शुक्रवार, 29 मई 2026

👉 “सर्वस्या उन्नतेर्मूलं महताँ संग उच्यते”

पारस के संपर्क में आने पर लोहे का टुकड़ा भी सोना बन जाता है। चन्दन वृक्ष की समीपस्थ झाड़ियां भी सुगन्ध से ओत-प्रोत होती पायी जाती हैं। संपर्क सान्निध्य एवं वातावरण का प्रभाव व्यक्ति को आमूल-चूल बदलकर उसे कहीं से कहीं पहुँचा देता है। ऐसी कई साक्षियाँ हैं जो बताती हैं कि जिन्होंने महामानवों का पल्ला पकड़ा, उनकी दी हुई शिक्षा पर चले तथा उनके संपर्क में रहकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव को वैसा ही बनाने का प्रयास किया तो वे भी उसी राजमार्ग पर चल पड़े। शक्तिपात या कुण्डलिनी जागरण होता है अथवा नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से तो कहा नहीं जा सकता, पर तथ्य एवं प्रमाण बताते हैं कि श्रेष्ठ सान्निध्य का प्रभाव इससे कम नहीं होता।

समर्थ गुरु रामदास को योग्य शिष्य की तलाश थी तथा शिवाजी को एक छत्रछाया की। वह सब उन्हें मिला। साथ में मिला समयानुकूल प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं मुगलों से जूझने हेतु शस्त्र विद्या का शिक्षण। अपने गुरु का दामन पकड़ कर वे छत्रपति बन गए और संस्कृति के रक्षक कहलाए। रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य ने विवेकानन्द को अल्पायु में ही विश्व बंधु सन्त बना दिया तथा प्रज्ञा चक्षु विरजानन्द जी के मार्गदर्शन ने सत्य की खोज में भटक रहे मूलशंकर को आर्य समाज का संस्थापक कुरीतियों से जूझने वाला एक प्रखर संन्यासी दयानन्द। बुन्देलखण्ड के राजा छत्रसाल को यदि स्वामी प्राणनाथ न मिले होते तो वे सम्भवतः उतने प्रखर पुरुषार्थी न बन पाते। यह सब चमत्कार उसी सान्निध्य का है जिसकी यशोगाथा गुरु शिष्य परंपरा में हमेशा से गायी जाती रही है।

इसी क्रम में सहज ही हमें एक सौम्य सरल एवं कार्य कुशल व्यक्ति की याद हो आती है जिसे बापू का सान्निध्य मिला, जो चम्पारन के एक साधारण से किसान से स्वतन्त्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति बना। बाबू राजेन्द्र प्रसाद को कौन नहीं जानता। पर कम को ही विदित है कि इस पद तक पहुँचने के पूर्व उन्हें समर्पण सेवा लगन की कितनी कड़ी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के संपर्क में अनेकानेक व्यक्तियों में से कइयों ने अपने त्याग-बलिदान के बदले स्वतन्त्र राष्ट्र में उच्च पद पाए। किसी के भी समर्पण की परस्पर तुलना कर पाना सम्भव नहीं। नेहरू अधिक त्यागी थे अथवा पटेल, मौलाना आजाद अथवा राजाजी। प्रश्न इस बात का नहीं। परन्तु जैसा बापू चाहते थे वैसा ही सीधे सादे स्तर पर बने रहकर यदि किसी ने महान बनने का प्रयास किया है तो उसमें राजेन्द्रबाबू का नाम बड़े श्रद्धा से लिया जाता है, लिया जाता रहेगा।

इतिहास साक्षी है कि राजेन्द्रबाबू उसके बाद बिना श्रेय की कामना के कई बार जेल गए लेकिन अंग्रेजों के नीली कोठी वाले साहबों के प्रयासों को कभी सफल नहीं होने दिया। चम्पारन के आन्दोलन को राष्ट्रीयता स्वतन्त्रता के रूप में 1947 में हुए उपसंहार की भूमिका माना जा सकता है। दृष्टा गाँधी ने जैसा कहा था, वही हुआ। इस संपर्क वार्तालाप के ठीक 29 वर्ष बाद भारत को स्वतन्त्रता मिली और विदेशियों के हाथ से सत्ता का हस्तान्तरण सर्वप्रथम संविधान सभा के अध्यक्ष श्री राजेन्द्रबाबू के हाथों में हुआ।

बिहार का एक सीधा-सादा यह किसान अपनी लगन कर्मठता एवं समर्पण के कारण ही उस उच्चतम पद को विभूषित कर सकने में समर्थ हुआ, जिसे स्वतन्त्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति नाम दिया गया। पद लिप्सा से कोसों दूर, सादगी की प्रतिमूर्ति राजेन्द्रबाबू जब तक जीवित रहे, इसी सिद्धांत की बानगी बने रहे कि श्रेष्ठ सान्निध्य एवं गुण ,कर्म, स्वभाव के परिष्कार से व्यक्ति महामानव बन सकता है। यही है वह चमत्कार जिसकी कामना तो लोग करते हैं, पुरुषार्थ नहीं करते।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1983

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👉 समुन्नत बनें ताकि सुविकसित रह सकें

इस संसार में पाने योग्य बहुत कुछ है, पर वह सब उनके लिए सुरक्षित है जो बलवान हैं। बल की उपासना करने के बाद ही अन्य देवताओं की आराधना में सफलता मिल सकती है।

हर वस्तु को मूल्य चुका कर लिया जाय, इस दुनिया के बाजार में यही नियम है। अधिकारियों की भर्ती होती रहती है पर उनमें लिए वे ही जाते हैं जो प्रामाणिकता एवं पात्रता सिद्ध कर सकते हैं। खाली हाथ निकले तो खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा। बाजार में कितने ही मूल्यवान पदार्थ भले ही पड़े हों पर खाली हाथ व्यक्ति के लिए कुछ भी प्राप्त कर सकने का द्वार बन्द ही रहेगा।

सफलताओं के रंगीन सपने देखने में जितनी कल्पना शक्ति का प्रयोग किया जाता है उतना ही यदि इस तथ्य पर विचार करें कि अपनी योग्यता किस प्रकार बढ़े और अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने योग्य क्षमता का अभिवर्धन कैसे हो? तो समझना चाहिए कि आकाँक्षा पूर्ति का अधिकाँश आधार बन गया। अच्छी परिस्थिति प्राप्त करने के लिए अच्छी मन स्थिति का निर्माण करना आवश्यक है। विकसित व्यक्तित्वों की पूँजी द्वारा ही इस संसार में ऐसा कुछ पाया कमाया जा सकता है जिसे महत्वपूर्ण कहा जा सके।

दुर्बलता एक अभिशाप है जिस पर हर दिशा से विपत्तियाँ टूटती हैं। प्रकृति नहीं चाहती कि उसकी श्रेष्ठ संरचना में सड़े−गले कूड़े−करकट के ढेर लगे रहें। दुर्बलता का ही दूसरा नाम कुरूपता है। हमारी आँखें उसे पसन्द नहीं करतीं फिर प्रकृति ही यह क्यों स्वीकार करेगी कि इस संसार में उस कूड़े−करकट के ढेर लगे रहें जो आन्तरिक समर्थता का मूल्य नहीं समझते और बाहर की उपलब्धियों की आकाँक्षा से उद्विग्न रहकर संसार में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। आलसी और अकर्मण्य के लिए संकटों और अभावों से छुटकारे का कोई उपाय नहीं। जो अपनी उपेक्षा करता है उसे हर दिशा से उपेक्षा और तिरस्कृत ही हाथ लगती है।

