शनिवार, 25 अप्रैल 2026

👉 साधना में आत्म-समर्पण की आवश्यकता (भाग १)

योग-साधन में सबसे बड़ी कठिनाई मन को वश में करने की होती है। इसकी चंचलता और शैतानी का कुछ ठिकाना नहीं। मन बिल्ली की तरह ताक लगाये बैठा रहता है और जैसे ही कोई महान विचार उदय होता है यह उस पर झपट पड़ता है और फिर नई-नई वासनाओं या कामनाओं का पचड़ा आरम्भ कर देता है। इच्छा का स्वरूप भी लगभग ऐसा ही है। हमने प्रायः देखा है कि श्रेष्ठ इच्छा का आगमन होते ही पुरानी इच्छा अपने पुराने अभ्यास के अनुसार उस पर चढ़ बैठती है। थोड़ी दूर चलने पर मालूम पड़ता कि इस विचार या इच्छा में तो कोई भूल थी। तब फिर मन को शान्त अवस्था प्राप्त होती है। इस प्रकार यह मन का विद्रोह बहुत समय तक चलता रहता है। धैर्य धारण करके धीरता के सहारे ही मन के इन भोगों को हटाना चाहिये। इसके पश्चात् मन धीरे-धीरे शिष्ट बनने लगता है।

साधना दो प्रकार की होती है—एक अपने लिये तपस्या करना और दूसरी साधना। इन्हीं को “कर्म योग“ और “ज्ञान योग“ के नाम से पुकार सकते हैं। ज्ञान-योग का स्वरूप साधारणतः यह है कि हम सब से अलग होकर यह निरीक्षण करते रहें कि मन के भीतर कैसी-कैसी आकाँक्षाएँ, प्रभाव और विचार उमड़ रहे हैं और शान्त हो रहे हैं। हमें उदासीन भाव से यह देखना चाहिये कि किस वस्तु से हानि पहुँच रही है। आरम्भ में तो इन वस्तुओं के साथ स्वयं भी मिलना पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उन पर दृष्टि ही नहीं पड़ती। धीरे-धीरे अभ्यास हो जाने पर सभी बातें प्रकृति के त्रिगुण की क्रीड़ा-तरंगों से ही उत्पन्न होती हैं। वस्तुतः हम अपनी निजी शक्ति से किसी भी विचार, बोध या कार्य की उत्पत्ति होना नहीं मान सकते। सब प्रकृति का दिया हुआ ही होता है, प्रकृति द्वारा ही इन सब में हमारी प्रवृत्ति होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि यह सब प्रकृति की ही ठगविद्या या विशेषता है—हम तो सिर्फ उससे मिले हुये ज्ञान रहित होकर पड़े हैं। 

सुख-दुख, पाप-पुण्य, फलाफल का द्वन्द्व मचा हुआ है। इससे बचने का एक मात्र उपाय यह है कि हम भी इसके विरुद्ध एक तरकीब या चाल से काम लेकर प्रकृति के कौशल को परास्त कर दें। वह चाल है अपना पृथक करण अर्थात् अपने को पूर्णतः प्रकृति से अलग समझना। भीतर का द्रष्टा पुरुष जितने अविचल भाव से स्थित हो सकेगा; उतना ही अधिक बन्धन स्वरूप द्वंद्व ढीला होगा और फिर अन्त में फिर द्वंद्व की इतिश्री हो जायगी। यही “ज्ञान योग“ का सार है। किन्तु इस ज्ञान योग के हो जाने से भी सब काम समाप्त नहीं हो जाता। प्रकृति के तीनों गुणों से अपने को मुक्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उन गुणों का रूपांतर हो जाना चाहिये। गीताकार ने भी “निस्त्रेगुण्य” के परे हो जाने का निर्देश किया है, पर उसकी विशेष व्याख्या नहीं की है। अब हमको इस ओर स्वयं ही ध्यान देना चाहिये।

“कर्म योग“ का रहस्य भी इसी तरह का है। पहले फलाफल को समर्पण करके—अर्थात् फलाफल की आशा त्यागकर कार्य करते जाना चाहिए। हृदय में भगवान है ऐसा समझ कर, उनका स्मरण करते हुये सब कामों को आरम्भ करना चाहिये, जैसे कि गीता में भगवान ने कहा “यथा नियुक्तोऽस्मि” (इनमें भी “मैं” करता हूँ) इसके पश्चात् इस कतृत्व (कर्तापन) के अभिमान का भी त्याग (उत्सर्ग) कर देना चाहिये। फल के साथ ही साथ कर्म का भी समर्पण करना पड़ता है। हमको यह समझना चाहिये कि सब कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार ही होते हैं, इसे पुरुष द्रष्टा भाव से देखता रहे। ऐसा होने से आपको जान पड़ेगा एक विश्वभाव-युक्त शक्ति ही समस्त विचारों, अनुभवों और कार्यों में चल कर सृष्टि का सम्पादन कर रही है। ऐसा होने से ही हमको एक शान्त, समदर्शी और साक्षी की अवस्था प्राप्त होती है। तब भी हमारे भीतर द्वंद्व रहता है, किन्तु वह मन, प्राण और शरीर के ऊपरी भाग में ही रहता है—भीतर तो समता ही स्थिर रहती है। इस अवस्था में बाहर के अन्य लोग इसमें भी दोष गुण, छोटे-बड़े का आस्तित्व ही देखते हैं, किन्तु साधक के भीतर का पुरुष गुणातीत और शाँति मग्न अवस्था में ही रहता है। यह अवस्था निःसंदेह बहुत ऊँची है, फिर भी हमको इससे आगे बढ़ना आवश्यक है क्योंकि पक्की अवस्था तभी मानी जायगी जब गुणों का भी परिवर्तन हो जाय।

*.....क्रमशः जारी*
योगीराज अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति जून 1959

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👉 वाणी का दुरुपयोग मत कीजिए (भाग १)

विश्व का संचालन करने वाली सार्वभौम शक्तियों का स्वर कभी सुनाई नहीं पड़ता और वे चुपचाप अपना कार्य करती रहती हैं, संसार में ऋतुयें आती हैं, मौसम बदलते हैं, ग्रह नक्षत्र अपनी-अपनी परिधि में चक्कर लगाते रहते हैं। सृजन पोषण नाश की लीला होती रहती है। संसार में अनेकों उथल-पुथल हलचलें होती हैं, किन्तु जिस शक्ति की प्रेरणा से यह सब होता रहता है उसका स्वर कभी सुनाई नहीं देता।

इंजन को गति देने वाली भाप चुपचाप बड़ी मुस्तैदी के साथ अपना काम करती है। लम्बी चौड़ी भारी भरकम रेलगाड़ी को मंजिल तक पहुँचाती है किन्तु उसकी आवाज कभी नहीं सुनाई पड़ती। व्यर्थ में बाहर निकलने वाली भाप अधिक शोर मचाती है।

