रविवार, 30 अगस्त 2026

👉 प्रेम साधना के पथ पर (अंतिम भाग)

निस्वार्थ सच्चा प्रेम ज्ञान भी है, शक्ति भी। जो प्रेम की प्रेरणा से कार्य करता है उसे न कोई कि वास्तव में यह प्रेम की एक आन्तरिक दशा हे देने को बाध्य करती है, अपना स्वयं का ख्याल नहीं करती। उत्सर्ग पर ही, त्याग पर ही प्रेम जीवित रहता है। प्रेम साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग को जीवन में अपनाना आवश्यक है। ज्यों-ज्यों त्याग वृत्ति बढ़ेगी प्रेम का पौधा भी उसी क्रम में बढ़ता जायेगा और सम पर जब फलित और पुष्पित होगा तो सारा वातावरण उसकी मधुर गंध से महक उठेगा, जहाँ मनुष्य को अपार शक्ति, आनन्द, सन्तोष, प्रसन्नता प्राप्त होगी।

प्रेम सहिष्णु होता है वह सब कुछ सहता है यही तो सच्चे प्रेम की पहिचान है। ईश्वर प्रेम के पीछे लोग कितने दुःख और परेशानियाँ सहन करते हैं। मीरा ने जहर का प्याला पिया, दयानन्द को सत्रह बार जहर खाना पड़ा और अपमान सहन करना पड़ा। कितने ही देवभक्तों ने देश प्रेम के लिए अपने बलिदान किए, भयंकर यातनाएँ सहन कीं। मासूम बच्चे दीवारों में चुनना दिये गये किन्तु यह सब किस लिए? प्रेम के लिए। प्रेम भरपूर सहनशीलता चाहता है। क्रोध अथवा झुँझलाहट उसके पास नहीं फटकते। आपत्तिकाल को भी प्रेम सहिष्णुता के माध्यम से सुखमय बना लेता है। प्रेम शिकायत नहीं करता जो कुछ आये उसे सहन करने को तैयार रहता है तभी तो प्रेम साधना की सुदीर्घ मंजिल प्राप्त होती है। प्रेमी सभी परिस्थितियों का सहर्ष स्वागत करता है। जिससे भी प्रेम का नाता जोड़ लिया है उसके लिये सब कुछ सहन करना, अपने प्रेम सम्बन्ध को ही प्रमुख मान अन्य परिस्थितिजन्य झंझावातों से, कठिनाइयों से विचलित न होना, उन्हें सहर्ष सहन करना ही सच्चे प्रेम के लिए अभीष्ट है।

निस्वार्थता प्रेम का मूलाधार है। जो प्रेम किया जाय वह निस्वार्थ हो। स्वार्थ ही गन्दी बू प्रेम में पैदा हो जाती है तो वह प्रेम नहीं रहता प्रत्युत पाप बन जाता है, यह स्वार्थ भले ही कैसा भी हो, प्रेम पथ के पथिक के लिये सर्वथा त्याज्य है। स्वार्थ मय प्रेम संकुचित होता है इसलिए वह दुखदायी और भार स्वरूप होता है। थोड़ा और बहुत स्वार्थ भी प्रेम को कलंकित करता है।

प्रेम ही जीवन है, जीवन ही प्रेम है। प्रेम साधना ही जीवन साधना है। प्रेम साधना के पथ पर अग्रसर होकर अपने सारे भेद भावों, विकारों को निकालकर सब से प्रेम करना शुरू कीजिये। उस परमपिता परमात्मा से प्रेम कीजिए। उसके बताए हुए विश्व से, मानव जाति से, पशु-पक्षियों से सब से प्रेम कीजिए। प्रेम से ही जीवन को सराबोर कीजिए। अनन्त जीवन धार की एक कड़ी रूप में ही यह हमारा भौतिक जीवन हे। प्रकृति के विधान के अनुसार यह शरीर और अनन्य जगत समय पर नष्ट हो जाता है किन्तु जीवन धारा अगाध गति से चलती रहती है। वही सत्य है सत्य के लिये समग्र के लिए ही प्रेम कीजिए। प्रेम, प्रेम सर्वत्र प्रेम ही के दर्शन कीजिए। चार दिन की जिन्दगी के लिये तुच्छ स्वार्थ, अहंकार, संग्रह के लिए जीवन को नष्ट करना, जीवन के साथ विश्वासघात है, ईश्वर के प्रति विश्वासघात है। प्रेम-स्वरूप यह सृष्टि और हमारा जीवन प्रेममय होने के लिए ही है।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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शनिवार, 29 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 Aug 2026


