सोमवार, 15 मार्च 2021

👉 Lakdi Ka Katora लकड़ी का कटोरा

एक वृद्ध व्यक्ति अपने बहु – बेटे के यहाँ शहर रहने गया उम्र के इस पड़ाव पर  वह अत्यंत कमजोर हो चुका था, उसके हाथ कांपते थे और दिखाई भी कम  देता था वो एक छोटे से घर में रहते थे, पूरा परिवार और उसका चार वर्षीया पोता एक साथ डिनर टेबल पर खाना खाते थे लेकिन वृद्ध होने के कारण उस व्यक्ति को खाने में बड़ी दिक्कत होती थी कभी मटर के दाने उसकी चम्मच से निकल कर फर्श पे बिखर जाते तो कभी हाँथ से दूध छलक कर मेजपोश पर गिर जाता।

बहु-बेटे  एक -दो  दिन ये सब  सहन करते  रहे पर अब उन्हें अपने पिता की इस  काम से चिढ होने लगी  हमें इनका कुछ करना पड़ेगा, लड़के ने कहा बहु ने भी हाँ में हाँ मिलाई और बोली, आखिर कब तक हम इनकी वजह से अपने खाने का मजा किरकिरा रहेंगे, और हम इस तरह चीजों का नुक्सान होते हुए भी नहीं देख सकते।

अगले दिन जब खाने का वक़्त हुआ तो बेटे ने एक पुरानी मेज को कमरे के कोने में लगा दिया, अब बूढ़े पिता को वहीँ अकेले बैठ कर अपना भोजन करना था यहाँ तक की उनके खाने के बर्तनों  की जगह एक लकड़ी का कटोरा दे दिया गया था, ताकि अब और बर्तन ना टूट -फूट सकें बाकी लोग पहले की तरह ही आराम से बैठ कर खाते और जब कभी -कभार उस बुजुर्ग की तरफ देखते तो उनकी आँखों में आंसू दिखाई देते यह देखकर भी बहु-बेटे का मन नहीं पिघलता, वो उनकी छोटी से छोटी गलती पर ढेरों बातें सुना देते वहां बैठा बालक भी यह सब बड़े ध्यान से देखता रहता, और अपने में मस्त  रहता।

एक रात खाने से पहले, उस छोटे बालक को उसके माता-पिता ने ज़मीन पर बैठ कर कुछ करते हुए देखा, “तुम क्या बना रहे हो ?”  पिता ने पूछा।

बच्चे ने मासूमियत के साथ उत्तर दिया, अरे मैं तो आप लोगों के लिए एक लकड़ी का कटोरा बना रहा हूँ, ताकि जब मैं बड़ा हो जाऊं तो आप लोग इसमें खा सकें, और वह पुनः अपने काम में लग गया पर इस बात का उसके माता -पिता पर बहुत गहरा असर हुआ, उनके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला और आँखों से आंसू बहने लगे वो दोनों बिना बोले ही समझ चुके थे कि अब उन्हें क्या करना है उस रात वो अपने बूढ़े पिता को  वापस डिनर टेबल पर ले आये, और फिर कभी उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया।

👉 सौभाग्य भरे क्षणों को तिरस्कृत न करें

ईश्वर ने मनुष्य को एक साथ इकट्ठा जीवन न देकर उसे अलग−अलग क्षणों में टुकड़े−टुकड़े करके दिया है। नया क्षण देने से पूर्व वह पुराना वापिस ले लेता है और देखता है कि उसका किस प्रकार उपयोग किया गया। इस कसौटी पर हमारी पात्रता कसने के बाद ही वह हमें अधिक मूल्यवान क्षणों का उपहार प्रदान करता है।

समय ही जीवन है। उसका प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है। वे हमारे सामने ऐसे ही खाली हाथ नहीं आते वरन् अपनी पीठ कीमती उपहार लादे होते हैं। यदि उनकी उपेक्षा की जाय तो निराश होकर वापिस लौट जाते है किन्तु यदि उनका स्वागत किया जाय तो उन मूल्यवान संपदाओं को देकर ही जाते है किन्तु यदि ईश्वर ने अपने परम प्रिय राजकुमार के लिए भेजी है।

