शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग ३)

जो मनीषी संतुलित मन वाले होते है। राग-द्वेष ईर्ष्या, स्पर्धा, उद्वेगों आवेशों से चलायमान नहीं होते, उनको और असन्तोष के कारण प्रभावित नहीं करने पाते। वे सुख दुख को धूप-छाँव की माया मात्र मानकर उनकी उपस्थिति में भीषण स्थिति में ही बने रहते है। न उनका मन विचलित होता है और न स्वयं वे। जिनका मन विविध विकारों और विकृतियों से भरा रहता है, जो क्षिप्त-विक्षिप्त और विक्षोभ के रोगी होते है, उनका मन संतुलित नहीं रहता, वे क्षण क्षण पर आन्दोलित और चलायमान होते हुए, सुख-दुख के झूले में झटके खाते रहते है। जिन्होंने प्रयत्नपूर्वक मन को स्थिरता, एकाग्रता और निरोध का अभ्यास करा लिया है, वे हर स्थिति और हर परिस्थिति में संतुलित रहकर सुख-शाँति के अधिकारी बनते है। मानसिक संतुलन सुख-सन्तोष का बहुत बड़ा आधार है, उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते ही रहना चाहिये।

अनुरूपता भी सुख शाँति का एक महत्वपूर्ण आधार है। अनुरूपता के अर्थ है अन्तर और बाह्य की अनुरूपता जिसका अन्तर पवित्र और आदर्शपूर्ण है, किन्तु उसके कार्य उसके अनुरूप नहीं है, तब भी सुख शाँति का सुलभ होना सम्भव नहीं। मन कुछ और चाहे, तन कुछ करता रहे- इससे भी मनुष्य में एक विरोध बना रहता है। अपनी अवहेलना होते रहने से मन सदा अक्लांत और संतत बना रहता है। जो अन्तर बाहर की द्विविधि स्थिति में पड़े रहते है, वे कभी संतुष्ट नहीं होते। उन्हें मन, की प्रेरणा पर चलने से तन की तृष्णायें सताती है और तन की प्रेरणा पर चलने से मन धिक्कारता है। बहुत बार बहुत से लोगों की नैतिक बुद्धि प्रबल होती है। अन्तरमन में आदर्श प्रेरणाएँ मचलती रहती है, किन्तु उन्होंने आदर्श व्यवहार का अभ्यास नहीं किया होता है। ऐसी स्थिति में उनसे यंत्रवत ही आदर्श से घिरे कार्य हो जाते है। जिससे पश्चाताप तो होता ही है साथ ही कर्मों के फलस्वरूप भी कष्ट और क्लेश उठाने पड़ते है।

इसी प्रकार बहुत से बाहर से बड़े सत्यनिष्ठ और आदर्शवादी होते है। वे सत्कर्म करने का प्रयत्न करते है। किन्तु उनका कुसंस्कारी मन उनका विरोध करता है। उनके किये पर स्वार्थ हानि, लाभ-हानि आदि का अभियोग लगाता है। बाहर से आदर्शवादियों को मन को ताड़ना में पड़ कर बड़ी भयंकर यातना उठानी पड़ती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं। (अंतिम भाग )

गीता का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि प्रसन्न रहने से सब प्रकार के दुखों का नाश हो जाता है। शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक सब प्रकार के दुःखों का इस एक ही ब्रह्मास्त्र से नाश हो जाता है। इसलिए जो लोग दुःखों से छुटकारा प्राप्त करके सुखी रहना चाहते हैं उन्हें उचित है कि अपने स्वभाव को हंसमुख बनावें। यह सोचना भूल है कि जिसके पास, धन, स्त्री, पुत्र, विद्या, स्वास्थ्य आदि साधन हैं, जो सम्पन्न है वह प्रसन्न रहेगा। हम देखते हैं कि इन सम्पदाओं से भरे पूरे असंख्यों मनुष्य मौजूद हैं पर उन्हें इन वस्तुओं के कारण सुख मिलने के कारण दूनी चिन्ताएं आ घेरती हैं। अनेकों नई समस्याएं, नई अड़चनें, नई बाधायें उनके सामने आती रहती हैं, एक जब तक गई नहीं कि दूसरी नई दस गुत्थियाँ सामने आ जाती हैं। इस प्रकार उसकी अशान्ति, अप्रसन्नता अपेक्षाकृत और भी अधिक बढ़ जाती हैं।

