सोमवार, 13 जुलाई 2026

👉 विलासिता हमें अपंग करके छोड़ेगी (भाग १)

मानव का आदि वंश पाश्चात्य वैज्ञानिक पिथेकेण्ट्रोपस, सिनैण्ट्रोपस और निएन्टर पाल मानते है। इनकी आकृति से आज के मानव से तुलना करने से बड़ा अन्तर दिखाई देता है। क्रोमग्नन की तुलना में तो अब का मनुष्य पहचाना भी नहीं जा सकता। पाश्चात्यों की बात पाश्चात्य जानें पर हम अपने आपको जिस अपौरुषेय पूर्ण विकसित मनुष्य से वंश उत्पत्ति की बात मानते है, उनकी शक्ति शारीरिक रचना और सामर्थ्य की दृष्टि से आज के मनुष्य को तौलने है तो वह बिलकुल भिन्न और दीन-दुर्बल दिखाई देता है। इसका कारण उसकी अपनी भूलें है, जो उसने बिना बेचारे ही है, कर रहा है।

जीव वैज्ञानिक के अनुसार इस प्रक्रिया सृष्टि से सब जीव प्रभावित होते है। उदाहरणार्थ आज का जो आरंभ में लोमड़ी की शकल का था। तब सम्भवतः उसकी प्रकृति भी माँसाहारी थी। वह जंगलों में छिपा पड़ा रहता था। धीरे-धीरे उसने स्वभाव बदला घास खाने लगा। हिंसक प्रकृति के कारण पहले उसमें स्वाभाविक भय रहता था उसे छोड़ कर निर्भय मैदानों में रहने लगा। चिन्तायें छोड़ देने से जिस प्रकार दुर्बल लोगों के स्वास्थ्य भी बुलन्द हो जाते है, उसी प्रकार वह भी अपने डील–डौल को सुडौल बनाता चला आया। धीरे-धीरे मनुष्य उसे प्यार करने लगा और उससे अस्तबल की शोभा बढ़ने लगी। आज उसी लोमड़ी जैसे घोड़े की सुन्दरता साधारण व्यक्तियों से लेकर राजाओं महाराजाओं को भी आकर्षित करती है, उसकी शक्ति की तुलना मशीनों से की जाती है।

इसके विपरीत लुप्त जन्तु-शास्त्र (मिसिंग लिंक) के अध्ययन से पता चलता है कि पहले किसी समय पृथ्वी पर कई सुडौल और चरम सीमा तक विकसित जीव पाये जाते थे। किन्तु इन जन्तुओं ने अपने रहने सहने में हद दर्जे की कृत्रिमता उत्पन्न की और अद्यावधि ही नष्ट हो गये। आज मनुष्य जो उत्तरोत्तर विलासी जीवन की ओर अग्रसर होता जा रहा है तथा जनसंख्या अनियन्त्रित रूप से बढ़ता जा रहा है, उसे देखकर कुछ जीव-शास्त्रियों का यह भी मत है कि मनुष्य को सम्भवतः कार्टून युग तक पहुँचने का अवसर ही न मिले अर्थात् वह बीच में ही समाप्त हो जाय।

एक ओर जहाँ परिश्रम के अभाव और प्राकृतिक दबाव के कारण मनुष्य बिलकुल क्षीणकाय हो जायेगा, यहाँ मानवीय शरीर और स्वभाव के विपरीत माँसाहार, मद्यपान आदि के कारण कुछ लोग ऐसा दैत्याकार भी हो सकते है, जिस तरह एक समय भूमध्य सागर टापू और चीन में भीमकाय मानव पैदा हो चुके है। यह लोग बड़े स्वेच्छाचारी और निर्द्वन्द्व विचरण करने वाले थे। पशु-पक्षियों को मार कर कच्चा ही खा जाते थे। कालान्तर में इन दैत्यों की चर्बी और मोटापे की बीमारी अनियन्त्रित हो गई और वे कुछ ही दिनों में अपने आप नष्ट हो गये। इस प्रकार की दैत्याकृतियाँ भी सामने आ सकती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग २)