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👉 प्रेम साधना के पथ पर (भाग 1)

कुछ सूक्ष्म दृष्टि से एवं जीवन की निम्न भूमिका के ऊपर उठकर देखने पर पता चलता है कि सारा विश्व एवं इसके सम्पूर्ण पदार्थ एक ही नियम के अंतर्गत दिखाई देते हैं। ऊर्ध्वगामी, दिव्य जीवन की पवित्र भूमिका में पहुँचने पर तो यह नियम प्रत्यक्ष दिखाई देता है। उस एक ही नियम के कारण जीव और निर्जीव दोनों अपने पर्यायों को बदलते रहते हैं। वे कायम और सुरक्षित रहते हैं और विकास को प्राप्त करते हैं। वह नियम है प्रेम का नियम। प्रेम जीवन के लिए एक आवश्यक तत्व ही नहीं वस्तुतः वह जीवन का एकमात्र नियम है। प्रेम ही जीवन है ऐसा कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। इसलिए जीवन साधना के साधक प्रेम की साधना को ही अपनाते हैं और इसी से अन्त में प्रेम के इस अनन्त सागर में विलीन होकर स्वयं प्रेम स्वरूप बन जोत हैं जैसे एक पानी की बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र बन जाती है। फिर वहाँ प्रेम का साम्राज्य होता है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

प्रेम में सुरक्षित रहने की शक्ति है। प्रेम का आधार पाकर विश्व भवन खड़ा है। प्रेम के समाप्त होते ही तत्क्षण इसका विनाश निश्चित है। प्रेम के कारण ही विश्व में जीवन कायम है। जब व्यक्ति प्रेम के नियम का उल्लंघन करके प्रतिद्वन्द्वी बन जाते हैं तो वहीं से दोनों के विनाश की लीला प्रारम्भ हो जाती है। आज विश्व मुख्यतया दो गुटों में बँटा हुआ है। इन दोनों गुटों में जब तनाव, उत्तेजनात्मक वातावरण बन जाता है तो विश्व के शुभ चिन्तक चिन्तित हो जाते हैं। परस्पर प्रेम में ही सुरक्षा समृद्धि और विकास निहित हैं इसके विपरीत विनाश ही हो सकता है। मनुष्य हृदय में जब तक पूर्ण प्रेम नहीं होता उसमें द्वेष, घृणा का निवास होता है तभी वह संसार के नियम को कठोर समझता है किन्तु जब ये दूषित तत्व समाप्त हो जाते हैं तो उसका हृदय दया और प्रेम से द्रवित हो उठता है, और वह संसार के नियम में असीम दयालुता और प्रेम पाता है। जब मनुष्य प्रेम के नियम को उल्लंघन करता है तभी तो दुखों, हानियों एवं परेशानियों से पड़ जाता है। जीवन भार बन जाता है।

प्रेम ही सम्पूर्ण सुखों का आधार है। आज प्रत्येक व्यक्ति सुखी जीवन के लिए तरह-तरह के साधन जुटाता है। सुख के लिये हर क्षण प्रयत्न भी करता है किन्तु फिर भी अधिकांश लोग दुखी एवं क्लान्त दिखाई देते हैं। इसका एकमात्र कारण है वे प्रेम को छोड़कर अन्यत्र सुख की खोज करते हैं जो बालू में से तेल निकालने जैसा प्रयत्न है। सुख भोगने के लिए प्रेम को जीवन में उतारना होगा। इसी की साधना करनी होगी।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1961

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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 28 Aug 2026


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👉 दूर दर्शिता का दुहरा लाभ

वैभव की दृष्टि से बड़े वे हैं, जिनके पास साधनों की प्रचुरता और बुद्धि कौशल की प्रखरता हैं। ऐसे लोग ऐश्वर्यवान कहलाते हैं और अपनी समर्थता के बदले सुख साधन एवं पद सम्मान पाते है।

