शनिवार, 30 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 39):- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

शिष्य संजीवनी को शिष्यों ने अजस्र स्रोत के रूप में अनुभव किया है। इसके चिंन्तन्- मनन से उन्हें शिष्यत्व की सुगन्धि और पुष्टि का अहसास होता है। इससे उनकी भावनाएँ न केवल प्रगाढ़ होती हैं, बल्कि पवित्र भी होती हैं। इस क्रम में कइयों के मन में प्रश्र उठना स्वाभाविक है कि आयुर्वेद आदि चिकित्सा शास्त्र के ग्रन्थों में प्रत्येक संजीवनी के साथ अनुपान की विधि क्या है? सचमुच ही यह प्रश्र सार्थक है। प्रश्रकत्ताओं की भावनाओं की सघनता को दर्शाता है। इसके उत्तर में यही कहना है कि जो शिष्य संजीवनी का सेवन कर रहे हैं अथवा करना चाहते हैं, उन्हें इस उत्तम औषधि का सेवन अपनी समर्पित भावनाओं के साथ करना चाहिए। ये समर्पित भावनाएँ ही इस औषधि का अनुपान हैं।

इस अनुपात के साथ यह औषधि अनेकों गुना प्रभावी हो जाती है। इसके शुभ परिणामों में भारी बढ़ोत्तरी हो जाती है। जो इस महासत्य को अनुभव कर रहे हैं, उन्हें अपनी नीरव भावनाओं में उस दिव्य तत्त्व की अनुभूति होती है- जो शिष्यत्व का सार है। यह क्या है? किस तरह है? इसके लिए शिष्य संजीवनी के नवें सूत्र पर चिंन्तन् करना होगा। इसमें शिष्यत्व की साधना करने वाले श्रेष्ठ साधक कहते हैं- ‘समर्पित भावनाओं की प्रगाढ़ता में नीरवता प्रकट होती है। यह नीरवता ही वह परम शान्ति है, जिसकी कामना सभी साधक करते हैं। इस शान्ति से ही परा वाणी की अनुगूंज प्रकट होती है।

वह वाणी अपने परम मौन में शिष्य को कहती है कि काट तो तुम चुके अब तुम्हें बोना चाहिए। यह वाणी- शिष्य के अन्तःकरण की परम शान्ति एवं सघन नीरवता का ही एक रूप है। यह स्वयं तुम्हारे सद्गुरु के स्वर हैं। उन्हें विश्वास है कि तुम उनके आदेश का पालन करोगे। इस अवस्था में तुम अब ऐसे शिष्य हो जो अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। तुम ब्राह्मी चेतना के संकेतों को सुन सकते हो, देख सकते हो, बोल सकते हो। ऐसा इसलिए हो सका है, क्योंकि तुमने अपनी वासनाओं को जीत लिया है और आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/ek

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? (भाग 5)


कौन मना करेगा? कोई नहीं करेगा। खिला हुआ फूल बीबी के हाथ में रख दिया जाय, तो बीबी मना करेगी क्या? नाक से लगाकर सूँघेगी छाती से लगा लेगी और कहेगी कि मेरे प्रियतम ने गुलाब का फूल लाकर के दिया है। मित्रो! फूल को हम क्या करते हैं? उस सुगंध वाले फूल को हम पेड़ से तोड़कर भगवान् के चरणों पर समर्पित कर देते हैं और कहते हैं कि हे परम पिता परमेश्वर! हे शक्ति और भक्ति के स्रोत! हम फूल जैसा अपना जीवन तेरे चरणारविन्दों पर समर्पित करते हैं। यह हमारा फूल, यह हमारा अंतःकरण सब कुछ तेरे ऊपर न्यौछावर है।

हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं और तेरे पर बलि बलि जाते हैं। हे भगवान्! तू धन्य है। सूरज तेरी आरती उतारता है, चाँद तेरी आरती उतारता है। हम भी तेरी आरती उतारेंगे। तेरी महत्ता को समझेंगे, तेरी गरिमा को समझेंगे। तेरे गुणों को समझेंगे और सारे विश्व में तेरे सबसे बड़े अनुदान और शक्ति प्रवाह को समझेंगे। हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं, तेरे स्वरूप को देखते हैं। तेरा आगा देखते हैं, तेरा पीछा देखते हैं, नीचे देखते हैं। सारे मुल्क में देखते हैं। हम शंख बजाते हैं। शंख एक कीड़े की हड्डी का टुकड़ा है और वह पुजारी के मुखमंडल से जा लगा और ध्वनि करने लगा। दूर दूर तक शंख की आवाज पहुँच गयी। हमारा जीवन भी शंख की तरीके से जब पोला हो जाता है।

इसमें से मिट्टी और कीड़ा जो भरा होता है, उसे निकाल देते हैं।जब तक इसे नहीं निकालेंगे, वह नहीं बजेगा मिट्टी को निकाल दिया, कीड़े को निकाल दिया। पोला वाला शंख पुजारी के मुख पर रखा गया और वह बजने लगा। पुजारी ने छोटी आवाज से बजाया, छोटी आवाज बजी। बड़ी आवाज से बजाया, बड़ी आवाज बजी। हमने भगवान् का शंख बजाया और कहा कि मैंने तेरी गीता गाई। भगवान्! तूने सपने में जो संकेत दिये थे, वह सारे के सारे तुझे समर्पित कर रहे हैं। शंख बजाने का क्रियाकलाप मानव प्राणियों के कानों में, मस्तिष्कों में भगवान् की सूक्ष्म इच्छाएँ आकांक्षाएँ फैलाने का प्रशिक्षण करता है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.1

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एक छोटे बच्चे के रूप में, मैं बहुत स्वार्थी था, हमेशा अपने लिए सर्वश्रेष्ठ चुनता था। धीरे-धीरे, सभी दोस्तों ने मुझे छोड़ दिया और अब मेरे...