मंगलवार, 26 मई 2026

👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 2)

बचपन में जो खिलौनों से चिपका रहता था अपना भविष्य बनाने में जी तोड़ परिश्रम करता है। उसकी प्रसन्नता इस बात में सन्निहित रहती है कि वैसे अधिक से अधिक योग्यता सम्पादित की जाय। सन्तुष्टि इस आकाँक्षा की पूर्ति से भी नहीं होती। एक की आपूर्ति दूसरे तरह की इच्छा को जन्म देती है। वयस्क होते ही अनुकूल साथी जीवन संगिनी की खोज चलती है। मिलते ही पत्नी के यौवन, रूप और लावण्य पर वह मुग्ध बना आनन्द की अनुभूति करता है। किन्तु यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं रहने पाती। शरीराकर्षण कुछ ही दिनों बाद समाप्त हो जाता है। तब तक प्रजनन का दौर चल पड़ता है।

नवागन्तुक शिशु प्रसन्नता का नवीन केन्द्र बिन्दु बनता है। उनकी किलकारियाँ सुनकर वह बड़े से बड़ा दुःख भी भूल जाता है। उसकी एक मुस्कान के लिए अपना सर्वस्व लुटाने के लिए मनुष्य तैयार रहता है। पर धीरे-धीरे वह आकर्षण भी कम होने लगा है जिससे प्रेरित होकर मानव बच्चे के लिए कष्ट उठाने के लिए तत्पर रहता था।
धनोपार्जन, संपदा संग्रह तथा लोकयश पाने की आकाँक्षा पूर्ति में वह अब सुख आनन्द ढूँढ़ने लगता है। तद्नुरूप प्रयासों का ताना बाना बुनता है। वह सब मिलने के बाद भी संतोष नहीं होता। अतृप्त और अशांत मनःस्थिति पुनः नये तरह के खेल खिलौने- मन बहलाने के साधन ढूंढ़ती है। सम्पूर्ण जीवन तो इन बाह्य प्रयासों में खप जाता है। जिसका मनुष्य आनन्द पाने का प्रयत्न करता है उतना ही वह उससे दूर होता चला जाता है।

हर मनुष्य की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। परस्पर एक दूसरे की अभिरुचियाँ भी भिन्न होती हैं। एक को एक तरह के काम में आनन्द आता है दूसरे को भिन्न प्रकार के काम में। स्वास्थ्य, धन, ऐश्वर्य, यश, सम्मान योग्यता की प्राप्ति में अधिकाँश व्यक्ति जीवन खपाते और तद्नुरूप सफलता मिलने पर मोद मनाते हैं। पर वह प्रसन्नता भी चिरस्थायी नहीं होती। कुछ ऐसे भी होते हैं जो समाज के ढर्रे से अलग हटकर अपना मार्ग चुनते हैं। वे असामान्य दुस्साहस का परिचय देते तथा ऐसे काम कर गुजरते हैं जिन्हें देखकर दांतों तले उंगली दवानी पड़ती है। जीवन के धनी व्यक्तियों को संकटों से युक्त कार्यों को करने में ही आनन्द आता है। कुछ व्यक्तियों की मनःस्थिति विकृत स्तर की बन जाती है। निकृष्ट कामों में ही उन्हें रस आता है। व्यसनी शराब के प्याले में आनन्द देखता और ढूंढ़ता है- उसी में डूबा रहता और अपना सर्वस्व गँवाता है। कामी कामतृप्ति की क्षणिक रसानुभूति में अपने शरीर को गलाता- मनःशक्ति को क्षीण करता रहता है। क्रूर आततायियों को जघन्य अपराधों को करने में प्रसन्नता होती है। दूसरों को रोते-कलपते, पीड़ा से कराहते-तड़पते देखकर आनन्द आता है। इसकी विकृति उनसे हत्या जैसे पाप कराती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 3)

किसी तरह की भावनाएँ चिन्तन में- विचार तरंगों में- प्रखरता उत्पन्न करती हैं? एक ही शब्द में यदि इसका उत्तर देना हो तो कहना होगा- आदर्शवादी भावनाएँ। आदर्शवादी भावनाएँ ही मनुष्य को उच्च स्तर का चिन्तन करने के लिए प्रेरित करती हैं। उस स्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवा भावी लोग अपनी तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ता हो। यही बात दुष्ट दुरात्माओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि सन्धियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर देते हैं तथा कुमार्गगामिता की ओर बढ़ाने लगते हैं। पतन का एक प्रवाह ही चल पड़ता है।

समान विचार वाले लोगों को अपने स्तर के नये विचार अन्तरिक्ष में व्याप्त ईथर तत्व से मिलते रहते हैं। या कि कहना चाहिए, उन्हें वहाँ से पोषण मिलता रहता है। सजातीय तत्वों के आकर्षण का प्रकृति नियम सर्वविदित है। धातुओं के कण धूलि में बिखरे रहते हैं परन्तु जिधर इन धातुओं की खदानें होती हैं उधर ये कण धीरे-धीरे सहज ही खिसकते तथा खदान में इकट्ठे होते जाते हैं। सभी नदियाँ समुद्र की दिशा में सहज ही बहती हैं। नाले नदियों की तरफ दौड़ते हैं। विचार भी अपने सजातीय विचारों की ओर उसी तेजी से दौड़ते हैं और वहाँ अपना रंग जमाते हैं। चोरी, लबारी, जुआरी, व्यभिचारी अपनी जमात जोड़ लेते हैं तो इसका यही कारण है और सन्त सज्जनों के सत्संग जमे रहते हैं तो इसका कारण भी यही है। अर्थात् जहाँ जिस स्तर के विचार उठ रहे होंगे वहाँ उसी स्तर की अन्य लोगों द्वारा छोड़ी गई विचार तरंगें भी आकर्षित होती हैं और अपना अड्डा जमा लेती हैं।

इस तथ्य को यों भी समझा जा सकता है कि हमारा रेडियो उन्हीं प्रसारणों को पकड़ता है जिन पर उसकी सुई अड़ी होती है। उस समय अन्य रेडियो स्टेशनों से अन्य प्रसारण भी होते रहते हैं, पर हम केवल अपनी रुचि का स्टेशन और प्रोग्राम ही सुनते हैं। अन्य प्रसारण अपनी राह चले जाते हैं, अपने रेडियो यन्त्र से उन्हीं का संपर्क हो पाता है जिन्हें अपना रेडियो पकड़ता है। विचार तरंगों को भी रेडियो तरंगों का सहधर्मी-सहकर्मी माना जा सकता है। वे उठती उमड़ती हैं और सभी को स्पर्श भी करती हैं। सभी पर वे सूक्ष्म प्रवाह भी छोड़ती हैं, पर विशेष प्रवाह अपने सजातियों पर ही डालती हैं। सज्जनों का मस्तिष्कीय चुम्बकत्व प्रायः उन्हीं को आकर्षित करता है, जिनमें सज्जनता के अंकुर पहले से ही मौजूद हों। दुर्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 26 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 26 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

सोमवार, 25 मई 2026

👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 1)

कस्तूरी की खोज में हिरन भटकता रहता है। वनों, कन्दराओं में वह ढूंढ़ता है, पर कहीं नहीं मिलती। जो भीतर है उसे बाहर खोजने में उसका जीवन खप जाता है। व्यर्थ की इस भाग दौड़ से उसे निराशा ही हाथ लगती है। अतृप्ति यथावत् बनी रहती है। यह बोध हो सके कि जिसे प्राप्त करने की आकुलता में वह वन एवं कन्दरा में विचरता रहता है वह उसके अपने ही भीतर विद्यमान है तो उसे तृष्णा की आग में इस तरह न जलना पड़े। उसकी निकटता प्राप्त कर मृग स्वयं परितृप्त हो जाय।

