शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद्धियाँ-विभूतियाँ कहते हैं। ये सब अमानतें हैं। ये अमानतें मनुष्यों को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएँ कमाये और स्वयं के लिए अपनी ऐय्याशी या विलासिता के साधन इकट्ठे करे और अपना अहंकार पूरा करे। ये सारी की सारी चीजें सिर्फ इसलिए उसको दी गयी हैं कि इन चीजों के माध्यम से वो जो भगवान् का इतना बड़ा विश्व पड़ा हुआ है, उसकी दिक्कतें और कठिनाइयों का समाधान करे और उसे अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए प्रयत्न करे।
    
बैंक के खजांची के पास धन रखा रहता है और इसलिए रखा रहता है कि सरकारी प्रयोजनों के लिए इस पैसे को खर्च करे। उसको उतना ही इस्तेमाल करने का हक है, जितना कि उसको वेतन मिलता है। खजाने में अगर लाखों रुपये रखे हों, तो खजांची उन्हें कैसे खर्च कर सकता है? पुलिस और फौज का कमाण्डर है, उसको अपना वेतन लेकर जितनी सुविधाएँ मिली हैं, उसी से काम चलाना चाहिए और बाकी जो उसके पास बहुत सारी सामर्थ्य और शक्ति बंदूक चलाने के लिए मिली है, उसको सिर्फ उसी काम में खर्च करना चाहिए, जिस काम के लिए सरकार ने उसको सौंपा है।
    
हमारी सरकार भगवान् है और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियाँ, अक्ल और विशेषताएँ हैं, वे अपनी व्यक्तिगत ऐय्याशी और व्यक्तिगत सुविधा और व्यक्तिगत शौक-मौज के लिए नहीं हैं और व्यक्तिगत अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जो कुछ भी उसको विशेषता दी गई है। उसको उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा जाए और जिम्मेदारी उस रूप में निभाए कि सारे के सारे विश्व को सुंदर बनाने में, सुव्यवस्थित बनाने में, समुन्नत बनाने में उसका महान् योगदान संभव हो।
    
भगवान् का बस एक ही उद्देश्य है- निःस्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान् ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना। करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आँखें, मनुष्य के कान, नाक, आँख, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आँकी जाती है। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्योछावर की जा सकती है।
    
ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान् ने बनाया है, उस भगवान् की जरूर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे असिस्टेण्ट के रूप में मेरे राजकुमार के रूप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखेगा।
    
मानव जीवन की विशेषताओं का और भगवान् के द्वारा विशेष विभूतियाँ मनुष्य को देने का एक और भी उद्देश्य है। जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले और ये समझ ले कि ‘मैं क्यों पैदा हुआ हूँ, और यदि मैं पैदा हुआ हूँ? तो मुझे अब क्या करना चाहिए?’ यह बात अगर समझ में आ जाए, तो समझना चाहिए कि इस आदमी का नाम मनुष्य है और इसके भीतर मनुष्यता का उदय हुआ और इसके अंदर भगवान् का उदय हो गया और भगवान् की वाणी उदय हो गयी, भगवान् की विचारणाएँ उदय हो गयीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग ७८)

प्रभु के भजन का, स्मरण का क्रम अखण्ड बना रहे

सदा श्वेत वस्त्र धारण करने वाले गंगापुत्र-देवव्रत-भीष्म की भक्तिगाथा सुनकर हिमालय के श्वेत शिखर भी भावों में भीग गए। ऋषि धौम्य से भीष्म की भावकथा सुनकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के अन्तःकरण में भावों की तीव्र हिलोर उठी। वह सोचने लगे कि अष्टवसुओं का अपराध बड़ा था या कि उनका शाप? सात वसुओं को तो भगवती गंगा ने अपनी परम पावन जलधारा में प्रवाहित कर मुक्त कर दिया पर आठवें वसु को अपने मोक्ष का पुण्यक्षण पाने के लिए सुदीर्घ यात्रा करनी पड़ी। सहनी पड़ी उन्हें अनगिन यातनाएँ, भावों की मर्मान्तक व्यथाएँ, जीवन भर पल-पल रचे जाने वाले कुचक्रों के कुटिल कंटक उन्हें चुभते रहे। हाँ! इन कंटको के बीच श्रीकृष्ण उन्हें सदा याद रहे। अपने अतीत के पृष्ठ निहारते हुए ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को यह स्मरण तो आया कि अपने ही शाप से वह कितने दुःखी हुए थे और तब उन्होंने पीड़ित-विकल मन से सर्वेश्वर परमात्मा को पुकारते हुए प्रार्थना की थी- ‘‘मेरे शाप को भी वरदान बना दो हे करूणासिन्धु!’’ और सचमुच ही प्रभु ने उनकी पुकार सुन ली। उन्होंने वशिष्ठ के शाप को वरदान में बदलते हुए आठवें वसु को महान शूरवीर और अपना परमभक्त बना दिया।

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ अपनी इन चिन्तन कड़ियों में खोए हुए थे। सप्तर्षियों में उनके छः सहयोगियों ने उनके मुख की ओर देखा। उन ऋषिश्रेष्ठ की भावदशा उनसे छुपी न रही। वे सोचने लगे कि सचमुच ही ब्रह्मर्षि सच्चे भगवद्भक्त हैं। क्योंकि भक्त ही है जिसके भावपूर्ण अन्तःकरण में द्वेष, वैर और क्रोध आ ही नहीं सकते। असमय और विषमता में आया हुआ उसके मन का क्रोध भी सहज ही करूणा में रूपान्तरित हो जाता है। ऋषि धौम्य ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ सहित सप्तर्षिमण्डल के अन्य सदस्यों के अन्तःकरण में उठ रही भावतंरगों के आरोह-अवरोह को देखा। साथ ही उन्होंने अपने हृदय में एक अनूठी आध्यात्मिक भावदशा को अनुभव किया। कुछ पलों के मौन के बाद उन्होंने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की ओर देखते हुए कहा- ‘‘ब्रह्मर्षि! गंगापुत्र अपने जीवन के अन्तिम पल तक सदा ही आपके कृतज्ञ रहे। एक अवसर पर तो उन्होंने योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से भी कहा था- हे लीलामय! आपकी मेरे ऊपर यह अहैतुकी कृपा ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के उस आशीष का सुफल है, जो उन्होंने अतीत में मुझे दिया था।’’

इन स्मृतियों के झरोखों से अतीत अपनी और झलकियाँ दिखा पाता, इसके पहले ही ब्रह्मर्षि वशिष्ठ स्वयं को संयत करते हुए देवर्षि नारद से बोले- ‘‘हे भक्तश्रेष्ठ! हम सभी को आपके नवीन भक्ति सूत्र की प्रतीक्षा है।’’ ऋषि वशिष्ठ के कथन पर देवर्षि ने अपनी मौन सहमति जताई। अन्य सभी ऋषियों, देवों, सिद्धों एवं तपस्वियों ने अपनी सम्मति दी। हिमालय के हिमशिखर भक्तिगंगा के नवीन प्रवाह के साक्षी बनने के लिए उत्सुक थे। देवर्षि ने सभी की इस उत्सुकता को शान्त करते हुए अपने नए सूत्र सत्य का उच्चारण किया-

‘अव्यावृतभजनात्’॥ ३६॥
अखण्ड भजन से (भक्ति का साधन) सम्पन्न होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४७