दुर्बल शरीर को नई−नई किस्म की बीमारियाँ दबोचती हैं। डरपोक को डराने के लिए जीवित ही नहीं मृतक भी भूत−पलीत बनकर ढूंढ़ते−खोजते आ पहुँचते हैं। आततायियों को अपनी शिकार पकड़ने के लिए कायरों की तलाश करनी पड़ती है। शंकाशील लोगों को बिल्ली भी रास्ता काटकर डरा देती है। अरबों, खरबों मील दूर रहने वाले ग्रह−नक्षत्र भी अपनी प्रकोप मुद्रा उन्हीं को दिखाते हैं जिन्हें अकारण भयभीत होने में मजा आता है। अन्यथा वे बेचारे व्यक्ति विशेष का बिगाड़ उपकार करना उनके बस से सर्वथा बाहर की बात है। दुर्बलताग्रसित व्यक्ति वस्तुतः अपने आपसे ही डरता है, उसकी भय−भीरुता देखकर दूसरे विदूषक भी चिढ़ाने का मजा लेने के लिए आ धमकते हैं।

अपनी दुर्बलताओं को खोजें, उनसे घृणा करें और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए जुट जाँय। समर्थता की उपासना करें। शरीर को बलवान बनाने की योजना बनायें और मन में जमे हुए भीरुता के समस्त आधारों को निरस्त कर दें। प्रगति का आरम्भ भीतर से करें ताकि उस अन्तः भूमि में उगाये अंकुर को समुन्नत व्यक्तित्व एवं वैभव के रूप में सुविकसित देखा जा सके।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1974

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2026


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गुरुवार, 28 मई 2026

‼ देवी प्रतिशोध ‼

सूर्यास्त के बाद —अन्धकार घना होता जा रहा था। अरब की मरुभूमि में रातें भी बड़ी भयावह लगा करती हैं। ऐसे ही रेतीले सुनसान स्थान पर यात्री को एक झोंपड़ी दिखाई दी। जिसमें कोई व्यक्ति गीत गा रहा था। यात्री एक क्षण को रुका और गीत के बोल सुनने लगा।

यात्री को झोंपड़ी में रहने वाले वृद्ध पुरुष की आकृति जानी-पहचानी लगी। स्मृतियाँ उघड़ती गयीं और उसे याद आया कि इस व्यक्ति से उनका निकटतम सम्बन्ध रह चुका है। झोंपड़ी में रहने वाला वृद्ध व्यक्ति युसुफ के नाम से जाना जाता था। यात्री ने युसुफ से कहा—मैं समाज द्वारा बहिष्कृत एक पापी हूँ। सभी ने मुझे अषम कहकर मेरा परित्याग कर दिया। राज कर्मचारी मुझे पकड़ कर दण्डित करने के लिए मेरा पीछा कर रहें है। आज की रात आपके घर में गुजारने का मौका मिल जाय तो बड़ी दया होगी। युसूफ आप तो अपनी दया के लिये संसार भर में प्रसिद्ध है।

युसूफ ने बड़ी विनम्रता पूर्वक कहा—भद्र पुरुष यह घर मेरा नहीं उस परमात्मा का ही है। इसमें तुम्हारा भी उतना ही अधिकार है जितना कि मेरा। मैं तो इस देह का भी स्वामी नहीं हूँ, यह भी एक धर्मशाला है। तुम प्रसन्नता पूर्वक जी चाहे जब तक यहाँ रहो।’

वह अन्दर खाना लाने के लिए चला गया। अभ्यागत को भरपेट भोजन करवा कर सोने के लिए बिस्तर लगा दिया और बिना परिचय पूछे ही सो जाने के लिए कहा।

प्रातःकाल हुआ। पूर्व दिशा में अरुणिमा फैलने लगी और पक्षियों का कलरव गूँजने लगा। युसुफ उठ गये थे और नहा-धोकर अतिथि के जागने का इन्तजार कर करे रहे थे। उधर अतिथि कई दिनों का हारा थका होने के कारण चैन की नींदें ले रहा था। युसुफ अतिथि के पास गये और धीरे से जगा कर बोले—”उठो भाई—सूरज उग आया है। तुम्हारी सुविधा के लिये मैं थोड़ा-बहुत लाया हूँ उसे लेकर मेरे द्रुतगामी घोड़े पर सवार होकर दूर चले जाना ताकि तुम अपने शत्रुओं की पहुँच से बाहर निकल सको।”

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास: भगवान को अपने जीवन में बुलाने का मंत्र: भाग 2, https://youtu.be/dv8jnOBZ5K8?si=9aWQB8n5JAbhCQLO

इस सत्पुरुष के मुखमण्डल पर हार्दिक पवित्रता ‘शीतल’ रजनी चन्द्रिका की भाँति फैली हुई थी। उनके शब्द जैसे अन्तःकरण से निकल कर आ रहें थे तभी तो उनका व्यवहार इतना दिव्य बन पड़ा था। इस दिव्य व्यवहार के प्रभाव स्वरूप की आगन्तुक के हृदय में भी पवित्र और सात्विक विचारों का प्रवाह बहने लगा था। अतिथि को अपना पूरा विगत स्मृत हो आया और लगा कि पाप पूर्ण प्रवृत्तियों की कालिमा पश्चाताप के रसायन से स्वच्छ होती जा रही हैं और उनके स्थान पर निर्मल भावों की तरंगें उठने लगी हैं।
पृथ्वी पर घुटने टेक युसुफ के चरणों में झुक कर अतिथि ने कहा—’हे शेख! आपने मुझे शरण दी, भोजन दिया, शान्ति दी और पवित्रता भी दी अब आपके प्रति कृतज्ञता के लिये क्या कहूँ?”

‘मैं कैसे कहूँ कि यह उपकार पापी इब्राहिम के लिए किया है जो आपके बड़े पुत्र का हत्यारा है। हमारे कबीलों में हत्यारे का शिरच्छेद कर ही मृतात्माओं शाँति पहुँचायी जाती है, आप भी उसी परम्परा का पालन कीजिए।’

इब्राहिम यह कहकर मौन हो गया। परन्तु युसुफ ने तो उसे भगाने में और भी जल्दी की क्योंकि वे डरने लगे थे—अपने आप से कि कहीं अपने पुत्र के हत्यारे का वध करने के लिए पाशविक प्रतिशोध न जाग पड़े।” वे बोले-तब तो तुम और भी जल्दी चले जाओ। कहीं मैं प्रतिशोध के कारण कर्त्तव्य भ्रष्ट न हो जाऊँ।

इब्राहिम चला गया और युसुफ ने अपने दिवंगत पुत्र को सम्बोधित करते हुए कहा—मैं तेरे लिये दिन-रात तड़पता रहा हूँ। आज मैंने तेरा बदला ले लिया है। तेरे हत्यारे की नृशंसभावना पश्चात्ताप की अग्नि में जलकर नष्ट हो गयी हैं और उसका हृदय पवित्र हो गया है। अब तू शान्ति की चिरनिद्रा में सो जा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (अंतिम भाग)

