शनिवार, 4 मई 2019

👉 सच्चे मित्र

कोई भी व्यक्ति संसार में अकेला नहीं जी सकता, क्योंकि वह अल्पशक्तिमान् है। इसलिए अपने सारे काम स्वयं नहीं कर सकता। एक दूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है। और सब लोग, सब की सहायता करते नहीं। सहायता लेने देने के लिए एक आपसी संबंध होता है, जिसे मित्रता कहते हैं। मित्र का अर्थ होता है, स्नेह करने वाला. यह स्नेह संबंध चाहे मां बेटी में हो, चाहे पिता पुत्र में हो, चाहे पति-पत्नी में हो, चाहे दो दोस्तों में हो,  इन सब में जो स्नेह का संबंध है, वही मित्रता है।

मित्र ऐसा बनाएं, जो एक दूसरे के कष्ट को समझे, और हृदय से उस की समस्याओं को दूर करने का पूरा प्रयत्न करे।

संसार में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे, जिनमें इस प्रकार की मित्रता देखी जाती है। उदाहरण के लिए यदि बेटा बीमार हो जाए, तो माता-पिता को नींद नहीं आती। दिन-रात उसकी सेवा करते हैं। और पूरी शक्ति लगाकर वैद्य डॉक्टरों की सहायता से उसे स्वस्थ बना देते हैं । ऐसे ही यदि माता पिता को कष्ट हो, यदि वे रोगी या वृद्ध हो जाएँ, तो बच्चों को भी वैसी ही सेवा करनी चाहिए, जैसी माता पिता अपने बच्चों की करते हैं। बस इसी संबंध का नाम सच्ची मित्रता है। अन्यथा बहुत से लोग मित्रता का केवल दिखावा करते हैं। सच्ची मित्रता, सच्चा स्नेह उनमें नहीं होता। ऐसे नकली मित्रों से और नकली रिश्तेदारों से सावधान रहें।

सब लोगों को पहचानें। जो हृदय से सेवा करते हैं, सच्चे मित्र हैं, उनके साथ ही जीवन जीने में, जीवन का सच्चा आनंद है।

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...