गुरुवार, 23 जुलाई 2026

👉 अधीरता एक छिछोरापन है। (भाग 2)

प्राचीन समय में जब शिष्य विद्याध्ययन के लिए जब गुरु के पास जाता था तो उसे पहले अपने धैर्य की परीक्षा देनी होती थी। गौएं चरानी पड़ती थीं, लकड़ियाँ चुननी पड़ती थीं, उपनिषदों में इस प्रकार की अनेकों कथाएं हैं। इन्द्र को भी लम्बी अवधि तक इसी प्रकार तपस्या पूर्ण प्रतीक्षा करनी पड़ी थी, जब वह अपने धैर्य की परीक्षा दे चुका, तब उसे आवश्यक विद्या प्राप्त हुई। प्राचीन काल में विज्ञ पुरुष जानते थे कि धैर्यवान् पुरुष ही किसी कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये धैर्यवान् स्वभाव वाले छात्रों को ही विद्याध्ययन कराते थे। क्योंकि उनके पढ़ाने का परिश्रम भी अधिकारी छात्रों द्वारा ही सफल हो सकता था। चंचल चित्त वाले, अधीर स्वभाव के मनुष्य का पढ़ना न पढ़ना बराबर है। अक्षर ज्ञान हो जाने या अमुक कक्षा का सार्टीफिकेट ले लेने से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। प्रमाण प्रत्यक्ष है। आज लाखों करोड़ों ‘पढ़े गधे’ इधर से उधर घूरे के तिनके चरकर लदते मरते रहते हैं। कोई कहने लायक पुरुषार्थ उनसे नहीं हो पाता।

आतुरता एवं उतावली का स्वभाव जीवन को असफल बनाने वाला एक भयंकर खतरा है। कर्म का परिपाक होने में समय लगता है। रुई को कपड़े के रूप तक पहुँचने के लिए कई कड़ी मंजिले पार करनी होती हैं और कठोर व्यभिधानों से होकर गुजरना पड़ता है, जो संक्राँति काल के मध्यवर्ती कार्यक्रम को धैर्यपूर्वक पूरा होने देने की जो प्रतीक्षा नहीं कर सकता, उसे रुई को कपड़े के रूप में देखने की आशा न करनी चाहिए। किया हुआ परिश्रम एक विशिष्ट प्रक्रिया के द्वारा फल बनता है। इसमें देर भी लगती है और कठिनाई भी आती है। कभी-कभी परिस्थितिवश यह देरी और कठिनाई आवश्यकता से अधिक भी हो सकती है। उसे पार करने के लिए समय और श्रम लगाना पड़ता है। कभी-कभी तो कई बार का प्रयत्न भी सफलता तक नहीं ले पहुँचाता, तब अनेक बार अधिक समय तक अविचल धैर्य के साथ जुटे रहकर अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करना होता है। आतुर मनुष्य इतनी दृढ़ता नहीं रखते, जरा सी कठिनाई या देरी से वे घबरा जाते हैं और मैदान छोड़कर भाग निकलते हैं। यही भगोड़ापन उनकी पराजयों का इतिहास बनता जाता है।

चित्त का एक काम पर न जमना, संशय और संकल्पों-विकल्पों में पड़े रहना एक प्रकार का मानसिक रोग है। यदि काम पूरा न हो पाया तो? यदि कोई आकस्मिक आपत्ति आ गई तो? यदि फल उलटा निकला तो? इस प्रकार की दुविधापूर्ण आशंकाएं मन को डाँवाडोल बनाये रहती हैं। पूरा आकर्षण और विश्वास न रहने के कारण मन उचटा-उचटा सा रहता है। जो काम हाथ में लिया हुआ है, उस पर निष्ठा नहीं होती। इसलिये आधे मन से वह किया जाता है। आधा मन दूसरे नये काम की खोज में लगा रहता है। इस डाँवाडोल स्थिति में एक भी काम पूरा नहीं हो पाता। हाथ के काम में सफलता नहीं मिलती। बल्कि उल्टी भूल होती जाती है, ठोकर पर ठोकर लगती जाती है। दूसरी ओर आधे मन से जो नया काम तलाश किया जाता है, उसके हानि-लाभों को भी पूरी तरह नहीं विचारा जा सकता। अधूरी कल्पना के आधार पर नया काम वास्तविक रूप में नहीं वरन् आलंकारिक रूप में दिखाई पड़ता है। पहले काम को छोड़कर नया पकड़ लेने पर भी उस नये काम की भी वहीं गति होती है, जो पुराने की थी। कुछ समय बाद उसे भी छोड़कर नया ग्रहण करना पड़ता है। इस प्रकार ‘काम शुरू करना और उसे अधूरा छोड़ना’ इस कार्यक्रम की बराबर पुनरावृत्ति होती रहती है और अन्त में मनुष्य अपने असफल जीवन पर पश्चाताप करता हुआ, इस दुनिया से कूँच कर जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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👉 परलोक कहाँ है? (भाग 2)

हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जानकारी, इच्छा एवं कल्पना के आधार पर हम अपनी मनोभूमि का, निर्माण करते हैं। यह मनोभूमि का ही अपनी दुनिया है। इसमें जैसे इरादे, मनसूबे, यकीदे जम जाते हैं उसी दृष्टिकोण से संसार के समस्त पदार्थों जो वह देखता है। आँखों पर पीला चश्मा पहन लेने से सभी दुनिया पीली दिखाई पड़ती हैं और नीला चश्मा पहन लेने पर हर चीज नीली दिखने लगती है। साधुओं की दृष्टि में यह संसार परमात्मा की पुनीत प्रतिमा है, सिंह की दृष्टि में सब मनुष्य स्वादिष्ट माँस के चलते फिरते लोथड़े हैं, दुकानदारों की निगाह में ग्राहक, वेश्या की दृष्टि में व्यभिचारी, कलार की दृष्टि में नशेबाज, इस दुनिया में भरे हुए है। भीतरी मन की दुनिया जैसी होती है बाहर की दुनिया भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है।

मनुष्य को अपनी रुचि जिधर होती है, उधर ही उसका मस्तिष्क ढूँढ़ खोज जारी रखता है। और यह एक प्रकट तथ्य है कि कुछ ढूँढ़ा जाता है वह मिलता है। अपने स्वभाव और विचारों के मनुष्यों को, स्थानों को, वातावरणों को, उसकी अदृश्य चेतना ढूँढ़ती रहती है। और धीरे-धीरे उसे अपने अनुकूल वातावरण मिल जाता है। चोरों को अपने साथी अन्य चोरों का सहयोग हर जगह मिल जाता है और वे चाहे कहीं चले जायें चोरी करने का अवसर या स्थान भी मिल जाता है। इसी प्रकार भले, बुरी, सभी प्रकृति के मनुष्य अपने रुचिकर स्थान को प्राप्त कर लेते हैं। साँसारिक परिस्थितियाँ दोनों ही प्रकार की होती हैं। 

सात्विक परिस्थितियों में सुख-शान्ति, प्रसन्नता तथा तृप्ति का अनुभव होता है। इसके विपरीत तामसिक परिस्थितियों में क्लेश, अशाँति दुख, दरिद्र तथा असन्तोष छाया रहता है, चोर स्वभाव का मनुष्य चोरी करेगा, फलस्वरूप उसे भय, अशान्ति, निन्दा, अविश्वास, राज दण्ड एवं कर्म के कठोर परिपाक का भागी बनना पड़ेगा। इसी प्रकार सदाचारी स्वभाव का मनुष्य सत्कर्म करेगा और फल स्वरूप प्रसन्नता, सन्तोष, प्रशंसा, विश्वास, स्वास्थ्य एवं समृद्धि प्राप्त करेगा। चोर को अपने स्वभाव के लोगों के बीच रहना पड़ेगा और उनका व्यवहार उसके साथ वैसा ही दुखदायक रहेगा जैसा दुष्टों के साथ दुष्टों का रहता हैं। इसके विपरीत सज्जन पुरुष के समीपवर्ती लोग भी वैसे ही होंगे और उनका व्यवहार वैसा ही संतोषजनक रहेगा जैसा सज्जनों का होता है।

