शनिवार, 4 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (भाग 2)

प्रगति और उन्नति का उत्साह मन में उत्पन्न होता है। बुद्धि उसकी योजना बनाती है और शरीर उसकी कार्यान्वित करता हैं जिसका मन और मस्तिष्क चिन्ता से तप रहा हो, शारीरिक स्वास्थ्य उसकी आग में आहुति वन रहा हो, ऐसे व्यक्ति के हृदय में उत्साह का जन्म होना असम्भव है। बुद्धि का कुण्ठित तथा कलुषित हो जाना स्वाभाविक है। और अस्वस्थ शरीर तो किसी योग्य रह ही नहीं सकता। इस प्रकार जिस मनुष्य की यह तीनों शक्तियों बेकार हो जाएँ, उसे प्रगति और उन्नति के शब्द अपने शब्द-कोष से निकाल ही देने चाहिये।

असन्तोष भी एक प्रकार की मानसिक व्याधि ही होती हैं। यह मनुष्य की सुख-शान्ति की हरण कर लेता है। संतोषी सदा सुखी-की तरह करना होगा-असन्तोषी सदा दुःखी’। यह गलत भी नहीं है। असन्तोष का जन्म अभाव से बतलाया गया है। जिसके पास काम न हो, भोजन-वस्त्र का अभाव हो, जीवन यापन के सामान्य साधनों की कमी हो। उसे असन्तोष होना स्वाभाविक है। किन्तु यह असन्तोष वह असन्तोष नहीं होता, जिसको मानसिक व्याधि कहकर निन्दा की जाती है। इस प्रकार का अभाव जन्य असन्तोष वास्तव में असन्तोष न होकर आवश्यक का दबाव होता है। यह बुरा नहीं। यदि आवश्यकताओं का दबाव अकारण सह लेने का अभ्यास बना लिया जाये तो मनुष्य सामान्य स्थिति से भी नीचे गिरकर दीन और दरिद्री ही बन जाए। कहीं से कुछ मिल गया खा लिया, नहीं तो भूखे पड़े तरह रहे हैं। कपड़ों के स्थान पर चीथड़ों को ही लपेटे है। इस प्रकार की विवशतापूर्वक जीवन मनुष्य के योग्य नहीं। वह तो बुद्धि एवं पुरुषार्थ से वंचित पशुओं का जीवन हैं। आवश्यकतायें मनुष्य को पुरुषार्थ एवं परिश्रम को प्रेरणा देती हैं। उनकी माँग का उचित उत्तर दिया ही जाना चाहिये।

मानसिक व्याधि वाला असंतोष दूसरी चीज है। उसका जन्म अभाव अथवा आवश्यकता से नहीं, बल्कि लोभ और तृष्णा से होता हैं यह एक असात्विक स्वभाव और आसुरी वृत्ति होती है। जो अकारण ही यातना दिया करती है। इस वृत्ति का व्यक्ति सब कुछ होने पर भी उसके सुख से वंचित ही रहता है। असंतोष की पीड़ा उसे घेरे ही रहती है। लोभ के कारण असंतोषी व्यक्ति सम्पत्ति एवं सम्पन्नता की दशा में भी अपने को अभावग्रस्त अनुभव किया करता है। लक्ष्मी का भंडार, पृथ्वी की वसुधा और कुबेर का कोष क्यों न दे दिया जाए। किन्तु असंतोष का रोगी तब भी संतुष्ट न होगा। तब भी उसे अभाव और आवश्यकता अनुभव होती रहेगी। ऐसा वितृष्णा व्यक्ति सम्पन्नता में भी विपन्नता का दुःख भोगने पर मजबूर रहता है।