मृग ही क्यों? मनुष्य भी तो आनन्द की खोज में मृग मरीचिका की तरह जीवन पर्यन्त भटकता रहता है। आनन्द की प्राप्ति उसकी मूलभूत माँग है। बचपन से लेकर जरावस्था तक वह इस आकाँक्षा की पूर्ति में लगा रहता है। पर हिरन की भाँति दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण मनुष्य सोचता है कि आनन्द के स्रोत बाहर हैं। दृश्य संसार और उससे सम्बद्ध परिवर्तनशील पदार्थों के आकर्षण में वह स्थायी और शाश्वत आनन्द की खोज करता है। इन्द्रियों की तुष्टि के लिए विषय रूपी साधन जुटाता है। पर उनका उपभोग अतृप्ति की आग को और भी अधिक भड़काता और बढ़ाता है।

बचपन से लेकर वृद्धावस्था की मध्यावधि में शारीरिक एवं मानसिक स्थिति में अनेकों तरह के परिवर्तन होते हैं। उन परिवर्तनों के साथ-साथ आनन्द प्राप्ति के बाह्य साधन भी बदलते रहते हैं। शैशव अवस्था की माँग अलग प्रकार की होती है और किशोरावस्था की अलग। युवा वय की मनःस्थिति और वृद्धों की मनःस्थिति सर्वथा एक दूसरे से भिन्न प्रकार की होती है। इस कारण आनन्द प्राप्ति के बाह्य स्रोत की क्रमिक रूप से बदलते रहते हैं। नवजात शिशु माँ की छाती से चिपकता रहता है। पय पान में ही उसे सामयिक तृप्ति मिलती है। पर थोड़ा बड़ा होते ही दुग्ध पान के प्रति उसकी अभिरुचि समाप्त हो जाती है। जो कभी माँ के हृदय से चिपका रहता था, वह अब चित्र-विचित्र खिलौनों में रमण करता है। सुखानुभूति के केन्द्र बिन्दु खिलौने बनते हैं। पर यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं चलने पाती। खिलौने जो बचपन में अत्यंत ही आकर्षक मनोरंजक लगते थे किशोरावस्था में नहीं भाते। घर की सीमा से बाहर वह प्रवेश करता है। मित्रों की टोली में उसका अधिकाँश समय व्यतीत होता है। पढ़ने-खिलाने की- आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 2)

यह शक्ति कहाँ से आती है? एक ही उत्तर है, इस शक्ति का स्रोत और निवास स्थान मस्तिष्क है। निश्चित रूप से उसे जादू का पिटारा कहा जा सकता है। यद्यपि इन दिनों विलक्षण कम्प्यूटरों का निर्माण हो रहा है। इनके निर्माण से कठिन बौद्धिक कार्यों को बड़ी सरलता से सम्पादित किया जा सकता है। इस कारण इनकी बड़ी चर्चा प्रशंसा की जाती है। किन्तु मस्तिष्कीय क्रियाकलापों को देखा जाए तो उनकी तुलना में अब तक के बने सभी कम्प्यूटर आविष्कारों को न्यौछावर किया जा सकता है। यह एक ऐसा यन्त्र है जिसका तुलना का या बराबरी का दूसरा उपकरण खड़ा कर सकना कल्पना के बाहर की बात है।

प्रकृति के इस अद्भुत विलक्षण आविष्कार के क्रियाकलापों को केवल जीवनयापन सम्बन्धी गतिविधियों तक ही सीमित समझना या यह सोचना कि यह केवल सोच विचार में ही लगा रहता है और उसकी शक्ति इतने तक ही सीमित रहती है, गलत होगा। मस्तिष्कीय क्रियाकलापों का क्षेत्र इससे बहुत आगे तक व्यापक है। सूर्य जिस प्रकार निरन्तर अपना प्रकाश और ताप चारों ओर बखेरता रहता है, ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा निःसृत होती रहती है। इसे विचार, संकल्प, भावना, इच्छा आदि किसी भी नाम से अथवा उसके संयुक्त सम्मिश्रण के रूप में सम्बोधित किया या पहचाना जा सकता है। इस विकिरण के द्वारा एक व्यक्ति अपने समीपवर्ती लोगों को अनजाने ही असाधारण रूप से प्रभावित करता रहता है। इसे अनन्त आकाश में भरे ईथर तत्व के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।

तालाब में ढेला फेंकने पर जिस प्रकार चारों ओर पानी की लहरें इकट्ठी होती रहती हैं, उसी तरह विश्वव्यापी ईथर महासागर में हमारे विचार अपने स्तर के प्रहार करते हैं और उनके प्रकाश ध्वनि से भी अधिक ऊँची एवं सूक्ष्म स्तर की किन्तु लगभग उसी प्रकार की तरंगें उठती हैं। वे कुछ दूर आकर ही समाप्त नहीं हो जातीं वरन् अनन्त आकाश में भ्रमण करती हुईं निकल जाती हैं। स्पष्ट है कि किसी गोलक पर सीधी यात्रा आरम्भ करने से उसका अन्त प्रारम्भ किये जाने वाले स्थान पर ही होता है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें अपनी सुदूर यात्रा करती हुईं वापस अपने उद्गम स्रोत पर लौट आती हैं। इस प्रक्रिया का दुहरा प्रभाव होता है। एक तो उसी स्तर की विचार बुद्धि वाले उन कम्पनों से बल तथा प्रोत्साहन पाते हैं और जब वे वापस लौटते हैं तो अपने इस उत्पादन को नये आहार के रूप में पाकर सृजेता मस्तिष्क को भी लाभ पहुँचाते हैं।

किसान अपनी फसल का लाभ स्वयं नहीं उठाता है। उसे लाभ मिलता है परन्तु उसके कृषि कर्म से जो उत्पादन होता है, जो लाभ अर्जित किया जाता है उसमें अन्य अनेकों का भी हिस्सा होता है। किसान द्वारा उत्पादित किये गये अन्न से सैकड़ों व्यक्तियों को भोजन मिलता है। विचारों का उत्पादन भी इसी प्रकार कृषि कार्य है। पशु अपनी शरीर यात्रा सम्बन्धी सोच विचारों में ही लगे रहते हैं इसलिए उनका चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। इसलिए उनसे उत्पन्न होने वाली विचार तरंगें भी अति शक्तिशाली होती हैं। जिनका चिन्तन शरीर यात्रा की परिधि में एक ही ढर्रे पर घूमता है उनकी चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 25 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe



👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

रविवार, 24 मई 2026

👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 1)

जलती हुई आग के पास बैठकर घोर शीत में भी सर्दी से बचा जा सकता है। आग अपने आसपास के समीपवर्ती क्षेत्र को भी गर्म करती है। वह अपनी ताप किरणें दूर-दूर तक फैलाती है और निकटवर्ती क्षेत्र को गर्म रखती है। यों शरीर में भी गर्मी होती है। साँस के द्वारा उस गर्मी को अनुभव किया जा सकता है और देह के संपर्क में जो वस्त्र आते हैं वे भी गरम हो जाते हैं। सर्दियों में कपड़े पहनकर सर्दी से इसीलिए बचा जा सकता है कि इन वस्त्रों से शरीर की गर्मी बाहर निकलने से बच जाती है और शरीर गर्म रहता है। मनुष्य में रहने वाली तापशक्ति से भी अधिक महत्वपूर्ण और प्रखर शक्ति है- विचार शक्ति। उसकी प्रचण्डता देखते ही बनती है।