आनन्द का केन्द्र बिन्दु अन्तरात्मा है। वह चैतन्य गतिविधियों का प्रेरणा स्थल भी है। पर चेतना की यह विशेषता होती है कि वह जड़ वस्तुओं में अधिक समय तक नहीं टिक सकती। जब तक उसका प्रकाश-आनन्द की किरणें वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा विषयों पर पड़ती है, तब तक वे आकर्षक लगती है। जैसे ही किरणें सिमटती हैं, वह दृश्यमान सौंदर्य लुप्त हो जाता है। वस्तुतः अन्तरात्मा से निकली भाव तरंगें दृश्य संसार तथा उससे सम्बद्ध वस्तुओं में अपने उद्गम स्थल की खोज करती हैं। बाहर वह नहीं मिलता। अतृप्ति मिटाने के लिए वह साँसारिक चीजों का सहारा लेती है। मिटने के स्थान पर वह और भी बढ़ती है तथा उसकी स्थिति उस प्यासे व्यक्ति की तरह होती है जो पानी की तलाश में निकलता है, पर मदिरालय पहुँच कर मद्यपान में अपना होश-हवाश गवाँ बैठता है। शराबी की तरह ही हालत जीवात्मा की हो जाती है जो सदा अतृप्त बनी आकुल व्याकुल रहती है।

यह एक विडम्बना ही है कि जीव स्वयं आनन्द का स्रोत होते हुए भी जीवन पर्यन्त उस अमृतत्व से वंचित रहता है। खेल खिलौने, भोग विलास, इच्छाओं आकाँक्षाओं, ऐषणाओं की पूर्ति में बचपन, किशोरावस्था युवावस्था प्रौढ़ावस्था खप जाती है, जब वृद्धावस्था में मनुष्य हाथ मलता रह जाता है। व्यतीत हुए भूतकाल के जीवन को स्मरण करके हर व्यक्ति की अंतर्व्यथा जेम्स एलन की भाँति मूक रूप में प्रस्फुटित होती है- “मैंने साँसारिक जीवन एवं उससे जुड़ी वस्तुओं में आनन्द की खोज का प्रयास किया किन्तु वह नहीं मिल सका। विद्याभ्यास किया- ऐश आराम के साधन जुटाये, श्रेय सम्मान अर्जित किया, पर अशान्ति बढ़ती ही गयी। मैंने दर्शनों का अनुशीलन किया किन्तु मेरा हृदय अहंभाव से विदग्ध हो गया तब पहली बार मुझे अनुभव हुआ है, कि शान्ति एवं आनन्द का केन्द्र बाहर नहीं भीतर है।”

ऐसी व्यथा-वेदना की अनुभूति हर व्यक्ति को कभी व कभी अवश्य होती है। जिसकी अभिव्यक्ति विभिन्न व्यक्तियों में अलग-अलग प्रकार को होती है। यह एक ऐसा अभाव है जिसकी आपूर्ति भौतिक वस्तुओं, विषयों अथवा भौतिक ज्ञान द्वारा नहीं हो सकती। वे मनुष्य के अन्तराल को तृप्त नहीं कर सकतीं। अन्तराल में इस पीड़ा का होना इस शाश्वत तथ्य की परिचायक है कि शाश्वत आनन्द की प्राप्ति जीव की प्रमुख माँग है। उसे पाने की उत्कंठा भी उसमें प्रबल है। भीतर की यह आकाँक्षा और उत्कंठा उस दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिए के लिए सतत् प्रेरित करती रहती है। दृष्टि बहुमुखी होने के कारण मानव उसे बाह्य संसार में ढूंढ़ता है, उसका पुरुषार्थ एवं सामर्थ्य इस प्रयास में ही खप जाता है। इन्द्रियों की क्षणिक तृप्ति आग में घी डालने का काम करती है तथा अतृप्ति अग्नि को और भी तीव्र करती है। एक कामना की पूर्ति दूसरी कामना की और दूसरी तीसरी को, इस तरह अनेकों प्रकार की कामनाओं की शृंखला चल पड़ती है। उन सभी की पूर्ति कभी नहीं हो पाती। छोटा जीवन और अनन्त कामनाएँ। ईश्वर प्रदत्त अलभ्य अनुपम जीवन कामनाओं की पूर्ति में होकर नष्ट होता है और अन्ततः पल्ले पड़ती है- अशान्ति, अतृप्ति, असन्तोष और पश्चाताप।

आन्तरिक भावों पर ध्यान दिया जा सके तो प्रतीत होगा कि आनन्द का अजस्र स्रोत अन्दर बैठा सतत् अपना प्रवाह संप्रेषित कर रहा है। वह समझते ही दुश्चिन्तन कुचेष्टाएँ समाप्त होने लगती हैं- लालसाएँ कम होने लगती तथा चेष्टाएँ अन्तर्मुखी बन जाती हैं। ऐसा आत्म बोध चेतना के उद्गम स्थल पर ही पहुँचने पर सम्भव है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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बुधवार, 27 मई 2026

‼ गतिशीलता की संजीव सरसता ‼

उस दिन लहर बड़ी निराश और दुखित बैठी थी। समुद्र उसे आगे और बिखरने के लिए कह रहा था। किन्तु वह डर रही थी। अपने आश्रयदाता के अञ्चल में छिपकर बैठे रहना ही उसे प्रिय था। वह इतने में ही सन्तुष्ट रहना चाहती थी।

समुद्र ने उसे समझाया भद्रे, आगे बढ़ो। मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं गति के साथ जुड़ा हैं। विद्रोह के बिना प्रणय की सरसता की अनुभूति कैसी होगी। शीत के अभाव में आतप का स्वाद कैसे चखा जा सकेगा?

लहर चाहती नहीं कि उसे आगे बढ़ने के झंझट में पड़ना पड़े। भविष्य न जाने कैसा होगा? इस अनिश्चितता की कल्पना उसे भयभीत कर रही थी। उसने संतृष्ण नेत्रों से अपने प्रियतम को देखा और चाहा कि उसे जहाँ का तहाँ रहने दिया।

समुद्र गम्भीर हो गया उसने कहा—देखती नहीं मेरे अन्दर कितना दर्द है जो मुझे क्षण भर चैन से नहीं बैठने देता। उस दर्द में हिस्सा बटाये बिना तुम कैसे मेरी प्रियतमा बन सकोगी? अन्तर को छूना चाहोगी तो दर्द भी तुम्हारे हिस्से में आवेगा। ज्वार−भाटों के रूप में उछलती मेरी पीड़ा में से क्या तुम लहराती हलचल जितना हिस्सा भी नहीं बटा सकोगी? प्रेम के साथ क्या मेरा दर्द भी अंगीकार न करोगी?

लहर युवक रही थी। अतीत की सरसता और आगत की अनिश्चितता के बीच वह असमंजस में खड़ी थी—उस स्तब्धता को तोड़ती हुई आगे वाली लहरें हंस पड़ी और बोलीं—सहेली हमें देखो न, उद्गम से बिछुड़ कर ही तो हम भी अनन्त की ओर जा रही है, अपने प्रियतम की महानता के अंतर्गत ही तो क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं—हम उससे बिछुड़ी कहाँ हैं। सीमित से असीम बनकर हमने प्रणय की सरसता को खोया कहाँ बढ़ाया ही तो है। फिर तु क्यों डरती हो। चर्चा बड़ी मधुर थी। सो उसे सुनकर सूर्य की किरणें भी ठिठक गई। प्रौढ़ाओं के समर्थन में सिर हिलाते हुए उनने भी कहा—हमें अपने प्रियतम की विशालता में विचरण करते हुए, तब की अपेक्षा अब अधिक उल्लास है जब हम निकटता की निष्क्रियता को जकड़े बैठी थीं।

प्रसंग पूरा नहीं हो पाया था कि महकती गन्ध सी वहीं आ पहुँची और बोली पुष्प की गरिमा के सुविस्तृत क्षेत्र को बढ़ाती हुई हम बिछुड़न का नहीं पुलकन का अनुभव करती हैं फिर छोटी सहेली—तुम्हीं क्यों कर रुक बैठने के लिए मचल रही हो।