चोर और सदाचारी को जो साँसारिक परिस्थितियाँ प्राप्त हैं वह एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं। परन्तु इसका मूल कारण मनुष्य का अपना मन है। वह चोर स्वभाव को अपनावे या सदाचार की ओर झुके यह पूर्णतया उसकी इच्छा के ऊपर निर्भर है। मनः लोक का जैसा निर्माण किया जाता है बाहरी दुनिया वैसी ही बन जाती है। मन में यदि शान्ति है तो बाहर भी शान्ति का वातावरण होगा यदि मन में आकुलता है तो बाहर भी आकुलता से भरी हुई घटनाएं चारों ओर मंडरा रही होगी। जिसने मनः लोक में स्वर्ग स्थापित कर लिया है उसके लिए इस संसार में सर्वत्र स्वर्ग है, जिसके मन में नरक है उसे सब ओर नरक की ज्वाला जलती हुई दृष्टि-गोचर होती रहेगी।

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 23 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 July 2026


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बुधवार, 22 जुलाई 2026

‼️ आत्म नियंत्रण के लिए व्रत ‼️

किसी सत कार्य को पूरा करने का संकल्प व्रत कहलाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह आदि महाव्रत कहलाते हैं। धर्मचर्या प्रतिज्ञा लेना उसे निबाहना व्रत है। अनेक दिशाओं में बिखरी हुई इच्छाओं को एकत्रित करके एक कार्य में लगाने के लिए तथा उस कार्य में जागरुक रहने के लिए व्रत लिए जाते हैं। व्रत का एक संकल्प है जिसे लेकर मनुष्य अपने ऊपर एक स्वेच्छा उत्तरदायित्व लेता है। यह उत्तरदायित्व व्रत की प्रतिज्ञा के आधार पर पालन होता रहता है।

मन की मूल प्रवृत्तियाँ बड़ी स्वच्छंद हैं वे बार -बार इधर उधर भागती हैं। नित नये परिवर्तन, चंचलता तथा, अस्थिरता में मन को बड़ा रस आता है। भौंरा एक फूल से दूसरे पर उड़ता फिरता है, मन जंगली घोड़े की तरह जहाँ तहाँ उछल-कूद मचाना अधिक पसन्द करता है। किसी एक बात पर डटा रहना उसे रुचिकर नहीं होता। यदि स्वभाव को ज्यों का त्यों रहने दिया जाय तो किसी एक विचार पर स्थिर रहना या एक कार्य में जुटा रहना कठिन है। कितने ही मनुष्य जिन्होंने अपनी प्रवृत्तियों का नियंत्रण नहीं किया है अपने विचार और कार्य जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं, फलस्वरूप उनका जीवन क्रम सदा अस्त−व्यस्त रहता है। किसी भी दिशा में उन्हें सफलता नहीं मिलती।

आत्मोन्नति के लिए जीवन क्रम को, विचारधारा को, कार्य प्रणाली को पूर्ण तथा नियंत्रण ऐसा होना चाहिए कि कठिनाइयाँ आने पर भी निश्चित पथ से विचलित होने का अवसर न आवे। इस आत्म नियंत्रण की महत्वपूर्ण सफलता को प्राप्त करने के लिए संकल्प को, प्रतिज्ञा का, व्रत को, लेना पड़ता है। जिव्हा के चटोरेपन पर उपवास द्वारा वाचालता पर मौन द्वारा काम वासना पर ब्रह्मचर्य द्वारा नियन्त्रण स्थापित किया जाता है। “अमुक काम न करूंगा” या “इस मर्यादा के अन्दर करूंगा” इस प्रकार की कठोर प्रतिज्ञा करने से एक निश्चित संकल्प की स्थिरता होती है। यदि धार्मिक भावनाओं के साथ, ईश्वर की साक्षी में यह प्रतिज्ञा की जाती है तो उसे व्रत कहा जाता है। साधारण प्रतिज्ञाओं की अपेक्षा व्रत की शक्ति बहुत प्रबल होती है क्योंकि उसका अन्तःकरण के गहरे स्तल तक प्रभाव पड़ता है। साधारण प्रतिज्ञाएं तो टूटती भी रहती हैं पर व्रतों में ईश्वर की कृपा से आम तौर से सफलता ही मिलती है। उनके टूटने के अवसर बहुत ही कम आते हैं।