निश्चय रखिये कि आप जो कुछ देखते है, वस्तुतः वह ही नहीं है। यदि वास्तव में वही होते तो अपने को पूर्ण और संतुष्ट अनुभव करते, आनन्दित और उल्लसित बातें मनुष्य अपने तन मन और क्रियाओं द्वारा अपने जिस रूप को व्यक्त करता है, वह उसका वह आदिरूप नहीं है जिसकी शोध वाँछनीय है। वह शरीर और उसके उपादान ही होता, तब तो वह अपने को हर समय जाने ही रहता, कुछ और जानने की आवश्यकता ही न होती। किन्तु आवश्यकता है, उसका अनुभव भी होता है और पूर्ति इच्छा थी। यही आवश्यकता इस बात की साक्षी है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप कुछ और है, जिसको जानना ही चाहिये। क्योंकि उसके बिना न तो पूर्णता प्राप्त हो सकती है और न अक्षय सुख शाँति।

जिस प्रकार एक छोटी सी वस्तु के पीछे एक बृहत् भण्डार, बूँद के पीछे समुद्र, बीज के पीछे वृक्ष और वायु की छोटी सी लहर के पीछे पवनमान अवस्थित है, इसी प्रकार हमारी चेतना के पीछे एक विराट् चेतना छिपी है। जिस प्रकार कोई एक इकाई किसी अनन्तता की साक्षी है, उसी प्रकार हमारी लघु चेतना किसी अखण्ड एवं असीमित चेतना की साक्षी है। जो कुछ वर्तमान अथवा दृश्यमान है, उसका एक आदि स्त्रोत होना ही चाहिये और वह होता भी है। वह प्रच्छन्न आदि स्त्रोत ही किसी वस्तु का सच्चा स्वरूप होती।

बूँद वस्तुतः बूँद नहीं होती है, उसका वास्तविक स्वरूप वह समुद्र है, जिससे वह आई है और जिसमें उसे लय हो जाना ही बीज को उसके उसी रूप में बीज मानना भूल है। बीज वस्तुतः विशाल वनस्पति है, जिससे वह उत्पन्न हुआ है और एक दिन अपना यह माध्यमिक रूप मिटाकर तद्रूप हो जाता है। वायु का लघु प्रवाह एक श्वाँस मात्र नहीं है। वह, वह सर्वव्यापक वायुमण्डल है, जिसमें वह आती और जिसमें जाकर लीन हो जाती है। इसी प्रकार लघु चेतन सागर है, जिसे परमात्मा कहते है और जिससे वह उत्पन्न होता है और अन्ततः जिसमें मिल जाता है। निस्संदेह मनुष्य आत्मा रूप में परमात्मा ही है। वह न शरीर है और न मन, बुद्धि, अहंकार आदि जो कि स्थूल रूप से प्रकट होता रहता है।
यदि सच्ची जिज्ञासा का सहारा लिया जाय तो आये दिन इस सत्य को अनुभव भी किया जा सकता है। यह सत्व तो सर्वथा मान्य ही है कि ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप है। 

संसार में जो कुछ सत्य, शिव और सुन्दर है, वह ईश्वर रूप है। जब मनुष्य किसी लहलहाती लता पर हँसते, झूमते किसी फूल को देखता है तो उसे उसके प्रति एक आत्मिक आकर्षण हो उठता है। वह उस सुविकसित एवं सुवासित पुष्प को देखकर केवल प्रसन्न ही नहीं होता बल्कि सोचने लगता है कि कितना अच्छा होता, यदि मैं भी इस पुष्प की तरह सुन्दर सुगंधित और विकसित होता। इसी की तरह संसार को आनन्द देता हुआ, हँसता खेलता और अपने ही आनन्द में मस्त होकर झूमता। हमारा रंग रूप भी इसी की तरह प्यारा प्यारा और आडम्बर रहित होता।

