शनिवार, 25 जुलाई 2026

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है—
हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्।
(तत्वा. (7/2)
अर्थात्—प्राण हिंसा करना, झूठे बोलना, चोरी करना, व्यभिचार और परिग्रह इन पाँच पापों को छोड़ना ही व्रत है।

बौद्ध दर्शन में निवृत्ति मार्ग की चर्चा की जाती है। वह वस्तुतः आत्मोद्धार का ही पर्याय है। इसके लिए जिन साधनों का विस्तार किया गया है, वे भी उपनिषदों के आत्म-शोधन एवं जैन दर्शन के व्रतों के समान ही है। बौद्ध भिक्षु जब आत्म-कल्याण के लिये निवृत्ति पथ का अनुसरण करता है तो उसे भी इस तरह की पाँच प्रतिज्ञायें करनी पड़ती हैं—

पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—मैं प्राणि-बध नहीं करूंगा।
अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—किसी की चोरी नहीं करूंगा।
कामे सुमिच्छासारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
— व्यभिचार नहीं करूंगा।
मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—मैं कभी झूठ नहीं बोलूँगा।
सुरा-मेरेय-मज्ज पमाद ट्ठाना वेरमणी
सिक्खापदं समादियामि।
—माँस मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करूंगा।

हिन्दू धर्म में भी यह सम्पूर्ण दुराचरण तो विवर्जित हैं ही साथ ही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से जानी गई मन की सूक्ष्म विकारमय वृत्तियों से जिनके कारण बड़े दोष बन पड़ते हैं, निग्रह की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है जो वास्तव में दूसरे धर्मों के सिद्धान्तों की अपेक्षा अधिक तथ्यपूर्ण एवं वैज्ञानिक हैं। उदाहरणार्थ काम-वासना बुरी वस्तु है और वह आत्म-ज्ञान से विमुख करने वाली है पर मनुष्य केवल मनोबल के आधार पर वासना से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि परिस्थितियों का प्रभाव भी तो अपना महत्व रखता है। मन की काम-वासना वस्तुतः वैज्ञानिक दृष्टि से अन्न दोष है अर्थात् यदि आहार अनियमित है तो मन की वासना पर कभी भी नियंत्रण नहीं किया जा सकता। इसलिए सच्चरित्रता के सिद्धान्तों को कुछ वाक्यों तक ही सीमित नहीं किया गया वरन् उनका बहुत अधिक विस्तृत विश्लेषण किया गया है। अर्थात् इन नियमों को प्रारम्भिक अवस्था, आहार-विहार, शिक्षा-दीक्षा, भाषा-व्यवहार, धर्म-कर्म आदि से ही बाँधने का प्रयास किया है। इस सर्वांगीण शुद्धि-प्रक्रिया को अपनाये बिना मनुष्य जीवन के दोषों से कदापि मुक्त नहीं हो सकता।

संसार में मनुष्य अपने क्षणिक सुख के लिए अनेक प्रकार के दुष्कर्म कर डालता है। उसे यह खबर नहीं होती कि इन दुष्कर्मों का फल हमें अन्त में किस प्रकार भुगतना पड़ेगा। मनुष्य को जो तरह-तरह के कष्ट उठाने पड़ते हैं, उनके लिए किसी अंश तक समाज और देशकाल की परिस्थितियाँ भी उत्तरदायी हो सकती हैं पर अधिकाँशतया वह अपने ही दुष्कर्मों के प्रतिफल भोगता है। किन्तु मनुष्य शरीर दुःख भोगने के लिए नहीं मिला। यह आत्म-कल्याण के लिए मुख्यतः कर्म-साधन है, इसलिए अपनी प्रवृत्ति भी आत्म-कल्याण या सुख प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति होना चाहिए और इसके लिए बुरे कर्मों से बचना भी आवश्यक हो जाता है।

