शनिवार, 6 जुलाई 2019

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 22)

👉 पूर्वजन्म के दुष्कर्मों का परिमार्जन जरूरी

पूर्वजन्म में वर्तमान जीवन के रहस्यों की जड़ें हैं। इन्हें खोदे बिना, इन्हें समझे बिना जिन्दगी की सूक्ष्मताओं का भेद नहीं पाया जा सकता। अचेतन के अविष्कार को आधुनिक मनोविज्ञान अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है। मनोवैज्ञानिक अनुसन्धानों के सारे दरो- दीवार इसी नींव पर टिके हैं। किसी भी पीड़ा- परेशानी का कारण मनोचिकित्सक अचेतन में ढूँढने की कोशिश करते हैं। आज के वैज्ञानिक समुदाय में इस सच को स्वीकारा जाता है कि जिन्दगी की समस्याओं की जड़ें इन्सान के मन में है। अनगिनत शोध प्रयासों ने इस तथ्य को प्रामाणिकता दी है कि रोग शारीरिक हों या मानसिक, इनके बीज इन्सान के अचेतन मन की परतों में छुपे होते हैं। इस सर्वमान्य स्वीकारोक्ति को विशेषज्ञों ने कई तरह से जाँच- परखकर सही पाया है। इसमें न कोई मतभेद है और न मनभेद।

हां, सवाल इसका जरूर है कि अचेतन मन क्या है? तो मनोवैज्ञानिक इसके उत्तर में कहते हैं कि यह और कुछ नहीं बस हमारा बीता हुआ कल है। बीते हुए कल में हमने जो कुछ किया, सोचा अथवा जो भावानुभूतियाँ पायी उसकी गहरी लकीरें हमारे अचेतन मन में अभी भी बनी हैं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि हमारे बीते हुए कल की अनुभूतियाँ ही अचेतन का निर्माण करती हैं। यदि इन अनुभूतियों में कटुता, तिक्तता या कसक बाकी रही है, तो वह रोग- शोक के रूप में प्रकट होती है। इसी से अनेकों दुःखद घटनाक्रम जन्म लेते हैं। यदि अचेतन की स्थिति सुधरी- संवरी है, तो जीवन के सुखमय होने के आसार भी बनते हैं।

प्रायः सभी मनोचिकित्सक अचेतन की इस परिभाषा एवं प्रभाव से सहमत हैं। किन्तु आध्यात्मिक चिकित्सक इस सत्य को अपेक्षाकृत व्यापक परिदृश्य में देखते हैं। इनका कहना है कि बीते हुए कल की सीमाएँ केवल वर्तमान के क्षण से लेकर बचपन तक सिमटी नहीं हैं। इसके दायरे काफी बड़े हैं। ये इतने ज्यादा व्यापक हैं कि इसमें हमारे पूर्वजन्म की अनुभूतियाँ भी समायी हुई हैं। पूर्वजीवन में हमारे द्वारा किए गए कर्म, गहनता से सोचे गए विचार एवं प्रगाढ़ता से पोषित हुई भावनाएँ भी अपनी स्थिति के अनुरूप वर्तमान जीवन में सुखद या दुःखद स्थिति को जन्म देती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
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