मौन में अजेय शक्ति है। मौन से समस्त शक्तियों का केन्द्रीय करण होता है। जीवन के बाह्य पटल पर यत्र-तत्र बिखेरी हुई जीवनी-शक्ति मौन के बाँध में जब एकत्रित करली जाती है तो वह उसी तरह शक्ति शाली, घनीभूत हो जाती है जैसे बाँध में रोकी गई नदी। शक्ति और क्षमतायें सदैव मौन की गोद में ही पलती हैं। संसार के महापुरुषों ने जो भी महत्वपूर्ण काम किए हैं वे सब ठण्डे दिल और ठण्डे दिमाग से ही सम्पन्न हुए हैं। किसी भी महान् कार्य के सम्पादन के लिए समस्त अन्तर एवं बाह्य प्रवृत्तियों को एकत्रित करके उन्हें लक्ष्य पर लगाना पड़ता है। महत्वपूर्ण कार्य मौन से ही सम्भव होता है।

भौतिक विज्ञान का नियम है, जो वस्तु या जिस मशीन के पुर्जों में संघर्ष जितना कम होगा, वे जितनी समस्वरता से कार्य करेंगे उतनी ही वह मशीन टिकाऊ एवं शक्ति शाली होगी। मौन भी मनुष्य के जीवन में समस्वरता प्रदान कर उसे अधिक टिकाऊ प्रभावशाली महत्वपूर्ण बना देता है। जिस मनुष्य के अन्तर बाह्य जीवन में और आदर्शों में पर्याप्त सामञ्जस्य होगा, किसी तरह का संघर्ष, गतिरोध न होगा, वह व्यक्ति महत्वपूर्ण, शक्ति शाली सिद्ध होगा और सन्तुलित होगा। यह सब मौन की ही देन है।

*.....क्रमशः जारी*
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 25 April 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 April 2026


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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 3)

आत्मनिषेधी से सारी शक्तियाँ सारे देव-तत्व और सारी सम्भावनायें एक साथ रुक जाती हैं। वह अकेला एकाकी आत्म-बहिष्कृत स्थिति में डूबते व्यक्ति की भाँति व्यर्थ ही हाथ-पैर मारता, थकता और अन्त में अविज्ञात अतल के गहन अन्धकार में डूब जाता है।

आत्मनिषेधी का दुर्भाग्य उसके अन्दर अशुभ एवं नकारात्मक संकेत बनकर किसी प्रेत-पुकार की तरह गूँजता रहता है। उसके मलिन मानस से ध्वनि उठती रहती है कि- ‘मैं यह काम नहीं कर सकता मुझमें उसे करने की शक्ति नहीं है। मेरे पास साधनों का अभाव है। समय मेरे अनुकूल नहीं है। मेरी योग्यता कम है। मेरे भाग्य में सफलता का श्रेय नहीं लिखा गया है। इस प्रकार के नकारात्मक संकेत सुन-सुनकर निर्जीव निर्बलतायें जीवित हो उठती हैं। निराशा, निरुत्साह और भय की भावनायें मानस में खेलने-कूदने और द्वन्द्व मचाने लगेंगी। तन-मन और मस्तिष्क की सारी शक्ति शिथिल पड़ जाती है। अन्तःकरण अवसन्न होकर निष्क्रिय हो जाता है। शरीर ढीला और मन मुरदार हो जाता है। इस प्रकार से भार आनत मनुष्य संसार में कुछ भी तो नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि वह हारा, पिछड़ा और हताश-सा आगे बढ़ते हुए लोगों को ईर्ष्या से देखे और मन ही मन दहता-सहता हुआ जिन्दगी के दिन पूरे करे।

एकाग्रता की शक्ति और उसका सुनियोजन | Ekagrata Ki Shakti Aur Uska Niyojan | 

तीसरे प्रकार के जो संशयी व्यक्ति होते हैं, उनकी दशा तो और भी खराब होती है। आत्म-विश्वासी जहाँ सराहनीय, आत्मनिषेधी दयनीय होता है, वहाँ आत्म संशयी उपहासास्पद होता है। वह किसी भी पुरुषार्थ के सम्बन्ध में ‘हाँ-न’ के झूले में झूलता रहता है। अभी उसे यह उत्साह होता है कि वह अमुक कार्य कर सकता है, लेकिन कुछ ही देर बाद उसका संशय बोल उठता है- हो सकता है यह काम मुझसे पूरा न हो। शायद मेरी क्षमतायें और योग्यतायें इस काम के अनुरूप नहीं हैं। लेकिन वह अपने इस विचार पर भी देर तक टिका नहीं रह पाता। सोचता है काम करके तो देखा जाए शायद कर लूँ। काम हाथ में लेता है तो हाथ-पैर फूल जाते हैं, अपने अन्दर एक रिक्तता और अयोग्यता अनुभव करने लगता है। भयभीत होकर काम छोड़ देता है। फिर बलात् उसमें लगता, थोड़ा-बहुत करता और इस भाव से उसे अधूरा छोड़ देता है कि हो नहीं पा रहा है बेकार समय नष्ट करने से क्या लाभ।

इस प्रकार संशयी व्यक्ति जीवन भर यही करता रहता है। कामों का साहस नहीं करता और यदि उनमें हाथ डालता है तो कभी पूरा नहीं कर पाता। इसी प्रकार के तर्क-वितर्क और ऊहापोह में उसका सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है। शेखचिल्लियों की तरह अस्थिर मन, मस्तिष्क और विश्वास वाले संसार में न तो आज तक कुछ कर पाए हैं और न आगे कुछ कर सकते हैं। उपहासास्पद स्थिति में ही संसार से विदा हो जाते है।

*.....क्रमशः जारी*
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 April 2026




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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2026



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गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

👉 अपनी इच्छा शक्ति को बढ़ाइए

‘जहाँ चाह है वहाँ राह है’ यह एक पुरानी कहावत है, परन्तु इसमें बड़ा बल है। मनुष्य की जैसी अच्छी बुरी इच्छा होती है वह उसी के अनुसार अपनी समस्त शक्तियों को लगा देता है और उसमें सफल होता है। मनुष्य की जैसी इच्छा होती है, वह वैसा ही बनता चला जाता है। कवि, लेखक, वक्ता, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनने की इच्छा रखने वाला अपनी क्रियाओं को उसी दिशा में मोड़ देता है और अपनी सारी शक्तियों को एकाग्र करके उस में लगा देता है, परिणामस्वरूप वह वही बन जाता है।

