सोमवार, 30 अप्रैल 2018

👉 बोध कथा

👉 गुरु-कृपा

🔶 सन्तों की अपनी ही मौज होती है! एक संत अपने शिष्य के साथ किसी अजनबी नगर में पहुंचे। रात हो चुकी थी और वे दोनों सिर छुपाने के लिए किसी आसरे की तलाश में थे। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया, वह एक धनिक का घर था और अंदर से परिवार का मुखिया निकलकर आया। वह संकीर्ण वृत्ति का था, उसने कहा - "मैं आपको अपने घर के अंदर तो नहीं ठहरा सकता लेकिन तलघर में हमारा स्टोर बना है।

🔷 आप चाहें तो वहां रात को रुक सकते हैं, लेकिन सुबह होते ही आपको जाना होगा। " वह संत अपने शिष्य के साथ तलघर में ठहर गए। वहां के कठोर फर्श पर वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि तभी संत को दीवार में एक दरार नजर आई।

🔶 संत उस दरार के पास पहुंचे और कुछ सोचकर उसे भरने में जुट गए। शिष्य के कारण पूछने पर संत ने कहा-"चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " अगली रात वे दोनों एक गरीब किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।

🔷 किसान और उसकी पत्नी ने प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उनके पास जो कुछ रूखा-सूखा था, वह उन्होंने उन दोनों के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें सोने के लिए अपना बिस्तर दे दिया। किसान और उसकी पत्नी नीचे फर्श पर सो गए।

🔶 सवेरा होने पर संत व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मरा पड़ा था। यह देखकर शिष्य ने संत से कहा- 'गुरुदेव, आपके पास तो कई सिद्धियां हैं, फिर आपने यह क्यों होने दिया?

🔷 उस धनिक के पास सब कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी मदद की, जबकि इस गरीब ने कुछ ना होने के बाद भी हमें इतना सम्मान दिया फिर भी आपने उसके बैल को मरने दिया।

🔶 " संत फिर बोले-'चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं। " उन्होंने आगे कहा- 'उस धनिक के तलघर में दरार से मैंने यह देखा कि उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था।

🔷 चूंकि उस घर का मालिक बेहद लोभी और कृपण था, इसलिए मैंने उस दरार को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण भंडार उसके हाथ ना लगे। इस किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर सोए थे। रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने रोक दिया।

🔶 चूंकि वे खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण ले जाने के लिए कहा। यह सुनकर शिष्य संत के समक्ष नतमस्तक हो गया।

🔷 ठीक इसी तरह गुरु की कृपा वह नहीं है जो हम चाहते बल्कि गुरु-कृपा तो वह है जो गुरुदेव चाहते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 30 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30April 2018



👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 3)

👉 इन तीनों को त्याग दीजिए- कुढ़ना, बकझक और हँसी मजाक।

🔶 (1) कुढ़ना एक भयंकर मानसिक विकार है। इससे मनुष्य की शक्ति का ह्रास, चिंता और व्यग्रता में वृद्धि होती है। निश्चयबल का क्षय होता है और अपने प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। कुढ़ने का अभिप्राय है हीनत्व की भावना से ग्रसित होना। यह उसी की प्रतिक्रिया है। मनुष्य के किए जब कुछ नहीं होता, तो वह कुढ़ता है। यही मानसिक व्याधि विकसित होने पर नैराश्य का रूप धारण कर लेती है।

🔷 (2) व्यर्थ की बकझक से मनुष्य का थोथापन प्रकट होता है। बातूनी व्यक्ति जबानी जमा खर्च में चतुर होता है, ठोस कर्म कम करता है क्योंकि बकझक ही में शक्ति नष्ट हो जाती है।

🔶 (3) अनियंत्रित हँसी मजाक आत्मिक दृष्टि से गर्हित है। गन्दा हँसी मजाक कटुता का रूप धारण कर लेता है। इससे मनुष्य की गुप्त वासना का पर्दाफाश होता है। अतः इन तीनों को-कुढ़ना, व्यर्थ की बकझक और अनियंत्रित हँसी मजाक की अधिकतर आदतों को त्याग देना उचित है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

👉 Atma Sadhana

🔶 Musicians do not become expert in either vocal or instrumental music in a day. They have to make a persistent effort. In the absence of practice, the voice of a vocalist sounds erratic and jarring and the fingers of an instrumentalist lack coordination. A true artist remains indifferent both to the reaction of the audience and to the remuneration paid to him.  He feels contented with the joy derived from his daily sadhana of music.

🔷 A true devotee of art would maintain his inner peace even if he does not get any immediate and tangible reward or recognition for his art.  He would continue to do his sadhana of music without any lessening of interest, even though he may have to dwell in a hut in a remote forest. The mental make up of a person practicing Atma sadhana should have at least this much dedication and commitment. Dancers, actors, sculptors, etc. know the importance of daily practice to maintain their art. Soldiers participate compulsorily in routine parades to maintain their skills of marksmanship and fighting.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 जीवन में विकास कीजिए:-

🔶 आपका शरीर प्रतिदिन विकसित हो रहा है। प्रत्येक दिन शरीर में नए रक्त, मज्जा, तन्तुओं का विकास हो रहा है पर खेद है कि शारीरिक अनुपात में मानसिक और आध्यात्मिक विकास नहीं हो रहा। आपका शरीर बड़ा होता जा रहा है किन्तु मन बच्चों जैसा अविकसित ही पड़ा है। उसमें उन तत्वों का विकास नहीं हुआ, जिनसे मनुष्य पूर्णता प्राप्त करता है।

🔷 मन विकसित हुआ या नहीं, यह जानने के लिए निम्न प्रश्नों का उत्तर दीजिए:-

🔶 1. क्या आप आत्मनिर्भर हैं, या हीनता के भाव को, लोगों से बात करते या व्यवहार करते हुए अनुभव करते हैं?

🔷 2. मन की शान्ति या उत्साह के लिए आप दूसरों के विचारों और मन्तव्यों पर कहाँ तक निर्भर रहते हैं? दूसरों के कुत्सित संकेत क्या आपको पस्त हिम्मत कर देते हैं या आप बिना उनकी परवाह किए अविचल भाव से अपने कर्तव्य-पथ या निर्दिष्ट मार्ग पर आरुढ़ हैं?

🔶 3. क्या आप मिथ्या घमंड, अहंकार या दूसरों की तारीफ के आदी बन गये हैं? बच्चे प्रायः जरा सी तारीफ से प्रसन्न हो उठते हैं, तनिक सी कठोर बात से विक्षुब्ध हो उठते हैं। क्या आप भी अपने को इसी श्रेणी में रक्खे हुए है? क्या दूसरों की झूठी तारीफ का जादू आप पर चलता है? यदि चलता है तो आप अभी अविकसित ही हैं।

🔷 4. क्या आप अपनी पोशाक की बहुत देखभाल रखते हैं? बाहर से शृंगार बनाकर अंदर का खोखलापन छिपाना चाहते हैं? क्या आपको आभूषणों, फेस पाउडर, रोज हजामत, टीप-टाप का शौक अभी तक बना हुआ है? क्या आप बच्चों की तरह अब भी चटकीले, रंग बिरंगे वस्त्र पहनने के आदी हैं?

🔶 5. जिह्वा के स्वाद में, स्वादिष्ट मिष्ठान्न और मेवे पकवान चाट पकौड़ी बीड़ी पान क्या इनमें आपको रुचि है? यदि हाँ, तो आप अभी रुचि में परिष्कार नहीं हुआ है। परिपक्वता और विकास इस दिशा में नहीं हुए हैं।

🔷 ऊपर लिखे हुए प्रश्नों पर विचार कीजिए। इनसे आपको अपने रुचि परिष्कार एवं विकास का कुछ ज्ञान होगा।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 4)

🔶 The parjanya generated by Yajna augments the level of prana in the air. This effect is dense around the Yajnasala (the area where is Yajna performed) but is also prevalent in the wider space and continues to expand with the flow of air with the process of Yajna. If we pour some oil drops in a pot containing water, the oil separates itself from water and spreads on the surface of water. In a similar way, the energy of Yajna expands all around in the open space. Its prana, its essence, its energy, is also present in the water contained in the clouds.

🔷 This is showered in the form of rain and thus gets absorbed in the soil, crops and vegetation. The soil irrigated by it is found to be more fertile and the grains, fruits and vegetables grown there are tastier and have higher nutrition. The milk of the cows, which graze the grass grown on such lands, is also of excellent quality. Drinking the milk and eating the fruits and vegetables energized by Yajna increases our stamina, resistance against infections and diseases, and mental astuteness.

🔶 In fact the cosmic flow of prana is omnipresent in the subliminal realms of Nature. It enables all activities, movements and evolution of living beings. All creatures possess prana and therefore they are called prani. Prana is the source of our vital strength. If it were present in substantial amount in the body, a visibly lean and skinny person would be very strong and healthy (e.g. Mahatma Gandhi).