अधिक साधन होने से कोई सुखी नहीं हो सकता। सुख का हेतु दूसरा है जो गीता के उपरोक्त श्लोक के अन्तिम भाग में बता दिया गया है। प्रसन्न चित्त होने से तत्क्षण बुद्धि स्थिर हो जाती है। इसी को यों भी कह सकते हैं कि बुद्धि स्थिर होने से तत्क्षण मनुष्य प्रसन्न चित्त रहने लगता है। बुद्धि को, संसार की पंचभौतिक, नश्वर चीजों के लोभ में उछलने, कूदने से रोककर आत्म परायणता में लगा देने से वह स्थिर हो जाती है और इस स्थिरता के साथ ही प्रसन्नता का अजस्र स्त्रोत प्रवाहित होने लगता है। आत्मा के लाभ के जीवन का एकमात्र लाभ समझकर कर्त्तव्य परायण होने से हर कार्य में एक अद्भुत आनन्द आने लगता है। अस्थिर बुद्धि वाला, साँसारिक, अस्थिर पदार्थों को भोगने एवं जाम करने के फेर में पड़ा रहता है और पानी की लहरें पकड़ने के समान बार बार असफलता पर खीजता रहता है, पर स्थिर बुद्धि वाला, केवल मात्र अपने कर्त्तव्य पर ध्यान देता है, अपने धर्म को, उत्तरदायित्व को पूरी सावधानी के साथ निवाहता है। इस कार्य प्रणाली में सफलता हर घड़ी अपने हाथ में रहती है। मैं अपना कर्त्तव्य ठीक प्रकार पालन कर रहा हूँ, इस सफलता पर वह हर घड़ी प्रसन्न रहता है, हर घड़ी आत्म सन्तोष का अनुभव करता है।

परमात्मा के पुनीत उद्यान में, संसार में खेलने का जिसे अवसर मिला हुआ है, उसे हर घड़ी प्रसन्न रहना चाहिए। काले-सफेद, भले-बुरे, प्रिय-अप्रिय तथ्यों से भरा हुआ संसार कितना सुन्दर है इसे देखकर उसका हृदय कमल खिल जाता है। अच्छाइयों का मधुर स्पर्श करना और बुराइयों से लड़ना यह उभय पक्षीय कार्यक्रम सामने रखकर मानों भगवान ने मीठे और तीखे षट्रस व्यंजन हमारे जीवन थाल में परोसे हैं, उनके विविध स्वादों का विविध प्रकार का अनुभव करते हुए हमें उसी प्रकार आनंदित होना चाहिए जैसे स्वादिष्ट षट्रस व्यंजनों का आस्वादन करते हुए हम प्रसन्न होते हैं। सुख-दुख, गरीबी-अमीरी, आनन्द-क्लेश, भाव-अभाव अपने-अपने ढंग के व्यंजन हैं। यही सभी अपने अपने ढंग से स्वादिष्ट हैं। एक से दूसरे का महत्व है। विरोधी भाव न हो तो हर एक वस्तु नीरस हो जाय। दिन का महत्व रात के कारण होता है यदि रात न हो तो दिन के आनन्द का अनुभव ही न हो, इसी प्रकार सुख का आनंद दुख से है। दुख न हो तो जिन बातों में आज सुख समझा जाता है, फिर न समझा जा सकेगा। संसार की, जीवन की, हर स्थिति हमारे लिए मंगलमयी, आनंददायक है। स्थिति के अनुकूल अपने को बदलकर हर अवस्था में अपने को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

गीता कहती है सम्पूर्ण दुखों के निवारण का उपाय, प्रसन्न रहना है। हर वक्त, हर स्थिति में मुस्कुराते रहिए, निर्भय रहिए, निश्चित रहिए, कर्त्तव्य करते रहिए और प्रसन्न रहिए। पाठकों! बुद्धि को स्थिर करो और प्रसन्न रहो।

📖 *अखण्ड ज्योति जुलाई 1947*

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 July 2026


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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग २)