हमारा भविष्य हमारे अपने हाथों में है। उसको बनाने वाले हम स्वयं ही हैं। एक विद्वान् युवकों से कहा करते थे कि “यही समय है जब तुम्हें अपने मार्ग का निश्चय कर लेना चाहिए नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा कि मैंने स्वयं अपने भविष्य को अन्धकारमय बनाया है। इच्छा एक ऐसी वस्तु है जो आसानी से हमारे स्वभाव में आ जाती है। इसलिए दृढ़ इच्छा करना सीखो और उस पर दृढ़ बने रहो। इस तरह से अपने अनिश्चित जीवन को निश्चित बना कर उन्नति का मार्ग प्रशस्त करो।”

जिस मनुष्य में कोई इच्छा नहीं होती, वह क्रियाहीन और निरुत्साही बना रहता है। ऐसे ही मनुष्य संसार में दीन-दीन दशा में देखे जाते हैं। मनुष्य को पिछड़ा हुआ और गिरी हुई परिस्थितियों में रखने वाली कोई वस्तु है तो वह इच्छा शक्ति का अभाव है जिसे हमें दूर करना है। जिस तरह नदी का चलता पानी स्वच्छ व स्वास्थ्यप्रद होता है और एक स्थान पर खड़ा पानी गंदला और स्वास्थ्य विनाशक होता है उसी तरह से इच्छा शक्ति जीवन में आगे बढ़ने और कुछ करने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है और इसके अभाव में हमें वर्तमान परिस्थितियों में ही सन्तुष्ट होना पड़ता है। यदि हम आलसी बन कर अपना जीवन बिता देते हैं, तो भगवान के द्वारा दिये गये उत्तरदायित्व को निबाहने से जी चुराते है, अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने से भागते हैं। हम यहाँ जागरुक रहने और दूसरों को जगाये रखने के लिए आये हैं। जब हमारी शक्तियाँ ही गुप्त पड़ी रहेंगी तो हम दूसरों के लिए कुछ करने में कैसे समर्थ होंगे? पहले तो अपनी शक्तियों को जाग्रत करने के लिए इच्छा शक्ति को बढ़ाना चाहिए और अपने जीवन का एक निश्चित मार्ग चुन लेना चाहिए तभी हमें सन्तोष होगा कि यहाँ हम मुर्दों की तरह नहीं बल्कि जिन्दों की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

एक संन्यासी कहा करते थे कि “जैसा तुम चाहो वैसे ही बन सकते हो क्योंकि इच्छा शक्ति का दैव के साथ ऐसा घनिष्ठ संबन्ध है कि हम सच्चे दिल से जो कुछ होने की इच्छा करें, वही हो सकते हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसकी उत्कट इच्छा आज्ञाकारी, सन्तोषी, नम्र अथवा उदार होने की हो और वह वैसा ही न हो जाये।” महापुरुषों के जीवन चरित्र इस सत्य की गवाही देते हैं। उन्होंने संसार में जितने बड़े-बड़े कार्य किये हैं, उन में इसी महाशक्ति का सहारा मुख्य था। यह तो सभी कार्यों की जड़ है। इसके बिना तो किसी कार्य का आरम्भ होना भी सम्भव नहीं है। अब यह व्यक्ति विशेष की बुद्धि और विवेक पर निर्भर है कि वह अपनी इच्छा शक्ति को किस ओर लगाये। चोर, डाकू भी इसके आधार पर सफल होते हैं और सन्त, महात्मा और महापुरुष भी इसी के सहारे समाज में क्रान्तियाँ करते हैं। धन्य हैं वह जो प्रभुदत्त इस शक्ति को उत्तम मार्ग में लगाते हैं।

*📖 अखण्ड ज्योति जून 1959*

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👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 2)

आत्मा अनन्त शक्तियों का भण्डार होती है। संसार की ऐसी कोई भी शक्ति और सामर्थ्य नहीं, जो इस भंडार में न होती हो। हो भी क्यों न? आत्मा परमात्मा का अंश जो होती है। सारी शक्तियाँ, सारी सामर्थ्य और सारे गुण उस एक परमात्मा में ही आते हैं। अस्तु अंश आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में विश्वास करना, परमात्मा में विश्वास करना है। जिसने आत्मा के माध्यम से परमात्मा में विश्वास कर लिया, उसका सहारा ले लिया, उसे फिर किस बात की कमी रह सकती है। ऐसे आस्तिक के सम्मुख शक्तियाँ अनुचरों के समान उपस्थित रहकर अपने उपयोग की प्रतिक्षा किया करती हैं।

किन्तु आत्मा का शक्ति-कोश अपने आप स्वयं नहीं खुलता। उसे खोलना पड़ता है। इस उद्घाटन की कुँजी है शुभ संकेत। अर्थात् ऐसे विचार जिनका स्वर हो कि- “मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ।” मुझमें उसे पूरा कर सकने का साहस है, उत्साह है और शक्ति भी है। मेरा पुरुषार्थ से अनुराग है, उत्साह है और उद्योग करना मेरा प्रियतम वासना है। विघ्न-बाधाओं से मुझे कोई भय नहीं, क्योंकि संघर्ष को मैं जीवन की एक अनिवार्य प्रतिक्रिया मानता हूँ। मैं मनुष्य हूं। मेरे जीवन का एक निश्चित उद्देश्य है। उसे पूरा करने में अपना तन, मन और जीवन लगा दूँगा। सफलता की प्राप्ति आसक्ति और असफलता के प्रति भय मेरी वृत्ति के अवयव नहीं हैं। मैं भगवान कृष्ण के अनासक्त कर्मयोग का अनुयायी हूँ। सफलता मुझे मदमत्त और असफलता मुझे निरस्त नहीं कर सकती। मुझे ज्ञान है कि लक्ष्य की प्राप्ति और उद्देश्य की पूर्ति सफलता, असफलता के सोपानों पर चलकर ही हो सकती है। मैं अखण्ड आत्म-विश्वासी हूँ। मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ और निश्चय ही करके रहूँगा।”

आत्मविश्वास का क्या अर्थ है? | Aatmvishwas Ka Kya Arth Hai? | https://youtu.be/Jt2fHj3r1Ug?si=2-cX4kMksMPdv_so

इस प्रकार के शुभ और सृजनात्मक संकेत देते रहने से आत्मा का कमल-कोश खुल जाता है और उसमें सन्निहित शक्तियाँ एकत्र होकर व्यक्ति की क्रिया में समाहित हो जाती हैं। वह अपने अक्षय, उत्साह साहस और आशा का अनुभव करने लगती हैं। और कदम-कदम पर लक्ष्य स्पष्ट से स्पष्टतर और दूर से सन्निकट होता दिखलाई देने लगता है। शुभ संकेतों से उद्बुद्ध आत्म-विश्वास केवल आत्मा तक ही सीमित नहीं रहता, वह क्रियाओं, प्रक्रियाओं और सिद्धि तक फैल जाता है।