विकास का क्रम भी इसी तरह चलता है। साधनों को प्राप्त कर यदि आत्मा विवेक का सदुपयोग करता है और उसे अच्छे कर्मों में लगाता है तो आत्मा अपनी शक्तियों को बढ़ाता हुआ अनुकूल साधनों को भी बनाता रहता है और अन्त में प्रारब्ध से, स्वाधीन होकर अपनी पूर्ण उन्नति कर लेता है।

इन दोनों मार्गों में से एक का चुनाव करना आवश्यक हो जाता है। आत्म-ज्ञान की इच्छा रखने वाले एक साथ दोनों आचरण नहीं कर सकते। शास्त्रकार ने अपना निष्कर्ष स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुए लिखा है—
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्वं पूषन्नपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये॥

“सत्य का मुख ढ़का हुआ है ऐ सत्य शोधक! यदि तू उसे प्राप्त करना चाहता है तो उस ढक्कन को खोलना पड़ेगा जिससे सत्य ढ़क गया है। यदि तू उसे नहीं छोड़ सकता तो सत्य ही तुझे छोड़ जाएगा।” दोनों बातें एक साथ कदापि नहीं हो सकतीं। आत्म-ज्ञान को बुरे कर्मों ने भी इसी तरह ढ़क लिया है। उसे प्राप्त करने के लिए इस अशुद्ध अवस्था का परित्याग करना ही पड़ता है। साँसारिक विषय वासनाओं की इच्छाओं पर विजय करनी ही पड़ती है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966

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👉 परलोक कहाँ है? (भाग 4)

सत्य, प्रेम और न्याय के जीवन तन्तुओं को झंकृत करते ही आत्मा में एक मधुर संगीत बजने लगता है। पवित्रता का आध्यात्मिक संगीत ही भगवान कृष्ण की त्रिभुवन मोहिनी मुरली का मधुर वेणु नाद है। इसका रस जिसने अनुभव किया है वह धन्य है। आत्मा पवित्र है, उसका मनुष्य के लिए सन्देश है कि “पवित्रता को विचार और कार्यों में ओत-प्रोत करें” यह ईश्वरीय सन्देश जिसने सुन लिया वह बड़भागी है, जिसने सुनकर हृदयंगम कर लिया और तदनुकूल आचरण करना आरम्भ कर दिया वह परमात्मा का सच्चा भक्त है। ऐसे भक्तों के बीच में ही भगवान खेला करते हैं। जिनका हृदय पवित्रता की भावनाओं से भरपूर है वह ईश्वरी लीलाओं का क्रीड़ा-क्षेत्र है। महात्मा ईसा कहा करते थे कि इस पृथ्वी का स्वर्ग भोले बालकों में मौजूद है। सचमुच जिनका हृदय बालकों की तरह कोमल एवं पवित्र है ये स्वयं स्वर्ग रूप हैं, स्वर्ग में जाने की उन्हें कुछ भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि जिन तथ्यों के आधार पर स्वर्ग के सुख का निर्माण होता है वे दृश्य इसके हृदय में मौजूद हैं और हर घड़ी स्वर्ग के सुख को उत्पन्न करते रहते हैं।

जो दूसरों को कष्ट में देखकर दया से द्रवित हो जाता है, जो असहायों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहता है, जो संसार के सुख में अपना सुख अनुभव करता है, दूसरों को हानि पहुँचाने की जिसे कभी इच्छा नहीं होती, सत्य की बढ़ोत्तरी देखकर जिसे आन्तरिक सुख होता है, जिसे पर स्त्री माता के तुल्य है, जो पर धन को धूलि के तुल्य समझता है, इन्द्रियों को जो मर्यादा से बाहर नहीं जाने देता, चुगली, निन्दा, ईर्ष्या, एवं कुढ़न से जो दूर रहता है, संयम जिसका व्रत है, प्रेम करना जिसका स्वभाव है, मधुरता जिसके होठों से टपकती है, स्नेह एवं सज्जनता से जिसकी आँखें भरी रहती हैं, जिसके मन में केवल सद्भाव ही निवास करते हैं, अनीति की ओर झुकने का जिसे कभी लालच नहीं आता, सादगी सरलता, शिष्टता जिसके रहन-सहन की अंग होती है, ऐसे पवित्र आत्मा व्यक्ति इस लोक के देवता हैं। वे जहाँ रहेंगे, छाया की तरह उनका स्वर्ग उनके साथ रहेगा।