मनुष्य जब वर्षा ऋतु में बादलों की गरज से मत्त होकर नाचते मोर को देखता है तो ठगा सा खड़ा हो जाता है और सोचने लगता है- क्यों न मुझे इस मोर की तरह सुन्दर पंख मिले और क्यों न मैं भी इसकी ही तरह मस्ती पा सका। कितना सुख हो कि इसी की तरह मनमोहक कलेवर पाकर और इसी की तरह विभोरता पाकर मैं भी मदमस्त होकर नृत्य कर सकूँ। इसकी वाणी की तरह मुझे भी लोक रंजन बाह्य मिली होती तो मैं भी बोल बोल कर संसार को अपनी और आकर्षित कर लेता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 13 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 July 2026


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शनिवार, 11 जुलाई 2026

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग १)

आत्म स्वरूप का ज्ञान, जिज्ञासा द्वारा ही संभव है। हम वस्तुतः है क्या-यह बोध तभी हो सकता है, जब हम उसको जानने के लिए उत्सुक और उत्कंठित हो जिस विषय में कोई रुचि, कोई उत्कंठा नहीं होती उसको कदापि नहीं जाना जा सकता।

ज्ञान का जन्म जिज्ञासा द्वारा ही होता है। पूर्वकालीन ऋषियों को जिज्ञासा हुई कि वे यह जाने कि इस अपार और रहस्यमय सृष्टि का आदि उद्गम क्या है? उनकी इस जिज्ञासा ने उन्हें प्रेरित किया और वे साधना मार्ग से शोध में प्रवृत्त हुए, जिसके परिणामस्वरूप उस ईश्वर को खोज ही लाये, जो इस निखिल ब्रह्माण्ड का रचयिता, पालन कर्ता और लय कर्ता है। उनकी जिज्ञासा ने ही उन्हें यह श्रेय प्रदान किया कि वे सृष्टि के रहस्यों, उसके आदि स्त्रोत ईश्वर का पता ही नहीं लगा सके, बल्कि उससे सीधा सम्पर्क भी स्थापित कर सकें।
वैज्ञानिकों को प्रकृति के रहस्यों और उसके उत्पादनों की प्रक्रिया जानने की जिज्ञासा हुई और वे इस खोज में निरत हो गये। उन्होंने पृथ्वी, पवन, जल और अग्नि के भौतिक रहस्य को जाना और उसका उपयोग किया। उन्होंने वनस्पतियों, औषधियों और प्राणियों के आधिभौतिक स्वरूप की जिज्ञासा की, विज्ञाता ने उन्हें शोभा कार्यों में संलग्न किया। जिसके फलस्वरूप आज के विशाल भौतिक विज्ञान, औषधि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान आदि शास्त्रों की रचना हुई।

मानस शास्त्रियों को जिज्ञासा हुई कि यह जान कि मनुष्य के अन्दर चलने वाले द्वन्द्वों का क्या आधार है। जिज्ञासा ने सक्रियता प्रदान की और उन्होंने स्थूल शरीर से भिन्न एक ऐसे निराकार मानसिक संसार का पता लगा डाला, जो बाह्य जीवन का मुख्य आधार है और आज का मानस ज्ञान एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित है।

अध्यात्म, भौतिक और मानस शास्त्रियों यदि जिज्ञासा न हुई होती तो क्या यह सम्भव था कि यह वैचित्र्यपूर्ण बृहत् ज्ञान मनुष्य जाति के पास होता। जिज्ञासा ही किसी ज्ञान की आधार शिला है, उसकी जननी है। आत्म ज्ञान भी आत्म जिज्ञासा के बिना नहीं हो सकता। यदि अपना, सच्चा और वास्तविक रूप जानना है तो उसे जानने की प्रबल जिज्ञासा करनी होगी, इससे रहित अन्य कोई उपाय नहीं, जिससे मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान पा सके। अस्तु, आत्म ज्ञान के लिये जिज्ञासा करिये और उसकी अनुकूल सक्रियता के लिये विचार, भाव और दृष्टिकोण का निर्माण कीजिये आत्मनिरीक्षण करते हुए अनुभवों की लड़ी बनाते चलिये, एक दिन आपकी आत्म ज्ञान हो जायेगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969


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👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (अंतिम भाग)