समुद्र इस दोष चर्चा को मनोयोग पूर्वक शान्त चित से सुन रहा था। इतने में इन्द्र ने द्वार खटखटाया और कहा—चलने में विलंब न करो। प्यारी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से बैठी है।

सागर सकपका कर उठ खड़ा हुआ। गेध का वाहन तैयार था। भाव बनकर वरुण ने उस पर आसन जमाया और इन्द्र के इशारे पर सुदूर यात्रा पर चल पड़ा।
नवोढ़ने संतृष्ण नेत्रों से देखा और पूछा—मेरे आश्रय दाता, क्या तुम्हें भी वियोग सहना पड़ता है—क्या बिछुड़न तुम्हारा भी पीछा नहीं छोड़ती।

सागर की आंखें छलक पड़ी। उसने कहा—भद्रे, यह बिछुड़न नहीं—नवीनीकरण है। जीवन इसी का नाम है। मैं मेघ बनकर आकाश में गमन करता हूँ और सरिताओं की जल राशि बनकर फिर वापिस लौट आता हूँ। इस गतिशीलता से किसी जीवित को छुटकारा नहीं। गमन का परित्याग करने पर तो मरण ही हाथ रह जायगा। सड़ना मुझे कब सुहाता है— कल्याणी।

लहर की आंखें खुल गई उसने चलना आरम्भ कर दिया।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 3)

बाह्य संसार में आनन्द प्राप्ति के लिए मनुष्य भटकता रहता है, वह इस बात का परिचायक है कि शाश्वत सुख की अनुभूति उसके जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए वह एक तरह का माध्यम ढूंढ़ता है तो कभी दूसरे प्रकार का। व्यक्ति के सुख का केन्द्र सदा बदलता रहता है। शैशव कोख माँ की गोद में, बाल्यावस्था खिलौने में, छात्र जीवन पुस्तकों में, यौवन पत्नी तथा धन संचय में, गृहस्थाश्रम पुत्र मोह में, यश प्राप्ति में नियोजित रहता है। गम्भीरता से विचार करने पर पता चलता है कि जिन भौतिक चीजों से आनन्द प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है वे पदार्थ वस्तुतः आनन्द से रहित हैं। यदि आनन्द होता तो मन सदा उनमें लीन रहता, पर आनन्द प्राप्ति के केन्द्र सतत् बदलते रहना इस बात का प्रमाण है कि यह विशेषता उन भौतिक वस्तुओं में नहीं है।

सुख एवं आनन्द का केन्द्र भीतर है- बाहर नहीं। आनन्द की भावना मनुष्य की अन्तरात्मा में विद्यमान है। यह भाव ही विभिन्न वस्तुओं में आरोपित होकर हमें आनंददायक प्रतीत होता है। इसी कारण भ्रमवश लोग वस्तुओं को ही आनन्द का हेतु समझ लेने की भूल कर बैठते हैं। भ्रमवश विभिन्न वस्तुओं में उसे ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं। फलस्वरूप असफलता ही हाथ लगती है। यह स्थिति उस हिरन जैसी ही है जो कस्तूरी की गंध से मोहित होकर उसे बाहर तो खोजता है पर भीतर नहीं झाँकता।

आनन्द आत्मा का शाश्वत गुण है। वही भीतर बैठा आनन्द प्राप्ति का भाव सम्प्रेषित करता तथा अपनी आनन्दमय स्थिति का भान कराता है। इन्द्रियों की बनावट बहिर्मुखी है। अन्तर्मुखी होकर मूल केन्द्र को तलाशने की अपेक्षा वे बाहर की ओर चंचल रहती हैं। साँसारिक आकर्षणों में वे सुख और आनन्द खोजती हैं- उन्हें ही सुख का आधार मान लेती हैं।

आनन्द की प्रतिच्छाया भावों के रूप में आरोपित होकर जड़ वस्तुओं तक को आकर्षक बना देती हैं। जबकि उनमें अपना कोई आकर्षण नहीं होता और न ही आनन्द। लुभाने दृश्य तथा संसार वही रहते हैं। समग्र इन्द्रियों से युक्त काया का स्वरूप भी नष्ट नहीं होता, पर चैतन्य आत्मा के शरीर से निकलते ही सब खेल समाप्त हो जाता है। कहीं कोई आकर्षण नहीं दीख पड़ता। जड़ काया के भीतर विद्यमान अन्तरात्मा की सौंदर्य प्रवाह किरणें ही वस्तुओं पर पड़कर सुन्दरता का आभास कराती हैं। दर्पण में दिखायी पड़ने वाली मुखाकृति की प्रतिच्छाया को देखकर दर्पण की सराहना की जाय तथा सुन्दर मुखाकृति का कारण दर्पण को माना जाय तो यह मान्यता अविवेकपूर्ण ही होगी। प्रतिच्छाया से आनन्द प्राप्ति का भ्रमपूर्ण प्रयास असफल ही सिद्ध होगा।

विषयों में कर्मेंद्रियां, ज्ञानेन्द्रियाँ रमण करती- कुछ क्षणों के लिए आनन्द की अनुभूति करती हैं। पर उनकी वे विशेषताएँ तब तक ही रहती हैं जब तक कि आत्मा काया में निवास करती है। इन्द्रियाँ उसी से गति एवं सामर्थ्य प्राप्त करती हैं। उनकी विभिन्न तरह की क्षमताएँ आत्मशक्ति का ही अनुदान हैं। रंग, रूप गंध स्पर्श स्वाद आदि कायिक अनुभूतियों से लेकर प्रसन्नता, प्रफुल्लता, उत्साह, उमंग आदि की मानसिक विशेषताएँ तक उस आन्तरिक चेतन शक्ति की ही प्रतिच्छाया है। शरीर एवं मन में जुड़ी हुई विभिन्न इन्द्रियाँ काय-कलेवर में आत्मसत्ता के बने रहने से ही पदार्थों, दृश्यों एवं विषयों में आत्मसत्ता के बने रहने से ही पदार्थों, दृश्यों एवं विषयों में सुख की अनुभूति कर पाती हैं। ऐसे सुख की जो क्षणिक, अस्थायी और अतृप्ति को और भी अधिक बढ़ाने वाला है। आत्मा के शरीर छोड़ते ही इन्द्रियाँ किसी प्रकार की अनुभूति नहीं कर पाती। पार्थिव शरीर मिट्टी तुल्य हो जाता है, उसे गाढ़ने-दफनाने-जलाने की तुरन्त बात सोची जाती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (अंतिम भाग)

शारीरिक पुण्य पापों की तरह मानसिक पुण्य पापों की चर्चा धर्मशास्त्रों में मिलती है और उनके अनेक भले बुरे परिणाम होने की बात भी कही जाती है। इस प्रतिपादन में ठोस तथ्य है। कहा जा चुका है कि हमारा चिन्तन परोक्ष रूप से सारे विश्व को प्रभावित करता है, ऐसी दशा में हमारे क्रिया-कलापों द्वारा न सही, विचारों द्वारा ही कुछ क्षति पहुंचाई गई अथवा सेवा सहायता की गई तो उसका भला-बुरा परिणाम हमें निश्चित रूप से मिलना चाहिए और वह मिलता है। शारीरिक पुण्य-पापों का अपना महत्व है, लेकिन मानसिक पुण्य-पापों को भी काल्पनिक, नगण्य, निरर्थक या विनोद कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। जब उनका प्रभाव होता है तो परिणाम क्यों नहीं मिलेगा?

