शुक्रवार, 11 जून 2021

👉 अपनी रोटी मिल बाँट कर खाओ

एक राजा था। उसका मंत्री बहुत बुद्धिमान था। एक बार राजा ने अपने मंत्री से प्रश्न किया – मंत्री जी! भेड़ों और कुत्तों की पैदा होने कि दर में तो कुत्ते भेड़ों से बहुत आगे हैं, लेकिन भेड़ों के झुंड के झुंड देखने में आते हैं और कुत्ते कहीं-कहीं एक आध ही नजर आते है। इसका क्या कारण हो सकता है?

मंत्री बोला – “महाराज! इस प्रश्न का उत्तर आपको कल सुबह मिल जायेगा।”  

राजा के सामने उसी दिन शाम को मंत्री ने एक कोठे में बिस कुत्ते बंद करवा दिये और उनके बीच रोटियों से भरी एक टोकरी रखवा दी।”

दूसरे कोठे में बीस भेड़े बंद करवा दी और चारे की एक टोकरी उनके बीच में रखवा दी। दोनों कोठों को बाहर से बंद करवाकर,वे दोनों लौट गये।

सुबह होने पर मंत्री राजा को साथ लेकर वहां आया। उसने पहले कुत्तों वाला कोठा खुलवाया। राजा को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि बीसो कुत्ते आपस में लड़-लड़कर अपनी जान दे चुके हैं और रोटियों की टोकरी ज्यों की त्यों रखी है। कोई कुत्ता एक भी रोटी नहीं खा सका था।

इसके पश्चात मंत्री राजा के साथ भेड़ों वाले कोठे में पहुंचा। कोठा खोलने के पश्चात राजा ने देखा कि बीसो भेड़े एक दूसरे के गले पर मुंह रखकर बड़े ही आराम से सो रही थी और उनकी चारे की टोकरी एकदम खाली थी।

वास्तव में अपनी रोटी मिल बाँट कर ही खानी चाहिए और एकता में रहना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🌸हम बदलेंगे, युग बदलेगा।🌸

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३१)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

मल-मूत्र की गठरी के ऊपर प्रकृति ने एक आकर्षक खोल चढ़ाया हुआ है ताकि वह घृणित पिटारा सर्वत्र दुर्गन्ध बखेरता न फिरे। लोग इस आवरण पर मुग्ध हो जाते हैं, रूप, यौवन पर लट्टू होते हैं। सौन्दर्य की शाश्वत प्यास सुकोमल पुष्प से लेकर बाल सुलभ भोलेपन तक से सर्वत्र सहज ही तृप्ति की जा सकती पर विकारी दृष्टि के साथ जुड़ी हुई कामुक लिप्सा नर-नारियों को बेतरह उद्विग्न करती रहती है और उन्हें न चलने योग्य मार्ग पर चलाती है। मूत्र त्याग के घृणित अंगों की तनिक सी खुजली न जाने किससे क्या-क्या नहीं कर लेती। यदि मोहान्ध दृष्टि का पर्दा उठ सका होता तो शारीरिक रूप, यौवन की—यौन लिप्सा की मदोन्मत्ता का नशा सहज ही उतर जाता और पंचभूतों से बने जड़-कलेवर के पीछे आत्मा की ज्योति जगमगाती दीखती। कामुकता का स्थान पवित्र प्रेम भावनाओं ने ग्रहण कर लिया होता और नर-नारी के बीच के सम्बन्ध प्रकृति और पुरुष की तरह एक दूसरे के पूरक बनकर श्रेय साधन में संलग्न रहे होते। आज का नारकीय दाम्पत्य-जीवन तब स्वर्गीय सुषमा बखेर रहा होता। ऐसे उच्च आदर्शों को आधार मानकर बनाये गये गृहस्थ तब स्वर्ग की प्रतिमूर्ति बनकर धरती को आनन्द, उल्लास से भर रहे होते और नर-रत्नों की पीढ़ियां सृजी जातीं। यह पिशाचिनी माया ही है जिसने रूप, सौन्दर्य को परखने का दृष्टि दोष उत्पन्न करके आत्मतत्व को तिरस्कृत और चमड़ी की चमक को गौरव प्रदान किया है।