उद्वेग एक तरह का पागलपन होता है। उत्तेजना, आवेग और आवेश आदि के सारे उन्माद इसी के अंतर्गत आते है। उद्वेग दूषित व्यक्ति अकारण ही आने भीतर तना-तना-सा रहता है। वह किसी बात अथवा काम के विषय में पहले तो मौन रहता है, किन्तु जब खुलता है तो विस्फोट की तरह। इससे उसकी बात अथवा काम बिगड़ जाती है। उद्वेग मानसिक न्यूनता का लक्षण है। जो अन्दर से गम्भीर और सम्पन्न होते है। वे सब कुछ शाँति पूर्वक सोचते और सरलतापूर्वक करते है, इसलिये उनके सारे काम बनते चले जाते है, किसी अभाव अथवा आवश्यकता से दुःखी होकर उद्वेग व्यक्ति या तो अपने आप पर खीजते रहते है अथवा दूसरों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लड़ते-झगड़ते रहते है। जिस काम में हाथ डालते है, उसको सुचारु रूप से करने के बजाय उससे झगड़ते से रहते है। जो काम करेंगे बेगार की तरह। उनका चंचल तथा क्षुब्ध मन काम में तन्मयता आने ही नहीं देता। किन्हीं अभावों अथवा कमियों को दूर करने की उत्सुकता में उद्वेग का प्रयोग करने से अपकृत्यता के सिवाय कृतकृत्वता प्राप्त नहीं होती।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969


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👉 दृष्टिकोण का सम्यक् परिष्कार (भाग 2)

यों अशिक्षितों को भी कूप मंडूक कहते हैं, वह भी अपने निकटवर्ती तथा उपलब्ध जानकारी से ही परिलक्षित होते है। उसी से प्रभाव परिष्कार प्राप्त करते है। संसार कितना विस्तृत है और उसमें कितनी विविधताएं, ज्ञान सम्पदाएं भरी पड़ी है, इसे जान सकना उनकी सीमित दृष्टि के लिए संभव ही नहीं हो सकता। पुस्तकों के पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से वे जितना जान सकते है उसके लिए अवसर ही नहीं रहता। सीमित ज्ञान के आधार पर ही उन्हें जानकारियों पाने, निष्कर्ष निकालने और कदम उठाने का अवसर मिलता है। इन परिस्थितियों को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। अशिक्षा एक प्रकार की दरिद्रता है, जिसके कारण ज्ञानधन कमा सकने और सच्चे अर्थों में धनी बनने का सुयोग प्राप्त कर ही नहीं पाते। विद्वानों की, सभ्यजनों की पंक्ति में बैठ सकना उनके लिए संभव ही नहीं हो पाता। बहुज्ञता और सभ्यता की दृष्टि से उनमें अनेकों त्रुटियाँ पाई जाती है।

निरक्षरों और साक्षरों की दृष्टि में स्तर में अन्तर रहने के अतिरिक्त यह भी जानना आवश्यक है कि इन दोनों ही स्थितियों से ऊंची है-दिव्य-दृष्टि। जिसको सम्यक् दृष्टि भी कहा गया है। दूसरे शब्दों में इसे दूरदर्शी विवेकशीलता भी कहा जा सकता है। यह जिन्हें उपलब्ध है, उन्हीं की मेधा तत्व दर्शन कर सकने में समर्थ होती है। यथार्थता का सत्य का दर्शन इन्हीं से बन पड़ता है। ईश्वर का साक्षात्कार भी इन्हीं के सहारे संभव है।

चर्मचक्षुओं से मिट्टी का ढेला अनगढ़ स्थिति में ही दीख पड़ता है। उसका कुछ मूल्य भी नहीं होता। किन्तु जब वैज्ञानिक उपकरणों से उसका वर्गीकरण, विश्लेषण किया जाता है तो उसे परमाणु समुच्चय के रूप में जाना जाता है। इसमें से प्रत्येक परमाणु अपने में असाधारण शक्ति धारण किये होता है। जिसका विस्फोट होने से तहलका मच जाता है। यह सूक्ष्म दृष्टि है इसे प्राप्त कर सकने पर विश्व के कण कण में संव्याप्त ब्रह्म-चेतना का दर्शन होता है।

यही है वह दृष्टि जिसके मिलने पर आत्म-स्वरूप का बोध होता है। अपने को परमात्मा का युवराज होने का भान होता है। साथ ही यह विश्व परिवार भगवान का सुरम्य उद्यान प्रतीत होता है। उसे सींचने संजोने के लिए माली का दायित्व संभालने के लिए मन मचलता है। जीवन एक बहुमूल्य अवसर प्रतीत होता है। जिसका सदुपयोग बन पड़ने पर नर नारायण, पुरुष पुरुषोत्तम बन सकने की संभावना का आधार प्रत्यक्ष रूप में परिलक्षित होता है। साथ ही वह सम्यक् दृष्टि भी प्राप्त होती है, जिसे दूसरे शब्दों में स्वर्ग कहा जाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 July 2026