जब चाहे जैसी कल्पनाएँ करने के लिए हर कोई स्वतन्त्र है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि यह कोई निरर्थक मनोविनोद मात्र है। विचारों की शक्ति और उनका महत्व आग या बिजली की तरह है। उनके साथ मखौलबाजी करना खतरनाक है। दुष्टता और दुराचार की कल्पना भर करते रहें, योजना भर बनाते रहें, उसी स्तर के सजातीय विचार चारों ओर से दौड़ पड़ेंगे और मस्तिष्क पर हावी हो जायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि हमारे प्रादुर्भूत विचार अनेक गुनी शक्ति सामर्थ्य से भर जायेंगे तथा उनके अच्छे-बुरे परिणाम सामने आ उपस्थित होंगे। यदि कोई व्यक्ति बुरे विचारों में निमग्न है तो स्वभावतः उस बुराई की अगणित प्रेरणाएँ योजनाएँ उसके मस्तिष्क के सामने आती चली जायेंगी और उसका मन क्रमशः उसके लिए प्रशिशित होता चला जाएगा।

कहा जा चुका है कि विचारशक्ति को विद्युत शक्ति जैसे अणु शक्ति जैसी- प्रचण्ड सामर्थ्य का माना जाना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए कि उसका सही सदुपयोग क्या हो सकता है? अपने पास धन सम्पत्ति हो तो उसका ऐसे ही निरर्थक कार्यों में कोई अपव्यय नहीं करता है। धन की बर्बादी करने से लोग क्षतिग्रस्त होते, नुकसान उठाते और उपहासास्पद बनते हैं। यही तथ्य विचारों की सम्पदा पर भी लागू होना चाहिए। जिन विचारों को अपनाया गया है वे प्रेरणाप्रद बनते हैं और अन्ततः अपनी ही दिशा में काम करने के लिए किया शक्ति को सहमत तथा तत्पर कर लेते हैं। अवाँछनीय विचारों को मस्तिष्क में स्थान देने और उन्हें वहाँ जड़े जमाने देने का अर्थ है भविष्य में हम उसी तरह का जीवन जीने की तैयारी कर रहे हैं। भले ही यह सब अनायास या अनपेक्षित रीति से हो रहा है, परन्तु उसका परिणाम तो होगा ही। उचित यही है कि हम उपयुक्त और रचनात्मक विचारों को ही मस्तिष्क में प्रवेश करने दें। यदि उपयोगी और विधायक विचारों का आह्वान करने और उन्हें अपनाने का स्वभाव बना लिया जाए तो निस्सन्देह प्रगति पथ पर बढ़ चलने की सम्भावनाएँ आश्चर्यजनक गति से विकसित हो सकती हैं।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 27 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2026


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मंगलवार, 26 मई 2026

👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 2)

बचपन में जो खिलौनों से चिपका रहता था अपना भविष्य बनाने में जी तोड़ परिश्रम करता है। उसकी प्रसन्नता इस बात में सन्निहित रहती है कि वैसे अधिक से अधिक योग्यता सम्पादित की जाय। सन्तुष्टि इस आकाँक्षा की पूर्ति से भी नहीं होती। एक की आपूर्ति दूसरे तरह की इच्छा को जन्म देती है। वयस्क होते ही अनुकूल साथी जीवन संगिनी की खोज चलती है। मिलते ही पत्नी के यौवन, रूप और लावण्य पर वह मुग्ध बना आनन्द की अनुभूति करता है। किन्तु यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं रहने पाती। शरीराकर्षण कुछ ही दिनों बाद समाप्त हो जाता है। तब तक प्रजनन का दौर चल पड़ता है।

नवागन्तुक शिशु प्रसन्नता का नवीन केन्द्र बिन्दु बनता है। उनकी किलकारियाँ सुनकर वह बड़े से बड़ा दुःख भी भूल जाता है। उसकी एक मुस्कान के लिए अपना सर्वस्व लुटाने के लिए मनुष्य तैयार रहता है। पर धीरे-धीरे वह आकर्षण भी कम होने लगा है जिससे प्रेरित होकर मानव बच्चे के लिए कष्ट उठाने के लिए तत्पर रहता था।
धनोपार्जन, संपदा संग्रह तथा लोकयश पाने की आकाँक्षा पूर्ति में वह अब सुख आनन्द ढूँढ़ने लगता है। तद्नुरूप प्रयासों का ताना बाना बुनता है। वह सब मिलने के बाद भी संतोष नहीं होता। अतृप्त और अशांत मनःस्थिति पुनः नये तरह के खेल खिलौने- मन बहलाने के साधन ढूंढ़ती है। सम्पूर्ण जीवन तो इन बाह्य प्रयासों में खप जाता है। जिसका मनुष्य आनन्द पाने का प्रयत्न करता है उतना ही वह उससे दूर होता चला जाता है।

हर मनुष्य की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। परस्पर एक दूसरे की अभिरुचियाँ भी भिन्न होती हैं। एक को एक तरह के काम में आनन्द आता है दूसरे को भिन्न प्रकार के काम में। स्वास्थ्य, धन, ऐश्वर्य, यश, सम्मान योग्यता की प्राप्ति में अधिकाँश व्यक्ति जीवन खपाते और तद्नुरूप सफलता मिलने पर मोद मनाते हैं। पर वह प्रसन्नता भी चिरस्थायी नहीं होती। कुछ ऐसे भी होते हैं जो समाज के ढर्रे से अलग हटकर अपना मार्ग चुनते हैं। वे असामान्य दुस्साहस का परिचय देते तथा ऐसे काम कर गुजरते हैं जिन्हें देखकर दांतों तले उंगली दवानी पड़ती है। जीवन के धनी व्यक्तियों को संकटों से युक्त कार्यों को करने में ही आनन्द आता है। कुछ व्यक्तियों की मनःस्थिति विकृत स्तर की बन जाती है। निकृष्ट कामों में ही उन्हें रस आता है। व्यसनी शराब के प्याले में आनन्द देखता और ढूंढ़ता है- उसी में डूबा रहता और अपना सर्वस्व गँवाता है। कामी कामतृप्ति की क्षणिक रसानुभूति में अपने शरीर को गलाता- मनःशक्ति को क्षीण करता रहता है। क्रूर आततायियों को जघन्य अपराधों को करने में प्रसन्नता होती है। दूसरों को रोते-कलपते, पीड़ा से कराहते-तड़पते देखकर आनन्द आता है। इसकी विकृति उनसे हत्या जैसे पाप कराती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 3)

किसी तरह की भावनाएँ चिन्तन में- विचार तरंगों में- प्रखरता उत्पन्न करती हैं? एक ही शब्द में यदि इसका उत्तर देना हो तो कहना होगा- आदर्शवादी भावनाएँ। आदर्शवादी भावनाएँ ही मनुष्य को उच्च स्तर का चिन्तन करने के लिए प्रेरित करती हैं। उस स्तर का चिन्तन करने वाले चरित्रवान एवं सेवा भावी लोग अपनी तरंगों के माध्यम से समस्त विश्व को अपनी प्रखर प्रेरणाओं से लाभान्वित करते हैं, भले ही उनका वह अनुदान दूसरों को प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ता हो। यही बात दुष्ट दुरात्माओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है। वे मन ही मन दुरभि सन्धियों के कुचक्र रचते रहते हैं और इस प्रकार की भयानक विचार तरंगें छोड़ते हैं जिनके कारण अगणित दुर्बल मनोभूमि के लोग उसी प्रकार का चिन्तन आरम्भ कर देते हैं तथा कुमार्गगामिता की ओर बढ़ाने लगते हैं। पतन का एक प्रवाह ही चल पड़ता है।

