बुधवार, 3 जून 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (अंतिम भाग)

निर्बल मन वाला व्यक्ति स्वभावतः निराशावादी होता है। उसे पग-पग पर अनर्थ ही दिखाई देता हैं। साधारण सी बीमारी-जैसे सर्दी-जुकाम खाँसी या बुखार आ जाने पर बुरी तरह घबरा उठता है। सोचने लगता हैं कहीं सर्दी बढ़कर निमोनिया न बन जाये। कहीं ऐसा न हो कि खाँसी बुखार मिलकर हमें यक्ष्मा कर दें। जरा-सी चोट लग जाने पर उसे ऐसा लगता है मानो उसकी हड्डी टूट गई है। किसी ऐसी रंग में जरा-सी भूल हो जाने पर ऐसा घबरा जाता हैं। जैसे उसकी बरखास्तगी का फरमान आने वाला हो। व्यापार में जरा-सा घाटा आते ही उसे अपनी घर-मकान नीलाम होता दिखाई देता है। निराशा के दोष के कारण उसे अनर्थ के सिवाय वह विचार कदाचित ही आता है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी बलवती होती हैं यह जरा-सी बीमारी मेरा क्या बिगाड़ सकती है, मैं इसे उपचार, आहार-बिहार और नियम, संयम पर जड़मूल से नष्ट कर दूँगा।

नौकरी में भूल हो जाने पर वह यह नहीं सोच पाता कि धोखे से गलती हो गई, आगे के लिये सावधान रहूँगा। सारी स्थिति सुधार लूँगा। व्यापारिक घाटे के प्रसंग में वह इस प्रकार सोच सकने से बाधित रहता है-कि व्यापार में हानि लाभ तो चलता ही रहता हैं। आज यदि हानि हो गई तो आगे लाभ भी होगा। मैं परिश्रम, पुरुषार्थ, सावधानी और साख के बल पर सारी कमी पूरी कर लूँगा। इस प्रकार अपनी निराश भावना के कारण मनो-हीन व्यक्ति प्रकाश के स्थान पर अन्धकार ही देखा करता है।

मानसिक दौर्बल्य अथवा मनोहीनता मानव-जीवन के लिये भयानक अभिशाप है। अदम्य शारीरिक शक्ति और प्रचुर साधन होने पर भी मनोहीन व्यक्ति जीवन में असफल ही रह जाता हैं। जबकि मनोबली व्यक्ति सामान्य शारीरिक क्षमता और साधनों की कमी में भी अपने साहस, उत्साह और संलग्नता के बल पर क्षमता और साधनों की वृद्धि कर लेते हैं और संसार के सफल व्यक्तियों की पंक्ति में अपना स्थान बना लेते है।

यदि किन्हीं कारणों से कोई मानसिक दौर्बल्य का बन्दी बन गया है तो ऐसा नहीं कि उसका यह अभिशाप दूर नहीं हो सकता। अवश्य ही दूर हो सकता है। प्रयत्न द्वारा संसार का हर काम सम्भव हो जाता है। यदि कोई अपने में मनोबल की कमी पाता है तो उसे चाहिये कि वह धीरे-धीरे उन कामों में पड़ना आरम्भ करें, जिनसे उसे भय लगता है ओर अपनी सारी प्राप्त एवं प्रबुद्ध शक्ति को लगाकर पुरुषार्थ करें। असफल होने पर जरा भी निराश न हों और बार-बार प्रयत्न करते चलें। इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास द्वारा उसका मनोबल बढ़ने लगेगा और एक दिन वह सुयोग्य बन जायेगा।

मीटर, रेल, और हवाई-जहाज चलाना सीखने वाले आरम्भ में डरते हैं किन्तु तब भी वे लगनपूर्वक उस काम में लगे ही रहते हैं। धीरे-धीरे उनका मनोबल बढ़ता जाता है और एक दिन वे इतने आत्म-विश्वासी हो जाते हैं कि बिना किसी शंका के दुरूह स्थानों पर भी अपना यान चलाते चले जाते हैं।

मनोबल मनुष्य का प्रधान बल है। इसकी वृद्धि किए बिना जीवन के क्या सामाजिक, क्या आर्थिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल सकी। अस्तु इस प्रधान बल को निरन्तर बढ़ाते ही रहना चाहिये।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 4)

मनुष्य के कर्तव्य क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर यह हैं कि जिन कामों, भावों तथा विचारों का प्रभाव दूसरों पर अवांछनीय हो, उनका त्याग और जिनका प्रभाव अनुकूल हो उनका ग्रहण। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। हम क्या न करें, जिससे किसी पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसी चिन्ता करते रहने की अपेक्षा यह अधिक सरल एवं सुखद है कि हम वह करें, जिसका प्रभाव दूसरों पर प्रतिकूल पड़े। यह काम सेवा, सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति परक ही हो सकते हैं।

मानव समाज पारस्परिकता के ही आधार पर बना, विकसित हुआ, बढ़ा और उसी के आधार पर ठहरा हुआ है। यदि हम सब एक दूसरे का सहयोग करना छोड़ दें तो जीवन, अन्न तथा वस्त्र जैसी साधारण समस्यायें भी हल न हो सकें जीवन की सारी सुविधा साधनों का निर्माण, जिनका कि हम सब उपभोग करते है, परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से सबके सहयोग से ही होता है। यदि हम एक दूसरे की सेवा करना छोड़ दें अथवा सहायता से विरत हो जायें तो हमारा समाज किसी भी विपत्ति आपत्ति का सामना करने में असमर्थ हो जाये। जो बीमार पड़ जाये वे बीमार ही पड़े रहे, जो आश्रित है वे निराश्रित होकर नष्ट हो जायें। जो धनपति हैं, वे सारा धन अपने पास ही रखें और सारा समाज दो दिन में ही असुविधा से त्रस्त हो उठे।

यदि विचारक अपने विचार, शक्तिवान अपनी शक्ति और शिल्पी अपना शिल्प अपने तक ही सीमित कर ले और दूसरों को उसका लाभ न दे तो शीघ्र ही पूरा समाज जड़वत् होकर एक स्थान पर रुक कर खड़ा हो जाये। तात्पर्य यह कि सारा मानव समाज ही क्यों संसार ही पारस्परिकता, सहायता, सहयोग और आदान प्रदान पर चल रहा है। जो स्वार्थी एवं संकीर्ण व्यक्ति इस पारस्परिकता का महत्व नहीं समझते अथवा इसके प्रतिपादन में प्रमाद करते हैं वे अविकसित एवं अपूर्ण मनुष्य ही हैं।