सुख-दुख का मन की स्थिति पर निर्भर होने का प्रमाण यह है कि बहुत बार मन को स्थिति के अनुसार मनुष्य एक ही बात में विपरीत अनुभूतियाँ पाया करता है। जिस समय मन स्वस्थ और शाँत होता है, उस समय कोई अप्रियता भी विक्षोभ उत्पन्न नहीं करने पाती और जब मन की स्थिति प्रतिकूल होती है तो प्रिय बातें भी अच्छी नहीं लगती। जैसे जब कोई पिता विनोद पूर्ण मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की शरारत में भी उसे आनन्द आता है किन्तु जब वह मलिन मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की उचित प्रसन्नता भी उस क्षुभित और दुःखी कर देती है। हानि लाभ की सूचनाओं में भी इसी तरह मनःस्थिति के अनुसार दुःख सुख होता रहता है। दुःख-सुख का जन्म बाहरी पदार्थों अथवा परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। उसका जन्म मन से मन में ही होता है। इसीलिए उन्हें मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है।

हमारे हृदय में सदा सुख का ही जन्म होता रहे, दुख की स्थिति में भी हम सुख का अनुभव करते रहें-इसके लिए आवश्यक है कि हम अपनी मनोभूमि को अनुकूल बनायें। मन की अनुकूलता का उपाय है ‘संतुलन’। संतुलन का आशय है, जल्दी जल्दी आन्दोलित न होना। उन्नति लाभ और सफलता के अवसरों पर खुशी से नाच उठना, हर्षातिरेक में जाना और गतिरोध, हानि अथवा असफलता के क्षणों में निराश, ह्रास अथवा शोकातिरेक से रो उठना वास्तव में मानसिक असंतुलन के लक्षण है।

अभ्यास पूर्वक यदि मनुष्य अपने इस मानसिक असंतुलन पर काबू रखने लगे तो वह एक सन्तोषप्रद सीमा तक सुख-दुख के घात-प्रतिघात से बचा रह सकता है। जो सुखात्मक अशाँत स्थिति में हर्षातिरेक से आन्दोलित हो उठेगा। दुःख के समय उसका शोक विह्वल हो उठना स्वाभाविक ही है। सुख का आघात तो एक हद तक सहा भी है। उससे अधिक हानि नहीं होती। केवल पुरुषोचित गाम्भीर्य और सुखोपभोग में समय की हानि अवश्य होती है बाकी हर्षातिरेक कोई गहरी हानि ऐसी हानि नहीं करता, जिसकी पूर्ति न हो सके अथवा दूर तक जिसका प्रभाव पड़े। किन्तु दुःख का आघात प्रायः असहाय होता है। उसके शक्तियों चेतना और यहाँ तक कि बुद्धि को भी दूरगामी हानि होती है। इसलिये सुख की अपेक्षा दुख के आघात से बचाव करना अधिक आवश्यक है। तथापि इसके उपाय मानसिक संतुलन की सिद्धि तभी सम्भव है, जब सुख के समय भी न आन्दोलित होने का अभ्यास रक्खा जाये। दुख के समय तो संभले रहने का प्रयत्न किया जाये और सुख के समय अतिरेक में बहते रहा जाये तो इस अधूरे प्रयत्न द्वारा प्रयोजन सिद्ध न होगा। यह तो एक और अभ्यास करना और दूसरी और उसे बिगाड़ लेना होगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं। (भाग ३)

प्रसन्न रहने से सामाजिक उन्नति भी होती है। हंसता चेहरा एक प्रकार का फूल है जिसे देखकर दर्शकों का मन अनायास ही उस ओर खिंच जाता है। उसके संपर्क में आने के लिए, उसकी मित्रता पाने के लिए, सभी का मन ललचाता है। कहते हैं कि हंसने वाले के मुँह से मोती झड़ते हैं और फूल बरसते हैं। इस दैवी उपहार को समेटने का लोभ भला कौन संवरण कर सकता है? जिससे थोड़ी देर भी उसकी बातें हो जाती हैं वही उसका स्नेही बन जाता है। अनेक व्यक्तियों की सहानुभूति, घनिष्ठता में भी एक बहुत बड़ा बल है जिनके द्वारा साधारण मनुष्य बड़ी उन्नति कर जाते हैं। बिना दूसरों की सहायता के केवल मात्र अपने पुरुषार्थ से हमारी जीवन यात्रा आगे नहीं बढ़ सकती। समृद्धि की शिला सामाजिक सहयोग पर रखी होती है। दूसरों का सहयोग प्राप्त करने के साधनों में प्रसन्न रहना, सबसे महत्वपूर्ण कारण है। हंसमुख को बिना माँगी सहायताएं प्राप्त होती रहती हैं।