इसके विपरीत आत्मनिषेधी व्यक्ति अपनी सारी शक्तियों को नकारात्मक बनाकर नष्ट कर लेता है। आत्मनिषेधी आसुरी वृत्ति है और आत्म विश्वास, देव वृत्ति आत्मा की शिव शक्ति आसुरी वृत्ति वाले का सहयोग कर भी किस प्रकार सकती है। जो नास्तिक बनकर परमात्मा को छोड़ देता है, परमात्मा उसे उससे पहले ही छोड़ देता है। जिसे परमात्मा ने छोड़ दिया, प्रभु जिससे विमुख हो गया, उसके लिए लोक-परलोक, आकाश-पाताल कहीं भी कल्याण की सम्भावना किस प्रकार हो सकती है। ऐसे नास्तिकवादी और आत्मनिषेधी की नाव भवसागर के बीच डूब जाना निश्चित है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970


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👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 1)

संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक आत्म विश्वासी, दूसरे आत्मनिषेधी और तीसरे मशयी। अपने इन्हीं प्रकारों के कारण एक वर्ग अपने उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर समाज पर छाये रहते हैं, अपना स्पष्ट स्थान बनाकर जीवन को सार्थक बनाते और समय के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

दूसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण निराशा, निरुत्साह और निःसाहस के कारण रोते-झींकते, भाग्य और विधाता को कोसते हुए जीते और अन्त में एक निस्सार और निरर्थक मौत मरकर चले जाते हैं।

तीसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण तर्कों, वितर्कों, में हाँ-ना, क्रिया-निष्क्रियता में अपना बहुमूल्य समय और शक्ति नष्ट करते हुए कर रहा हूँ-के भ्रम में कुछ भी न करके एक असन्तोष लेकर संसार से चले जाते हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें निष्क्रियता का दोष दिलाने के सिवाय कोई उपहार नहीं दिला पाती।

संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्म-विश्वासी वर्ग के होते हैं। वे अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो काम अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन से उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते हैं। आशा, साहस और उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वे इनको अपने पास से जाने नहीं देते।

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास : भाग 1 | Pt Shriram Sharma Acharya, 

आत्म-विश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य और ऊँचा आदर्श ही चुनता है। हेयता, हीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। फटक भी कैसे सकती है? जब आत्मविश्वास के बल पर वह ऊँचे से ऊँचा कार्य कर सकने का साहस रखता है और कर भी सकता है तो फिर अपने लिए निकृष्ट आदर्श और पतित मार्ग क्यों चुनेगा? आत्मविश्वासी जहाँ अपने लिए उच्च आदर्श चुनता है, वहाँ उच्च कोटि का पुरुषार्थ भी करता है। वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का विकास करता, शुभ संकेतों द्वारा उनमें प्रखरता भरता और यथायोग्य उनका पूरा उपयोग करता है। नित्य नये उत्साह से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अन्त में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है। पराजय, पलायन और प्रशमन से आत्म-विश्वासी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, संघर्ष उसका नारा और कर्त्तव्य उसका शस्त्र होता है। निसर्ग ऐसे अविबन्ध शूरमाओं को ही विजय-मुकुट पहनाया करती है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970

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👉 हम सद्गुणों का उपार्जन क्यों न करें? (भाग 1)

संयम एक प्रकार का अनुशासन है जो साधक में वैराग्य लाता है और उसे योग-पथ पर अग्रसर होने में सहायता प्रदान करता है। यम अथवा आत्मनिग्रह का अभ्यास ही संयम है। यही सारे सद्गुणों का अधिष्ठान है।

संयम ही रोगों के विरुद्ध दृढ़तम चहार दीवारी है यही सारी व्याधियों से सुरक्षित रखता है। इससे सुन्दर स्वास्थ्य शक्ति बल तथा वीर्य की प्राप्ति होती है।

एक सप्ताह के लिए चाय, काफी अथवा धूम्रपान करना बन्द कर दो। इससे तुम्हारी इच्छाशक्ति बलवती होगी जिससे संयम कार्य में मदद मिलेगी। अन्य संयम तुम्हारे लिए सरलतर हो जायेंगे।

संयम का लक्ष्य मन को निम्न पाशवीय अभिरुचियों से ऊपर उठाना ही है। इससे निश्चय ही आत्मपरिष्कार में सहायता मिलती है।

नियताहार, संयम, उपवास, आत्मनियन्त्रण, आत्म-निग्रह, आत्मसंयम, परिमितता ये सब पर्यायवाची हैं।

मदोन्मत्तता, आत्यंतिकता, उद्भ्रान्तता, उन्माद, आत्म-तृप्ति, इन्द्रिय परायणता, लम्पटता, ये सब संयम के विपरीतार्थक शब्द हैं।

आत्मविश्वास कैसे बढ़ाएं | Aatmvishwas Kaise Badhaye | https://youtu.be/Av3k4y9QHKE?si=fQDFCkLMpz8EPnzi

भोजन बन्द कर देना भोजन से संयम कहलाता है। अल्पाहार करना ही नियताहार है। अनाहार कभी एक बार कर लिया जाता है परन्तु अल्पाहार अभ्यास की वस्तु है। इच्छित वस्तु का परित्याग ही आत्म-निग्रह है। अनिच्छित वस्तु का परित्याग भी संयम ही है। नियमित समय तक, साधारणतः धार्मिक व्रतों में, भोजन न करना उपवास कहलाता है। युक्ति पूर्वक कुछ विशेष वस्तुओं का सीमित सेवन तथा कुछ का पूर्ण परित्याग ही परिमितता है। हम लोग दुर्गुणों में संयम तथा भोजन में मिताहार का प्रयोग करते हैं।

यह एक सुन्दर सद्गुण है कि एक मनुष्य दूसरों के साथ चाहे उनकी प्रकृति कैसी भी क्यों न हो, अपने को व्यवस्थित तथा उपयुक्त बनाता है। जीवन में सफलता पाने के लिए यह सर्वोत्तम तथा अनिवार्य सद्गुण है। शनैःशनैः इसका उपार्जन करना आवश्यक है। बहुसंख्यक-जन इसे नहीं जानते कि किस प्रकार दूसरों के साथ अपने को उपयुक्त बनावें। दूसरों के हृदय पर शासन करने के लिए तथा अन्ततः जीवन संग्राम में विजयी होने के लिए यथा काल व्यवस्था एक विचित्र सद्गुण है।