अन्तःकरण की शान्ति बाहरी दुनिया को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण बना देती है। जिसके मन में सात्विकता है उसे दूसरों का धन, वैभव, ज्ञान, रूप, यौवन, देखकर प्रसन्नता होगी कि परमात्मा के इस पुनीत उद्यान का एक पौधा सुविकसित तथा पल्लवित हो रहा है, उस नयनाभिराम दृश्य से शान्त पुरुष का हृदय तृप्त एवं प्रफुल्लित हो जाता है। परन्तु जिसके मन में अशान्ति व्याप रही है, ईर्ष्या की डायन नंगा नृत्य कर रही है उसे दूसरों की बढ़ोत्तरी नहीं सुहाती। भीतर ही भीतर भारी कुढ़न होती है और उस कुढ़न की अग्नि से उसकी छाती भभकने लगती है। जिसकी बढ़ोत्तरी हो रही है उसे नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के षड़यन्त्र रचता है और अनिष्ट कर पथ पर अग्रसर होता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 25 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 July 2026


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शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य

कठोपनिषद् में वैवस्वत यम ने नचिकेता को आत्म-साधना पर प्रकार डालते हुए कहा—
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्त मानसो वापि प्रज्ञानेनैन माप्नुयात्॥
1/2/24
“हे शिष्य! जिनने अपना चरित्र शुद्ध नहीं किया, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं, जिसका चित्त स्थिर नहीं रहता और जिसका मन सदैव अशान्त रहता है, वह केवल बाह्य ज्ञान के आधार पर आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता।”

चरित्र या कर्म अपना फल किस प्रकार देते हैं? यह जानने की बात है। बीज के अनुरूप ही फल होता है। पाप से आत्मा की पराधीनता दृढ़ होती है और पुण्य आत्मा को मुक्त अवस्था की ओर अग्रसर करता है, यही पाप और पुण्य के फल का रहस्य है। बुरे कर्म आत्मा के लिये आवश्यक हैं या नहीं? यह बातें व्यवहार से स्पष्ट मालूम पड़ जाती हैं। मोटे तौर पर वासना पूर्ति से अशान्ति बढ़ती है, क्रोध से शरीर जलने लगता है और आत्मा को बेचैनी मालूम पड़ती है। लोभ आता है तो मनुष्य कितना उद्विग्न हो जाता है, मानो वह नरक की अग्नि में प्रत्यक्ष जल रहा हो। इसी प्रकार संसार में जितने भी बुरे कर्म हैं, वह आत्मा को कष्ट देने वाले और उसके शाश्वत गुणों के विपरीत ही होते हैं, फिर इनके रहते आत्मा अपने मुक्त रूप में प्रकट भी कैसे हो सकता है?

मन की मलीनतायें, पाप, क्रोध, काम और इच्छायें नहीं रहतीं तो आत्मा को तुरन्त शान्ति मिलती है, गुण बढ़ते हैं, ज्ञान बढ़ता है, आनन्द मिलता है, शक्ति अनुभव होती है, सन्तोष होता है। इस प्रकार आत्मा को सुख की अनुभूति होती है। इससे भी मालूम पड़ता है कि काम, क्रोध आदि विकार हैं और वे आत्मा की पवित्रता को कलंकित करने वाले ही होते हैं। अतः इनके रहते हुए आत्म-ज्ञान की इच्छा कैसे पूर्ण हो सकती है?

