शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

👉 पाप का गुरु

🔶 एक पंडित जी कई वर्षों तक काशी में शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद अपने गांव लौटे। गांव के एक किसान ने उनसे पूछा, पंडित जी आप हमें यह बताइए कि पाप का गुरु कौन है? प्रश्न सुन कर पंडित जी चकरा गए, क्योंकि भौतिक व आध्यात्मिक गुरु तो होते हैं, लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनकी समझ और अध्ययन के बाहर था। पंडित जी को लगा कि उनका अध्ययन अभी अधूरा है, इसलिए वे फिर काशी लौटे। फिर अनेक गुरुओं से मिले। मगर उन्हें किसान के सवाल का जवाब नहीं मिला।

🔷 अचानक एक दिन उनकी मुलाकात एक वेश्या से हो गई। उसने पंडित जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी समस्या बता दी। वेश्या बोली, पंडित जी..! इसका उत्तर है तो बहुत ही आसान, लेकिन इसके लिए कुछ दिन आपको मेरे पड़ोस में रहना होगा। पंडित जी के हां कहने पर उसने अपने पास ही उनके रहने की अलग से व्यवस्था कर दी। पंडित जी किसी के हाथ का बना खाना नहीं खाते थे, नियम-आचार और धर्म के कट्टर अनुयायी थे। इसलिए अपने हाथ से खाना बनाते और खाते। इस प्रकार से कुछ दिन बड़े आराम से बीते, लेकिन सवाल का जवाब अभी नहीं मिला।

🔶 एक दिन वेश्या बोली, पंडित जी…! आपको बहुत तकलीफ होती है खाना बनाने में। यहां देखने वाला तो और कोई है नहीं। आप कहें तो मैं नहा-धोकर आपके लिए कुछ भोजन तैयार कर दिया करूं। आप मुझे यह सेवा का मौका दें, तो मैं दक्षिणा में पांच स्वर्ण मुद्राएं भी प्रतिदिन दूंगी। स्वर्ण मुद्रा का नाम सुन कर पंडित जी को लोभ आ गया। साथ में पका-पकाया भोजन। अर्थात दोनों हाथों में लड्डू। इस लोभ में पंडित जी अपना नियम-व्रत, आचार-विचार धर्म सब कुछ भूल गए। पंडित जी ने हामी भर दी और वेश्या से बोले, ठीक है, तुम्हारी जैसी इच्छा। लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखना कि कोई देखे नहीं तुम्हें मेरी कोठी में आते-जाते हुए। वेश्या ने पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर पंडित जी के सामने परोस दिया।

🔷 पर ज्यों ही पंडित जी खाने को तत्पर हुए, त्यों ही वेश्या ने उनके सामने से परोसी हुई थाली खींच ली। इस पर पंडित जी क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या मजाक है?
वेश्या ने कहा, यह मजाक नहीं है पंडित जी, यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है। यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ का भी नहीं पीते थे, मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने मेरे हाथ का बना खाना भी स्वीकार कर लिया। यह लोभ ही पाप का गुरु है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 20 Jan 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Jan 2018

🔶 अपनी प्रसन्नता को जब अपनी मुट्ठी में रखा जा सकता है और हर घड़ी आनन्दित रहने का नुस्खा मालूम है तो क्यों न उसी का प्रयोग किया जाय? फिर क्यों इस बात पर निर्भर रहा जाय कि जब कभी सफलता मिलेगी, अभीष्ट वस्तु प्राप्त होगी तब कहीं प्रसन्न होंगे? इस प्रतीक्षा में मुद्दतें गुजर सकती हैं और यह भी हो सकता है कि सफलता न मिलने पर वह प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा जीवन भर हाथ रहे। इसलिये गीताकार ने यह सहज नुस्खा हमें बताया है कि फल की प्रतीक्षा मत करो, उस पर बहुत ध्यान भी मत दो, न तो सफलता के लिए आतुरता दिखाओ और न सफलता मिलने पर परेशान होओ। चित्त को शान्त और स्वस्थ रखकर अपने कर्तव्य को एक पुरुषार्थी व्यक्ति की तरह ठीक तरह पालन करो। ऐसा करने से तुम्हें लोक में भी शान्ति मिलेगी और परलोक भी सुधरेगा।