इस शक्ति का- विचार शक्ति एवं इच्छा शक्ति का निर्माण मस्तिष्क में होता है। विचार शक्ति और इच्छा शक्ति की प्रचण्डता तथा प्रखरता के अनेक उदाहरण प्रत्यक्ष जगत में देखे जा सकते हैं। कई लोगों ने तो अपनी इस शक्ति का विकास इस स्तर तक किया है कि उनकी मिसाल दी जा सकती है और सामान्यजनों के लिए वे प्रसंग चमत्कारी ही कहे जा सकते हैं। ड्यूक विश्वविद्यालय की परामनोविज्ञान प्रयोगशाला ‘अमेरिकन सोसाइटी फार साइकिक पावर’ तथा कुछ अन्य विश्वविद्यालयों ने इस सम्बन्ध में रुचि दिखाई है और ऐसे अनेक उदाहरण एकत्रित किए हैं। जिनमें विचार या इच्छा शक्ति का महत्व समझा जा सके।

इन प्रसंगों में रेड सीरियस का उदाहरण बहुत चमत्कारी कहा जा सकता है। रेड के सम्बन्ध में पत्र-पत्रिकाओं में बहुत कुछ प्रकाशित हो चुका है। पिछले दिनों अमेरिका के ही एक व्यक्ति आइजक बोर्न ने स्पेन के समुद्र में डूबे जहाजों का पता लगाने के लिए अपनी विचार शक्ति का प्रयोग किया और तमाम उपाय असफल हो जाने के उपरान्त इस पद्धति से सफलता प्राप्त की। अतीन्द्रिय शक्तियों में से अधिकाँश इन्हीं विचार और इच्छा शक्ति का परिणाम है। दूर-दर्शन, दूरानुभूति पूर्वाभास आदि अतीन्द्रिय विशेषताएँ प्रकारान्तर से इसी विचार शक्ति के परिणाम हैं।

यहाँ यह तथ्य समझ लेना चाहिए कि विचार शक्ति और इच्छा शक्ति में बहुत थोड़ा-सा अन्तर है। इन दोनों का निर्माण मस्तिष्क में होता है, यहाँ तक तो कोई विवाद नहीं है, लेकिन यहाँ आकर इच्छा शक्ति विचार शक्ति का पलड़ा भारी हो जाता है कि इच्छा शक्ति का प्राण है। कहा जा सकता है कि इच्छा शक्ति की प्रबलता से मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ती है। मस्तिष्कीय उपचारों से कदाचित ही किन्हीं जड़मति लोगों को बुद्धिमान बनाया जा सकता हो पर इच्छा शक्ति की प्रेरणा से वरदराज जैसे अगणित मन्दमति लोग उच्च श्रेणी के विचारवान बुद्धिमान बन सकते हैं। अन्तःप्रेरणा उनके अविकसित मस्तिष्क को विकसित स्तर का बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित की है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 योगी अरविन्द का पूर्ण योग

योगीराज अरविन्द के पूर्णयोग के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि और भुक्ति। सर्वप्रथम साधना मार्ग में आत्म-शुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। प्रत्येक साधना प्रणाली में परिशुद्धि का विधान है। शुद्धि का क्षेत्र व्यापक है। बाहर और भीतर दोनों ही क्षेत्र का परिशोधन आवश्यक है। हठयोग की साधना शारीरिक परिशोधन के लिए की जाती है। पूर्णयोग की साधना में शरीर ही नहीं मन, वाणी, प्राण और अंतःकरण अर्थात् समूची मानवी प्रकृति का परिष्कार आवश्यक है।

शुद्धि के प्रारम्भ होने का चिन्ह है समता का दिग्दर्शन। साधक प्रकृति की सब क्रियाओं को, द्वंद्वों और अविद्या के आक्रमण को, अपने अज्ञान को समता की दृष्टि से देखता है तथा उन्हें दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। शुद्धि के अंतर्गत मन बुद्धि चित्त अहंकार और प्राण की सभी परतें समाहित हैं। इस सबका परिष्कार आवश्यक है।

पूर्णयोग और आत्मसिद्धि का दूसरा अंग महर्षि अरविन्द के अनुसार है- मुक्ति। मुक्ति का अर्थ है आत्मा का जीव शरीर के बन्धनों एवं आकर्षणों से परे हो जाना तथा आत्मा की असीम अमरता में उन्मुक्त हो जाना। महर्षि का कहना है कि- “समस्त स्थूल क्रिया-कलापों अथवा प्रकृतिगत चेष्टाओं का परित्याग कर निष्क्रिय निर्वाण स्थिति में पहुँचने का नाम मुक्ति नहीं है जैसा कि कितने चिंतक कहते हैं। यह एक ऐसा आन्तरिक परिवर्तन है जो साधक को दिव्य बनाता है। मुक्ति के दो चरण हैं- परित्याग और ग्रहण। जिसमें एक निषेधात्मक पक्ष है दूसरा भावनात्मक। मुक्ति की निषेधात्मक गति का अर्थ है- अपनी सत्ता की निम्न प्रकृति के प्रधान बन्धनों एवं मुख्य ग्रन्थियों से छुटकारा पाना। उसके भावनात्मक पक्ष का अर्थ है- उच्चतर आध्यात्मिक सत्ता में समाहित हो जाना- उसकी दिव्य अनुभूतियों में रमण करना। वैचारिक दृष्टि से मुक्ति का अर्थ है निष्काम और निरहंकार होना, मन और अन्तरात्मा में त्रिगुण से रहित, निस्त्रैगुण्य होना। मुक्ति के सभी मौलिक तत्व दार्शनिक दृष्टि से इस लक्ष्य में समाहित है। भावनात्मक अभिप्राय मुक्ति का है- अपनी आत्मा को विश्वात्मा के साथ एक करना उच्चतम दिव्य प्रकृति को धारण करना। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि भगवान के समान बनना। यही मुक्ति का सम्पूर्ण और समग्र आशय है।

शुद्धि और मुक्ति सिद्धि की पूर्वावस्थाएँ हैं। आध्यात्मिक सिद्धि का अर्थ योगीराज अरविन्द की दृष्टि में है- भागवत सत्ता की प्रकृति के साथ एकत्व प्राप्त करना। पर विभिन्न दर्शनों में सिद्धि की मान्यता के संदर्भ में मतभेद मायावादी के लिए सत्ता का सर्वोच्च तथा एकमात्र वास्तविक सत्य निर्विकार निर्गुण एवं आत्म सचेतन ब्रह्म है। इसलिए आत्मा की निर्विकार शान्ति तथा शुद्ध आत्म चेतनता में विकसित होना ही उसका सिद्धि विषयक विचार है तथा व्यक्तिगत अहंता का परित्याग करके शान्त आत्म ज्ञान में प्रतिष्ठित होना ही उसका मार्ग है। बौद्ध-मतावलम्बो के लिए उच्चतम सत्य सत्ता का अस्वीकार है। अतः उसके लिए सत्ता की क्षणिकता, कामना की विनाशकारी निःसारता का बोध, अहंकार का तथा उसे धारण करने वाले विचार संस्कारों का एवं कर्म श्रृंखलाओं का विलय ही सर्वांगपूर्ण मार्ग है। प्रत्येक दर्शन अपने-अपने विचार के अनुसार भगवान के साथ कुछ सादृश्य प्राप्त करता है और प्रत्येक तद्नुरूप अपना मार्ग ढूँढ़ निकालता है।