प्रसन्नमुख मुद्रा, प्रमाणिकता की साक्षी देती हैं। जो स्थिर चित्त है, जो सुखी है, जो सफल है, जो संतुष्ट है वह प्रसन्न रहेगा अथवा जो प्रसन्न रहेगा उसमें यह चारों बाते होंगी। यह चारों सम्पदाएं जिनके पास हैं वह निश्चय ही बुद्धिमान, गम्भीर, विश्वसनीय, साहसी, कुशल एवं सुयोग्य समझा जाता है। प्रसन्न रहना देखने में मामूली बात है पर उसके पीछे अनेकों मौन रहस्य छिपे होते हैं। यह रहस्य सामने वाले के ऊपर अपनी छाप छोड़े बिना नहीं रहते। इन तथ्यों के आगे सामने वाले को नत मस्तक होना पड़ता है, यही कारण है कि प्रमुदित रहने वाले से शत्रुता रखने वाले मुश्किल से ही कहीं दृष्टिगोचर होते हैं। घर में, दफ्तर में, देश में, परदेश में, बाजार में, राजदरबार में, विद्वानों में, मूर्खों में हर जगह उसका आदर होता है। हर जगह उसे सहयोग मिलता है। वह अपने आप नेता होता है, उसके प्रभाव से अनेकों को उसका अनुयायी बनना पड़ता है।

शारीरिक, मानसिक और सामाजिक मजबूती होने का फल आर्थिक उन्नति के रूप में अपने आप सामने आता है। जो शरीर से कड़ी मेहनत कर सकता है, जो शान्त चित्त से एकाग्रतापूर्वक सही बात सोच सकता है, जिसे दूसरे लोग प्यार करते हैं और सहयोग देते हैं उसकी आर्थिक उन्नति होनी अवश्यम्भावी है। ऐसा आदमी, व्यापार, नौकरी, उत्पादन, जो भी अर्थ उपार्जन का मार्ग अपनावेगा उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। जो सुयोग्य है, उसे भूखों न मरना पड़ेगा। कोई आपत्ति भी आ जाय तो अपनी योग्यताओं द्वारा वह उसे हटाकर पुनः खोये हुए वैभव को प्राप्त कर लेगा। जब सब लोग हंसमुख का सहयोग करते हैं तो फिर भली लक्ष्मी सहयोग क्यों न करेगी?

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बुधवार, 8 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग १)

सुख-शाँति की उपलब्धि हो सकती है, यह ध्रुव सत्य है। जो लोग यह मान्यता बनाये बैठे है कि यह संसार तो दुःखों का आगार है, यहाँ पर सुख दुर्लभ है, नहीं मिल सकता-वे निश्चय ही भूल पर है। ऐसे लोग संसार के नाम से अपने मनोयोग का ही कथन करते है। चूँकि उनका अपना मानस जीवन शोक-संतापों और असन्तोष, अशान्ति से भरा होता है, इसलिए उन्हें यह सारा संसार ही दुःख का आगार आभासित होता है। जबकि वास्तविक बात यह है कि संसार में दुःख की अपेक्षा सुख की मात्रा अधिक है।

यदि ऐसा न होता तो यह संसार अब तक मनुष्यों से रिक्त हो चुका होता। दुःख और कष्टों में कोई जीता ही न रह पाता। इसके विपरीत बराबर देखा जाता है कि लोग उत्साहपूर्वक जी रहे है। संसार से मनुष्यों को प्यार है। वे इसकी अधिकाधिक उन्नति के लिए प्राणपण से प्रयत्नरत है। यदि उन्हें इस संसार में सुख-शाँति और आनन्द न मिलता तो क्यों तो वे इसमें जीना पसन्द करते और क्यों इसको सजाने का प्रयत्न करते। जिया तो सुख और आनंद के लिए जाता है, न कि दुख और शोक सन्ताप के लिये। हर मनुष्य के पास उसका एक सुख है, जो उसे मिलता है। अब यह भिन्न बात है कि वह उसको समझ न पाये और अपने किन्हीं भ्रमों और अज्ञान से आहत उल्टा अनुभव करे अथवा अपनी गलतियों से अपने सुख में आग लगाता रहे। मनुष्य निश्चय ही कतिपय सुधारों के आधार पर अपने सुख के भाग को स्थायी अधिक तथा निरापद बना सकता है। और उसे बनाना भी चाहिये।