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म

देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया-

‘तत्तु विषयत्यागात् सङ्गत्यागाच्च’॥३५॥
वह (भक्ति-साधन) विषय त्याग और सङ्गत्याग से सम्पन्न होता है।

इस सूत्र को सुनकर न जाने क्यों महर्षि धौम्य की आँखें भींग आयीं। महर्षि की आँखों में अचानक छलक आए इन आँसुओं को सभी ने देखा। सप्तऋषियों सहित सभी देवगण-सिद्धगण महर्षि के इन भावबिन्दुओं को निहारने लगे परन्तु किसी ने कहा कुछ नहीं। थोड़ी देर तक सब ओर मौन पसरा रहा। इसे बेधते हुए ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और पुलह लगभग एक साथ कह उठे- ‘‘लगता है इन क्षणों में किन्हीं स्मृतियों ने आपको विकल किया है।’’ ‘हाँ’ कहते हुए ऋषि धौम्य ने अपना सिर उठाया और बोले, ‘‘देवर्षि के सूत्र से मुझे विषय और सङ्ग का सम्पूर्ण रूप से त्याग करने वाले भक्त भीष्म की याद आ गयी।’’ भीष्म का नाम सुनकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से भी न रहा गया। आखिर उन्होंने ही तो अष्टवसुओं को श्राप दिया था। इन अष्टवसुओं में से सात को तो जगन्माता श्रीगंगा जी मुक्त कर पायीं परन्तु आठवें वसु ‘धौ’ को शान्तनु के आग्रहवश वह अपने जल प्रवाह में न प्रवाहित कर सकीं।
यही गंगापुत्र देवव्रत थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को भीष्म के अतीत का यह प्रसंग भूला न था। वह भी उन्हें याद कर भावविह्वल हो उठे और कहने लगे, ‘‘निश्चय ही गंगापुत्र महान भक्त थे। सारे जीवन उन्होंने पीड़ाएँ सहीं, घात-प्रतिघात सहे, किन्तु सत्य से कभी न विचलित हुए। इन पीड़ाओं ने ही उनके अन्तःकरण को भक्ति-सरोवर बना दिया था। महर्षि धौम्य आपने तो उनका सान्निध्य-संग पाया है। उन परमभागवत भीष्म की भक्तिगाथा हम सबको अवश्य सुनाएँ।’’ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के वचनों का सभी ने अनुमोदन किया। गायत्री के महाभर्ग को धारण करने वाले विश्वामित्र और पुलह भी कह उठे, ‘‘अवश्य ऋषि धौम्य! उन महान भक्त की गाथा सुनाकर हम सब को तृप्ति दें।’’ ऋषि धौम्य ने यह सब सुनकर उन सभी की ओर देखा, फिर देवर्षि की तरफ निहारा। उनकी इस दृष्टि को देवर्षि ने अपना अहोभाग्य समझा और कहने लगे, ‘‘गंगापुत्र भीष्म तो सदा ही माता गंगा की भाँति पवित्र हैं। उनके जीवन की भक्तिलहरों से हम सभी अभिसिंचित होना चाहेंगे ऋषिवर!’’

सभी के आग्रह से महर्षि की भावनाएँ शब्द बन कर झरने लगीं। वे कहने लगे, ‘‘गंगापुत्र देवव्रत को उनकी सत्यनिष्ठा ने, उनकी अटल प्रतिज्ञा ने भीष्म बनाया। यूँ तो उनके सुदीर्घ जीवन के अनेको अविस्मरणीय प्रसंग हैं, जिन्हें महर्षि वेदव्यास ने ‘जय’ काव्य में कहा है परन्तु एक प्रसंग सबसे अनूठा है, जिसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपने इस भक्त के वश में हो गए थे। उन दिनों महाभारत का महासमर चल रहा था।’’ ऋषि धौम्य की वाणी अपने स्मृति रस में भीगने लगी। ‘‘दुर्योधन प्रायः ही पितामह को पाण्डवों के वध के लिए उकसाता रहता था। एक दिन उसने कहा-पितामह! आपने तो अपने गुरू भार्गव परशुराम को भी युद्घ में पराजित किया है। आपके सामने मनुष्य तो क्या स्वयं देवगण भी नहीं टिक सकते। तब फिर पाण्डवों की क्या मजाल? कहीं हस्तिनापुर के प्रति आपकी निष्ठा तो नहीं डिग रही। कुटिल शकुनि की चालों में आकर दुर्योधन ने भीष्म के मर्म पर चोट की।

भीष्म व्यथित हो उठे। उन्होंने पाँच बाण अपने तूणीर से अलग करते हुए प्रतिज्ञा की-कल के युद्घ में इन पाँच बाणों से पाण्डवों का वध होगा। यदि ऐसा न हो सका तो?- दुर्योधन की जिह्वा को काल ने कीलित करते हुए नया प्रश्न किया। दुर्योधन के प्रश्न का भीष्म ने उत्तर दिया- तो फिर स्वयं श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाना पड़ेगा। दुर्योधन को वचन देने के उपरान्त भीष्म और भी व्यथित हो उठे। वह अपने शिविर में बैठे हुए श्रीकृष्ण को पुकारने लगे- हे जनार्दन! हे माधव!! अपने भक्त की लाज रखो गोविन्द, भक्त की पुकार भगवान ने सुनी। उन लीलापुरुषोत्तम ने अपनी लीला रची। इस प्रतिज्ञा की चर्चा सुनकर महारानी द्रोपदी व्यथित हो उठी। वह उन्हें लेकर भीष्म के शिविर में पहुँची। भीष्म आँख मूँदे श्रीकृष्ण का ध्यान कर रहे थे। द्रोपदी के प्रणाम करने पर उन्होंने आँख मूँदे ही उसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे डाला। इस आशीर्वाद को सुनकर द्रोपदी बिलख उठी और बोली, यह कैसा आशीर्वाद? द्रोपदी की वाणी को सुनकर भीष्म चौंके, उन्होंने आँखें खोलीं और बोले, पुत्री! तुम्हें जो यहाँ तक लाए हैं, वे स्वयं कहाँ हैं? भक्त की विकल पुकार सुनकर योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके सम्मुख आए और बोले-पितामह! आप सम्पूर्ण जीवन सांसारिक भोग विषयों से, उनके कुत्सित संग से दूर रहे हैं। दुर्योधन और शकुनि जैसे दुराचारी और कुटिल जनों के बीच भी आपने भक्ति की सच्ची साधना की है। विश्वास रखिए, मेरा मान भले ही भंग हो, मेरे भक्त का मान कभी भंग नहीं हो सकता।

अगले दिन प्रातः जब रणभेरियाँ बजीं, युद्घ का प्रारम्भ हुआ तब महाभक्त और परमशूरवीर भीष्म ने महासंग्राम किया। पाण्डव सेना के पाँव उखड़ने लगे। अर्जुन का रथ भी स्थिर न रह सका। भीष्म के सम्मुख अर्जुन की सारी धनुर्विद्या विफल होने लगी। ऐसे में स्वयं श्रीकृष्ण ने हुंकार भरी और अपनी प्रतिज्ञा भंग करते हुए वह हाथ में चक्र लेकर दौड़ पड़े। सेना में हाहाकार मच गया। भक्त भीष्म अपने भक्तवत्सल भगवान को भक्तिपूर्वक निहारने लगे-
वा धीतपट की कहरान।

