लोग भले ही लाभ कमाते हैं, पर वस्तुत: मानव के मूल्यांकन में ये बहुत ही निर्धन, निम्र स्तर के तथा घटिया लोग हैं। जिसे अविश्वस्त समझा जाय, जिनकी नीयत पर संदेह किया जाय, जिसे ठग, धोखेबाज और बहकाने वाला माना जाय, वह नि:संदेह अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खो चुका। इतनी कीमती वस्तु खोकर यदि किसी ने धन कमा भी लिया, तो इसमें न कोई गौरव की बात है और न प्रसन्नता की। अपना सामाजिक सम्मान खोकर कई लोग धन कमा लेते हैं। लुच्चे, लफंगे, जेबकट और लुटेरे भी अपनी उस्तादी से बहुत पैसे बनाते हैं। और मौज की छानते हैंं। क्या इनकी प्रशंसा की जायेगी? क्या इनका कोई सराहनीय सामाजिक स्तर गिना जायेगा? नहीं, विचारशील क्षेत्रों में इन्हें निम्रकोटि का इन्सानियत से गिरा हुआ व्यक्ति ही गिना जायेगा। ऐसी कमाई, जिससे मनुष्य घृणास्पद बनता हो, अपना आत्म-सम्मान खोता हो, धिक्कार के ही योग्य है। असत्यवादी चाहे वह अपनी चालाकी से किसी क्षेत्र में कितनी ही सफलता क्यों न प्राप्त कर सका हो, धिक्कार योग्य ही माना जायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 1)

🔶 प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

🔷 मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

🔶 अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.15

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 1)

🔷 पिछली भूलों का परिमार्जन, वर्तमान का परिष्कृत निर्धारण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण यदि सचमुच ही अभीष्ट हो तो इसके लिए विचार संस्थान पर दृष्टि जमानी चाहिए। इस मान्यता को सुस्थिर करना चाहिए कि समस्त समस्याओं का उद्गम भी यही है और समाधान भी इसी क्षेत्र में सन्निहित है। यह सोचना सही नहीं है कि धन-वैभव के बाहुल्य से मनुष्य सुखी एवं समुन्नत बनता है। इसलिए सब छोड़कर उसी का अधिकाधिक अर्जन जैसे भी संभव हो करना चाहिए। इस भ्रान्ति से जितनी जल्दी छुटकारा पाया जा सके, उतना ही उत्तम है।

🔶 शरीर की बलिष्ठता और चेहरे की सुन्दरता का अपना महत्त्व है। धन की भी उपयोगिता है और उसके सहारे शरीर यात्रा के साधन जुटाने में सुविधा रहती है। इतने पर भी यह तथ्य भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि व्यक्तित्व का स्तर और स्वरूप चिन्तन क्षेत्र के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व का स्तर ही वस्तुतः किसी के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण होता है। उसी के अनुरूप भूतकाल बीता है, वर्तमान बना है और भविष्य का निर्धारण होने जा रहा है। उसकी उपेक्षा करने पर भारी घाटे में रहना पड़ता है। स्वास्थ्य का, शिक्षा का, प्रतिभा का, सम्पदा का, पद-अधिकार का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, पर उनका लाभ मात्र सुविधा संवर्धन तक सीमित है। यह सम्पदा अपने लिए तथा दूसरों के लिए मात्र निर्वाह सामग्री ही जुटा सकती है, पर इतने भर से बात बनती नहीं। आखिर शरीर ही तो व्यक्तित्व नहीं है? आखिर सुविधाएँ मिल भर जाने से ही तो सब कुछ सध नहीं जाता? कुछ इससे आगे भी है। यदि न होता तो साधन सम्पन्न ही सब कुछ बन गये होते। तब महामानवों की कहीं कोई पूछ न होती, न आदर्शों का स्वरूप कहीं दृष्टिगोचर होता और न मानवी गरिमा का प्रतिनिधित्व करने वाले महामानवों की कहीं आवश्यकता-उपयोगिता समझी जाती।

🔷 समझा जाना चाहिए कि व्यक्ति या व्यक्तित्व का सार तत्व उसके मनःसंस्थान में केन्द्रीभूत है। अन्तःकरण, अन्तरात्मा आदि नामों से इसी क्षेत्र का वर्णन-विवेचन किया जाता है। शास्त्रकारों ने ‘‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षये’’ ‘‘आत्मैव आत्मनः बन्धु आत्मैव रिपुरात्मनः’’ ‘‘उद्धरेदात्मनात्मानम् नात्मानमवसादयेत्’’ आदि अभिवचनों में एक ही अंगुलि निर्देश किया है कि मन के महत्त्व को समझा जाय और उसके निग्रह के, परिशोधन-परिष्कार के निमित्त संकल्पपूर्वक साधनारत रहा जाय। मन को जानने की उपमा विश्व विज्ञान से दी गई है। जो अपने ऊपर शासन कर सकता है, वह सबके ऊपर शासन करेगा इस कथन में बहुत कुछ तथ्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 28 Feb

🔷 Family life is best for most of us. But it is so, subject to condition that one develops and gives a proper decorum to all the members. Parents will have to bear the responsibility of mutual harmony, education, manners. Love and affection and also observe proper development of children. Marriage is not simply a atmosphere of  physical relation but a team for moral and spiritual progress in a blissful way.

🔶 What are needed for a happy blissful life are good health, ability and high moral values. One should develop all this by constant practice. Instead of planning for high ambitions, one should go on earning virtues and distributing side by side to other needy. Self satisfaction in the availing – circumstances is an art in life. Beyond sensual pleasures, there are other higher dimensions for growth in life, which can easily be attained under discipline and ethos.

🔷 Man has control on his destiny. Based on practice of virtues and velour. Nothing is beyond his reach. There is along history that man has earned great height through his hard work and intellect, why you can not. Be sure you have every thing in you in a seed form. But you will have to grow that. That is the royal path which leads historic people to their summits. Thoughts are the power to push you up to great success of life. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 17)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 इसलिए मित्रो! इन लोगों से हमारा क्या बनने वाला है? क्या करेंगे हम इन मुरदा आदमियों का? इनसे हमारा कुछ काम नहीं बनेगा। हमको जीवट वाले आदमियों को तलाश करना पड़ेगा। अतः आपको जहाँ कहीं भी जीवट वाले आदमी मिलें, आप वहाँ जाना। हमारा संदेश लेकर के जाना और कहना कि हम आपकी तलाश करते रहे हैं। हम इसलिए तलाश करते रहे हैं कि हमारा ये ख्याल था, भगवान् जाने सही था या गलत था कि आपके अंदर जीवट नाम की कोई चीज है। इस जन्म की नहीं, तो पहले जन्म की है।

🔷 कभी भी हमारी इन आँखों ने चमक में धोखा नहीं खाया है। आपके बारे में हमने अपने मन में यह ख्याल बना करके रखा था कि आप जिंदा इंसानों में से हैं और आपके अंदर दरद नाम की कोई चीज है। आपके अंदर विवेक नाम की कोई चीज है और आपके अंदर तड़प नाम की कोई चीज है। अगर हमको ये चीजें न मालूम पड़ें, तो फिर मुरदे आदमियों को ढोने में क्या आनंद आता है? लाशों को ढो-ढोकर हम कहाँ डालेंगे? सड़े हुए बदबूदार आदमियों को हम कहाँ कंधे पर लिए फिरेंगे? मित्रो! इनको हम बैकुंठ का रास्ता कैसे दिखा देंगे? इनको हम स्वर्ग की कहानी कैसे कह देंगे? भगवान् से मिलने की बात हम कैसे कह देंगे?

🔶 मित्रो! हम सड़े हुए मनुष्यों और मरे हुए मनुष्यों की मनोकामना पूर्ण करने की जिम्मेदारी कैसे उठा लेंगे? हमारे लिए यह बिलकुल असंभव था, नामुमकिन था। हमारा एक ही ख्याल था कि आप लोग जिंदा आदमी हैं। अगर आप वास्तव में जिंदा आदमी हैं, तो यहाँ से जाने के बाद जिंदा आदमियों के तरीके से अपनी जिंदगी जीना। विवेकशील लोगों के तरीके से जीना, विचारशील और भावनाशील लोगों के तरीके से जीना, दिलवाले आदमियों के तरीके से जीना। अगर आप इस तरह से जिएँ, तो फिर तलाश करना और यदि कहीं कोई जिंदा आदमी दिखाई पड़े, तो आप उसके आस-पास चक्कर काटना। आप इस तरीके से चक्कर काटना, जिस तरीके से भौंरा खिले हुए फूल के पास चक्कर काटता है। खिले हुए फूल के आस-पास तितलियाँ और मधुमक्खियाँ चक्कर काटती हैं, जैसे हम बराबर आपके पास चक्कर काटते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 53)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔶 इस भाव सत्य से जुड़ा एक बहुत ही प्रेरक प्रसंग है। यह प्रसंग श्री श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के गृही शिष्य श्री रामचन्द्र दत्त के जीवन का है। श्री दत्त महाशय की भक्ति अपने गुरु के प्रति बढ़ी-चढ़ी थी; परन्तु इसी के साथ उनमें सांसारिक बुद्धि की भी छाया थी। उनमें अपनी विद्या-बुद्धि एवं धन-पैसे का अहंकार भी था। उनके संदर्भ में एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री परमहंस देव के संन्यासी शिष्य स्वामी अद्भुतानन्द पहले इन्हीं के यहाँ नौकरी करते थे। इन अद्भुतानन्द को श्री रामकृष्ण के भक्त समुदाय में लाटू महाराज के नाम से जाना जाता है। दत्त महाशय ने ही उन्हें ठाकुर से मिलवाया था। बाद में उनकी भक्ति भावना को देखकर उन्हें ठाकुर की सेवा में अर्पित कर दिया।
  
🔷 यही दत्त महाशय एक दिन श्री श्री ठाकुर के पास दक्षिणेश्वर आये हुए थे। स्वाभाविक रूप से वे अपने साथ अपने गुरुदेव के लिए कुछ फल-मिठाइयाँ एवं कुछ अन्य सामान लाये हुए थे। ठाकुर ने स्वभावतः यह सामान युवा भक्त मण्डली में बाँट दिया। उन्हें इस तरह सामान बाँटते देखकर दत्त महाशय थोड़ा कुण्ठित हो गये। उन्हें लगा कि इतना कीमती सामान और इन्होंने इन लड़कों में बाँट दिया। अच्छा होता कि ये इस सबको अपने लिए रख लेते और बहुत दिनों तक इसका उपयोग करते रहते। उनकी ये सांसारिक भावनाएँ ठाकुर से छिपी नहीं रहीं। जिस समय वे यह सब सोच रहे थे, उस समय शाम का समय था और वे परमहंस देव के पास बैठे उनके पाँव दबा रहे थे।
  
🔶 इन भावनाओं के उनके मन में उठते ही श्री श्रीरामकृष्ण देव ने अपने पाँव से उनके हाथ झटक दिये और बाँटने से बचा हुआ उनका सामान उनके पास फेंकते हुए बोले-तू अब जा यहाँ से। मैं तुझे अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। रही बात उस सामान की, जो तू अब तक यहाँ लाया करता था, वह भी और उससे ज्यादा तुझे मिल जायेगा। मैं माँ से प्रार्थना करूँगा कि वह सब कुछ बल्कि उससे बहुत ज्यादा तुझे लौटा दे। अचानक ठाकुर में आये इस भाव परिवर्तन से दत्त महाशय तो हतप्रभ रह गये; पर साथ ही वे यह भी समझ गये कि अन्तर्यामी ठाकुर ने उनके मन में उठ रही सभी भावनाओं को जान लिया है।
  