🔷 Its elevated levels are expressed in mental radiance, intellectual sharpness and talents. Its reduction on the contrary would turn a physically robust person rather weak, lethargic and dull. Reduction of this subtle energy in plants and trees would diminish the shining beauty of flowers, and nutrient quality of fruits, vegetables and grains. Decreased levels of prana in the air, despite the presence of substantial amounts of oxygen, would lessen its vitality. Even deep breathing of this otherwise ‘fresh’ air would not have the desired healthy effects. People living at such places are found to lack vital strength, immunity and mental sharpness. The parjanya extracted by Yajna compensates for these deficiencies.
📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 5)

🔶 यह नारकीय स्थिति है। भीतर से आत्म प्रताड़ना और बाहर से भर्त्सना जिस पर बरसती है उसे साक्षात् नरकवासी कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक रोगों से उद्विग्न रहने वाले नरक ही भोगते हैं। लोक-लोकांतरों में नरक है या नहीं। कुम्भीपाक, वैतरणी आदि का अस्तित्व है या नहीं। इस विवाद में पड़े बिना इतने से भी काम चल सकता है कि जो अपनी शांति और प्रतिष्ठा गँवा बैठा उसके लिए मानव जीवन की सरसता कोसों पीछे रह गयी।

🔷 सरकार को चकमा देकर राज दण्ड से बचा जा सकता है। समाज की आंखों में भी धूल झोंकी जा सकती है। पर आत्मा की अदालत ऐसी है जिसने सब कुछ देखा सुना है उसके दण्ड से छुटकारा पा सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। यहाँ देर तो है पर अन्धेर नहीं है। मनुष्य के लिए थोड़े से दिन का विलम्ब ही उसकी आस्था डगमगा देता है, पर तत्वज्ञानियों की दृष्टि से यह जीवन असीम और अनन्त है।

🔶 एक जन्म का समय बीतना उसके लिए एक रात की निद्रा लेकर नये प्रभात पर फिर उठने के समान है। आज का लिया कर्ज परसों चुकाने की शर्त पर मिल गया है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सदा के लिए मुफ्त में मिल गया और फिर कभी वह देना न पड़ेगा। बहुत से लोग जन्म से ही अन्धे, अपंग उत्पन्न होते हैं। कइयों की प्रतिभा जन्म से ही ऐसी अद्भुत होती है कि दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इसे पूर्व संचित संस्कारों का प्रतिफल कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 34


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.34

👉 गुरुगीता (भाग 98)

👉 गुरूकृपा गृहस्थ को भी विदेह बना देती है

🔶 गुरूगीता के महामंत्रों में साधक, साधना एवं सिद्धि तीनों का तत्त्वबोध पिरोया है। इन मंत्रों में बार- बार चेताया गया है कि शिष्य- साधक क्या करें? किसी मंत्र को दुहराने वाले अथवा ध्यान के लिए गुम- सुुम बैठे रहने वाले को न तो शिष्य कहते हैं और साधक। शिष्य और साधक तो किसी की समूची जीवनचर्या, जीवनशैली और जीवन दृष्टि का नाम है। यह सत्य जहाँ है, वहीं शिष्यत्व है। अपने कान में मंत्र सुनने वाले को शिष्य नहीं कहते। दीक्षा के कर्मकाण्ड भर से किसी को शिष्यत्व उपलब्ध नहीं होता। यह उपलब्धि तो बलिदानी भावना एवं समर्पण की सतत साधना से हुआ करती है, जिसके अन्तःकरण में यह घटना घट चुकी है अथवा घटित हो रही है- समझो वही शिष्यत्व का उदय हो रहा है। वहीं पर एक साधक का व्यक्तित्व अपना आकार पा रहा है।

🔷 यही स्थिति साधना की है। साधना मन अन्तःकरण एवं जीवन के परिष्कार का नाम है, फिर वह चाहे कैसे भी हो। चाहे इसके लिये कोई मंत्र जपना पड़े या फिर किसी सेवाकर्म में लगना पड़े। किस मंत्र का जप करना साधना है? अथवा ध्यान की किस प्रक्रिया को करना साधना है? ये सभी सवाल अर्थहीन हैं। सब सही है कि अपने सद्गुरू उपदेश के अनुसार, उनके आदेश के अनुसार जीवन जीने की साधना कहते हैं। फिर वह चाहे कितना ही अटपटा क्यों न हो। देवर्षि नारद के उपदेश से मरा- मरा जपने वाले क्रूरकर्मा रत्नाकर महर्षि वाल्मिकी ही गये। गुरू के आदेश के अनुसार जीवन जीने की परिणति उनके जीवन में साधना की चरम सफलता के रूप में साकार हुई।

🔶 इसी तरह से सिद्धि व्यक्तित्व की विराट् में विलीनता है। अहंता का, वैभव का अपने सद्गुरू में विसर्जन है। व्यक्तित्व की सर्वमयता ही साधक और उसकी साधना की चरम उपलब्धि है। जिसे यह स्थिति हासिल हो सकी- समझो उसी की साधना सफल हुई। उसी को सिद्धि ने दर्शन दिये। उसी को तत्त्वबोध प्राप्त हुआ, उसी को मुक्ति मिल सकी। गुरूगीता के पिछले क्रम में इसी रहस्य को भगवान् भोले नाथ ने माँ जगदम्बा को समझाया है। इसमें उन्होंने कहा था- हे महादेवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है ऐसा कहते हैं। जो पिण्ड से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हुआ, उसी को मुक्त कहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 150

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

👉 मान बड़ाई का परित्याग

🔷 स्वामी रामतीर्थ की विद्वत्ता तथा ओजस्वी वाणी से प्रभावित होकर अमेरिका की 18 युनिवर्सिटियों ने मिलकर उन्हें एल. एल. डी. की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। जिस उन्होंने सधन्यवाद अस्वीकार करते हुए कहा स्वामी और ‘एम. ए.’ ये दो कलंक पहले ही नाम के आगे पीछे लगे हुए है अब तीसरे कलंक को कहाँ रखूँगा?

🔶 यश कीर्ति, लोकेषणा, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, पूजा, मान बड़ाई के फेर में पड़कर सत्ता और लोक सेवियों का अहंकार उभरता है। इसलिए सच्चे सत मान बड़ाई से सदा बचते रहते है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 पक्का बनना कच्चा मत रहना

🔷 एक बार एक साधक ने अपने गुरुदेव से पुछा की गुरुदेव हम पक्के साधक कैसे बने! गुरुदेव ने शिष्य को एक कहानी सुनाई

🔶 एक नगर मे एक सेठ जी की हलवाई की दुकान थी वहाँ कई लोग काम करते थे! उस नगर मे हलवाई तो बहुत थे पर प्रतिस्पर्धा बहुत थी इसलिये जो भी सेठ के यहाँ नौकरी करता वो बड़ी सावधानी से चलता था की कही गलती हुई तो सेठ जी तत्काल नौकरी से बाहर कर देते!

🔷 एक बार हलवाई के साथ एक छोटा बालक दुकान पर आ गया हलवाई हलवा बना रहा था बालक आकर हलवाई से पूछे की हलवा बन गया हलवाई ने कहा ठहरो अभी, थोड़ी देर बाद बनेगा फिर थोड़ी देर बाद वो वापिस आया और पूछे की हलवा बन गया तो हलवाई ने कहा ठहरो अभी!

🔶 थोड़ी देर बाद फिर आकर पूछे हलवाई जी खुशबू तो आ रही है हलवा बन गया क्या? हलवाई को जब बार बार परेशान किया तो हलवाई ने कहा की खुशबू आ रही है तो ले खा! और उसे हलवा रखा पर उसने कहा की ये तो अच्छा नही लग रहा है हलवाई जी ने कहा अच्छा नही लग रहा है तो चुपचाप बैठ जाओ और थोड़ा इंतजार करो!

🔷 थोड़ी देर बाद हलवाई ने पुनः उसे हलवा रखा तो इस बार वो खुशी से उछल पड़ा अब बहुत अच्छा लगा! बालक ने हलवाई से पुछा की हलवाई जी अब ये अच्छा कैसे लगा? और पहले क्यों नही लगा?

🔶 तो हलवाई जी ने उसे बड़े प्यार से समझाया बेटा पहले ये कच्चा था इसलिये अच्छा नही लगा अब ये पक गया इसलिये अब ये अच्छा लग रहा है! फिर बालक ने पूछा की इसे आग से नीचे क्यों उतारा है? तो हलवाई ने उसे प्यार से समझाया बेटा अब ये पक गया इसलिये इसे नीचे उतार दिया गया!

🔷 इतने मे एक मजदूर ने आकर हलवाई जी से कहा की हलवाई जी आपने दुध को गरम नही किया इसलिये वो सारा दुध फट गया! और इतने मे सेठ जी आ गये और वो बड़ा नाराज हुये और चिल्लाने लगे उसे नौकरी से बाहर निकालने लगे पर हलवाई गिड़गिड़ाया सेठ जी आप जो चाहो वो सजा दे दो पर नौकरी से मत निकालो कल मेरी सगाई है यदि आपने नौकरी से बाहर निकाल दिया तो सगाई टूट जायेगी!

🔶 फिर सेठ जी ने दया तो की पर दंड के तौर पे एक महीने की पगार काट ली!

