रविवार, 28 जून 2026

👉 सादगी और संतोष की जिन्दगी!

वस्तुओं की प्रचुर मात्रा भी मनुष्य को सन्तोष नहीं दे सकती, पर इससे ठीक उल्टी विधि अपनाने से काम बन जाता है। मन को सन्तोष का अभ्यस्त कर लिया जाय तो इच्छा की पूर्ति सहज ही हो जाती है। मनुष्य की आवश्यकताएं स्वल्प हैं। उपभोग भी एक सीमा तक ही हो सकता है। उतना उपार्जन करना और साधन जुटाना सरल है। अतएव इच्छाएं सीमित रखने, उपभोग को औचित्य की मर्यादा में रखने तथा कठिन परिश्रम से उपार्जन में जुटे रहने पर कोई कारण नहीं कि इच्छाओं की पूर्ति न हो सके। अभावग्रस्तता और दरिद्रता का रोना आलसी, अपव्ययी रोते है या फिर जिनकी आकाँक्षाएं असीमित है।

संग्रह और उपभोग पर सीमा बाँन लगना चाहिए। इसके लिए औचित्य की मर्यादा और देख वासी के स्तर की होनी चाहिए। एक परिवार के सदस्य आमतौर से एक ही स्तर का रहन सहन तथा निर्वाह अपनाते है। भले ही उनमें से कोई अधिक खाये, पहने भी, यह भी नहीं हो सकता, इससे असमानता बढ़ेगी, मनोमालिन्य पनपेगा और ऐसी परम्परा चल पड़ेगी, जिसके रहते स्नेह सौजन्य का टिक सकना कठिन है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यदि सादगी का जीवन जिया जाए तो कम आजीविका वाले व्यक्ति भी प्रसन्नता भरे गुजार सकते हैं और सन्तोष के साथ रह सकते है।

अपव्यय अपने आप में एक बड़ा दुर्गुण है। कोई व्यक्ति अधिक कमाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस कमाई को फिजूल खर्च में फूँक दिया जाए। इस पैसे से ज्ञान-वृद्धि जैसे स्वार्थ और दूसरों की सहायता करने जैसे परमार्थ साधे जा सकते है। उससे आत्म कल्याण और लोक कल्याण के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। ठाट-बाट का अहंकारी प्रदर्शन तथा विलासी शौक-मौज के अपव्यय में हाथ खुला छोड़ने पर आदत बिगड़ती है और अधिक खर्च करने की इच्छा होने लगती है। वह बढ़ते बढ़ते नशेबाजों जैसी कुटेब बन जाती है। ऐसे कुटैवग्रस्तों का काम उचित उपार्जन से नहीं चलता, वह कम पड़ता है। इसलिए बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए अनुचित मार्ग अपनाने पड़ते हैं। अधिकाँश अपराधियों के मूल रूप में यही देखा जाता है।

यह सोचना सही नहीं है कि जितने ठाट बाट से रहेगा वह उतना ही बड़ा समझा जायेगा। यह बचकाना-चिन्तन समझदारों का नहीं होता। बड़प्पन सज्जनता है और उसकी पहचान सादगी से होती है। सादगी का अर्थ है-नम्रता, निरहंकारिता। अपने को जन-साधारण स्तर का समझने वाला खर्चीला रहन-सहन नहीं अपना सकता, क्योंकि उसमें क्षुद्रता और अहमन्यता की स्पष्ट गंध आती है। जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का अनुभव नहीं करते, वे ही संग्रही, विलासी और अहंकारी की भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे लोगों से स्वार्थ साधने वाले ही चाटुकारी भरी मुँह सामने प्रशंसा कर सकते हैं। पीछे पीछे भी उनके मुँह से यथार्थता निकलती है। स्वार्थी, संकीर्ण और निष्ठुर प्रकृति के व्यक्ति ही प्रायः महत्वाकाँक्षी होते हैं। उदारचेता अधिक कमाने पर भी सीमित साधनों से सादगी का निर्वाह करते हैं और उन महत्वकाँक्षाओं से दूर रहते है। ऐसा न करने पर समय और श्रम का अधिकाँश भाग खप जाता है। इस संदर्भ में कटौती करने पर व्यक्तिपरक कार्यों में संलग्न हो सकता है, जो सद्गुणों की अभिवृद्धि कर सके और सर्वत्र सुख-शान्ति का वातावरण बना सके।

लोग अच्छी बातों की नकल कम और बुरी बातों की अधिक करते हैं। एक अपव्ययी अनेकों को उस का आदि बना देता है। फलतः दोष रोष और असन्तोष तीनों ही बढ़ते और वातावरण को विषाक्त करते हैं। वस्तु इच्छाओं को सन्तोष तथा सादगी की जिन्दगी जीना ही श्रेयस्कर है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 28 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2026


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शनिवार, 27 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (अंतिम भाग)