🔷 पर अब किया भी क्या जा सकता था? शाम गहरी हो गयी थी। वापस कलकत्ता भी नहीं लौट सकते थे। वैसे भी ऐसे मनःस्थिति में वह कलकत्ता लौटना भी नहीं चाहते थे। बस भरे हुए मन से सोचा ठाकुर के द्वारा तिरस्कृत जीवन अब किस काम का? और उनके अन्दर उमड़ आयी भक्ति भावना ने यह प्रेरणा दी कि क्यों न माँ के मन्दिर के पास बैठकर ठाकुर के नाम का जप किया जाय। बस ‘ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय’ उनके कण्ठ से, प्राणों से और हृदय से बहने लगा। उनकी भावनाएँ अपने दिव्य गुरु में विलीन होने लगी। रात गहरी होती गयी और वह अपने सद्गुरु की पराचेतना में विलीन होते गये। भाव विलीनता इतनी प्रगाढ़ हुई कि शिष्यवत्सल श्री परमहंस देव स्वयं उनके पास आ गये और बोले-चल तेरा परिमार्जन हो गया। श्री ठाकुर के चरणों को अपने आँसुओं से धोते दत्त महाशय अनुभव कर रहे थे कि सद्गुरु की पराचेतना ही चिंतनीय-मननीय है। इस सत्य को हम भी अनुभव कर सकते हैं।                                 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 87

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

👉 मंगलसूत्र

🔷 वह आज सुबह से सड़कों पर यहाँ वहाँ भटक रहा है।पर कोई काम नहीं मिला। शायद उसकी ऐसी हालत देखकर कोई उसे किसी कार्य के लायक ही नहीं समझ रहा। तभी तो सभी उसे भिखारी समझ कर दुत्कार रहे हैं। दोपहर होने को आयी। जुबान सूख रही है।होठों पर पपड़ी सी जम गयी है।उसे ना ही खाने की जरूरत है और ना ही पानी की तलब। पिछले हफ्ते से उसने खाया ही कहाँ है भरपेट। जरूरत ही महसूस नहीं हुई। पर वह उस चीज को कहाँ से हासिल करे जिसकी तलब उसके दिमाग पर हावी होती जा रही है। राघव भी जाने कहाँ मर गया आज। सुबह से दो बार चौराहे पर ढाबे के आस पास सब कहीं छान चुका है। कहीं नहीं दिखा।

🔶 रोज तो वहीं खड़ा मिलता है। कहीं वह उससे खेल तो नहीं रहा? राघव अच्छी तरह जानता है कि वह नशे के बगैर नहीं जी सकता। फिर वह क्या करे? जेब में कौड़ी भी नहीं है। हाथ पैर जोड़कर दो चार खुराक उधारी पर ले लेता। कहीं भाग थोड़े ही जायेगा वह? हमेशा तो पैसे तुरंत चुकाता है। आज नहीं तो क्या हुआ?विश्वास भी कोई चीज है आखिर।

🔷 अपनी ही सोच पर हँस पड़ा वह। विश्वास और वह? इकलौता होने के कारण कितनी उम्मीदें थीं उस से माँ बापू को।पर उसने परवाह की कभी क्या? घर के बर्तन,रूपये पैसे जेवर जब गायब होने लगे तब सबको समझ आया कि लड़का हाथ से निकल चुका है। समझाना बुझाना कुछ काम नहीं आया। आखिरकार माँ ने आखिरी पत्ता फेंका। शायद ब्याह के बाद मोहमाया में पड़कर बुरी सोहबत से छूट जाये।

🔶 जब सोना उसकी दुल्हन बनकर आयी तो सचमुच वह उसका रूप देखकर अपनी सुधबुध ही खो बैठा था। कुछ दिन तक तो सब ठीक चला। माँ बाबू जी भी बेहद खुश कि चलो बुढ़ापा खराब होने से बच गया। पर वही कुपथ पर ले जाने वाले कुमित्र फिर आसपास मंडराने लगे। सोना का सोने जैसा रूप भी उसे न रोक सका।

🔷 उसने भले ही माँ बाबू जी को कभी सुख ना दिया पर सोना के प्रेम,सम्मान व सेवाभाव से वो निहाल थे। प्रारम्भ में तो वह संकोच करता रहा फिर धीरे धीरे ब्याह में मिले नेग निछावर व उपहारों पर नजर गड़ाने लगा। सोना भी कूछ ना कह पाती। कमरे में से कीमती सामान गायब होने लगे पर माँ बाबू जी को कुछ न पता चलता।

🔶 खुद तो पीता पिलाता। दोस्तों को भी खुश करता। धीरे धीरे साल गुजर गया। सोना का रूप पीला पड़ने लगा। मायके जाती तो किसी के बहुत पूछने पर भी कुछ ना बताती। पर अंदर ही अंदर चिंता का घुन लग चुका था उसे। जाने क्या होगा उसके भविष्य का? पेट में पल रही नन्ही सी जान भी क्या इसी माहौल में साँस लेगी? क्या क्या सपने देखे थे उसने,पर कच्चे रेत से सब ढह गये। माँ बाबू जी को जब उसके पेट से होने का पता चला तो उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा।

🔷 उम्मीदों के नये पुल बनने लगे। पर अभी दुःखों का अंत कहाँ था। दर्द की पराकाष्ठा नहीं देखी थी उन्होंने। उधर ज्यों ज्यों पेट में पल रहा जीव बढ़ रहा था त्यों त्यों सोना के तन से गहनों का बोझ कम होता जा रहा था। अब तो माँ भी सब समझने लगी थी। विरोध करने पर वह घर से चले जाने की धमकी देकर सबकी बोलती बंद कर देता।

🔶 उफ्फ ......यह दिन भी देखना था। आज तो हद ही हो गयी। रात सोना को आपने गले पर स्पर्श का अहसास हुआ तो वह चिंहुक कर ऊठ गयी। मंगल सूत्र की डोरी पर पति का हाथ देखकर काँप गयी। वही मंगलसूत्र जिसे माँ ने पहली रात में कोठरी में जाने से पहले पकड़ाया था मुँह दिखाई के लिये। मोर के बड़े से ठप्पे वाला मंगलसूत्र। सुहाग की आखिरी निशानी बस यही तो बचा था उसके पास। सोना ने हाथ पकड़ लिया था। जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी थी उसे। चिरौरी भरे स्वर में बोल गयी थी"अब इसे तो छोड़ दीजिये। कितना गिरेंगे आप?"

🔷 ग्लानि तो नहीं हुई पर शायद मन में भय कर गया कि सोना कहीं यह बात बता न दे माँ बाबू जी को। सो तड़के ही घर से निकल गया। पूरे दिन घर जाने की हिम्मत ना जुटा पाया। उधर सोना दिन भर आँसू बहाती रही। डाॅक्टर दीदी ने इसी महीने की तारीख दी थी। अब वह क्या करे? आज तो उसे सारी दुनिया ही बेगानी लग रही थी। पति के इस रूप की उसने कल्पना भी नहीं की थी। जब नन्हा घर में आ जायेगा तो वह मोहमाया में पड़ जायेगी। तब क्या होगा?नहीं ऐसा नहीं होने देगी वह। इस माहौल में वह अपने बच्चे को नहीं जीने देगी। उसे कुछ करना होगा.....जल्दी ही.....बच्चे के आने से पहले ही।

🔶 और वहाँ चंदन? वह सड़क किनारे ही पड़ गया था।नींद क्या आती? रात भर सोचता रहा सुबह राघव के पाँव पकड़कर खुराक माँगेगा। फिर मेहनत मंजूरी करके चुकता कर देगा। पर घर तो हरगिज नहीं जाना। पत्नी होकर भी पति की मदद नहीं कर सकती। ऐसा घर माँ बाप पत्नी किस काम के? करवटों में कब सुबह हुई पता ही नहीं चला। उठकर पास के नल पर हाथ मुँह धोया और फिर सड़क पर हो लिया,अपने लत की चाह में जो उसे कहाँ से कहाँ ले आयी थी।

🔷 उधर घर में जो घटित होना था वह हो चुका था। पर उसे क्या खबर क्या परवाह? खुद का भी होश नहीं था। दाढ़ी बढ़ चुकी थी। बाल बिखरे हुये और उसकी जिन्दगी की भाँति उलझे हुये। पेट पीठ से लग चुका था। एक भिखारी से कम लग भी नहीं रहा था। उस रात सोना के हाथ की रोटी खायी थी तबसे भरपेट खाना नसीब ही कहाँ हुआ था?

🔶 आज भी काम नहीं मिला था और ना ही राघव। क्या करे?....कहाँ से रूपयों का इन्तजाम हो?...ये कागज के रंगीन टुकड़े भी क्या चीज हैं। खूब रुलाते हैं इन्सान को।

🔷 तभी उसका ध्यान घाट की ओर जाते रेले पर चला गया। शायद कोई पर्व स्नान है। तभी इत्ता आदमी चला जा रहा है पगलाया हुआ। बड़ा दानपुण्य करते हैं लोग नदी किनारे। इस खयाल से ही उसकी निस्तेज बुझ चुकी आँखें चमक उठीं। भिखारी तो लग ही रहा है। कौन पहचानेगा उसे इस हुलिये में। शायद कुछ मिल जाये।यही सोचकर भीड़ के संग हो लिया। घाट पर एक किनारे बैठने भर की जगह ढूंढने में ज्यादा देर नहीं लगी उसे। लोग चले जा रहे थे पर कोई उसपर ध्यान नहीं दे रहा था। हाथ फैलाये हुये बुदबुदाता जा रहा था"लोग कितना बदल गये हैं। धर्म कर्म तो रहा ही नहीं दान पुण्य की भावना भी नहीं रही लोगों में।"......तभी भीड़ में सामने आते जाने पहचाने चेहरे पर नजर गड़ गई। अरे बाप रे.....इतवारी काका..कहीं देख तो नहीं लिया। कोई अमावस पूरनमासी नहीं छोड़ते। गंगा नहाना तो उनके जीवन का जरूरी कारज है। घबराकर मुँह फेरकर बैठ गया। भीड़ आगे बढ़ गयी।

🔶 यह ठीक नहीं है। कोई पहचान लेगा तो....। उठकर मेले में भटकता रहा। सांझ ढल रही थी। भूख प्यास अब शरीर पर असर दिखाने लगी थी। तलब भी बढ़ चली थी। इतना समय वह बिना नशे के कभी नहीं रहा। धीरे धीरे वह मेले की भीड़ को छोड़कर घाट के सुनसान हिस्से की ओर बढ़ चला। उसे मेले की चहल पहल,सजी दुकानें व खुश्बू बिखेरते चाट मिठाई के ठेले कुछ भी भा नहीं रहे थे। आँखें सुस्ती से बेजान हो चली थीं। शरीर निढाल हो गया था। पेड़ के तने से टेक लगाकर बैठ गया वह। सूरज अस्तांचल में समाने लगा था। उसे भी लग रहा था कि आज उसका सूरज भी ढलने को है। तुरंत उसे कुछ करना है, रात होने से पहले ही।

🔷 घाट पर कुछ चितायें जल रही थीं कुछ बस बुझने को ही थीं। जहाँ जीवन के बाद आता है इंसान,आज वह वहीं खड़ा है जिन्दा लाश बनकर। कैसी नियति है? अचानक नजर अभी अभी लायी गयी शवयात्रा पर ठिठक गयी। ट्रैक्टर ट्राॅली से जाने पहचाने लोग उतर रहे थे। लगता है गाँव में टपक गया है कोई।......बाबू जी?...ये भी हैं यहाँ?

🔶 कहीं देख ना लें। पेड़ की ओट हो लिया। चिता सजा दी गयी। यह क्या?....बाबू जी चिता को मुखाग्नि दे रहे हैं?