वर्चस् की दृष्टि से महान् वे हैं, जिनके दृष्टिकोण एवं चरित्र क्रम का स्तर ऊँचा है। जो आदेश पर आस्था रखते हैं और उन्हें कठिन अवसरों पर भी अपनाये रहने वाले साहस का परिचय देते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता को ही भव बंधन कहते है जिसने इस निकृष्टता से मुँह मोड़ा और उदात्त अन्तःकरण की प्रेरणा से सत्प्रयोजन के लिए कदम बढ़ाया, उसे ही जीवनमुक्त कहते हैं मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है और उसका श्रेयाधिकारी उसे पाया गया है जो बड़प्पन से नहीं महानता से प्यार करता है।

वैभव से दूसरे चमत्कृत हो सकते हैं, शरीर की सुविधा हो सकती है। किन्तु जहाँ तक आत्म संतोष लोक सम्मान एवं देवी अनुग्रह जैसी विभूतियों का सम्बन्ध हैं वे वैभववानों को नहीं, महामानवों को ही उपलब्ध होती हैं।

दूरदर्शी वे हैं जो क्षुद्रता से ऊँचे उठकर महानता का वरण करते हैं। वैभव नश्वर और अस्थिर ही नहीं मादक भी है। उसमें उन्माद उत्पन्न करने का दुर्गुण है। ऐसे कम ही हैं, जो वैभव को पचाने और उसका सदुपयोग करने में समर्थ होते है। अधिकतर तो उसका दुरुपयोग ही होता है इसके विपरीत महानता की विभूतियाँ ऐसी हैं जो व्यक्ति की गरिमा बढ़ाती हैं। गरिमा ही वह विभूति है जिसके आधार पर जन सहयोग बरसता और उच्च स्तरीय सफलताओं का अवसर मिलता है।

अदूरदर्शिता वैभव के लिए मचलती है और उसके लिए क्षुद्रता की रीति-नीति का अनुसरण करती है। दूरदर्शिता हर कसौटी पर वर्चस् की गरिमा को परखती और उसी का वरण करती है। महामानव वर्चस के लिए महत्ता के लिए, प्रयत्न करते हैं। फलतः दुहरे नफे में रहते है। महानता जहाँ रहती है वहाँ सम्पदा का भी अभाव नहीं रहने पाता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1979


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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 27 Aug 2026


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सोमवार, 24 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 24 Aug 2026



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👉 प्रेम के अभाव ने ही हमें प्रेत पिशाच बनाया है। (अंतिम भाग )

प्रेम का विकास अपने परिवार में प्रारम्भ होता है। यह उसकी प्रथम सीढ़ी है और पास पड़ोस ग्राम देश और विश्व में व्याप्त होता जाता है। वह केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं रहता पेड़ पौधे पशु पक्षी आदि सृष्टि में व्याप्त होता जाता है सब में अपनत्व भाव का विकास होने लगता है। जब अन्तिम सीढ़ी पर प्रेम पहुँचता है तो वही प्रभु की स्थिति है वह स्थिति प्रभु सारूप्य की स्थिति है किन्तु प्रथम या निम्न सीढ़ी के आधार बिना अन्तिम सीढ़ी तक पहुँचना असम्भव है। प्रेम साधना की पराकाष्ठा ही प्रभु दर्शन है।

प्रभु आनन्द धन है। यदि आनन्द की प्राप्ति करना है तो प्रेम ही उसकी प्राप्ति का मुख्य साधन है। जिस परिवार या जिस समाज में परस्पर प्रेम है एक दूसरे से आत्मीयता है वह एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के दुख को अपना ही दुख मानता है। उसके निवारण हेतु वैसा ही प्रयत्न करता है जैसा कि अपने दुख के निवारण हेतु करता है। उसे आत्मवत् ही समझता है । उस परिवार और समाज में कैसे कटुता रहेगी? कैसे विषमता रहेगी? कैसे एक दूसरे की हानि करेंगे? वह तो यह समझेंगे कि उसकी हानि की हमारी हानि हैं वह परिवार और समाज सुखी रहेगा और उस प्रेम के द्वारा आनन्दघन प्रभु के निकट पहुँचेगा।