अध्यात्म का अर्थ क्या है? | Adhyatam Ka Arth Kya Hai | Dr Chinmay Pandya, 

व्रतों के साथ एक प्रकार की तपश्चर्या सम्बन्धित है। उनके द्वारा तितीक्षा का कष्ट सहने का अभ्यास बढ़ता है। नियत गतिविधि से कोई धार्मिक कृत्य, व्रतों के आधार पर बड़ी आसानी से चलते रहते हैं। एक व्रत के सफलतापूर्वक पूरा हो जाने पर साधक का साहस बढ़ जाता है। और अगले व्रतों के लिए वह अधिक दृढ़ हो जाता है। इसलिए आरम्भ छोटे व्रतों से किया जाता है। स्त्रियों में इस प्रकार के छोटे-छोटे व्रतों का बहुत प्रचलन है। वे संक्रान्ति से कोई धार्मिक अनुष्ठान आरम्भ करती हैं। एक वर्ष पूरा हो जाने पर उस कर्मकाण्ड का सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाने के उपलक्ष्य में कुछ दान पुण्य करती हैं।

मार्गशीर्ष का, माघ का प्रातःकालीन शीतल जल का स्नान शीत की तितीक्षा का व्रत है। भूमि पर शयन, मौन, उपवास, भोजन में से कुछ वस्तुओं का त्याग, प्रातःकालीन शीघ्र जागरण नियत पूजन वन्दन क्रिया क्षेत्र की परिक्रमा, आहार-विहार दिनचर्या एवं किसी पद्धति में किन्हीं विशेष बातों का सम्मिलित करना या त्याग करना, सर्दी-गर्मी, भूख प्यास को सहना, एक प्रकार के तप हैं। इन्हें नियत समय पर धार्मिक भावनाओं के साथ आरम्भ और पूर्ण करना व्रत कहलाता है।

व्रतों के अपनाने से आत्म बल बढ़ता है। इसलिए आत्म मार्ग के पथिकों को समय-समय पर शारीरिक, मन, वाणी, व्यवहार और वस्तुओं सम्बन्धी व्रतों का पालन करते रहना चाहिए। कुछ समय तक के लिए जूता पहनना छोड़ देना, भूमि पर सोना, उपवास रखना, रात्रि जागरण, पैदल तीर्थ यात्रा, नमक छोड़ देना, सूर्य दर्शन के साथ भोजन करना, कम वस्त्रों का धारण, शीत ऋतु में प्रातः स्नान जैसे उपायों का अवलम्बन करते रहने से शरीर कष्ट सहिष्णु बनता है मौन, पूजन, आराधना, एकान्त सेवन, दान, परोपकार सत्संग, स्वाध्याय, म्यान जैसे कार्यों से मानसिक क्षमता एकाग्रता बढ़ती है। केवल सत्य ही बोलना, हिंसा न करना, धन का अधिक संचय न करना, काम सेवन अयुक्त मर्यादा से अधिक न करना। अन्योपार्जित धन से, कटुभाषण से बचना, आदि आत्मिक बातों से आत्म शक्ति बलवती होती है।

आत्म शुद्धि के लिए चांद्रायण या अर्ध चांद्रायण जैसे व्रत बहुत उपयोगी हैं। उनसे अनेक रोगों की अपने आप चिकित्सा भी हो जाती है। चांद्रायण व्रत एक महीने के लिए होता है। जिस आदमी का आहार एक सेर का हो वह पूर्णमासी के दिन पूर्ण आहार करके प्रतिदिन एक छटाँक घटाता जाय और अमावस्या को बिल्कुल निराहार रहे। फिर शुक्र पक्ष की प्रतिपदा से एक छटाँक आरम्भ करके प्रतिदिन एक छटाँक बढ़ाता जाय और पन्द्रह दिन में (अगली पूर्णमासी को) पूरे आहार पर पहुँच जावे। अर्ध चांद्रायण इसका आधा होता हो। पन्द्रह दिन में से सात दिन क्रमशः कम करे आठवें दिन निराहार रहे फिर उसी क्रम से बढ़ाकर अगले सात दिन में पूर्ण आहार पर पहुँच जावे। नये साधकों को अर्ध चांद्रायण ही सुगम पड़ता है।

व्रतों से साधक की आत्म शक्ति बढ़ती है और उसे बाह्य एवं आन्तरिक अनेक लाभों की उपलब्धि होती है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1947