जीवन का हर प्रभात सच्चे मित्र की तरह नित नये अनुदान लेकर आता है। वह चाहता है उस दिन का शृंगार करने में इस अनुदान के किये गये सदुपयोग को देख कर प्रसन्नता व्यक्त करें।

उपेक्षा और तिरस्कार पूर्वक लौटा दिये गये जीवन के क्षण−घटक दुखी होकर वापिस लौटते हैं। आलस्य और प्रमाद में पड़ा हुआ मनुष्य यह देख ही नहीं पाता कि उसके सौभाग्य का सूर्य दरवाजे पर दिन आता है और कपाट बन्द देख कर निराश वापिस लौट जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1974 पृष्ठ 1

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 15 March 2021

◆ काम को कल के लिए टालते रहना और आज का दिन आलस्य में बिताना एक बहुत बड़ी भूल है। कई बार तो वह कल कभी आता ही नहीं। रोज कल करने की आदत पड़ जाती है और कितने ही ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य उपेक्षा के गर्त में पड़े रह जाते हैं, जो यदि नियत समय पर आलस्य छोड़कर कर लिये जाते तो पूरे ही हो गये होते।

◇ जो उन्नति की ओर बढ़ने का प्रयत्न नहीं करेगा, वह पतन की ओर फिसलेगा। यह स्वाभाविक क्रम है। इस संसार में मनुष्य जीवन की दो ही गतियाँ हैं-उत्थान अथवा पतन।  तीसरी कोई भी माध्यमिक गति नहीं है। मनुष्य उन्नति की ओर न बढ़ेगा तो समय उसे पतन के गर्त में गिरा देगा।

◆ हम अपने आपको प्यार करें, ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अंतःकरण को प्यार से ओतप्रोत कर लिया, जिसके चिंतन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ता है, ईश्वर का प्यार उसी को मिलेगा।

◇ दोष दिखाने वाले को अपना शुभ चिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर कु्रद्ध होता है, शत्रुता मानता और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 रामकृष्ण परमहंस


भक्ति में है शक्ति अपरिमित, भगवन भी मिल जाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।
 
माँ काली के परम भक्त थे, ईश् अंश अवतारी थे।
प्रेम, दया, करुणा, ममता, मानवता के पुजारी थे।।
हरिदर्शन को आतुर हर क्षण, ईश्वर को पा पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।
 
भक्ति भाव से रामकृष्ण ने, काली को साकार किया।
शुष्क हृदयों में भी गुरु ने, करुणा का संचार किया।।
ह्रदय पवित्र, मन निर्मल जन, ईश्वर दर्शन कर पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।

दरिद्र-नारायण की सेवा को, भक्ति मार्ग से जोड़ा था।
जाति-पाति और उच्च-नीच का, बंधन उनने तोड़ा था।।
सेवा पथ अपनाकर ही हम, ईश्वर से मिल पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।
 
विद्या और अविद्या माया, का विस्तार बताया था।
गृहस्थ तपोवन है भगवन ने, जी कर स्वयं सिखाया था।।  
‘कामिनी कंचन’ की बाधा से, ईश्वर मिल ना पाते हैं।।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।

इन्द्रिय निग्रह करके साधक, महायोगी बन पाते हैं।
धर्म सभी सच्चे होते बस, मार्ग अलग हो जाते हैं।।
ज्ञान, भक्ति, वैराग्य साधकर, बंधन मुक्त हो पाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जगत को, भक्ति मार्ग दिखलाते हैं।।  

                                                            उमेश यादव

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग १)

भव्य भवन थोड़े से या झोंपड़े बहुत से, इन दोनों में से एक का चयन जन कल्याण की दृष्टि से करना है, तो बहुलता वाली बात को प्रधानता देनी पड़ेगी। राम...