🔷 विचारणीय बात यही है कि जब हम अपनी जीवन समस्याओं में से अधिकांश को, अपना भीतरी सुधार करके, अपनी विचार शैली में थोड़ा परिवर्तन करके हल कर सकते हैं तो फिर उलझन भरा जीवन क्यों व्यतीत करें? मनुष्य बहुत चतुर है, विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण चातुर्य का परिचय देता है, उसकी बुद्धिमत्ता की जितनी सराहना की जाय उतना ही कम है। पर इतना होते हुए भी जब वह अपने दृष्टिकोण को सुधारने की आवश्यकता को नहीं समझ पाता और उस पर समुचित ध्यान नहीं दे पाता तो उसकी बुद्धिमत्ता पर सन्देह होने लगता है। वह प्रयत्न पूर्वक बड़े-बड़े महान् कार्य पूरे करता है तब यह बात उसके लिए क्यों कठिन होनी चाहिये कि अपनी मनोगत, भावनागत त्रुटियों पर विचार करे और उन्हें सुधारने के लिए तैयार हो जाय।

🔶 आत्मचिन्तन, आत्मशोधन एवं आत्मनिर्माण का कार्य उतना ही सरल है जितना शरीर को सर्वांगासन, मयूरासन, शीर्षासन आदि आसनों के लिए अभ्यस्त कर लेना। आरम्भ में इस झंझट में पड़ने से मन आनाकानी करता है, पुराने अभ्यास को छोड़कर नया अभ्यास डालना अखरता है, कुछ कठिनाई एवं परेशानी भी होती है, यदि अभ्यासी इन बातों से डर कर अभ्यास न करें या छोड़ दें तो आसनों के द्वारा होने वाले सत्परिणामों से लाभान्वित होना संभव न होगा। इसी प्रकार यदि आत्म-निरीक्षण करने में, अपने दोष ढूंढ़ने में उत्साह न हो, जो कुछ हम करते या सोचते हैं सो सब ठीक है, ऐसा दुराग्रह हो तो फिर न तो अपनी गलतियां सूझ पड़ेगी और न उन्हें छोड़ने की उत्साह होगा। वरन् साधारण व्यक्तियों की तरह अपनी बुरी आदतों का भी समर्थन करने के लिये दिमाग कुछ तर्क और कारण ढूंढ़ता रहेगा जिससे दोषी होते हुए भी अपनी निर्दोषिता प्रमाणित की जा सके।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपने आपको जानो, समझो और सुधारो

🔷 परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की धूप एवं पवन देव अपनी मर्जी के बिना प्रवेश नहीं कर सकते। यदि दरवाजे, खिड़कियाँ बन्द कर दिये जाएँ, तो प्रचण्ड धूप एवं तेज हवा का प्रवेश भी भीतर न हो सकेगा। केवल वही स्टेशन अपने रेडियो पर सुना जाता है, जिस पर हम सुई लगाते हैं। अन्य स्टेशनों के ब्राडकास्ट हमारे कानों तक नहीं आ सकते, भले ही वे कितने ही जोरदार प्रसारण चला रहे हों।
    
🔶 इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि आंतरिक प्रखरता के बल पर लोगों ने अभावग्रस्त एवं विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए प्रगति के पथ-प्रशस्त किये हैं और अनेकानेक अवरोधों को पार करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे हैं। इसके विपरीत हर प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी ऊपर उठने की बात तो दूर उल्टे नीचे ही गिरते चले गये हैं।
    
