मकान-मालिक जब घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है तो उस मकान की दुर्दशा प्रारम्भ हो जाती है। मकड़ियाँ जाला बनाने लगती हैं। जगह-जगह चिड़ियाँ घोंसले बना लेती हैं। कीड़े-मकोड़े बढ़ जाते हैं। वर्षा और वायु के प्रकोप से दीवालों में दरारें पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे आलीशान मकान भी खाली पड़े रहने पर ध्वस्त होकर धराशायी बन जाते हैं। यह स्थिति घर में फली क्रियाशीलता के अभाव से हो जाती है। जब तक मालिक रहता है, तब तक उसकी लिपाई, पुताई, छानी-छप्पर, मिट्टी-मरम्मत होती रहती है। इससे वही मकान साफ -सुथरा और वर्षा में भी सुदृढ़ बना रहता है। ठीक यही बात मानव जीवन के बारे में भी लागू होती है। जब तक मनुष्य क्रिया-शील रहता है तब तक अंग-प्रत्यंग तथा मानसिक चेष्टायें सही दिशा में लगी रहती हैं, पर जैसे ही आलस्य और अकर्मण्यता संवार हुई कि रोग-शोक, असन्तोष और अशान्ति, दैन्य और दीनता के जीव-जन्तु अपना-अपना अड्डा मनःक्षेत्र में जमाने लग जाते हैं और चारों ओर निराशा की मुर्दनी छाई जान पड़ने लगती है।
लोहा देखने में कितना ठोस व मजबूत दिखाई पड़ता है। सारे शरीर की शक्ति लगा कर भी उसे तोड़ा जाना सम्भव नहीं। काटना हो तो पैनी छैनी और वजनदार घनों की चोट देनी पड़ेगी। पर उसी लोहे को किसी कूड़े-कचरे के ढेर में फेंक दीजिये तो कुछ ही दिन में जंग लग जायगी और सम्पूर्ण लोहे को चाट कर बैठ जायेगी। मनुष्य शरीर भी लोहे जैसा ही है। इसकी सुन्दरता और मजबूती तभी तक स्थिर समझिये, जब तक इसमें क्रियाशीलता है। काम से जी-चुराने और दूर भागने का परिणाम लोहे में जंग लग जाने जैसा ही हो सकता है। शरीर का महत्व काम से ही है।
कहावत है- “खाली दिमाग शैतान का घर” अर्थात् निरर्थक समय बिताने और आलस्य में पड़े रहने से उत्पन्न शिथिलता अनेक प्रकार की विकृतियाँ ही पैदा करती है। अपने साथ अनेक औरों को भी इससे हानि ही होती है। पारस्परिक कलह, अनैतिक तत्व और दुराचार बरतने वाले वे ही लोग होते हैं जो श्रम से जी चुराते हैं। जो फैशनपरस्ती को ही जीवन मानकर केवल बन ठन कर इधर-उधर घूमते रहते हैं, ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिये अभिशाप माने जाते हैं । ऐसे आदमियों को कोई अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। उनका सभी जगह निरादर होता है। प्यारा चाम नहीं काम होता है।
जीवन-विद्या के विद्वान व प्रमुख आचार्य टिनमैन अपने अनुयाइयों को सम्बोधित कर कहा करते थे-”जो आलस्य में अपना मूल्यवान् समय गँवाता है वह अभागा है। पृथ्वी पर परिश्रम से मुक्ति नहीं है । मनुष्य कर्म के लिये उत्पन्न हुआ है। उसे जीवन भर परिश्रम करना चाहिये।” एक कर्मशील महापुरुष का कथन है-”जीवन के उपरान्त चिर-काल तक मुझे विश्राम ही तो करना है।”
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965
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