🔷 गुरुदेव ने अपने शिष्य को आगे समझाते हुये कहा की कच्चे दूध को गर्म नही करोगे तो फट जायेगा! हलवा कितना भी मीठा क्यों न हो उसमे कितना भी घी क्यों न हो पर यदि कच्चा है तो कोई मतलब नही! कच्ची सगाई कभी भी टूट सकती है, कच्ची नौकरी मे हमेशा एक तनाव रहता है की कभी भी बाहर हो सकते है!

🔶 अरे साधक बनो तो पक्का बनना कच्चा मत रहना और पक्का साधक बनने के लिये रोज साधना और सत्संग करना! हॆ वत्स साधक वही जो हर पल सावधान रहे! हे वत्स माया बड़ी ठगनी है जिस तरह से रोटी पकने के बाद आग से उतारी जाती है और जब वो पक जाती है तभी वो मूल्यवान है कच्ची रोटी नही खाई जा सकती है!

🔷 उसी तरह जब तक साधक आग पर न जल जायें अर्थात मृत्यु को प्राप्त न कर ले तब तक उसे हर क़दम पर सावधानी बरतनी पड़ती है! इसलिये सावधान वत्स सावधान साधक का पहला कर्तव्य की वो हर कदम पर सावधान होकर चले!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 April 2018


👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 2)

🔷 इन तीनों को झिड़को :- निर्दयता, घमण्ड और कृतघ्नता-

🔶 ये मन के मैल हैं। इनसे बुद्धि प्राप्त करने में फंस जाती है। निर्दयी व्यक्ति अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता।

🔷 घमण्डी हमेशा एक विशेष प्रकार के नशे में मस्त रहता है, धन, बल, बुद्धि में अपने समान किसी को नहीं समझता। कृतघ्न पुरुष दूसरों के उपकार को शीघ्र ही भूल कर अपने स्वार्थ के वशीभूत रहता है। वह केवल अपना ही लाभ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ-पंक में कलुषित रहता है।

🔶 दूसरे के किए हुए उपकार को मानने तथा उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने में हमारे आत्मिक गुण-विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रकट होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

👉 आपका जीवन किधर जा रहा है?

🔷 मानवी जगत् में आकर आपने क्या किया है? क्या कोई ऐसा कार्य किया है जिससे आपको मनः शान्ति का चरम सुख प्राप्त हो? क्या आपकी मनोवृत्ति सात्विक वस्तुओं पर एकाग्र होती है, या वह अब भी निंद्य एवं वासनामय पदार्थों की ओर मारी-मारी फिरती है? संसार में जिन दो स्थानों पर रह कर आपको आत्म विकास करना पड़ा, उन स्थानों पर रह कर क्या आपने कुशलता और चातुर्य का परिचय दिया है? क्या आप उस परिपक्वता में आ गये हैं कि आपकी राय दूसरे लेते हैं? निर्णय करते समय क्या भावावेश, या जल्दबाजी में आ जाते हैं, या ‘करूं या न करूं’ की स्थिति में पड़े रहते हैं? जीवन में क्या आपके कोई निश्चित या अनिश्चित उद्देश्य हैं? उस तक पहुँचने के लिए क्या आपने कुछ प्रयत्न किया है?

🔶 एक संतुलित और विवेकशील व्यक्ति के मन में इस प्रकार के अनेक प्रश्न आते हैं। वासना या क्षणिक आवेश से मुक्त होकर जब वह जीवन की जटिलताओं पर विचार करता है, तो उसे ज्ञान होता है कि वास्तव में अभी उसमें कुछ नहीं किया है। यों ही निरुद्देश्य जीवन-यात्रा चली जा रही है।

🔷 यह अनिश्चित प्रवृत्ति मानव की सबसे बड़ी निर्बलता है। मनुष्य अपने आपको बड़ा बुद्धिमान समझता है किन्तु वास्तव में उसके जीवन का 50 प्रतिशत जीवन यों ही आलस्य और बेकारी में नष्ट होता है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 13

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 3)

🔷 Scientific aspects of Yajna
The four Vedas signify the philosophy of the eternity and absolute compatibility of Gayatri and Yajna in the divine creations.  Further, the Atharvaveda also deals with the sound therapy aspects of the mantras. They can be used for the treatment of the ailing human system at the physical, psychological and spiritual levels. The Samaveda focuses on the musical chanting patterns of the mantras and the subtle form of Yajna by defining the latter as the process of mental oblation on the surface of internal emotions through the cosmic radiations of the omnipresent subtle energy of sound. The Yajurveda contains the knowledge of the principles and the methods of performing Yajnas as a part of the spiritual and scientific experiments for global welfare.

🔶 The effects of Yajna include treatment of various diseases and the removal of atmospheric pollution (discussed in detail in the coming issues). Another prominent effect is parjanya.

🔷 Parjanya implies sublime showers of vital energy and spiritual strength from the cosmic layers (higher space). As the natural fertilizers add to the fertility of soil, the unique confluence of the power of mantra, thermal force and sublimated herbal energy in Yajna increases the vital energy (prana) in the atmosphere while purifying the air. This prana is inherent in the air. The sadhaka, having prepared himself through pranayama is able to inhale this parjanya along with oxygen through inner determination (sankalpa). The flow of fresh air in the morning is found be rich in pr³ña. The larger the scale of Yajnas and the longer their duration, the greater would be these effects.    

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 4)

🔷 कुकर्मों की आदत डालते ही अपने भीतर एक असुर उत्पन्न होता है। स्वाभाविक प्रकृति दैवी है। जगह एक के रहने लायक ही है पर मनःक्षेत्र में दो व्यक्तित्व परस्पर विरोधी प्रकृति के घुसते हैं तब निरन्तर संघर्ष करते हैं। देवासुर संग्राम की स्थिति बना देते हैं। एक आगे धकेलता है दूसरा पीछे घसीटता है। दो साँड जिस खेत में लड़ते हैं उसकी हरी-भरी फसल को रौंद कर रख देते हैं। कोई उपयोगी सामान उधर रखा हो वह भी बिखर जाता है। एक म्यान में दो तलवारें ठूंसने पर म्यान फटता है और तलवारों को भी खरोंच आती है। दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्व गढ़ लेने पर उनका द्वन्द्व युद्ध देखते ही बनता है। आत्म हनन इसी स्थिति को कहते हैं।

🔶 संसार में पागलपन तेजी से बढ़ रहा है। आँकड़े बताते हैं कि शारीरिक रोगियों की तुलना में मानसिक रोगियों की संख्या कई गुनी है। सनकी एवं अर्ध विक्षिप्तों की संख्या गिनी जाय और उनके द्वारा हानियों का लेखा जोखा लगाया जायेगा तो प्रतीत होगा कि मानव समाज की सबसे बड़ी समस्या यही है। गरीबी से भी बड़ी। गरीब की समझदारी तो कायम रहती है पर अधपगले तो आये दिन ऐसा सोचते और करते रहते हैं जिससे उन्हें स्वयं भी नहीं, मित्र-शत्रुओं, परिचितों तक को पग-पग पर त्रास सहने पड़ें।

🔷 मनोविज्ञान शास्त्र में मस्तिष्क की श्रेष्ठता को खा जाने वाला दो व्यक्तित्वों का उपजना, परस्पर अन्तर्द्वन्द्व करना ही प्रधान कारण है। यह दूसरा असुर अपने ही अचिन्त्य चिन्तन और कुकर्म करने से उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो सदा बेचैन रहते ही हैं, जिनके भी संपर्क में आते हैं उन्हें भी सताते रहते हैं। कुकर्मी, दुर्व्यसनी भी होते हैं। उन्हें नशेबाजी, व्यभिचार, चोरी, छल, ठगी, शेखीखोरी जैसी कितनी ही कुटेवें पीछे लग लेती हैं। और उनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थिति दयनीय बना देती हैं। ऐसे लोगों पर से दूसरों का विश्वास उठ जाता है। अविश्वासी के साथ कोई आदान-प्रदान नहीं करता। सहयोग देना तो दूर। साथियों का अविश्वास पात्र बना हुआ व्यक्ति मरघट के भूत की तरह एकाकी रह जाता है। समय पर काम आने वाला उसका एक भी मित्र नहीं रहता। चाटुकार ही स्वार्थ सिद्धि के लिए पीछे लगे रहते हैं और जब उन्हें उसमें कमी दिखती है तो छिटक कर अलग हो जाते हैं। यह हानि साधारण नहीं समझी जानी चाहिए, व्यक्तित्व गँवा बैठने के उपरान्त फिर आदमी के पास बचता ही क्या है। वह जीवित रहते हुए भी मृतकों में गिना जा सकता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.33

👉 गुरुगीता (भाग 98)

👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति

🔷 कुण्डलिनी के जागृत होते ही कीचड़ धुलने लगती है, कुसंस्कारों की काई छटने लगती है और तब उसे अनुभव होता है कि देह से परे भी उसकी सत्ता है। इस तरह ऐसा साधक कुण्डलिनी के जागरण एवं ऊर्घ्वगमन के साथ ही पिण्ड से मुक्त हो जाता है; परन्तु यह मुक्ति का पहला चरण है। इसके आगे की यात्रा तब सम्भव होती है, जब वह पद को पहचानता है। प्राण रूप हंस की सूक्ष्मताओं एवं विचित्रताओं से परिचित होता है। देह में जितने बन्धन है, वे सब के सब स्थूल हैं, परन्तु प्राण की प्रकृति देह की तुलना में सूक्ष्म है। इस प्राण को भलीभाँति जान लेने पर, इसे अपनी साधना से स्थिर कर लेने पर उसे पद मुक्ति के रूप में मुक्ति के दूसरे चरण का अनुभव होता है।