आत्मा में केवल वही इच्छायें सुखद अनुभव होती हैं, जिन्हें हम पुण्य कहते हैं। सेवा, सर्द्धम, सद्भावना, प्रेम, स्नेह और त्याग-उदारता के क्षणों में आत्मा की शुद्ध इच्छा प्रकट होती है, जबकि साँसारिक भोग की इच्छायें पराधीनता और दूसरे पदार्थों का दास बनाती हैं। अतः रागद्वेष सभी अस्वाभाविक हैं। इनके रहते हुए आत्म-स्थिरता या आत्मा के सुखों में एकाग्रता नहीं हो पाती और आत्मस्थित हुए बिना उसका ज्ञान प्राप्त करना सम्भव नहीं। यह स्थिति ही ऐसी है, जिसे कामनाओं के पहाड़ पर चढ़कर नहीं देख सकते। आत्मा को देखने के लिए तो विशुद्ध आत्म-गुण वाला बनना पड़ता है या आत्मा में ही बस जाना होता है। अतः आत्मा को जागृत करने का पहला महामन्त्र आत्मा को शुद्ध बनाना है।
अध्यात्म योग की आधार शिला की व्याख्या करते हुए श्री शंकराचार्य ने भी इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। उन्होंने लिखा है—

विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य चेतस आत्मानि
समाधान मध्यात्म योगः।
अर्थात्— चित्त को विषयों से हटा कर आत्मा में समावेश करना ही अध्यात्म-योग है।
उपरोक्त कथन से इस आन्तरिक प्रक्रिया पर पूरी तरह प्रकाश पड़ जाता है कि आत्मा की शुद्धि के बिना आत्म-ज्ञान सम्भव नहीं है।

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👉 परलोक कहाँ है? (भाग 3)

संसार के समस्त दुख मिलकर मनुष्य को उतना दुखी नहीं कर सकते जितना कि भीतर के अन्तर्द्वन्द्व उसे दुखी करते हैं। मृत्यु स्वयं उतना कष्ट नहीं देती जितनी कि मृत्यु का भय दुखी बनाता है। व्यापार में घाटा हो जाने पर भी एक व्यापारी के सामने ऐसा अवसर नहीं आता कि उसे जीवन-यापन में असुविधा हो। तो भी वह इतनी चिन्ता करता है कि सूखकर काँटा हो जाता है। उस घाटे वाले व्यापारी की जो स्थिति है उससे भी बहुत गिरी हुई स्थिति के मजूर हंसते-खेलते प्रसन्नता का जीवन बिताते हैं। घाटे वाले व्यापारी को साँसारिक विपत्ति वास्तव में नहीं आई, केवल उसके मन में विपत्ति की एक झाड़ी उग आई। ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, शोक, चिन्ता, कुढ़न, निराशा, भय, आशंका, प्रतिहिंसा स्पर्धा आदि दुर्भावों के कारण कितने ही मनुष्य बुरी तरह व्याकुल रहते हैं, उनके मन में सदा एक बेचैनी, आकुलता, अशान्ति एवं पीड़ा उठती रहती है, जिनके कारण उनका मनः लोक बहुत ही नीरस, गन्दा, शुष्क धुँधला एवं अन्धकार पूर्ण हो जाता है। उन्हें हर घड़ी अशान्ति घेरे रहती है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, छल, पाखण्ड, असंख्य, शोषण, अपहरण, दुराचार, व्यभिचार आदि के कुविचार एक प्रकार के मानसिक शत्रु हैं वे मनः लोक में निशाचरों की भाँति छिपे बैठे रहते हैं और जब भी अवसर मिलता है, दल-बल सहित पूरी तैयारी के साथ निकल पड़ते हैं और जीवन के सुकोमल तन्तुओं को अस्त-व्यस्त कर डालते हैं। जैसे पेट में कोई विषैला पदार्थ पहुँच जाय तो वहाँ बड़ी जलन होती हैं, दस्त या उलटी होने लगती हैं। 

