गुरुवार, 29 मार्च 2018

👉 विचारों की शक्ति

🔷 मित्रो ! मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते हैं, उतनी आसानी से सोना नहीं मिलता। पापों की ओर आसानी से मन चला जाता है, किंतु पुण्य कर्मों की ओर प्रवृत्त करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा नीचे पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किंतु अगर ऊँचे स्थान पर चढ़ाना हो, तो पंप आदि लगाने का प्रयत्न किया जाता है।

🔶 बुरे विचार, तामसी संकल्प ऐसे पदार्थ हैं, जो बड़ा मनोरंजन करते हुए मन में धँस जाते हैं और साथ ही अपनी मारक शक्ति को भी ले जाते हैं। स्वार्थमयी नीच भावनाओं को वैज्ञानिक विश्लेषण करके जाना गया है कि वे काले रंग की छुरियों के समान तीक्ष्ण एवं तेजाब की तरह दाहक होती हैं। उन्हें जहाँ थोड़ा-सा भी स्थान मिला कि अपने सदृश और भी बहुत-सी सामग्री खींच लेती हैं। विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्त्वों की भाँति खिंचने और खींचने की शक्ति होती है। तदनुसार अपनी भावना को पुष्ट करने वाले उसी जाति के विचार उड़-उड़ कर वहीं एकत्रित होने लगते हैं।

🔷 यही बात भले विचारों के संबंध में है। वे भी अपने सजातियों को अपने साथ इकट्ठे करके बहुकुटुंबी बनने में पीछे नहीं रहते। जिन्होंने बहुत समय तक बुरे विचारों को अपने मन में स्थान दिया है, उन्हें चिंता, भय और निराशा का शिकार होना ही पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ज्ञान और आस्था

🔷 एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

🔶 नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिता के साथ रहती थी। लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दुहती, फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।

🔷 पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए। लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

🔶 अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

🔷 लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि- “नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, मै नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।“

🔶 पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, ‘‘क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती?”

🔷 पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।

🔶 उन्होंने लक्ष्मी से पूछा- “ तुमने आज नदी कैसे पार की ? इतनी सुबह तो कोई मल्लाह नही मिलता।”

🔷 लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा- ‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से नदी पार कर ली। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’

🔶 पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।

🔷 पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।

🔶 पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा- ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में ही लगा हुआ था।’’

🔷 पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 March 2018


👉 MICRO-ANALYSIS OF SPIRITUALISM

🔷 What is spiritualism? It is upside down process of our life. Do you see it as juggling or thaumaturgy? There is nothing like that. Albeit, the direction of life is flipped and turned out here. The way common persons of the world think, wish and do, on the contrary the processes of spiritualistic life is completely different.

🔶 Different types of flirtations and handiwork you perform for a glimpse of God, for worshipping, miraculous enlightenment and getting prosperity, it is better not to indulge into that, because this will be too tough to you. You’ll be shattered into pieces at the very first step. When you will be asked for celibacy and you will be directed that physical celibacy is not as necessary as mental and internal one, then you’ll start biting your finger and say, firstly we are not able to celibate physically, then what to say about going mental celibacy! Our mind and eyes remain indulged in misconduct and vices 24 hours. When whole of your power will be destroyed in this only, then how on earth your serpent power (secret centers of immense divine powers hidden in one’s spinal cord) would get awakened? When you’ll spoil whole of your power needed to awaken the serpent power in these vices and misconducts through your eyes in the form of vicious waves, then you’ve definitely ended up all of your power and energy in vain.

🔷 Similarly, the blood which is formed after you take food and which in turn creates your mind and thoughts, has got contaminated due to intake of improper, fraudulently-earned and ill gotten food. How the hell you’ll be able to make it stable and concentrated in spiritualism and Almighty?

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 अध्यात्म का सूक्ष्म-विश्लेषण

🔷 अध्यात्म क्या है? जीवन का शीर्षासन है। आप क्या इसे बाजीगरी समझते हैं कि यह कर लूँगा, वह कर लूँगा। इसमें ऐसा कुछ नहीं है, वरन इसमें जीवन की दिशा उलटी जाती है, जीवन को पलटा जाता है। दुनिया वाले लोगों के सोचने, करने का जो तरीका है, आकांक्षाओं, इच्छाओं का जो ढंग है, उससे आध्यात्मिक जीवन की प्रक्रियाएं भिन्न हैं, जिन्हें अलग ढंग से करना पड़ता है।