कर धरि चक्र चरन की धावनि,नहि विसरति वह बान॥
रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै, कच रज की लपटान।
मानों सिंह सैल तें निकस्यों, महामत्त गज जान॥
हे प्रभु तुम मेरो पन राख्यो, मेटि वेद की वान।

भीष्म के मन मन्दिर में भगवान की मूर्ति सदा के लिए बस गयी। अर्जुन के आग्रह पर भगवान तो अपने रथ पर वापस लौट गए, परन्तु भीष्म का मन पुनः वापस नहीं लौटा। अन्त क्षण में वे प्रभु का यही रूप निहारते रहे। शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म भगवान के इसी रूप का ध्यान करते रहे। जीवन में उन्हें अनगिनत और असहनीय पीड़ाएँ मिलीं पर इन पीड़ाओं से उनकी भक्ति निखरती गयी। भगवान की कृपा वर्षा उन पर और भी सघन होती गयी। अन्तिम क्षणों में भी पितामह भीष्म चक्रधारी के उसी स्वरूप का चिन्तन करते हुए उन्हीं के दिव्य स्वरूप में विलीन हो गए।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४४

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७६)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म

भक्तिरस में भीगी देवर्षि नारद की वाणी सभी को भगवद्रस में भिगोती गयी। शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों से भक्ति चन्द्रिका की उजास सभी के अन्तःकरण में उतरती रही। भगवान का ‘रसो वै सः’ स्वरूप उस भक्ति समागम में उपस्थित जनों की अन्तर्चेतना में प्रकट होता गया। चन्द्रदेव अपने अमृतरस के पूर्ण कलश हिमालय के हिमशिखरों पर बिखेरते हुए तारकगणों के साथ विहार करते रहे। हिमवान के आंगन में बैठे भक्तिरस में भीगे हुए ऋषि-महर्षि, सिद्घ देवगण अपनी आध्यात्मिक रात्रिचर्या में लग गए। सदा ही इनके दिवस भगवान का गुणगान करने में, भगवद्भक्तों की कथावार्ता में व्यतीत होते थे। इनकी रात्रियाँ सदा ही भक्ति की भावसमाधि की निमग्नता में डूबी होती थीं। यह लोकोत्तरजनों का समागम था। इसकी विशिष्टताएँ, अलौकिकताएँ तो केवल समाधि में ही जानी जा सकती थीं।

रात्रि के साथ ही भक्ति-समाधि के क्षण भी बीते। गगन में भगवान सूर्यदेव का सात रश्मि अश्वों का रथ हांकते हुए सूर्य सारथी अरुण ने पदार्पण किया। गगन में उनके पहला पग धरते ही निशा का सम्पूर्ण साम्राज्य तिरोहित होने लगा। अरुण आभा से श्वेत हिमशिखर रक्तिम-स्वर्णिम होने लगे। इसी के साथ सभी प्रातकृत्य, सन्ध्यावन्दन, सूर्यार्घ्यदान से निवृत्त हुए। समूचे वातावरण की सूक्ष्मता में गायत्री महामंत्र के चौबीस मन्त्राक्षरों की अनुगूँज फैल गयी। साथ ही महाभर्ग सूर्य का तेजस और भी सघन होता गया। सप्तऋषियों की भक्तिसभा देवर्षि नारद के भक्तिसूत्र में गुँथती गयी, जुड़ती गयी। जुड़ने के इस क्रम में इस भक्ति समागम में एक अन्य महिमामय और पधारे। अरुण देव के पदार्पण के साथ ही हिमवान के आंगन में इनका भी आगमन हो गया था। प्रायः सभी इनकी तपसाधना और भक्तिभावना से परिचित थे।

ये महर्षि धौम्य थे, जो इस धराधाम पर महाभारत काल में विचरण किया करते थे, जिन्होंने पाण्डुपुत्रों को वनवास काल में अनेकों आध्यात्मिक शिक्षाएँ और सहायताएँ दी थीं। महारानी द्रोपदी को अक्षयपात्र इनकी ही सहायता-कृपा से प्राप्त हुआ था। देवर्षि इन्हें परम प्रिय थे। इनके सुखद, भावपूर्ण भक्तिरस में भीगे सान्निध्य का आकर्षण ही सम्भवतः इन्हें यहाँ ले आया था। अन्यथा इनका स्वाभाविक निवास तो इन दिनों तपोलोक में था। यह तपस्वी महर्षियों का दिव्यलोक है। इस उच्चतर प्रकाशलोक में भी हिमवान के आँगन में बह रही भक्तिगंगा की लहरें पहुँचने लगी थीं। तभी तो वहाँ के महर्षि आज यहाँ इस भक्तिसभा में पधारे थे। देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया-

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र

देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रहे थे कि अन्य शास्त्रों की तो चर्चा होती है, विचार किया जाता है, विमर्श होता है, उनके उपदेश होते हैं, पर भक्ति की तो बात ही अनूठी है। इसमें भला चर्चा और विमर्श क्या? तर्कों के गणितीय समीकरणों का भला भक्ति में क्या काम? बात भक्ति की चले तो स्वयं ही गीत गूंजने लगते हैं। बात भक्ति की हो तो साधना की पथरीली राहों पर स्वयं ही सुमन सज जाते हैं। कदम भक्ति की डगर पर बढ़े तो ग्रीष्म का आतप, शिशिर की ठिठुरन, वर्षा का प्रचण्ड वेग, सबके सब ऋतुराज वसन्त में रूपान्तरित हो जाते हैं। सत्य यही है कि भक्ति बोलती नहीं, गाती है। भक्ति बोलती नहीं, नाचती है।

भक्ति की यह अनुभूति समष्टि में तरंगित होती रही। जल-थल और नभ में यह भक्तिधुन तैरती रही। हिमवान के शैलशिखरों में भी आज भक्ति का अन्तःस्रोत प्रकाशित हो उठा। अपनी किरणों से अमृतवृष्टि कर रहे चन्द्रदेव का अस्तित्त्व भी भावों में भीग गया। और ऐसा स्वाभाविक भी था- ‘चन्द्रमा मनसो जातः’ इस वेदवाणी के अनुसार चन्द्रमा प्रभु के मन का बिम्ब ही तो है। भक्ति की इस भावचर्चा में जब भक्तों के मन भीगे हुए हैं तो भला भगवान का मन क्यों न भीगे। देवर्षि नारद ने भक्तिरस में सिक्त चन्द्रमा की ओर देखा, फिर मुस्करा कर मौन हो गए।

उनकी यह मुस्कराहट और फिर उनका मौन होना, इसे सभी ने देखा। जहाँ अन्यों ने कुछ नहीं कहा, वहीं ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तनिक मुखर होकर किन्तु मृदु स्वर में बोले- ‘‘कुछ कहें देवर्षि! आखिर आप भी तो भक्ति के आचार्य हैं। आपकी अनुभूतियों में तो भक्ति के साधन के गीत सदा ही गूंजते होंगे।’’ वसिष्ठ के इस कथन को शिरोधार्य करते हुए देवर्षि ने विनम्र भाव से कहा, ‘‘आप सदृश ब्रह्मर्षियों का आशीष अवश्य भगवत्कृपा बनकर मेरे अन्तर्भावों में गूँजता है। परन्तु जहाँ तक भक्ति के साधन गीतों के गायन की बात है, तो आज तो वह समस्त सृष्टि में गूँज रहे हैं।’’ ऐसा कहते हुए देवर्षि ने आकाश में तारागणों के साथ मुक्त विहार करते हुए चन्द्रमा की ओर निहारा।