🔷 क्या माँ...? नहीं ऐसा नहीं हो सकता। पर क्यों नहीं हो सकता? आँसू बह चले थे उसकी निर्लज्ज आँखों से। जी हुआ भागकर चला जाये बाबूजी के पास। गिर जाये उनके कदमों में।माँग ले माफी। पर यह क्या इतना आसान है अब ....। ना ही तन में ताकत बची थी और ना ही मन में हिम्मत। क्या मुँह लेकर जाता। शायद सोना ने सब बता दिया होगा।बर्दाश्त नहीं कर पायी होंगी। वह इतना गिर जायेगा माँ ने कभी नहीं सोचा होगा। पश्चाताप की एक चिंगारी उभरी और तुरंत बुझ भी गयी। चिता जल रही थी पर उसका शरीर कुछ और ही माँग रहा था उससे। उसकी सारी संवेदनायें, भावनायें और रिश्ते चिता के साथ ही भस्म होते जा रहे थे। जीवन भर संजोये गये संस्कार और बंधन लकड़ियों की चटकन के साथ ही दरक गये थे। आँखें मूंदकर बैठा रहा वह।

🔶 धीरे धीरे आहटें कम होती जा रही थीं। उसे लग रहा था कि वह अपना होश खोता जा रहा है। तभी कानों में पड़ी एक आवाज ने उसे चौंका दिया"कितना दुःख झेलकर पाला था मनोहर ने चंदन को। पर इतना बड़ा दुःख दिया उसने। पहले वह घर छोड़ गया। अब बहू ने जहर खा लिया। दुनिया ही उजड़ गयी बेचारे की। सुना है बहू भी पेट से थी।किलकारी गूंजने से पहले ही सब कुछ खत्म हो गया।"

🔷 "सही कह रहे हो। ऊपर वाले की रही मरजी थी। ऐसे लड़के से तो बेऔलाद होना ही भला है। बहू मरने से पहले ही कह गयी थी कि उसकी चिता को पति हाथ भी नहीं लगायेगा। बहुत भली थी........इसके बाद उसे कुछ भी सुनाई न पड़ा। कान में माँ ,बाबू जी,सोना सबकी आवाजें गूँजती रहीं। एक दूसरे में गडमड हुई फिर सन्नाटा छा गया।

🔶 अचानक ना जाने कहाँ से उसमें बला की ताकत आ गयी। वह दौड़ पड़ा चिता की ओर। लकड़ियाँ अभी धधक रही थीं और उनके बीच सोना का रूप और यौवन भी। पर उसे तो और किसी चीज की तलाश थी। जरूर वह आग के ढेर में होगी। पागलों की तरह वह लकड़ी से अंगारों को इधर उधर बिखेरे जा रहा था। चिता के राख बनने तक लगातार........

🔷 पर वह ठप्पा उसे नहीं दिखा, सुन्दर सा, बड़ा सा, मोर वाला......मंगलसूत्र का ठप्पा...... थक कर वह वहीं लुढ़क गया.... ....कानों में सबकी आवाजें खोती जा रही थीं।।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Feb 2018

👉 आज का सद्चिंतन 27 Feb 2018


👉 ईश्वर के अनुग्रह का सदुपयोग किया जाय

🔷 मनुष्य को सोचने और करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। उसका उपयोग भली या बुरी, सही या गलत किसी भी दिशा में वह स्वेच्छापूर्वक कर सकता है। भव बंधन में बँधना भी उसका स्वतन्त्र कर्तृत्व ही है। इसमें माया, प्रारब्ध, शैतान, ग्रह, नक्षत्र आदि किसी अन्य का कोई दोष या हस्तक्षेप नहीं है। जीवन के स्वरूप और उद्देश्य से अपरिचित व्यक्ति भौतिक लालसाओं और लिप्साओं में स्वतः आबद्ध होता है। वह चाहे तो अपनी मान्यता और दिशा बदल भी सकता है और जिस तरह बंधनों को अपने इर्द गिर्द लपेटा था उसी प्रकार उनसे मुक्त भी हो सकता है।

🔶 रेशम का कीड़ा अपना खोल आप बुनता है और उसी में बँधकर रह जाता है। मकड़ी को बंधन में बाँधने वाला जाल उसका अपना ही तना हुआ होता है। इसे उनकी प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। जब रेशम का कीड़ा खोल में से निकलने की बात सोचता है तो बुनने की तरह उसे कुतर डालने में भी कुछ कठिनाई नहीं होती। मकड़ी अपने फैलाये जाले को जब चाहे तब समेट भी सकती है। इन्द्रिय लिप्साओं और ममता, अहंता को प्रधानता देकर मनुष्य शोक-सन्ताप की विपन्नता में ग्रस्त होता है। यदि वह अपनी दिशा पलट ले तो जीवन मुक्त स्थिति का आनन्द प्राप्त करने में भी उसे कोई अड़चन प्रतीत न होगी।

🔷 समस्त विभूतियों से सम्पन्न मानव जीवन का अनुदान और सर्व तन्त्र स्वतन्त्रता का उपहार देकर भगवान ने अपने अनुग्रह का अन्त कर दिया। अब मनुष्य की बारी है कि वह सिद्ध कर दिखाये कि उसका सदुपयोग वह कर सकता है जो उसे दिया गया।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1972 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1972/October/v1.1

👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है (अन्तिम भाग)

🔷 पूर्वकृत पापों के नष्ट होने का संबंध उन कर्मों से है जिनका अभी परिपाक नहीं हुआ है, जो अभी संचित रूप में पड़े हैं और समयानुसार फलित होने के लिए जो सुरक्षित रखे हुए हैं। वर्तमान काल में यदि अधिक बलवान शुभकर्म किए जाएं, मन में यदि उच्चकोटि की सतोगुणी भावनाओं का प्रकाश प्रज्वलित रहे तो उसके तेज से, ऊष्मा से वह अशुभ संचय झुलसने लगता है और हत प्रभ हीन वीर्य होने लगता है। जहाँ अग्नि की भट्टी जलती रहती हो उसके आस पास में कई पुस्तकें औषधियाँ आदि रखी रहें तो वे सब उस गर्मी के कारण जीर्ण शीर्ण निस्तेज और क्षतवीर्य हो जायेंगी। कोई बीज उस गर्मी को रखे रहें तो उनकी उपजाने की शक्ति मारी जायेगी।

🔶 इसी प्रकार यदि वर्तमान काल में कोई व्यक्ति अपनी मनोभूमि को तीव्रगति से निर्मल और सतोगुणी बनाता जा रहा है तो उसकी तीव्रता से भूतकाल के अशुभ कर्मों की शक्ति अवश्य नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि भूतकाल में अच्छे कर्म किये गये थे और उनका सुखदायक शुभ परिपाक होने जा रहा था तो वह परिपाक भी वर्तमान काल के कुकर्मों, दुर्गुणों, कुविचारों और दुष्ट भावनाओं के कारण हीन-वीर्य, निष्फल और मृतप्रायः हो सकता है। वर्तमान का प्रभाव भूत पर ही पड़ता है और भविष्य पर भी। महापुरुषों के पूर्वज भी प्रशंसा पाते है और संतान भी आदर की दृष्टि से देखी जाती है। दुष्ट कुकर्मियों के पूर्वज भी कोसे जाते हैं और उनकी संतानें भी लज्जा का अनुभव करती है।

🔷 स्मरण रखिए वर्तमान ही प्रधान है। पिछले जीवन में आप भले या बुरे कैसे भी काम करते रहे हों यदि अब अच्छे काम करते हैं तो चंद भोग्य बन गये फलों को छोड़ कर अन्य संचित पाप क्षतवीर्य हो जायेंगे और यदि उनका कुछ परिणाम हुआ भी तो बहुत ही साधारण स्वल्प कष्ट देने वाला एवं कीर्ति बढ़ाने वाला होगा। शिवि, दधीच, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, ध्रुव, पांडव आदि को पूर्व भोगों के अनुसार कष्ट सहने पड़े पर वे कष्ट अन्ततः उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाले और आत्मलाभ कराने वाले सिद्ध हुए। सुकर्मी व्यक्तियों के बड़े-बड़े पूर्व घातक स्वल्प दुख देकर सरल रीति से भुगत जाते हैं। पर जो वर्तमान काल में कुमार्गगामी हैं उनके पूर्वकृत सुकर्म तो हीन वीर्य हो जायेंगे जो संचित पाप कर्म हैं वे सिंचित होकर परिपुष्ट और पल्लवित होंगे, जिससे दुखदायी पाप फलों की शृंखला अधिकाधिक भयंकर होती जाएगी।

🔶 हमें चाहिए कि सद्विचारों को आश्रय दें और सुकर्मों को अपनायें, यह प्रणाली हमारे बुरे भूतकाल को भी श्रेष्ठ भविष्य में परिवर्तित कर सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.19

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( अन्तिम भाग)

🔶 निज के व्यक्तित्व को गर्हित करने वालों में निराशा, उदासी, आलस्य, प्रमाद, भय, चिन्ता, कायरता, लिप्सा स्तर की दुष्प्रवृत्तियों की गणना होती है। दूसरों से सम्बन्ध बिगाड़ने में क्रोध, आवेश, अहंकार, अविश्वास, लालच, अनुदारता जैसी आदतों को प्रमुख माना जाता है। भविष्य को बिगाड़ने में चटोरेपन, प्रदर्शन, बड़प्पन, दर्प, अविवेक, अनौचित्य जैसी उद्दण्डताओं का परिकर आता है। मर्यादाओं की अवज्ञा करने और अनाचार पर उतारू होने वाले लोग प्रायः वे होते हैं जिन पर विलास, लालच, संग्रह, अहंता के उद्धत प्रदर्शन का भूत सवार है। अनास्था या नास्तिकता इसी मनःस्थिति को कहते हैं। ईश्वर सद्भावना, सद्विचारणा एवं सत्प्रवृत्ति के समुच्चय को कहते हैं।

🔷 उसी के सम्मिलित स्वरूप की एक ऐसे व्यक्ति विशेष के रूप में अवधारणा की गयी है कि जो न्यायनिष्ठ है और अपनी वरिष्ठता का उपयोग अनुशासन बनाये रहने के लिए करता है। न उसका कोई प्रिय है और न अप्रिय, न किसी से लगाव, न पक्षपात, न विद्वेष। कर्म और उसका प्रतिफल ही ईश्वरीय नियति है। मानवोचित गौरव गरिमा का निर्वाह ही उसकी वास्तविक अर्चना है। इससे विमुख व्यक्तियों को नास्तिक कहा जा सकता है। शास्त्रों में जिन नास्तिकों की भर्त्सना की गयी है, वे उस समुदाय में नहीं आते जो पूजा-अर्चा से आनाकानी करते हैं। वरन् वे हैं जो उत्कृष्टता के प्रति अनास्था व्यक्त करते हैं।

🔶 आस्था-अनास्था की परख किसी के चिन्तन का स्तर एवं प्रवाह की कसौटी पर ही हो सकती है। भगवान को मस्तिष्क में विराजमान माना गया है। शेषशायी विष्णु का क्षीर सागर वही है। कैलास वासी शिव का निवास इसी मानसरोवर के मध्य में है। कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्माजी का ब्रह्मलोक यही है। तिलक चन्दन इसी पर लगाते हैं। आशीर्वाद वरदान के लिए उसी का स्पर्श किया जाता है। विधाता को जो भाग्य में लिखना होता है उसी पटल पर लिखते हैं। विचार तंत्र की गरिमा जितनी अधिक गाई जाय उतनी ही कम है। इसे ब्रह्माण्ड की, विराट ब्रह्म की अनुकृति कहा गया है। जिसने मनःसंस्थान का परिशोधन परिष्कार कर लिया, समझना चाहिए कि उसने तपश्चर्या और योगाभ्यास की आत्मा से सम्पर्क साध लिया। वह सिद्ध पुरुष बनेगा, स्वर्ग में रहेगा और जीवनमुक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होकर हर दृष्टि से कृत-कृत्य बनेगा।

🔷 स्मरण रहे, शरीर के समस्त अंग-अवयवों का जितना महत्त्व है, उसके संयुक्त स्वरूप की तुलना में अकेले मस्तिष्क की महत्ता कहीं अधिक है। मस्तिष्क को सही और स्वस्थ रखने का तात्पर्य है उसकी विचार प्रक्रिया को सही दिशा प्रदान करना। पागलों और अविकसित मस्तिष्क वालों की जिन्दगी निरर्थक होती है और वे ज्यों-त्यों करके दिन काटते हैं। उलटी विचारणा अपनाने वाले, भ्रान्तियों और विकृतियों में ग्रसित होकर अनुपयुक्त सोचते रहने वाले उससे भी अधिक घाटे में रहते हैं। अनजान की तुलना में वे अधिक दुःख पाते और दुःख देते हैं जो उलटा सोचते और उलटे रास्ते चलते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed. (Part 3)

🔷 You have been asked to wear yellow clothes for it is symbol of being determined. Other people do not wear yellow clothes but you should wear. It also means you do not have any pressure from anyone and you are not interested to copy or follow the world. What is this? It is the symbol of being committed. Whatever is the kind of food, if it is bad what to do of it? Let us go with it, but no SAHAB! It does not taste good so let us taste KACHAUDI somewhere else. Please do not do so. Don’t discuss about different types of foods and tastes. What will happen then?