पत्नी नहीं जानती कि पति के साथ किस प्रकार अनुकूल बर्ताव करना चाहिये। वह सदा अपने पति को अप्रसन्न रखती है, घर में झगड़े का कारण बनती है और अन्ततः पति द्वारा परित्यक्त होती है। किरानी नहीं जानते कि अपने मालिक के साथ किस प्रकार व्यवहार करें। वह उससे झगड़ पड़ता है और शीघ्र ही अपनी करनी का फल भोगता है। शिष्य नहीं जानता कि गुरु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। व्यापारी नहीं जानता कि किस प्रकार वह ग्राहकों के साथ व्यवहार करे। फलतः वह अपने व्यापार तथा ग्राहकों से वंचित रह जाता है। दीवान यदि नहीं जानता कि महाराजा के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए तो उसको नौकरी से अलग होना पड़ता है। यथा काल व्यवस्था के ऊपर संसार आधारित है। जो इस कला अथवा विज्ञान को जानता है वह संसार में सकुशल निवास करता है और जीवन की सभी परिस्थितियों में सुखी रहता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जून 1959

"Shantikunj Rishi Chintan शांतिकुंज हरिद्वार का आधिकारिक YouTube चैनल

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 April 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2026


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बुधवार, 15 अप्रैल 2026

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2026


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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

👉 पाप से सावधान! (अंतिम भाग)

व्यभिचार के दोनों−रूप परस्त्री गमन तथा परपुरुष गमन त्याज्य हैं। सावधान! यह मन में चिन्ता, अधैर्य, अविश्वास, ग्लानि का सृष्टा महा राक्षस है। यह पाप समाज से चोरी चोरी किया जाता है अतः मन छल कपट, धूर्तता, मायाचार, प्रपञ्च आदि से भर जाता है। ये कुवासनाएँ कुछ समय लगातार मन में प्रविष्ट होने से अंतर्मन में गहरी मानसिक ग्रन्थियों की सृष्टि कर देती हैं। ऐसे व्यक्ति मौन सम्बन्धी बातों में निरन्तर दिलचस्पी, गन्दे शब्दों का प्रयोग, बात बात में गाली देना, गुह्य अंगों का पुनःपुनः स्पर्श, पराई स्त्रियों को वासनामय कुदृष्टि से देखना, मन में गन्दे विचारों—पापमयी कल्पनाओं के कारण खींचतान अस्थिरता, आकर्षण−निकर्षण आदि मनः संघर्ष निरन्तर चलते रहते हैं। यही कारण है कि विकारी पुरुष प्रायः चोर निर्लज्ज, दुस्साहसी, कायर, झूठे और ठग होते हैं, अपने व्यापार तथा व्यवहार में समय समय पर अपनी इस कुप्रवृत्ति का परिचय देते रहते हैं। लोगों के मन में उनके लिए विश्वास, प्रतिष्ठा, आदर की भावना नहीं रहती, समाज से उन्हें सच्चा सहयोग प्राप्त नहीं होता और फलस्वरूप जीवन−विकास के महत्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।

व्यभिचार की मनःस्थिति अशान्त, सलज्ज, दुःख पूर्ण होती है। उसमें द्वन्द्व चलता रहता है, अन्तःकरण कलुषित हो जाता है। मनुष्य की प्रतिष्ठा एवं विश्वस्तता स्वयं अपनी ही नजरों में कम हो जाती है प्रत्येक क्षेत्र में सच्ची मैत्री या सहयोग भावना का अभाव मिलता है। ये सब मानसिक दुःख नर्क की दारुण यातना के समान कष्टकर हैं। व्यभिचारी को निज कुकर्म का दुष्परिणाम रोग−व्याधि सामाजिक बहिष्कार के रूप से इसी जीवन में भुगतना पड़ता है।

मन में पापमय विचार रखना घातक है। आपका मन तो निर्मल शुद्ध देव मन्दिर स्वरूप होना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, चिन्ता आदि वे दुष्ट मनोभाव हैं, जो मनुष्य का प्रत्यक्ष नाश करने वाले हैं!

महर्षि जैमिनी के अनुसार जो द्विज लोभ से मोहित हो पावन ब्राह्मणत्व का परित्याग कर कुकर्म से जीविका चलाते हैं, वे नर्कगामी होते हैं।

जो नास्तिक हैं, जिन्होंने धर्म की मर्यादा भंग की है, जो काम भोग के लिए उत्कण्ठित, दाम्भिक और कृतघ्न हैं, जो ब्राह्मणों को धन देने की प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, चुगली खाते, अभिमान रखते और झूठ बोलते हैं, जिनकी बातें परस्पर विरुद्ध होती हैं, जो दूसरों का धन हड़प लेते हैं, दूसरों पर कलंक लगाने के लिए उत्सुक रहते हैं और पराई सम्पत्ति देखकर जलते हैं, वे नर्क में जाते हैं।

जो मनुष्य सदा प्राणियों के प्राण लेने में लगे रहते हैं, पराई निन्दा के प्रवृत्त होते हैं, कुँए, बगीचे, पोखर आदि को दूषित करते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं।

वाणी से कुशब्दों, गाली, अपमान जनक, कटु वचन उच्चारण करना भी पाप है। आपको चाहिए कि शरीर मन वाणी को सहज सात्विक कार्यों में लीन रखें, शुभ सोचें, शुभ उच्चारण करें।

*.....समाप्त*
📖 *अखण्ड ज्योति मार्च 1955*

👉 आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग (भाग २)

जो लोग अभी इतनी मानसिक उन्नति नहीं कर सके हैं कि दूसरों की मूर्खतापूर्ण भूलों को क्षमा कर दें, उनको कम से कम क्रोध और असत्य के बदले तुरंत वैसा ही व्यवहार करने के बजाय कुछ देर ठहर कर समस्त परिस्थिति पर शाँतचित्त से विचार करना चाहिए। ऐसा होने से वे कम से कम वैसी मूर्खता से बच जायेंगे जैसी पहला व्यक्ति कर चुका है।

दूसरों के उद्देश्य के विषय में शंका करना अच्छा कार्य नहीं है। केवल उसकी अन्तरात्मा ही उसके विचारों को जानती है। हो सकता है कि वह कुछ ऐसे उद्देश्यों से प्रेरित होकर कोई कार्य कर रहा हो जो तुम्हारे मस्तिष्क में आ ही नहीं सकते। यदि तुम किसी के विरुद्ध कोई बात सुनते हो, तो तुम इसको दोहराओ मत। संभव है वह सत्य न हो और यदि हो भी, तो उसके विषय में मौन रहना ही अधिक दयालुता होगी।

बोलने से पहले सोच लो अन्याय असत्य भाषण से दोष-भागी बनोगे। कार्यों में भी सत्य का पालन करो, अपना मिथ्या प्रदर्शन मत करो, क्योंकि प्रत्येक दल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिये जैसे सिर्फ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।

अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, https://youtu.be/vSKChpugH14?si=M9jnwKP58NH40az5

आचरण और व्यवहार में सत्य का पालन वास्तव में कठिन है, इसका अर्थ यह है कि दूसरों के सामने कोई कार्य इस उद्देश्य से न करना चाहिए कि उसके मन में हमारे लिये उच्च-धारणा बैठ जाये। साथ ही जिस कार्य के करने में दूसरों के सामने लज्जित ना होना पड़े ऐसा कार्य छुपकर भी नहीं करना चाहिए। लोगों को आप अपना सच्चा स्वरूप देखने दीजिये और जो कुछ आप नहीं हैं वैसा बनने का ढोंग मत कीजिये। बहुत लोगों का ऐसा उद्देश्य रहता है कि हमारे प्रति दूसरों की धारणा हमारी रुचि के अनुकूल ही होनी चाहिये। फलतः ऐसी अनेक प्रकार की छोटी बातें होती हैं, जिन्हें हम एकान्त में तो कर लें, परन्तु दूसरों के सामने नहीं करेंगे, क्योंकि हम सोचते हैं कि लोग हम से ऐसी बातों के करने की आशा नहीं करते।

यह बात सत्य है कि हमें कभी अपना झूठा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रत्येक प्रकार का झूठा प्रदर्शन पतनकारी होता है। परन्तु यह भी ध्यान रखिये कि उस झूठे प्रदर्शन को टालने के लिये कहीं आप उसकी प्रतिकूल पराकाष्ठा तक न पहुँच जायें लोग कभी-कभी ऐसा कहते हैं कि “मैं तो अपने प्राकृतिक रूप में ही लोगों के सामने अपने को प्रकट करना चाहता हूँ।” और ऐसा कहकर वे अपना अत्यन्त निकृष्ट, अशिष्ट और असभ्य रूप लोगों को दिखलाना आरम्भ करते हैं। किन्तु ऐसा करके वे अपना प्राकृतिक स्वरूप जैसा होना चाहिये वह नहीं दिखलाते, वरन् इसके विपरीत अपने हीन, तुच्छ और निकृष्ट रूप का प्रदर्शन करते हैं। क्योंकि मनुष्य में जो कुछ उच्चतम, सर्वोत्तम एवं सर्वश्रेष्ठ गुण हैं, वे ही आत्मा से निकट सम्बन्ध रखते हैं, अतः अपने-आत्मा के प्राकृतिक स्वरूप को प्रकट करने के लिये हमें यथाशक्ति सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

*धार्मिक पाखण्ड भी असत्य का ही एक रूप है। यदि कोई मनुष्य अपने आपको आध्यात्मज्ञानी प्रकट करता है, साथ ही अपनी उन्नति एवं सिद्धियों का वर्णन करके पाखंडी लोगों की तरह भोले-भाले व्यक्ति यों की प्रशंसा प्राप्त करने का यत्न करता है तो यह समझ लेना चाहिए कि वह सत्य का वास्तविक अनुयायी नहीं है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जून 1957

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👉 पाप से सावधान! (भाग 3)

आपका जीवन सदा सबके लिए हितकारी हो, सेवा करें, आस पास के सब व्यक्ति आपसे प्रेरणा और बल प्राप्त करें, आप मृदु वचनों का उच्चारण करें, तो आपके लिए सुखदायिनी मुक्ति दूर नहीं है।

चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती रिश्वत, आदि तो स्थूल रूप में चोरी हैं ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना, भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, सहायता या वस्तु देने का आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। फलतः अनिष्टकारी एवं त्याज्य है।

व्यभिचार मानवता का सबसे घिनौना निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य पाप−पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। आये दिन समाज में इस पाप की शर्माने वाली गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनाएँ सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान दुःख होता है। मनुष्य आत्म ग्लानि का रोगी बन जाता है, जिससे आत्म हत्या तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक साँख्य, बाल बच्चों, पत्नी का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है।

Gayatri Mantra Rules | गायत्री मंत्र जप के आवश्यक नियम शर्तें व अनुशासन | https://youtu.be/xx0vKHJGVOo?si=qT-brDFCt_gUsMIG

शरीर में होने वाले व्यभिचार जनित रोगों की संख्या सर्वाधिक है। अप्राकृतिक तथा अति वीर्यपात सू मूत्र नलिका सम्बन्धी गुप्त रोग उत्पन्न होते हैं, जिन्हें न डाक्टर ठीक कर सकता है, न रुपया पैसा इत्यादि ही सहायक हो सकता है। वेश्यागमन के पास से मानव−शरीर अशक्त हो जाता है और स्थायी रूप से निर्बलता, सिरदर्द, बदहजमी, रीढ़ का दुखना मिर्गी, नेत्रों की कमजोरी, हृदय की धड़कन, बहुमूत्र पक्षाघात, प्रमेह, नपुंसकता, क्षय और पागलपन आदि शारीरिक रोग उत्पन्न होकर जीवितावस्था में ही नर्क के दर्शन करा देते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 April 2026


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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 13 April 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 April 2026



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रविवार, 12 अप्रैल 2026

👉 अनैतिक सफलता-नैतिक असफलता

और दूसरा वह वृक्ष है महात्मन्! देखिये न। आस-पास की सारी भूमि पर उसने अधिकार कर लिया है, छोटे-छोटे पौधों को पनपने नहीं दिया इसने। दूसरे के अधिकार को भी अपना हित मानकर शोषण कर लिया और आज सभी वृक्षों से विशाल दिखाई देने लगा। पर आप हैं कि नैतिकता की प्रशंसा के पुल बाँधे जा रहे हैं। महाराज! संसार में शोषक, शक्तिशाली और हिंसक पनपते हैं। नीति और ईमानदारी को पकड़े रहने वाले बेचारे दूसरे वृक्षों को देखो, कितने कोमल और कमजोर दिखाई देते हैं। उगते, फलते, फूलते तो ये भी हैं पर इनकी करोड़ों की शान और इस मद-मस्ती में झूमते विशाल वृक्ष की शान-क्या तुलना हो सकती है।

साधु मुस्कराये और बोले-वत्स! कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनके उत्तर तत्काल नहीं दिये जाते। प्रतीक्षा करो और प्रतिफल देखो। शीघ्र ही समझ में आ जायेगा कि नीति, नीति ही है और अनीति, अनीति ही है। अनीति का अन्त सदैव दुःखद ही होता है।