देवर्षि की इस दृष्टि और उनके मन के अन्तर्भावों को ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सहित सभी महर्षि एवं देवगण समझ गए, उन्हें भान हुआ कि आज शरद पूर्णिमा है। उसी की ओर इंगित कर रहे हैं। शरद पूर्णिमा तो सदा ही भक्ति का महारास बनकर सृष्टि में अवतरित होती है। इन पावन क्षणों में प्रकृति अनगिन रूप धर कर विराट पुरुष को अपनी भक्ति अर्पित करती है। इस महारास में प्रकृति स्वयं भक्त बनकर भक्ति के अनन्त-अनन्त रूपों को प्रस्तुत करती है और उसके सभी रूपों को स्वयं भगवान स्वीकारते हैं। भक्ति और भक्त उन भगवान में समाते हैं, उनसे एकात्म होते हैं। जिनके पास आध्यात्मिक दृष्टि है, सृष्टि की सूक्ष्मता का ज्ञान है, जो प्रकृति और पुरुष के अन्तर्मिलन को निहारने में समर्थ हैं, केवल वे ही उनके बाह्य मिलन को अनुभव कर सकते हैं। भक्ति के सभी आचार्यों ने इन सूक्ष्मताओं को देख परख कर ही तो भक्ति के साधनों का गान किया है।

शरद पूर्णिमा की इस अनुपम छटा ने देवर्षि को अपने आत्मभावों में निमज्जित कर दिया है। वे जैसे स्वयं से ही कह रहे थे- ‘‘द्वापर युग में ब्रजमण्डल में एक परमदिव्य शरद पूर्णिमा की निशावेला में विराट पुरुष एवं प्रकृति का यह सम्मिलन साकार हुआ था। इस विरल मुहूर्त में भक्ति के अनोखे गीत गूँजे थे और भक्ति के सभी साधनों ने नृत्य किया था। कालिन्दी की लहरों के सान्निध्य में, कदम्ब के वृक्षों की छांव में, यह महारास हुआ था। विराट पुरुष स्वयं योगेश्वर कृष्ण का रूप लेकर आए थे। प्रकृति ने ब्रजबालाओं का बाना पहना था। चन्द्रदेव उस घड़ी में सर्वथा मुक्त भाव से अमृतवृष्टि कर रहे थे।

उन पलों में भक्ति-भक्त एवं भगवान तीनों ही सम्पूर्ण रूप से एकाकार हो रहे थे। जीवन चेतना का हर पहलू जुड़ रहा था, मिल रहा था, समा रहा था। वहाँ हास्य था, उल्लास था, उछाह था, मुक्त मिलन था। महारास था, परन्तु आसक्ति का लेश भी न था, विषय वासना तनिक भी न थी। चन्द्रदेव की धवल चन्द्रिका की भाँति अन्तः-बाह्य सभी आयामों में सम्पूर्ण निर्मलता थी। गोपिकाएँ अपने गोपेश्वर के प्रति अर्पित हो रही थीं। जैसे समस्त सरिताएँ एक साथ ही सागर में समा जाती हैं, ठीक वैसे ही गोपबालाएँ योगेश्वर कृष्ण में समा रही थीं। प्रकृति का कण-कण, रसमय-प्रभुमय हो रहा था। यह रसमयता, यह प्रभुमयता ही तो भक्ति है। जहाँ यह है, वहाँ भक्ति के समस्त साधन स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं। वहाँ सहज ही भक्ति के गीत गूँजते हैं।’’ धाराप्रवाह बोलते-बोलते देवर्षि अचानक रुके, फिर मुस्कराए और अपने प्रिय नारायण का स्मरण करते हुए बोले- ‘‘मेरा सम्पूर्ण भक्तिशास्त्र उस महारास की रसमयता से ही तो प्रकट हुआ है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४०

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

👉 इस तप-साधना में संलग्न होना ही चाहिये

आज तो विचार-क्रान्ति का प्रथम चरण उठाया जाना आवश्यक है! अभी तो गहरी खुमारी में अवांछनीय रूप से देखने वालों को जगाया जाना ही प्रथम कार्य है जिसके बाद और कुछ सोचा और किया जाना सम्भव है। इसलिए लोक- शिक्षण को अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति के लिए अभी अपना प्रथम अभियान चल रहा है। इसके अन्तर्गत हमें अशुद्ध विचारों के दुष्परिणाम और सद्विचारों की उपयोगिता तथा स्वतन्त्र चिन्तन को पद्धति मात्र सिखानी बतानी है। इसी का क्षेत्र व्यापक बनाना है। जो सचमुच हमें प्यार करते हों- जो सचमुच हमारे निकट हों- जिन्हें सचमुच हमसे दिलचस्पी हो- उन्हें इसके लिए योजना को कार्यान्वित करने के लिए इस तप-साधना में संलग्न होना ही चाहिये।

विचार-क्रान्ति के प्रथम चरण की प्रस्तुत योजना के दो आधार हैं। प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा अथवा छुट्टी के दिन पूरा समय देना। दूसरी अपनी आजीविका का एक अंश इस पुण्य प्रयोजन में नियमित रूप से लगाना। महीने में एक दिन उपवास ही क्यों न करना पड़े-चाहे किसी आवश्यकता में कटौती ही क्यों न करनी पड़े पर इतना त्याग बलिदान तो किया ही जाना चाहिये। नियमितता से स्वभाव एवं अभ्यास का निर्माण होता है इसलिए एक बार थोड़ा समय या थोड़ा पैसा दे देने से काम न चलेगा इसमें नियमितता जुड़ी रहनी चाहिये। लगातार की नियमितता को ही साधना कहते हैं। जो कम ज्यादा समय या धन खर्च करना चाहें वे वैसा कर सकते हैं। पर होना सब कुछ नियमित हो चाहिये। लगातार चलने से मंजिल पार होती है। एक क्षण की उछाल चमत्कृत तो करती है पर उससे लम्बी मंजिल का पार होना सम्भव नहीं। इसलिए किसी से बड़ी धन राशि की याचना नहीं की है भले ही थोड़ा-थोड़ा हो पर नियमित रूप से कुछ करते रहने के लिए कहा गया है।

अपने क्षेत्र के ऐसे शिक्षित जिनमें थोड़ी विचारशीलता की सम्भावना हो अपने सम्पर्क क्षेत्र में ढूंढे जा सकते हैं और उनकी लिस्ट बनाई जा सकती है। आरम्भ में यह लिस्ट छोटी भी बनाई जा सकती है पर पीछे एक दूसरे से पूछने परामर्श करने पर उस लिस्ट का विस्तार होता रह सकता है। प्रतिदिन यथा अवसर कुछ लोगों से मिलना और उन्हें एक विज्ञप्ति पढ़ने का अनुरोध करना बिना झिझक-संकोच एवं समय खर्च किये बड़ी आसानी से हो सकता है। किसी बड़े दफ्तर या कारखाने में काम करने वाले, बड़ी कक्षाओं के अध्यापक लोग, चिकित्सक, व्यापारी, घूमने वाले ऐजेन्ट, दलाल, पोस्टमैन जैसे व्यक्ति तो बड़ो आसानी से यह काम कर सकते हैं। हर स्थिति का व्यक्ति कहीं न कहीं लोगों से मिलता- जुलता ही है। उसको परिवार, सम्पर्क, रिश्तेदार, मित्र, परिजन कुछ तो होते ही हैं। यहाँ से आरम्भ करके उसकी श्रृंखला परिचितों से परिचय प्राप्त करने से बढ़ाई जा सकती है। इस प्रकार अपना प्रचार क्षेत्र हर किसी के लिए १०० तक हो सकता है। गाँवों में समीपवर्ती दो- चार गांवों का मिलकर भी यह क्षेत्र हो सकता है। यह सौ व्यक्ति चलते- फिरते नहीं वरन् ऐसे होना चाहिये जिसके पास बार-बार पहुंचा जा सके और जो लगातार उस साहित्य सीरीज को पढ़ाकर अपना मन मस्तिष्क परिपक्व करने के उपयुक्त कुछ ठोस सामग्री लगातार प्राप्त करते रह सकें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र