🔶 इस अवस्था में पहुँचे हुए योगी को वासनाएँ नहीं सताती, कुसंस्कारों की कीचड़ उसे कलुषित नहीं करती। वह भय से सर्वथा मुक्त हो जाता है। परन्तु यहीं से उसके जीवन में ऋद्धियों का, सिद्धियों का सिलसिला प्रारम्भ होता है। परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को परिष्कृत प्राण एवं पारदर्शी मन उसमें अनेक अलौकिक विभूतियों को जन्म देते हैं। हालाँकि इसमें स्थूल जैसा कुछ भी नहीं होता। परन्तु इनके प्रयोग एवं परिणाम से सूक्ष्म अभिमान तो जगता ही है। इनसे छुटकारा इतना आसान नहीं है। यह तो योग साधक को के वल आत्म साक्षात्कार के बाद ही उपलब्ध होता है।

🔷 किन्तु यह तभी होता है, जब इसे बिन्दु रूप आत्मज्योति का दर्शन हो। यह दर्शन ही आत्म साक्षात्कार है। जो योग साधक इस आत्मरूप का साक्षात्कार करता है, वही मुक्ति के अगले चरण यानि कि रूप मुक्ति का आनन्द उठा सकता है। योग साधक की यह अवस्था पूर्णतः द्वन्द्वातीत होती है। न यहाँ सुख होता है और न दुःख। किसी तरह के सांसारिक- लौकिक कष्ट उसे कोई पीड़ा नहीं देते। गुण गुणों में बसते हैं, इस सत्य का अनुभव उसे इसी अवस्था में होता है। उपनिषदों में इसी को अंगुष्ठ मात्र आत्मज्योति का साक्षात्कार कहा गया है। इस ज्योति के दर्शन मात्र से योग साधक को स्वयं का ज्ञान एवं आत्मरूप में स्थिति की प्राप्ति हो जाती है। इस अवस्था का सच एक ऐसा सच है, जिसे अवुभवी ही जानते हैं। वही इसका सुख एवं आनन्द भोगते हैं।

🔶 मुक्ति की यह अवस्था पाने के बाद भी भेद बना रहता है। जीव सत्ता एवं परमात्म सत्ता के बीच पारदर्शी दीवार बनी रहती है। कुछ वैसा ही, जैसा कि लैम्प की ज्योति एवं देखने वाले के बीच शीशा आ खड़ा होता है। देखने वाला ज्योति को देखता है, परन्तु इसे छू नहीं सकता, इसमें समा नहीं सकता। कुछ इसी तरह आत्मज्योति में स्थिर हो जाने के बाद जीव सत्ता को परमात्मा की अनुभूति तो होने लगती है, परन्तु भेद करने वाली पारदर्शी दीवार नहीं ढहती। यह अवस्था आनन्ददायक होते हुए भी बड़ी पीड़ादायक एवं तड़पाने वाली है।

🔷 अनुभवी जनों को ही इसका अनुभव होता है। इस पारदर्शी दीवार को भेदना किसी साधनात्मक पुरूषार्थ से सम्भव नहीं है। कोई भी योग साधना, किसी तरह की तकनीक से यह कार्य नहीं हो सकता। इसके लिए तो बस भक्त की पुकार और भगवान् की कृपा का मेल चाहिए। शिष्य की तड़पन एवं सद्गुरु की कृपा से ही यह दीवार ढहती है- गिरती है। बड़ी कठिन एवं मार्मिक बात है यह ।। जो यहाँ लिखा और कहा जा रहा है, उसे पता नहीं कौन किस तरह से समझ सकेगा। पर यही सच है, यही सच है। जिसे अपने गुरू की यह कृपा मिल जाती है, उसी को रूपातीत निरूपित हो जाता है। यही सम्पूर्ण मुक्ति है। सद्गुरू की अपने शिष्य पर अनूठी कृपा है। इस कृपा को पाने वाला कौन होता है? इसे भगवान् सदाशिव अगले क्रम में बताते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 148

👉 जीवन का एक रहस्य.....

🔶 एक औरत बहुत महँगे  कपड़ो में अपने मनोचिकित्सक के पास जाती है और उसे कहती है कि उसे लगता है कि उसका पूरा जीवन बेकार है, उसका कोई अर्थ नहीं है। वे उसकी खुशियाँ ढूँढने में मदद करें।

🔷 मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला - "मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।"

🔶 तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा, कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी - "मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसेमें मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था।

🔷 मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी। तब एक दिन, एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा।

🔶 उस दिन बहुत महीनों बाद मैं मुस्कुराई । तब मैंने सोचा अगर इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है, तो हो सकता है दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी, जो कि बीमार था, उसके लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।

🔷 हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी। आज, मैं किसी को नहीं जानती जो मुझसे बेहतर खाता-पीता हो और चैन से सोता हो। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को ख़ुशी देकर।

🔶 यह सब सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती। हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।

ख़ुशी मंजिल नहीं, यात्रा है..,वह कल नहीं, आज है..
निर्भरता नहीं, निर्णय है..,यह नहीं कि हम कौन है,
अपितु हमारे पास क्या है

👉 इन तीन का ध्यान रखिए (भाग 1)

🔶 उत्पादन की जड़:- इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये- अपना क्रोध, अपनी जिह्वा और अपनी वासना। ये तीनों ही भयंकर उत्पादक की जड़ हैं।

🔷 क्रोध:- क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करने तक नहीं रुकता। ऊटपटाँग बक जाता है और बाद में हाथ मल मल कर पछताता है।

🔶 स्वाद:- जीभ के स्वाद के लालच में भक्ष्य अभक्ष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खा खाकर अपनी पाचन शक्ति सदा के लिये नष्ट कर डालते हैं।

🔷 सबसे बड़े मूर्ख वे हैं जो अनियंत्रित वासना के शिकार हैं।  विषय-वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो होता ही है, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग विलासी पुरुष को घृणा की दृष्टि से अवलोकता है। गुरुजन उसका तिरस्कार करते हैं। ऐसे पापी मदहोश को स्वास्थ्य लक्ष्मी और आरोग्य सदा के लिये त्याग देते हैं। इन तीनों ही शत्रुओं पर पूरा पूरा नियंत्रण रखिये।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 13

👉 आज का सद्चिंतन 28 April 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 April 2018


👉 त्यागमय जीवन

🔶 महात्मा ईसा ने अपने शिष्यों से कहा था कि-“जो बहुत जोड़ता है वह बहुत खोयेगा। जो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहता है वह सब कुछ छोड़कर मेरे साथ चले।” भगवान बुद्ध ने राज सिंहासन छोड़ा था पर वे किसी प्रकार घाटे में नहीं रहे। राजा विश्वामित्र से महर्षि विश्वामित्र का पद ऊंचा था, बैरिस्टर गाँधी से महात्मा गाँधी कुछ बुरे नहीं रहे। अकबर का दरबारी प्रताप सिंह बनने की अपेक्षा जंगलों में भटकने वाला राणाप्रताप क्या मूर्ख कहलाया ? भामा शाह अपना सब कुछ लुटा गये, क्या वे घाटे में रहे ? सिकन्दर अपनी दौलत को देख देखकर मरते वक्त बुरी तरह फूट फूट कर रोता था, मरने के बाद उसने अपने दोनों हाथ अर्थी से बाहर निकले रहने देने का आदेश किया था ताकि लोग यह जान सकें कि विपुल सम्पत्ति जमा करने वाला सिकन्दर अपने साथ कुछ भी न ले जा सका था उसके दोनों हाथ बिल्कुल खाली थे।

🔷 त्याग का अर्थ जिम्मेदारियों का कर्तव्य का त्याग नहीं है जैसा कि आजकल कितने ही नासमझ लोग अपने कठोर कर्तव्यों से विमुख होकर कायरतापूर्वक घर छोड़कर भाग खड़े होते हैं और विचित्र वेष बनाकर आलस्य में समय बिताते हुए दूसरों पर भार बनते हैं। त्याग का वास्तविक अर्थ है- अपनी दुर्भावना दुर्वासना स्वार्थपरता, ममता एवं लोभवृत्ति का त्याग। वेद भगवान ने कहा दे--“सौ हाथों से कमा, हजार हाथों से दान कर” हम तत्परतापूर्वक अपने श्रम का शक्ति का योग्यता का समय का पूरा पूरा उपयोग करते हुए आत्मिक और साँसारिक उत्पादन बढ़ावे और उस उत्पादन का आवश्यक अंश जीवन निर्वाह के लिए उपयोग करते हुए शेष को निर्लोभ भाव से परमार्थ में लगावें। यही गीता का कर्म योग हैं। यह त्यागमय जीवन बिताने की नीति मानव जीवन के सदुपयोग की सर्वोत्तम नीति है, आत्मोन्नति की सर्वोत्तम साधना है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1950 पृष्ठ 24

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 2)

🔶 The brilliance and purity of agni (fire) appears to be a universal symbol for worship.  The rituals of different religions affirm this fact. The first mantra of Rigaveda – the most ancient scripture of knowledge on Earth, quotes “agnimide purohitam”, signifying agni as a sacred idol of God. This is what is referred to in different religious and spiritual scriptures as Brahmateja, Divine Flame, Sacred Glow, Divine Light, Latent Light, etc. The Vedic hymn “agne supatha raye” prays to this omnipotent, supreme power to enlighten and ennoble us towards the righteous path. The same is inspired in the phrase “dhiyo yonah pracodayat” of the great Gayatri Mantra.