अपना स्वरूप, अपना लक्ष्य, अपना कर्त्तव्य यदि मनुष्य समय सका होता तो उसका चिन्तन और कर्तृत्व अत्यन्त उच्चकोटि का होता ऐसे नर को नारायण कहा जाता और उसके चरण जहां भी पड़ते वहां धरती धन्य हो जाती। पर अज्ञान के आवरण को क्या कहा जाय जिसने हमें नर-पशु के स्तर पर देखने और उसी प्रकार की रीति-नीति अपनाने के लिए निकृष्टता के गर्त में धकेल दिया है। माया का यही आवरण हमें नारकीय यातनाएं सहन करते हुए रोता, कलपता जीवन व्यतीत करने के लिए विवश करता है।

संसार को जैसा कि हम देखते, समझते हैं वह पूर्व प्रचलित भ्रान्त धारणाओं पर और मस्तिष्क सहित इन्द्रियों के ज्ञान पर आधारित है। यदि हम एक बार इन दोनों आधारों की अप्रामाणिकता और अक्षमता को स्वीकार करलें तथा नये सिरे से अपने सम्बन्ध में, सम्बन्धित व्यक्तियों तथा पदार्थों के सम्बन्ध में समस्त विश्व ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में नये तर्क पूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करना आरंभ करें तो तथ्य बिलकुल दूसरे ही स्तर के सामने आवेंगे और वही प्रतिपादन सोलहों आने सत्य सिद्ध होगा जिसे वेदान्त दर्शन में निर्धारित किया गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ४९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३१)

भक्त का जीवन निर्द्वंद्व व सहज होता है

देवर्षि के वचन सभी की कर्ण सरिता से प्रवाहित होकर हृदय सागर में विलीन होते गये। अद्भुत रस था प्रभु पार्षद नारद की वाणी में। कुछ क्षण को तो लगा कि सभी को भावसमाधि हो गयी परन्तु तभी महर्षि क्रतु ने चेताया-‘‘देवर्षि! ऐसा भी तो हो सकता है कि अंतर्चेतना भक्ति में इतनी भीग जाय कि लोक एवं वेद सब कुछ स्वयं ही बिसर जाय।’’ ‘‘हाँ, सम्भव है ऐसा’’, ब्रह्मर्षि पुलह का स्वर था यह। वह कह रहे थे कि ‘‘भावुकता जब भाव-महाभाव में परिवर्तित होती हुई परिपक्व प्रेम में प्रतिष्ठित होती है तो सभी विधि-निषेध खोने लगते हैं। आत्मबोध इतना प्रगाढ़ होता है कि देहबोध विस्मृत होने लगता है। भक्त भगवन्मय होता है, ऐसे में कैसे निभे आचारविधान? किस तरह से किए जाएँ कठोर कर्म?’’
    
पुलह के इस प्रश्न पर देवर्षि नारद का मौन टूटा। उनके हृदय से भक्ति की झंकार उठी और अधरों से फूट पड़ी। उन्होंने कहा-
‘लोकोऽपिपितावदेव किन्तु
भोजनादि व्यापारस्त्वा-शरीरधारणावधि’॥ १४॥
‘लौकिक कर्मों को तब तक (ब्रह्मज्ञान रहने तक) विधिपूर्वक करना चाहिए, पर भोजनादि कार्य, जब तक शरीर रहेगा, होते रहेंगे।’
    
इस सूत्र के उच्चारण के साथ देवर्षि ने ऋषियों एवं देवों की दिव्यता को निहारा और कहने लगे- ‘‘यह सूत्र पूर्व सूत्र का ही उत्तर भाग है। दोनों को एकीकृत करके समझना चाहिए। सच यही है कि नियम एवं मर्यादाओं की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए। इन्हें अपने आप मनमाने ढंग से छोड़ देने पर पतन की आशंका बढ़ जाती है, परन्तु भावों में भीगी चेतना जब भक्ति में प्रतिष्ठित हो जाती है, तब ये सभी बाहरी आचार-नियम सहज ही छूट जाते हैं। हाँ, जब तक शरीर रहता है, तब तक भोजन आदि कर्म होते रहेंगे, क्योंकि इनके बिना शरीर की रक्षा सम्भव नहीं है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६२

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...