मनुष्यता की पूर्णता के लिये हमें संग्रह की नहीं त्याग की नीति अपनानी चाहिये। दूसरों से अपना स्वार्थ कैसे सधे यह सोचने के स्थान पर यह सोचना चाहिये कि ऐसा कुछ क्या किया जा सकता है, जिससे दूसरों का कुछ हित हो। जिस दिन हमारी अन्तःचेतना, सेवा, पुण्य, परोपकार, त्याग, उदारता, पारस्परिकता, सहायता, सहयोग, प्रेम, दया करुणा आदि की उदार भावनाओं से ओत प्रोत हो जाये, उस दिन समझना चाहिये कि हम मनुष्यता की पूर्णता की ओर अग्रसर हो आये हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

‼️ पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी ‼️

“लक्ष्मी उद्योगी पुरुष सिंहों को प्राप्त होती है”- वह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग-युग के अनुभव के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एक मात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ नहीं करेगा, परिश्रम में अपना पसीना नहीं बहाएगा तब तक किसी प्रकार के श्रेय का अधिकारी नहीं बन सका। लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है।

कहा जाता है कि लक्ष्मी, श्रेय, सफलता और सम्पन्नता आदि उपलब्धियाँ भगवान् की कृपा से ही मिलती है। ऐसी मान्यता आस्तिकता की द्योतक है, अच्छी है। इस धारणा को बनाकर चलने में कोई हानि नहीं। किन्तु इसका रहस्य समझ लेना भी आवश्यक है।

संसार में चारों ओर जो सुख-सम्पन्नता के साधन और कारण बिखरे पड़े हैं, वह सब एकमात्र उस परमात्मा की ही कृपा है। सुख-दुःख और साधन सुविधा भी उसकी रचना के उसी प्रकार अंग है, जिस प्रकार मनुष्य स्वयं। किसी को मिलने वाली सम्पत्ति उसे तभी ही मिल सकती है, जब उसमें मूल स्वामी की सहमति तथा स्वीकृति सम्मिलित हो इस प्रकार निश्चय ही संसार के सुख-साधन और सम्पत्ति सम्पन्नता परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है।

संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये? | Sansaar Kya Hai Aur Hum Kaisa Jeevan Jiyen | 

किन्तु, इस विश्वास के साथ वह न भूल जाना चाहिये कि उसकी कृपा यों ही अनायास मिल जाती है। अथवा वह मनमौजी परमात्मा योंही बैठा-बैठा जिसे चाहता है सम्पन्नता अथवा सफलता वितरित करता रहता है और किसी को असफलता एवं विपन्नता, ऐसा नहीं है। उसके विधान में एक नियम और न्यायशीलता रहती है। वह किसी पर न तो अनायास नर अकारण कृपा करता है। और न कोप। सफलता और सम्पन्नता के लिये उस न्यायपरायणता की कृपा अर्जित करनी पड़ती है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक उसकी पूजा नियमपूर्वक उसकी कृपा अर्जित कर लेते हैं, संसार में सब कुछ पा जाते हैं और जो इस विषय में प्रभारी अथवा अन्ध-विश्वासी बने रहते हैं, उन्हें खाली हाथ ही रहना पड़ता है।

सम्पन्नता के सम्बन्ध में परमात्मा की कृपा पाने का केवल एक ही आधार है और वह है पुरुषार्थ अथवा परिश्रम। जो व्यक्ति प्रमाद त्याग कर उद्योग परिश्रम अथवा पुरुषार्थ करते हैं, उन पर परमात्मा कृपा करता ही नहीं उसे करनी पड़ती है। वह अपने इस नियम को इस विषय में भंग करने के लिये सक्षम नहीं है। यह अक्षमता उसकी असमानता नहीं, महिमा है। जो व्यक्ति अपने बनाये नियमों के प्रति जितना भीरु और भावुक रहता है, वह उतना ही दृढ़ और महान माना जाता है। उसी व्यक्ति के बनाये विधान का मान तथा पालन होता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 03 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 June 2026


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सोमवार, 1 जून 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 3)

यदि भय और आशंकाओं का सम्बन्ध मनुष्य की हृदय-स्थिति से न होता और उनका निवास प्रसंग अथवा परिस्थितियों में होता तो वह उस स्थिति में सभी मनुष्यों पर समान रूप से प्रतिक्रियाएँ होना चाहिये। जब ऐसा होता नहीं, किसी भयानक परिस्थिति को देखकर कहाँ कोई एक बुरी तरह डर कर घबरा कर भागने का रास्ता खोजने लगता है, वहाँ कोई दूसरा उसी परिस्थिति में अपने संतुलन ओर साहस के आधार पर वीरतापूर्वक उसका सामना करने के लिये उत्साहित हो उठता है। यह अन्तर परिस्थिति का नहीं केवल मनःस्थिति का होता है। जिसका मन निर्बल और कायर होगा, उसका घबरा जाना स्वाभाविक है। जिसका मनोबल बढ़ा-चढ़ा होगा, उसके मन में भय अथवा पलायन का भाव ही न आयेगा। वह तो ताल ठोक कर टक्कर लेने को उद्यत हो उठेगा।

मनुष्य की सारी बाह्य क्रियाओं की जड़ उसके मन में ही होती है। मनुष्य की शारीरिक क्रियाओं का संचालक मन ही होता है। मन स्वस्थ, बलवान, ओर संतुलित होगा, क्रियायें भी सुन्दर, सतेज ओर व्यवस्थित होंगी। मन निर्बल और अस्थिर होगा, क्रिया-कलाप भी सारहीन और अस्त-व्यस्त होगा।

कारण कोई भी रहे हों, किन्तु जिनके मन क्षीण, निर्बल ओर निस्तेज हो जाते हैं, उनका सारा जीवन भय, आशंकाओं, कट्टरता और संदेहों से भरा रहता है। मनोहीन मनुष्य हर बात में भयानक घटनाओं, सम्भावनाओं और परिणामों की कल्पना किया करते है। उन्हें सब ओर सब जगह अमंगल और अकल्याण ही दिखाई देता है। जिस प्रकार कायर और भीरु सिपाही को मोर्चे पर सिवाय मौत के और कुछ दिखाई नहीं देता, जबकि वहाँ पर विजय, यश और प्रतिष्ठा की भी सम्भावना होती है, उसी प्रकार निर्बल मन वाले को सब जगह असफलता और आशंका ही दीखती रहती है, जबकि सभी क्षेत्रों और कार्यों में दूसरे लोग सफल और कृतकृत्य होते रहते हैं।

निर्बल मन वालों की विचार-धारा प्रतिगामिनी हो जाती है। ऐसा मनुष्य यदि एक सफल और एक असफल आदमी को एक साथ देखता है तो भी वह असफल व्यक्ति की स्थिति से प्रभावित होता। वह सोचता है यदि में भी इस काम को करूँ तो असफल हो जाऊँगा। उसका विश्वास उस सफल व्यक्ति पर नहीं जाता ओर न अपने लिये उसे उदाहरण ही बना पाता है। कायर व्यक्ति जिस प्रकार मैदान छोड़कर भागने वालों को अपना आदर्श बनाता है, मोर्चे पर डटने वालों को नहीं, उसी प्रकार मनोहीन व्यक्ति भी असफल, अकर्मण्य और अग्राह्य उदाहरणों को अपना आदर्श बनाता है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 3)