पर सर्वांगीण योग के लिए सिद्धि का अर्थ- एक ऐसी दिव्य आत्मा और दिव्य कर्म को प्राप्त करना होगा जो जगत में दिव्य सम्बन्ध और दिव्य कर्म का खुला क्षेत्र प्रदान करेंगे। अपने समग्र स्वरूप में उसका अर्थ है- सम्पूर्ण प्रकृति को दिव्य बनाना तथा उसके अस्तित्व और कर्म की समस्त असत्य ग्रन्थियों का परित्याग करना।

सिद्ध या पूर्णता प्राप्त पुरुष उस ब्राह्मी चेतना में पुरुषोत्तम के साथ एक होकर जीवन धारण करता है। वह सर्व मय ब्रह्म, सर्व ब्रह्म में, अनन्त सत्ता और अनन्त गुणों वाले ब्रह्म, अनन्त ब्रह्म में स्वयंभू- चैतन्य स्वरूप और विश्व ज्ञानमय ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म में, स्वयंभू आनन्द स्वरूप और विराट् अस्तित्व- आनन्दमय ब्रह्म, आनन्द ब्रह्म में सचेतन होकर निवास करेगा। वह सम्पूर्ण विश्व को एक असीम विराट् सत्ता की अभिव्यक्ति अनुभव करेगा तथा समस्त गुणों एवं कर्मों को उसकी विराट् और असीम शक्ति की क्रीड़ा। उच्चतर अनुभूति की आनन्दमय स्थिति में वह उस तत् के साथ एक होगा। जो समस्त सत्ता का उद्गम और आधार है- सबको अन्तर्वासी, मूल आत्म तत्व और उपादान शक्ति है। यही है- आत्मसिद्धि की पराकाष्ठा।

भूक्ति का अर्थ अरविन्द की दृष्टि में है- ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’। अर्थात्- अनासक्त भाव से उसको (भोगों को) भोगो। कामना प्रेरित जीवन में रहकर भोग को भोगने का प्रयत्न करना निश्चय ही लक्ष्य प्राप्ति में बाधक है। जीवन में दिव्य पूर्णता का आविर्भाव करना, सम्पूर्ण जीवन को अध्यात्मिक शक्ति का क्षेत्र मानकर दिव्य भोग करना ही भुक्ति का रहस्य है। इस तरह पूर्ण योग में जीवन के दिव्य भोग के आदर्श को अरविन्द ने स्वीकारा है। पूर्णयोग के साधक को इस विश्व उपवन में उत्पन्न हुए दिव्य आनन्द का उपभोग करना चाहिए।

महर्षि अरविन्द के अनुसार समर्पण का अर्थ है- अपनी सम्पूर्ण प्रकृति को- अपने आपको भगवान के हाथ में सौंप देना। हमें अपनी प्रत्येक चीज को- बाह्याभ्यन्तरिक विभूतियों को उस विश्वमय विश्वातीत परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए। अपने संकल्प अपने भाव और अपने विचार को उस एक बहुरूप भगवान पर पूर्णरूपेण एकाग्र करना और अपनी सम्पूर्ण सत्ता को भगवान पर ही न्यौछावर करा देना समर्पण योग की एक निर्णायक गति है। यह अहं का उस ‘तत्’ की ओर मुड़ना है जो उससे अनन्त गुना महान् है। इसी में आत्म समर्पण की पूर्णता है।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 24 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शनिवार, 23 मई 2026

👉 प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (अंतिम भाग)

देवता और असुर भावनात्मक उभार के दो सिरे हैं। मध्यवर्ती स्थान शान्त और सन्तुलित रहता है। सामान्य मनुष्य हर किसी से मानवोचित सद्व्यवहार करते है और अपने कर्त्तव्य धर्म पर आरूढ़ रहकर मध्यवर्ती गतिविधियाँ चलाते हुए जीवन−क्रम पूरा करते हैं। न उन्हें किन्हीं से अत्यधिक घनिष्टता होती है और न रोष, विद्वेष ही सताता है। वे जानते हैं मनुष्यों की पारस्परिक, सहिष्णुता और सद्व्यवहार के आधार पर ही गुजर करनी पड़ती है इसलिए सम्बन्धों का सन्तुलित निर्वाह करते हुए गुजर करनी चाहिए। न अति की सीमा तक मैत्री बढ़ानी चाहिए न घृणा द्वेष की आग में जलना चाहिए। लोग जैसे भी हैं बने रहे−हमें अपना कर्त्तव्य भर पालन करते रहना है यह मानकर चलते रहना सरल पड़ता है और सुलभ भी है। इस नीति से जिन्दगी आसानी के साथ कट जाती है और सम्बन्धित लोगों के रिश्ते का देर तक ठीक प्रकार निर्वाह होता रहता है।

इससे आगे की भावुक स्थिति को असामान्य या अतिवादी कह सकते हैं। वह इस छोर पर पहुँचेगी या उस छोर पर। या तो आदर्शवादी व्यक्तित्वों के साथ सघन होकर उच्चस्तरीय आत्मिक विकास की भूमिका बनायेगी या फिर लोभ और मोह में उलझकर उन्माद जैसी स्थिति उत्पन्न करेगी। उसमें रुझान ही प्रधान रहता है। दुष्ट और दुर्गुणी भी प्रिय लगने लगता है यहाँ तक कि उस तथाकथित प्रेमी की प्रसन्नता के लिए स्वयं का भी दुष्ट कर्मों में सहयोग समर्थन चल पड़ता है। तब प्रिय पात्र को आदर्श की ओर ले चलने का उत्साह समाप्त हो जाता है और मित्र को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को मन रहता है, भले ही वह कर गुजरना कितना ही अनैतिक या अवाँछनीय क्यों न हो। यह पतन का अन्तिम छोर है। प्रेम का विकृत स्वरूप कितना विघातक हो सकता है उसका परिचय इस मोह ग्रस्त उन्मादी आवेश की स्थिति वाले वातावरण में कहीं भी देखा जा सकता है।

प्रेम का उज्ज्वल पक्ष ऐसा है जिसमें उस पवित्र सूत्र में बँधे दोनों पक्षों का केवल उत्कर्ष और कल्याण ही होता है। ऐसी मित्रता एक आदर्शवादी अन्तःकरण को दूसरे परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ बाँधती है। एक ओर एक मिलकर ग्यारह बनने की उक्ति उन पर लागू होती है। उनका भावनात्मक आदान−प्रदान परस्पर एक दूसरे को ऊँचा उठाता है और आगे बढ़ाता है ऐसी मित्रता का आरम्भ सदुद्देश्य के लिए होता है इसलिए उसका अन्त भी सुखद सन्तोषजनक ही रहता है। परिस्थितियाँ इन मित्रों को दूर−दूर रहने के लिए विवश कर दें तो भी उनकी सद्भावना और घनिष्टता में कोई अन्तर नहीं आता। जब कि मोहग्रस्त लोग जब तक सामने रहते है तब तक देख देखकर जीने की बात करते हैं कि पर जब विलग हो जाते हैं तो कुछ ही समय में उनकी स्थिति अपरिचितों जैसी हो जाती है।