किन्तु सुख भाग योंही सुरक्षित न हो जायेगा। उसके लिए कुछ प्रयत्न करना होगा। प्रयत्नों में सबसे पहला प्रयत्न है मन का परिष्कार। सुख दुख वस्तुतः और कुछ नहीं। वे मन की दो दिशाओं के भिन्न-भिन्न नाम मात्र है। इनका जन्म बाह्य संयोगों से न होकर मन से ही होता है। इसलिये सुख और दुःख को मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है। पिता स्वस्थ होता है सन्तान भी स्वस्थ होती है। पिता सज्जन होता है, सन्तान भी सज्जन होती है। पिता रोगी होता है, सन्तान भी वैसी होती है। पिता दुष्ट होता है, सन्तान का सज्जन होना कठिन है। इसी प्रकार मन यदि सुन्दर दशा में है, उससे तदनुरूप सुख का जन्म और यदि मन की दशा अच्छी नहीं है तो उससे दुःख का ही जन्म होना है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं। (भाग २ )

मन का, मस्तिष्क का नाश करने में अप्रसन्नता से बढ़कर और कोई घातक वस्तु नहीं है। जिसका चित्त किसी न किसी कारण से दुखी ही बना रहता है, जो आशंका, भय, असफलता से चिन्तित रहते हैं, जिन्हें द्वेष, कुढ़न, शोक, आवेश, उद्वेग घेरे रहते हैं, जो अहंकार से गरदन फुलाये रहते हैं, सीधे मुँह किसी से बात करना जिन्हें सुहाता नहीं, ऐसे बदमिजाज आदमी अपने दुःस्वभाव के कारण अपनी मानसिक शक्तियों का सत्यानाश करते रहते हैं। उनमें से अधिकाँश को तरह तरह की सनक सवार हो जाती है। कितने अर्ध विक्षिप्त होते हैं और कई तो बिल्कुल पागल हो जाते हैं। ऐसे लोगों को अनिद्रा, मधुमेह, बवासीर दस्त साफ न होना, जिगर बढ़ जाना, मुँह से बदबू आना, दांतों में मवाद जाना, रक्त की कमी, दिल की धड़कन, खुश्की, खुजली, मुँह में छाले जैसे रोग हो जाते हैं और कितना ही इलाज करने पर भी जड़ से नहीं जाते। मानसिक उद्वेगों के कारण रक्त के श्वेत कीटाणु अशक्त हो जाते हैं। फलस्वरूप शरीर की रोग निरोधक शक्ति में शिथिलता आ जाती है। हड्डियों के भीतर की मज्जा सूख जाती है, नसें सख्त पड़ जाने के कारण पैरों में हड़फूटन होती रहती है।

अप्रसन्न, रहने वाले, मानसिक अशान्ति से घिरे रहने वाले लोगों का वीर्य निःस्वत्व हो जाता है। उन्हें सुसंतति प्राप्त करने का सौभाग्य नहीं मिलता या तो संतान होती ही नहीं, होती है तो निर्बल, रोगग्रस्त, अपूर्ण होती है। इनमें भी पुत्र की अपेक्षा कन्याएं ही अधिक होती हैं। इन बालकों को सूखा, पीलिया, दस्त अधिक होना, पेट बढ़ जाना, आँखें दुखना जैसे निर्बलता जन्य रोग घेरे रहते हैं। वे बहुत दिन में खड़े होने और बोलने की सामर्थ्य प्राप्त कर पाते हैं। ऐसे बालक बहुधा बचपन में ही मर जाते हैं, अगर किसी प्रकार माता मसानी पर से बच भी गये तो बड़े होने पर मूर्खता, आलस्य, व्यसन आदि दुर्गुणों से घिरे रहते हैं। चिन्ताग्रस्त, खिन्न मानस, माता पिता को सुसंतति से प्रायः वंचित ही रहना पड़ता है।