मनुष्य जीवन एक अनुपम अवसर है। इसी बात का कि इस श्रेणियों में से जिस श्रेणी में चाहे अपना उत्थान अथवा पतन कर सकता है। किन्तु जीवन की सफलता एवं सार्थकता इसी बात में है कि मनुष्य अधिकाधिक उन्नति की ओर बढ़ता हुआ ईश्वरत्व प्राप्त कर ले। वह उन्नति करता हुआ मनुष्य से देवता और देवता से ईश्वर रूप होकर सदा सर्वदा के लिये जन्म मरण के चक्र से निवृत्त हो जाये। किसी कार्य की सार्थकता सफलता ही हैं और सफलता का अर्थ है उन्नति एवं विकास। मनुष्यता से देवत्व की ओर पहुँचना ही उसकी सार्थकता है। पतन की ओर प्रगति करना अग्रसर होना नहीं कहा जा सकता है और न मनुष्य से असुर बन जाना सार्थकता ही। सुन्दर से असुन्दर बनना नहीं, सुन्दर, सुन्दरतम बनना ही विकास है। अस्तु हमारी, आप सबके जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम सब श्रेष्ठता की ओर बढ़कर देवत्व की कक्षा में प्रवेश करें।

एक कक्षा से दूसरी कक्षा की ओर उछाल मारना ठीक नहीं। इस अभियान की क्रमिक प्रगति ही अधिक समुचित, सरल एवं विशद होगी। पहले हम मनुष्य से पूर्ण मनुष्य बनने के प्रयत्न में लगें और तब मनुष्यता की पूर्णता के बाद देवत्व की ओर बढ़ें।

मानना ही होगा, अभी हम मात्र मनुष्य ही हैं, पूर्ण मनुष्य नहीं। हमें अपने स्वार्थों एवं अधिकारों के प्रति काफी स्पृहा है। कभी कभी जब हमारी आसुरी वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं, तब उनके प्रभाव में अपना कर्तव्य भूल जाते हैं और दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण भी कर बैठते हैं। यह बात अवश्य है कि बाद में समाधान होने के पश्चाताप भी करते हैं और क्षमा भी माँगते हैं। अच्छा हो कि हमसे यह भूल कभी न हो। इसका एक सरल सा उपाय यह है कि हम अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने कर्तव्यों पर अधिक ध्यान दें। अपने कर्तव्यों तक सीमित रहने से स्वाभाविक है कि अधिकारों की जागरूकता कम हो जायेगी और इस प्रकार उनके प्रति हमारा ममत्व घटने लगेगा और निःस्वार्थ बुद्धि का विकास होने लगेगा। कर्तव्यों का अधिक भान ही तो स्वार्थ को प्रबुद्ध किया करता है। इस उपाय में अधिकारों के हनन होने का भय इसलिये नहीं है कि जब कोई नेक आदमी स्वयं अपने अधिकारों की स्पृहा न कर कर्तव्य करता रहता है, तब दूसरे लोग उसके अधिकार रक्षा को अपना कर्तव्य मान लेते हैं। कर्तव्यशील सत्पुरुष अपने अधिकारों से वंचित रह जाये यह सम्भव नहीं।

इस प्रकार स्वार्थ के प्रति ममत्व कम होते ही परमार्थ बुद्धि का विकास प्रारम्भ हो जायेगा और मनुष्य देवत्व की ओर चल पड़ेगा।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 01 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 June 2026


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रविवार, 31 मई 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 2)

जिन मनुष्यों के मन बलवान और सतेज होते हैं, वे कम समय में ही पर्याप्त विकास कर लेते हैं। जो काम हाथ में लेते हैं, उत्साह और अभिरुचि से करते है। इस गुण के कारण उनकी ग्रहणशीलता भी बड़ी-बड़ी रहती है। कम-कम से ज्ञान ओर गुणों को हृदयंगम करते चले जाते हैं। मनोबली लोगों का आत्म-विश्वास बड़ा प्रबल होता है। उनकी संसार का काम कठिन ओर दुस्सह मालूम ही नहीं होता। आत्म-विश्वास के कारण वे अपने को हर काम के योग्य समझा करते है। जो भी काम उन्हें सौंप दिया जाता है, उसे पूरा करके दिखलाते हैं।

आध्यात्मिक विकास तो मनोबल के अभाव के में असंभव है। आध्यात्मिक विकास के लिये वृत्तियों ओर इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना होता है। यदि मन बलवान ओर स्वरूप है तो उसकी सहायता से वृत्तियों और इन्द्रियों की वश में किया जा सकता है। यदि मन कमजोर और अस्वस्थ है तो मनुष्य की वृत्तियाँ शासन-हीन हो जायेंगी। वे अपनी सत्ता स्वतन्त्र कर लेंगी। तब किसी दशा में भी उन्हें वशवर्ती नहीं किया जा सकता।

आध्यात्मिक विकास के लिये अनेक तरह के नियम, संयम और व्रतों का निर्वाह करना पड़ता है। बहुत-सी साधनाओं में उतरना पड़ता हैं साधना ओर संयत का यह कार्यक्रम केवल शारीरिक-बल के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिये मनोबल की आवश्यकता होती है। जिसका मन शक्तिशाली और अनुकूल होता है, वह किसी भी विकार, वेग अथवा उद्वेग पर आसानी से नियंत्रण ला सकता है। जिसका शरीर शक्तिशाली हो पर मन निर्बल हो तो ऐसे आदमी की आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल रहती है। वह तो अपने आवेशों और विकारों को जरा देर भी नहीं रोक सकता। संसार के सारे शासन, अनुशासन, नियम और संयम मनोबल के आधार पर सफल बनाये जा सकते है, शारीरिक-बल के आधार पर नहीं। किसी भी क्षेत्र की सफलता के लिये मानसिक-बल की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे जागृत और विकसित करते ही रहना चाहिये।

निर्बल मन वाले कोई बड़ा काम तो दूर सामान्यतम कामों में भी घबरा जाते है। कोई भी प्रसंग उपस्थित होते ही वे भय, आशंका ओर सन्देह के वशीभूत हो जाते हैं, फिर चाहे उसे उस प्रसंग में भय, आशंका अथवा सन्देह का कारण हो या न हो। वास्तविकता यह है कि भय का कारण प्रसंग अथवा परिस्थितियों में नहीं होता, उसकी जड़ मनुष्य के अपने निर्बल मन में ही होती हैं। हृदय से ही होता है। इनका हेतु वह मानसिक कमजोरी ही होती है, जो किन्हीं भूलों अथवा भ्रमों से पैदा हो जाती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 2)

वह जो कुछ सोचता है, दूसरों के हित के लिये, जो कुछ करता है दूसरों के लाभ के लिये। उसका खाना-पीना सोना-जागना उठना बैठना, हँसना बोलना वहाँ तक कि श्वाँस एवं प्रश्वास की प्रक्रिया तक दूसरों के हित के लिये ही सक्रिय रहती है। उसका सारा व्यक्तिगत एवं अस्तित्व लोक रंजन में विलीन हो जाता है। वह सम्पूर्ण रूप से परमार्थ रूप होकर ईश्वर की श्रेणी में पहुँच जाता है। ईश्वर का जो कुछ है, वह सब संसार के कल्याण के लिये। उसका अपना कोई स्वार्थ हो ही क्या सकता है?