🔶 Whatever are the benefits of tasty foods, but I do not give importance to them as much as to this thing that you have waged war against your mind to change it to make your one enemy a friend. Your enemy number one is your mind; your friend number one is also your mind. Determination & self-discipline is the name of pressure and furnace that is needed to mould a new weapon, to change an enemy into a friend. To exercise self-discipline you have to be determined and committed and you should make little commitments from time to time so that your determination gets support and goes strong. Such little commitments mean not to do that work until this work is done.
                                                     
🔷 Be a committed man, only committed men have emerged as great men; only committed men have progressed and succeeded and only committed ones have enabled others to cross over. You should be determined and committed. Goodness must be your policy. Generosity must be your duty. Once you have done so, the second step you have to take is not to do these works that no salt on Thursday, celibacy on Thursday or two hours silence on Thursday etc. if you practice these little commitments in association with some excellent duty and responsibility then your ideas will succeed, your personality will be sharp and you will be counted amongst nice people. I hope you would understand the importance of self-discipline and commitment and go ahead to adopt the same.

Finished, today’s session.                                           
===OM SHANTI====
                                           
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 16)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! सारे-के-सारे ये वो लोग हैं, जो मर गए हैं, जो सड़ गए हैं। लोभ के अलावा, लालच के अलावा, ख्वाहिशों के अलावा, तमन्नाओं के अलावा इनके पास कुछ नहीं है। जो आदमी खाली हो गए हैं और जो ढोल तरीके से पोले हैं, उनका हम क्या करेंगे? इनके लिए हम कुछ नहीं करेंगे और न इनसे समाज के लिए, भगवान् के लिए ही कुछ उम्मीद रखेंगे। किसी के लिए भी इनसे उम्मीद नहीं रखेंगे। इनको हम छोड़ देंगे।

🔶 मित्रो! हमारा मिशन जो इंसान में भगवान् का अवतरण करने के लिए और जमीन पर स्वर्ग की धाराओं को बहाने के लिए बोया और खड़ा किया गया है, उसके लिए हमें जिंदा आदमियों की जरूरत है। जिंदा आदमी ही इस मिशन को आगे लेकर चलेंगे। मुरदा आदमी ज्यादा से ज्यादा माला घुमा देंगे। एक हनुमान जी की घुमा देंगे, एक लक्ष्मी जी की घुमा देंगे, एक युग-निर्माण की घुमा देंगे और एक अपने बेटे की घुमा देंगे और एक अपने मोहल्ले वाले की घुमा देंगे और कहेंगे कि गुरुजी मैं रोज नौ माला जपता हूँ। उसमें एक आपके लिए जपता हूँ और एक लक्ष्मी जी के लिए। वाह, बेटे! लक्ष्मी जी भूखी बैठी थी और भगवान् जी को तीन दिन से नाश्ता नहीं मिला था। तूने एक माला जपी थी, बस उससे भगवान् जी का कलेऊ हो जाएगा और उनको रोटी मिल जाएगी। अहा! ये हैं असली भगत और असली जादूगर। सारे जादू के पिटारे ये अपने माला में भरे हुए बैठे हैं।

🔷 मित्रो! इनसे हमारा काम चलेगा? इनसे हमारा काम नहीं चलेगा। जो व्यक्ति हर काम के लिए माला को ही काफी समझते हैं, उनसे हमारा काम नहीं चलेगा। जब कभी इनको जुंग आती है, छटपटाहट आती है, तो खट माला पकड़ लेते हैं और कहते हैं कि इस पर माला को चलाऊँगा, उस पर माला को चलाऊँगा। इस तरह वे तरह-तरह की चर्खियाँ चला देते हैं। जिस तरह बंदूक में तरह-तरह के कारतूस चढ़ा देते हैं? मंत्र का। इस माला पर महामृत्युंजय मंत्र का कारतूस दनादन चढ़ा दिया, जो खट्-खट् सब बीमारियों को मार डालता है और जब इसको लक्ष्मी जी की जरूरत पड़ती है तब? अहा! ‘‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’’ मंत्र का दे दनादन-दे दनादन जप, और वो आई देवी और ये आई चंडी और ये आया पैसा। बस इसके पास तो एक ही मशीनगन है। मरने दो इन अभागे को, इसके पास न कोई जिंदगी है, न कोई दिशा है, न कोई प्रेरणा है, न कोई लक्ष्य है और न इसके पास दिल है। ये अभागा तो केवल माला को लेकर ही दफन होने वाला है और माला को लेकर ही मरेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 52)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔷 सद्गुरु चेतना का यह तत्त्व सब भाँति अपूर्व है, नित्य है, स्वयं प्रकाशित एवं निरामय है। इसमें किसी तरह का विकार नहीं है। यह परमाकाश रूप, अचल, अक्षय और आनन्द का स्रोत है॥ ६४॥ वेद स्तोत्र भी यही कहते हैं। प्रत्यक्ष, शब्द आदि चारों प्रमाणों से भी यही सत्य सिद्ध होता है। गुरुदेव की आत्मचेतना, तपश्चेतना का सदा-सदा स्मरण करना चाहिए॥ ६५॥ हे महामति देवि! इसके मनन से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं। तुम्हारी साधुता को देखकर ही मैंने यह सत्य तुम्हें बताया है।
  
🔶 गुरुगीता के मंत्रों में इस परम सत्य का उद्घाटन है कि गुरुदेव ही स्मरणीय हैं, चिंतनीय हैं और मननीय हैं। उनकी पराचेतना में रमण करने से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है। कई शिष्य-साधक बौद्धिक रूप से इस सच्चाई को जानते हैं; किन्तु भावरूप से वे इसमें डूब नहीं पाते, निमग्न नहीं हो पाते। इसका कारण यह होता है कि उनकी बुद्धि तरह-तरह सांसारिक गणित लगाती रहती है। इस बुद्धि को श्रीमद्भगवद्गीता के गायक ‘व्यावसायित्मका बुद्धिः’ कहते हैं।

🔷 श्री रामकृष्ण परमहंस इसके लिए ‘पटवारी बुद्धि’ का शब्द उपयोग करते थे। जोड़-तोड़, कुटिलता-क्रूरता में निरत रहने वालों के लिए न तो साधना सम्भव है और न ही उनसे समर्पण बन पड़ता है और जो अपनी अहंता का सिर उतार कर गुरुचरणों पर रखने का साहस नहीं कर सकते, भला उनके लिए गुरु भक्ति कहाँ और किस तरह से सम्भव है। ऐसों को सद्गुरु चाहकर भी नहीं अपना पाते। शिष्य की भाव मलीनता उन्हें यह करने ही नहीं देती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 86

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 Feb 2018


👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है ( भाग 2)

🔶 जैसे गोबर के उपले आज थापे जाएं तो वे कई दिन में सूख कर जलाने लायक होते है। हम जो भले बुरे कर्म करते रहते हैं उनका भी धीरे धीरे परिपाक होता रहता है और कालान्तर में वे कर्मफल के रूप में परिणित होते है। इसी प्रक्रिया को भाग्य, तकदीर, कर्मलेख, विधाता के अंक, प्रारब्ध, होतव्यता, आदि नामों से पुकारते हैं। हम देखते हैं कि कई व्यक्ति अत्यन्त शुभ कर्मों में प्रवृत्त है पर उन्हें कष्ट में जीवन बिताना पढ़ रहा है और जो पाप में प्रवृत्त हैं वे चैन की छान रहे हैं। इस का कारण यही है कि उनके भूतकाल के कर्मों का उदय इस समय हो रहा है और आज की करनी का फल उन्हें आगे आने वाले समय में मिलेगा।

🔷 मोटा नियम यही है कि जो किया गया है, उसका फल अवश्य मिलेगा। कर्म जैसे मन्द या तीव्र किये गये होंगे उनकी बुराई अच्छाई के अनुसार न्यूनाधिक सुख दुख का विधान होता है। यह कर्म भोग बड़े बड़ों को भोगना पड़ता है।

🔶 परन्तु इसमें सूक्ष्म नियमानुसार कभी कभी हेर फेर भी हो जाता है। जो प्रारब्ध परिपक्व होकर भोग के रूप में प्रस्तुत है उसमें परिवर्तन होना तो कठिन है पर जो कर्म अभी पक रहे हैं, भोग बनने की स्थिति में जो अभी नहीं पहुँच पाये हैं उन पर वर्तमान कर्मों का प्रभाव पड़ता है और उनका फल न्यून या अधिक हो सकता है अथवा वे नष्ट भी हो सकते हैं। धर्म ग्रन्थों में जहाँ शुभ कर्मों का महात्म्य वर्णन किया गया है वहाँ स्थान-स्थान पर ऐसा उल्लेख आया है कि “इस शुभ कर्म के करने से पिछले पाप नष्ट हो जाते हैं।” यहाँ सन्देह उत्पन्न होता है कि यदि उस कर्म के करने वाले के पाप नष्ट ही हो गये तो वर्तमान में तथा भविष्य में किसी प्रकार का दुख या अभाव उसे न रहना चाहिए। परन्तु ऐसा होता नहीं, शुभ कर्म करने वाले भी अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह सुख दुख प्राप्त करते रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 18

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.18

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 5)

🔷 दोष जिस-तिस को देने और गुण इस-उस के गाने से सिर्फ मन हलका होता है। मूलतः चयन अपने ही रुझान का होता है। साथी और समर्थक तो बुरे से बुरे मार्ग पर चलने वालों को भी मिल जाते हैं और श्रेय पथ पर चलने वाले ही कहाँ हर किसी का समर्थन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी ढेरों लोग मूर्ख बनाते और रास्ते में रोड़े अटकाते हैं। अस्तु, दूसरों को महत्त्व देना हो तो उतना ही देना चाहिए कि उनका अस्तित्व तो है, पर इतना नहीं कि किसी को उनके पीछे चलने के लिए विवश ही होना पड़े। आखिर स्वतन्त्र चिन्तन भी तो कोई वस्तु है। मस्तिष्क तो अपना है। उस पर अपना अधिकार नहीं। संकल्प बल से विचारों को दिशा नहीं दी जा सकती है और जो चल रहा है उसमें परिवर्तन-प्रत्यावर्तन की सम्भावना नहीं है, ऐसा मानकर नहीं चलना चाहिए।