यदि आज संसार में कुटुम्ब की स्थिति हो जाय परिवार की भाँति एक देश के मानव दूसरे देश के मानवों से प्रेम करने लगे तो विश्व में आज जो घृणा द्वेष की विषम स्थिति बनी हुई है वह मिट जावे। विध्वंसक हथियार न बने। ज्ञान विज्ञान की शक्ति नाश की दिशा में न चलकर विकास की दिशा में प्रवाहित हो। आज जो संसार नरक सदृश बना है। जीवन घुट रहा है वह संसार स्वर्ग सदृश बन सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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👉 ‘बुरे’ भी ‘भले’ बन सकते हैं।

कोई मनुष्य अपने पिछले जीवन का अधिकाँश भाग कुमार्ग में व्यतीत कर चुका है या बहुत सा समय निरर्थक बिता चुका है तो इसके लिए केवल दुख मानने पछताने या निराशा होने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। जीवन का जो भाग शेष रहा है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। राजा परीक्षित को मृत्यु से पूर्व एक सप्ताह आत्म कल्याण को मिला था, उस ने इस छोटे समय का सदुपयोग किया और अभीष्ट लाभ प्राप्त कर लिया। बाल्मीकि के जीवन का एक बड़ा भाग, लूट, हत्या, डकैती आदि करने में व्यतीत हुआ था वे संभले तो वर्तमान जीवन में ही महान ऋषि हो गये। गणिका जीवन भर वेश्या वृत्ति करती रही, सदन कसाई, अजामिल, आदि ने कौन से दुष्कर्म नहीं किये थे। सूरदास को अपनी जन्म भर की व्यभिचारी आदतों से छुटकारा मिलते न देखकर अन्त में आंखें फोड़ लेनी पड़ी थी, तुलसीदास का कामातुर होकर रातों रात ससुराल पहुँचना और परनाले में लटका हुआ साँप पकड़ कर स्त्री के पास जा पहुँचना प्रसिद्ध है। इस प्रकार के असंख्यों व्यक्ति अपने जीवन का अधिकाँश भाग बुरे कार्यों में व्यतीत करने के उपरान्त सत्पथ गामी हुए हैं और थोड़े से ही समय में योगी और महात्माओं को प्राप्त होने वाली सद्गति के अधिकारी हुए हैं। 

यह एक रहस्यमय तथ्य है कि मंद बुद्धि, मूर्ख, डरपोक, कमजोर तबियत के ‘सीधे’ कहलाने वालों की अपेक्षा वे लोग अधिक जल्दी आत्मोन्नति कर सकते हैं जो अब तक सक्रिय, जागरुक, चैतन्य, पराक्रमी, पुरुषार्थी एवं बदमाश रहे हैं। कारण यह है कि मंद चेतना वालों में शक्ति का स्त्रोत बहुत ही न्यून होता है वे पूरे रचनाकारी और भक्त रहें तो भी मंद शक्ति के कारण उनकी प्रगति अत्यंत मंदाग्नि से होती है। पर जो लोग शक्तिशाली हैं, जिनके अन्दर चैतन्यता और पराक्रम का निर्झर तूफानी गति से प्रवाहित होता है वे जब भी, जिस दिशा में भी लगेंगे उधर ही सफलता का ढेर लगा देंगे। अब तक जिन्होंने बदमाशी में अपना झंडा बुलन्द रखा है वे निश्चय ही शक्ति सम्पन्न तो हैं पर उनकी शक्ति कुमार्ग गामी रही है यदि वही शक्ति सत्पथ पर लग जाय तो उस दिशा में भी आश्चर्य जनक सफलता उपस्थित कर सकती है। गधा दस वर्ष में जितना बोझा ढोता है, हाथी उतना बोझा एक दिन में ढो सकता है। आत्मोन्नति भी एक पुरुषार्थ है। इस मंजिल पर भी वे ही लोग शीघ्र पहुँच सकते हैं जो पुरुषार्थी हैं, जिनके स्नायुओं में बल और मन में अदम्य साहस तथा उत्साह है।