मोह में आदान के साथ प्रदान की शर्त जुड़ी रहती है। हमने उसके लिए यह किया इसलिए उसे हमारे लिए यह करना चाहा ऐसा लेखा−जोखा जहाँ भी लिया जा रहा होगा वहाँ लाभ हानि के आधार पर सन्तोष अथवा आक्रोश भी व्यक्त किया जा रहा होगा। अपेक्षा पूरी होने पर वह आतुर प्रेम भयंकर प्रतिशोध भी बन जाता है। और आज दाँत काटी रोटी वाले मित्रकल ‘जान के ग्राहक’ बने दिखाई पड़ते हैं। प्रेमोन्माद में यह ज्वार−भाटे जैसी उठक−पटक स्वाभाविक भी है। सच्चे प्रेम में ऐसे आँधी तूफान नहीं आते उसमें एक रस शीतल भर सुगन्ध पवन बहता रहता है। प्रेम देने के लिए किया जाता है लेने के लिए नहीं। देते रहने में कोई बाधा नहीं। झंझट तो तब खड़ा होगा जब लेने की अपेक्षा की जायगी और वह जो चाहा था सो मिल नहीं सकेगा। प्रेम इसी चट्टान से टकरा कर नष्ट भ्रष्ट होता है। अनुदान अपने हाथ की बात है प्रतिदान दूसरे के हाथ की। प्रतिदान का अभिलाषी मोह है और अनुदान के लिए समुन्नत प्रेम। मोहग्रस्त को पग−पग पर खोज का, जलन का, उलाहने का, पश्चाताप का, अनुभव होता है। किन्तु जहाँ प्रेम है वहाँ शान्ति−स्थिरता और प्रसन्नता की स्थिति में कमी परिवर्तन दृष्टिगोचर ही न होगा। ऐसा परिष्कृत प्रेम ही आत्मा की उच्चस्तरीय आवश्यकता है। उसे पाकर मनुष्य इतना ही आनन्द पाता है जितना ईश्वर को अपनी गोदी में बिठाकर अथवा स्वयं उसकी गोदी में बैठकर पाया जा सकता है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 बड़े उद्घोष ना करें बड़े कार्य करें (अंतिम भाग)

सुविकसित व्यक्तित्व वाले प्रौढ़ व्यक्तित्व को न तो बूढ़ों की तरह भूत उपासक होना चाहिए ओर न बालकों की तरह भविष्य वक्त बनने का उपहासात्मक उपक्रम बनाना चाहिए। यथार्थवादी होना चाहिए और वर्तमान पर सारा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। प्रौढ़ता में ही वह साहस होता है जो वर्तमान की कठिन चुनौती को स्वीकार कर सके।

वर्तमान,आज की जटिल समस्याओं को लेकर सामने आता है और सामाधान के ऐसे हल चाहता है जो प्रबल पुरुषार्थ और प्रखर मनोबल के आधार पर ही ढूंढ़े निकाले जा सकते है पौरुष जितना गौरवशाली है उतना ही उन उत्तरदायित्वों से लदा हुआ भी है जो मनस्वी एवं दूरदर्शी आन्तरिक स्थिति होने पर ही निबाहे जा सकते हैं।

कल क्या करना है − इसकी रूपरेखा सामने रहनी चाहिए ताकि उस आधार पर वर्तमान प्रयासों को अग्रसर किया जा सके। किन्तु भविष्य को सुनिश्चित मानकर नहीं चला जाना चाहिए। मनुष्य की अकेली इच्छा ही सब कुछ नहीं है −परिस्थिति कल बदल सकती है और आज की इच्छा भी कल किसी कारण शिथिल हो सकती है। ऐसी दशा में दूसरों को आकर्षक आश्वासन देने या आशान्वित करने का मूल्य ही कितना रह जाता है।

भविष्य में यह करने की इच्छा है इस प्रकार विचार व्यक्त करने में और उस संदर्भ में दूसरे से परामर्श लेने में हर्ज नहीं। भावी योजनाएँ बनती है और बनाई जाती हैं सो उचित भी हैं और आवश्यक भी। पर मैं यह कर ही लूँगा ऐसा उद्घोष नहीं करना चाहिए। हाँ वैसा करने के लिए शक्ति भर और पूरी ईमानदारी से प्रयत्न करने का संकल्प किया जा सकता है और उस निश्चय को कार्यान्वित करने में तत्परता पूर्वक जुटा जा सकता है। ऐसे साहसिक प्रयत्नशीलता सम्भवतः अपने आज के संकल्प को बहुत हद तक पूरी भी रह सकती है। तब सफलता जितनी भी मिल सकी वह प्रशंसनीय कही जा सकता। इसके विपरीत यदि लम्बी−चौड़ी उद्घोष किये गये हैं और वे आवेश मात्र सिद्ध हुए तो इससे अपना शिर लज्जा से नीचा होगा और दूसरों को व्यंग करने का अवसर मिलेगा।

उचित यही है कि हम आज की बात सोचे ओर आज के काम आज ही निपटाने क प्रयत्न करें। आज के उत्तरदायित्व भी इतने बड़े और इतने अधिक हैं कि उनकी पूर्ति सही रीति से कर सकने में बढ़े चढ़े प्रयास, साहस, साधन, और बुद्धिबल को नियोजित करने ही कुछ काम चलता है हमें इसी केन्द्र पर अपने को केन्द्रित करना चाहिए।,कोई सत्कर्म करना है तो आज ही करना चाहिए। महा प्रभु ईसा कहते थे कि जो सत्कर्म करना है सो आज ही कर। बांये हाथ में जो दान के लिए है उसे दाहिने हाथ मत लेजा। ऐसा न हो कि इस फेर बदल में तेरा मन बदल जाय और जो देना चाहता है वह न दे सके।’ बुद्धि मान सदा से यही कहते रहे है कि −सौ मन कथनी की अपेक्षा एक सेर ‘करनी’ का महत्व अधिक है। घोषणाएँ करते फिरने की अपेक्षा यह अच्छा है कि हम अपनी सदाशयता का परिचय आज की कर्मनिष्ठा द्वारा व्यक्त करें।’

जीभ छोटी बनाई गई है हाथ बड़े। जीभ एक है और हाथ दो। यह अनुपात इसलिए रखा गया है कि हम कहें कम, करें अधिक। क्रिया ही किसी की सद्भावना का सच्चा प्रमाण है जीभ तो भावावेश में कुछ भी कह सकती है। जीभ तो भावावेश में कुछ भी कह सकती है और वह उन्माद उतरते ही पिछली बात को बदल भी सकती है पर क्रिया तो क्रिया ही रहेगी। संकल्प में जितना अन्तर हैं उतना घोषणा और क्रिया में भी रहता है आमतौर पर लम्बी चौड़ी घोषणाएँ आवेशग्रस्त ही करते है अत्युत्साह की मनः स्थिति में प्रायः स्थिति में प्राय यह स्मरण नहीं रहता कि जो कहा जा रहा है उसे कल कार्यान्वित किया भी जा सकेगा या नहीं। जो न किया जा सके उनके कहने से क्या लाभ? जो कहने को जी चाहती ही उसके पीछे दूरगामी चिन्तन −उपयुक्त साधन ओर अविचल संकल्प −बल हो तो ही घोषणा के लिए कदम बढ़ाना चाहिए, अन्यथा जो बन पड़ेगा वह अधिक से अधिक तत्परता एवं सदाशयता के साथ करते इतना कथन ही पर्याप्त हैं।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 23 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शुक्रवार, 22 मई 2026

👉 बड़े उद्घोष ना करें बड़े कार्य करें (भाग 1)