🔷 एक साधक अपनी श्रद्धा के बल पर धातु और  पत्थर से बनी प्रतिमाओं से चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर लेता है, दूसरा अपनी अनास्था के कारण जीवन्त देव मानवों के अति समीप रहने पर भी कोई लाभ नहीं ले पाता। एकलव्य ने मिट्टी से बनी द्रोणाचार्य की प्रतिमा से वह अनुदान प्राप्त कर लिया था, जो पाण्डव सचमुच के द्रोणाचार्य से भी प्राप्त नहीं कर सके थे। मीरा के ‘गिरधर गोपाल’ और रामकृष्ण परमहंस की ‘काली’ में जो चमत्कारी शक्ति थी, वह उनके श्रद्धारोपण से ही उत्पन्न हुई थी और उन्हीं के लिए फलप्रद सिद्ध होती रही। उन्हीं प्रतिमाओं से अन्य लोग वैसा लाभ नहीं उठा सकते। यंत्र-तंत्रों की सिद्धि में विधि-विधानों की इतनी भूमिका नहीं होती, जितनी साधक के श्रद्धा, विश्वास की। भूतप्रेतों से लेकर देवी-देवताओं तक के जो परिचय सामने आते हैं, उनमें व्यक्ति के अपने विश्वास ही फलित हुए पाये जाते हैं। अमुक चिकित्सा से लाभ होना अथवा अमुक चिकित्सक का सफल होना अथवा अमुक चिकित्सक का असफल होना बहुत करके रोगी के विश्वास पर निर्भर रहता है।
    
🔶 विपुल वर्षा होने पर भी पत्थर की चट्टाने एक बूँद पानी भी नहीं सोख पातीं। इसके विपरीत रेगिस्तानी गर्मी में हरे रहने वाले पेड़-पौधे कहीं से भी अपने निर्वाह के लिए आवश्यक नमी उसी उष्ण वातावरण में से उपलब्ध करते रहते हैं। स्वाति की वर्षा से केवल वे ही सीपें लाभ उठा पाती हैं, जिनके मुँह खुले होते हैं। सरकारी छात्र-वृत्ति उन्हीं को मिलती है, जो परिश्रमपूर्वक पढऩे और अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते हैं। बाहरी सहायता उपलब्ध होना न होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं, जितना कि व्यक्ति की निजी पात्रता एवं प्रखरता का होना।
    
🔷 आत्मबोध का तात्पर्य है, अपने से सन्निहित शक्ति एवं सम्भावना से परिचित होना। आत्मिक प्रगति का अर्थ है- आंतरिक दोष-दुर्गुणों को निरस्त करके सद्ïभावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को समुन्नत बनाने के उपक्रम में निरन्तर निरत रहना। इन सत्प्रयत्नों से मानवीय और दैवी दोनों प्रकार की सहायताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहती हैं।
    
🔶 ब्रह्म विद्या का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्देश यह है कि अपने आपको जानो, अपने को समझो और अपने को सुधारो। ‘आत्मा वाऽरे श्रोतव्य: निदिध्यासितव्य:’ की उक्ति में यही उद्बोधन भरा पड़ा है। गीता कहती है - ‘अपना उद्धार आप करो’ अपने आप को गिराओ मत। ‘उद्धरेत् आत्मनात्मानं नात्मानं अवसादयेत्’ की सूक्ति में यही ब्रह्मïवाक्य गूँजता है। मित्रों को ढूँढऩे और शत्रुओं को भगाने के लिए अन्यत्र कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, वे अपने ही भीतर डेरा डाले बैठे हैं- ‘आत्मैव आत्मना बन्धु: आत्मैव रिपुरात्मन:’ का गीता कथन अक्षरश: सत्य है। अपने पौरुष- पुरुषार्थ से अपनी विवेकशीलता और दूरदर्शिता से ही प्रगति के द्वार खुलते हैं। अपनी ही अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता और अनास्था ही हमें ले डूबती है। अपने उत्थान-परिष्कार की तथा पतन-पराभव की कुंजियाँ अपने ही हाथों में हैं, दोनों में से चाहे जिसका द्वार स्वेच्छापूर्वक खोला जा सकता है। यह तथ्य समझ में आ सके, तो प्रतीत होगा कि अपना आपा ही कल्पवृक्ष है, जिसकी जिस कामना से उपासना की जाय, उसी के अनुरूप वरदान मिलते चले जाएँगे। अन्य किसी देवता की उपासना भले ही निष्फल चली जाए, पर जीवन- देवता की, आत्म-निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी प्रगति उत्कृष्टता की दिशा में हो (भाग 3)