🔶 विचारणा में जिस स्तर का अभ्यास पड़ गया है, एक बार उसके खरे-खोटे होने पर नये सिरे से पर्यवेक्षण करना चाहिए और जिन अनुपयुक्त अभ्यासों का कूड़ा-कचरा भरा पाया जाय, उसे साहसपूर्वक बुहार फेंकना चाहिए। लौट-लौट कर आने की कठिनाई तो घर में चमगादड़ों का घोंसला हटाने पर भी आती है। भगा देने पर भी वे लौटकर आती हैं। फिर भी वे इतनी प्रबल नहीं हैं कि गृहस्वामियों के निश्चय को पलट सकें। उन्हें झक मारकर अपना घोंसला अन्यत्र बनाना पड़ता है। कुविचारों की जड़ तभी तक जमी रहती है जब उन्हें उखाड़ने-उजाड़ने का कोई अन्तिम निर्णय नहीं होता। असमंजस का लाभ सदा विपक्षी को मिलता है। संशोधन के निश्चय और परिवर्तन के संकल्प में ही दुर्बलता हो, किसी अन्तिम निर्णय पर पहुँचना न बन पड़ रहा हो तो बात दूसरी है।

🔷 कुविचारों में निषेधात्मक विचारों का एक बहुत बड़ा परिकर है। इनमें से कुछ ऐसे हैं जो व्यक्तित्व को दबोचे रहते हैं और दलदल में से उबरने ही नहीं देते। कुछ ऐसे हैं जो व्यवहार को विकृत, उद्धत बनाकर साथियों से पटरी नहीं बैठने देते। कुछ ऐसे हैं जो दिशाधारा को प्रभावित करते हैं और कँटीली झाड़ियों में भटकाते हैं। इन सभी की अपनी-अपनी मण्डली और बिरादरी है। वे एक-एक के साथ एक जुड़े रहते हैं। रेलगाड़ी में जुड़े डिब्बे की तरह, जंजीर की कड़ियों की तरह, चींटी, दीमकों और टिड्डियों की तरह उन्हें झुण्ड बनाकर साथ-साथ चलते देखा जा सकता हैं। किन्तु साथ ही यह बात भी है कि रानी मक्खी के उड़ जाने के उपरान्त छत्ते की अन्य मधुमक्खियाँ भी इच्छा या अनिच्छा से अपनी अधिष्ठात्री के साथ चली जाती हैं, इसी प्रकार विचारों के परिकर भी जड़ जमाते और सिर पर पैर रखकर उलटे पावों पलायन करते भी देखे जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed. (Part 2)

🔶 Had they not waged war against ill-thoughts, what poor commitments alone could do; how those commitments would have completed. Ill-thoughts would have been overpowered and set aside in a corner. You must have an army of opponent thoughts in stand-by position to help you at any such crucial moment. The moment ill thoughts of avarice, sex-lust, jealousy and timidity come to your mind, just ask your good army to face them to stop and remove from mind. How it will do if you do not fight? Nothing worked except a war against RAVANA.

🔷 Did anything other than war worked against DURYODHAN? Did anything other than war worked against KANS? I am not talking about war of love, violence or non-violence. I however am only talking about war waged against ills & weaknesses in own personalities and improper conducts, wickedness prevalent in society. You must at any cost prepare an army of thoughts that is equally helpful in giving you support and making a new atmosphere around you. These are the thoughts of determination.
                                          
🔶 A farmer named HAZARI decided, ‘‘I have to plant a garden of one thousand mango trees.’’ Well people just conceded to him when he proceeded for that. Why people conceded? He was determined. Had he not been determined then he would have been wasting his time delivering here & there only speeches, ‘‘SAHAB, plant the tress, promote greenery.’’ So does anyone plant? The world spends a lot on advertisements but does anyone listen?

🔷 To be listened it is very essential that the person who is saying this must be a determined fellow. Being determined means committed to come around high class principles in life. Though essentially it should be for little things & for little periods initially so that no hindrance is faced in commitment, so that psychic force is developed and a base is prepared for bigger commitments ahead in life. It also helps a man to maintain his dignity by remembering such committed instances. Therefore it is very essential for you to be committed.
                                           
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 15)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 और विनोबा कौन हैं मित्रो! जवान आदमी। और गाँधी जी अस्सी वर्ष के करीब पहुँच गए थे। वो कौन थे? जवान आदमी। जवाहरलाल नेहरू चौहत्तर-पिचहत्तर वर्ष के थे, जब उनकी मृत्यु हुई। तब वे कौन थे? जवान आदमी और राजगोपालाचार्य? राजगोपालाचार्य की जब मृत्यु हुई थी, तो वे अस्सी वर्ष को भी पार कर गए थे। वे कौन थे? जवान आदमी, और हम और आप? हम और आप बुड्ढे आदमी हैं, जर्जर आदमी हैं, टूटे हुए और लकवा के मारे हुए आदमी हैं। कंगाली के मारे हुए, दरद के मारे हुए, दुर्भाग्य के मारे हुए और हम सब देवताओं के मारे हुए आदमी हैं।

🔷 हमारी नसें और हड्डियाँ गल गई हैं। हमार मन सड़ गया है और हमारी भावनाएँ सो गई हैं। हमारा जीवन समाप्त हो गया है। हम लुहार की धौंकनी के तरीके से साँस जरूर लिया करते हैं। हमारी साँस चलती तो है, पर बहुत धीरे-धीरे चलती है। हम कौन हैं? हम मुरदा आदमी हैं। हम मर गए हैं। हमारे अंदर कोई जीवट नहीं है, कोई जिंदगी नहीं है। हमारे अंदर कोई लक्ष्य नहीं है, कोई दिशा नहीं है। हमारे अंदर कोई तड़प नहीं है, कोई कसक नहीं है और हमारे अंदर कोई जोश नहीं है। हमारा खून ठंडा हो गया है।

🔶 साथियो! जिनका खून ठंडा हो गया है, उनको मैं क्या कहूँगा? उनको मैं बूढ़ा आदमी कहूँगा। पच्चीस वर्ष का हो तो क्या, अट्ठाइस वर्ष का हो तो क्या, बत्तीस वर्ष का हो तो क्या? वह बूढ़ा आदमी है और मौत का शिकार है। उसके सामने जिंदगी का कोई लक्ष्य नहीं है, उसके सामने कोई चमक नहीं है। जिसके सामने कोई चमक नहीं है, जिसके सामने कोई उम्मीद नहीं है, जिसकी हिम्मत समाप्त हो गई, जो आदमी निराश हो गया, जिसकी आँखों में निराशा और मायूसी छाई हुई है, वह बूढ़ा आदमी है। मित्रो! इन बूढ़े आदमियों का हम क्या करेंगे? इनसे हम क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वे स्वयं के लिए क्या काम कर सकते हैं और भगवान् के लिए क्या कर सकते हैं। और समाज के लिए क्या कर सकते हैं? यह देखकर हम उनसे ना उम्मीद हो जाते हैं। हम उनसे ज्यादा-से-ज्यादा यही उम्मीद रखेंगे कि हमारा जब हवन होगा, तो उन्हें उम्मीद दिलाएँगे कि आपके बेटा-बेटी हो जाएँगे। उनके लिए बस सब से बड़ा एक ही काम है कि बेटा-बेटी हो जाएँ। पैसा हो जाए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 51)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन
🔶 गुरुगीता का गायन करते हुए शिष्यों की अन्तश्चेतना श्रद्धा रस में भीग रही है। भक्ति का उफान उनकी भाव चेतना में हिलोरें ले रहा है। इन हिलोरों में न केवल अतीत के कल्मष घुले हैं; बल्कि प्रखरता प्रकाश की नयी आभा भी फैली है। गुरुगीता के मंत्रों का प्रभाव ही कुछ ऐसा है। ये भगवान् महादेव के वचन हैं, जो सदा सर्वदा अमोघ हैं। भगवान् सदाशिव की वाणी तीनों कालों में सत्य है। महाकाल के वचनों पर काल का कोई प्रभाव नहीं है। काल का पाश, देश की सीमाएँ इन्हें छू भी नहीं सकती। इन वचनों का सही-सही मर्म तो केवल माता पार्वती ने ही समझा। जो प्रथम श्रोता होने के साथ भगवान् साम्ब सदाशिव की प्रथम शिष्या भी हैं। अपने सद्गुरु की अनुगत और उन्हीं में विलीन।
  
🔷 शिष्यों के लिए वह परम आदर्श हैं। समर्पण-विसर्जन व विलय की सघनता की साकार मूर्ति। जो शिष्य हैं, वे इन सजल श्रद्धा के साकार भाव विग्रह से श्रद्धा के कुछ कण पाकर स्वयं को प्रखर प्रज्ञा रूपी गुरुदेव में लय कर सकते हैं। इस भाव प्रवाह में अवगाहन करने वालों ने गुरु भक्ति की पूर्व कथा में पढ़ा कि सद्गुरु का नाम मंत्रराज है। इसका जप करने से बुद्धि खरा सोना बनती है। इसके स्मरण-चिंतन से महासंकटों से रक्षा होती है। हर किसी अवस्था में चलते-फिरते, बैठते-उठते यह मंत्रराज साधक की रक्षा करता है। जो भी शिष्य इसकी साधना करता है, उसे अविनाशी, निराकार व निर्विकार आत्म तत्त्व की अनुभूति होती रहती है।
  
🔶 गुरुदेव के इस अद्भुत स्वरूप के एक अन्य रहस्यमय आयाम को प्रकट करते हुए भगवान् भोलेनाथ आदिमाता भवानी से कहते हैं-

अपूर्वाणां परं नित्यं स्वयं ज्योतिर्निरामयम्। विरजं परमाकाशं ध्रुवमानन्दमव्ययम्॥ ६४॥
श्रुतिः  प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानश्चतुष्टयम्। यस्य चात्मतपो वेद देशिकंच सदा स्मरेत्॥ ६५॥
मननं यद्वरं कार्यं तद्वदामि महामते। साधुत्वं च मया दृष्ट्वा त्वयि तिष्ठति साम्प्रतम्॥ ६६॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 85

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

👉 कैसी वाणी कैसा साथ?

🔷 दवे साहेब विश्वविद्यालय के विद्यार्थियो के बीच बहुत प्रसिद्द थे। उनकी वाणी, वर्तन तथा मधुर व्यवहार से कॉलेज के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियो उन्हें ‘वेदसाहेब’ से संबोधन करते थे. ऐसे भी वे संस्कृत के प्राध्यापक थे, और उनकी बातचीत में संस्कृत श्लोक-सुभाषित बारबार आते थे. उनकी ऐसी बात करने की शैली थी जिससे सुनने वाले मुग्ध हो जाते थे।

🔶 एक दिन विज्ञान के विद्यार्थियो की कक्षा में अध्यापक नहीं थे तो वे वहाँ पहुंच गए. सभी विद्यार्थियों ने खड़े होकर उनका सम्मान किया और अपने स्थान पर बैठ गए।

🔷 कक्षा प्रतिनिधि ने दवे साहेब से कहा, सर, कॉलेज के समारोहों में हमने आपको कई बार सुना है. लेकिन आज आपसे करीब से बातचीत करने का मौका मिला है. कृपया संस्कृत साहित्य में से कुछ ऐसी बातें बताइये जो हमारे दैनिक जीवन में काम आये।

🔶 दवे साहेब मुस्कराए और बोले :  पृथिव्याम त्रिनिरत्नानि जलं, अन्नं, सुभाषितम।। यानि कि अपनी इस धरती पर तीन रत्न हैं – जल,अन्न तथा अच्छी वाणी।

🔷 बिना जल तथा अन्न हम जी नहीं सकते, लेकिन सुभाषित या अच्छी वाणी एक ऐसा रत्न है जो हमारी बोली को श्रृंगारित करता है. हम अपने विचारों को सरलता से तथा स्पष्टता से सुभाषित द्वारा सबके सम्मुख रख सकते है।

🔶 दवे साहब अभी बोल ही रहे थे कि किसी विद्यार्थी ने प्रश्न किया,  हम वाणी का प्रयोग कैसे करें? तथा हमें किस तरह के लोगों का संग करना चाहिए?

