शनिवार, 26 मई 2018

👉 हिंसा का बीज़

🔶 कस्बे में एक महात्मा थे। सत्संग करते और लोगों को धैर्य, अहिंसा, सहनशीलता, सन्तोष आदि के सदुपदेश देते। उनके पास सत्संग मे बहुत बड़ी संख्या में भक्त आने लगे। एक बार भक्तों ने कहा महात्मा जी आप कस्बे में अस्पताल, स्कूल आदि भी बनवाने की प्रेरणा दीजिए। महात्मा जी ने ऐसा ही किया। भक्तों के अवदान और परिश्रम से योजनाएं भी बन गई। योजनाओं में सुविधा के लिए भक्तों नें, कस्बे के नेता को सत्संग में बुलाने का निर्णय किया।

🔷 नेताजी सत्संग में पधारे और जनसुविधा के कार्यों की जी भरकर सराहना  की और दानदाताओं की प्रशंसा भी। किन्तु महात्मा जी की विशाल जनप्रियता देखकर, अन्दर ही अन्दर जल-भुन गए। महात्मा जी के संतोष और सहनशीलता के उपदेशों के कारण कस्बे में समस्याएं भी बहुत कम थी। परिणाम स्वरूप नेता जी के पास भीड कम ही लगती थी।

🔶 घर आकर नेताजी सोच में डूब गए। इतनी अधिक जनप्रियता मुझे कभी भी प्राप्त नहीं होगी, अगर यह महात्मा अहिंसा आदि सदाचारों का प्रसार करता रहा। महात्मा की कीर्ती भी इतनी सुदृढ थी कि उसे बदनाम भी नहीं किया जा सकता था। नेता जी अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे।आचानक उसके दिमाग में एक जोरदार विचार कौंधा और निश्चिंत होकर आराम से सो गए।

🔷 प्रातः काल ही नेता जी पहूँच गए महात्मा जी के पास। थोडी ज्ञान ध्यान की बात करके नेताजी नें महात्मा जी से कहा आप एक रिवाल्वर का लायसंस ले लीजिए। एक हथियार आपके पास हमेशा रहना चाहिए। इतनी पब्लिक आती है पता नहीं कौन आपका शत्रु हो? आत्मरक्षा के लिए हथियार का पास होना बेहद जरूरी है।

🔶 महात्मा जी नें कहा, “बंधु! मेरा कौन शत्रु?  शान्ति और सदाचार की शिक्षा देते हुए भला  मेरा कौन अहित करना चाहेगा। मै स्वयं अहिंसा का उपदेश देता हूँ और अहिंसा में मानता भी हूँ।” नेता जी नें कहा, “इसमें कहाँ आपको कोई हिंसा करनी है। इसे तो आत्मरक्षा के लिए अपने पास रखना भर है। हथियार पास हो तो शत्रु को भय रहता है, यह तो केवल सावधानी भर है।” नेताजी ने छूटते ही कहा, “महात्मा जी, मैं आपकी अब एक नहीं सुनूंगा। आपको भले आपकी जान प्यारी न हो, हमें तो है। कल ही मैं आपको लायसंस शुदा हथियार भैंट करता हूँ।”

🔷 दूसरे ही दिन महात्मा जी के लिए चमकदार हथियार आ गया। महात्मा जी भी अब उसे सदैव अपने पास रखने लगे। सत्संग सभा में भी वह हथियार, महात्मा जी के दायी तरफ रखे ग्रंथ पर शान से सजा रहता। किन्तु अब पता नहीं, महाराज जब भी अहिंसा पर प्रवचन देते, शब्द तो वही थे किन्तु श्रोताओं पर प्रभाव नहीं छोडते थे। वे सदाचार पर चर्चा करते किन्तु लोग आपसी बातचित में ही रत रहते। दिन प्रतिदिन श्रोता कम होने लगे।

🔶 एक दिन तांत्रिकों का सताया, एक विक्षिप्त सा  युवक सभा में हो-हल्ला करने लगा। महाराज नें उसे शान्त रहने के लिए कहा। किन्तु टोकने पर उस युवक का आवेश और भी बढ़ गया और वह चीखा, “चुप तो तूँ रह पाखण्डी” इतना सुनना था कि महात्मा जी घोर अपमान से क्षुब्ध हो उठे। तत्क्षण क्रोधावेश में निकट रखा हथियार उठाया और हवाई फायर कर दिया। लोगों की जान हलक में अटक कर रह गई।