🔷 जीवन-निर्माता धर्म का आधार है सत्य और ईमानदारी। मनुष्य जो कुछ कहे, करे और सोचे उसका आधार सत्य ही होना चाहिये। जिसने आत्म-निर्माण के लिये धनाढ्यता को आदर्श बनाया है उसे चाहिये कि वह धन के लिये जिस व्यवसाय को अपनाता है उसमें पूरी तरह ईमानदार रहे। यदि दुकानदारी करता है तो पूरा तोले, उचित मूल्य ले। खरा माल दे, ठीक पैसे बतलाये। वस्तु, मूल्य तथा उसके गुण बतलाते समय सच बोले। जिस कीमत में किसी एक ग्राहक को वस्तु दे उसी कीमत में दूसरे को। मुनाफा कमाने के लिये वस्तुएं छिपाकर न रखे। होते हुए किसी से इनकार न करे। आबाल वृद्ध सभी के साथ उसकी इसी प्रकार की एक जैसी ही नीति रहनी चाहिए। किसी अनजान, अबोध अथवा निर्बल से चीज होते हुए भी इनकार कर देना अथवा ज्यादा दाम लेकर देना और किसी जानकार, बुद्धिमान अथवा बलवान व्यक्ति को अलभ्य वस्तुएं भी ठीक दामों पर दे देना, व्यापार जैसे पवित्र काम में एक बड़ा कलंक है।

🔶 व्यापारियों और कारखानेदारों को चाहिए कि वे खरा माल बेचे-बनायें, नकली अथवा निकृष्ट माल बाजार में न भेजें, अधिक मुनाफाखोरी से बचें। लागत के अनुसार कीमत लें। मजदूरों तथा कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक दें। शोषण, मुनाफाखोरी और कालाबाज़ारी की नीति से बचें। इन सब आदर्शों के साथ धनाढ्यता का लक्ष्य पाने वाले ही उस दिशा में अपने निर्माता माने जाएंगे।

🔷 जिसका लक्ष्य एक अच्छा श्रमिक बनना हो वह किसी भी काम को पूरे तन-मन के साथ पूरे समय भर करे। पारिश्रमिक की मात्रा के अनुसार अपने श्रम की मात्रा घटाने-बढ़ाने के बजाय हर स्थिति में पूरी ईमानदारी बरतें अर्थात् पारिश्रमिक भले ही कम हो लेकिन अपने श्रमदान की मात्रा पूरी रखें। कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करें। उनके काम पर आने का जो नियत समय हो, अकारण ही उससे देर न करें। पूरे समय पर एकनिष्ठ भाव से काम करें। समय पूरा होने से पहले काम न छोड़ें। कामचोरी, रहस्योद्घाटन, चुगली, पिशुनता आदि से बचे रहें। इस प्रकार अपने साधारण कामों में भी पूरी ईमानदारी और सत्य का निर्वाह करके आत्म-निर्माण किया जा सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अक्टूबर 1970 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1970/October/v1.17

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.11

👉 Amrit Chintan 20 Jan 2018

🔷 To achieve success in all the sections of Yug Nirman Yojna. I need talented people as volunteers. We will find talents from every field of their actions. Because this is the time when talents must engage themselves for a new creation of humanity is this world.

🔶 If our children learn the object of life from the very beginning, they will be able to control the impronts of bad habits, which spolk the entire life. Imprints of previous lives and the social atmosphere which effect our haracters and makes us more selfish and materialistic in life. But if object of life is always in front of you, you will be on righteous path.

🔷 All rituals of worship, sadhana, Contemplation, yog exercises are to develop “Shraddha” i.e. love for ideality life. Shraddha is based on your true sincerity. Love and service to all who are needy. In the script of ‘Ramayan’ written by Goswami Tulsidas ji Shraddha and Vishwas(Firm believe) is compressed with Lord Shiva and Mata Parvati. So the object of life is ideality and all other rituals are stepping stones to achieve ‘Shraddha’.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 3)