असुर वह कहा जाता है, जिसकी भावनायें स्वार्थी एवं संकीर्ण हों। अपने सुख दुःख के अतिरिक्त दूसरों के सुख दुःख से कोई सम्बन्ध न रखता हो। केवल अपनी बात ही सोचना, दूसरों के विषय में कोई विचार न रखना, दूसरों के अधिकारों की उपेक्षा कर अपने अधिकारों को चाहना। दूसरे की हानि लाभ से निरपेक्ष रहकर अपना हित देखते रहना, स्वार्थपूर्ति के लिये पथ एवं प्रयत्न की कोई मर्यादा न मानना। स्वार्थ के लिये ईर्ष्या, द्वेप और क्रोध आदि वृत्तियों पर संयम न रखना असुरता के लक्षण हैं। जब यह असुरता अपनी परिधि से निरंतर पिशाचता अथवा पामरता की परिधि में प्रवेश कर जाती है, तब वह आततायी, अत्याचारी और असहनीय बन जाता है। अकारण एवं अनावश्यक रूप में दूसरों को सताना, दुःखी करना, हानि पहुँचाना उसका सामान्य मनोरंजन हो जाता है।

दूसरों के सुख में दुःख और दुःख में सुख अनुभव करना उसका विशेष लक्षण होता है। अपना कोई स्वार्थ न होते हुए भी दूसरों की उन्नति एवं विकास में बाधा डालना और प्राणपण से यह प्रयत्न करना कि दूसरा एक कदम आगे न बढ़ जाये, कहीं यह शांति अथवा सुख की एक बूँद न पाले आदि उच्छृंखल, अनर्गल एवं अन्यायपूर्ण कार्य करते रहने वाले पिशाच अथवा राक्षसों की कोटि में आते हैं। झूठ, छल, धूर्तता, कपट, मक्कारी, चोरी, विश्वासघात, प्रवंचना, शोषण आदि पैशाचिक प्रवृत्तियाँ ही तो हैं। ऐसे अभागे मानव पिशाचों को असाध्य ही मानना चाहिये। इनकी अपावन छाया तक जिस जिस स्थान पर पड़ जाती है, उस उस स्थान पर नरक निर्माण हो जाता है।

यह कोटियाँ अथवा श्रेणियाँ-इनमें से मनुष्य जिस कोटि में चाहे प्रवेश कर सकता है। उस पर किसी प्रकार का बाह्य प्रतिबन्ध नहीं है। वह देवता, असुर, राक्षस कुछ भी बन सकता है।

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✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 31 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2026


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शनिवार, 30 मई 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 1)

सिद्धि का आधार शक्ति माना गया हैं। संसार का कोई उद्योग, कोई भी पुरुषार्थ और कोई भी कार्य शक्ति के बिना नहीं किया जा सकता। कोई बड़ा ही नहीं एक साधारण और सामान्य काम में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। अशक्त मनुष्य संसार में कुछ भी नहीं कर सकता।

संसार में प्रधानतः दो शक्तियाँ काम करती हैं। एक शारीरिक-बल दूसरा मानसिक-बल आगे की अन्य शक्तियाँ-जैसे बौद्धिक-बल आध्यात्मिक अथवा आत्मिक-बल भी पूर्वोक्त दो बलों के आधार पर ही पाये ओर विकसित किये जाते हैं।

शारीरिक-बल और मानसिक-बल में भी मानसिक-बल की प्रधानता हैं। शारीरिक-बल का अपने-आपमें कोई अधिक महत्व नहीं है। मनोबल का सहयोग पाये बिना शारीरिक-बल निकम्मा बना रहता है। बहुत बार देखा जा सकता है कि शारीरिक-बल कम होने पर भी लोग मनोबल के आधार पर बहुत से काम कर जाते हैं। शरीर-बल प्रधान सैनिक जिनका मानसिक-बल निर्बल होता है। मनोबल प्रधान और इम्यून शारीरिक-बल वाले सैनिकों से परास्त हो जाते है। जंगल में शेर की तुलना में हाथी, गैंडे, सुअर आदि बहुत से जानवर शरीर-बल में बहुत अधिक होते हैं, किन्तु मनोबल की कमी के कारण शेर से डरते ओर उसका आतंक मानते रहते हैं। वास्तविक बल मनोबल ही होता है-शारीरिक-बल तो मात्र यांत्रिक बल ही होता हैं।

शरीर में क्षमता होते हुए भी जब मनुष्य का मन असहयोगी हो जाता है तो वह जरा देर भी काम नहीं कर सकता। मन में उत्साह ओर सहयोग होने पर यदि एक बार शरीर थका भी हो तो भी मनुष्य बहुत देर तक काम करता रहता है। शरीर की सारी क्रियायें मन की सहायता से ही सम्पादित होती है।

बौद्धिक-बल उत्पन्न करने के लिये भी मानसिक अभ्यास की आवश्यकता होती है। मनुष्य की बुद्धि का विकास अध्ययन, अनुभव और विषय में गहरे पैठने से होता है। जिसका मन निर्बल है, असहयोगी या उत्साह हीन है, वह न तो अध्ययन का परिश्रम कर सकता है, न सजग रहकर अनुभव संचय कर सकता है। और न उत्साहपूर्वक किसी विषय में गहरे पैठ सकता है। यदि वह यह सब करेगा भी तो मानसिक सहयोग के अभाव में कुछ लाभ नहीं उठा सकता।

न जाने कितने उत्साह अथवा अभिरुचि से रहित मन वाले लोग वर्षों पड़ते रहते हैं, नौकरी ओर व्यापार करते हैं, किन्तु प्रगति के नाम पर एक कदम भी आगे नहीं बड़ पाते पूरी सिद्धि तो उनके लिए असम्भव होती है। मन का असहयोग, विद्रोही, निरुत्साही, चंचल आदि होना उसकी निर्बलता के ही लक्षण होते हैं।

.....क्रमशः जारी
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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 1)