🔷 उसके बाद कस्बे में महात्मा जी का सत्संग वीरान हो गया और नेताजी की जनप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2018



👉 आज का सद्चिंतन 27 May 2018


👉 यह अच्छी आदतें डालिए (भाग 5)

जागरुकता :-

🔶 जो जीवन में जागरुक रहता है, उन्मत्त होता रहता है। जो तन्द्रा आलस्य या विलास में सोया रहता है, क्षय और पतन को प्राप्त होता है। जागरुक व्यक्ति अपने चारों ओर, संसार में देश तथा समाज में होने वाले क्रम तथा घटनाओं पर तीखी दृष्टि रखता है और उनसे लाभ उठाता है।

🔷 जागरुकता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से चौकना रहता है। उसका मन संसार की प्रगति को देखता रहता है। उसमें शैथिल्य और आलस्य नहीं रहता। सतर्क पहरेदार की भाँति वह अपने इर्द गिर्द के परिवर्तनों को देखता और उनसे लाभ उठाता है। डाक्टर को देखिए, सिपाही या मल्लाह को देखिए, वे कैसे चुस्त, सतर्क, जागरुक रहते हैं। अपने काम पर तीखी दृष्टि लगाये रहते हैं। आध्यात्मिक जगत् के पथिक के लिए जागरुकता अतीव आवश्यक गुण है।

🔶 जीवन में अपने कर्त्तव्यों, उत्तरदायित्वों, आगे आने वाली जिम्मेदारियों, व्ययों के प्रति जागरुक रहिये। आपकी प्रगति कैसी हो रही है, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, शारीरिक सभी रूपों में आप कितना आगे बढ़ रहे हैं, अथवा नीचे सरके आ रहे हैं?—यह चौकन्ने हो कर नापते रहिये। चौकन्ना व्यक्ति आने वाले खतरों से मार नहीं खाता। जरासा खतरा देखते ही वह गिलहरी की तरह जागरुक हो उठता है और बच निकलता है।

🔷 वे ही व्यक्ति अधिक वेतन प्राप्त करते हैं, जिनमें जागरुकता की अधिक आवश्यकता होती है। एंजिन तथा हवाई जहाज के चालक, बम चलाने वाले, मोटर ड्राइवर, डाक्टर, इंजीनियर, मजिस्ट्रेट इत्यादि सब ही को जिस गुण की अतीव आवश्यकता है, वह सतत् चेतनशीलता है।

🔶 शरीर में रोगों की ओर से सतर्क रहिये। तनिक सी लापरवाही से इन रोगों का अत्यधिक विकास हो सकता है। तनिक सी अशिष्टता से लड़ाई, झगड़ा, मुकदमेबाजी तक की नौबत आ सकती है। चारों ओर से आक्रमण आ सकते हैं पर जागरुकता सबसे हमारी रक्षा कर सकती है। अच्छा सेनापति सब जरूरतों के लिए तैयार रहता है।

📖 अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1955 पृष्ठ 20
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/April/v1.20

👉 Truthfulness (Last Part)

🔶 Personnel of the armed forces and intelligence agencies have strict instructions to gather information from others but not to divulge facts about themselves. This appears to be a clear encouragement to falsehood. But behind it is the exalted aim of national security and crime investigation. Hence, in such cases recourse to apparent lies can in no way be considered unbecoming or demeaning. Dharmaraj Yudhishthira, While confirming the death of Ashwathama, simply added in a low tone, ‘naro wa Kunjro wa’ (Either a man of this name or an elephant).

🔷 Many an elephant had died in the Mahabharat war. Yudhisthir instead of clarifying the position took recourse to a half truth. Even Lord Krishna, sensing that Arjun might have to die instead of Jayadratha, created the mirage of a sunset with the help of his ‘Sudarshan Chakra’. Thus, Arjuna’s life was saved and instead Arjun was able to kill Jayadrath to fulfill his vow. The seemingly deceptive trick played by Krishna served the cause of truth by serving the life of the greates warrior of the age fighting against the forces of evil.

🔶 All these epochal episodes are not meant to encourage falsehood, nor to paint truth as impractical. Honesty and truthfulness are indeed the basic moral and ethical values to be practiced in our lives.

🔷 We must not indulge in adulteration, or profiteering; must use correct weights and measures, and have transparent book keeping. But by the same token, it is not at all necessary to play Harishchandra before a thief or a ‘thug’, reveal to him details of one’s money and valuables and thus facilitate and encourage theft and dacoity.