बहुत से लोग कपटपूर्ण स्थिति वाले भी होते है। वे ऊपर से तो बड़े सज्जन और अनुरूप दिखलाई देने का प्रयत्न करते रहते है। उसी के अनुरूप बोलते और उसी के अनुरूप आचरण भी प्रदर्शित करते है। पर यह सब उनका होता दिखावा ही। उनका इस प्रकार का बाह्य अन्तर के छल पर एक आवरण होता है। अवसर पाते ही ऐसे कपटी व्यक्ति दूसरों की हानि करते देर नहीं करते। वास्तविकता तो यह होती है कि बाहर का आदर्श उनका एक जाल के समान होता है, एक छल और छलावा होता है। अवसर पाकर दूसरों को छल लेने का, धोखा देने का एक उपाय मात्र होता है। ऐसे छली और कपटी लोग स्वप्न में भी कभी सुख शाँति नहीं पा सकते। वे ऊपर से कितनी ही शाँति-सन्तोष और स्थिरता का अभिनय करने में क्यों न सफल हो जायें पर अन्दर ही अन्दर अशाँत, भीत व्यग्र बने रहते है। उनकी अन्तरात्मा उनकी कुरूपता पर उन्हें धिक्कारती रहती है। उन्हें स्पष्ट अनुभव होता है कि वे जो कुछ दिखला और कर रहे है, वह सब मिथ्या है। एक दिन इसका परिणाम उन्हें भोगना ही होगा। उनकी अन्तरात्मा उन्हें क्षमा नहीं करेगी और तब समय आयेगा तो यही आत्मा जो मनुष्य का मित्र कही गई है, शत्रु बनकर उनके सामने खड़ी हो जायेगी। 

तन, मन और बुद्धि की सारी शक्तियाँ कुण्ठित कर देगी और उनको परिणाम भोगने के लिए निर्बल से निर्बल करके डाल देगी। उभय रूपी व्यक्ति इस सारे सत्य को भली प्रकार जानते है और भविष्य के भय से हर समय जलते गलते रहते है।

इसी अन्तर बाहर को अनुरूपता के कारण, विरोधी चिन्तन के फलस्वरूप इतना मानसिक ताप हो जाता है कि बहुत बार मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ तक पैदा हो जाती है। इसी विरोधाभास के कारण हृदय कमजोर होकर बैठ जाते है और कभी कभी लोग इस आपत्ति से पागल तक हो जाते है। अन्दर बाहर का यह विरोधाभास भयंकर यातना भरी स्थिति है। इसमें कैसे अबुद्धिमान लोग एक क्षण को भी शाँति के लिए तरसते रहते है। इस द्विविधि जीवन से उसी तरह बचते रहना चाहिये, जिस प्रकार सावधान लोग दुमुँही साँप से बचते है।

इन दोनों उपायों के साथ सुख-शाँति की सुरक्षा करने के लिये, एक छोटी-सी आवश्यकता और है। वह है ‘सामंजस्य’। बिना सामंजस्य बुद्धि के भी काम नहीं चल सकता। यदि कोई व्यक्ति अन्तर से आदर्शवादी है और उसका बाह्य व्यवहार भी उसी के अनुरूप है, तथापि सामंजस्य गुण का अभाव है, तब भी वह दूसरों के गलत काम देख सुनकर अथवा अनुभव करके अशाँत होता रहेगा। असामंजस्य बुद्धि वाले व्यक्तियों का यह एक मिराज हो जाता है कि जैसा मैं आदर्शवादी हूँ, वैसा ही हर आदमी बने और जब वे इसके विरुद्ध देखते है तो अशाँत और व्यग्र होते है। इस अच्छाई बुराई से भरे संसार में सबका एक सा होना सम्भव नहीं। जो जैसा है उसे उसके भाग्य और अन्त पर छोड़कर अपनी सुख-शाँति की रक्षा करना ही चाहिये। आवश्यकता भर ड़ड़ड़ड़ को समझा, सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न तो करना चाहिये किन्तु इस विषय में इस सीमा तक भावुक न हो जाये कि उसके दुर्भाग्य में अपना भाग बना ले। मानवीय सद्भावना रखते हुए उसे उसके कर्मों पर छोड़िये, न उस पर क्रोध करिये और न क्षोभ। यदि उसकी बुराई के छींटे अपने आप पर भी कभी आ जाते है तो उन्हें सहन करिये, साधारण सामंजस्य बनाए रहिये और इस प्रकार अपनी सुख शाँति को प्रभावित मन होने दीजिये, यही बुद्धिमानी है और यही उचित है।