🔶 पूजा-उपासना के बारे में, सिद्धि-चमत्कारों के बारे में, देवताओं के दर्शन के बारे में, ऋद्धि-सिद्धि पाने के बारे में जो तरह-तरह के खेल-खिलवाड़ आप करते रहते हैं, उसमें न पड़ें तो अच्छा है, क्योंकि आपके लिए यह वह कठिन पड़ेगा। आप पहली मंजिल पर ही टक्कर खाकर चकनाचूर हो जाएँगे। जब आपसे ब्रह्मचर्य के लिए कहा जायेगा कि शारीरिक ब्रह्मचर्य उतना आवश्यक नहीं जितना कि मानसिक ब्रह्मचर्य आवश्यक है, तब आप दाँत निकाल देंगे और कहेंगे कि शारीरिक ब्रह्मचर्य तो हमसे साधता नहीं, फिर मानसिक ब्रह्मचर्य की बात ही अलग है! चौबीस घंटे हमारा दिमाग और आँखें दुराचार में लगी रहती हैं। जब आपकी सारी शक्ति इसी में खर्च हो जायेगी तब फिर आपका सहस्रार-चक्र (कुण्डलिनी-जागरण की अंतिम अवस्था) कहाँ से जगेगा? सहस्रार-चक्र में लगने वाली सारी शक्ति इसी में लय कर देंगे, तब फिर वह जागेगा कैसे? सहस्रार को जाग्रत करने वाला जो प्रकाश है, वह तो आपकी आँखों के रास्ते तरंगों के जरिये नष्ट हो जायेगा। इसके अन्दर जो गर्मी थी, ऊर्जा थी वह तो आपने ख़त्म कर दी।

🔷 इसी तरह आहार के आधार पर जो आपका रक्त बनता है और जिससे बनता है मन; तमोगुणी अन्न, अनीति-बेईमानी का कमाया हुआ अन्न, हराम का कमाया हुआ अन्न खाकर के आपने उसे तमोगुणी बना दिया है। उसे आप अध्यात्म में, भगवान में स्थिर कैसे कर पाएंगे?

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 30 March

🔷 The path followed by great men of the time show us the right way of living. If we follow them we will also attain the same aim of life as they could. Success of our life and wisdom can be attained on their guidance. Our life should not be like depressed, pessimistic or like those who are totally materialistic. We should not be hippocratic either in our talks and actions. That is our show of life totally different then what we are.

🔶 We should work hard for our progress in life, but should not disturbed in our present situation. Money is not everything in life. If we develop our nature and behavior and create an atmosphere of happiness by sharing and caring for other. We can enjoy the bliss of life.

🔷 When one’s Soul attain oneness with super-consciousness or God, it means that beastile behavior (selflessness) gets change into divinity, the beggar becomes a donor and so on. This type of change in human nature is known as unity with God – vilay, visarjan and sharnagati or total surrender to God. At that level the devotee and God become one or adwait i.e. oneness (no two). 
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (अन्तिम भाग)

🔷 भावी जीवन की आपकी रूपरेखा क्या हो, आप केवल अपने ही लिए ही नहीं जिएँ, उसमें समाज की भी हिस्सेदारी है, लोगों की भी हिस्सेदारी है, भगवान की भी हिस्सेदारी है, आदर्शों की भी हिस्सेदारी है, धर्म और संस्कृति की भी हिस्सेदारी है—उस हिस्सेदारी को आप कैसे निभा पायेंगे? उसके बारे में शिक्षण, आपका सायंकाल का शिक्षण इस उद्देश्य के लिए है, आप इस उद्देश्य को समझिये। आप घटना को देखेंगे और यहाँ के क्रम को देखेंगे, तो ऊपर ही दृष्टि रह जाएगी। दृष्टि को भीतर ले जाइए, दर्शन समझिये यहाँ के कल्प का और यह मानकर चलिए कि यहाँ कल्प का मतलब है—बदल डालना।

🔶 अब आपको यहाँ से बदलते हुए जाना है। घर जाकर आपको अपना बदला हुआ रूप दिखाना है। घर जाकर के आपके भावी जीवन में आपका क्रिया-कलाप और आपका उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिसमें पिछले जीवन से कोई संगति न हो। आप एक, आपका ईमान दो, आपका भगवान तीन, तीन तो आप ही के हैं सहपाठी। इन तीनों के साथ में तो आप सारे जीवन की मंजिल पूरी कर सकते हैं। जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों के बहकावे में आएँ? जरूरी क्या है कि आप दूसरों को प्रसन्न करने की कोशिश करें? अपने ईमान को प्रसन्न कर लीजिए, बहुत है—भगवान को प्रसन्न कर लीजिए बहुत है।

🔷 आत्मा और परमात्मा को जो आदमी प्रसन्न कर सकते हैं, सारी दुनिया उनसे प्रसन्न रहती है अथवा चलिए यह मान लें—सारी दुनिया प्रसन्न न भी है, नाराज बनी है, तो उस नाराजगी से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। आपकी आत्मा नाराज हो, आपका परमात्मा नाराज और सारी दुनिया आपसे प्रसन्न बनी रहे और आरती उतारती रहे, तो उससे कुछ बनने वाला भी नहीं है। यही चिन्तन है, जो आपको एक महीने लगातार अपने मनःक्षेत्र में घुमाते रहना चाहिए। मन को बदलिए, सोचने के तरीके बदलिए, जीवन की कार्य-पद्धति बदलिये। बहुत कुछ बदलना है आपको। अगर बदल डालेंगे, तो मजा आ जाएगा! बस, आज तो मुझे इतना ही कहना था आपसे।