रक्त में कोई विषैला विजातीय पदार्थ पहुँच जाय तो फोड़े-फुन्सी चकते, कोढ़ आदि पैदा हो जाता है। माँस में काँटा घूस जाय तो जब तक वह निकल नहीं जाता निरन्तर पीड़ा होती रहती है। ठीक यही हाल इन कुविचार रूपी तामसिक, नीच, विजातीय, दानवों के मनः लोक में घुस जाने से होता है, यह कुछ न कुछ खुद-बुद किया ही करते हैं। आँख में पड़ी हुई कंकड़ी की भाँति वे अन्तः चेतना को हर समय घायल ही करते रहते हैं। जैसे कोई आदमी लाल मिर्चों की बुकनी मर्म छिद्रों में भर लेने के बाद तड़पता फिरता है, चैन और आराम उसके लिए स्वप्न हो जाता है वैसे ही दुःस्वभावों को अन्तःकरण में स्थान देने से आत्मा में तीव्र जलन होती रहती है, शान्ति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं ऐसी स्थिति मानसिक नरक ही कही जायगी।

मानसिक स्वर्ग का अर्थ हैं अपने अन्तःकरण में सात्विक विचारों, सद्भावों और सद्गुणों को धारण करना। ईमानदारी की पवित्रता हिमि सी शीतल, पुष्प सी कोमल, चन्दन सी सुगन्धित और नवनीत सी स्वच्छ होती है उसे धारण करते ही आत्मा को बड़ी राहत मिलती है। हिमालय की तपोभूमि में नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्य देखते हुए कन्द-मूल-फल खाते हुए, भगवती भागीरथी, के तट पर निवास करने वाले तपस्वियों को जो शान्ति मिलती है उसी शान्ति को हम ईमानदारी की पवित्रता ग्रहण करके प्राप्त कर सकते हैं। सच्चा मनुष्य विश्वास करता है कि- “ईमानदारी का पवित्र जीवन ही मुझे जीना है, मैं सच्चाई और नेकी से भरे हुए ही अपने विचार रखूँगा, न्याय के ऊपर ही मेरी जीवन नीति निर्भर रहेगी, मैं सत्य को ही सोचूँगा, सत्य के आधार पर ही विचार करूंगा, भलाई नेकी, उदारता और क्षमा का आश्रय ग्रहण करूंगा कुविचार पाप, द्वेष और तुच्छ स्वार्थों से ऊंचा उठकर आध्यात्मिक जीवन जीऊंगा। यह भावनाएं उसके अन्तःकरण में सात्विकता का शीतल झरना प्रवाहित कर देती है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 24 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 July 2026


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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

👉 अधीरता एक छिछोरापन है। (भाग 2)

प्राचीन समय में जब शिष्य विद्याध्ययन के लिए जब गुरु के पास जाता था तो उसे पहले अपने धैर्य की परीक्षा देनी होती थी। गौएं चरानी पड़ती थीं, लकड़ियाँ चुननी पड़ती थीं, उपनिषदों में इस प्रकार की अनेकों कथाएं हैं। इन्द्र को भी लम्बी अवधि तक इसी प्रकार तपस्या पूर्ण प्रतीक्षा करनी पड़ी थी, जब वह अपने धैर्य की परीक्षा दे चुका, तब उसे आवश्यक विद्या प्राप्त हुई। प्राचीन काल में विज्ञ पुरुष जानते थे कि धैर्यवान् पुरुष ही किसी कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये धैर्यवान् स्वभाव वाले छात्रों को ही विद्याध्ययन कराते थे। क्योंकि उनके पढ़ाने का परिश्रम भी अधिकारी छात्रों द्वारा ही सफल हो सकता था। चंचल चित्त वाले, अधीर स्वभाव के मनुष्य का पढ़ना न पढ़ना बराबर है। अक्षर ज्ञान हो जाने या अमुक कक्षा का सार्टीफिकेट ले लेने से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। प्रमाण प्रत्यक्ष है। आज लाखों करोड़ों ‘पढ़े गधे’ इधर से उधर घूरे के तिनके चरकर लदते मरते रहते हैं। कोई कहने लायक पुरुषार्थ उनसे नहीं हो पाता।