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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (भाग 1)

निराशा, चिन्ता, असन्तोष अथवा उद्वेग किसी भी, आपत्ति अथवा विषमताओं का उपचार नहीं है। यह विकास स्वयं ही रोग और विपत्ति माने गये है। संसार में जो भी व्यक्ति सफल हुये हैं, उन्होंने अपने जीवन में निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष की कभी अवसर नहीं दिया। उन्होंने विकट से विकट परिस्थितियों में अपने को इन विकारों से बचाया है। संसार में जो भी असफल होते हैं, उनकी असफलता का कारण अभाव अथवा प्रतिकूल परिस्थितियाँ नहीं होती। उनका एक मात्र कारण निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष ही होता है। असफलता का निवास बाह्य परिस्थितियों की प्रतिकूलता में नहीं मनुष्य की प्रति गामिनी भावनाओं में होता है।

निराशा एक मानसिक रोग है। यह मनुष्य की गतिशीलता को अस्वस्थ बना देता है। निराशावादी व्यक्ति प्रगति की भावना और उन्नति की जिज्ञासा से उदासीन हो जाता है। प्रगति अथवा उन्नति की बात मन में आते ही उसे ऐसा आभास होने लगता है, मानो वह अपने ऊपर कोई विपत्ति लाने की बात सोच रहा हे। काम में प्रवृत्ति लाने से पूर्व ही उसे आपत्तियाँ, कठिनाईयाँ और असफलता दिखलाई देने लगती है। उसका साहस मर जाता है, उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। आपने को जहाँ का तहाँ पड़ा सुरक्षित अनुभव करता है। एक निराशावादी और मृत व्यक्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। एक स्थित शव की तरह होता है, एक चलती-फिरती लाश की तरह।

चिन्ता की चिंता तक कहा गया है। किन्तु चिन्ता रूपी चिता श्मशान की चिता से अधिक भयंकर होती है। क्योंकि वह चिंता मेरे मनुष्य को जलाया करती है और यह जीवित मनुष्य को। चिंता-ग्रस्त मनुष्य अन्दर गीली लकड़ी की तरह सुलगता करता है। इस जलन में सबसे पहले उसकी प्रसन्नता जलती है, फिर जीवन की आशाएँ, अनन्त क्षमताएँ और अन्ततः शरीर। चिन्ता की आग इस प्रकार क्रम-क्रम से जलाकर मनुष्य का सारा जीवन खाक कर डालती है।

चिन्ता की चिंता में बैठा मनुष्य अपनी यातना पूर्ण मृत्यु की प्रतीक्षा करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता। जिस वृक्ष में आग लग गई हो अथवा जिसे दावाग्नि ने झुलस डाला हो उससे हरियाली की आशा करना दुराशा मात्र है। ऐसे दाव-दुग्ध वृक्ष में न नये पत्ते उग सकते हैं, न फूल खिल सकते हैं और न फल आ सकते है। उसका ठूँठ होकर निरुपयोगी हो जाना निश्चित है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 दृष्टिकोण का सम्यक् परिष्कार (भाग 1)

नेत्र न होने पर अन्धा मनुष्य अनेक सुख-सुविधाओं से वंचित रह जाता है। उसे दूसरों पर अधिकांश कार्यों के लिए पराश्रित रहना पड़ता है। समुचित स्थान प्राप्त करना और प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ सकना भी अपेक्षाकृत कम ही सम्भव हो पाता है। इसीलिए “आँख गई तो जहान गया” की लोकोक्ति अक्सर सुनी जाती है। आँखों में विकार भर जाने से, छोटा-मोटा दुःख दर्द खड़ा हो जाने से लोग अधिक चिंतित और चौकन्ने होते है। उपचार में कमी नहीं रहने देते। सोचते है आँखें चली गई तो क्या होगा?