॥ॐ शान्ति:॥

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 76)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔷 सद्गुरु के ध्यान में रमी ऐसी ही एक गुरुकृपा सिद्ध महातपस्विनी माँ ज्योतिर्मयी का कथा प्रसंग बड़ा ही प्रेरक है। माता ज्योतिर्मयी का विवाह अल्पायु में उनके मायके वालों ने कर दिया था; पर देव का आघात उनके पति नहीं रहे। पति के बूढ़े माता-पिता भी इकलौते पुत्र के वियोग की वजह से स्वर्ग सिधार गए। इधर मायके वालों पर भी दुर्भाग्य की कुदृष्टि थी। वह थी भी माता-पिता की इकलौती कन्या। पुत्री की इस दारुण वेदना से विह्वल माता-पिता अधिक दिन जीवित न रह पाये। वे भी परलोकवासी हो गए। बारह-तेरह वर्ष की बालिका ज्योतिर्मयी का इस संसार में अपना कोई न रहा।
  
🔶 रोती-बिलखती, यह विधवा बालिका अपने जीवन के घने अँधेरे से घबरा गई। क्या करें? कहाँ जाएँगे? ये सवाल उसके सामने भूखे शेर की तरह गर्जने लगे। इनसे छुटकारा पाने के लिए उसके पास मात्र गंगा की गोद के सिवा और कोई भी रास्ता न था। सो उसने अपने गाँव के पास बहती हुई गंगा नदी की धारा में प्राण त्यागने की ठान ली। रात के घने अँधेरे में जब वह गंगा की गोद में छलाँग लगाने के लिए उद्यत थी, तभी किसी ने पीछे से आकर उसका हाथ पकड़ लिया। अचानक इस तरह हाथ पकड़ लेने पर वह चिहुँकी और चौंकी। पीछे मुड़कर देखा, तो गैरिक वस्त्रधारी एक वृद्ध संन्यासी खड़े थे। उनके श्वेत केश शुभ्र चाँदनी में चाँदी की तरह चमक रहे थे।
  
🔷 उन्होंने प्यार से उसका हाथ थाम कर केवल इतना कहा- बेटी! जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान् होता है। भगवान् अपने इस सबसे प्यारे बच्चे की सहायता के लिए किसी न किसी को अवश्य भेजता है। उसी ने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है। आओ तुम मेरे साथ आओ। उन संन्यासी के स्वरों में माँ की ममता थी। बालिका ज्योतिर्मयी ने उन पर सहज विश्वास कर लिया। वही उनके गुरु हो गए और भरोसा, गुरु का ध्यान ही उसका धर्म बन गया। इसी धर्म के निर्वाह में उसके दिवस-रात्रि बीतने लगे।
  
🔶 प्रातः स्नान आदि नित्यकर्मों से निबटकर वह सद्गुरु के ध्यान में खो जाती। सहस्रदल कमल पर गुरुदेव की भव्यमूर्ति का ध्यान यही उसकी साधना थी। नियमित अभ्यास के प्रभाव से ध्यान का चुम्बकत्त्व घना होता गया और इस चुम्बकत्व ने उसके प्राण प्रवाह की गति बदल दी। निम्नगामी प्राण विद्युत् ऊर्ध्वगामी होने लगी। जो ऊर्जा निम्न केन्द्रों पर एकत्रित रहती थी। अब उसने ऊर्ध्वगामी होकर चेतना के उच्च केन्द्रों को जाग्रत् करना प्रारम्भ कर दिया। चक्रों के जागरण, बेधन एवं प्रस्फुटन की क्रिया चल पड़ी। सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, काम करते हुए ज्योतिर्मयी की भावनाएँ सहस्रदल कमल में स्थापित सद्गुरु की चेतना में विलीन होती रहती थी। समय के साथ इसमें प्रगाढ़ता आती गयी।
  
🔷 वर्षों बीत गए और गुरु ने स्थूल देह का त्याग कर दिया; पर उनकी सूक्ष्म चेतना के साथ ज्योतिर्मयी का अभिनव साहचर्य था। वह हमेशा कहती थी कि सच्चा शिष्य हमेशा अपने गुरु के साथ रहता है। वह अपने गुरु में रहता है और गुरु उसमें समाए रहते हैं। अब उसका व्यक्तित्व सभी आध्यात्मिक सिद्धियों, शक्तियों एवं विभूतियों का भण्डार बन गया। आध्यात्मिक साधना की दुर्लभ कही जाने वाली अवस्थाओं को उसने सहज प्राप्त कर लिया। हालाँकि उसके आस-पास के लोग उसकी इस उच्च स्थिति से अनजान थे। उन्हें तो इस सत्य का तब पता चला, जब हिमालय की दुर्गम कन्दराओं में तप करने वाले योगिराज महानन्द ने उन्हें बताया कि तुम्हारे गाँव के पास गंगा किनारे वास करने वाली माँ ज्योतिर्मयी परम योगसिद्ध हैं और उन्हें यह अवस्था सद्गुरु के ध्यान से मिली है। इस सच को सुनकर सभी कह उठे- सद्गुरु की महिमा अनन्त! इस अनन्त महिमा के अनन्त विस्तार का अगला आयाम इस प्रकार है

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 118

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