मंद मति तम की स्थिति में हैं, उनकी क्रिया किसी भी दिशा में क्यों न हो। पुरुषार्थी, चतुर, संवेदनशील व्यक्ति रज की स्थिति में हैं चाहे वह अनुपयुक्त दिशा में ही क्यों न लगा हो। तम नीचे की सीढ़ी है, रज बीच की, और सत सबसे ऊपर की सीढ़ी है। जो रज की स्थिति में है उसके लिए सत में जा पहुँचना केवल एक ही कदम बढ़ाने की मंजिल है, जिस पर वह आसानी से पहुँच सकता है। स्वामी विवेकानन्द से एक मूढ़मति ने पूछा- मुझे मुक्ति का मार्ग बताइए। स्वामी जी ने उसकी सर्वतोमुखी मूढ़ता को देख कर कहा तुम चोरी, व्यभिचार, छल, असत्य भाषण, कलह आदि में अपनी प्रवृत्ति बढ़ाओं। इस पर वहाँ बैठे हुए लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा स्वामी जी आप यह क्या अनीति का उपदेश करते हैं? उन्होंने विस्तार पूर्वक समझाया कि तम में पड़े हुए लोगों के लिए पहले रज में जागृत होना पड़ता है तब वे सत में पहुँच सकते हैं। भोग और ऐश्वर्य को अर्निद्य मार्ग से प्राप्त करना निर्दोष और निद्य मार्ग से प्राप्त करना, सदोष रजोगुणी अवस्था है। दरिद्र को पहले सुसम्पन्न बनना होता है तब यह महात्मा बन सकता है। दरिद्र और नीच मनोवृत्ति का मनुष्य उदारता और महानता की सतोगुणी भावनाओं को धारण करने में समर्थ नहीं होता।

एक बार स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में अध्यात्म पर भाषण दे रहे थे। अमेरिकनों ने सभा में ही पूछा स्वामी जी! क्या भारतवासी पूर्ण अध्यात्मवादी हो गये हैं, जिससे उन्हें उपदेश न देकर आपको अमेरिका आने की आवश्यकता अनुभव हुई? स्वामी जी ने इस प्रश्न का बड़ा अच्छा उत्तर दिया। उन्होंने कहा- आप अमेरिका निवासी रजोगुणी स्थिति में है, धनी और विद्या सम्पन्न है इसलिए आप ही सतोगुण स्थिति में चलने के, अध्यात्म का अवलम्बन करने के अधिकारी हैं। मैं अधिकारी पात्रों को ढूँढ़ता हुआ आपके पास अमेरिका आया हूँ। मेरे देश वासी इस समय, दरिद्रता, अविद्या और पराधीनता में जकड़े पड़े हैं, उनकी स्थिति तम की है। मैं उनसे कहा करता हूँ कि- तुम उद्योगी बनो, अधिक कमाओ, अच्छा खाओ और सम्मान पूर्वक जीना सीखो यही उनके लिए आत्मोन्नति का मार्ग है। तम की स्थिति को पार कर रजोगुण में जागृत होना और तदुपरान्त सतोगुण में पदार्पण करना आत्मोन्नति का यह सीधा सा मार्ग है।

जो लोग पिछले जीवन में कुमार्ग गामी रहे हैं, बड़ी ऊटपटाँग गड़बड़ करते रहे हैं वे भूले हुए, पथभ्रष्ट तो अवश्य हैं पर इस गणन प्रक्रिया द्वारा भी उन्होंने अपनी चैतन्यता बुद्धिमत्ता, जागरुकता और क्रियाशीलता को बढ़ाया है। यह बढ़ोतरी एक अच्छी पूँजी है। पथ भ्रष्टता के कारण जो पाप उनसे बन पड़े हैं वे पश्चाताप और दुःख के हेतु अवश्य हैं पर संतोष की बात इतनी है कि इस कँटीले, पथरीले, लहू-लुहान करने वाले, ऊबड़-खाबड़ दुखदायी मार्ग में भटकते हुए भी मंजिल की दिशा में ही यात्रा की है। यदि अब संभल जाया जाय और सीधे राजमार्ग से, सतोगुणी आधार से आगे बढ़ा जाय तो पिछला ऊल-जलूल कार्यक्रम भी सहायक ही सिद्ध होगा।