Meaning of Yajna
🔷 In its gross form, Yajna is a spiritual experiment of sacrificing and sublimating the havana samagri (herbal preparations) in the fire accompanied by the chanting of Vedic mantras.  This is only the physical process or ritual of Yajna, which has scientific importance and beneficial effects. This agni-Yajna when performed on a small scale is also known as havan, homam or agnihotra.

🔶 The meaning of Yajna is not confined to this sacrificial fire process. It has a much wider and deeper meaning. The word Yajna is derived from the Sanskrit verb yaj, which has a three-fold meaning: worship of deities (devapujana), unity (sangatikarana) and charity (dana). The philosophy of Yajna teaches a way of living in the society in harmony and a lifestyle which promotes and protects higher human values in the society, which is indeed the basis of an ideal human culture.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 3)

🔶 चिकित्सा विज्ञान की नवीनतम खोज यह है कि शारीरिक और मानसिक बीमारियों का प्रधान उद्गम केन्द्र मस्तिष्क है। क्योंकि सारे शरीर पर मूल नियंत्रण उसी का है। मनः क्षेत्र उद्विग्न होगा तो शरीर की स्थिति सामान्य होने पर भी कोई न कोई रोग आये दिन घेरे रहेंगे। विकृति रहने तक औषधि उपचार में कोई स्थायी निराकरण न हो सकेगा। यदि मन प्रफुल्ल और हलका हो तो शारीरिक कारणों से उठने वाले रोग तो प्रकृति ही समयानुसार अच्छे कर देती है या फिर मामूली उपचार से दूर हो जाते हैं। पर एक के बाद एक उठते रहने का सिलसिला मनोविकारों के कारण ही होता है।

🔷 मानसिक दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बड़े बेतुके, अविचारी, उद्धत, सनकी, शेख चिल्ली लोकाचार का ध्यान न रखने वाले होते हैं। उन्हें पागल तो नहीं कह सकते पर अधपगले से कम भी उनकी स्थिति नहीं होती। ऐसे लोग अपने लिए और दूसरों के लिए भारभूत ही सिद्ध होते हैं। वे किसी को नहीं सम्भाल पाते उल्टे उन्हीं को दूसरों के द्वारा सम्भालना पड़ता है। ऐसे लोगों को विकृत व्यक्तित्व कहते हैं। उनकी उपयोगिता, प्रगति एवं सफलता निरन्तर घटती ही जाती है। बुढ़ापा आने पर तो ऐसे लोगों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो जाती है।

🔶 मानवी चेतना का मौलिक स्वभाव सज्जनता सद्भावना से जुड़ा हुआ है। उसमें जब अनाचार घुसते पड़ते हैं तो काँटे की तरह चुभते रहते हैं और बेचैनी उत्पन्न करते हैं। दुष्टता बरतने से दूसरों की जो हानि होती है उसकी तुलना में अपनी हानि कहीं अधिक होती है। दूसरे तो चोट खाते समय ही हैरान होते हैं पर अपने भीतर आत्म प्रताड़ना का एक ऐसा राक्षस घुस बैठता है जो आजीवन त्रास देता रहता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 33

👉 गुरुगीता (भाग 97)

👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति

🔶 इस साधना रहस्यों को अपने श्रीमुख से उद्घाटित करते हुए भगवान् महादेव कहते हैं-
श्री महादेव उवाच-
पिण्डं कुण्डलिनीशक्तिः, पदं हंसमुदाहतम्। रूपं बिन्दुरितिज्ञेयं रूपातीतं निरञ्जनम् ॥ १२१॥
पिण्डे मुक्ता पदे मुक्ता, रूपे मुक्ता वरानने। रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्तानामसंशयः॥ १२२॥

🔷 हे देवि! कुण्डलिनी शक्ति पिण्ड है। हंस पद है, बिन्दु ही रूप है तथा निरञ्जन, निराकार रूपातीत है, ऐसा कहते हैं॥ १२१॥ जो पिण्ड से मुक्त हुआ, पद से मुक्त हुआ, रूप से मुक्त हुआ और जो रूपातीत से मुक्त हो सका, हे श्रेष्ठ मुखवाली! उसी को मुक्त कहते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥१२२॥

🔶 गुरूगीता के उपरोक्त दो महामंत्रों में योगीजनों की समस्त योगसाधना का सार है। विरले ही इसकी अनुभूति कर पाते हैं। भगवान् शिव बड़े क्रम से माता भवानी को इन रहस्यों की जानकारी देते हैं। वे कहते हैं कि कुण्डलिनी शक्ति ही पिण्ड है। इसका तात्पर्य यह है कि जब तक योग साधक में कुण्डलिनी शक्ति सुप्त रहती है, तब तक वह देह बोध और देहाभिमान से बँधा रहता है। ऐसा व्यक्ति कितनी ही पुस्तकें पढ़ डाले, भले कितनी ही शास्त्रों का अध्ययन कर ले, पर उसे देह बोध से मुक्ति नहीं मिलती। इनके पास तर्क तो होते हैं, पर बोध नहीं होता है। ये बातें कितनी ही ऊँची क्यों न करें, पर वह वासनाओं की कीचड़ और कलुष से मुक्त नहीं हो पाता। उसे यह मुक्ति मिलती है- कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 146

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

👉 संयम का महत्व

🔷 एक देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनो में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुँह तक न देखने की कसम खा ली और अपने-अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया।

🔶 परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली कौन है, बाहर से आवाज आई दीदी मैं ! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आई हो ?

🔷 देवरानी ने कहा दीदी सोच कर तो वही गई थी, परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई।

🔶 बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं। जीवन मे  क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है।

🔷 समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं। हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 27 April 2018


👉 हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण

👉 मनोनिग्रह-सफलता की कुँजी

🔷 एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

🔶 अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

🔷 आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

🔶 प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 9


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/January/v1.9

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 April 2018

🔷 कहते हैं कि शनिश्चर और राहू की दशा सबसे खराब होती है और जब वे आती हैं तो बर्बाद कर देती हैं। इस कथन में कितनी सचाई है यह कहना कठिन है, पर यह नितान्त सत्य है कि आलस्य को शनिश्चर और प्रमाद को-समय की बर्बादी को-राहू माना जाय तो इनकी छाया पड़ने मात्र से मनुष्य की बर्बादी का पूरा-पूरा सरंजाम बन जाता है।

🔶 दुःख और कठिनाइयेां में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख-सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। इसलिए उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से माँगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दें, ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे।

🔷 निराशा वह मानवीय दुर्गुण है, जो बुद्धि को भ्रमित कर देती है। मानसिक शक्तियों को लुंज-पुंज कर देती है। ऐसा व्यक्ति आधे मन से डरा-डरा सा कार्य करेगा। ऐसी अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकना संभव ही कहाँ होगा? जहाँ आशा नहीं वहाँ प्रयत्न नहीं। बिना प्रयत्न के ध्येय की प्राप्ति न आज तक कोई कर सका है, न आगे संभव है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Yajna – The Root of Vedic Culture (Part 1)

🔷 Gayatri and Yajna constitute the foundation of the Vedic Indian Culture. While Gayatri imparts wisdom and pure intelligence, Yajna inspires corresponding creativity and actions.

🔶 In talking of the Vedic age the images of the great saints performing agnihotra-Yajnas instantly flashes in our memory. In those days, apart from the saints, the rich and the poor, the kings and citizens also had an equally deep faith and respect for Yajna and they used to sincerely participate in and lend wholehearted support for different kinds of Yajnas. The saints used to spend at least one-third of their lives in conducting Yajnas.

🔷 It was a common belief and an observed fact in the Vedic Indian society that Yajna was essential for the refinement of human life from a sudra (i.e. a person living a life driven by animal instincts) to a Brahmin (i.e. a wise, knowledgeable, charitable person), and ultimately to a divine, great personality. Yajnas played an essential role in the all-round progress, prosperity and happiness in the Vedic age. This was indeed natural, as the philosophy and science of Yajna and the different modes of performing agni-Yajna were discovered and developed by the rishis based on their deep understanding and in-depth research of the human self, the intricacies of the social system and the mysteries of Nature.