इस प्रकार जीवन में यदि स्थायी सुख शाँति की आकांक्षा है तो संतुलन, समरूपता और सामंजस्य का अभ्यास करिये। इनका अवलम्बन लिए बिना अभिमत फल की आशा नहीं की जा सकती।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 July 2026


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शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग ३)

जो मनीषी संतुलित मन वाले होते है। राग-द्वेष ईर्ष्या, स्पर्धा, उद्वेगों आवेशों से चलायमान नहीं होते, उनको और असन्तोष के कारण प्रभावित नहीं करने पाते। वे सुख दुख को धूप-छाँव की माया मात्र मानकर उनकी उपस्थिति में भीषण स्थिति में ही बने रहते है। न उनका मन विचलित होता है और न स्वयं वे। जिनका मन विविध विकारों और विकृतियों से भरा रहता है, जो क्षिप्त-विक्षिप्त और विक्षोभ के रोगी होते है, उनका मन संतुलित नहीं रहता, वे क्षण क्षण पर आन्दोलित और चलायमान होते हुए, सुख-दुख के झूले में झटके खाते रहते है। जिन्होंने प्रयत्नपूर्वक मन को स्थिरता, एकाग्रता और निरोध का अभ्यास करा लिया है, वे हर स्थिति और हर परिस्थिति में संतुलित रहकर सुख-शाँति के अधिकारी बनते है। मानसिक संतुलन सुख-सन्तोष का बहुत बड़ा आधार है, उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते ही रहना चाहिये।

अनुरूपता भी सुख शाँति का एक महत्वपूर्ण आधार है। अनुरूपता के अर्थ है अन्तर और बाह्य की अनुरूपता जिसका अन्तर पवित्र और आदर्शपूर्ण है, किन्तु उसके कार्य उसके अनुरूप नहीं है, तब भी सुख शाँति का सुलभ होना सम्भव नहीं। मन कुछ और चाहे, तन कुछ करता रहे- इससे भी मनुष्य में एक विरोध बना रहता है। अपनी अवहेलना होते रहने से मन सदा अक्लांत और संतत बना रहता है। जो अन्तर बाहर की द्विविधि स्थिति में पड़े रहते है, वे कभी संतुष्ट नहीं होते। उन्हें मन, की प्रेरणा पर चलने से तन की तृष्णायें सताती है और तन की प्रेरणा पर चलने से मन धिक्कारता है। बहुत बार बहुत से लोगों की नैतिक बुद्धि प्रबल होती है। अन्तरमन में आदर्श प्रेरणाएँ मचलती रहती है, किन्तु उन्होंने आदर्श व्यवहार का अभ्यास नहीं किया होता है। ऐसी स्थिति में उनसे यंत्रवत ही आदर्श से घिरे कार्य हो जाते है। जिससे पश्चाताप तो होता ही है साथ ही कर्मों के फलस्वरूप भी कष्ट और क्लेश उठाने पड़ते है।

इसी प्रकार बहुत से बाहर से बड़े सत्यनिष्ठ और आदर्शवादी होते है। वे सत्कर्म करने का प्रयत्न करते है। किन्तु उनका कुसंस्कारी मन उनका विरोध करता है। उनके किये पर स्वार्थ हानि, लाभ-हानि आदि का अभियोग लगाता है। बाहर से आदर्शवादियों को मन को ताड़ना में पड़ कर बड़ी भयंकर यातना उठानी पड़ती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं। (अंतिम भाग )