पिछले पाप नष्ट हो सकते हैं, कुमार्ग पर चलने से जो घाव हो गये हैं वे थोड़ा दुख देकर शीघ्र अच्छे हो सकते हैं। उनके लिए चिंता एवं निराशा की कोई बात नहीं। केवल अपनी रुचि और क्रिया को बदल देना है। यह परिवर्तन होते ही बड़ी तेजी से सीधे मार्ग पर प्रगति होने लगेगी। दूरदर्शी तत्वज्ञों का मत है कि जब बुरे आचरणों वाले व्यक्ति बदलते हैं तो आश्चर्य जनक गति से सन्मार्ग में प्रगति करते हैं और स्वल्प काल में ही सच्चे महात्मा बन जाते हैं। जिन विशेषताओं के कारण वे सफल बदमाश थे वे ही विशेषताएं उन्हें सफल संत बना देती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949

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शनिवार, 22 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 Aug 2026



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👉 अधूरी शिक्षा से ही संतोष न कर लीजिए।

आज कल बौद्धिक ज्ञान को शिक्षा कहते हैं। मास्टरी, डाक्टरी, इंजीनियरी, कला-कौशल आदि की योग्यताएं शिक्षा कहलाती हैं इनके द्वारा धन, मान तथा सुख सामग्री की प्राप्ति होती है। क्या शिक्षा का प्रयोजन यही है? नहीं, केवल इतने मात्र से काम नहीं चल सकता। शरीर को आनन्द मिला पर आत्मा अशाँत रही तो वह वैभव फीका है, निस्सार है। सच्चा आनन्द वह है जिसमें साँसारिक और आत्मिक जीवन की उभय पक्षीय उन्नति एवं तृप्ति प्राप्त हो। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को पूर्णरूपेण सुखी बनाना है।

हम संसार की अनेक बातें जानते हैं, पर अपनी आत्म-सत्ता के संबंध में हमारा ज्ञान बहुत थोड़ा है। दुनियावी स्वार्थ में हम भले ही चौकस हों, पर आत्मिक स्वार्थों के क्षेत्र में पग-पग पर बाजी हारते हैं। थोड़ी सी भोग सामग्री हमारे पास भले ही जमा हो जाय पर आत्मिक सम्पत्तियों से प्रायः हम रीते ही रहते हैं। यह समझ किस काम की? इस शिक्षा से, इस चतुराई से क्या लाभ, जिसके द्वारा एकाँगी तुच्छ को प्राप्त करना तो सुलभ हो जाय पर वास्तविक लाभ की पहचान और उपलब्धि में कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न हो। शिक्षा तो वह है- जिससे बुद्धि का उचित परिमार्जन हो और जीवन के हर पहलू पर ठीक तरह विचार कर सकने की क्षमता प्राप्त हो जाय।

कहते हैं कि “इंसान को इशारा काफी होता है।” जो संकेत मात्र से साधारण विचार बुद्धि से अपना हित अनहित समझ ले। कुमार्ग पर चलने से अपरिमित हानि होती है और लाभ अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक। जिसे कौड़ी के मोल हीरा बेचते हुए झिझक नहीं होती उसे शिक्षित किस प्रकार कहा जाय? शिक्षित कहना तो दूर उसे तो इंसान तक नहीं कह सकते, क्योंकि “इन्सान को इशारा काफी होता है।” जब कोई अनुचित कार्य किया जाता है तो आत्मा इशारा करती है, अन्तःकरण पुकारता है कि यह न करो यह अनुचित है। यह बड़ा जोरदार इशारा है जो इशारा नहीं समझता और केवल लोभ तथा भय को ही समझता है वह तो पशु है। उसे तो नर पशु ही कहा जा सकता है।

साँसारिक जानकारी की बहुत सी बातें स्कूलों में सिखाई जाती है, वे उचित भी हैं और आवश्यक भी, पर इतने मात्र से ही संतुष्ट हो बैठना पर्याप्त न होगा। हमें शिक्षा का वह भाग भी प्राप्त करना चाहिए जिससे सत् असत् का विवेक होता है और सच्चे स्वार्थ साधन के लिए उत्साह पैदा होता है। ऐसी शिक्षा के लिए स्वाध्याय, सत्संग, संयम, सदाचार तथा सच्चिदानंद प्रभु का आश्रय लेना होता है। ऐसी शिक्षा अपने प्रकाश से अन्तरात्मा के अन्धकार को दूर करके आत्मिक और साँसारिक जीवन को सुखी बना सकती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949