महर्षि दुर्वासा के मुख से भक्ति की अनुभवकथा को सुनकर सभी के हृदयसरोवर में भगवत्प्रेम की अनेकों उॄमया उठीं। प्रायः सभी के नेत्र ऋषि दुर्वासा के मुख को निहारने लगे। इस समय उनके मुख पर बड़ी सहज और सात्त्विक कोमलता थी। इस अनूठी कोमलता को देखकर कईयों को अचरज भी हुआ क्योंकि ऋषि दुर्वासा तो सदा ही अपने रौद्रभाव के लिए विख्यात थे। उनके मुखमण्डल पर तो सदा ही दुर्धर्ष रौद्रभाव की छाया रहती थी। कठिन तप की कठोरता का तेजस उनके मुख को आवृत्त किए रहता था। परन्तु आज तो स्थिति परिवर्तित थी। इन क्षणों में कोमलता ने कठोरता का स्थान ले लिया था। महर्षि की आँखें भीगी हुई थीं। हृदय विगलित था और कण्ठ रुद्ध हो रहा था। बस भक्तिपूर्ण मन से आकाश को निहारे जा रहे थे। मुख से निकलते अस्फुट स्वरों- हे भक्तवत्सल नारायण! हे करूणासिन्धु नारायण!! हे कृपासागर नारायण!!! के रूप में भक्ति की निर्झरणी बह रही थी।

प्रखर तपस्वी महर्षि दुर्वासा का यह रूप सभी के अन्तस को छू गया। इन क्षणों में हिमवान के शिखरों की शुभ्रता शत-सहस्र-लक्षगुणित होती जा रही थी। ऐसा हो भी क्यों न? आखिर निशिपति चन्द्रदेव तारकों का पुष्पहार पहनकर गगन-विहार करने जो आ चुके थे। वह अपने सहस्र-सहस्र रश्मिकरों से रूपहली चाँदनी सब ओर बिखेर रहे थे। इस उज्ज्वल-धवल चाँदनी के संस्पर्श से शुभ्र हिमशिखरों की शुभ्रता और भी सम्मोहक हो रही थी। जितनी तीव्रता से हिमालय के शिखरों पर चन्द्रमा की चाँदनी व्याप्त हो रही थी, उतनी ही तीव्रता से उपस्थित जनों के मनों में महर्षि दुर्वासा के प्रति अपनापन व्याप्त हो रहा था। ऋषियों-महर्षियों, देवों, सिद्धों की सुकोमल भावनाएँ महर्षि के भक्तिपूर्ण मन से एकात्म हो रही थीं।

इस गहन आध्यात्मिक अनुभूति से देवर्षि नारद भी पुलकित थे। वह मौन हो आनन्दित हो रहे थे। आनन्द की यह छटा उनकी मुखछवि पर भी छिटक रही थी। वह इस समय बस भक्ति की भाव तरंगों में भीग रहे थे। महर्षि वसिष्ठ अपने सप्तर्षिमण्डल के साथ इस दृश्य की मनोरमता निहार रहे थे। महाराज अम्बरीश की स्मृतियों ने उन्हें भी बहुत कुछ अतीत की झलकियाँ दिखा दी थीं। वह अनुभव कर रहे थे कि भक्ति की चर्चा और भक्त के सहचर्य-सत्संग से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं। पर कहीं उनके मन में यह भी था कि देवर्षि अपने सूत्र का उच्चारण करें और इस भक्ति के भावप्रवाह की मनोरमता में एक नवीन आयाम जुड़े।

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के इन अन्तर्भावों ने देवर्षि की अन्तश्चेतना को हौले से छुआ और उसमें एक नवीन सूत्र का अंकुरण हुआ। वे वीणा की झंकृति के साथ मधुर स्वर में बोले-
‘तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः’॥ ३४॥
आचार्यगण उस (भक्ति) के साधन (के गीत गाते हैं) बतलाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३८

सोमवार, 11 अक्तूबर 2021

👉 सच्ची सरकार

कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नि ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है। आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं। शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा।

भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जीकी कृपा। अगर कोई अच्छा मूल्य मिला, तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा।

पत्नि बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले, तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना। घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे। पर बच्चे अभी छोटे हैं, उनके लिए तो कुछ ले ही आना।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए।

बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है। तेरा परिवार बसता रहे। ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा।
दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे।

भक्त नामदेव जी- दो चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?

फकीर ने जितना कपड़ा मांगा,
इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था।
और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया।

दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे। फिर पत्नि की कही बात, कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है। दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना।

अब दाम तो क्या, थान भी दान जा चुका था। भक्त नामदेव जी एकांत मे पीपल की छाँव मे बैठ गए।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
जब सारी सृष्टि की सार पूर्ती वो खुद करता है, तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा। और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन गए।

अब भगवान कहां रुकने वाले थे।
भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी।

अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया।
नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है?
नामदेव का घर यही है ना?
भगवान जी ने पूछा।

अंदर से आवाज हां जी यही आपको कुछ चाहिये
भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर मे कुछ भी नही है फिर ह्र्दय मे देने की सहायता की जिज्ञयासा हैl

भगवान बोले दरवाजा खोलिये
लेकिन आप कौन?

भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी? जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक, वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl

ये राशन का सामान रखवा लो। पत्नि ने दरवाजा पूरा खोल दिया। फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ, कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई।
इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है? मुझे नहीं लगता। पत्नी ने पूछा।

भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है।
जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया।
और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है।
जगह और बताओ।
सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में।

शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था।

समान रखवाते-रखवाते पत्नि थक चुकी थीं। बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे। वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़। कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते। उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे।

भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे, पर सामान आना लगातार जारी था।

आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना।
हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकी वो अभी तक घर नहीं आए हैं।

भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं।
अब परिजन नामदेव जी को देखने गये

सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे, जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं।

इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते उनकी पत्नी बोल पड़ीं- कुछ पैसे बचा लेने थे। अगर थान अच्छे भाव बिक गया था, तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?

भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए। फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया, कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है।

पत्नि ने कहा सच्ची सरकार को आपने थान बेचा और वो तो समान घर मे भैजने से रुकता ही नहीं था। पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया। उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे।

भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले-! वो सरकार है ही ऐसी। जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं। उसकी देना कभी भी खत्म नहीं होता।

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें

कभी हमने पूर्व जन्मों के सत् संस्कार वालों और अपने साथी सहचरों को बड़े प्रयत्नपूर्वक ढूंढा है और 'अखण्ड- ज्योति परिवार की शृद्खला में गूंथकर एक सुन्दर गुलदस्ता तैयार किया था। मंशा थी इन्हें देवता के चरणों में चढ़ा येंगे। पर अब जब जब कि बारीकी से नजर डालते हैं कि कभी के अति सुरम्य पुष्प अब परिस्थितियों ने बुरी तरह विकृत कर दिये है। वे अपनो कोमलता, शोभा और सुगंध तोनों ही खोकर बुरी तरह इतनी मुरझा गये कि हिलाते- दुलाते हैं तो भी सजीवता नहीं आती उलटी पंखड़ियाँ भर जाती हैं। ऐसे पुष्पों को फेंकना तो नहीं है क्योंकि मूल संस्कार जब तक विद्यमान हैं तब तक यह आशा भी है कि कभी समय आने पर इनका भी कुछ सदुपयोग सम्भव होगा, किसी औषधि में यह मुरझाये फूल भी कभी काम आयेंगे। पर आज तो देव देवो पर चढ़ाये जाने योग्य सुरभित पुष्पों की आवश्यकता है सो उन्हीं की छांट करनी पड़ रही है। अभी आज तो सजीवता ही अभीष्ट है और वस्तुस्थिति की परख तो कहने- सुनने- देखने- मानने से नहीं वरन् कसौटी पर कसने से ही होता है। सो परिवार को सजोवता- निर्जीवता- आत्मीयता, विडम्बना के अंश परखने के लिए यह वर्तमान प्रक्रिया प्रस्तुत की है। बेकार की घचापच छट जाने से अपने अन्तरिम परिवार को एक छोटी सीमा अपने लिए भी हलकी पड़ेगी बौर अधिक ध्यान से सींचे- पोसे जाने के कारण वे पौधे भी अधिक लाभान्वित होंगे

नव- निर्माण के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। विचार- प्रसार तो उसका बीजारोपण है। इसके बिना कोई गति नहीं। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पाये बिना ऊंची पढ़ाई की न तो आशा है न सम्भावना है। इसलिए प्रारम्भ में हर किसी को अक्षर ज्ञान कराना अनिवार्य है। पीछे जिसकी जैमी अभिरुचि हो शिक्षा के विषय चुनना रह सकता है पर अनिवार्य में छूट किसी को नहीं मिल सकती। प्रारम्भिक अक्षर सबको समान रूप में  पढ़ने पड़ेगे। विचारों की उप-योगिता, महत्ता, शक्ति और प्रमुखता का रहस्य हर किसी के मस्तिष्क में कूट- कूट कर भरा जाना है और बताया जाना है कि व्यक्ति की महानता और समाज की प्रखरता उसमें सक्षिप्त विचार पद्धति पर ही सन्निहित है। परिस्थितियों के बिगड़ने- बनने का एकमात्र आधार विचारणा ही है। विवेक के प्रकाश में यह परखा जाना चाहिये कि हमने अपने ऊपर कितने अवांछनीय और अनुपयुक्त  विचार अंट रखे है और उनने हमारी कितनी लोमहर्षक दुर्गति की है। हमें तत्त्वदर्शी की तरह वस्तुस्थिति का विश्लेषण करना होगा और निर्णय करना होगा कि किन आदर्शों और उत्कृष्टताओं को अपनाने के लिए कठिबद्ध हों ताकि वर्तमान के नरक को हटाकर उज्ज्वल भविष्य की स्वर्गीय सम्भावनाओं को मूर्तिमान् बना सकना सम्भव हो सके। विचार- क्रान्ति का मूल यही रत्रतन्त्र चिन्तन है। जन- मानस को उसी की प्राथमिक शिक्षा दी जानी है। अभी हमारी योजना का प्रथम चरण यही है। अगले चरणों में तो अनेक रचनात्मक और अनेक संघर्षात्मक काम करने को पड़े हैं। युग परिवर्तन और घरती पर स्वर्ग का अवतरण अगणित प्रयासों की अपेक्षा रखता है। वह बहुत व्यापक और बहुमुखी योजना हमारे मस्तिष्क में है। उसकी एक हलकी- सी झाकी गत दिनों योजना में करा भी चुके हैं। वह हमारा रचनात्मक प्रयास होगा। संघर्षात्मक पथ एक और ही जिसके अनुसार अवांछनीयता, अनैतिकता एवं अरामाजिकता के विरुद्ध प्रचलित 'घिराव' जैसे भाध्यमों से लेकर समग्र बहिष्कार तक और उतनी अधिक दबाव देने की प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जिससे दुष्टुता भी बोल जाय और उच्छ्खनता का कचू-मर निकल जाय। सजग, समर्थ लोगों की एक सक्रिय  स्वय- सेवक सेना प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो जाय तो आज जिन अनैतिकताओं का चारों और बोलबाला है और जो न हटने वालो न टलने वाली दीखती हैं। आंधी में उड़ते तिनकों की तरह तिरोहित हो जाँयगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969

👉 भक्तिगाथा (भाग ७४)

जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान हैं

ये क्षण बड़े शीतल व सुखद थे। ये अनुभूतियाँ कई क्षणों तक सभी को घेरे रहीं, तभी उस सघन आध्यात्मिक वातावरण में एक प्रखर तेजस्विता ने आकार ग्रहण किया। यह आकृति परम तेजस्वी व प्रखर तपस्वी ऋषि दुर्वासा की थी। ऋषि दुर्वासा अपने प्रचण्ड तप व असाध्य साधन के लिए विख्यात थे। उन्होंने योग एवं तंत्र की अनगिनत दुष्कर साधनाएँ सम्पन्न की थीं। विविध विद्याएँ अपने सभी सुफल के साथ उनके सामने करबद्ध खड़ी रहती थीं। इन महान ऋषि ने केवल दुर्व खाकर हजारों वर्ष तप किया था। दीर्घ अवधि तक इस दुर्व (दूब)+असन (भोजन) के कारण ही उनका नाम दुर्वासा हो गया था। उनकी चमत्कारिक शक्तियों व विकट तप की ही भाँति उनका क्रोध भी लोकविख्यात था परन्तु उनका क्रोध सदा ही किसी न किसी भाँति लोककल्याणकारी था।

ऐसे ऋषि दुर्वासा का आगमन, सुखद किन्तु आश्चर्यजनक था। वे महारूद्र के रौद्रतेज की साकार रौद्र मूर्ति थे। उनके आगमन से कुछ को प्रसन्नता हुई तो कुछ को आश्चर्य। परन्तु सुखी सभी थे क्योंकि सभी को यह लग रहा था कि महर्षि के आगमन से भक्तिगाथा में एक नयी कथा पिरोयी जाएगी। ऋषियों ने महर्षि का स्वागत किया। देवों, गन्धर्वों, सिद्धों व चारणों ने उन्हें भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया। महर्षि दुर्वासा ने विहंसते हुए सभी का अभिवादन स्वीकार किया। उन्हें इस तरह हंसते हुए देखकर सभी को आश्वस्ति मिली। सभी को आश्वस्ति पाते देखकर महर्षि भी पुलकित हुए। उन्होंने सभी से कहा कि ‘‘मैंने अपने जीवन में अनगिनत साधनाएँ की हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि अब तो मैंने साधनाओं एवं सिद्धियों की गणना करना ही छोड़ दिया है। विद्याओं के विविध प्रकार और उनके सुफल मेरे लिए अर्थहीन हो गए हैं। इन सबसे मुझे किंचित मात्र भी शान्ति नहीं मिली।