गीता का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि प्रसन्न रहने से सब प्रकार के दुखों का नाश हो जाता है। शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक सब प्रकार के दुःखों का इस एक ही ब्रह्मास्त्र से नाश हो जाता है। इसलिए जो लोग दुःखों से छुटकारा प्राप्त करके सुखी रहना चाहते हैं उन्हें उचित है कि अपने स्वभाव को हंसमुख बनावें। यह सोचना भूल है कि जिसके पास, धन, स्त्री, पुत्र, विद्या, स्वास्थ्य आदि साधन हैं, जो सम्पन्न है वह प्रसन्न रहेगा। हम देखते हैं कि इन सम्पदाओं से भरे पूरे असंख्यों मनुष्य मौजूद हैं पर उन्हें इन वस्तुओं के कारण सुख मिलने के कारण दूनी चिन्ताएं आ घेरती हैं। अनेकों नई समस्याएं, नई अड़चनें, नई बाधायें उनके सामने आती रहती हैं, एक जब तक गई नहीं कि दूसरी नई दस गुत्थियाँ सामने आ जाती हैं। इस प्रकार उसकी अशान्ति, अप्रसन्नता अपेक्षाकृत और भी अधिक बढ़ जाती हैं।

अधिक साधन होने से कोई सुखी नहीं हो सकता। सुख का हेतु दूसरा है जो गीता के उपरोक्त श्लोक के अन्तिम भाग में बता दिया गया है। प्रसन्न चित्त होने से तत्क्षण बुद्धि स्थिर हो जाती है। इसी को यों भी कह सकते हैं कि बुद्धि स्थिर होने से तत्क्षण मनुष्य प्रसन्न चित्त रहने लगता है। बुद्धि को, संसार की पंचभौतिक, नश्वर चीजों के लोभ में उछलने, कूदने से रोककर आत्म परायणता में लगा देने से वह स्थिर हो जाती है और इस स्थिरता के साथ ही प्रसन्नता का अजस्र स्त्रोत प्रवाहित होने लगता है। आत्मा के लाभ के जीवन का एकमात्र लाभ समझकर कर्त्तव्य परायण होने से हर कार्य में एक अद्भुत आनन्द आने लगता है। अस्थिर बुद्धि वाला, साँसारिक, अस्थिर पदार्थों को भोगने एवं जाम करने के फेर में पड़ा रहता है और पानी की लहरें पकड़ने के समान बार बार असफलता पर खीजता रहता है, पर स्थिर बुद्धि वाला, केवल मात्र अपने कर्त्तव्य पर ध्यान देता है, अपने धर्म को, उत्तरदायित्व को पूरी सावधानी के साथ निवाहता है। इस कार्य प्रणाली में सफलता हर घड़ी अपने हाथ में रहती है। मैं अपना कर्त्तव्य ठीक प्रकार पालन कर रहा हूँ, इस सफलता पर वह हर घड़ी प्रसन्न रहता है, हर घड़ी आत्म सन्तोष का अनुभव करता है।

परमात्मा के पुनीत उद्यान में, संसार में खेलने का जिसे अवसर मिला हुआ है, उसे हर घड़ी प्रसन्न रहना चाहिए। काले-सफेद, भले-बुरे, प्रिय-अप्रिय तथ्यों से भरा हुआ संसार कितना सुन्दर है इसे देखकर उसका हृदय कमल खिल जाता है। अच्छाइयों का मधुर स्पर्श करना और बुराइयों से लड़ना यह उभय पक्षीय कार्यक्रम सामने रखकर मानों भगवान ने मीठे और तीखे षट्रस व्यंजन हमारे जीवन थाल में परोसे हैं, उनके विविध स्वादों का विविध प्रकार का अनुभव करते हुए हमें उसी प्रकार आनंदित होना चाहिए जैसे स्वादिष्ट षट्रस व्यंजनों का आस्वादन करते हुए हम प्रसन्न होते हैं। सुख-दुख, गरीबी-अमीरी, आनन्द-क्लेश, भाव-अभाव अपने-अपने ढंग के व्यंजन हैं। यही सभी अपने अपने ढंग से स्वादिष्ट हैं। एक से दूसरे का महत्व है। विरोधी भाव न हो तो हर एक वस्तु नीरस हो जाय। दिन का महत्व रात के कारण होता है यदि रात न हो तो दिन के आनन्द का अनुभव ही न हो, इसी प्रकार सुख का आनंद दुख से है। दुख न हो तो जिन बातों में आज सुख समझा जाता है, फिर न समझा जा सकेगा। संसार की, जीवन की, हर स्थिति हमारे लिए मंगलमयी, आनंददायक है। स्थिति के अनुकूल अपने को बदलकर हर अवस्था में अपने को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