आम-लोग चर्मचक्षुओं को ही देखते और जानते है उन्हीं को सौंदर्य का प्रतीक मानते हैं। आँखों में आँखें डालकर एक दूसरे के मनोभावों को परखते है। उन्हीं के सहारे अपना व्यवहार, व्यवसाय चलाते है। अन्य इन्द्रियों का जीवन में जितना महत्व है उससे कम नहीं, वरन् अधिक बड़ी भूमिका चक्षुओं की है पर यह समस्त गुण गान चर्मचक्षुओं के ही किये जाते है।

मनुष्य को ऐसे अदृश्य चक्षु भी उपलब्ध हैं जो प्रत्यक्षतः चेहरे पर सटे दिखाई नहीं पड़ते, पर उन्हें परोक्ष रूप से महती भूमिका निबाहते देखा जा सकता है। यह है ज्ञानचक्षु। इन्हें प्रजा-चक्षु भी कहते है। इनका कर्तव्य दूरदर्शी विवेकशीलता के रूप में दीख पड़ता है। इन्हें आमतौर से बन्द ही पाया जाता है। प्रायः लोग उतनी ही परिधि में देख-भाल कर पाते हैं, जितना कि प्रत्यक्ष आंखें देख पाती है। इतने ही क्षेत्र को अपनी सीमा समझते हैं। उसी दायरे में कुछ सोचने की, करने की आवश्यकता समझते है। घाटे और नफे को भी इसी सीमा में घटित होने वाले घटना-क्रम के आधार पर मूल्याँकन करते है। प्रगति भी इसी सीमा में सीमित रहती है। एक प्रकार से इतनी ही परिधि में उनका अपना संस्कार सिकुड़ा हुआ होता है।

नेत्रों की दृष्टि कम हो जाने पर दूर की चीजें दीखना बंद हो जाता है और जिसे देखना है उसे आँखों के समीप लाना पड़ता है। दूर रहने पर एक धुँधली-सी छवि ही चलती फिरती दीखती है जो इस विशाल विश्व के कण कण में बिखरा पड़ा है, जो युग युगान्तरों से बढ़ता चला आया है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 03 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 July 2026



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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

👉 मृत्यु से डर कैसा? (अन्तिम भाग)

मनुष्य जीवन के साथ जुड़े हुए कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को जीवन काल में ही पूर्ण कर लिया जाए उनके प्रति लापरवाही न बरती जाए, तो ऐसे कर्मनिष्ठ व्यक्ति को मृत्यु का भय क्यों हो? तब महात्मा गाँधी, भगत सिंह, आजाद की तरह हंसते हुए मौत का वरण किया जा सकता है। विवेकानन्द, रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस की तरह मृत्यु को सुखद बनाया जा सकता है। जो भगवान के दरबार में न्याय की परीक्षा के लिए, जीवन कर्मों का विवरण प्रस्तुत करने के लिए, आत्मा-परमात्मा के प्रिय मिलन के लिए सदैव उद्यत रहते है, उन्हें भय किस बात का? डरता तो वह है जो अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही बरतता-उदासीन रहता और कुकर्मों में निरत रहते हुए जीवन को यों ही निरर्थक गंवा देता है।

मौत के इस उज्ज्वल पक्ष के दर्शन की जानकारी प्राप्त कर इसकी तैयारी में जुट पड़ना ही जीवन की सार्थकता है। इसके लिए कितने समय में कितना काम निपटाना है। क्या करना और किन उपायों को अपनाना है। यह सब योजनाबद्ध रूप से ही हो सकता है। हम जीवन की अवधि 75 वर्ष माने और बचपन 15 वर्ष का समझ, तो कार्य करने के लिए 60 वर्ष ही बचते हैं। यह मनुष्य की इच्छा पर निर्भर है कि ऐसे ही निरर्थक कामों में उसे व्यतीत कर दे या ऐसा कुछ करें जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की उपलब्धि हो सके। पर यह हो तभी सकता है जब निश्चित समय में निश्चित कार्य निपटा लेने का स्मरण रहे। मृत्यु तो अनिवार्य है, उसे याद रखना एक प्राकृतिक चेतावनी अपनाना है, जिसका अर्थ होता है-जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग समय रहते कर लिया जाए।