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👉 प्रेम के अभाव ने ही हमें प्रेत पिशाच बनाया है। (भाग 2)

जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए प्रति अपने “मैं” को छोड़ देता है तो उसे प्रेम कहते हैं जब कोई ‘सर्व’ के प्रति अपने ‘मैं’ को छोड़ देता है तो वह भक्ति कहलाती है। 

मानव में प्रभु के मिलन के लिए प्रेम आवश्यक है। श्री रामानुजाचार्य के पास एक व्यक्ति दीक्षित होने आया और बोला प्रभु के पाने के लिए आप मुझे दीक्षा दीजिए। श्री रामानुजाचार्य बोले तुमने किसी से प्रेम किया है उसने कहा कि नहीं हम तो प्रभु से मिलना चाहते हैं। तब रामानुजाचार्य बोले मैं दीक्षा देने में असमर्थ हूँ क्योंकि यदि तुम्हारे पा सप्रेम होता तो मैं उसे परिशुद्ध कर ईश्वर की ओर ले जाता लेकिन तुम में प्रेम ही नहीं है।

प्रेम और सत्य एक रुपये के दो पहलू है एक दूसरे के पूरक और आधार है। सत्य का आधार मस्तिष्क है तो प्रेम का आधार हृदय है। सत्य में वह आत्मीयता नहीं जो प्रेम में है। सत्य यदि रुक्ष और कटु है तो प्रेम मधुर और कोमल है। सत्य जैसे जानने की बात है तो प्रेम वैसा ही होने की भी। सत्य से निर्भयता आती है और प्रेम से निराभिमानता।

आज कल प्रेम के विषय में गलत भ्रान्ति है। काम को ही प्रेम समझा जाता है। इस भ्रम के फैलाने में सिनेमा गन्दे उपन्यास तथा कहानियों का प्रधान हाथ है। जो दर्शकों और पाठकों को गलत दिशा दे रहे हैं। काम प्रेम का आभास तथा भ्रम है। जैसे कोई व्यक्ति कोहरे का धुँआ समझ लेता है मृग मरुभूमि में प्रकाश के झिलमिलाने से उसे पानी समझ लेता है। और प्यास बुझाते को दौड़ता है। जिसे मृग तृष्णा कहते हैं। जैसे उसे आभास और भ्रम हो जाता है। वैसे ही मान को भी काम में प्रेम का आभास या भ्रम दिखाई देता है।

प्रेम और काम में बहुत अन्तर है प्रेम जितना विकसित होता है काम उतना ही संकीर्ण हो जाता है। प्रेम सृजनात्मक शक्ति का ऊर्ध्वीकरण है तो काम सृजनात्मक शक्ति की पतनोन्मुखी स्थिति है इसलिए जब प्रेम पूर्णता की स्थिति में बढ़ता है तो काम शून्यता की स्थिति में पहुँचता जाता है। इस प्रकार की स्थिति में जीने वाला व्यक्ति ब्रह्मचर्य की दशा को प्राप्त करता जाता है। अपनी सृजनात्मक शक्ति के द्वारा ही आत्मबल दूसरों के हित में रह रहना प्रेम का रूप है। प्रेम का व्यावहारिक रूप सेवा है। काम तो प्रकृति ही सम्मोहन शक्ति है जो सन्तति के उत्पन्न हेतु निर्मित है उसकी अधिकता या उसका दुरुपयोग करना व्यभिचार है। काम के दमन से काम से मुक्ति नहीं हो सकती और प्रेम के द्वारा ही उससे मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। तुलसीदास जी बड़े कामुक थे। जब उनका प्रेम भगवान में लग गया तो काम वासना छूट गई। राम गुणगान में रामचरित मानस का सृजन किया। सही सृजनात्मक शक्ति प्रेम के द्वारा पतनोन्मुख दिशा में न बहकर सर्वभूत हिते रता हुई यही प्रेम और भक्ति का परिणाम है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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👉 प्रेम साधना के पथ पर (अंतिम भाग)

निस्वार्थ सच्चा प्रेम ज्ञान भी है, शक्ति भी। जो प्रेम की प्रेरणा से कार्य करता है उसे न कोई कि वास्तव में यह प्रेम की एक आन्तरिक दशा हे देने...