यह करूंगा−−वह करूंगा ऐसी घोषणाएं करते फिरना निरर्थक है। यह निश्चित नहीं कि जो करने के लिए आज कहा जा रहा है उसे अगले दिन किया भी जा सकता है या नहीं। कल संयोग वश ऐसी परिस्थितियाँ आ सकती हैं कि जो कल करने की घोषणा की गई है वह सम्भव ही न रहें।

अप्रत्याशित घटना क्रम का घटित हो जाना असम्भव नहीं कोन जाने अपना शरीर आज जिस स्थिति में हैं कल उसमें रहेगा भी या नहीं। बीमारी और मौत का आक्रमण कब किस पर हो जाय इसे कोन जानता है। ईश्वर न करे अपना शरीर ही कल दस याग्य न रहे कि घष्ए को कार्यान्वित किया जा सके। इसी प्रकार अन्य ऐसी घटनाएँ भी घटित हो सकती हैं जो अपने भविष्य कथन को निरस्त कर दें। चोरी, अग्निकांड, दुष्काल, घाटा आदि ऐसे हो दरिद्र बना कर रख दें। तब उन घोषणाओं की पूर्ति कैसे हो सकेगी जो आज की सुसंपन्न स्थिति को ध्यान में रखकर की गई थी।

भविष्य अनिश्चित है। नियति के गर्भ में कितनी मृदुल और कितनी दुखद सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं इसे कौन जानता है कल हम क्या करेंगे क्या नहीं—यह निर्णय आज नहीं कल ही किया जा सकता है। समय से पूर्व तो उसकी घोषणा करना तो बचकानापन है। आज तो हमें वही सोचना−−वही कहना और वही करना चाहिए को आश्वासन देना सम्भव है। भविष्य के लिए किसी को आश्वासन देना व्यर्थ है। देना ही हो तो इस शर्त के साथ देना चाहिए कि आज जैसी परिस्थिति कल भी बनी रही तो वह किया जा सकेगा जो आज कहा जा रहा है।

बूढ़े मनुष्य भूतकाल के घटनाक्रम में बहुत दिलचस्पी रखते हैं ओर बीती हुई बातों की चर्चा बड़े उत्साह के साथ करते या सुनते हैं। उनका श्रेष्ठ समय भूतकाल ही था जो अब गुजर गया। वर्तमान नीरस है ओर भविष्य डरावना, इसलिए सुखानुभूति के लिए उन्हें मधुर भूतकाल का स्मरण करते हुए चैन मिलता है। कुछ विचित्र व्यक्ति ऐसे भी होते है जिन्हें दुखों की स्मृति भी ओर विपत्तियों की चर्चा करके अपने घाव हरे करते हैं और अभ्यस्त दुखी मनः स्थिति का जागृत करके विलक्षण प्रकार का आनन्द लेते है। सुखद हो अथवा दुखद जिन्हें भूतकाल जिन्हें भूतकाल की स्मृतियाँ ही सुहाती हैं—कथा पुराणों से लेकर व्यक्ति गत स्मृति की तथा स्वजन संबंधियों की पिछली चर्चाएँ जिन्हें सन्तोष देती हैं समझना चाहिए कि वे बूढ़े हो गये। उनका मन बुढ़ापे से ओत−प्रोत हो गया। भले ही ऐसे लोग आयु की दृष्टि से अधेड़ या युवक दिखाई पड़ते हों।

बालकों का स्वभाव भविष्य की कल्पनाएँ करते रहना होता है। चूँकि उनका भूतकाल कुछ महत्वपूर्ण नहीं था और न उसका स्मरण ही उन्हें होता वर्तमान भी अस्थिरता और अनिश्चितता से भरा रहता है, इसलिए अनेक लिए चिन्तन का एकमात्र आधार भविष्य ही रह जाता है। उसी पर वे तरह−तरह के सुखद आरोपण करते हैं। भविष्य में यह पावेंगे—वहाँ जावेंगे—यह खायेंगे—यह करेंगे जैसी चर्चाएँ ही उनके मुँह सुनी जाती हैं। वे कल्पनाओं को ही वास्तविकता समझने लगते हैं और सम्भावनाओं की सुनिश्चितता का ऐसा बाना पहनाते हैं मानों जो कुछ वे सोच या कह रहे हैं अवश्य ही वैसा होकर रहेगा। उनके इस भोलेपन पर अभिभावक रस लेते हैं, पर साथ ही उस बचपन पर हँसते भी हैं जिसकी कल्पना और यथार्थता के बीच में कितनी बड़ी खाई होती है बाल–कल्पनाओं और घोषणाओं का यदि कोई लेखा−जोखा रखा जा सके तो प्रतीत होगा कि वे जितनी भोली भाली और मृदुल थीं उससे अधिक वे अवास्तविक भी थीं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (भाग 2)

रस लोनी भ्रमर और पराग प्रेमी मधुमक्खियाँ, एक फूल को चूस कर दूसरे पर जा बैठती है। तितलियों को एक फूल पर बैठे रहने से सन्तोष नहीं होता, उन्हें क्षण−क्षण नवीनता चाहिए। प्रेम जहाँ होगा वहाँ यह अस्थिर उन्माद कभी भी दृष्टिगोचर न होगा। जहाँ आस्थाएँ काम कर रही होंगी वहीं तो विश्वास दे सकने और पा सकने की स्थिति बनेगी। आजीवन मैत्री निर्वाह का आधार वहीं तो बनेगा। प्रेम धर्म निबाहना केवल शूरवीरों का काम है—उसके लिए बहुत चौड़ा दिल चाहिए। मोहग्रस्त लोभीजन उसका निर्वाह कर सकें यह सम्भव नहीं हो सकता।

मोहग्रस्त मनःस्थिति में भौतिक अनुदान, उपहार देने या पाने की प्रवृत्ति रहती है। यदि इस स्तर की प्रेम विडम्बना नर−नारी के बीच चल रही होगी तो उसमें यौन लिप्सा की आतुर माँग होगी। भले ही प्रिय पात्र का गृहस्थ, भविष्य एवं स्तर पतन के गर्त में गिरता हो तो गिरे। उन्माद की पूर्ति किसी भी कीमत पर होनी चाहिए। आवेश में यह मोह ही प्रेम जैसा लगता है और उस आतुर मनःस्थिति में पड़े हुए उन्मादी अपने आपको ‘प्रेमी’ कहने लगते हैं, जबकि यह आचरण प्रेम के तत्व दर्शन की सीमा को छू भी नहीं रहा होता।

विशुद्ध प्रेम व्यक्तियों के बीच आदर्शवादी विशेषताओं के कारण ही आरम्भ होता और पनपता है। वास्तविक सौंदर्य शरीर का नहीं आत्मा का होता है। वह आकृति को देखकर ठिठकता नहीं, वरन् गहराई में प्रवेश करके प्रकृति के मर्मस्थल तक चला जाता है। ऐसे व्यक्ति शारीरिक आकर्षण को तनिक भी महत्व नहीं देते। उनके लिए काली कुरूप आकृति में ऐसी कोई न्यूनता दिखाई नहीं पड़ती, जिसकी तुलना में किसी रूप यौवन सम्पन्न को महत्व दिया जा सके। ऊपर चमड़ी के भीतर सर्वत्र रक्त, माँस, अस्थि जैसे घिनौने और दुर्गन्ध युक्त पदार्थ ही तो भरे पड़े हैं। उनमें केवल मूढ़ मति ही उलझती हैं। शरीर आकर्षण को लेकर आरम्भ हुआ ‘प्रेम’ संध्याकाल के रंगीले बादलों की तरह देखते−देखते धूमिल होता चला जाता है और फिर कुछ समय बाद उसका कहीं पता भी नहीं चलता।