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👉 अधीरता एक छिछोरापन है। (भाग 1)

अधीरता की अशाँत दशा में कोई व्यक्ति न तो साँसारिक उन्नति कर सकता है और न आध्यात्मिक। कारण यह है कि उन्नति के लिए, ऊंचा उठने के लिए, आगे बढ़ने के लिए, जिस बल की आवश्यकता होती है, वह बल मानसिक अस्थिरता के कारण एकत्रित नहीं हो पाता। जब हाथ काँप रहा हो उस समय बन्दूक का ठीक निशाना नहीं साधा जा सकता। आवेश की दशा में मानसिक कम्पन की अधिकता रहती है। उस उद्विग्नता की दशा में यह नहीं सूझ पड़ता कि क्या करना चाहिए, क्या न करना चाहिए।

अधीर होना, हृदय की संकीर्णता और आत्मिक बालकपन का चिन्ह है। बच्चे जब बाग लगाने का खेल खेलते हैं तो उनकी कार्य प्रणाली बड़ी विचित्र होती है। अभी बीज बोया, अभी उसमें खाद पानी लगाया, अभी दो-चार मिनट के बाद ही बीज को उलट-पलट कर देखते हैं कि बीज में से अंकुर फूटा या नहीं। जब अंकुर नहीं दिखता तो उसे फिर झाड़ देते हैं और दो-चार मिनट बाद फिर देखते हैं। इस प्रकार कई बार देखने पर भी जब वृक्ष उत्पन्न होने की उनकी कल्पना पूरी नहीं होती तो सारे उपाय काम में लाते हैं। वृक्षों की टहनियाँ तोड़कर मिट्टी में गाढ़ देते हैं और उससे बाग की लालसा को बुझाने का प्रयत्न करते हैं। उन टहनियों के पत्ते उठा-उठा कर देखते हैं कि फल लगे या नहीं। यदि दस-बीस मिनट में फल नहीं लगते तो कंकड़ों को डोरे से बाँध कर टहनियों में लटका देते हैं। इस अधूरे बाग से उन्हें तृप्ति नहीं मिलती। फलतः कुछ देर बाद उस बाग को बिगाड़-बिगूड़ कर चले जाते हैं। 

कितने ही जवान और वृद्ध पुरुष भी उसी प्रकार की बाल क्रीड़ाएं अपने क्षेत्र में किया करते हैं किसी काम को बड़े उत्साह से आरम्भ करते हैं, इस उत्साह की- अति ‘उतावली’ बन जाती है। कार्य आरम्भ हुए देर नहीं होती कि यह देखने लगते हैं कि सफलता में अभी कितनी देर है। जरा भी प्रतीक्षा उन्हें सहन नहीं होती। जब उन्हें थोड़े ही समय में रंगीन कल्पनाएं पूरी होती नहीं दिखतीं तो निराश होकर उसे छोड़ बैठते हैं। अनेकों कार्यों को आरम्भ करना और उन्हें बिगाड़ना-ऐसी ही बाल-क्रीड़ाएं वे जीवन भर करते रहते हैं। छोटे बच्चे अपनी आकांक्षा और इच्छा पूर्ति के बीच में किसी कठिनाई, दूरी या देरी की कल्पना नहीं कर पाते, इन बाल-क्रीडा करने वाले अधीर पुरुषों की भी मनोभूमि ऐसी ही होती है। यदि हथेली पर सरसों न जमी तो खेल बिगाड़ते हुए उन्हें कुछ देर नहीं लगती।

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👉 परलोक कहाँ है? (भाग 1)

स्वः लोक अपने अन्दर है।

अपने आप में, अपने अन्तःकरण में एक जबरदस्त लोक मौजूद है। उस लोक की स्थिति इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके सामने भू लोक और भुवः लोक तुच्छ हैं। निस्संदेह बाहर की परिस्थितियाँ मनुष्य को आन्दोलित, तरंगित तथा विचलित करती हैं। परन्तु संसार के समस्त पदार्थों का जितना भला या बुरा प्रभाव होता हैं उससे अनेकों गुना प्रभाव अपने निज के विचारों तथा विश्वासों द्वारा होता है।