📖 From Akhand Jyoti Jan 2001

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 2)

🔷 चोरी करते ही हाथों में लकवा मार जाय। कुमार्ग पर चलने वालों के पैर लड़खड़ा जाते। झूठ बोलने वाले की जीभ ठप्प हो जाती। कुदृष्टि डालने वालों को दिखना बन्द हो जाता। व्यभिचारी नपुंसक हो जाते तो फिर धर्मशास्त्रों की, उपदेशकों की, पुलिस कचहरी की कोई आवश्यकता न पड़ती। कुकृत्य करने की किसी की हिम्मत ही न पड़ती। अच्छे कर्मों के सत्परिणाम हाथों हाथ मिलते तो हर आदमी इसी को लाभदायक व्यवसाय समझकर अपने मन से ही किया करता। पर इसे भगवान की मसखरी ही समझना चाहिए कि विलम्ब से प्रतिफल मिलने के कारण लोग अधीर हो उठते हैं और विश्वास ही गँवा बैठते हैं। उससे उत्पन्न होने वाले असन्तुलन को सम्भालने के लिए संतों और सुधारकों को आना पड़ता है और बात बेकाबू होती है तो उसके लिए भगवान को आना पड़ता है। मनुष्य की अपनी दूरदर्शिता की परीक्षा का तो यही केन्द्र है।

🔶 बीजों में कुछ ऐसे होते हैं जो एक सप्ताह के भीतर हरियाली दे जाते हैं और तीन महीने उनकी फसल भी कट जाती है। पर कुछ ऐसे हैं जो बहुत देर लगाते हैं। ताड़ का बीज बोने पर एक वर्ष में अंकुर फोड़ता है हर वर्ष कुछ इंच बढ़ता है और पाँच सौ वर्ष की आयु तक जीता है जबकि मक्का पकने में थोड़े ही दिन लगते हैं। स्कूल में दाखिल होने के उपरान्त स्नातक बनने और अफसर पद पर नियुक्त होने में चौदह वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है। होता यह भी है कि मजूर दिन भर मेहनत करने के बाद शाम को अपनी मजूरी के पैसे ले जाता है।

🔷 असंयम बरतने वालो का स्वास्थ्य खराब तो होता है पर उसमें देर लगती है। देखा यह भी गया है कि नशा पीते ही मदहोशी चढ़ दौड़ती है। उपरोक्त उदाहरणों में यह प्रकट है कि कभी-कभी तो परिणाम जल्दी मिलता है पर कभी उसमें देर हो जाती है। कुछ देर तो हालत में लगती है, आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है। कर्मफल के सम्बन्ध में भी यह देर सबेर का चक्र चलता है। पर परिणाम होना सुनिश्चित है। भाग्य का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वह पिछले किये हुए कर्मों का ही प्रतिफल है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.32

👉 गुरुगीता (भाग 96)

👉 सद्गुरू की कृपा से ही मिलती है मुक्ति

🔷 गुरूगीता में योगसाधना के गहन रहस्य उजागर होते हैं। इसमें जो कुछ भी है, वह सभी तरह के बुद्धि कौशल से परे है। गुरूगीता के महामंत्रों में निहित रहस्य बुद्धि से नहीं, बोध से अनुभव होता है। इसके मंत्रोंक्षरों की सच्चाई के तर्क से नहीं, साधना से ही जाना जा सकता है। जो लोग गुरूगीता को बुद्धि और तर्क से जानने की कोशिश करते हैं, वे अपने ही जाल में उलझ कर रह जाते हैं। गुरूगीता के सम्बन्ध में उनकी बौद्धिक तत्परता उन्हें भ्रमों के सिवा और कुछ नहीं दे पाती। तर्कों से उन्हें केवल बहस का खोखलापन मिलता है। इसके विपरीत जो साधना करते हैं, वे अपनी साधना से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के सहारे सब कुछ जान लेते हैं।

🔶 गुरूगीता की रहस्य कथा में अन्तर्दृष्टि के रहस्यों की श्रृंखला स्पष्ट होती रही है। इसकी प्रत्येक कड़ी ने साधकों एवं शिष्यों की अन्तर्दृष्टि में हर बार नये आयाम जोड़े हैं। पिछले क्रम में माँ पार्वती ने भगवान् सदाशिव से अनूठी जिज्ञासा जतायी है। उन्होंने पूछा है कि हे महादेव! पिण्ड क्या है? पद किसे कहते हैं? हे भोलेनाथ रूप क्या है और रूपातीत क्या है? माँ की यह सभी जिज्ञासाएँ जीवात्मा के अस्तित्व के अतिगूढ़ प्रश्न हैं और इनका उत्तर केवल साधना की समाधि से शिवमुख से सुनकर ही जाना जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 144

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 April 2018


👉 आध्यात्म पथ के पथिकों! अपरिग्रही बनो!!

🔶 मन से हर एक को सदैव अपरिग्रही होना चाहिए। आदर्श यही सामने रहना चाहिए कि सच्ची जरूरतें पूरी करने के लिए ही कमायें, जोड़ने जमा करने या ऐश उड़ाने के लिए नहीं। यदि गरीब आदमी लखपती बनने के मनसूबे बाँधता है तो वह परिग्रही है। धन वैभव के बारे में यही आदर्श निश्चित किया होना चाहिए कि सच्ची जरूरतों की पूर्ति के लिए कमायेंगे, उतनी ही इच्छा करेंगे, उससे अधिक संग्रह न करेंगे। धन को जीवन का उद्देश्य नहीं वरन् एक साधन बनाना चाहिए।

🔷 “आत्मोन्नति और परमार्थ” जीवनोद्देश्य तो यही होना चाहिए। जीवन धारण करने योग्य पैसा कमाने के अतिरिक्त शेष समय इन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए। पैसे की आज जो सर्वभक्षी तृष्णा हर एक के मन में दावानल की तरह धधक रही है यह सर्वथा त्याज्य है। सादगी और अपरिग्रह में सच्चा आनन्द है। मनुष्य उतना ही आनन्दित रह सकता है जितना अपरिग्रही होगा। परिग्रही के सिर पर तो अशान्ति और अनीति सवार रहती है। इसी मर्म को समझते हुए योग शास्त्र के आचार्यों ने आध्यात्म पथ के पथिक को अपरिग्रही बनने का आदेश किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1944 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/February/v1

👉 संकल्पवान

🔶 गुरजिएफ ने कहा कि सामान्य व्यक्ति वादा नहीं कर सकता, संकल्प नहीं कर सकता, क्योंकि यह सब तो साधकों के गुण हैं, शिष्यत्व के लक्षण हैं।

🔷 गुरजिएफ के पास लोग आते और कहते— अब मैं व्रत लूँगा। उसके शिष्य औस्पेन्सकी ने लिखा है कि वह जोर से हँसता और कहता 'इससे पहले कि तुम कोई प्रतिज्ञा लो, दो बार फिर सोच लो। क्या तुम्हें पूरा आश्वासन है कि जिसने वादा किया है, वह अगले क्षण भी बना रहेगा? तुम कल से सुबह तीन बजे उठने का निर्णय कर लेते हो और तीन बजे तुम्हारे भीतर कोई कहता है, झंझट मत लो। बाहर इतनी सर्दी पड़ रही है। और ऐसी जल्दी भी क्या है? मैं यह कल भी कर सकता हूँ और तुम फिर सो जाते हो। दूसरे दिन सारे पछतावे के बावजूद यही स्थिति फिर से दुहराई जाती है। क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की, वह सुबह तीन बजे वहाँ होता ही नहीं, उसकी जगह कोई दूसरा ही आ बैठता है। अनुशासन का मतलब है, भीड़ की इस अराजक अव्यवस्था को समाप्त कर केन्द्रीयकरण की लयबद्धता उत्पन्न करना और तभी जानने की क्षमता आती है।

🔶 संकल्पवान ही आत्मतत्त्व को जान पाते हैं। गुरुदेव का समूचा जीवन इसी संकल्प का पर्याय था। उनके समूचे जीवन में, अन्तर्चेतना में अविराम लयबद्धता थी; तभी उनके गुरु ने उन्हें जो अनुशासन दिया, वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक पालन करते रहे। अनुशासन से मिलता-जुलता अंग्रेजी का शब्द है- डिसिप्लिन। यह डिसिप्लिन शब्द बड़ा सुन्दर है। यह उसी जड़, उसी उद्ïगम से आया है, जहाँ से डिसाइपल शब्द आया है। इससे यही प्रकट होता है कि अनुशासन शिष्य का सहज धर्म है। केन्द्रस्थ, लयबद्ध, संकल्पवान व्यक्ति ही गुरु के दिए गए अनुशासन को स्वीकार, शिरोधार्य कर सकता है। ऐसे ही व्यक्ति के अन्दर विकसित होती है, जानने की क्षमता।

📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान से

👉 Revolution

🔶 It is an established truth that whoever listened to and heeded the call of the “Budham, Dhamman, Sangham saranam gachchhami” to protest against the then prevalent malpractices. Thousands and thousands forsook everything and followed him. He ushered in a reform through intellectual revolution. A similar miracle was wrought by Gandhiji. One and a half thousand years of slavery and suppression had left the populace emaciated, and it lacked the courage and wherewithal to take on the mighty British Empire.