ग्रीष्म के अन्तिम दिन, वर्षा के पूर्वारम्भ के दिन बड़े बवण्डरी और तूफानी होते हैं। ऐसे ही किसी एक दिन भयंकर तूफान आया। छोटे-छोटे कोमल पौधे झुक-झुक गये, पृथ्वी माता की गोद में लोट-लोट गये। तूफान उन्हें पार करके निकल गया तो जैसे पहले खड़े थे, वैसे ही फिर खड़े होकर अपनी विकास यात्रा में जुट गये।

किन्तु उस महावृक्ष के अभिमान और अहंकार का अब तक भी कोई ठिकाना नहीं था। उसी अकड़ में खड़ा रहा। तूफान अपनी सारी शक्ति समेटकर उस पर टूट पड़ा और लंका में जो स्थिति रावण के दस शीश और बीस भुजाओं की हुई थी, वही स्थिति उस भीमकाय वृक्ष की कर डाली। दनुजाकार डालें, तने सब क्षत-विक्षत लोटने लगे, जड़ें भी संभाल न पाईं। पेड़ पल भर में ढेर हो गया।

प्रातःकाल जो भी ग्रामीण उधर से निकलता, हाहाकारी वृक्ष की यह विनाश-लीला देखकर उधर ही खिंचा चला आता। देखते-देखते ग्राम वासियों की भीड़ एकत्रित हो गई। इतना बड़ा पेड़ ढहकर भूमि पर बिखरा पड़ा है और छोटे-छोटे पौधे आनन्द की हिलोरें ले रहे हैं-यह देखकर सभी को आश्चर्य हो रहा था, तभी साधु भी उधर आ पहुँचे।

वृक्ष की ओर देखकर हँसे और बोले-यही है उस दिन के प्रश्न का उत्तर। अनीति और अधर्म से प्रारम्भ में लोग तेजी से बढ़ते हैं, पर अन्त उनका ऐसा ही अनिष्टकारी होता है, जैसे इस वृक्ष का।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1970

👉 आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग (भाग 1)

मनुष्य का कर्तव्य है कि सत्य और असत्य का भेद पहिचानने का प्रयत्न करता रहे। सत्य आध्यात्मिक जगत का सर्वोत्तम रत्न है और भगवान ने उसे पहिचानने की निश्चित योग्यता भी मनुष्य को दी है पर आधुनिक युग के कुतर्कशील लोगों ने उसका स्वरूप ऐसा गँदला कर दिया है कि उसकी पहिचान करना भी बड़ा कठिन हो जाता है। इसके लिए सबसे पहला उपाय यह है कि हम स्वयं मन, वाणी और कर्म से सदा सत्य का पालन करें। जो व्यक्ति सत्य का पालन करता है वह सत्य और असत्य की पहिचान अपने सहज-ज्ञान से शीघ्र ही कर सकता है।

सत्य और असत्य की पहिचान पर ज्यादा जोर देने की आवश्यकता इसलिये भी है कि संसार में आजकल अनेकों मूर्खतापूर्ण असत्य विचार और अन्धविश्वास भरे पड़े हैं, और जो व्यक्ति इनका दास बना रहता है वह कभी उन्नति नहीं कर सकता।

इसलिये तुम्हें किसी बात को इसलिये ग्रहण नहीं करना चाहिए कि उसे बहुसंख्यक लोग मानते हैं, या वह शताब्दियों से चली आई है, अथवा उन धर्मग्रंथों में लिखी है जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं। तुम्हें उस पर स्वयं भी विचार करके उसके सत्य-असत्य और उचित-अनुचित होने का निर्णय करना चाहिए। याद रखो कि एक विषय पर चाहे एक हजार मनुष्यों की अनुमति क्यों न हो किन्तु यदि वे लोग उस विषय में कुछ भी नहीं जानते, तो उनके मत का कुछ भी मूल्य नहीं है। जिसे सत्य मार्ग पर चलना है उसे स्वयं विचार करना सीखना चाहिए, क्योंकि अंधविश्वास संसार की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। यह एक ऐसा बंधन है जिससे पूर्ण रूप से मुक्ति होना चाहिए। दूसरों के विषय में तुम्हारा विचार सदा सत्य होना चाहिए। उनके विषय में जो बात तुम नहीं जानते उस पर विचार मत करो।

यह कल्पना भी मत करो कि लोग सदा तुम्हारे ही विषय में सोचा करते हैं। यदि एक मनुष्य कोई ऐसा कार्य करता है जिससे तुम्हारी समझ में तुम्हारी हानि होगी, अथवा वह कोई बात कहता है जो तुम्हारे विचार पर तुम पर घटती है, तो तत्काल ही यह मत सोचो कि “उसका उद्देश्य मुझे हानि पहुँचाना था। “ बहुत सम्भव है कि उसने तुम्हारे विषय में सोचा ही न हो, क्योंकि प्रत्येक जीव के अपने निज के कष्ट होते हैं और उसके विचारों का केन्द्र मुख्यतः वह स्वयं ही रहता है। यदि कोई मनुष्य तुमसे क्रोधित होकर बात करता है तो यह मत सोचो कि वह तुमसे घृणा करता है अथवा तुम्हें व्यथित करना चाहता है। हो सकता है कि उसे किसी अन्य व्यक्ति ने क्रोधित कर दिया हो, और संयोग से उस समय तुम उसे मिल जाते हो, और तब उसका सारा क्रोध तुम्हीं पर उतरता है। यह ठीक है कि वह मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहा है, क्योंकि क्रोध करना ही मूर्खता है। किंतु तुम्हें उसके विषय में असत्य विचार नहीं करना चाहिये।

लोगों की बहुत सी छोटी-छोटी कठिनाइयाँ इसी प्रकार पैदा हो जाती हैं। किसी व्यक्ति पर यदि परेशानियों का भार बहुत अधिक होता है तो उसके कारण वह लगभग प्रत्येक बात पर क्रोध करने लग जाता है। वास्तव में हम अपने आस-पास रहने वालों के भी सब कष्टों को नहीं जानते, क्योंकि कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी कठिनाइयों को घोषित करता नहीं फिरता। साधारण मर्यादा उसे ऐसा करने से रोकती है। किन्तु यदि हम यह याद रखे कि ऐसी कठिनाइयाँ सबके लिये उपस्थित हैं और उनके प्रति उदार भाव से काम लें, तो हम स्वयं क्रोध से अवश्य बच सकेंगे।



.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जून 1957

"Shantikunj Rishi Chintan *शांतिकुंज हरिद्वार का आधिकारिक YouTube चैनल*

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👉 पाप से सावधान! (भाग 2)

मनुष्य प्रायः तीन अंगों से पाप में प्रवृत्त होता है 
1—शरीर 2—वाणी और 3—मन द्वारा। इनके भी विभिन्न रूप हो सकते हैं, विभिन्न अवस्थाएँ और स्तर हो सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य का अधःपतन करने में समर्थ हैं। तीनों द्वार बन्द रखें, शरीर, मन और वाणी का उपयोग करते हुए बड़े सचेत रहें। कहीं ऐसा न हो कि आत्म संयम की शिथिलता आ जाये और पाप पथ पर चले जायं!