🔷 अच्छा बेटे, यह बता कि कुछ काम भी करेगा या नहीं करेगा? माता जी! काम पर तो नहीं जाऊँगा। तो फिर क्या करेगा? बस यहीं पर आपका सत्संग सुनूँगा और आपकी रोटी खाया करूँगा। रोटी से पेट भर जायेगा, तो भी खाऊँगा और खाता रहूँगा। बेटे, तब तो तेरा पेट फट जायेगा और तू बीमार हो जायेगा। नहीं साहब! सत्संग किया करूँगा और बाबा जी के यहाँ रहा करूँगा और रामायण पढ़ा करूँगा और भागवत् पढ़ा करूँगा। बेटे, तूने भागवत् पढ़ ली और सुन ली, दवा भी खाली और इंजेक्शन भी ले लिया। अब तू काम करने के लिए चल। नहीं साहब! हम तो काम नहीं करेंगे। जिन्दगी भर स्कूल में पढ़ा करेंगे। बेटे, पढ़ने के बाद नौकरी करेगा या नहीं? महाराज जी! नौकरी तो नहीं करूँगा, खेती तो नहीं करूँगा। मैं तो स्कूल में पाँचवें दर्जे में भर्ती हो गया हूँ और जब तक मेरी नौकरी नहीं लग जायेगी, मैं रोजाना रामायण और महाभारत पढ़ा करूँगा। क्यों पढ़ेगा? पढ़ने की वजह क्या है?

🔶 मित्रो! सत्संग की कोई वजह भी तो होनी चाहिए। आप किसके लिए सत्संग करेंगे। नहीं साहब! सत्संग करूँगा। बेटे, तू बता तो सही कि सत्संग क्यों करेगा? नहीं साहब! मैं तो सत्संग करूँगा? बेटे, तू पागल आदमी नहीं है, जिसे यह पता ही नहीं है कि सत्संग क्यों किया जाता है। मित्रो! सत्संग करने का उद्देश्य मनुष्यों के अंदर जीवट पैदा करना होता है। सत्संग का उद्देश्य मनुष्यों के अंदर क्रियाशीलता उत्पन्न करना होता है। क्रियाशीलता अगर हमारे अंदर उत्पन्न हो गयी है, भावना हमारे अंदर उत्पन्न हो गयी है, तो भावना को कार्यक्षेत्र में चलना चाहिए और कार्यक्षेत्र में उसका समावेश होना चाहिए। अगर हमने ऐसा करना शुरू नहीं किया और ऐसा करना हमारे लिए संभव नहीं हुआ, तो बहुत भारी मुश्किल हो जायेगी और बहुत दिक्कत खड़ी हो जायेगी, बड़ी कठिनाई पैदा हो जायेगी।

🔷 मित्रो! आपको जो सत्संग दिया गया, जो शिक्षण दिया गया है, उस सत्संग और प्रशिक्षण का उद्देश्य एक होना चाहिए। और वह उद्देश्य यह होना चाहिए कि हमारे दिये हुए विचार और हमारे दिये हुए क्रियाकलाप किसी कार्यक्षेत्र में परिणत हो सकें। भगवान बुद्ध ने यही किया। अपने पास लोगों को थोड़े समय तक रखने के पश्चात् सबको कार्यक्षेत्र के लिए भेज दिया। आप लोगों को जो क्रियाकलाप बताये गये हैं और जो सत्संग सुनाये गये हैं, उसमें जो आपको सीखना है, वह इसलिए सीखना है कि संसार में जहाँ कहीं भी आपको पतन मालूम पड़े, जहाँ कहीं भी आपको असुविधा मालूम पड़े, जहाँ कहीं भी आपको पीड़ा मालूम पड़े, उस पीड़ा के स्थान पर और पतन के स्थान पर आपको चले जाना चाहिए। भगवान बुद्ध ने यही किया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 21)