किसी अवसर का समुचित लाभ उठा लेना ही उस अवसर की सार्थकता कही गई है। मानव जीवन भी एक अवसर ही नहीं एक अनुपम अवसर है। जो बुद्धिमान इस अवसर की महत्ता समझते हैं, वे इसका लाभ उठाने में कभी नहीं चूकते। जीवन का लाभ उठाने का अर्थ है, इसको सफल एवं सार्थक बना लेना। इसकी श्रेष्ठ रचना ही इसकी सार्थकता मानी गई है और सार्थकता का अभिप्राय है, इसकी चेतना को देवत्व की ओर उठाया जाये। मनुष्य से बढ़कर देवताओं की कक्षा में प्रवेश किया जाये।

मनुष्य जीवन मध्यम श्रेणी है। इसके दायें बायें दो और श्रेणियाँ हैं। देवता और असुर। मनुष्य की क्षमता में है कि वह चाहे तो अपनी गतिविधियों तथा विचार प्रवृत्तियों के आधार पर देवता बन जाये अथवा असुर रूप में पतित हो जाये।इन दोनों श्रेणियों के बीज मनुष्य के अन्दर विद्यमान् हैं। वह जितनी तत्परता से जिन बीजों का विकास कर लेगा उतने अनुपात में ही देवता अथवा असुर बन जायेगा। यद्यपि इन दोनों श्रेणियों की एक पराकाष्ठा भी है। वे हैं परमात्म रूप एवं पिशाचता। देवत्व जब बढ़कर अपनी परिधि पार कर जाता है तब ईश्वर रूप हो जाता है और असुरता उतरते उतरते पिशाचता के रूप में परिणत हो जाती है।

मनुष्यता की पहचान यह है कि वह अपने और दूसरों के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण रखता है। यद्यपि उसे अपने अधिकारों तथा स्वार्थों का ध्यान अवश्य रहता है तथापि दूसरों के अधिकारों का भी उल्लंघन नहीं करता उनके स्वार्थों का हनन नहीं करता। वह जो कुछ उसका है लेना चाहता है और जो कुछ दूसरों का है उसको देने का साहस रखता है। अपनी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हुए दूसरों की सुख सुविधाओं में व्याघात उत्पन्न नहीं करता।

देवता का लक्षण यह है कि वह अपने स्वार्थ तथा अधिकारों को द्वितीय स्थान पर तो रखते ही हैं बल्कि उनकी हानि करके भी दूसरों की सुख सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न किया करते हैं। अपनी उन्नति रोक कर दूसरों को उन्नति पथ पर बढ़ाने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख समझकर परमार्थ में तत्पर रहते हैं। जब यह पुण्य प्रवृत्ति आगे बढ़कर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं रह जाता। उनके पास जो कुछ होता है, उसमें निस्पृह हो जाता है। उनकी सारी गतिविधियाँ और सारी चिन्ताएँ दूसरे की सेविका बन जाती हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 30 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 May 2026



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शुक्रवार, 29 मई 2026

👉 “सर्वस्या उन्नतेर्मूलं महताँ संग उच्यते”

पारस के संपर्क में आने पर लोहे का टुकड़ा भी सोना बन जाता है। चन्दन वृक्ष की समीपस्थ झाड़ियां भी सुगन्ध से ओत-प्रोत होती पायी जाती हैं। संपर्क सान्निध्य एवं वातावरण का प्रभाव व्यक्ति को आमूल-चूल बदलकर उसे कहीं से कहीं पहुँचा देता है। ऐसी कई साक्षियाँ हैं जो बताती हैं कि जिन्होंने महामानवों का पल्ला पकड़ा, उनकी दी हुई शिक्षा पर चले तथा उनके संपर्क में रहकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव को वैसा ही बनाने का प्रयास किया तो वे भी उसी राजमार्ग पर चल पड़े। शक्तिपात या कुण्डलिनी जागरण होता है अथवा नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से तो कहा नहीं जा सकता, पर तथ्य एवं प्रमाण बताते हैं कि श्रेष्ठ सान्निध्य का प्रभाव इससे कम नहीं होता।

समर्थ गुरु रामदास को योग्य शिष्य की तलाश थी तथा शिवाजी को एक छत्रछाया की। वह सब उन्हें मिला। साथ में मिला समयानुकूल प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं मुगलों से जूझने हेतु शस्त्र विद्या का शिक्षण। अपने गुरु का दामन पकड़ कर वे छत्रपति बन गए और संस्कृति के रक्षक कहलाए। रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य ने विवेकानन्द को अल्पायु में ही विश्व बंधु सन्त बना दिया तथा प्रज्ञा चक्षु विरजानन्द जी के मार्गदर्शन ने सत्य की खोज में भटक रहे मूलशंकर को आर्य समाज का संस्थापक कुरीतियों से जूझने वाला एक प्रखर संन्यासी दयानन्द। बुन्देलखण्ड के राजा छत्रसाल को यदि स्वामी प्राणनाथ न मिले होते तो वे सम्भवतः उतने प्रखर पुरुषार्थी न बन पाते। यह सब चमत्कार उसी सान्निध्य का है जिसकी यशोगाथा गुरु शिष्य परंपरा में हमेशा से गायी जाती रही है।

इसी क्रम में सहज ही हमें एक सौम्य सरल एवं कार्य कुशल व्यक्ति की याद हो आती है जिसे बापू का सान्निध्य मिला, जो चम्पारन के एक साधारण से किसान से स्वतन्त्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति बना। बाबू राजेन्द्र प्रसाद को कौन नहीं जानता। पर कम को ही विदित है कि इस पद तक पहुँचने के पूर्व उन्हें समर्पण सेवा लगन की कितनी कड़ी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के संपर्क में अनेकानेक व्यक्तियों में से कइयों ने अपने त्याग-बलिदान के बदले स्वतन्त्र राष्ट्र में उच्च पद पाए। किसी के भी समर्पण की परस्पर तुलना कर पाना सम्भव नहीं। नेहरू अधिक त्यागी थे अथवा पटेल, मौलाना आजाद अथवा राजाजी। प्रश्न इस बात का नहीं। परन्तु जैसा बापू चाहते थे वैसा ही सीधे सादे स्तर पर बने रहकर यदि किसी ने महान बनने का प्रयास किया है तो उसमें राजेन्द्रबाबू का नाम बड़े श्रद्धा से लिया जाता है, लिया जाता रहेगा।

इतिहास साक्षी है कि राजेन्द्रबाबू उसके बाद बिना श्रेय की कामना के कई बार जेल गए लेकिन अंग्रेजों के नीली कोठी वाले साहबों के प्रयासों को कभी सफल नहीं होने दिया। चम्पारन के आन्दोलन को राष्ट्रीयता स्वतन्त्रता के रूप में 1947 में हुए उपसंहार की भूमिका माना जा सकता है। दृष्टा गाँधी ने जैसा कहा था, वही हुआ। इस संपर्क वार्तालाप के ठीक 29 वर्ष बाद भारत को स्वतन्त्रता मिली और विदेशियों के हाथ से सत्ता का हस्तान्तरण सर्वप्रथम संविधान सभा के अध्यक्ष श्री राजेन्द्रबाबू के हाथों में हुआ।