समान विचार वाले लोगों को अपने स्तर के नये विचार अन्तरिक्ष में व्याप्त ईथर तत्व से मिलते रहते हैं। या कि कहना चाहिए, उन्हें वहाँ से पोषण मिलता रहता है। सजातीय तत्वों के आकर्षण का प्रकृति नियम सर्वविदित है। धातुओं के कण धूलि में बिखरे रहते हैं परन्तु जिधर इन धातुओं की खदानें होती हैं उधर ये कण धीरे-धीरे सहज ही खिसकते तथा खदान में इकट्ठे होते जाते हैं। सभी नदियाँ समुद्र की दिशा में सहज ही बहती हैं। नाले नदियों की तरफ दौड़ते हैं। विचार भी अपने सजातीय विचारों की ओर उसी तेजी से दौड़ते हैं और वहाँ अपना रंग जमाते हैं। चोरी, लबारी, जुआरी, व्यभिचारी अपनी जमात जोड़ लेते हैं तो इसका यही कारण है और सन्त सज्जनों के सत्संग जमे रहते हैं तो इसका कारण भी यही है। अर्थात् जहाँ जिस स्तर के विचार उठ रहे होंगे वहाँ उसी स्तर की अन्य लोगों द्वारा छोड़ी गई विचार तरंगें भी आकर्षित होती हैं और अपना अड्डा जमा लेती हैं।

इस तथ्य को यों भी समझा जा सकता है कि हमारा रेडियो उन्हीं प्रसारणों को पकड़ता है जिन पर उसकी सुई अड़ी होती है। उस समय अन्य रेडियो स्टेशनों से अन्य प्रसारण भी होते रहते हैं, पर हम केवल अपनी रुचि का स्टेशन और प्रोग्राम ही सुनते हैं। अन्य प्रसारण अपनी राह चले जाते हैं, अपने रेडियो यन्त्र से उन्हीं का संपर्क हो पाता है जिन्हें अपना रेडियो पकड़ता है। विचार तरंगों को भी रेडियो तरंगों का सहधर्मी-सहकर्मी माना जा सकता है। वे उठती उमड़ती हैं और सभी को स्पर्श भी करती हैं। सभी पर वे सूक्ष्म प्रवाह भी छोड़ती हैं, पर विशेष प्रवाह अपने सजातियों पर ही डालती हैं। सज्जनों का मस्तिष्कीय चुम्बकत्व प्रायः उन्हीं को आकर्षित करता है, जिनमें सज्जनता के अंकुर पहले से ही मौजूद हों। दुर्जनों के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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सोमवार, 25 मई 2026

👉 आनन्द की गंगोत्री अपने ही भीतर (भाग 1)

कस्तूरी की खोज में हिरन भटकता रहता है। वनों, कन्दराओं में वह ढूंढ़ता है, पर कहीं नहीं मिलती। जो भीतर है उसे बाहर खोजने में उसका जीवन खप जाता है। व्यर्थ की इस भाग दौड़ से उसे निराशा ही हाथ लगती है। अतृप्ति यथावत् बनी रहती है। यह बोध हो सके कि जिसे प्राप्त करने की आकुलता में वह वन एवं कन्दरा में विचरता रहता है वह उसके अपने ही भीतर विद्यमान है तो उसे तृष्णा की आग में इस तरह न जलना पड़े। उसकी निकटता प्राप्त कर मृग स्वयं परितृप्त हो जाय।

मृग ही क्यों? मनुष्य भी तो आनन्द की खोज में मृग मरीचिका की तरह जीवन पर्यन्त भटकता रहता है। आनन्द की प्राप्ति उसकी मूलभूत माँग है। बचपन से लेकर जरावस्था तक वह इस आकाँक्षा की पूर्ति में लगा रहता है। पर हिरन की भाँति दृष्टि बहिर्मुखी होने के कारण मनुष्य सोचता है कि आनन्द के स्रोत बाहर हैं। दृश्य संसार और उससे सम्बद्ध परिवर्तनशील पदार्थों के आकर्षण में वह स्थायी और शाश्वत आनन्द की खोज करता है। इन्द्रियों की तुष्टि के लिए विषय रूपी साधन जुटाता है। पर उनका उपभोग अतृप्ति की आग को और भी अधिक भड़काता और बढ़ाता है।

बचपन से लेकर वृद्धावस्था की मध्यावधि में शारीरिक एवं मानसिक स्थिति में अनेकों तरह के परिवर्तन होते हैं। उन परिवर्तनों के साथ-साथ आनन्द प्राप्ति के बाह्य साधन भी बदलते रहते हैं। शैशव अवस्था की माँग अलग प्रकार की होती है और किशोरावस्था की अलग। युवा वय की मनःस्थिति और वृद्धों की मनःस्थिति सर्वथा एक दूसरे से भिन्न प्रकार की होती है। इस कारण आनन्द प्राप्ति के बाह्य स्रोत की क्रमिक रूप से बदलते रहते हैं। नवजात शिशु माँ की छाती से चिपकता रहता है। पय पान में ही उसे सामयिक तृप्ति मिलती है। पर थोड़ा बड़ा होते ही दुग्ध पान के प्रति उसकी अभिरुचि समाप्त हो जाती है। जो कभी माँ के हृदय से चिपका रहता था, वह अब चित्र-विचित्र खिलौनों में रमण करता है। सुखानुभूति के केन्द्र बिन्दु खिलौने बनते हैं। पर यह स्थिति भी अधिक दिनों तक नहीं चलने पाती। खिलौने जो बचपन में अत्यंत ही आकर्षक मनोरंजक लगते थे किशोरावस्था में नहीं भाते। घर की सीमा से बाहर वह प्रवेश करता है। मित्रों की टोली में उसका अधिकाँश समय व्यतीत होता है। पढ़ने-खिलाने की- आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 2)

यह शक्ति कहाँ से आती है? एक ही उत्तर है, इस शक्ति का स्रोत और निवास स्थान मस्तिष्क है। निश्चित रूप से उसे जादू का पिटारा कहा जा सकता है। यद्यपि इन दिनों विलक्षण कम्प्यूटरों का निर्माण हो रहा है। इनके निर्माण से कठिन बौद्धिक कार्यों को बड़ी सरलता से सम्पादित किया जा सकता है। इस कारण इनकी बड़ी चर्चा प्रशंसा की जाती है। किन्तु मस्तिष्कीय क्रियाकलापों को देखा जाए तो उनकी तुलना में अब तक के बने सभी कम्प्यूटर आविष्कारों को न्यौछावर किया जा सकता है। यह एक ऐसा यन्त्र है जिसका तुलना का या बराबरी का दूसरा उपकरण खड़ा कर सकना कल्पना के बाहर की बात है।

प्रकृति के इस अद्भुत विलक्षण आविष्कार के क्रियाकलापों को केवल जीवनयापन सम्बन्धी गतिविधियों तक ही सीमित समझना या यह सोचना कि यह केवल सोच विचार में ही लगा रहता है और उसकी शक्ति इतने तक ही सीमित रहती है, गलत होगा। मस्तिष्कीय क्रियाकलापों का क्षेत्र इससे बहुत आगे तक व्यापक है। सूर्य जिस प्रकार निरन्तर अपना प्रकाश और ताप चारों ओर बखेरता रहता है, ठीक उसी प्रकार मानव मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा निःसृत होती रहती है। इसे विचार, संकल्प, भावना, इच्छा आदि किसी भी नाम से अथवा उसके संयुक्त सम्मिश्रण के रूप में सम्बोधित किया या पहचाना जा सकता है। इस विकिरण के द्वारा एक व्यक्ति अपने समीपवर्ती लोगों को अनजाने ही असाधारण रूप से प्रभावित करता रहता है। इसे अनन्त आकाश में भरे ईथर तत्व के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।