किन्तु जितने लोग है जो ऐसा सोचते और करते है बहुधा लोग मृत्यु से बचने की कपोल कल्पना में ही खोये रहते है अथवा उसे विस्तृत कर देते है, मानों उसे कभी मरना ही न पड़ेगा। मौत को गर्व के साथ वरण करने वाले कुछ ही लोग होते है। इनमें से व्यक्ति सम्मिलित होते है जो अपने आप के प्रति पूर्ण आश्वस्त होते हैं। सृष्टा के विश्व उद्यान को सुन्दर और समुन्नत बनाने के कार्य को निष्ठा के साथ करने वाला व्यक्ति ईश्वर के न्यायालय में अपने सुकृत्यों का विवरण प्रस्तुत करने को उत्साहित रहता है। रणक्षेत्र में विजयी सेनापति विजय पताका लहराता हुआ अपने राजा के पास हर्षोल्लास उपस्थित होता है। उसे अपनी विजय पर गर्व होता है। इसके विपरीत युद्ध क्षेत्र से भागने वाला पराजित सिपाही राजा के सामने उपस्थित

मृत्यु उतनी भयावह नहीं जितना कि लोगों ने इसे समझा है। मृत्यु से डरने की अपेक्षा इसकी सुनियोजित तैयारी करने की आवश्यकता है। इस सत्य को समझकर जीवन व्यवहार में परिष्कार-परिमार्जन प्रारम्भ कर दिया जाए तो कोई कारण नहीं कि मृत्यु का भय बना रहे। अपने चरित्र का आधार लेकर सत्कर्मों में संलग्न व्यक्ति अपने कर्तव्यों को पूर्ण करता रहे। यही जीवन यात्रा का सच्चा मार्ग है। कर्तव्य परायणता में ही वास्तविक सुख और शान्ति सन्निहित है। इन्हें पालन कर मौत से तो नहीं पर उसे भय से निश्चय ही बचा जा सकता है।

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👉 सच्चिदानन्द की आस्था और अनुभूति (अन्तिम भाग)

चेतना पर माया, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर के जो आवरण पड़े हैं, इनके कारण जीव इस उद्गम स्त्रोत तक पहुँच नहीं पाता। प्यास निरन्तर बनी रहती है। कस्तूरी अपनी नाभि में लिये हिरन जिस प्रकार सुगन्ध की खोज में मारा-मारा फिरता है, उसी प्रकार जीव आनन्द की खोज में विविध योजनाएँ बनाता, कल्पना करता एवं अथक प्रयत्न करता है। यह पुरुषार्थ असफल, असमाधानकारक ही होता है। अन्तःकरण की गहन परतों में छिपे आनन्द के स्त्रोत की खोज बाह्य जगत में चलने के कारण भटकाव, थकान, अशाँति, निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।

आनन्द की मिठास और भी गहन है। इसकी विकृति वासना, तृष्णा, अहंता के रूप में बाहर परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासना आकर्षक एवं लुभावनी लगती है। विषयों के सेवन में मन लगने लगता है तो व्यक्ति विलासी, प्रमादी, आलसी होता चला जाता है। जिह्वा का असंयम, कामेन्द्रियों का उपभोग, संग्रह का लोभ अनेकानेक मानसिक एवं शारीरिक व्याधियों को जन्म देता है।

विषयों के सेवन में जब इतनी तृप्ति एवं तुष्टि मनुष्य को मिलती है तो उसके मूल स्त्रोत में कितनी मिठास होगी, यह कल्पना मात्र से ही हृदय पुलकित हो उठता है। भगवान रसमय है। इस रस को आत्म-सत्ता के रूप में ईश्वर ने मनुष्य को धरोहर बनाकर दिया है। यह रस भौतिक नहीं आत्मिक है। इसे अन्तःकरण के उल्लास, सन्तोष, शाँति जैसी दिव्य संवेदनाओं के रूप में अनुभव किया जाता है। भक्ति रस की धाराएँ ऐसे ही अन्तःकरण में बहती हैं। ये ही कभी मीरा, कभी चैतन्य एवं कभी रामकृष्ण परमहंस जैसी विभूतियों के रूप में प्रकट होती हैं। सर्वोच्च सत्ता, परब्रह्म से, मिलन संयोग की स्थिति ऐसी ही जागृति पर आती है।