प्रेम गुण ग्राही होता है और वह केवल वहीं जमता है जहाँ व्यक्ति में आदर्शवादी विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं। आत्मा की भूख है कि आत्मिक विभूतियों से भरे व्यक्ति के सजातीय आकर्षण से प्रभावित होकर उसकी भावनात्मक समीपता चाहे। जड़वादी मोह ग्रस्तता के पीछे यौन लिप्सा का ताण्डव रहता है जबकि आत्मवादी प्रेम में केवल सद्भाव सम्पन्न आत्मीयता के आदान−प्रदान की माँग मात्र रहती है। ऐसे प्रेमीजन यदि नर−नारी हैं तो वे आजीवन अति पवित्र सम्बन्ध खुश−खुशी बनाये रह सकते हैं और एक−दूसरे के चरित्र को उज्ज्वल सिद्ध करने के लिए अपनी दुर्बलता पर सदा−सदा तक काबू रख सकते हैं।

नर और नर के बीच—नारी और नारी के बीच उन्मादी प्रेम सघन नहीं हो सकता किन्तु निष्ठावान प्रेम के लिए लिंग भेद जैसी कोई अड़चन नहीं है। दाम्पत्य−जीवन में एक दूसरे पर जैसी निर्भरता होती है एक दूसरे के सान्निध्य में जितना आनन्द प्राप्त करते है वैसा ही विश्वस्तता और भाव भरी स्थिति नारी और नारी के बीच अथवा नर और नर के बीच भी रह सकती है। मैत्री और कामुकता दो भिन्न वस्तुएँ हैं। आवश्यक नहीं कि दोनों साथ रहें। कामुकता विहीन मैत्री भी उसी प्रकार निभायी जा सकती है जिस प्रकार दुनियादार लोगों की मैत्री विहीन कामुकता का क्रीड़ा−विनोद प्रायः चलता रहता है।

लोभ और स्वार्थ की पूर्ति के लिए उत्पन्न हुआ प्रेम पानी के बबूले की तरह उठता है और झाग की तरह बैठ जाता है। मतलब निकालने के लिए चापलूसी की विद्या अब एक सर्व विदित कथा कारिता रह गई है। प्रेम शब्द का उपयोग इस कला−कौशल के साथ भी आये दिन होता है—वैसी ही कृति अनुकृति—वैसी ही भाषा शब्दावली प्रयुक्त होती है पर वस्तुतः बगुला द्वारा मछली पकड़ने अथवा बिल्ली द्वारा चूहा दबोचने से पूर्व साध कर उठाये गये कदमों जैसी ही होता है। प्रयोजन पूर्ण होने के बाद तथाकथित प्रेम पात्र चूसे हुए नींबू के छिलके की तरह कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है। यही तो आज का व्यवहार है। कैसा दुखद और कैसी दयनीय है यह विडम्बना।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

गुरुवार, 21 मई 2026

👉 प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (भाग 1)

मोटी बुद्धि प्रेम और मोह को एक ही मानती है जबकि उनमें जमीन आसमान जितना अन्तर है। व्यक्तियों अथवा वस्तुओं के प्रति इतनी अधिक आसक्ति का होना कि उन्हें पाने अथवा कब्जे में रखे रहने के लिए कुछ भी करने पर उतारू रहा जाय मोह है। व्यक्ति गत रुचि, डडडड, आकर्षण अथवा उपयोग की दृष्टि से किन्हीं पदार्थों एवं व्यक्तियों के साथ घनिष्टता स्थापित हो जाती है और वह इतनी सघन हो जाती है कि विछोह की बात सोचने से कष्ट होता है। यह मोह की स्थिति है। मोह यह चाहता है कि प्रिय वस्तु का साथ छूटने न पाये, चाहे इसके लिए अपना अथवा प्रिय पात्र का कितना ही अहित क्यों न होता हो यह मोह भी मोटी बुद्धि का प्रेम ही लगता है और इसी शब्द से उस आसक्ति का उल्लेख भी किया जाता है, पर वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न होती है।

प्रेम चूँकि एक आदर्श है। इसलिए उसकी घनिष्टता एकात्मता आदर्श के साथ ही जुड़ी रहेगी। जहाँ आदर्श न हो वहाँ प्रेम का अस्तित्व रह ही नहीं सकता। व्यक्ति गत मोह किसी के रंग, रूप, व्यवहार, उपयोग एवं आकर्षण के आधार पर पनपता है। जो रुचिर लगा उसी के प्रति आकर्षण बढ़ गया। जिसकी समीपता में सुखद कल्पना कर ली गई उसी के पीछे मन चलने लगा। यह आसक्ति किसी को देखने मात्र से पनप सकती है और उसके घनिष्ठ सान्निध्य की आतुरता उन्माद बनकर कुछ भी कर गुजर सकती है। प्रेम के नाम पर ऐसी ही दुर्घटनाएँ आये दिन होती रहती है। इनका परिणाम वैसा ही होता है जैसा नशा उतरने पर पैसा, समय और खुमारी गँवाकर असहाय अशक्त बने हुए शराबी का। इस प्रेमोन्माद में कभी किसी को शान्तिदायक परिणाम हाथ नहीं लगा है। यह जुआ खेलने वालों को सदा हार ही हाथ लगती रही है।

प्रेम न तो आकस्मिक होता है और न अकारण। उसके पीछे ऐसे तथ्य होते हैं जो आदर्शवादिता की पृष्ठभूमि पर ही उदय हो सकते हैं। उसमें रंग−रूप की—आकर्षक व्यक्तित्व की—आवश्यकता नहीं पड़ती। वरन् यह परख रहती है कि प्रिय−पात्र कितना आदर्शवादी है। उसमें सज्जनता, कर्त्तव्य−निष्ठा, उदारता, सहृदयता जैसे सद्गुणों की कितनी मात्रा है। जहाँ विभूतियों के प्रति आकर्षण होगा वहाँ मैत्री केवल सद्भाव सम्पन्न सच्चरित्र व्यक्ति से ही बन पड़ेगी। और तब तक यथावत् बनी रहेगी जब तक उन सद्गुणों का अस्तित्व अक्षुण्ण रह सके।

मोह में गुणों की अपेक्षा नहीं रहती। शारीरिक आकर्षण की इसके लिए पर्याप्त है। कुरूप से अरुचि रूप वाले की मनुहार जहाँ हो रही हो वहाँ मोह के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसा आदर्श रहित आकर्षण सर्वथा अस्थिर रहता है। उसमें अधिक गहरे नशे की प्यास रहती है। अपनी कुरूप पत्नी के प्रति रुखाई धारण करके जो रूपवान प्रेयसी है पीछे लगा फिरता है उसके सम्बन्ध में यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह उस प्रेयसी के प्रति भी अपनी अनुरक्ति देर तक बनाये रह सकेगा। नवीनता का—अधिक गहरे नशे का आकर्षण उसे फिर कहीं से कहीं से भागेगा। दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथे प्रेयसी तलाश करने की कभी न बुझने वाली अतृप्ति का मोह ग्रस्तों में सदा ही बनी रहेगी। वे किसी के भी सगे न बन सकेंगे।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 नाव न खेई जाय बिना मल्लाह के