🔷 पुत्र, तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया हैं, इसका उत्तर मैं तीन श्लोकों के माध्यम से देना चाहूंगा। तुम्हारा पहला प्रश्न- वाणी का प्रयोग कैसे करें?

यस्तु सर्वमभिप्रेक्ष्य पुर्वमेवाभिभाषते।
स्मितपुर्वाभिभाषी च तस्य लोक: प्रसीदति।।
(महाभारत शांतिपर्व 84/6)

🔶 देवों के गुरु बृहस्पतिजी हमें इस श्लोक से शिक्षा देते है कि, लोकव्यवहार में वाणी का प्रयोग बहुत ही विचारपूर्वक करना चाहिए. बृहस्पतिजी स्वयं भी अत्यंत मृदुभाषी एवं संयतचित्त है. वे देवराज इन्द्रसे कहते है : राजन ! आप तो तीनों लोकों के राजा हैं, अत: आपको वाणी के विषयमें बहुत ही सावधान रहना चाहिए. जो व्यक्ति दूसरोँ को देखकर पहले स्वयं बात करना प्रारंभ करता है और मुस्कराकर ही बोलता है, उस पर सभी लोग प्रसन्न हो जाते है।

यो हि नाभाषते किंचित सर्वदा भृकुटीमुख:।
द्वेष्यो भवति भूतानां स सांत्वमिह नाचरन।।
(महा. शान्ति. 84/5)

🔷 इसके विपरीत जो सदा भौहें टेढ़ी किए रहता है, किसी से कुछ बातचीत नहीं करता, बोलता भी है तो टेढ़ी या व्यंगात्मक वाणी बोलता है, मीठे वचन न बोलकर कर्कश वचन बोलता है, वह सब लोगों के द्वेष का पात्र बन जाता है।

🔶 अब तुम्हारा दूसरा प्रश्न – हमें किसका संग करना चाहिए?

सद्भि: संगं प्रकुर्वीत सिद्धिकाम: सदा नर:।
नासद्भिरिहलोकाय परलोकाय वा हितम्।।
(गरुड़पु. आ. 108/2)

🔷 देवों के गुरु बृहस्पतिजी बताते है कि ‘जो मनुष्य चारों पुरुषार्थ [यानि कि धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष] की सिद्धि हो ऐसी चाहत रखता हो तो उसे सदैव सज्जनों का ही साथ करना चाहिए. दुर्जनों के साथ रहने से इहलोक तथा परलोकमें भी हित नहीं है।

🔶 दवेसाहेब तथा विद्यार्थियो का संवाद पूरा हुआ और सभी विद्यार्थियो के मुखमंडल पर आनंद की उर्मी थी, आज सभी विद्यार्थियों को एक अच्छी सीख मिल चुकी थी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 Feb 2018


👉 सत्कर्मों से दुर्भाग्य भी बदल सकता है ( भाग 1)

🔶 प्रारब्ध कर्मों का, भूतकाल में किये हुए भले बुरे कामों का, फल मिलना प्रायः निश्चित ही होता है। कई बार तो ऐसा होता है कि कृतकार्य का फल तुरन्त मिल जाता है, कई बार ऐसा होता है कि प्रारब्ध भोगों की प्रबलता होने के कारण विधि निर्धारित भली-बुरी परिस्थिति वर्तमान काल में बनी रहती है और इस समय जो कार्य किए गए है उनका परिणाम कभी पीछे भुगतने के लिए जमा हो जाता है।

🔷 यदि प्रत्येक भले बुरे कर्म का फल तुरन्त हाथों-हाथ मिल जाता होता तो इस संसार में कहीं भी पापी और पाप का निशान ढूंढ़ने मिलता। क्योंकि जैसे विष खाते ही तुरन्त मृत्यु हो जाती है। वैसे ही पाप करते ही उसकी भयंकर पीड़ा होती तो उसे कोई स्पर्श भी न करता और बुराई का स्वादिष्ट फल मिठाई की तरह मधुर, बर्फ सा शीतल, चन्दन सा सुगंधित और सब प्रकार मनोहर आनन्द मय होता तो दौड़ दौड़ कर सभी लोग बुराई करते, अशुभ कर्म करने में कोई किसी से पीछे न रहता। परन्तु परमेश्वर ने मनुष्य की बुद्धिमता की परीक्षा करने के लिए और उसकी स्वतंत्रता, दूरदर्शिता और विवेकशीलता को स्वतंत्र दिशा में विकसित होने देने के लिए ऐसी व्यवस्था की है कि कर्मफल तुरन्त तो बहुत कम मिलते हैं वे आगे पीछे के लिए जमा होते रहते है। यह उधार खाता, उचंत खाता, बैंकों के हिसाब की तरह आगे पीछे जमा खर्च में पड़ता रहता है। यह वह स्थान है जिस पर मनुष्य की बुद्धिमता परखी जाती है, इसी खतरे से सावधान करने के लिए धर्म का विधान है।

🔶 वेद पुराण शास्त्र, इतिहास इसी जगह पर सावधान करने के लिए अपना अभिमत घोषित करते रहते हैं। फिर भी लोग चूकते हैं।-भ्रम में पड़ते हैं, और इस संदेह में पढ़ते हैं कि जाने कर्मफल मिलता भी है या नहीं। शास्त्रों की वाणी, धर्म की व्यवस्था जाने सच है भी या नहीं। इस संदेह में भ्रमित होकर ही वे पाप और नास्तिकता को अपना लेते है। तुरन्त फल न मिलना यही तो माया है, इस माया में ही मनुष्य भ्रमित होता है। आग छूने से जलन और बर्फ छूने से ठंडक की भाँति यदि पाप पुण्य का स्पर्श अपना अपना तुरन्त परिणाम दिखाते तो वेदशास्त्र धर्म भजन, पूजन कथा, कीर्तन आदि किसी की जरूरत न पड़ती। जैसे हरी घास को देखते ही गधा सीधा उसे खाने को चला जाता है वैसे ही सब लोग पुण्य के लिए सीधे चल देते है। और जैसे लाल झंडे को देखकर भैंस बिदकती है वैसे ही पाप का नाम सुनते ही लोग उससे बचकर दूर भागते हैं। पर ऐसा है नहीं, यही ईश्वर की माया है। हम माया को समझें और उसके जाल में न उलझें यही हमारी बुद्धिमानी का प्रमाण हो सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/February/v1.17

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 4)

🔶 कहा जाता है कि शरीर बल, सूझ-बूझ, साधन और सहयोग से कठिनाइयों का हल निकलता है और प्रगति का द्वार खुलता है। यह कथन जितना सही है उससे भी अधिक सही यह है कि मनोबल बाजी जीतता है। वही सबसे बड़ा बल है। शरीर से दुर्बल और साधनों की दृष्टि से अभावग्रस्त होते हुए भी कितने ही व्यक्ति महत्त्वपूर्ण सफलतायें प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए हैं। इसमें उनके मनोबल ने ही प्रमुख भूमिका निभाई है। मनोबल को बढ़ाने और अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक है कि सदा आशा भरे सपने देखे जायें। रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर वर्तमान परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का, ऊँचा उठने का ढाँचा खड़ा किया जा सकता है और उस उत्साह भरे पराक्रम के सहारे सफलता के स्तर तक पहुँचा जा सकता है।

🔷 कल क्या होने जा रहा है यह किसी को भी विदित नहीं है। न वैसा कुछ नियति निर्धारण है। मनुष्य स्वयं ही किसी रास्ते का चयन करते हैं, अपने ही पैरों चलते हैं और अपनाये गये मनोरथ के अनुरूप किसी लक्ष्य तक पहुँचते हैं। कौन किस स्तर का चयन करे? किसके पैर किस राह पर चलें, यह उसका अपना फैसला है। दूसरे तो हर बुरे-भले काम में साथ देते और रोक-टोक करते देखे गये हैं। उनमें से किन्हें महत्त्व दिया जाय, किन्हें न दिया जाय, यह फैसला अपना ही होता है।

🔶 यह सोचना व्यर्थ है कि परिस्थितियों या सम्बन्धियों ने उन्हें दबाया और ऐसा करने को विवश किया जैसा कि मन नहीं था। यह बात मात्र दुर्बल मनोबल वालों पर ही लागू होती है। मनस्वी जानते हैं कि कोई किसी को बाधित नहीं कर सकता। मनुष्य की संरचना इतनी दुर्बल नहीं है कि उस पर दूसरों के फैसले लद सकें और अपरिहार्य बन सकें। एक समय की भूल दूसरे समय सुधर भी सकती है। आज की सहमति को कल की असहमति में भी बदला जा सकता है। परिवर्तन काल की उथल-पुथल में कुछ अड़चन असुविधा तो होती है, पर नया रास्ता बन जाने की भी संगति मुड़-तुड़ कर बैठ ही जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Be Determined & Committed.

🔷 Many noble, important and interesting works you have to do after you go back from here but you will not be able to do so because your mind will loosen. To overcome this situation you please prepare an army, a series of thoughts. Thoughts can be cut off by thoughts; one poison can be killed by another poison; throne can be stuck out by another throne. Ill-thoughts that usually trouble you must be countered by an army of opponent thoughts. Good thoughts, noble thoughts too can form a strong army.  
                                         
🔶 If ill-thoughts of avarice, dishonesty and longing come to your mind, you please keep in stand-by position an army of statements of great men their history, health and honesty and say we will use honestly earned money only and not dishonestly earned money. If ill-thoughts of sex, lust and adultery come to your mind, you please again keep in stand-by position an army of good-thoughts like how HANUMAN became a powerful person due to celibacy, how BHISM PITAMAH became an able person due to celibacy. You can remind many such persons from history taking from SHANKERACHARYA to many other saints and noble persons who had once waged war against their ill-thoughts to place their names in history.
                                           
.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 14)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 इसलिए मित्रो! जहाँ कहीं भी क्षमताएँ दिखाई पड़े, प्रतिभाएँ दिखाई पड़ें, वहाँ आप हमारे संदेश वाहक के रूप में जाना और खासतौर से उनसे प्रार्थना करना, अनुरोध करना। पूर्व में मैंने विभूतिवानों को संबोधित किया था और उनका आह्वान किया था कि आपकी जरूरत है। भगवान् ने आपको विशेषताएँ दी हैं, उसकी उसे जरूरत है, लड़ाई, युद्ध का जब वक्त आता है, तो नौजवानों की भरती कंपलसरी कर दी जाती है और जो लोग बुड्ढे होते हैं, उनको छोड़ दिया जाता है।

🔶 कंपलसरी लड़ाई में सभी नौजवानों को, चौड़े सीने वालों को पकड़ लिया जाता है और फौज में भरती कर लिया जाता है। कब? जब देश पर दुश्मन का हमला होता है। मित्रो! उनसे जो नौजवान हैं, प्रतिभावान् हैं, विभूतिवान् हैं, उनसे मेरा संदेश कहना। लेकिन जो व्यक्ति मानसिक दृष्टि से बुड्ढे हो गए हैं, वे जवान हों तो क्या, सफेद बाल वाले बुड्ढे हों तो क्या, हमको उनकी जरूरत नहीं है। क्यों? क्योंकि वे मौत के शिकार हैं। वे इसी के लिए हैं कि जब मौत को चारे की जरूरत पड़े, तो वे उसकी खुराक का काम करें।