तालाब में ढेला फेंकने पर जिस प्रकार चारों ओर पानी की लहरें इकट्ठी होती रहती हैं, उसी तरह विश्वव्यापी ईथर महासागर में हमारे विचार अपने स्तर के प्रहार करते हैं और उनके प्रकाश ध्वनि से भी अधिक ऊँची एवं सूक्ष्म स्तर की किन्तु लगभग उसी प्रकार की तरंगें उठती हैं। वे कुछ दूर आकर ही समाप्त नहीं हो जातीं वरन् अनन्त आकाश में भ्रमण करती हुईं निकल जाती हैं। स्पष्ट है कि किसी गोलक पर सीधी यात्रा आरम्भ करने से उसका अन्त प्रारम्भ किये जाने वाले स्थान पर ही होता है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के मस्तिष्क से निकलने वाली विचार तरंगें अपनी सुदूर यात्रा करती हुईं वापस अपने उद्गम स्रोत पर लौट आती हैं। इस प्रक्रिया का दुहरा प्रभाव होता है। एक तो उसी स्तर की विचार बुद्धि वाले उन कम्पनों से बल तथा प्रोत्साहन पाते हैं और जब वे वापस लौटते हैं तो अपने इस उत्पादन को नये आहार के रूप में पाकर सृजेता मस्तिष्क को भी लाभ पहुँचाते हैं।

किसान अपनी फसल का लाभ स्वयं नहीं उठाता है। उसे लाभ मिलता है परन्तु उसके कृषि कर्म से जो उत्पादन होता है, जो लाभ अर्जित किया जाता है उसमें अन्य अनेकों का भी हिस्सा होता है। किसान द्वारा उत्पादित किये गये अन्न से सैकड़ों व्यक्तियों को भोजन मिलता है। विचारों का उत्पादन भी इसी प्रकार कृषि कार्य है। पशु अपनी शरीर यात्रा सम्बन्धी सोच विचारों में ही लगे रहते हैं इसलिए उनका चिन्तन थोड़ा और विचार प्रवाह अत्यन्त क्षीण होता है। किन्तु मनुष्य में भावना इच्छा, संकल्प, आदर्श आदि की बड़ी शक्तिशाली प्रेरणाएँ चिन्तन क्षेत्र को घेरे रहती हैं। इसलिए उनसे उत्पन्न होने वाली विचार तरंगें भी अति शक्तिशाली होती हैं। जिनका चिन्तन शरीर यात्रा की परिधि में एक ही ढर्रे पर घूमता है उनकी चिन्तन तरंगें दुर्बल होती हैं। उनमें प्रखरता तभी आती है जब किन्हीं विशेष भावनाओं का उभार उनमें सम्मिलित रह रहा है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 May 2026


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रविवार, 24 मई 2026

👉 विचार- एक अद्भुत प्रचण्ड शक्ति स्रोत (भाग 1)

जलती हुई आग के पास बैठकर घोर शीत में भी सर्दी से बचा जा सकता है। आग अपने आसपास के समीपवर्ती क्षेत्र को भी गर्म करती है। वह अपनी ताप किरणें दूर-दूर तक फैलाती है और निकटवर्ती क्षेत्र को गर्म रखती है। यों शरीर में भी गर्मी होती है। साँस के द्वारा उस गर्मी को अनुभव किया जा सकता है और देह के संपर्क में जो वस्त्र आते हैं वे भी गरम हो जाते हैं। सर्दियों में कपड़े पहनकर सर्दी से इसीलिए बचा जा सकता है कि इन वस्त्रों से शरीर की गर्मी बाहर निकलने से बच जाती है और शरीर गर्म रहता है। मनुष्य में रहने वाली तापशक्ति से भी अधिक महत्वपूर्ण और प्रखर शक्ति है- विचार शक्ति। उसकी प्रचण्डता देखते ही बनती है।

इस शक्ति का- विचार शक्ति एवं इच्छा शक्ति का निर्माण मस्तिष्क में होता है। विचार शक्ति और इच्छा शक्ति की प्रचण्डता तथा प्रखरता के अनेक उदाहरण प्रत्यक्ष जगत में देखे जा सकते हैं। कई लोगों ने तो अपनी इस शक्ति का विकास इस स्तर तक किया है कि उनकी मिसाल दी जा सकती है और सामान्यजनों के लिए वे प्रसंग चमत्कारी ही कहे जा सकते हैं। ड्यूक विश्वविद्यालय की परामनोविज्ञान प्रयोगशाला ‘अमेरिकन सोसाइटी फार साइकिक पावर’ तथा कुछ अन्य विश्वविद्यालयों ने इस सम्बन्ध में रुचि दिखाई है और ऐसे अनेक उदाहरण एकत्रित किए हैं। जिनमें विचार या इच्छा शक्ति का महत्व समझा जा सके।

इन प्रसंगों में रेड सीरियस का उदाहरण बहुत चमत्कारी कहा जा सकता है। रेड के सम्बन्ध में पत्र-पत्रिकाओं में बहुत कुछ प्रकाशित हो चुका है। पिछले दिनों अमेरिका के ही एक व्यक्ति आइजक बोर्न ने स्पेन के समुद्र में डूबे जहाजों का पता लगाने के लिए अपनी विचार शक्ति का प्रयोग किया और तमाम उपाय असफल हो जाने के उपरान्त इस पद्धति से सफलता प्राप्त की। अतीन्द्रिय शक्तियों में से अधिकाँश इन्हीं विचार और इच्छा शक्ति का परिणाम है। दूर-दर्शन, दूरानुभूति पूर्वाभास आदि अतीन्द्रिय विशेषताएँ प्रकारान्तर से इसी विचार शक्ति के परिणाम हैं।

यहाँ यह तथ्य समझ लेना चाहिए कि विचार शक्ति और इच्छा शक्ति में बहुत थोड़ा-सा अन्तर है। इन दोनों का निर्माण मस्तिष्क में होता है, यहाँ तक तो कोई विवाद नहीं है, लेकिन यहाँ आकर इच्छा शक्ति विचार शक्ति का पलड़ा भारी हो जाता है कि इच्छा शक्ति का प्राण है। कहा जा सकता है कि इच्छा शक्ति की प्रबलता से मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ती है। मस्तिष्कीय उपचारों से कदाचित ही किन्हीं जड़मति लोगों को बुद्धिमान बनाया जा सकता हो पर इच्छा शक्ति की प्रेरणा से वरदराज जैसे अगणित मन्दमति लोग उच्च श्रेणी के विचारवान बुद्धिमान बन सकते हैं। अन्तःप्रेरणा उनके अविकसित मस्तिष्क को विकसित स्तर का बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित की है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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👉 योगी अरविन्द का पूर्ण योग

योगीराज अरविन्द के पूर्णयोग के चार प्रमुख अंग हैं- शुद्धि, मुक्ति, सिद्धि और भुक्ति। सर्वप्रथम साधना मार्ग में आत्म-शुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। प्रत्येक साधना प्रणाली में परिशुद्धि का विधान है। शुद्धि का क्षेत्र व्यापक है। बाहर और भीतर दोनों ही क्षेत्र का परिशोधन आवश्यक है। हठयोग की साधना शारीरिक परिशोधन के लिए की जाती है। पूर्णयोग की साधना में शरीर ही नहीं मन, वाणी, प्राण और अंतःकरण अर्थात् समूची मानवी प्रकृति का परिष्कार आवश्यक है।

