सोमवार, 14 सितंबर 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026



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बुधवार, 2 सितंबर 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 2 Sep 2026



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👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ( भाग 2)

नम्र, दयालु, उपकारी और सहायक बनो। यही नहीं कि कभी-कभी यथावकाश इन गुणों का उपयोग किया जावे बल्कि सर्व काल में आपके सारे जीवन में इन्हीं गुणों का अभ्यास होना चाहिये। एक भी शब्द ऐसा मत कहो जिससे दूसरों को ठेस पहुँचे। बोलने से पहले भली प्रकार विचार करो और देख लो कि जो कुछ आप कहने लगे हो वह दूसरों के चित्त को दुखी तो नहीं करेगा-क्या वह बुद्धिसंगत मधुर सत्य तथा प्रिय तो है। पहले से ही ध्यानपूर्वक समझ लो कि आपके विचार शब्दों और कार्यों का क्या प्रभाव होगा। प्रारम्भ में आप कई बार भले ही असफल हो सकते हो परंतु यदि आप अभ्यास करते रहे तो अंतः में आप अवश्य सफल हो जाओगे।

आपको कोई काम निरुत्साह से, लापरवाही से, बेमन से नहीं करना चाहिए यदि मन की ऐसी वृत्ति रखोगे तो जल्दी उन्नति नहीं कर सकते। सम्पूर्ण चित्त, मन, बुद्धि आत्मा उस काम में लगा होना चाहिये। तभी आप उसे योग या ईश्वर पन कह सकते हो। कुछ मनुष्य हाथों से काम करते हैं और उनका मन कलकत्ते के बाजार में होता है, बुद्धि दफ्तर में होती है और आत्मा स्त्री या पुत्र में संलग्न रहती है। यह बुरी आदत है। आपको कोई भी काम हो उसे योग्य सन्तोषप्रद ढंग से करना चाहिये। आपका आदर्श यह होना चाहिये कि एक समय में एक ही काम अच्छे ढंग से किया जाये। यदि आपके गुरु मित्र आपसे तौलिया धोने को कहें तो आपको ना उन्हें बताए हुए ही उनके और कपड़ों को भी धो डालने चाहिए।

लगातार असफलता होने से आपको साहस नहीं छोड़ना चाहिए असफलता के द्वारा आपको अनुभव मिलता है। आपको वे कारण मालूम होंगे जिनसे असफलता हुई है और भविष्य में उनसे बचने के लिये सचेत रहोगे। आपको बड़ी-बड़ी होशियारी से उन कारणों से रक्षा करनी होगी। इन्हीं असफलताओं की कमजोरी में से आपको शक्ति मिलेगी। असफल होते हुए भी आपको अपने सिद्धान्त, लक्ष्य, निश्चय और साधन का दृढ़ मति होकर पालन और अनुसरण करना होगा। आप कहिये “कुछ भी हो मैं अवश्य पूरी सफलता प्राप्त करूंगा, मैं इसी जीवन में-नहीं नहीं, इसी क्षण आत्म साक्षात्कार करूंगा। कोई असफलता मेरे मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकती।”

प्रयत्न और कोशिश आपकी ओर से होनी चाहिये भूखे मनुष्य हो आप ही खाना पड़ेगा। प्यासे को पानी पीना ही पड़ेगा। आध्यात्मिक सीढ़ी पर आपको हर एक कदम अपने अपने आप ही रखना होगा। इस बात को भली प्रकार स्मरण रखिये। साहसी बनो। यद्यपि बेरोजगार हो कुछ खाने को नहीं हो, तन पर वस्त्र भी न होवे तब भी सदा प्रसन्न रहो। आपका यथार्थ स्वभाव सच्चिदानन्द है। यह बाह्य नाशवान स्थूल शरीर तो माया का ही कार्य हैं मुस्कुराओ, सीटी बजाओ, हँसो कूदो और आनन्द में मग्न होकर नाचो।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950

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मंगलवार, 1 सितंबर 2026

👉 आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ( भाग 1)

यदि आप जल्दी आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं तो इसके लिए सजगता, होशियारी रखना बहुत जरूरी है आध्यात्मिक मार्ग में थोड़ी-सी सफलता थोड़ी सी मन की गंभीरता, एकाग्रता, सिद्धियों के थोड़े से दर्शन, थोड़े से अन्तर्यामी ज्ञान की शक्ति से ही कभी संतुष्ट मत रहो। इससे ज्यादा ऊंची चढ़ाइयों पर चलना अभी बाकी है।