बिहार का एक सीधा-सादा यह किसान अपनी लगन कर्मठता एवं समर्पण के कारण ही उस उच्चतम पद को विभूषित कर सकने में समर्थ हुआ, जिसे स्वतन्त्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति नाम दिया गया। पद लिप्सा से कोसों दूर, सादगी की प्रतिमूर्ति राजेन्द्रबाबू जब तक जीवित रहे, इसी सिद्धांत की बानगी बने रहे कि श्रेष्ठ सान्निध्य एवं गुण ,कर्म, स्वभाव के परिष्कार से व्यक्ति महामानव बन सकता है। यही है वह चमत्कार जिसकी कामना तो लोग करते हैं, पुरुषार्थ नहीं करते।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1983

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👉 समुन्नत बनें ताकि सुविकसित रह सकें

इस संसार में पाने योग्य बहुत कुछ है, पर वह सब उनके लिए सुरक्षित है जो बलवान हैं। बल की उपासना करने के बाद ही अन्य देवताओं की आराधना में सफलता मिल सकती है।

हर वस्तु को मूल्य चुका कर लिया जाय, इस दुनिया के बाजार में यही नियम है। अधिकारियों की भर्ती होती रहती है पर उनमें लिए वे ही जाते हैं जो प्रामाणिकता एवं पात्रता सिद्ध कर सकते हैं। खाली हाथ निकले तो खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा। बाजार में कितने ही मूल्यवान पदार्थ भले ही पड़े हों पर खाली हाथ व्यक्ति के लिए कुछ भी प्राप्त कर सकने का द्वार बन्द ही रहेगा।

सफलताओं के रंगीन सपने देखने में जितनी कल्पना शक्ति का प्रयोग किया जाता है उतना ही यदि इस तथ्य पर विचार करें कि अपनी योग्यता किस प्रकार बढ़े और अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने योग्य क्षमता का अभिवर्धन कैसे हो? तो समझना चाहिए कि आकाँक्षा पूर्ति का अधिकाँश आधार बन गया। अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने के लिए अच्छी मन स्थिति का निर्माण करना आवश्यक है। विकसित व्यक्तित्वों की पूँजी द्वारा ही इस संसार में ऐसा कुछ पाया कमाया जा सकता है जिसे महत्वपूर्ण कहा जा सके।

दुर्बलता एक अभिशाप है जिस पर हर दिशा से विपत्तियाँ टूटती हैं। प्रकृति नहीं चाहती कि उसकी श्रेष्ठ संरचना में सड़े−गले कूड़े−करकट के ढेर लगे रहें। दुर्बलता का ही दूसरा नाम कुरूपता है। हमारी आँखें उसे पसन्द नहीं करतीं फिर प्रकृति ही यह क्यों स्वीकार करेगी कि इस संसार में उस कूड़े−करकट के ढेर लगे रहें जो आन्तरिक समर्थता का मूल्य नहीं समझते और बाहर की उपलब्धियों की आकाँक्षा से उद्विग्न रहकर संसार में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। आलसी और अकर्मण्य के लिए संकटों और अभावों से छुटकारे का कोई उपाय नहीं। जो अपनी उपेक्षा करता है उसे हर दिशा से उपेक्षा और तिरस्कृत ही हाथ लगती है।

दुर्बल शरीर को नई−नई किस्म की बीमारियाँ दबोचती हैं। डरपोक को डराने के लिए जीवित ही नहीं मृतक भी भूत−पलीत बनकर ढूंढ़ते−खोजते आ पहुँचते हैं। आततायियों को अपनी शिकार पकड़ने के लिए कायरों की तलाश करनी पड़ती है। शंकाशील लोगों को बिल्ली भी रास्ता काटकर डरा देती है। अरबों, खरबों मील दूर रहने वाले ग्रह−नक्षत्र भी अपनी प्रकोप मुद्रा उन्हीं को दिखाते हैं जिन्हें अकारण भयभीत होने में मजा आता है। अन्यथा वे बेचारे व्यक्ति विशेष का बिगाड़ उपकार करना उनके बस से सर्वथा बाहर की बात है। दुर्बलताग्रसित व्यक्ति वस्तुतः अपने आपसे ही डरता है, उसकी भय−भीरुता देखकर दूसरे विदूषक भी चिढ़ाने का मजा लेने के लिए आ धमकते हैं।

अपनी दुर्बलताओं को खोजें, उनसे घृणा करें और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए जुट जाँय। समर्थता की उपासना करें। शरीर को बलवान बनाने की योजना बनायें और मन में जमे हुए भीरुता के समस्त आधारों को निरस्त कर दें। प्रगति का आरम्भ भीतर से करें ताकि उस अन्तः भूमि में उगाये अंकुर को समुन्नत व्यक्तित्व एवं वैभव के रूप में सुविकसित देखा जा सके।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1974

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 May 2026


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गुरुवार, 28 मई 2026

‼ देवी प्रतिशोध ‼

सूर्यास्त के बाद —अन्धकार घना होता जा रहा था। अरब की मरुभूमि में रातें भी बड़ी भयावह लगा करती हैं। ऐसे ही रेतीले सुनसान स्थान पर यात्री को एक झोंपड़ी दिखाई दी। जिसमें कोई व्यक्ति गीत गा रहा था। यात्री एक क्षण को रुका और गीत के बोल सुनने लगा।

यात्री को झोंपड़ी में रहने वाले वृद्ध पुरुष की आकृति जानी-पहचानी लगी। स्मृतियाँ उघड़ती गयीं और उसे याद आया कि इस व्यक्ति से उनका निकटतम सम्बन्ध रह चुका है। झोंपड़ी में रहने वाला वृद्ध व्यक्ति युसुफ के नाम से जाना जाता था। यात्री ने युसुफ से कहा—मैं समाज द्वारा बहिष्कृत एक पापी हूँ। सभी ने मुझे अषम कहकर मेरा परित्याग कर दिया। राज कर्मचारी मुझे पकड़ कर दण्डित करने के लिए मेरा पीछा कर रहें है। आज की रात आपके घर में गुजारने का मौका मिल जाय तो बड़ी दया होगी। युसूफ आप तो अपनी दया के लिये संसार भर में प्रसिद्ध है।

युसूफ ने बड़ी विनम्रता पूर्वक कहा—भद्र पुरुष यह घर मेरा नहीं उस परमात्मा का ही है। इसमें तुम्हारा भी उतना ही अधिकार है जितना कि मेरा। मैं तो इस देह का भी स्वामी नहीं हूँ, यह भी एक धर्मशाला है। तुम प्रसन्नता पूर्वक जी चाहे जब तक यहाँ रहो।’