गीता में कहा है कि-मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है। कोई मित्र इतनी सहायता नहीं कर सकता जितनी कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। इसी प्रकार कोई दूसरा उतनी शत्रुता नहीं कर सकता जितनी कि मनुष्य खुद अपने आप अपने से शत्रुता करता है। अपनी कल्पना शक्ति, विचार और विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी एक दुनिया निर्माण करता है। वही दुनिया उसे वास्तविक सुख-दुख दिखाया करती है।

एक व्यक्ति सुनसान रात में मरघट के पास से निकलता है। उसके मन में कोई आशंका नहीं, तारागणों की सुन्दरता निहारता हुआ, रात्रि की नीरवता और शीतलता को निरखता हुआ, मन्द स्वर से गीत गुनगुनाता हुआ खुशी-खुशी चला जाता है। परन्तु दूसरा व्यक्ति उसी रास्ते जाता है तो मरघट में भूत लोटते दिखाई पड़ते हैं, झाड़ियों में से मसानी और चुड़ैलें झाँकती दिखती हैं, उनके मारे डर थर-थर पैर काँपने लगते हैं, कण्ठ सूख जाता है, निगाह चूकने से एक पेड़ के ठंठ से टकरा जाता है। बस भूत के भयंकर आक्रमण का प्रत्यक्ष दृश्य दिखाई पड़ता है। वह बीमार पड़ जाता है, महीनों चारपाई सेता है, मुश्किल से अच्छा हो पाता है या मर जाता है। रास्ता वही था, रात वही थी, एक आदमी खुशी-खुशी उसी रास्ते चला आया, दूसरे आदमी की जान पर बन आई। यह भेद क्यों हुआ? इसका कारण मनुष्यों की भिन्न मानसिक स्थिति थी। जिसके मन में से भय उत्पन्न हुआ वह भय ही उनकी छाती पर भयंकर मसान बन कर चढ़ बैठा और उसे प्राण घातक संकट में फाँस दिया।

रस्सों को साँप समझ कर अनेक आदमी भयभीत होकर मूर्छित हो जाते हैं। चूहे के काट जाने पर अपने आपको साँप का काटा समझा कर कई मनुष्य मृत्यु के मुख में चले जाते हैं। साधारण रोग को असाध्य रोग मानकर अनेकों रोगी घबरा जाते हैं और वह घबराहट ही उनकी जान की ग्राहक बन जाती हैं। यह आफत के पहाड़ कौन ढ़ाता है? मनुष्य अपने आप अपने विचार बल से उन आफत के पहाड़ों का निर्माण करता है और खुद अपने ऊपर पटककर स्वयमेव चकनाचूर हो जाता है। मनुष्य के मन में प्रचण्ड शक्ति भरी हुई है वह इस शक्ति द्वारा अपने लिये अत्यन्त अनिष्ट कर और अत्यन्त उपयोगी तथ्य निर्मित कर सकता है।

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 July 2026


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शनिवार, 18 जुलाई 2026

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (अंतिम भाग)

इतिहास में किसी अत्याचारी अथवा आततायी का वर्णन पढ़कर मनुष्य के हृदय में यह भाव नहीं आता कि वह भी उसी की तरह रक्त पात करता, दूसरों को पीड़ा पहुँचता अथवा किसी का धन अथवा समान लूटता तो बड़ा आनन्द रहता। एक ओर जहाँ मनुष्य की सत्य, शिव और सुंदरम् से प्रेम होता है, वहाँ दूसरी ओर दुष्टता, दुराचार और दुराशा से घृणा और विकर्षण भी होता है। यह विवेकपूर्ण अनुभूति बतलाती है कि मनुष्य का स्वरूप वास्तविक स्वरूप सत्य, शिव और सुन्दर का प्रतिरूप है, उसके उस रूप में कुरूपता, असत्य सत्य, शिव और सुन्दर के सिवाय और कुछ नहीं है, अस्तु उसका अंश भी अपने आदि स्त्रोत के समान उसी का स्वरूप है।

निश्चय ही मनुष्य का सत्य रूप ईश्वर रूप ही है। अपने इस स्वरूप के विपरीत कार्य करने वाले या तो पूरे मनुष्य नहीं माने जा सकते अथवा वह मानना होगा कि वे वह सब करके एक मौलिक अपराध कर रहे है, एक पाप कर रहे है, जो उन्हें नहीं करना चाहिये।