आतुरता एवं उतावली का स्वभाव जीवन को असफल बनाने वाला एक भयंकर खतरा है। कर्म का परिपाक होने में समय लगता है। रुई को कपड़े के रूप तक पहुँचने के लिए कई कड़ी मंजिले पार करनी होती हैं और कठोर व्यभिधानों से होकर गुजरना पड़ता है, जो संक्राँति काल के मध्यवर्ती कार्यक्रम को धैर्यपूर्वक पूरा होने देने की जो प्रतीक्षा नहीं कर सकता, उसे रुई को कपड़े के रूप में देखने की आशा न करनी चाहिए। किया हुआ परिश्रम एक विशिष्ट प्रक्रिया के द्वारा फल बनता है। इसमें देर भी लगती है और कठिनाई भी आती है। कभी-कभी परिस्थितिवश यह देरी और कठिनाई आवश्यकता से अधिक भी हो सकती है। उसे पार करने के लिए समय और श्रम लगाना पड़ता है। कभी-कभी तो कई बार का प्रयत्न भी सफलता तक नहीं ले पहुँचाता, तब अनेक बार अधिक समय तक अविचल धैर्य के साथ जुटे रहकर अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करना होता है। आतुर मनुष्य इतनी दृढ़ता नहीं रखते, जरा सी कठिनाई या देरी से वे घबरा जाते हैं और मैदान छोड़कर भाग निकलते हैं। यही भगोड़ापन उनकी पराजयों का इतिहास बनता जाता है।

चित्त का एक काम पर न जमना, संशय और संकल्पों-विकल्पों में पड़े रहना एक प्रकार का मानसिक रोग है। यदि काम पूरा न हो पाया तो? यदि कोई आकस्मिक आपत्ति आ गई तो? यदि फल उलटा निकला तो? इस प्रकार की दुविधापूर्ण आशंकाएं मन को डाँवाडोल बनाये रहती हैं। पूरा आकर्षण और विश्वास न रहने के कारण मन उचटा-उचटा सा रहता है। जो काम हाथ में लिया हुआ है, उस पर निष्ठा नहीं होती। इसलिये आधे मन से वह किया जाता है। आधा मन दूसरे नये काम की खोज में लगा रहता है। इस डाँवाडोल स्थिति में एक भी काम पूरा नहीं हो पाता। हाथ के काम में सफलता नहीं मिलती। बल्कि उल्टी भूल होती जाती है, ठोकर पर ठोकर लगती जाती है। दूसरी ओर आधे मन से जो नया काम तलाश किया जाता है, उसके हानि-लाभों को भी पूरी तरह नहीं विचारा जा सकता। अधूरी कल्पना के आधार पर नया काम वास्तविक रूप में नहीं वरन् आलंकारिक रूप में दिखाई पड़ता है। पहले काम को छोड़कर नया पकड़ लेने पर भी उस नये काम की भी वहीं गति होती है, जो पुराने की थी। कुछ समय बाद उसे भी छोड़कर नया ग्रहण करना पड़ता है। इस प्रकार ‘काम शुरू करना और उसे अधूरा छोड़ना’ इस कार्यक्रम की बराबर पुनरावृत्ति होती रहती है और अन्त में मनुष्य अपने असफल जीवन पर पश्चाताप करता हुआ, इस दुनिया से कूँच कर जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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👉 परलोक कहाँ है? (भाग 2)

हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जानकारी, इच्छा एवं कल्पना के आधार पर हम अपनी मनोभूमि का, निर्माण करते हैं। यह मनोभूमि का ही अपनी दुनिया है। इसमें जैसे इरादे, मनसूबे, यकीदे जम जाते हैं उसी दृष्टिकोण से संसार के समस्त पदार्थों जो वह देखता है। आँखों पर पीला चश्मा पहन लेने से सभी दुनिया पीली दिखाई पड़ती हैं और नीला चश्मा पहन लेने पर हर चीज नीली दिखने लगती है। साधुओं की दृष्टि में यह संसार परमात्मा की पुनीत प्रतिमा है, सिंह की दृष्टि में सब मनुष्य स्वादिष्ट माँस के चलते फिरते लोथड़े हैं, दुकानदारों की निगाह में ग्राहक, वेश्या की दृष्टि में व्यभिचारी, कलार की दृष्टि में नशेबाज, इस दुनिया में भरे हुए है। भीतरी मन की दुनिया जैसी होती है बाहर की दुनिया भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है।

मनुष्य को अपनी रुचि जिधर होती है, उधर ही उसका मस्तिष्क ढूँढ़ खोज जारी रखता है। और यह एक प्रकट तथ्य है कि कुछ ढूँढ़ा जाता है वह मिलता है। अपने स्वभाव और विचारों के मनुष्यों को, स्थानों को, वातावरणों को, उसकी अदृश्य चेतना ढूँढ़ती रहती है। और धीरे-धीरे उसे अपने अनुकूल वातावरण मिल जाता है। चोरों को अपने साथी अन्य चोरों का सहयोग हर जगह मिल जाता है और वे चाहे कहीं चले जायें चोरी करने का अवसर या स्थान भी मिल जाता है। इसी प्रकार भले, बुरी, सभी प्रकृति के मनुष्य अपने रुचिकर स्थान को प्राप्त कर लेते हैं। साँसारिक परिस्थितियाँ दोनों ही प्रकार की होती हैं। 

सात्विक परिस्थितियों में सुख-शान्ति, प्रसन्नता तथा तृप्ति का अनुभव होता है। इसके विपरीत तामसिक परिस्थितियों में क्लेश, अशाँति दुख, दरिद्र तथा असन्तोष छाया रहता है, चोर स्वभाव का मनुष्य चोरी करेगा, फलस्वरूप उसे भय, अशान्ति, निन्दा, अविश्वास, राज दण्ड एवं कर्म के कठोर परिपाक का भागी बनना पड़ेगा। इसी प्रकार सदाचारी स्वभाव का मनुष्य सत्कर्म करेगा और फल स्वरूप प्रसन्नता, सन्तोष, प्रशंसा, विश्वास, स्वास्थ्य एवं समृद्धि प्राप्त करेगा। चोर को अपने स्वभाव के लोगों के बीच रहना पड़ेगा और उनका व्यवहार उसके साथ वैसा ही दुखदायक रहेगा जैसा दुष्टों के साथ दुष्टों का रहता हैं। इसके विपरीत सज्जन पुरुष के समीपवर्ती लोग भी वैसे ही होंगे और उनका व्यवहार वैसा ही संतोषजनक रहेगा जैसा सज्जनों का होता है।

चोर और सदाचारी को जो साँसारिक परिस्थितियाँ प्राप्त हैं वह एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं। परन्तु इसका मूल कारण मनुष्य का अपना मन है। वह चोर स्वभाव को अपनावे या सदाचार की ओर झुके यह पूर्णतया उसकी इच्छा के ऊपर निर्भर है। मनः लोक का जैसा निर्माण किया जाता है बाहरी दुनिया वैसी ही बन जाती है। मन में यदि शान्ति है तो बाहर भी शान्ति का वातावरण होगा यदि मन में आकुलता है तो बाहर भी आकुलता से भरी हुई घटनाएं चारों ओर मंडरा रही होगी। जिसने मनः लोक में स्वर्ग स्थापित कर लिया है उसके लिए इस संसार में सर्वत्र स्वर्ग है, जिसके मन में नरक है उसे सब ओर नरक की ज्वाला जलती हुई दृष्टि-गोचर होती रहेगी।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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बुधवार, 22 जुलाई 2026

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👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

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