भौतिक उपलब्धियाँ कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हों वे तब तक उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकतीं जब तक उनमें सृजनात्मक प्रवृत्तियां न जुड़ी हों। ध्वंस में प्रयुक्त होने वाले साधन तो सामूहिक विनाश के कारण बनते हैं। आग भोजन पकाने, मशीनें चलाने तथा अन्यान्य कार्यों में प्रयुक्त होती हैं? सृजन की दिशा में उसका प्रयोग मानव मात्र के लिये उपयोगी बनता है। ध्वंस में प्रयुक्त हो तो वही आग कुछ ही क्षणों में दावानल का स्वरूप ग्रहण करके अगाध संपत्ति को नष्ट कर डालती है। रचनात्मक कार्यों में आने वाली एक वस्तु उपयोगी बन जाती है। वही ध्वंस में प्रयोग होने पर विनाश का दृश्य उपस्थित करती है।
मानवी व्यक्तित्व का विश्लेषण करने पर उसमें दोनों ही प्रवृत्तियां पायी जाती हैं। बुद्धि का योगदान तो इन दोनों में ही होता है, किन्तु एक के साथ सम्वेदनाओं का गुट जुड़े होने से रचनात्मक बनकर मानव मात्र के लिये उपयोगी बनती है। वहीं दूसरी प्रखर होते हुये भी सम्वेदनाओं से रहित होने के कारण स्वार्थी, संकीर्ण बनकर संकट ही खड़ा करती है।
महत्व उपलब्धियों का नहीं उनके साथ जुड़े उद्देश्यों का है। आदर्शों एवं सिद्धांतों के लिये प्रयुक्त होने वाले साधन ही मानवी विकास के आधार बनते। भले ही वे अल्प क्यों न हों, किन्तु महत्व उनका ही है जो सदुद्देश्य के लिये प्रयुक्त हों। सही अर्थों में वे ही सामाजिक विकास कारण होते हैं। बढ़े हुये साधन व्यक्ति विशेष के लिये उपयोगी हो सकते हैं। किन्तु आदर्शों के अभाव में तो संकट ही खड़ा करते हैं। समीक्षा की जाय तो बुद्धि का सही उपयोग जिस कारण बन पड़ता है- वह है मानवी सम्वेदना। उससे जुड़कर बुद्धि सृजनात्मक प्रवृत्तियां अपनाती तथा सबके लिए उपयोगी बनती हैं। साधनों का प्रयोग श्रेष्ठ कार्यों के लिए तभी हो पाता है। व्यक्ति तथा समाज का उत्थान-पतन इसी आधार पर निर्भर करता है।
बुद्धि के अनुदान भौतिक उपलब्धियों के रूप में सर्वत्र परिलक्षित हो रहे हैं। प्रकृति के एक से बढ़कर एक रहस्य इसके द्वारा खोले जा रहे हैं। वैज्ञानिक शोधों में इसकी ही प्रखरता दिखायी पड़ती है। बहिरंग जगत की सम्पन्नताएँ इसी के द्वारा बढ़ी हैं। किन्तु इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि मनुष्य बुद्धि एवं साधनों की दृष्टि से कितना भी विकसित क्यों न हो गया हो, मानवी गुणों की दृष्टि से उसका पतन ही हुआ है। इसका एक ही कारण है- जिस आधार पर व्यक्तित्व की श्रेष्ठता विनिर्मित होती है, उसकी उपेक्षा करना। दिव्य सम्वेदनाओं से रहित होने पर तो पशु प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलाता है। निरंकुश बुद्धि स्वार्थी, संकीर्ण बनकर सामाजिक विग्रह खड़ा करती है।
उद्देश्य के अनुरूप मनुष्य की विचारणा चलती तथा उसकी पूर्ति के लिए अनेकों जाल-जंजाल खड़े करती है। मानवी आदर्श यदि भौतिक साधनों की प्राप्ति तक ही सिमट कर रह गया है तो स्पष्ट है कि उसकी प्राप्ति के लिये मनुष्य नीति, अनीति पर ध्यान दिये बिना वह मार्ग अपनायेगा जो उसकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ेगी। अधिक संग्रह करने की होड़ चल पड़ेगी। मानवोचित्त आदर्शों से समाज विमुख हो जायेगा। स्पष्ट है कि इस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाने पर परस्पर असहिष्णुता, ईर्ष्या की भावना को ही पोषण मिलेगा। पशु प्रवृत्तियां पनपने तथा नर पशुओं की संख्या ही बढ़ती जायेगी।
इसे समय का अभिशाप ही कहा जाना चाहिए कि बुद्धि ने भौतिक उपलब्धियों को ही अपना आदर्श माना। उसे पाने के लिये अपनी सारी सामर्थ्य झौंक दी। प्रयत्न करने पर सफलता का मिलना असंदिग्ध है। सम्पन्नताएँ अनुगामी हुईं, किन्तु इतने मात्र से मनुष्य सन्तुष्ट न हो सका। अधिक प्राप्त करने एवं संग्रह की ललक बनी रही। प्रकृति के सीमित साधनों को यदि एक मनुष्य की झोली में डाल दिया जाय तो भी उसकी असीम तृष्णा की पूर्ति सम्भव नहीं है। अपूर्तिनीय तृष्णा की पूर्ति के लिये बुद्धि ने वह मार्ग अपनाया जो समस्त मानव जाति के लिए हानिकारक है।
.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1981
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