यह निश्चय हो जाने पर कि मनुष्य आत्मा रूप में परमात्मा ही है, यदि वह अपने गौरव, अपनी गरिमा और अपने महत्व का प्रतिपादन नहीं कर पाता तो यह उसकी कमी ही कही जायेगी किसी महान पिता का पुत्र होकर भी, किसी शक्तिशाली का अंग होकर भी यदि कोई अपने आपमें निकृष्ट और दीन हीन बना रहना चाहता है तो यह उसका दुर्भाग्य ही माना जायेगा। अन्यथा अपने उच्च से उच्च सर्वोच्च स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर निकृष्ट न होगा। ऐसे महान, व्यक्तित्व के पास ईर्ष्या द्वेष, छल कपट, शोषण, क्रूरता आदि आसुरी वृत्तियों का क्या काम रह सकता है।

आइए अपने अन्दर जिज्ञासा जागृत कर अनुभव के आधार पर अपने सत्यस्वरूप का साक्षात्कार करे, उसमें विश्वास और उसी के अनुरूप अपना आचरण बनायें। यदि इस विकास में हमारी निम्न वृत्तियाँ बाधक बनती है तो मान ले कि यही वह अवरोध है, यह वह आवरण है जो हमें अपने वास्तविक स्वरूप की ओर जाते और उसे देखने में बाधा डाल रहा है। सौंदर्यानुभूति और सत्कर्मों की ओर से चलकर और ईर्ष्या द्वेष, मद मत्सर, लोभ, क्रोध आदि दूषणों को छोड़ते हुए आत्मा स्वरूप की ओर सरलतापूर्वक पहुँचा जा सकता है।

हम सब परमपिता परमात्मा, उस सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान तत्व उस आदि एवं अंतिम स्त्रोत से निकली इकाइयाँ है, जिनका वास्तविक स्वरूप वही एक प्रभु एवं विभु है, अपने उस स्वरूप को पहचाने और तद्रूप होकर उसी स्वरूप को प्राप्त करें।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 July 2026



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बुधवार, 15 जुलाई 2026

👉 विलासिता हमें अपंग करके छोड़ेगी (भाग २)

1924 में प्रोफेसर इलियट स्मिथ ने मिश्र की 30000 ममी (मिश्र में एक विशेष प्रकार के मशाल में शवों को सुरक्षित रखने की परम्परा है, इन शवों को ही ममी कहते है) का परीक्षण किया। उच्च वर्ग वाले शवों को छोड़कर अन्य लोगों के दाँत का क्षय बहुत कम मिला। कुछ अर्थराइटिस, किडनी के स्टोन के तीन और एक गाल के स्टोन का रोगी मिला। रिकेट्स और कैन्सर रोम के एक भी लक्षण किसी भी ममी में नहीं मिले। उस समय मिश्र के लोग भी अकृत्रिम और प्राकृतिक भोजन करते थे, वे लगभग पूर्ण शाकाहारी थे, तब ऐसी स्थिति थी, किन्तु स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है पर अकेले कैंसर में ही हजारों रोगी है, इससे रोगों की बढ़ोत्तरी और स्वास्थ्य में अवांछित परिवर्तन का पता चलता है। कुछ हजार वर्ष बाद तो सम्भवतः एक ही बच्चा शुद्ध जन्म नहीं लेगा, उनमें से अधिकाँश कोई न कोई रोग लेकर जन्मेंगे कई तो ऐसे भी होंगे, जो आज के वीर्य रोगों से रोगी मनुष्य की क्रमागत संतान होने के कारण नपुंसक और लिंगहीन भी होंगे। आज की बीमारियों के सारे लक्षण संस्कार रूप में पहुँचने की बात विज्ञान पुष्ट ही कर चुका है, इसलिये कोई सन्देह नहीं, जो आने वाली कार्टून पीढ़ी अपने अनेक अंग ही खो दे। पैर की उँगलियों और बालों के बारे में तो जीवन-शास्त्री आशंका व्यक्त ही करते है कि हाथों में केवल एक-एक उँगली होगी और सारे के सारे बालों से पुरुषों को ही नहीं, स्त्रियों को भी मुक्ति मिल जायेगी।