यह परम शान्ति तो भक्ति में है। जिसकी वजह से वत्स अम्बरीश का इतने युगों बाद नामश्रवण भी भावों को भिगो देता है। जहाँ भक्ति है, वहाँ स्वयं भगवान हैं, और जहाँ भगवान हैं, वहाँ पराजय और अशुभ टिक ही नहीं सकते। इसलिए भक्ति ही श्रेष्ठतम साधन मार्ग है।’’ महर्षि दुर्वासा के ये अनुभूतिवाक्य सभी को प्रीतिपूर्ण लगे। उन सबने देवर्षि की ओर देखा। देवर्षि ने पुलकित मन से महर्षि दुर्वासा की ओर देखते हुए अपने नए सूत्र का उच्चारण किया-

‘तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः’॥ ३३॥
इसलिए संसार बन्धन से मुक्त होने की इच्छा रखने वालों को भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिए।

देवर्षि के इन वचनों को सुनकर ऋषिश्रेष्ठ दुर्वासा कह उठे- ‘‘नारद के ये वचन त्रिकालसत्य हैं, त्रिवारसत्य हैं, और सच यही है कि यही सर्वकालिक सत्य है। मेरी स्वयं की अनुभूति भी यही कहती है।’’ फिर थोड़ा रुककर वह बोले- ‘‘सम्भव है कि आपने यह कथा सुन रखी हो परन्तु फिर भी मैं इसे कहना चाहता हूँ।’’ ‘‘अवश्य कहें-महर्षि!’’ सभी ने लगभग एक स्वर से कहा। केवल ऋषि अत्रि मुस्करा दिए। ऋषि दुर्वासा ने पिता की इस मुस्कान पर दोनो हाथ जोड़ लिए और कहना प्रारम्भ किया- ‘‘अभी आपने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के मुख से भक्त अम्बरीश का भक्तिप्रसंग सुना है। मैं भी आज उनकी भक्ति की सराहना करना चाहता हूँ। इस कथा को घटित हुए युगों बीत गए परन्तु मेरे अन्तःकरण में वे सभी दृश्य अभी भी जीवन्त हैं।

उस दिन भी एकादशी व्रत के परायण का उत्सव था। ठीक वैसा ही आयोजन, वैसा ही समारोह-सम्भार, जिसकी कथा आप सभी ने थोड़ी ही देर पहले सुनी है। बस अन्तर था तो इतना, कि वत्स अम्बरीश ने एक दिन पूर्व मुझे आमंत्रित किया था परन्तु मैं परायण उत्सव पर निश्चित मुहूर्त्त से काफी विलम्ब से पहुँचा। अम्बरीश जब तक प्रतीक्षा कर सकते थे, उन्होंने की। परन्तु बाद में ऋषियों के निर्देश से उन्होंने परायण कर लिया। हालांकि, इसके लिए उन्होंने मुझसे क्षमायाचना भी की। परन्तु मैं उस दिन अहंता से ग्रसित था। सो मैंने क्रोधवश क्रूर करालकृत्या का प्रयोग अम्बरीश पर कर दिया। वहाँ उपस्थित ऋषियों के पास इसकी कोई काट न थी। सभी असहाय से खड़े इसे देखते रहे। और क्रूर करालकृत्या अम्बरीश को जलाने लगी।

उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की ओर देखा और इन महान ऋषि के संकेत को समझकर आर्त स्वर से पुकारा- रक्षा करो नारायण! करूणा करो हे भक्तवत्सल!! अम्बरीश की इस आर्त पुकार ने जैसे सप्तलोक और चौदह भुवनों को बेध दिया और फिर पलक झपकते ही जैसे सहस्रों-सहस्र सूर्य आकाश में उदित हो गए। यह नारायण के सुदर्शन चक्र का प्राकट्य था, जिसने क्षणार्ध में उस कृत्या को भस्मीभूत कर दिया। फिर वह सुदर्शन वेगपूर्ण हो मुझे दण्डित करने के लिए दौड़ा। मैं भी भयभीत होकर भागा- पहले पिताश्री अत्रि एवं माताश्री अनुसूइया के पास गया। इन्होंने मुझे परामर्श दिया कि पुत्र तुम अम्बरीश की शरण में जाओ। अन्यत्र तुम्हें कहीं भी शरण न मिलेगी। पर मुझ अभिमानी को यह बात समझ में न आयी। सो ऋषियों के पास से त्रिदेवों के पास गया। ब्रह्मा, शिव और अन्त में नारायण के पास। परन्तु वहाँ भी वही कहा गया- कि तुम अम्बरीश के अपराधी हो उन्हीं की शरण में जाओ। आखिर थक हार कर मैं अम्बरीश के पास आया। परन्तु यह क्या, उन्होंने तो मेरे पाँव पकड़ लिए, और कहा आप पर नारायण की अवश्य कृपा होगी। उनके इस स्वरों के साथ ही सुदर्शन तिरोहित हो गया। परन्तु उस दिन मुझे यह बोध अवश्य हो गया कि भक्ति से श्रेष्ठ अन्य कोई साधन नहीं है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३६

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

👉 सुविधा सम्पन्न होने पर भी थकान-ग्रस्त क्यों? (अन्तिम भाग)

खुली, धूप, ताजी हवा और अंग संचालन के आवश्यक शारीरिक परिश्रम का अभाव साधन सम्पन्न लोगों की थकान का मुख्य कारण है। इसके लिये बाहर से बहुत आकर्षक लगने वाले दफ्तर वास्तव में बहुत ही खतरनाक हैं। वातानुकूलित करने जरा-सी गर्मी में पंखों की तेज चाल- कूलर- खश के पर्दे, बर्फ मिला पानी- जाड़े में हीटर- गरम चाय- ऊनी कपड़ों का कसाव देखने में बड़े आदमी होने का चिह्न लगाते हैं और तात्कालिक सुविधा भी देते हैं पर इनका परिणाम अन्ततः बहुत बुरा होता है। त्वचा अपनी सहन शक्ति खो बैठती है। अवयवों में प्रतिकूलता से लड़ने की क्षमता घट जाती है। फलस्वरूप ऋतु प्रभाव को सहन न कर पाने से आये दिन जुकाम, खाँसी, लू लगना, ताप, सिर दर्द, अनिद्रा, अपच जैसी शिकायतें समाने खड़ी रहती हैं। सूर्य की किरणें और स्वच्छ हवा में जो प्रचुर परिमाण में जीवन तत्व भरे पड़े हैं उनसे वञ्चित रहा जाय तो उसकी पूर्ति ‘विटामिन, मिनिरल और प्रोटीन’ भरे खाद्य पदार्थों की प्रचुर मात्रा भी नहीं कर सकती। साधन सम्पन्न लोग ही तात्कालिक सुविधा देखते हैं और दूरगामी क्षति को भूल जाते हैं। फलतः वह आरामतलबी का रवैया बहुत भारी पड़ता है और थकान तथा उससे उत्पन्न अनेक विग्रहों का सामना करना पड़ता है।