सदा सेवा करने को तैयार रहो। शुद्ध प्रेम, दया और नम्रता सहित सेवा करो। सेवा करते समय कभी मन में भी खीझने या कुढ़ने का भाव मत आने दो। सेवा करते हुए मुख पर खेद और ग्लानि के भाव मत आने दो। ऐसा करने से जिसकी सेवा करते हो वह आपकी सेवा स्वीकार नहीं करेगा। आप एक अवसर खो दोगे। सेवा के लिए अवसर ढूँढ़ते रहो। एक भी अवसर को मत जाने दो बल्कि अवसर खुद बनालो।

अपने जीवन को सेवामय बना दो सेवा के लिए अपने हृदय में चाव तथा उत्साह भर लो। दूसरों के लिये प्रसाद बन कर रहो। यदि ऐसा करना चाहते हो तो आपको अपने मन को निर्मल बनाना होगा। अपने आचरण को दिव्य तथा आदर्श बनाना होगा। सहानुभूति, प्रेम, उदारता, सहनशीलता और नम्रता बढ़ानी होगी। यदि दूसरों के विचार आपके विचारों से भिन्न हों तो उनसे लड़ाई झगड़ा न करो। अनेक प्रकार के मन होते हैं। विचारने की शैली अनेक प्रकार की हुआ करती है विचारने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हुआ करते हैं। अतएव हर एक दृष्टिकोण निर्दोष है, लोगों के मत के अनुकूल बनो। उनके मत को भी ध्यान तथा सहानुभूति पूर्वक देखो और उसका आदर करो। अपने अहंकार चक्र के क्षुद्र केन्द्र से बाहर निकलो और अपनी दृष्टि को विस्तृत करो। अपना मत सर्वग्राही और उदार बना सब के मत के लिए स्थान रखो। तभी आपका जीवन विस्तृत और हृदय उदार होगा। 
आपको धीरे-धीरे मधुर और नम्र होकर बातचीत करनी चाहिए। मितभाषी बनो। अवाँछनीय विचारों और सम्वेदनाओं को निकाल दो। अभिमान या चिड़चिड़ेपन को लेश मात्र भी बाकी नहीं रहने दो। अपने आपको बिल्कुल भुला दो। अपने व्यक्तित्व का भी अंश या भाव न रहने पावे। सेवा कार्य के लिए पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता है यदि आप में उपरोक्त सद्गुण मौजूद हैं तो आप संसार के लिये पथ प्रदर्शक और अमूल्य प्रसाद रूप हो। आप एक अलौकिक सुगन्धित पुष्प हो जिसकी सुगन्ध देश भर में व्याप्त हो जायेगी। आपने बुद्धत्व की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लिया।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950

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रविवार, 30 अगस्त 2026

👉 प्रेम साधना के पथ पर (अंतिम भाग)

निस्वार्थ सच्चा प्रेम ज्ञान भी है, शक्ति भी। जो प्रेम की प्रेरणा से कार्य करता है उसे न कोई कि वास्तव में यह प्रेम की एक आन्तरिक दशा हे देने को बाध्य करती है, अपना स्वयं का ख्याल नहीं करती। उत्सर्ग पर ही, त्याग पर ही प्रेम जीवित रहता है। प्रेम साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग को जीवन में अपनाना आवश्यक है। ज्यों-ज्यों त्याग वृत्ति बढ़ेगी प्रेम का पौधा भी उसी क्रम में बढ़ता जायेगा और सम पर जब फलित और पुष्पित होगा तो सारा वातावरण उसकी मधुर गंध से महक उठेगा, जहाँ मनुष्य को अपार शक्ति, आनन्द, सन्तोष, प्रसन्नता प्राप्त होगी।

प्रेम सहिष्णु होता है वह सब कुछ सहता है यही तो सच्चे प्रेम की पहिचान है। ईश्वर प्रेम के पीछे लोग कितने दुःख और परेशानियाँ सहन करते हैं। मीरा ने जहर का प्याला पिया, दयानन्द को सत्रह बार जहर खाना पड़ा और अपमान सहन करना पड़ा। कितने ही देवभक्तों ने देश प्रेम के लिए अपने बलिदान किए, भयंकर यातनाएँ सहन कीं। मासूम बच्चे दीवारों में चुनना दिये गये किन्तु यह सब किस लिए? प्रेम के लिए। प्रेम भरपूर सहनशीलता चाहता है। क्रोध अथवा झुँझलाहट उसके पास नहीं फटकते। आपत्तिकाल को भी प्रेम सहिष्णुता के माध्यम से सुखमय बना लेता है। प्रेम शिकायत नहीं करता जो कुछ आये उसे सहन करने को तैयार रहता है तभी तो प्रेम साधना की सुदीर्घ मंजिल प्राप्त होती है। प्रेमी सभी परिस्थितियों का सहर्ष स्वागत करता है। जिससे भी प्रेम का नाता जोड़ लिया है उसके लिये सब कुछ सहन करना, अपने प्रेम सम्बन्ध को ही प्रमुख मान अन्य परिस्थितिजन्य झंझावातों से, कठिनाइयों से विचलित न होना, उन्हें सहर्ष सहन करना ही सच्चे प्रेम के लिए अभीष्ट है।