गीता कहती है सम्पूर्ण दुखों के निवारण का उपाय, प्रसन्न रहना है। हर वक्त, हर स्थिति में मुस्कुराते रहिए, निर्भय रहिए, निश्चित रहिए, कर्त्तव्य करते रहिए और प्रसन्न रहिए। पाठकों! बुद्धि को स्थिर करो और प्रसन्न रहो।

📖 *अखण्ड ज्योति जुलाई 1947*

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 10 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 July 2026


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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग २)

सुख-दुख का मन की स्थिति पर निर्भर होने का प्रमाण यह है कि बहुत बार मन को स्थिति के अनुसार मनुष्य एक ही बात में विपरीत अनुभूतियाँ पाया करता है। जिस समय मन स्वस्थ और शाँत होता है, उस समय कोई अप्रियता भी विक्षोभ उत्पन्न नहीं करने पाती और जब मन की स्थिति प्रतिकूल होती है तो प्रिय बातें भी अच्छी नहीं लगती। जैसे जब कोई पिता विनोद पूर्ण मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की शरारत में भी उसे आनन्द आता है किन्तु जब वह मलिन मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की उचित प्रसन्नता भी उस क्षुभित और दुःखी कर देती है। हानि लाभ की सूचनाओं में भी इसी तरह मनःस्थिति के अनुसार दुःख सुख होता रहता है। दुःख-सुख का जन्म बाहरी पदार्थों अथवा परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। उसका जन्म मन से मन में ही होता है। इसीलिए उन्हें मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है।

हमारे हृदय में सदा सुख का ही जन्म होता रहे, दुख की स्थिति में भी हम सुख का अनुभव करते रहें-इसके लिए आवश्यक है कि हम अपनी मनोभूमि को अनुकूल बनायें। मन की अनुकूलता का उपाय है ‘संतुलन’। संतुलन का आशय है, जल्दी जल्दी आन्दोलित न होना। उन्नति लाभ और सफलता के अवसरों पर खुशी से नाच उठना, हर्षातिरेक में जाना और गतिरोध, हानि अथवा असफलता के क्षणों में निराश, ह्रास अथवा शोकातिरेक से रो उठना वास्तव में मानसिक असंतुलन के लक्षण है।

अभ्यास पूर्वक यदि मनुष्य अपने इस मानसिक असंतुलन पर काबू रखने लगे तो वह एक सन्तोषप्रद सीमा तक सुख-दुख के घात-प्रतिघात से बचा रह सकता है। जो सुखात्मक अशाँत स्थिति में हर्षातिरेक से आन्दोलित हो उठेगा। दुःख के समय उसका शोक विह्वल हो उठना स्वाभाविक ही है। सुख का आघात तो एक हद तक सहा भी है। उससे अधिक हानि नहीं होती। केवल पुरुषोचित गाम्भीर्य और सुखोपभोग में समय की हानि अवश्य होती है बाकी हर्षातिरेक कोई गहरी हानि ऐसी हानि नहीं करता, जिसकी पूर्ति न हो सके अथवा दूर तक जिसका प्रभाव पड़े। किन्तु दुःख का आघात प्रायः असहाय होता है। उसके शक्तियों चेतना और यहाँ तक कि बुद्धि को भी दूरगामी हानि होती है। इसलिये सुख की अपेक्षा दुख के आघात से बचाव करना अधिक आवश्यक है। तथापि इसके उपाय मानसिक संतुलन की सिद्धि तभी सम्भव है, जब सुख के समय भी न आन्दोलित होने का अभ्यास रक्खा जाये। दुख के समय तो संभले रहने का प्रयत्न किया जाये और सुख के समय अतिरेक में बहते रहा जाये तो इस अधूरे प्रयत्न द्वारा प्रयोजन सिद्ध न होगा। यह तो एक और अभ्यास करना और दूसरी और उसे बिगाड़ लेना होगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 विलासिता हमें अपंग करके छोड़ेगी (भाग १)

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