शुद्धि के प्रारम्भ होने का चिन्ह है समता का दिग्दर्शन। साधक प्रकृति की सब क्रियाओं को, द्वंद्वों और अविद्या के आक्रमण को, अपने अज्ञान को समता की दृष्टि से देखता है तथा उन्हें दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। शुद्धि के अंतर्गत मन बुद्धि चित्त अहंकार और प्राण की सभी परतें समाहित हैं। इस सबका परिष्कार आवश्यक है।

पूर्णयोग और आत्मसिद्धि का दूसरा अंग महर्षि अरविन्द के अनुसार है- मुक्ति। मुक्ति का अर्थ है आत्मा का जीव शरीर के बन्धनों एवं आकर्षणों से परे हो जाना तथा आत्मा की असीम अमरता में उन्मुक्त हो जाना। महर्षि का कहना है कि- “समस्त स्थूल क्रिया-कलापों अथवा प्रकृतिगत चेष्टाओं का परित्याग कर निष्क्रिय निर्वाण स्थिति में पहुँचने का नाम मुक्ति नहीं है जैसा कि कितने चिंतक कहते हैं। यह एक ऐसा आन्तरिक परिवर्तन है जो साधक को दिव्य बनाता है। मुक्ति के दो चरण हैं- परित्याग और ग्रहण। जिसमें एक निषेधात्मक पक्ष है दूसरा भावनात्मक। मुक्ति की निषेधात्मक गति का अर्थ है- अपनी सत्ता की निम्न प्रकृति के प्रधान बन्धनों एवं मुख्य ग्रन्थियों से छुटकारा पाना। उसके भावनात्मक पक्ष का अर्थ है- उच्चतर आध्यात्मिक सत्ता में समाहित हो जाना- उसकी दिव्य अनुभूतियों में रमण करना। वैचारिक दृष्टि से मुक्ति का अर्थ है निष्काम और निरहंकार होना, मन और अन्तरात्मा में त्रिगुण से रहित, निस्त्रैगुण्य होना। मुक्ति के सभी मौलिक तत्व दार्शनिक दृष्टि से इस लक्ष्य में समाहित है। भावनात्मक अभिप्राय मुक्ति का है- अपनी आत्मा को विश्वात्मा के साथ एक करना उच्चतम दिव्य प्रकृति को धारण करना। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि भगवान के समान बनना। यही मुक्ति का सम्पूर्ण और समग्र आशय है।

शुद्धि और मुक्ति सिद्धि की पूर्वावस्थाएँ हैं। आध्यात्मिक सिद्धि का अर्थ योगीराज अरविन्द की दृष्टि में है- भागवत सत्ता की प्रकृति के साथ एकत्व प्राप्त करना। पर विभिन्न दर्शनों में सिद्धि की मान्यता के संदर्भ में मतभेद मायावादी के लिए सत्ता का सर्वोच्च तथा एकमात्र वास्तविक सत्य निर्विकार निर्गुण एवं आत्म सचेतन ब्रह्म है। इसलिए आत्मा की निर्विकार शान्ति तथा शुद्ध आत्म चेतनता में विकसित होना ही उसका सिद्धि विषयक विचार है तथा व्यक्तिगत अहंता का परित्याग करके शान्त आत्म ज्ञान में प्रतिष्ठित होना ही उसका मार्ग है। बौद्ध-मतावलम्बो के लिए उच्चतम सत्य सत्ता का अस्वीकार है। अतः उसके लिए सत्ता की क्षणिकता, कामना की विनाशकारी निःसारता का बोध, अहंकार का तथा उसे धारण करने वाले विचार संस्कारों का एवं कर्म श्रृंखलाओं का विलय ही सर्वांगपूर्ण मार्ग है। प्रत्येक दर्शन अपने-अपने विचार के अनुसार भगवान के साथ कुछ सादृश्य प्राप्त करता है और प्रत्येक तद्नुरूप अपना मार्ग ढूँढ़ निकालता है।

पर सर्वांगीण योग के लिए सिद्धि का अर्थ- एक ऐसी दिव्य आत्मा और दिव्य कर्म को प्राप्त करना होगा जो जगत में दिव्य सम्बन्ध और दिव्य कर्म का खुला क्षेत्र प्रदान करेंगे। अपने समग्र स्वरूप में उसका अर्थ है- सम्पूर्ण प्रकृति को दिव्य बनाना तथा उसके अस्तित्व और कर्म की समस्त असत्य ग्रन्थियों का परित्याग करना।

सिद्ध या पूर्णता प्राप्त पुरुष उस ब्राह्मी चेतना में पुरुषोत्तम के साथ एक होकर जीवन धारण करता है। वह सर्व मय ब्रह्म, सर्व ब्रह्म में, अनन्त सत्ता और अनन्त गुणों वाले ब्रह्म, अनन्त ब्रह्म में स्वयंभू- चैतन्य स्वरूप और विश्व ज्ञानमय ब्रह्म, ज्ञानं ब्रह्म में, स्वयंभू आनन्द स्वरूप और विराट् अस्तित्व- आनन्दमय ब्रह्म, आनन्द ब्रह्म में सचेतन होकर निवास करेगा। वह सम्पूर्ण विश्व को एक असीम विराट् सत्ता की अभिव्यक्ति अनुभव करेगा तथा समस्त गुणों एवं कर्मों को उसकी विराट् और असीम शक्ति की क्रीड़ा। उच्चतर अनुभूति की आनन्दमय स्थिति में वह उस तत् के साथ एक होगा। जो समस्त सत्ता का उद्गम और आधार है- सबको अन्तर्वासी, मूल आत्म तत्व और उपादान शक्ति है। यही है- आत्मसिद्धि की पराकाष्ठा।

भूक्ति का अर्थ अरविन्द की दृष्टि में है- ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’। अर्थात्- अनासक्त भाव से उसको (भोगों को) भोगो। कामना प्रेरित जीवन में रहकर भोग को भोगने का प्रयत्न करना निश्चय ही लक्ष्य प्राप्ति में बाधक है। जीवन में दिव्य पूर्णता का आविर्भाव करना, सम्पूर्ण जीवन को अध्यात्मिक शक्ति का क्षेत्र मानकर दिव्य भोग करना ही भुक्ति का रहस्य है। इस तरह पूर्ण योग में जीवन के दिव्य भोग के आदर्श को अरविन्द ने स्वीकारा है। पूर्णयोग के साधक को इस विश्व उपवन में उत्पन्न हुए दिव्य आनन्द का उपभोग करना चाहिए।

महर्षि अरविन्द के अनुसार समर्पण का अर्थ है- अपनी सम्पूर्ण प्रकृति को- अपने आपको भगवान के हाथ में सौंप देना। हमें अपनी प्रत्येक चीज को- बाह्याभ्यन्तरिक विभूतियों को उस विश्वमय विश्वातीत परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए। अपने संकल्प अपने भाव और अपने विचार को उस एक बहुरूप भगवान पर पूर्णरूपेण एकाग्र करना और अपनी सम्पूर्ण सत्ता को भगवान पर ही न्यौछावर करा देना समर्पण योग की एक निर्णायक गति है। यह अहं का उस ‘तत्’ की ओर मुड़ना है जो उससे अनन्त गुना महान् है। इसी में आत्म समर्पण की पूर्णता है।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1983 

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