वह अन्दर खाना लाने के लिए चला गया। अभ्यागत को भरपेट भोजन करवा कर सोने के लिए बिस्तर लगा दिया और बिना परिचय पूछे ही सो जाने के लिए कहा।

प्रातःकाल हुआ। पूर्व दिशा में अरुणिमा फैलने लगी और पक्षियों का कलरव गूँजने लगा। युसुफ उठ गये थे और नहा-धोकर अतिथि के जागने का इन्तजार कर करे रहे थे। उधर अतिथि कई दिनों का हारा थका होने के कारण चैन की नींदें ले रहा था। युसुफ अतिथि के पास गये और धीरे से जगा कर बोले—”उठो भाई—सूरज उग आया है। तुम्हारी सुविधा के लिये मैं थोड़ा-बहुत लाया हूँ उसे लेकर मेरे द्रुतगामी घोड़े पर सवार होकर दूर चले जाना ताकि तुम अपने शत्रुओं की पहुँच से बाहर निकल सको।”

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास: भगवान को अपने जीवन में बुलाने का मंत्र: भाग 2, https://youtu.be/dv8jnOBZ5K8?si=9aWQB8n5JAbhCQLO

इस सत्पुरुष के मुखमण्डल पर हार्दिक पवित्रता ‘शीतल’ रजनी चन्द्रिका की भाँति फैली हुई थी। उनके शब्द जैसे अन्तःकरण से निकल कर आ रहें थे तभी तो उनका व्यवहार इतना दिव्य बन पड़ा था। इस दिव्य व्यवहार के प्रभाव स्वरूप की आगन्तुक के हृदय में भी पवित्र और सात्विक विचारों का प्रवाह बहने लगा था। अतिथि को अपना पूरा विगत स्मृत हो आया और लगा कि पाप पूर्ण प्रवृत्तियों की कालिमा पश्चाताप के रसायन से स्वच्छ होती जा रही हैं और उनके स्थान पर निर्मल भावों की तरंगें उठने लगी हैं।
पृथ्वी पर घुटने टेक युसुफ के चरणों में झुक कर अतिथि ने कहा—’हे शेख! आपने मुझे शरण दी, भोजन दिया, शान्ति दी और पवित्रता भी दी अब आपके प्रति कृतज्ञता के लिये क्या कहूँ?”

‘मैं कैसे कहूँ कि यह उपकार पापी इब्राहिम के लिए किया है जो आपके बड़े पुत्र का हत्यारा है। हमारे कबीलों में हत्यारे का शिरच्छेद कर ही मृतात्माओं शाँति पहुँचायी जाती है, आप भी उसी परम्परा का पालन कीजिए।’

इब्राहिम यह कहकर मौन हो गया। परन्तु युसुफ ने तो उसे भगाने में और भी जल्दी की क्योंकि वे डरने लगे थे—अपने आप से कि कहीं अपने पुत्र के हत्यारे का वध करने के लिए पाशविक प्रतिशोध न जाग पड़े।” वे बोले-तब तो तुम और भी जल्दी चले जाओ। कहीं मैं प्रतिशोध के कारण कर्त्तव्य भ्रष्ट न हो जाऊँ।

इब्राहिम चला गया और युसुफ ने अपने दिवंगत पुत्र को सम्बोधित करते हुए कहा—मैं तेरे लिये दिन-रात तड़पता रहा हूँ। आज मैंने तेरा बदला ले लिया है। तेरे हत्यारे की नृशंसभावना पश्चात्ताप की अग्नि में जलकर नष्ट हो गयी हैं और उसका हृदय पवित्र हो गया है। अब तू शान्ति की चिरनिद्रा में सो जा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (अंतिम भाग)

आनन्द का केन्द्र बिन्दु अन्तरात्मा है। वह चैतन्य गतिविधियों का प्रेरणा स्थल भी है। पर चेतना की यह विशेषता होती है कि वह जड़ वस्तुओं में अधिक समय तक नहीं टिक सकती। जब तक उसका प्रकाश-आनन्द की किरणें वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा विषयों पर पड़ती है, तब तक वे आकर्षक लगती है। जैसे ही किरणें सिमटती हैं, वह दृश्यमान सौंदर्य लुप्त हो जाता है। वस्तुतः अन्तरात्मा से निकली भाव तरंगें दृश्य संसार तथा उससे सम्बद्ध वस्तुओं में अपने उद्गम स्थल की खोज करती हैं। बाहर वह नहीं मिलता। अतृप्ति मिटाने के लिए वह साँसारिक चीजों का सहारा लेती है। मिटने के स्थान पर वह और भी बढ़ती है तथा उसकी स्थिति उस प्यासे व्यक्ति की तरह होती है जो पानी की तलाश में निकलता है, पर मदिरालय पहुँच कर मद्यपान में अपना होश-हवाश गवाँ बैठता है। शराबी की तरह ही हालत जीवात्मा की हो जाती है जो सदा अतृप्त बनी आकुल व्याकुल रहती है।

यह एक विडम्बना ही है कि जीव स्वयं आनन्द का स्रोत होते हुए भी जीवन पर्यन्त उस अमृतत्व से वंचित रहता है। खेल खिलौने, भोग विलास, इच्छाओं आकाँक्षाओं, ऐषणाओं की पूर्ति में बचपन, किशोरावस्था युवावस्था प्रौढ़ावस्था खप जाती है, जब वृद्धावस्था में मनुष्य हाथ मलता रह जाता है। व्यतीत हुए भूतकाल के जीवन को स्मरण करके हर व्यक्ति की अंतर्व्यथा जेम्स एलन की भाँति मूक रूप में प्रस्फुटित होती है- “मैंने साँसारिक जीवन एवं उससे जुड़ी वस्तुओं में आनन्द की खोज का प्रयास किया किन्तु वह नहीं मिल सका। विद्याभ्यास किया- ऐश आराम के साधन जुटाये, श्रेय सम्मान अर्जित किया, पर अशान्ति बढ़ती ही गयी। मैंने दर्शनों का अनुशीलन किया किन्तु मेरा हृदय अहंभाव से विदग्ध हो गया तब पहली बार मुझे अनुभव हुआ है, कि शान्ति एवं आनन्द का केन्द्र बाहर नहीं भीतर है।”