🔷 A small number of satyagrahis were simply no match. But the widespread and deep resentment coalesced into the great freedom struggle. Circumstances started turning favourable, and India became independent. The present age is witnessing a spiritual-intellectual revolution. The divisive  human consciousness bound to be transformed into the unitive cosmic consciousness. Indian culture is on the threshold of becoming world culture. The emergence of a New Era is imminent.

📖 From Akhand Jyoti

👉 कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र (भाग 1)

🔶 हमारे कर्म ही समयानुसार भले बुरे परिणामों के रूप में सामने आते रहते हैं। सृष्टा ने ऐसी स्वसंचालित प्रक्रिया बनाई है कि अपने कृत्यों का परिणाम स्वयं भुगत लेने का चक्र सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है। यह उचित ही हुआ। अन्यथा हर व्यक्ति के द्वारा चौबीस घण्टे में जो भले बुरे कृत्य होते रहते हैं वे जन्म भर में इतने अधिक इकट्ठे हो जाते हैं कि इन फाइलों को पढ़ना और दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करना एक न्यायाधीश के लिए सम्भव न होता। इतने मनुष्य के लिए इतने न्यायाधीश नियुक्त करने में भगवान की कितनी परेशानी पड़ती।

🔷 झंझट से बचने और व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए भगवान ने मनुष्य के भीतर ऐसा स्वसंचालित तन्त्र फिट कर दिया है जो कर्मों का लेखा जोखा रखता और उसके दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करता है। यह है मनुष्य का अचेतन मन जिसे धर्म ग्रंथों की भाषा में चित्र गुप्त भी कहा गया है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कर्मफल का बहीखाता उन्हीं के पास है और प्रतिफल का निपटारा यथावत् वे ही करते रहते हैं। फोटोग्राफी के फिल्म की तरह वे दृश्यों का अंकन करते रहते हैं। टेप रिकार्डर की तरह उनकी मशीन पर जो घटित होता रहता है उसका अंकन चलता रहता है और समय आने पर उसकी प्रतिक्रिया यथा समय सामने आ खड़ी होती है।

🔶 शास्त्रों ने अनेक स्थानों पर इस बात का उल्लेख किया है कि मनुष्य अपने कर्मों को स्वयं ही भोगता रहता है। साधारणतया यही देखने में भी आता है। सत्कर्म करने वाले ऊँचे उठते, प्रतिष्ठा पाते और सुखी रहते हैं। कुकर्मी उनकी बुरी परिणति भुगतते रहते हैं। इसमें कई बार देर लग जाती है और मनुष्य अधीर होकर कर्मफल पर अविश्वास व्यक्त करने लगता है और निर्भय होकर उच्छृंखलता पर उतारू हो जाता है।

🔷 सत्कर्म करने वाले जैसे सत्परिणामों की आशा करते थे वैसा न मिलने पर वे भी निराश होते और अविश्वासी बनते देखे गये हैं। इसे सृष्टि व्यवस्था का एक रहस्य कह सकते हैं। कर्मों का परिणाम यथावत् होने की बात निश्चित होते हुए भी उसमें विलम्ब लग जाता है। इस विलम्ब का समाधान बनाने के लिए इतने शास्त्रों की रचना हुई है। धर्मों उपदेशकों को समय-समय पर इसके लिए भारी श्रम करते रहना पड़ा है। मनुष्य की विवेक बुद्धि एवं श्रद्धा निष्ठा की परीक्षा इसी पर होती रही है। अन्यथा यदि हाथों हाथ कर्मफल मिला होता तो समझने समझाने की इतनी जरूरत न पड़ती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1985 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1985/January/v1.32

👉 गुरुगीता (भाग 95)

👉 सद्गुरु को तत्त्व से जान लेने का मर्म

🔶 जीव को पिण्ड मिलने और इसमें आबद्ध होने का कारण उसकी वासनाएँ, चाहतें और इच्छाएँ हैं। वासनाएँ जब तक हैं, जीव का पिण्ड से छुटकारा नहीं है। इतना ही नहीं, वह इन वासनाओं से लिपटे रहने के कारण स्वयं को ही पिण्ड समझने लगता है। ग्रामीण अंचल में एक बड़ा प्रचलित मुहावरा है- पिण्ड छुड़ाना। किसी जंजाल या विपत्ति से पीछा छूटने पर कहते हैं कि चलो पिण्ड छूटा। भले ही इस कहावत पर किसी ने गहराई से विचार न किया हो, परन्तु सच यही है कि पिण्ड छूटना बड़े महत्त्व की बात है; परन्तु योगीजन जानते हैं कि पिण्ड से मुक्त होना वासनाओं से मुक्त होने के बाद ही सम्भव है और वासनाएँ कुण्डलिनी शक्ति के जागरण व ऊर्ध्वगमन के बाद ही छूट पाती हैं। सो वासनाओं और इससे पैदा होने वाले कर्म बीजों व इसके परिणामों को जिसने जान लिया, समझो उसने पिण्ड के तत्त्व को जान लिया।
    
🔷 माता जगदम्बा प्रभु से अगला सवाल करती हैं-प्रभु पद किसे कहते हैं? यह पद शब्द भी यौगिक शब्दावली की एक गहरी विशेषता है। योग में जीवात्मा को पद कहा गया है। इसका एक नाम हंस भी है। इस हंस का ज्ञान सामान्य जनों को नहीं होता; क्योंकि वासनाओं से चंचल प्राणों में यह अनुभूति नहीं हो पाती। जब वासनाओं का वेग थमता है, तब प्राण स्थिर होते हैं। और प्राणों की इस स्थिरता में हंस का अनुभव होता है। यह अनुभव जीवात्मा का है। जीवात्मा का मतलब है आत्मचेतना का वह स्वरूप जिसने प्रकृति बन्धनों के कारण जीव भाव को स्वीकार कर लिया है। जीव भाव से मुक्त होने पर ही योग साधना में आत्मतत्त्व की अनुभूति होती है।
    
🔶 इसी क्रम में माँ की अगली जिज्ञासा है कि प्रभु रूप क्या है? रूप का मतलब है—आत्मरूप का। यह आत्मरूप है—आत्मज्योति रूप नीलबिन्दु। इसका अनुभव साधक को आत्मज्योति का अनुभव देता है। इस अनुभूति के साथ ही साधक को अपने आत्मरूप का ज्ञान व भान हो जाता है। सभी जप, योग एवं तप का सुफल यही है। जिसकी यह स्थिति नहीं है समझो उसे अभी अध्यात्म की कक्षा में प्रवेश नहीं मिला। योग साधना में रूप दर्शन एवं रूप मुक्ति यही दो क्रम हैं। इन्हें पूरा कर लेने पर रूपातीत अनुभूति का क्रम होता है। यह अध्यात्म विद्या की उच्च कक्षा है। इसमें प्रवेश साधक को जन्मों की साधना के बाद मिलता है।
    
🔷 इस उच्च कक्षा के बारे में जगन्माता भवानी अगली जिज्ञासा करती हैं—प्रभु रूपातीत क्या है? रूपातीत है ब्राह्मीचेतना। सभी रूप इसी से उदय होते हैं और इसी में विलीन हो जाते हैं। यह अनुभूति विरल है। जन्म-जन्मान्तर की साधना के बाद ही साधक इसकी प्राप्ति का अधिकारी हो पाता है। इसे पाने पर न शोक रह जाता है और न मोह। माया से परे अगम-अगोचर प्रभु की अनुभूति अति असाधारण अनुभव है। इस अनुभव में साधना की सार्थकता है। यहीं जीव शिव बनता है। इस शिवत्व की प्राप्ति में उसकी गुरुसेवा की सफलता है। उसके सद्गुरु के वरदान का सुफल है। जिसको यह मिल गया समझो उसे सब मिल गया।
    
🔶 हालाँकि यह तत्त्व बोध होता है क्रमवार ही। सबसे पहले पिण्ड बोध करना होता है। किन वासनाओं के प्रतिफल से यह देह मिली है। किन कर्मबीजों के कारण वर्तमान परिस्थितियाँ हैं। इसे अपनी साधना की गहराई में अनुभव करना होता है। इसके बाद आता है प्राणों की गति का क्रम। प्राणों की गति का ऊर्ध्व व स्थिर होना जीवात्मा के साक्षात्कार का कारण बनता है। इसके बाद ही हो पाता है आत्मज्योति के दर्शन का क्रम और बाद में ब्र्राह्मी चेतना से सायुज्य की स्थिति बनती है। यह सायुज्यता मिलने पर साधक को अपने सद्गुरु के निराकार निरञ्जन तत्त्व का  साक्षात्कार होता है। माँ  की इन जिज्ञासाओं में भगवान् सदाशिव के उत्तर अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 143

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

👉 अहंकार और प्रेम...!!!