शरीर के पापों में वे समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं, जिन्हें रखने से ईश्वर के भव्य मन्दिर रूपी भवसागर से पार कराने वाले पवित्र मानव शरीर को भयंकर हानि पहुँचती है। कञ्चन तुल्य काया में ऐसे विकार उपस्थित हो जाते हैं जिससे जीवितावस्था में ही मनुष्य नर्क की यन्त्रणाएँ प्राप्त करता है।

हिंसा प्रथम कायिक पाप है। आप सशक्त हैं,तो हिंसा द्वारा अशक्त पर अनुचित दबाव डालकर पाप करते हैं। मद, ईर्ष्या द्वेष आदि की उत्तेजना में आकर निर्बलों को दबाना, मारपीट या हत्या करना जीवन को गहन अवसाद से भर लेना है। हिंसक की अन्तरात्मा मर जाती है। उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, उसके मुख मुद्रा से क्रोध, घृणा, द्वेष, की अग्नि निकला करती है।

हिंसक पशु की कोटि का व्यक्ति है। उसमें मानवोचित गुण नहीं रहते। बल के मद में वह अपने स्वार्थ, आराम, वासना पूर्ति के लिए काम करता है। उसे पशु की योनि प्राप्त होती है और जीवन अशान्त बना रहता है।

हिंसा का तात्पर्य यह नहीं कि आप किसी के शरीर को चोट पहुँचाएँ, मारें पीटें ही, दूसरे के हृदय को किसी प्रकार का आघात पहुँचाना, कटु वचन का उच्चारण, गाली गलौज आदि भी हिंसा के ही नाना रूप हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 12 April 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 April 2026

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👉 कर्मयोग का रहस्य (अंतिम भाग)

यदि आप किसी मनुष्य या पशु का खून बहता हुआ देखो तो कपड़े के लिये इधर−उधर मत भागे फिरो, बल्कि अपनी धोती या कमीज में से, कुछ परवा नहीं कितना भी कीमती हो एक टुकड़ा फाड़ कर उसके पट्टी बाँध दो, यदि वह कीमती रेशमी कपड़ा भी है तो भी उसको फाड़ने में शंका मत करो, यह सच्चा कर्मयोग है। यह आपके हृदय को जाँचने के लिये काँटा है, आपमें से कितनों ने इस प्रकार की सेवा की है, यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो आज से शुरू कर दो।

जब आपका पड़ौसी या कोई निर्धन आदमी रोगग्रस्त हो तो उसके लिये अस्पताल से दवाई ला दो। सावधानी से उसकी सेवा करो, उसके कपड़े खाने के बर्तन और टट्टी−पेशाब के बर्तन साफ करो, यह अनुभव करो कि उस रोगी मनुष्य के रूप में आप ईश्वर की सेवा कर रहे हो। इस प्रकार आपका मन बहुत ऊँचा उठ जावेगा और दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी, उससे हर्ष−दायक शब्द कहो, उसके पंगग के पास बैठो। उसके स्वस्थ होने के लिए प्रभु से प्रार्थना करो। इस प्रकार के कर्मों से आप में दया और प्रेम की वृद्धि होने में सहायता मिलेगी, इसमें घृणा, द्वेष और शत्रुता का नाश होगा और आप दैवत्व में बदल जाओगे।

जैसा आप चाहते हो कि दूसरे आपके साथ बर्ताव करें वैसा आप भी उनके साथ करो, इस नीतिवाक्य को याद रखो। नित्य के जीवन−व्यवहार में यह आपका आचार−नियम होना चाहिए, समस्त धर्मों का साराँश यही है, आप कोई अनुचित कर्म नहीं करोगे, आपको अमित आनन्द मिलेगा।

जब तुम बाजार में जाओ तो हमेशा अपनी जेब में कुछ पैसे डाले रखो और उन्हें गरीबों को बाँट दो। रेलवे प्लेटफार्म पर गरीब कुलियों से झगड़ा मत करो, उदार बनो उन्हें चार आने या आठ आने दो। अनुभव करो कि सारी देहों में आप ही रम रहे हो, आपका हृदय विशाल हो जावेगा, आप एकत्व का अनुभव करने लगोगे, आप और भी उदार बन जाओगे।

"जप प्रक्रिया का वैज्ञानिक रहस्य: कैसे काम करती है मंत्र शक्ति?" | https://youtu.be/BO_pDMHTlBI?si=MzQSfXQfSm4xCGst

आप दवाइयों की एक पेटी अपने साथ रख सकते हो और गरीब रोगियों की चिकित्सा कर सकते हो, होम्योपैथिक दवाइयों का इलाज कोई हानि नहीं करता है। पुस्तक देख देखकर अप दवाई दे सकते हो। किसी बायोकैमिस्ट से मिलकर अपना सन्देह दूर कर सकते हो। ऐसी सेवा से आपको बहुत आनन्द मिलेगा, इससे चित्त−शुद्धि बहुत होती है।

महात्मा गाँधी की आत्मकथा पढ़िए। वह सम्मानित कार्य और तुच्छ नीच सेवा में भेद नहीं समझते थे। उनके लिये झाडू लगाना और टट्टी साफ करना बहुत बड़ा योग है। उन्होंने स्वयं टट्टियाँ साफ की हैं। अनेक प्रकार की सेवाएँ कर करके, उन्होंने इस मोहकारक ‘मैं’ को बिल्कुल ही नष्ट कर रखा है। बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त सज्जन इनके आश्रम में योग सीखने के लिये आये। वे सोचते थे कि महात्मा गाँधी जी उनको एकान्त कमरे में या परदे के पीछे विचित्र रीति से प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, कुण्डलिनी, योगादि की शिक्षा देंगे, परन्तु जब उनसे कहा गया कि सबसे पहले टट्टियाँ साफ करो तो उनको बड़ी निराशा हुई और वे एकदम आश्रम छोड़कर चले गये।

प्रति दिन जितने अधिक सत्कार्य हो सकें करिये, सोते समय अपने दिन भर के कार्यों की परीक्षा कीजिए और नित्य अपनी आध्यात्मिक डायरी नोट कीजिए। सत्कार्य करना ही आध्यात्मिक जीवन का उदय है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1955

👉 साधना में आत्म-समर्पण की आवश्यकता (भाग १)

योग-साधन में सबसे बड़ी कठिनाई मन को वश में करने की होती है। इसकी चंचलता और शैतानी का कुछ ठिकाना नहीं। मन बिल्ली की तरह ताक लगाये बैठा रहता ह...