ऐसी व्यथा-वेदना की अनुभूति हर व्यक्ति को कभी व कभी अवश्य होती है। जिसकी अभिव्यक्ति विभिन्न व्यक्तियों में अलग-अलग प्रकार को होती है। यह एक ऐसा अभाव है जिसकी आपूर्ति भौतिक वस्तुओं, विषयों अथवा भौतिक ज्ञान द्वारा नहीं हो सकती। वे मनुष्य के अन्तराल को तृप्त नहीं कर सकतीं। अन्तराल में इस पीड़ा का होना इस शाश्वत तथ्य की परिचायक है कि शाश्वत आनन्द की प्राप्ति जीव की प्रमुख माँग है। उसे पाने की उत्कंठा भी उसमें प्रबल है। भीतर की यह आकाँक्षा और उत्कंठा उस दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिए के लिए सतत् प्रेरित करती रहती है। दृष्टि बहुमुखी होने के कारण मानव उसे बाह्य संसार में ढूंढ़ता है, उसका पुरुषार्थ एवं सामर्थ्य इस प्रयास में ही खप जाता है। इन्द्रियों की क्षणिक तृप्ति आग में घी डालने का काम करती है तथा अतृप्ति अग्नि को और भी तीव्र करती है। एक कामना की पूर्ति दूसरी कामना की और दूसरी तीसरी को, इस तरह अनेकों प्रकार की कामनाओं की शृंखला चल पड़ती है। उन सभी की पूर्ति कभी नहीं हो पाती। छोटा जीवन और अनन्त कामनाएँ। ईश्वर प्रदत्त अलभ्य अनुपम जीवन कामनाओं की पूर्ति में होकर नष्ट होता है और अन्ततः पल्ले पड़ती है- अशान्ति, अतृप्ति, असन्तोष और पश्चाताप।

आन्तरिक भावों पर ध्यान दिया जा सके तो प्रतीत होगा कि आनन्द का अजस्र स्रोत अन्दर बैठा सतत् अपना प्रवाह संप्रेषित कर रहा है। वह समझते ही दुश्चिन्तन कुचेष्टाएँ समाप्त होने लगती हैं- लालसाएँ कम होने लगती तथा चेष्टाएँ अन्तर्मुखी बन जाती हैं। ऐसा आत्म बोध चेतना के उद्गम स्थल पर ही पहुँचने पर सम्भव है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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बुधवार, 27 मई 2026

‼ गतिशीलता की संजीव सरसता ‼

उस दिन लहर बड़ी निराश और दुखित बैठी थी। समुद्र उसे आगे और बिखरने के लिए कह रहा था। किन्तु वह डर रही थी। अपने आश्रयदाता के अञ्चल में छिपकर बैठे रहना ही उसे प्रिय था। वह इतने में ही सन्तुष्ट रहना चाहती थी।

समुद्र ने उसे समझाया भद्रे, आगे बढ़ो। मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं गति के साथ जुड़ा हैं। विद्रोह के बिना प्रणय की सरसता की अनुभूति कैसी होगी। शीत के अभाव में आतप का स्वाद कैसे चखा जा सकेगा?

लहर चाहती नहीं कि उसे आगे बढ़ने के झंझट में पड़ना पड़े। भविष्य न जाने कैसा होगा? इस अनिश्चितता की कल्पना उसे भयभीत कर रही थी। उसने संतृष्ण नेत्रों से अपने प्रियतम को देखा और चाहा कि उसे जहाँ का तहाँ रहने दिया।

समुद्र गम्भीर हो गया उसने कहा—देखती नहीं मेरे अन्दर कितना दर्द है जो मुझे क्षण भर चैन से नहीं बैठने देता। उस दर्द में हिस्सा बटाये बिना तुम कैसे मेरी प्रियतमा बन सकोगी? अन्तर को छूना चाहोगी तो दर्द भी तुम्हारे हिस्से में आवेगा। ज्वार−भाटों के रूप में उछलती मेरी पीड़ा में से क्या तुम लहराती हलचल जितना हिस्सा भी नहीं बटा सकोगी? प्रेम के साथ क्या मेरा दर्द भी अंगीकार न करोगी?

लहर युवक रही थी। अतीत की सरसता और आगत की अनिश्चितता के बीच वह असमंजस में खड़ी थी—उस स्तब्धता को तोड़ती हुई आगे वाली लहरें हंस पड़ी और बोलीं—सहेली हमें देखो न, उद्गम से बिछुड़ कर ही तो हम भी अनन्त की ओर जा रही है, अपने प्रियतम की महानता के अंतर्गत ही तो क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं—हम उससे बिछुड़ी कहाँ हैं। सीमित से असीम बनकर हमने प्रणय की सरसता को खोया कहाँ बढ़ाया ही तो है। फिर तु क्यों डरती हो। चर्चा बड़ी मधुर थी। सो उसे सुनकर सूर्य की किरणें भी ठिठक गई। प्रौढ़ाओं के समर्थन में सिर हिलाते हुए उनने भी कहा—हमें अपने प्रियतम की विशालता में विचरण करते हुए, तब की अपेक्षा अब अधिक उल्लास है जब हम निकटता की निष्क्रियता को जकड़े बैठी थीं।

प्रसंग पूरा नहीं हो पाया था कि महकती गन्ध सी वहीं आ पहुँची और बोली पुष्प की गरिमा के सुविस्तृत क्षेत्र को बढ़ाती हुई हम बिछुड़न का नहीं पुलकन का अनुभव करती हैं फिर छोटी सहेली—तुम्हीं क्यों कर रुक बैठने के लिए मचल रही हो।

समुद्र इस दोष चर्चा को मनोयोग पूर्वक शान्त चित से सुन रहा था। इतने में इन्द्र ने द्वार खटखटाया और कहा—चलने में विलंब न करो। प्यारी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से बैठी है।

सागर सकपका कर उठ खड़ा हुआ। गेध का वाहन तैयार था। भाव बनकर वरुण ने उस पर आसन जमाया और इन्द्र के इशारे पर सुदूर यात्रा पर चल पड़ा।
नवोढ़ने संतृष्ण नेत्रों से देखा और पूछा—मेरे आश्रय दाता, क्या तुम्हें भी वियोग सहना पड़ता है—क्या बिछुड़न तुम्हारा भी पीछा नहीं छोड़ती।

सागर की आंखें छलक पड़ी। उसने कहा—भद्रे, यह बिछुड़न नहीं—नवीनीकरण है। जीवन इसी का नाम है। मैं मेघ बनकर आकाश में गमन करता हूँ और सरिताओं की जल राशि बनकर फिर वापिस लौट आता हूँ। इस गतिशीलता से किसी जीवित को छुटकारा नहीं। गमन का परित्याग करने पर तो मरण ही हाथ रह जायगा। सड़ना मुझे कब सुहाता है— कल्याणी।

लहर की आंखें खुल गई उसने चलना आरम्भ कर दिया।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 मन को दुर्बल न बनने दें (अंतिम भाग)

निर्बल मन वाला व्यक्ति स्वभावतः निराशावादी होता है। उसे पग-पग पर अनर्थ ही दिखाई देता हैं। साधारण सी बीमारी-जैसे सर्दी-जुकाम खाँसी या बुखार आ...