👉 जीवन में प्रेम का संचय करें, अहंकार का नहीं।

🔷 जगत की ओर देखने वाला अहंकार से भरा हुआ हो जाता है, प्रभु की ओर देखने वाला प्रेम से पूर्ण होता है।

🔶 अहंकार सदा लेकर प्रसन्न होता है, प्रेम सदा देकर संतुष्ट/आनंदित होता है।

🔷 अहंकार को अकड़ने का अभ्यास है, प्रेम सदा झुक कर विनम्रता से रहता है।

🔶 अहंकार जिस पर बरसता है उसे तोड़ देता है, प्रेम जिस पर बरसता है उसे जोड़ देता है।

🔷 अहंकार दूसरों को ताप देता है, प्रेम शीतल मीठे जल सी तृप्ति देता है।

🔶 अहंकार संग्रह में लगा रहता है, प्रेम बाँट-बाँट कर आगे बढ़ता है।

🔷 अहंकार सबसे आगे रहना चाहता है, प्रेम सबके पीछे रहने में प्रसन्न है।

🔶 अहंकार सब कुछ पाकर भी भिखारी है , प्रेम अकिंचन रहकर भी पूर्ण धनी है।

जीवन प्रेममयी बने।

👉 चांदी की छड़ी

🔷 एक आदमी सागर के किनारे टहल रहा था। एकाएक उसकी नजर चांदी की एक छड़ी पर पड़ी, जो बहती-बहती किनारे आ लगी थी। वह खुश हुआ और झटपट छड़ी उठा ली। अब वह छड़ी लेकर टहलने लगा।

🔶 धूप चढ़ी तो उसका मन सागर में नहाने का हुआ। उसने सोचा, अगर छड़ी को किनारे रखकर नहाऊंगा, तो कोई ले जाएगा। इसलिए वह छड़ी हाथ में ही पकड़ कर नहाने लगा। तभी एक ऊंची लहर आई और तेजी से छड़ी को बहाकर ले गई। वह अफसोस करने लगा और दुखी हो कर तट पर आ बैठा।

🔷 उधर से एक संत आ रहे थे। उसे उदास देख पूछा, इतने दुखी क्यों हो? उसने बताया, स्वामी जी नहाते हुए मेरी चांदी की छड़ी सागर में बह गई। संत ने हैरानी जताई, छड़ी लेकर नहा रहे थे ? वह बोला, क्या करता ? किनारे रख कर नहाता, तो कोई ले जा सकता था।

🔶 लेकिन चांदी की छड़ी ले कर नहाने क्यों आए थे ? स्वामी जी ने पूछा। ले कर नहीं आया था, वह तो यहीं पड़ी मिली थी, उसने बताया। सुन कर स्वामी जी हंसने लगे और बोले, जब वह तुम्हारी थी ही नहीं, तो फिर दुख या उदासी कैसी?

🔷 मित्रों कभी कुछ खुशियां अनायास मिल जाती हैं और कभी कुछ श्रम करने और कष्ट उठाने से मिलती हैं। जो खुशियां अनायास मिलती हैं, परमात्मा की ओर से मिलती हैं, उन्हें सराहने का हमारे पास समय नहीं होता।

🔶 इंसान व्यस्त है तमाम ऐसे सुखों की गिनती करने में, जो उसके पास नहीं हैं- आलीशान बंगला, शानदार कार, स्टेटस, पॉवर वगैरह और भूल जाता है कि एक दिन सब कुछ यूं ही छोड़कर उसे अगले सफर में निकल जाना है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 April 2018


👉 युग-निर्माण के सत्संकल्प में विवेक को विजयी बनाने का शंखनाद

🔷 युग-निर्माण के सत्संकल्प में विवेक को विजयी बनाने का शंखनाद है। हम हर बात को उचित-अनुचित की कसौटी पर कसना सीखें। जो उचित हो वही करें, जो ग्राह्य हो वही ग्रहण करें, जो करने लायक हो उसी को करें। लोग क्या कहते हैं, क्या कहेंगे, इस प्रश्न पर विचार करते समय हमें सोचना होगा कि लोग दो तरह के हैं। एक विचारशील दूसरे अविचारी।

🔶 विवेकशील पाँच व्यक्तियों की सम्मति, अविचारी पाँच लाख व्यक्तियों के समान वजन रखती हैं। विवेकशीलों की संख्या सदा ही कम रही है। वन में सिंह थोड़े और सियार बहुत रहते हैं। एक सिंह की दहाड़, हजारों सियारों की हुआ-हुआ से अधिक महत्त्व रखती है। विचारशील वर्ग के थोड़े से व्यक्ति, विवेकसम्मत कदम बढ़ाने का दृढ़ निश्चय कर लें तो व्याप्त विकृतियाँ उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हो जायेंगी जैसे प्रचण्ड सूर्य के उदय होते ही कोहरा। मनुष्य की शक्तियों, क्षमताओं को वांछित दिशा में लगाने के लिए यह करना ही होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.१२)

👉 The supremacy of wisdom in the Yug Nirman solemn pledge

 🔷 In Yug Nirman Sat-sankalpa* (the solemn pledge for ushering in the new era of bright future for all), there is an ardent call for making wisdom excel everywhere. We should learn to make use of our wisdom to rationalize each and every thing. We should do only what is right and worth doing and adopt only that which is worth adopting. If a question crops up in our mind about what people might think or say about our out of the ordinary actions or conduct, we should recall that there are two types of people—those who are sensible and those who are senseless

🔶 The voice of a few sensible people is as powerful as that of the hordes of senseless people. There has always been dearth of sensible people in this world. There may be a very few lions compared to flocks of jackals living in a forest. However, the roar of only one lion stands out a mile among the yells and yaps of thousands of jackals. In the same way, if only a few of sensible people happen to firmly resolve to take some prudent initiatives, they can make widely prevalent badness crumble to pieces in the same way as the sunrise makes the early morning mist disappear. This need to be done and must be done to steer the capabilities and resources of the mankind into desirable positive direction.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- 66 (5.12)

👉 साधना से साहस

🔷 मित्रो ! साधना का प्रयोजन अपने भीतर की महानता को विकसित करना ही है। बाहर व्यापक क्षेत्र में भी देव शक्तियाँ विद्यमान हैं। पर उनके लिए समष्टि विश्व की देखभाल का विस्तृत कार्य क्षेत्र नियत रहता है। व्यक्ति की भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करने-सफलता और वरदान देने का कार्य उनके वे अंश ही पूरा करते हैं जो बीज रूप में हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। सूर्य का अंश आँख में मौजूद है। यदि आँखें सही हों तो ही विराट् सूर्य के प्रकाश से लाभ उठाया जा सकता है। अपने कान ठीक हों तो ही बाहर के ध्वनि प्रवाह की कुछ उपयोगिता है। इसी प्रकार अपने भीतर के हेय बीज यदि विकसित परिष्कृत हों तो उनके माध्यम से विश्वव्यापी देवतत्वों के साथ सम्बन्ध जोडऩा आकर्षित करना और उनका सहयोग अनुग्रह प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

🔶 मित्रो! इक्कीसवीं सदी रूपी गंगावतरण को उन भगीरथों की आवश्यकता है, जो सूखे पड़े विशाल क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए राजपाट का व्यामोह छोड़कर तप-साधना का मार्ग अपनाने का असाधारण साहस दिखा सकें।

🔷 जिनका साहस उभरे, उन्हें करना इतना भर है कि अपनी पहुँच से प्रज्ञा पुत्रों को महाकाल की चुनौती से अवगत कराएँ और युग धर्म के परिपालन में वरिष्ठों को क्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है, इसका स्वरूप समझाते हुए उन्हें नए सिरे से नई उमंगों का धनी बना सकने की स्थिति उत्पन्न करें। अपना परिवार इतना बड़ा, इतना समर्थ और इतना प्रबुद्ध है कि उस परिवार के लोग ही नव सृजन में जुट सकें, तो असंख्य-अनेक को अपना सहयोगी बनाने में निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। उतने भर से वह गति चक्र घूमने लगेगा जो नया इन्सान बनाने, नया संसार बसाने की युग चेतना को समुचित सहयोग दे सकें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 King Nripendra

🔷 The glory of king Nripendra of Mahismati had spread far and wide like the scattered luminescence of the full moon. The treasury, army, power and beauty-everything was in plentiful abundance. King Nripendra was just and benevolent towards his subjects  who, in turn, held him in great adoration.

🔶 Time passed. Strengths declined. Old age began to creep over and with this gradually increased the king’s inner disquiet and dissatisfaction. He withdrew into a shell of silence and stopped seeing anybody . Restless and sad, the king was always  seen immersed in brooding.

🔷 One day, very early in the morning, the king strolled over the palace garden. Sitting on a quartz rock, and facing east, he was engrossed for long in an inward search for something. Slowly the sun rose over the horizon. Its vibrant rays fell upon the pond and stirred the ‘thousand petalled’ lotus. The flower was soon in full bloom and began spreading its beauty and fragrance all over.

🔶 The divine inner voice spoke: “Can you still not grasp the mystery of the sun’s splendour? From where does its brilliance come? Is not the radiating light the sun’s own inner pulsation? The fragrance of the lotus comes from within. This whole flux of life you see everywhere has sprouted forth from within the cosmic spirit. The source of delight is hidden inside you. You will have to awaken it. For this, you have to orient yourself inward and do jivana sadhana

📖 From Akhand Jyoti

👉 वास्तविक सौंदर्य

राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कईं राजकुमार व राजा उसके साथ विवाह करना चाहते थे, लेकिन वह किसी को पसन्द नहीं करती थी। आखिरकार उन र...