👉 समर्पण-विसर्जन-विलय

🔷 गुरुगीता के महामंत्रों में साधना जीवन का परम सत्य निहित है। इनमें वह परम रहस्य सँजोया है, जिसके आचरण का स्पर्श पारसमणि की भाँति है। जो छूने भर से साधक के अनगढ़ जीवन और कुसंस्कारों को आमूल-चूल बदल देता है। गुरुकृपा से मानवीय कमियाँ-कमजोरियाँ ईश्वरीय विभूतियों व उपलब्धियों में बदल जाती हैं। गुरु निष्ठा से क्या नहीं हो सकता? इस प्रश्न चिह्न का एक ही उत्तर है सब कुछ सम्भव है-सब कुछ सम्भव है। इसलिए हानि में-लाभ में, यश में-अपयश में, जीवन में-मरण में, किसी भी स्थिति में सद्गुरु का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि परम कृपालु सद्गुरु का प्रत्येक अनुदान उनकी कृपा ही है। ये अनुदान सुख भरे हों या फिर दुःख से सने हों, साधक के साधनामय जीवन के लिए कल्याणकारी ही हैं। परम रहस्य सद्गुरु की कृपा भी बड़ी ही रहस्यमय होती है। इसका बौद्धिक विवेचन किसी भी तरह सम्भव नहीं। इसे तो बस सजल भावनाओं में ग्रहण किया जा सकता है।
  
🔶 गुरु गीता के उपर्युक्त मंत्रों में इसके धारण-ग्रहण की कतिपय विधियों का उल्लेख किया गया है। गुरुदेव की छवि का स्मरण, उनके नाम का जप, जीवन की विपरीतताओं में भी गुरुवर की आज्ञा का निष्ठापूर्वक पालन साधक को गुुरुकृपा का सहज अधिकारी बनाता है। गुरु के मुख में तो ब्रह्म का वास है, वे जो भी बोलें—वह शिष्य के लिए ब्रह्मवाक्य  है। गुरुकृपा ही साधक को ब्रह्मानुभूति का वरदान देती है। परम पतिव्रता स्त्री जिस तरह से हमेशा ही अपने पति का ध्यान करती है, ठीक उसी तरह से साधक को अपने गुरु का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान इतना प्रगाढ़ हो कि उसे अपना आश्रय, जाति, कुल, गोत्र सभी कुछ भूल जाए। गुरु के अलावा कोई अन्य भावना उसे न भाये।
  
इस भक्ति कथा में नई कड़ी जोड़ते हुए भगवान् महादेव माता पार्वती को समझाते हैं-

अनन्यश्चिन्तयन्तो मां सुलभं परमं पदम्। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु॥ २१॥
त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्यसुरपन्नगाः। गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्त्या तु लभ्यते॥ २२॥
गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते। अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥ २३॥
गुकारः प्रथमो वर्णो मायादिगुणभासकः। रुकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्ति विनाशनम्॥ २४॥
एवं गुरुपदं श्रेष्ठं देवानामपि दुर्लभं। हाहाहूहू गणैश्चैव गन्धर्वैश्च प्रपूज्यते॥ २५॥
  
🔶 शिष्य को यह तथ्य भलीभाँति आत्मसात् कर लेना चाहिए कि सद्गुरु का अनन्य चिंतन मेरा ही (भगवान् सदाशिव) चिंतन है। इससे परमपद की प्राप्ति सहज, सुलभ होती है। इसलिए कल्याण कामी साधक को प्रयत्नपूर्वक  गुरु आराधना करनी चाहिए॥ २१॥ तीनों लोकों के देव-असुर एवं नाग आदि सभी इस सत्य को बड़ी स्पष्ट रीति से बताते हैं कि ब्रह्मविद्या गुरुमुख में ही स्थित है। गुरुभक्ति से ही इसे प्राप्त किया जा सकता है॥ २२॥ ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ अक्षर अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ का अर्थ है  प्रकाश। इस तरह गुरु ही अज्ञान का नाश करने वाले ब्रह्म है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥ २३॥ शास्त्र वचनों से यह प्रमाणित होता है कि ‘गुरु’ शब्द के प्रथम वर्ण ‘गु’ से माया आदि गुण प्रकट होते हैं और इसके द्वितीय वर्ण ‘रु’ से ब्रह्म प्रकाशित होता है। जो माया की भ्रान्ति को विनष्ट करता है॥ २४॥ इसलिए गुरुपद सर्वश्रेष्ठ है, यह देवों के लिए भी दुर्लभ है। हाहाहूहू गण और गन्धर्व आदि भी इसकी पूजा करते हैं॥ २५॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 37

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...