🔷 मित्रो! बुड्ढा आदमी कौन? क्या वह जिसके बाल सफेद हो गए हैं? सफेद बालों वाला बुड्ढा होता है कहीं, वह जवान होता है। इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री जिसका नाम चर्चिल था, अस्सी वर्ष का हो गया था और उसकी कमर में दरद रहता था। इंग्लैंड के लोगों ने कहा कि हम अपनी हुकूमत और अपने राष्ट्र की जिम्मेदारी इस आदमी के हाथ में सुपुर्द करेंगे, और वो चर्चिल जो था, जब दिन-रात जर्मनी वाले इंग्लैण्ड के ऊपर बम बरसा रहे थे, तब सारी-की-सारी सत्ता का केन्द्र वही एक आदमी था। बड़ा जबरदस्त आदमी, नौजवान आदमी था। कितने वर्ष का था, अस्सी वर्ष का, जो सारे-के-सारे लोगों से कह रहा था, इंग्लैण्ड के लोगों! घबराने की जरूरत नहीं। भगवान् हमारा सहायक है और हम ऊँचा उठेंगे, आगे बढ़ेंगे और हम फतह करके रहेंगे। हर आदमी के अंदर उसने जिंदगी पैदा की और जोश पैदा किया। वो कौन आदमी था? जवान आदमी था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 50)

👉 मंत्रराज है सद्गुरु का नाम

🔷 गुरुगीता के इन मंत्रों में साधना के कई गम्भीर रहस्य समाए हैं। इन मंत्रों में जिस साधना विधि का सांकेतिक वर्णन है, उसकी विस्तृत चर्चा कई तांत्रिक ग्रन्थों में मिलती है। इसकी विस्तार से विवेचना तो एक अलग लेख की विषय वस्तु बनेगी। जिसे श्रद्धालु शिष्यों के अनुरोध पर फिर कभी दिया जाएगा; परन्तु यहाँ संक्षेप में सद्गुरु नाम के महामंत्र का उल्लेख अवश्य किया जा रहा है। इसे ही भगवान् भोलेनाथ ने परम मंत्र एवं मन्त्रराज कहा है। इस मंत्र का स्वरूप क्या होगा? इस प्रश्न के उत्तर में गुरुभक्त सिद्धजन कहते हैं कि ॐ ऐं (नाम) आनन्दनाथाय गुरवे नमः ॐ, इस प्रकार सद्गुरु के नाम का जप करना चाहिए। इस मंत्र के स्वरूप को अपने गुरुदेव के मंगलमय नाम के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। जैसे अपने गुरुदेव का नाम है ‘श्रीराम’ तो उनके नाम का महामंत्र होगा- ‘ॐ ऐं श्रीराम आनन्दनाथाय गुरवे नमः ॐ’। जो गुरुभक्त हैं, वे प्रतिदिन गायत्री महामंत्र के जप के साथ इस महामंत्र की एक माला का भी जप कर सकते हैं।
  
🔶 अनुभवी साधकों का तो यह भी कहना है कि गायत्री महामंत्र के जप का दशांश गुरु नाम मंत्र का जप करने से गायत्री जप पूर्ण हो जाता है। नियमित साधना करने वाले सूक्ष्मतत्त्व के ज्ञाता साधकों का यह मानना है कि कई बार जन्म-जन्मान्तर के अशुभ कर्मों के कारण गायत्री का जप शीघ्र फलदायी नहीं हो पाता। विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए किए गए अनुष्ठान सफल नहीं होते हैं। इसका कारण केवल इतना ही है कि विगत  जन्मों के अशुभ संस्कार, दुर्लंघ्य प्रारब्ध इसमें बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। इसी वजह से गायत्री महामंत्र के कई अनुष्ठान कर लेने के बावजूद भी पुत्र प्राप्ति की, धन प्राप्ति की कामनाएँ अधूरी रहती हैं। कई बार तो साधक के मन की आस्था घटने लगती है। उसे अविश्वास घेर लेता है। अन्तःकरण में अंकुरित होने वाले सन्देह एवं भ्रम कहने लगते हैं कि कहीं गायत्री साधना के ही प्रभाव में कुछ कमी तो नहीं।
  
🔷 ऐसी स्थिति में सद्गुरु का तपोबल ही सम्बल होता है। जो काम अपने प्रयास, पुरुषार्थ से असम्भव होता है, वह गुरुकृपा से सम्भव होता है। गुरु कृपा ही असम्भव को सम्भव बनाने वाली प्रक्रिया है; पर इसका विधिवत् आह्वान करना पड़ता है। इसे अपने अन्तःकरण में धारण करना पड़ता है। यदि ऐसा किया जा सके, तो दुष्कर और दुरूह प्रारब्ध को भी मोड़-मरोड़ कर अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। सभी तरह की विघ्न-बाधाओं को धूल-धूसरित और धराशायी किया जा सकता है। राह के सभी रोड़े फिर कभी आड़े नहीं आते। असफलता-सफलता में परिवर्तित होती है। खोया आत्मबल फिर से वापस मिलता है।
  
🔶 बस इसके लिए करना इतना ही है कि सन्ध्यावंदन के बाद गायत्री जप करने से पहले एक माला गुरु नाम के महामंत्र का जप करें। फिर इसके बाद गायत्री जप करें और बाद में गायत्री जप का दशांश गुरु नाम मंत्र का जप करें। उदाहरण के लिए यदि तीस माला गायत्री जपी गयी है, तो तीन माला गुरुनाम मंत्र का जप करें। कई तन्त्र ग्रन्थ यह भी कहते हैं कि प्रत्येक दस माला के बाद एक माला गुरु नाम मंत्र का जप किया जा सकता है। कई साधकों ने इस विधि को भी परम कल्याणकारी अनुभव किया है। इस विधि से की गई साधना न केवल लौकिक उपलब्धियाँ एवं सफलताएँ प्रदान करती है; बल्कि अलौकिक आध्यात्मिक सफलताओं के भी भण्डार खोलती है। इस तरह नियमित निरन्तर की गई साधना से साधक को आत्मतत्त्व की अनुभूति होती है। उसका जीवन कृतकृत्य एवं कृतार्थ होता है। गुरुदेव के तपोबल को और अधिक शिष्य कैसे आत्मसात् करें, इसकी चर्चा अगले मंत्रों में की गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 82

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

👉 बेवक़ूफ़ : एक गृहणी

🔶 वो रोज़ाना की तरह आज फिर ईश्वर का नाम लेकर उठी थी। रसोई में आई और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाया। फिर बच्चों को नींद से जगाया ताकि वे स्कूल के लिए तैयार हो सकें।

🔷 कुछ ही पलों मे वो अपने  सास ससुर को चाय देकर आयी फिर बच्चों का नाश्ता तैयार किया और इस बीच उसने बच्चों को ड्रेस भी पहनाई। फिर बच्चों को नाश्ता कराया।

🔶 पति के लिए दोपहर का टिफीन बनाना भी जरूरी था। इस बीच स्कूल का रिक्शा आ गया और  वो बच्चों को रिक्शा तक छोड़ने चली गई।

🔷 वापस आकर पति का टिफीन बनाया और फिर मेज़ से जूठे बर्तन इकठ्ठा किये। इस बीच पतिदेव की आवाज़ आई की मेरे कपङे निकाल दो। उनको ऑफिस जाने लिए कपङे निकाल कर दिए।

🔶 अभी पति के लिए उनकी पसंद का नाश्ता तैयार करके टेबिल पर लगाया ही था की छोटी ननद आई और ये कहकर ये कहकर गई की भाभी आज मुझे भी कॉलेज जल्दी जाना, मेरा भी नाश्ता लगा देना।

🔷 तभी देवर की भी आवाज़ आई की भाभी नाश्ता तैयार हो गया क्या? अभी लीजिये नाश्ता तैयार है। पति और देवर ने नाश्ता किया और अखबार पढ़कर अपने अपने ऑफिस के लिए निकल चले।

🔶 उसने मेज़ से खाली बर्तन समेटे और सास ससुर के लिए उनका परहेज़ का नाश्ता तैयार करने लगी। दोनों को नाश्ता कराने के बाद फिर बर्तन इकट्ठे किये और उनको भी किचिन में लाकर धोने लगी।

🔷 इस बीच सफाई वाली भी आ गयी। उसने बर्तन का काम सफाई वाली को सौंप कर खुद बेड की चादरें वगेरा इकट्ठा करने पहुँच गयी और फिर सफाई वाली के साथ मिलकर सफाई में जुट गयी।

🔶 अब तक 11 बज चुके थे, अभी वो पूरी तरह काम समेट भी ना पायी थी की काल बेल बजी। दरवाज़ा खोला तो सामने बड़ी ननद और उसके पति व बच्चे सामने खड़े थे।

🔷 उसने ख़ुशी ख़ुशी सभी को आदर के साथ घर में बुलाया और उनसे बाते करते करते उनके आने से हुई ख़ुशी का इज़हार करती रही। ननद की फ़रमाईश के मुताबिक़ नाश्ता तैयार करने के बाद अभी वो नन्द के पास बेठी ही थी की सास की आवाज़ आई की बहु खाने का क्या प्रोग्राम हे।

🔶 उसने घडी पर नज़र डाली तो 12 बज रहे थे। उसकी फ़िक्र बढ़ गयी वो जल्दी से फ्रिज की तरफ लपकी और सब्ज़ी निकाली और फिर से दोपहर के खाने की तैयारी में जुट गयी। खाना बनाते बनाते अब दोपहर का दो बज चुके थे।

🔷 बच्चे स्कूल से आने वाले थे, लो बच्चे आ गये। उसने जल्दी जल्दी बच्चों की ड्रेस उतारी और उनका मुंह हाथ धुलवाकर उनको खाना खिलाया। इस बीच छोटी नन्द भी कॉलेज से आ गयी और देवर भी आ चुके थे।

🔶 उसने सभी के लिए मेज़ पर खाना लगाया और खुद रोटी बनाने में लग गयी। खाना खाकर सब लोग फ्री हुवे तो उसने मेज़ से फिर बर्तन जमा करने शुरू कर दिये।

🔷 इस वक़्त तीन बज रहे थे। अब उसको खुदको भी भूख का एहसास होने लगा था। उसने हॉट पॉट देखा तो उसमे कोई रोटी नहीं बची थी।

🔶 उसने फिर से किचिन की और रुख किया तभी पतिदेव घर में दाखिल होते हुये बोले की आज देर हो गयी भूख बहुत लगी हे जल्दी से खाना लगा दो।

🔷 उसने जल्दी जल्दी पति के लिए खाना बनाया और मेज़ पर खाना लगा कर पति को किचिन से गर्म रोटी बनाकर ला ला कर देने लगी।
 
🔶 अब तक चार बज चुके थे। अभी वो खाना खिला ही रही थी की पतिदेव ने कहा की आ जाओ तुम भी खालो। उसने हैरत से पति की तरफ देखा तो उसे ख्याल आया की आज मैंने सुबह से कुछ खाया ही नहीं।
 
🔷 इस ख्याल के आते ही वो पति के साथ खाना खाने बैठ गयी। अभी पहला निवाला उसने मुंह में डाला ही था की आँख से आंसू निकल आये।
 
🔶 पति देव ने उसके आंसू देखे तो फ़ौरन पूछा की तुम क्यों रो रही हो। वो खामोश रही और सोचने लगी की इन्हें कैसे बताऊँ की ससुराल में कितनी मेहनत के बाद ये रोटी का निवाला नसीब होता हे और लोग इसे मुफ़्त की रोटी कहते हैं।
 
🔷 पति के बार बार पूछने पर उसने सिर्फ इतना कहा की कुछ नहीं बस ऐसे ही आंसू आ गये। पति मुस्कुराये और बोले कि तुम औरते भी बड़ी "बेवक़ूफ़" होती हो, बिना वजह रोना शुरू कर देती हो।