एक था यात्री, दूर देश की यात्रा पर निकला था वह। अभी एक योजन ही चला था कि एक नदी आ गई, किनारे पर नाव लगी थी। उसने कहा- यह नदी मेरा क्या करेगी? पाल उसने बाँधा नहीं, डाँड उसने खोले नहीं, जाने कैसी जल्दी थी। मल्लाह को उसने पुकारा नहीं। बादल गरज रहे थे। लहरें तूफान उठा रही थीं। फिर भी वह माना नहीं, नाव को लंगर से खोल दिया और आप भी उसमें सवार हो गया।

किनारा जैसे तैसे निकल गया पर नाव मझधार में आई वैसे ही भँवरों और उत्ताल-तरंगों ने आ घेरा। नाव एक बार ऊपर तक उछली और दूसरे ही क्षण यात्री को समेटे जल में समा गई।

एक दूसरा यात्री आया। किनारे लगी नाव टूटी-फूटी थी, डाँड कमजोर थे, पाल फटा हुआ था, तो भी उसने युक्ति से काम लिया। नाविक को बुलाया और कहा-मुझे उस पार तक पहुँचा दो। नाविक यात्री को लेकर चल पड़ा। लहरों ने संघर्ष किया, तूफान टकराये, हवा ने पूरी ताकत लगाकर नाव को भटकाने का पूरा प्रयत्न किया पर नाविक उन सब कठिनाइयों से परिचित था, एक-एक को सम्भालता हुआ यात्री को सकुशल दूसरे पार तक ले आया।

मनुष्य जीवन भी एक यात्रा है, जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों के महासागर पार करने पड़ते हैं, जो नाव छोड़ने से पूर्व भगवान् को अपना नाविक नियुक्त कर लेते हैं, भगवान् उनकी यात्रा को सरल बना देते हैं, क्योंकि जीवन पथ की सभी कठिनाइयों के वही ज्ञाता और वही मनुष्य के सच्चे सहचर हैं। अपने अहंकार और अज्ञान में डूबे मनुष्यों की स्थिति तो उस पहले यात्री जैसी है जो नाव चलाना न जानने पर भी उसे तूफानों में छोड़ देता है और बीच में ही नष्ट हो जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe
 

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

बुधवार, 20 मई 2026

👉 शरीर नहीं आदर्श की रक्षा आवश्यक

अग्नि बोले-महाराज! महाराज शिवि का धर्म और उनकी जीव दया उशीनर देश में ही नहीं सारे विश्व में विख्यात है। सभी जानते हैं कि राजसत्ता का स्वामी होकर भी शिवि ने न तो किसी के साथ अनीति बरती न छल किया इसलिये उनकी परीक्षा लेने की बात व्यर्थ ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं वे प्राणिमात्र को आत्मा की दृष्टि से ही प्यार करते हैं।

देवराज इन्द्र ने उत्तर दिया-साधन सम्पन्न व्यक्ति का कोई ठिकाना नहीं जातवेद। क्या पता शिवि जो कुछ कर रहे हैं वह एकमात्र दिखावा हो वे इस तरह सब का ध्यान अपने विलासी जीवन की ओर से बँटाये रखना चाहते हों। निष्ठा की परीक्षा लिये बिना किसी की शुद्धता का क्या प्रमाण। फिर यदि वे सचमुच अपने अन्तःकरण से पूर्ण निश्छल हैं और परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं तो उससे उनकी कीर्ति ही बढ़ेगी।

भगवान इन्द्र के तर्कों के आगे अग्नि देव की एक न चली। तब उन्होंने भी शिवि की परीक्षा लेने की बात स्वीकार कर ही ली।

एक निमेष के अन्तर से दृश्य पलट गया। महाराज शिवि सभासदों सहित राज दरबार में बैठे किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहे थे तभी एक श्वेत कपोत उड़ता हुआ आया और उनकी जंघा पर आ बैठा। पक्षी घबराया हुआ था लगता था वह किसी संकट से ग्रस्त है। महाराज शिवि अभी अच्छी तरह सोच भी नहीं सके थे कि कबूतर का पीछा करता हुआ एक बाज भी वहाँ आ पहुँचा। एक बार उसने ललचाई दृष्टि से कपोत की ओर देखा फिर सिंहासन के दक्षिण पार्श्व में बैठता हुआ बोला-महाराज! कबूतर मेरा आखेट है आप उसे मुझे सौंप दीजिये।

शिवि बोले- तात! मेरे राज्य में कहीं भी जीव-हिंसा नहीं होती फिर वह कबूतर तो मेरी शरण में आ गया उसे तुम्हें सौंप कर हम जीव हिंसा का पाप अपने सिर पर नहीं ले सकते। कबूतर के बदले तुम और जो कुछ भी चाहो ले सकते हो।

एक का अधिकार छीन कर दूसरे की रक्षा करना कहाँ का धर्म है-महाराज! बाज ने तर्क किया-प्रकृति ने मुझे माँस भोजी बनाया है इसलिये मुझे तो माँस ही चाहिये। जब भी माँस देने की बात आयेगी आपको जीव हिंसा करना ही पड़ेगी इसलिए अच्छा तो यही है कि आप इस कबूतर को ही लौटा दें।

महाराज शिवि! एक क्षण के लिए विचार मग्न से प्रतीत हुये-बाज का कथन गलत नहीं है धर्म की रक्षार्थ बाज को माँस दिया जाये तो वह किसी जीव को मार कर ही दिया जा सकता है। एक की रक्षार्थ दूसरे को मारना पाप ही तो है फिर-तब ऐसा करो बाज, महाराज बोले-तुम्हें इस कबूतर के बराबर तोल कर यदि अपने शरीर से माँस दे दूँ तो- “मुझे कोई इन्कार नहीं” बाज ने सहमति प्रकट कर दी।

क्षण-क्षण चढ़ते-उतरते दृश्यों में ठहराव आ गया। सारी सभा इस आलौकिक न्याय को निस्तब्ध होकर देख रही थी। तराजू मँगाया गया। एक पलड़े में कबूतर के रूप में अग्नि देव को बैठाया गया दूसरी ओर शिवि अपने शरीर का माँस काट कर चढ़ाने लगे। बाँया हाथ, बाँया पाँव, दाँया पाँव तीनों चढ़ गये फिर भी माँस कबूतर के बराबर न हुआ। महामंत्री ने टोका महाराज? कुछ छल हो रहा है तो उन्होंने कहा-धर्म की राह पर चलने वाले वीर, छल-कपट की बात नहीं सोचते महामंत्री उठो और मुझे उठा कर पलड़े पर रख दो यदि कबूतर की रक्षार्थ मेरे प्राण चले जाते हैं तो भी कुछ हर्ज नहीं।

महाराज को पलड़े पर रख दिया गया, दोनों पलड़े बराबर हो गये पर अब भगवान् इन्द्र को और देर तक छद्म वेष में रहना कठिन हो गया शिवि की निष्ठा ने उन्हें पराभूत कर दिया। वे अपने देव रूप में प्रकट हुये और शिवि के धर्मपालन की प्रशंसा करने लगे। उनकी कृपा से शिवि के कटे अंग भी जुड़ गये और जुड़ गया इतिहास में जीव दया और कर्त्तव्य पालन का एक ऐसा पृष्ठ जो युग-युगों तक मनुष्य को कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देता रहेगा।

📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 2)

बचपन में जो खिलौनों से चिपका रहता था अपना भविष्य बनाने में जी तोड़ परिश्रम करता है। उसकी प्रसन्नता इस बात में सन्निहित रहती है कि वैसे अधिक ...