इस प्रकार मानसिक असंतुलन में अपना शरीर घुलता है और भावी संतति का ह्रास होता है। परन्तु जो लोग प्रसन्न रहते हैं, हंसमुख एवं खुशमिज़ाज रहते हैं वे सहज ही इन आपत्तियों से बच जाते हैं। इतना ही नहीं उनका स्वास्थ्य दिन दिन अच्छा होता रहता है। एक आदमी एक एक गज रोज नीचे उतरे और दूसरा आदमी एक एक गज रोज ऊपर चढ़े तो उन दोनों में नित्य की चाल की अपेक्षा दूना अन्तर होता जायगा। अप्रसन्न रहने वालों और प्रसन्न रहने वालों के बीच में नित्य दूना अन्तर पड़ता जाता है। एक दिन दिन नीचे गिरता है, दूसरा दिन दिन ऊपर चढ़ता है। प्रसन्न रहने वाले की मानसिक शक्तियाँ-जिज्ञासा, कल्पना, इच्छा, व्यवस्था, आशा एवं श्रद्धा शनैः शनैः मजबूत होती जाती है और वह प्रतिदिन अधिक मनस्वी बनता जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1947

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मंगलवार, 7 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (अंतिम भाग)

यह सुरदुर्लभ मानव-जीवन बहुत मूल्यवान उपलब्धि है। यह कल्प-वृक्ष ओर कामधेनु की तरह फलदायी हैं। आप इससे जो चाहें प्राप्त कर सकते है। किंतु यह फलदायक तभी होता है, जब इसे हरा-भरा और प्रसन्न रक्खा जाए। यदि आप इसको चिन्ता की चिंता में जलाते रहेंगे, तब तो यह सूख जायेगा। इसके सारे गुण, सारी विशेषताएँ और सारे अनुग्रह नष्ट हो जाएँगे। चिन्ता छोड़िये, यह मनुष्य की जीवित अवस्था में ही मृत बना देती है। चिन्ता में जल-जलकर मर जाने से कहीं अच्छा है कि आप पुरुषार्थ के मैदान में ही इसका बलिदान दे दें। इस निरर्थक मृत्यु से तो यह सार्थक अंत कहीं अच्छा है। उसमें एक आदर्श और एक ऊँचाई तो है। चिन्ता छोड़कर प्रसन्न होइए। पुरुषार्थ करिये, आप अवश्य सफल होंगे।

आप अभाव-ग्रस्त है। जरूरतों से पीड़ित है तो इसमें क्षुब्ध अथवा असंतुष्ट रहने का क्या काम। असन्तोष आपकी इन पीड़ाओं का उपचार नहीं है। इनका उपचार है, अधिकाधिक परिश्रम एवं पुरुषता। यह वे पैसे का उपचार करने में आपका क्या जाता है? पौरुष तथा श्रमशीलता की शक्ति आपको ईश्वर की ओर से मिली ही है। उसका उपयोग करिए तब अपनी पीड़ाओं से मुक्त हो जाइए। और यदि प्रसन्नता की स्थिति में भी आप संतुष्ट रहते हैं तो समझ लीजिए कि आप लोभ तथा तृष्णा के पिशाच से ग्रस्त है। इसका उपचार संतोष तथा उदारता ही है। अपनी वृत्ति पर विचार कीजिये, उसे बुरा समझकर त्याग दीजिए। लोभ तथा तृष्णा का उपचार उसका तिरस्कार तथा संसार की अमरता में विश्वास करना है। इन्हीं उपायों का अवलम्ब लीजिये, आप असंतोष के पिशाच से छूट कर सुखी हो जाइये।

कोई भी विपत्ति अथवा आपदा क्यों न आ जाए, मूल कर भी उद्वेग में मत बह जाइए। ईश्वर की कृपा में अखंड विश्वास रखिए। अपनी आत्मा तथा बुद्धि-विवेक में अखंड विश्राम रखिए। शान्त एवं गम्भीर बने रहिए। सारी आपदायें आप पर से ऐसे गुजर जायेगी, जैसे किसी सुदृढ़ वृक्ष पर से तूफान निकल जाता है। उद्वेग एक मानसिक त्रुटि है।

निराशा, चिन्ता, असंतोष अथवा उद्वेग किन्हीं समस्याओं का हल नहीं है। यह मानव-जीवन प्रकृति के दोष हैं, जो काम बनाने के बजाय बिगाड़ देते हैं। इसको त्याग कर मनुष्य को सृजनात्मक गुणों का ही अवलम्ब लेकर चलना चाहिए। तभी वह सफल होगा और तभी सुखी तथा संतुष्ट।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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