📖 Akhand Jyoti- Feb 2001

👉 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिये (भाग 3)

🔶 बात यहीं तक समाप्त नहीं होती। हमारे दाम्पत्य जीवन के आदर्श भी अब वही होते जाते हैं जो पाश्चात्य देशों के हैं। पतिव्रत और पत्नीव्रत पश्चिम में भी विदा करने की तैयारी हो चुकी है। सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा उस संस्कृति में बेकार मानी जाती है, हम भी सम्मिलित परिवारों को समाप्त कर रहे हैं। विवाह होते ही पति पत्नी सारे कुटुम्ब से अलग रहने की बात सोचते हैं और वही करते हैं। पश्चिम में आहार की स्वच्छता रहती है पर पवित्रता को व्यर्थ माना जाता है। हम भी जिस तिस के हाथ का बना भक्ष अभक्ष का विचार छोड़कर चाहे जो खाने लगे हैं।

🔷 पश्चिम वासियों का दृष्टिकोण खाओ पीओ मजा करो है। हम भी ऊंचे आदर्शवाद का कष्ट साध्य जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा को त्याग कर विलासी जीवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं और जिस प्रकार भी नीति अनीति से सम्भव हो उसके साधन जुटाने में कटिबद्ध हो रहे हैं। ईसाइयत हमें प्यारी लगती है। हिन्दुत्व, बेवकूफी का चिन्ह प्रतीत होता है। शेक्सपियर और मिल्टन हमें विद्वान दीखते हैं, कालिदास और भवभूति का नाम भी याद नहीं होता।

🔶 क्या हमारे लिए यह उचित होगा कि अपनी महान जाति को इस सांस्कृतिक पराधीनता के चंगुल में फंसते हुए देखते रहें और चुपचाप आंसू बहाते रहें। नहीं, इतने से काम न चलेगा। हमें अपने राष्ट्रीय और जातीय गौरव की रक्षा के लिए ही नहीं—मानवता, धार्मिकता और अध्यात्मिकता के आदर्शों को जीवित रखने के लिए उस भारतीय संस्कृति को जीवित रखना होगा जिसकी गोद में पलकर इस के निवासी देवता की पदवी प्राप्त करते हैं। जो संस्कृति घर-घर में नर रत्नों को, महापुरुषों को जन्म देने की अपनी प्रामाणिकता लाखों वर्षों से प्रमाणित करती आ रही है, उसे इस प्रकार आसुरी संस्कृति से पद दलित और परांगमुख होते देखना हमारे लिए एक बड़ी हल लज्जास्पद बात होगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 8

👉 आध्यात्म पथ के पथिकों! अपरिग्रही बनो!!

🔶 मन से हर एक को सदैव अपरिग्रही होना चाहिए। आदर्श यही सामने रहना चाहिए कि सच्ची जरूरतें पूरी करने के लिए ही कमायें, जोड़ने जमा करने या ऐश उड़ाने के लिए नहीं। यदि गरीब आदमी लखपती बनने के मनसूबे बाँधता है तो वह परिग्रही है। धन वैभव के बारे में यही आदर्श निश्चित किया होना चाहिए कि सच्ची जरूरतों की पूर्ति के लिए कमायेंगे, उतनी ही इच्छा करेंगे, उससे अधिक संग्रह न करेंगे। धन को जीवन का उद्देश्य नहीं वरन् एक साधन बनाना चाहिए। “आत्मोन्नति और परमार्थ” जीवनोद्देश्य तो यही होना चाहिए।

🔷 जीवन धारण करने योग्य पैसा कमाने के अतिरिक्त शेष समय इन्हीं कार्यों में लगाना चाहिए। पैसे की आज जो सर्वभक्षी तृष्णा हर एक के मन में दावानल की तरह धधक रही है यह सर्वथा त्याज्य है। सादगी और अपरिग्रह में सच्चा आनन्द है। मनुष्य उतना ही आनन्दित रह सकता है जितना अपरिग्रही होगा। परिग्रही के सिर पर तो अशान्ति और अनीति सवार रहती है। इसी मर्म को समझते हुए योग शास्त्र के आचार्यों ने आध्यात्म पथ के पथिक को अपरिग्रही बनने का आदेश किया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड-ज्योति जनवरी 1944 पृष्ठ 1