निस्वार्थता प्रेम का मूलाधार है। जो प्रेम किया जाय वह निस्वार्थ हो। स्वार्थ ही गन्दी बू प्रेम में पैदा हो जाती है तो वह प्रेम नहीं रहता प्रत्युत पाप बन जाता है, यह स्वार्थ भले ही कैसा भी हो, प्रेम पथ के पथिक के लिये सर्वथा त्याज्य है। स्वार्थ मय प्रेम संकुचित होता है इसलिए वह दुखदायी और भार स्वरूप होता है। थोड़ा और बहुत स्वार्थ भी प्रेम को कलंकित करता है।

प्रेम ही जीवन है, जीवन ही प्रेम है। प्रेम साधना ही जीवन साधना है। प्रेम साधना के पथ पर अग्रसर होकर अपने सारे भेद भावों, विकारों को निकालकर सब से प्रेम करना शुरू कीजिये। उस परमपिता परमात्मा से प्रेम कीजिए। उसके बताए हुए विश्व से, मानव जाति से, पशु-पक्षियों से सब से प्रेम कीजिए। प्रेम से ही जीवन को सराबोर कीजिए। अनन्त जीवन धार की एक कड़ी रूप में ही यह हमारा भौतिक जीवन हे। प्रकृति के विधान के अनुसार यह शरीर और अनन्य जगत समय पर नष्ट हो जाता है किन्तु जीवन धारा अगाध गति से चलती रहती है। वही सत्य है सत्य के लिये समग्र के लिए ही प्रेम कीजिए। प्रेम, प्रेम सर्वत्र प्रेम ही के दर्शन कीजिए। चार दिन की जिन्दगी के लिये तुच्छ स्वार्थ, अहंकार, संग्रह के लिए जीवन को नष्ट करना, जीवन के साथ विश्वासघात है, ईश्वर के प्रति विश्वासघात है। प्रेम-स्वरूप यह सृष्टि और हमारा जीवन प्रेममय होने के लिए ही है।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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शनिवार, 29 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 Aug 2026


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👉 प्रेम साधना के पथ पर (भाग 1)

कुछ सूक्ष्म दृष्टि से एवं जीवन की निम्न भूमिका के ऊपर उठकर देखने पर पता चलता है कि सारा विश्व एवं इसके सम्पूर्ण पदार्थ एक ही नियम के अंतर्गत दिखाई देते हैं। ऊर्ध्वगामी, दिव्य जीवन की पवित्र भूमिका में पहुँचने पर तो यह नियम प्रत्यक्ष दिखाई देता है। उस एक ही नियम के कारण जीव और निर्जीव दोनों अपने पर्यायों को बदलते रहते हैं। वे कायम और सुरक्षित रहते हैं और विकास को प्राप्त करते हैं। वह नियम है प्रेम का नियम। प्रेम जीवन के लिए एक आवश्यक तत्व ही नहीं वस्तुतः वह जीवन का एकमात्र नियम है। प्रेम ही जीवन है ऐसा कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। इसलिए जीवन साधना के साधक प्रेम की साधना को ही अपनाते हैं और इसी से अन्त में प्रेम के इस अनन्त सागर में विलीन होकर स्वयं प्रेम स्वरूप बन जोत हैं जैसे एक पानी की बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र बन जाती है। फिर वहाँ प्रेम का साम्राज्य होता है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