इसका कारण हे, मानवीय मस्तिष्क के धन क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। अब मनुष्य चलता बहुत अधिक है पर बैठे-बैठे चलता है। रेलें, मोटरें, ताँगे और रिक्शे चलाते है, अब मनुष्य खाता बहुत है पर भूख नहीं, जीभ खिलाती है, अब मनुष्य सुनता बहुत है पर स्वाभाविक इच्छा के अनुरूप नहीं मोटरें, रेल-गाड़ियाँ जहाज, मिलों-कारखानों के भौंपू, मशीनों की गड़गड़ाहट सुननी पड़ती है, अब मनुष्य देखता बहुत है पर आत्मा को बलवान और सौंदर्यवान बनाने वाले प्राकृतिक दृश्य, हरियाली और पुष्प, पौधों को शोभा नहीं, सिनेमा के दृश्य कृत्रिम पेन्सिलों से रंगे हुये चित्र वह भी दूषित भाव पैदा करने वाले। पहले लोग पदयात्रायें करते थे।, एकान्तवास रखा करते थे, प्राकृतिक दृश्यों के बीच रहा करते थे, संगीत और लोक गीतों का आनन्द लिया करते थे, इससे सूक्ष्म मनोजगत को प्रफुल्लित और आत्मा को शाँति देने वाले ‘हारमोन्स’ का स्राव होता रहता था और मनुष्य स्वस्थ और सुडौल बना रहता था। स्वाभाविक प्रक्रियायें बेकार मस्तिष्क की भूख बन गई है। 

सोचने-विचारने की प्रक्रिया के सम्बन्ध रखने वाले केन्द्रों, स्नायु-कोषों और नस-तंतुओं में निवास होता जा रहा है बढ़ी हुई जनसंख्या को तो भोजन चाहिये चाहे वह भीख माँग कर अमेरिका से मिले या समुद्र की मछलियों और अन्य जीवों को मारकर मिले। मस्तिष्क के अवयव बढ़ेंगे तो उन्हें भी चारा चाहिये। उन्हें प्रकृति ने जितना नियत किया है, उससे अधिक मिल नहीं सकता, फलस्वरूप वे हिंसा करते है, अर्थात् आँख की, नाक, कान और पेट की शक्ति चूसते है, इससे होगा यह कि और अंग कमजोर होते चले जायेंगे। विचार शक्ति प्रौढ़ होती चली जायेगी और इन्द्रियों की क्षमता गिरती चली जायेगी। अर्थात् यह कार्टून की आकृति वाले लोगों में शरीर ही क्षीण न होगा वरन् बहरे भी हो सकते है, गूँगे भी, आँखों से कम दीखने और एक फर्लांग चलकर थक जाने की बीमारियाँ जोर पकड़ लेंगी। इनसे बचने के लिए तब श्रवण यन्त्रों, अणुवीक्षण, दूरवीक्षण यन्त्रों को लोग उसी तरह शरीर से लटकाये घूमा करेंगे, जैसे स्त्रियाँ तरह-तरह के जेवरों से जकड़ी रहती है। मनुष्य और कम्प्यूटर में तब कोई विशेष अन्तर न रह जायेगा।

मनुष्य को प्रकृति ने जो दाँत दिये है, वह शाकाहार के लिये उपयुक्त है, माँसाहारी जन्तुओं के दाँत बड़े और नुकीले (कैनाइन टीथ) होते है। उनके पंजों के नाखून भी मुड़े हुए और तीखे होते है, क्योंकि माँस नोंचने में उनसे सहायता मिलती है, मनुष्य का पिछला इतिहास बताता है कि उनका मुख आगे निकला हुआ और जबड़े लम्बे होते थे, क्योंकि तब उसे अधिकाधिक कच्चा खाना पड़ता था, यदि मनुष्य माँस भक्षी हुआ तो उसके दाँत और उँगलियों के नाखून भालुओं, चीतों जैसे हो सकते है या फिर कच्चे और दाँतों से चबाकर खाने वाले खाने के कम उपयोग से उसका मुखर भीतर ही धँसता चला जायेगा। मुख ऐसा लगेगा, जैसे किसी गुफा में घुसने के लिए ‘होल’ (छेद) बनाया गया हो।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 अधीरता एक छिछोरापन है। (भाग 2)

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