सत् चित् आनन्द की अनुभूति एवं सुनियोजित सद्गति व्यक्ति को कहीं का कहीं पहुँचा देती है। इसी अनुभूति का अभाव भटकाव को जन्म देता है। कारण शरीर की इन तीन धाराओं को, उनके उद्देश्य को एवं विकृति के दुष्परिणामों को जानना आवश्यक है। समस्त व्याधियों के मूल में जो बीज है वह है व्यक्ति की स्वयं के मरण-धर्मा होने की अनुभूति न होना। आदर्शवादी, उत्कृष्टता में विश्वास का अभाव तथा आनन्द की प्राप्ति हेतु बाह्य जगत में भटकाव। मनुष्य आत्मा-गरिमा से यदि परिचित होने का प्रयास करे, तो वह जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि- रसानुभूति का आनन्द ले सकता है। समस्त विकारों से मुक्ति मिल जाती है जब व्यक्ति स्वयं की अजरता, अमरता पर चिंतन करता है। नश्वर शरीर के लिए वह अपनी क्षमताएँ नष्ट नहीं करता, वरन् सत् की खोज, चित् की स्वीकारोक्ति व आनन्द की अनुभूति में अपने जीवन का सदुपयोग कर परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1981

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 02 July 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 02 July 2026


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बुधवार, 1 जुलाई 2026

👉 मृत्यु से डर कैसा? (भाग 2)

यात्रा पर निकलने के लिए घर के सदस्यों को त्यागना पड़ता है। उनके मोह को त्यागे बिना यात्रा निकल कर नये व्यक्तियों से परिचय का, नये स्थानों को देखने का आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा नये जीवन का आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता। जीवात्मा नये जीवन का आनन्द प्राप्त करने की सुख .... आकर्षित करती है। वह जीर्ण आवास से मुक्ति पाक नवजीवन प्राप्त करता है। यही स्थिति मृत्यु है।

पुराना कपड़ा उतारना, पुराना घर छोड़ना और नया धारण करना कितना सुखद और आनंददायक प्रतीत है। सुख और आनन्द लिए प्रयास किया जाना संभव स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। पुराने जीवन को .... जराजीर्ण शरीर को प्रत्यावर्तित कर नव जीवन में .... करने की प्रक्रिया भी इसी तरह सुख है। यह दुखद होती। इसे जीवन यात्रा की अनिवार्य, अत्यन्त उप लाभप्रद तथा आनन्ददायक प्रक्रिया कहा जा सकता है।

अन्धेरे में प्रवेश करते समय भय लगता है रात्रि अंधकार में घर से बाहर जाने पर भी डर लगता अपरिचित व्यक्ति से बातचीत करने में हिचक महसूस होती है। नये स्थान में जाने से पूर्व भय के कारण ही बार उसके सम्बन्ध में विचार किया जाता है, उसका जाना जा जाता है। मौत के वास्तविक स्वरूप की जानकारी अभाव में ही उससे भय लगता है, अन्याय उसे हर्षोल्लास के साथ वरण किया जाता।

कार्य की सफलता में उसकी तैयारी आवश्यक है। इसके लिए कर्ता को अपनी योग्यता क्षमता का अभिवर्धन करना पड़ता है। पूर्व तैयारी के बिन श्रम एवं समय निरर्थक ही नहीं होते, वरन् लक्ष्य की पूर्णता भी संदिग्ध बनी रहती है। लक्ष्य पूर्ति के लिए उपलब्ध अवधि में योजनाबद्ध रूप से तैयारी न कर पाना ही भय क कारण होता है। परीक्षा की तैयारी के लिए लगन के साथ अध्ययन किया जाता है। अध्ययनशील विद्यार्थी को उत्तीर्ण होने की सुखद कल्पना उल्लासित करती रहती है। वह परीक्षा के क्षणों की प्रतीक्षा करता है, किन्तु इसके विपरीत तैयारी न करने वाले के लिए परीक्षा हौवा बन जाती है। उसे परीक्षा नाम से भय लगाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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