म्यूनिख (जर्मनी) की वावेरियन एकेडमी आफ लेवर एण्ड सोशल येडीशन संस्था की शोधों का निष्कर्ष यह है कि कठोर शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों की अपेक्षा दफ्तरों की बाबूगीरी स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक खतरनाक है।

स्वास्थ्य परीक्षण- तुलनात्मक अध्ययन आँकड़ों के निष्कर्ष और शरीर रचना तथ्यों को सामने रखकर शोध कार्य करने वाली इस संस्था के प्रमुख अधिकारी श्री एरिफ हाफमैन का कथन है कि कुर्सियों पर बैठे रहकर दिन गुजारना अन्य दृष्टियों से उपयोगी हो सकता है पर स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वथा हानिकारक है। इससे माँस पेशियों के ऊतकों एवं रक्त वाहिनियों को मिली हुई स्थिति में रहना पड़ता है, वे समुचित श्रम के अभाव में शिथिल होती चली जाती है फलतः उनमें थकान और दर्द की शिकायत उत्पन्न होती है। रक्त के नये उभार में, उठती उम्र में यह हानि उतनी अधिक प्रतीत नहीं होती पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे वैसे आन्तरिक थकान के लक्षण बाहर प्रकट होने लगते हैं और उन्हें कई बुरी बिमारियों के रूप में देखा जा सकता है। कमर का दर्द (लेवैगो), कूल्हे का दर्द (साइटिका) गर्दन मुड़ने में कंधा उचकाने में दर्द, शिरा स्फीति (वेरी कजोवेन्स), बवासीर, स्थायी कब्ज, आँतों के जख्म, दमा जैसी बीमारियों के मूल में माँस पेशियों और रक्त वाहिनियों की निर्बलता ही होती है, जो अंग सञ्चालन, खुली धूप और स्वच्छ हवा के अभाव में पैदा होती है। इन उभारों को पूर्व रूप की थकान समझा जा सकता है।

बिजली की तेज रोशनी में लगातार रहना, आँखों पर ही नहीं आन्तरिक अवयवों पर भी परोक्ष रूप से बुरा प्रभाव डालता है। आँखें एक सीमा तक ही प्रकाश की मात्रा को ग्रहण करने के हिसाब से बनी हैं। प्रकृति ने रात्रि के अन्धकार को आँखों की सुविधा के हिसाब से ही बनाया है। प्रातः सायं भी मन्द प्रकाश रहता है। उसमें तेजी सिर्फ मध्याह्न काल को ही आती है। सो भी लोग उससे टोप, छाया, छाता, मकान आदि के सहारे बचाव कर लेते हैं। आंखें सिर्फ देखने के ही काम नहीं आतीं वे प्रकाश की अति प्रबल शक्ति को भी उचित मात्रा में शरीर में भेजने की अनुचित मात्रा को रोकने का काम करती हैं। यह तभी सम्भव है जब उन पर प्रकाश का उचित दबाव रहे पर यदि दिन रात उन्हें तेज रोशनी में काम करना पड़े तो देखने की शक्ति में विकार उत्पन्न होना तो छोटी बात है। बड़ी हानि यह है कि प्रकाश की अनुचित मात्रा देह में भीतर जाकर ऐसी दुर्बलता पैदा करती है जिससे थकान ही नहीं कई अन्य प्रकार की तत्सम्बन्धित बीमारियाँ भी पैदा होती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972

👉 भक्तिगाथा (भाग ७३)

जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान हैं

देवर्षि के सूत्र सत्य में अपने शब्दप्रसूनों को पिरोते हुए ब्रह्मर्षि वसिष्ठ बोले- ‘‘सचमुच ही राजपरितोष तो राजा के सानिध्य में रहकर ही जाना जा सकता है। यह तब और भी सुखकर एवं प्रीतिकर होता है, जब राजा हमारे वत्स अम्बरीश की भाँति, तपस्वी, ब्राह्मणों एवं साधुओं को साक्षात साकार नारायण के रूप में पूज्य मानता हो। और रही बात भोजन की तो इसका स्वाद एवं सुख, चर्चा-चिन्तन में नहीं, इसे ग्रहण करने में है।’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का यह कथन कुछ इतना मधुर व लयपूर्ण था कि उनकी शब्दावली, एक नवीन दृश्यावली को साकार कर रही थी। एकबारगी सभी के अन्तर्भावों में भुवनमोहिनी अयोध्या, सरयू का तट, उस पावन नदी का नीर, उसमें मचलती लहरें और उन लहरों में अठखेलियाँ करती सूर्य रश्मियाँ और अवधवासियों पर, समस्त भक्तों और सन्तों पर अपनी स्वर्णिम कृपा बरसाते सूर्यदेव प्रकट हो उठे थे।

ये बड़े ही गहन समाधि के क्षण-पल थे। इन क्षणों में, इन पलों में हिमवान के आंगन में बैठे हुए सभी ने अयोध्या का सुखद अतीत निहारा। उन्होंने देखा कि राजर्षि अम्बरीश किस तरह तपोधन महर्षि विद्रुम एवं उनके शिष्य शील व सुभूति का सत्कार-सम्मान कर रहे हैं। किस तरह वह उन्हें बार-बार आग्रहपूर्वक भोजन ग्रहण करा रहे हैं। सबने यह भी देखा कि राजपरितोष एवं क्षुधाशान्ति के ये सुखद पल सरयू के तीर पर ही समाप्त न हुए बल्कि महाराज उन्हें आग्रहपूर्वक राजभवन में ले गए। भव्य राजप्रासाद में महारानी सहित सभी राजसेवकों व राजसेविकाओं ने इनका सम्मोहक सम्मान किया। आरती के थाल सजे, वन्दनवार टंगे, मंगलगीतों का गायन हुआ। इतने पर भी महाराज ने विराम न लिया, वह इन्हें आग्रहपूर्वक राजसभा में ले गए। जहाँ स्वागत-सम्मान के इस समारोह ने अपना चरम देखा।

राजर्षि अम्बरीश की भावनाओं में भीगे ऋषि विद्रुम इसे तितीक्षा के रूप में सहन करते रहे। परन्तु एक पल ऐसा भी आया जब उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की ओर सांकेतिक दृष्टि से देखा। अन्तर्ज्ञानी ब्रह्मर्षि परम तपस्वी का संकेत समझ गए। उन्होंने अम्बरीश को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘पुत्र! अब ऋषिश्रेष्ठ को तपोवन जाने की अनुमति दो क्योंकि ऋषिवर इस समय तुम्हारे भावों के वश में हैं। इसी वजह से वह तुम्हारे प्रत्येक आग्रह एवं अनुरोध को स्वीकार करते जा रहे हैं। परन्तु यह उनकी और उनके शिष्यों की प्रकृति के विपरीत है। उनकी प्रकृति के लिए तो तपोवन की कठोरता व दुष्कर-दुधर्ष साधनाएँ ही सहज हैं। इसलिए उन्हें अब तपोवन जाने दो वत्स!’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ महाराज अम्बरीश के  लिए ही नहीं बल्कि उनके समस्त कुल के आराध्य थे। उनका प्रत्येक वचन उन्हें सर्वथा शिरोधार्य था। इसलिए उन्होंने भीगे नयनों से, विगलित मन से ऋषि विद्रुम व शील एवं सुभूति को विदा दी। अतीत के इस अनूठे दृश्य को सभी ने अपने अन्तर्भावों में निहारा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३५

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...