प्रेम में सुरक्षित रहने की शक्ति है। प्रेम का आधार पाकर विश्व भवन खड़ा है। प्रेम के समाप्त होते ही तत्क्षण इसका विनाश निश्चित है। प्रेम के कारण ही विश्व में जीवन कायम है। जब व्यक्ति प्रेम के नियम का उल्लंघन करके प्रतिद्वन्द्वी बन जाते हैं तो वहीं से दोनों के विनाश की लीला प्रारम्भ हो जाती है। आज विश्व मुख्यतया दो गुटों में बँटा हुआ है। इन दोनों गुटों में जब तनाव, उत्तेजनात्मक वातावरण बन जाता है तो विश्व के शुभ चिन्तक चिन्तित हो जाते हैं। परस्पर प्रेम में ही सुरक्षा समृद्धि और विकास निहित हैं इसके विपरीत विनाश ही हो सकता है। मनुष्य हृदय में जब तक पूर्ण प्रेम नहीं होता उसमें द्वेष, घृणा का निवास होता है तभी वह संसार के नियम को कठोर समझता है किन्तु जब ये दूषित तत्व समाप्त हो जाते हैं तो उसका हृदय दया और प्रेम से द्रवित हो उठता है, और वह संसार के नियम में असीम दयालुता और प्रेम पाता है। जब मनुष्य प्रेम के नियम को उल्लंघन करता है तभी तो दुखों, हानियों एवं परेशानियों से पड़ जाता है। जीवन भार बन जाता है।

प्रेम ही सम्पूर्ण सुखों का आधार है। आज प्रत्येक व्यक्ति सुखी जीवन के लिए तरह-तरह के साधन जुटाता है। सुख के लिये हर क्षण प्रयत्न भी करता है किन्तु फिर भी अधिकांश लोग दुखी एवं क्लान्त दिखाई देते हैं। इसका एकमात्र कारण है वे प्रेम को छोड़कर अन्यत्र सुख की खोज करते हैं जो बालू में से तेल निकालने जैसा प्रयत्न है। सुख भोगने के लिए प्रेम को जीवन में उतारना होगा। इसी की साधना करनी होगी।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1961

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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 28 Aug 2026


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👉 दूर दर्शिता का दुहरा लाभ

वैभव की दृष्टि से बड़े वे हैं, जिनके पास साधनों की प्रचुरता और बुद्धि कौशल की प्रखरता हैं। ऐसे लोग ऐश्वर्यवान कहलाते हैं और अपनी समर्थता के बदले सुख साधन एवं पद सम्मान पाते है।

वर्चस् की दृष्टि से महान् वे हैं, जिनके दृष्टिकोण एवं चरित्र क्रम का स्तर ऊँचा है। जो आदेश पर आस्था रखते हैं और उन्हें कठिन अवसरों पर भी अपनाये रहने वाले साहस का परिचय देते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता को ही भव बंधन कहते है जिसने इस निकृष्टता से मुँह मोड़ा और उदात्त अन्तःकरण की प्रेरणा से सत्प्रयोजन के लिए कदम बढ़ाया, उसे ही जीवनमुक्त कहते हैं मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है और उसका श्रेयाधिकारी उसे पाया गया है जो बड़प्पन से नहीं महानता से प्यार करता है।

वैभव से दूसरे चमत्कृत हो सकते हैं, शरीर की सुविधा हो सकती है। किन्तु जहाँ तक आत्म संतोष लोक सम्मान एवं देवी अनुग्रह जैसी विभूतियों का सम्बन्ध हैं वे वैभववानों को नहीं, महामानवों को ही उपलब्ध होती हैं।

दूरदर्शी वे हैं जो क्षुद्रता से ऊँचे उठकर महानता का वरण करते हैं। वैभव नश्वर और अस्थिर ही नहीं मादक भी है। उसमें उन्माद उत्पन्न करने का दुर्गुण है। ऐसे कम ही हैं, जो वैभव को पचाने और उसका सदुपयोग करने में समर्थ होते है। अधिकतर तो उसका दुरुपयोग ही होता है इसके विपरीत महानता की विभूतियाँ ऐसी हैं जो व्यक्ति की गरिमा बढ़ाती हैं। गरिमा ही वह विभूति है जिसके आधार पर जन सहयोग बरसता और उच्च स्तरीय सफलताओं का अवसर मिलता है।

अदूरदर्शिता वैभव के लिए मचलती है और उसके लिए क्षुद्रता की रीति-नीति का अनुसरण करती है। दूरदर्शिता हर कसौटी पर वर्चस् की गरिमा को परखती और उसी का वरण करती है। महामानव वर्चस के लिए महत्ता के लिए, प्रयत्न करते हैं। फलतः दुहरे नफे में रहते है। महानता जहाँ रहती है वहाँ सम्पदा का भी अभाव नहीं रहने पाता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1979


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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 27 Aug 2026


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