🔶 क्या आपको भी लगता है की गृहणी मुफ़्त की रोटिया तोड़ती है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 24 Feb 2018


👉 अपने को पहचानें

🔶 शरीर अनेक सुख-सुविधाओं का माध्यम है, ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा रसास्वादन और कर्मेन्द्रियों के द्वारा उपार्जन करने वाला शरीर ही सांसारिक हर्षोल्लास प्राप्त करता है। इसलिए इसे स्वस्थ, सुन्दर, सुसज्जित एवं समुन्नत स्थिति में रखना चाहिए। इसी दृष्टिï से उत्तम आहार-विहार रखा जाता है, तनिक सा रोग-कष्टï होते ही उपचार कर ली जाती है। शरीर की ज्योति ही मस्तिष्क की उपयोगिता है। आत्मा की चेतना और शरीर की गतिशीलता का भौतिक व आत्मिक समन्वय का प्रतीक है, यह मन मस्तिष्क इसकी अपनी उपयोगिता है। मन की कल्पना, बुद्धि का निर्णय, चित्त की आकांक्षा और अहन्ता की प्रवृत्ति इन चारों से मिलकर अन्त:करण चतुष्टïय बना है।
  
🔷 सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, दीक्षा द्वारा मस्तिष्क को विकसित एवं परिष्कृत करने के लिए हमारी चेष्टïा निरन्तर रहती है क्योंकि भौतिक जगत में उच्चस्तरीय विकास एवं आनन्द उसी के माध्यम से सम्भव है। सभ्य, सुसंस्कृत , सुशिक्षित व्यक्ति ही नेता, कलाकार, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनिरय, वैज्ञानिक, साहित्यकार आदि ही पद प्राप्त कर सकते हैं।
  
🔶 शरीर को समुन्नत स्थिति में रखने के लिए पौष्टिïक आहार, व्यायाम, चिकित्सा, विनोद आनन्द आदि की अगणित व्यवस्थाएँ की गई हैं। मस्तिष्कीय उन्नति के लिए स्कूल, कॉलेज, प्रशिक्षण केन्द्र, गोष्ठिïयाँ, सभाएँ विद्यमान हैं। पुस्तिकाएँ, रेडियो, फिल्म आदि का सृजन किया गया है जिससे कि मस्तिष्कीय समर्थता बढ़े।
  
🔷 मनुष्य का स्थूल कलेवर शरीर और मन के रूप में ही जाना समझा जा सकता है। सो उन्हीं के लिए सुविधा साधन जुटाने में हर कोई जुटा है। यह उचित भी है। इस जगत के लिए जड़ साधनों और चेतन हलचलों को यदि मानवी सुविधा एवं सन्तोष के लिए नियोजित किया जाता है और उसके लिए उत्साहवर्धक प्रयास जुटाया जाता है तो इसमें अनुचित भी क्या हैै?
  
🔶 मनुष्य द्वारा जो कुछ किया जा रहा है, संसार में जो हो रहा है, उसे स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए। यहाँ उसकी निन्दा प्रशंसा नहीं की जा रही है। ध्यान उस तथ्य की ओर आकर्षित किया जा रहा है जो इस सबसे अधिक उत्कृष्टï एवं आवश्यक था उसे एक प्रकार से भुला ही दिया गया। समझ यह लिया गया है कि मनुष्य जो सब कुछ है, वह शरीर और मन तक की सीमित है। इससे आगे, इससे ऊपर और कोई हस्ती नहीं। यदि इससे आगे, इससे ऊपर भी कुछ समझा गया होता तो उसके लिए भी जीवन क्रम में वैसा ही स्थान मिलता, वैसा ही प्रयास होता, जैसा शरीर और मन के लिए होता है, पर हम देखते हैं वह तीसरी सत्ता जो इन दोनों से लाखों, करोड़ों गुनी अधिक महत्त्वपूर्ण है एक प्रकार से उपेक्षित विस्मृत ही पड़ी है और वह लाभ और आनन्द जो अत्यन्त सुखद एवं समर्थ है एक प्रकार से अनुपलब्ध ही रहा है।
  
🔷 रोज ही यह कहा और सुना जाता है कि हमारे शरीर और मन से ऊपर आत्मा है। सत्संग और स्वाध्याय के नाम पर यह शब्द प्रतिदिन आये दिन आँखों और कानों के पर्दों पर टकराते हैं, पर वह सब एक ऐसी विडम्बना बन कर रह जाता है जो मानो कहने-सुनने और पढऩे-लिखने के लिए ही खड़ी की गई हो। वास्तविकता से जिसका कोई सीधा सम्बन्ध न हो। यदि ऐसा न होता तो आत्मा को सचमुच ही महत्त्वपूर्ण माना गया होता। कम से कम शरीर, मन जितने स्तर का समझा गया होता, तो उसके लिए उतना श्रम एवं चिन्तन तो नियोजित किया ही गया होता, जितना कायिक, मानसिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लक्ष्य में तन्मय हो जाइए

🔷 मन बड़ा शक्तिवान है परन्तु बड़ा चञ्चल । इसलिए उसकी समस्त शक्तियाँ छितरी रहती हैं और इसलिए मनुष्य सफलता को आसानी से नहीं पा लेता। सफलता के दर्शन उसी समय होते हैं, जब मन अपनी वृत्तियों को छोड़कर किसी एक वृत्ति पर केन्द्रित हो जाता है, उसके अलावा और कुछ उसके आमने-सामने और पास रहती ही नहीं, सब तरफ लक्ष्य ही लक्ष्य, उद्देश्य ही उद्देश्य रहता है।

🔶 मनुष्य अनन्त शक्तियों का घर है, जब मनुष्य तन्मय होता है तो जिस शक्ति के प्रति तन्मय होता है, वह शक्ति जागृत होती और उस व्यक्ति को वह सराबोर कर देती है। पर जो लोग तन्मयता के रहस्य को नहीं जानते अपने जीवन में जिन्हें कभी एकाग्रता की साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।

🔷 जिन्हें हम विघ्न कहते हैं, वे हमारे चित्त की विभिन्न वृत्तियाँ हैं जो अपने अनेक आकार प्रकार धारण करके सफल नहीं होने देतीं। यदि हम लक्ष्य सिद्ध करना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि लक्ष्य से विमुख करने वाली जितनी भी विचार धारायें उठें और पथ-भ्रष्ट करने का प्रयत्न करें हमें उनसे अपना सम्बन्ध विच्छेद करते जाना चाहिए। और यदि हम चाहें अपनी दृढ़ता को कायम रखें, अपने आप पर विश्वास रखें तो हम ऐसा कर सकते हैं, इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है। एक ऐतिहासिक घटना इस सम्बन्ध में हमें विशेष प्रकाश दे सकती है।

🔶 मन की अपरिमित शक्ति को जो लक्ष्य की ओर लगा देते हैं और लक्ष्य भ्रष्ट करने वाली वृत्तियों पर अंकुश लगा लेते हैं अथवा उनसे अपना मुँह मोड़ देते हैं वे ही जीवन के क्षेत्र में विजयी होते हैं, सफल होते हैं।

🔷 धनुष से छूटा बाण अपनी सीध में ही चलता जाता है, वह आस-पास की किसी वस्तु के साथ अपना संपर्क न रख कर सीधा वहीं पहुँचता है जो कि उसके सामने होती है। अर्थात् सामने की तरफ ही उसकी आँख खुली रहती है और सब ओर से बन्द। इसलिये जो लोग लक्ष्य की तरफ आँख रखकर शेष सभी ओर से अपनी इन्द्रियों को मोड़ लेते है और लक्ष्य की ओर ही समस्त शक्ति लगा देते हैं वे ही सफल होते हैं। उस समय अर्जुन से पूछे गये द्रोण के प्रश्न-उत्तर में अर्जुन की तरह उनकी अन्तरात्मा में एक ही ध्वनि गूँजती है अतः अपना लक्ष्य ही दिखाई देता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 10

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 3)

🔷 जंक्शन पर गाड़ियाँ एक लाइन में खड़ी होती हैं। इनमें से किसे, किस दिशा में दौड़ना है, कहाँ पहुँचना है, इसका निर्धारण प्वाइंटमैन लीवर गिराकर करता है। वह दो पटरियों को इस प्रकार मिला देता है कि गाड़ी की दिशा बन सके और फिर उस पर दौड़ते हुए वह अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सके। एक ही लाइन में खड़ी दो गाड़ियाँ साथ-साथ छूटती हैं, पर उनकी दिशा अलग होने के कारण एक बम्बई पहुँचती है तो दूसरी कलकत्ता। दोनों के बीच भारी दूरी है। यह क्योंकर बन गयी? इसका उत्तर लीवर गिराकर पटरियाँ जोड़ने वाला प्वाइंटमैन हर किसी को आसानी से समझा सकता है कि एक समय के उस छोटे से निर्धारण ने कैसा कमाल कर दिया। यह उदाहरण विचारणा को दिशाधारा मिलने के सम्बन्ध में पूरी तरह लागू होता है।

🔶 मनुष्य जिस भी स्तर की विचारणा अपनाना चाहे, उसे वैसे चयन की परिपूर्ण स्वतन्त्रता है। तर्क और तथ्य तदनुरूप ढेरों इकट्ठे किए जा सकते हैं। मित्र सम्बन्धी साथ नहीं देंगे, परिस्थितियाँ प्रतिकूल बनेंगी, घाटा पड़ेगा और भविष्य अन्धकार से घिरा रहेगा, इस स्तर की निराशाजनक कल्पना के पक्ष में अनेकों तर्क सोचे जा सकते हैं। संगति बिठाने वाले ढेरों ऐसे उदाहरण भी मिल सकते हैं जिनमें कल्पित निराशा का समर्थन करने वाले घटनाक्रम घटित हुए हों। निराशा को अंगीकार करने वाला अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए अनेकानेक कारण ढूँढ़ सकता है। साथ ही जोर देकर कह भी सकता है कि उसने जो सोचा है गलत नहीं है।

🔷 रुख बदलते ही दूसरे प्रकार के तर्कों और उदाहरणों का पर्वत खड़ा हो जायेगा। आशा और उत्साह की उमंगें उठें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास जमे तो फिर उस स्तर के तर्कों की कमी न रहेगी। हेय परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों में से कितनों ने असाधारण प्रगति की और आशाजनक सफलता प्राप्त की है, इसके उदाहरणों से न केवल इतिहास के पृष्ठ भरे पड़ें हैं वरन् वैसे उदाहरणों से अपना समय एवं सम्पर्क क्षेत्र भी सूना नहीं मिलेगा। वैसा अपने लिए क्यों नहीं हो सकता? जो काम एक कर सका उसे दूसरा क्यों नहीं कर सकता? इस प्रकार के विधेयक विचारों का सिलसिला यदि मनःक्षेत्र में चल पड़े, तो न केवल वैसा विश्वास बँधेगा वरन् प्रयत्न भी चल पड़ेगा और यह असम्भव न रहेगा कि उत्कर्ष की जो साध संजोयी थी वह समयानुसार पूरी होकर न रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 God among Sufferers

🔶 "Where can I find God?", asked a young man. And saint Namdev said," Come with me in the evening. I shall show you God right before your eyes." The young man waited impatiently. In the evening the saint took him to a hutment and stood in front of a poor old man's hut. They went inside the hut. There on a tattered bed lay a frail sick child whose mother has passed away. He had been diagnosed with T.B. Saint Namdev gave him medicine, attended to him and caressed him. When leaving, the saint promised the boy that he will visit him again the next day.
                                      
🔷 "We have spent the entire evening", said the young man, "where is the God you promised me to show?" And the saint replied, "Oh! Didn't you see Him? That poor sick child was God himself!" Now, the young man understood that serving the humanity is the real worship of God.
                                           
📖 From Pragya Puran