इस देहासक्ति से मनुष्य की बड़ी गहरी हानि होती है। देह को प्रधानता मिलते ही आत्मा पीछे रह जाती है। आत्मा के गौण होते ही अज्ञान का घना अंधकार घेर लेता है और तब उस अंधकार में इस मान जीव की जो दुर्दशा होती है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उसे भय, संशय, सन्देह तथा आशंकाओं की डायन हर समय सताया करती है। एष्णा और तृष्णायें उसे एक क्षण भी विश्राम नहीं लेने देतीं। आस्तिकता, आस्था और अञनागत भविष्य के सारे दीप बुझ जाते है और मनुष्य एक अँधेरा अन्त पाकर अनन्त अंधकार में जाकर तुम कल्पों के लिए डूब जाता है।

शरीर और कुछ नहीं एक साधन मात्र है, आत्मा के उद्धार का साधन। इसकी खोज खबर रखनी तो चाहिये, पर उसी सीमा तक जहाँ तक यह साधन रूप में आत्मोद्धार में सहायक हो सके। इसे स्वस्थ तथा सशक्त बनाये रखने के लिये जो भी जरूरी हो करिये पर इसकी इन्द्रिय लिप्सा की जिज्ञासा का कभी भी रंजन न करिये। विषय भोग और आराम, विश्राम जिन्हें यह माँगा करता है, इसके लिये घातक तथा अनावश्यक है। इनकी सुविधा पाकर यह शरीर आलसी, प्रमादी और ढीठ बन जाता है और तब हर उस साधना में आनाकानी करने लगता है, जो आत्मा के उद्धार में आवश्यक होते है। अस्तु देहाभिमान अथवा आशक्ति से सदा सावधान रहकर दूर रहना चाहिये।

देहासक्ति छूटते ही बाकी सारी आसक्तियाँ आपसे आप छूट जाती है। इसका पोषण करते हुए, इसको ठीक वैसे ही भूले रहिये, जैसे जीव इसका विसर्जन हो जान के बाद भूल जाता है। ममता मोह और माया के सारे सम्बन्ध भी टूट जाते है, ठीक उसी प्रकार इसका विस्मरण किए रहने से सारी आसक्तियाँ छूट जावेंगी और तब अन्तिम समय में उनको अनुभूति भी साथ लगी हुई न जायेगी। जीवनिर्लित और निर्मोहपूर्वक जाकर अनन्त जीवन को ग्रहण कर लेगा।

मनुष्य का जीवन ही अन्तिम नहीं है, इसके बाद एक दीर्घकालीन जीव भी है, जिसके यापन में आवश्यक पुष्य का सम्बल इस जीवन में संचय करने के लिए अनासक्ति भाव से कर्म करते हुए, जीवन चलाइये और बाद में माया-मोह तथा आसक्ति से निवृत्त होकर संसार से यात्रा कीजिए। तभी वहाँ जाकर दीर्घकालीन सुख, सन्तोष की प्राप्ति होगी।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 27 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 June 2026



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शुक्रवार, 26 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 3)

पारलौकिक जीवन की तैयारी में निर्मोह, निर्लिप्तता अथवा अनासक्ति की साधना भी परमावश्यक है। इस असार संसार के माया मोह लेकर जाने वाले उस पार के अपार जीवन में बड़ी सघन यातना के भागीदार बनते है को माया मोह के कारण रो-रोकर प्राण छोड़ते और तड़प तड़प कर संसार से विदा होते है, वे वहाँ भी अपनी अस अन्तिम स्थिति के अनुसार वैसे ही रो रो और तड़प तड़प कर जीवन बितायेगा। मनुष्य की अतिमानसिक स्थिति इस बात का स्पष्ट विज्ञापन है कि उसे उस पारलौकिक जीवन में किस भोग का भागी बनना होगा। यदि वह निर्लिप्तावस्था में हँसता खेलता हुआ गया, तब तो समझना चाहिये कि वहाँ भी हँसता खेलता ही रहेगा और यदि रोता सिसकता हुआ, विदा हुआ तो वहाँ भी रोता सिसकता ही रहेगा। इसमें दो सम्भावनायें नहीं हो सकती।

इह जीवन के दुःख अन्त का सबसे बड़ा और अगाध कारण आसक्ति ही है, आसक्ति के कारण ही सम्बन्धियों के बिछुड़ने का घेरा पड़ता है। आसक्ति के कारण ही थोड़ी सी असफलता निराशा की घटाये घेर लेती है। आसक्ति के कारण ही जरा सी उपेक्षा प्रतिहिंसा की आग जला देती है और आसक्ति के कारण ही धन वैभव के लिए पाप कर्मों में संलग्न हो जाते है। अस्तु आसक्ति ही को सारे दुःखों का मूल कारण मानना और उससे छूटने का उपाय करना चाहिये।

आसक्ति बड़ा भयंकर रोग है, फिर चाहे वह पुत्र-पत्नी के प्रति हो, धन-दौलत के प्रति हो, सुहृद सहचरों के प्रति हो देह अथवा अभिरुचियों के प्रति हो। इस रोग से बच कर ही मनुष्य एक निरामय एवं निर्भय जिन्दगी जी सकता है और निश्शंक अनत अपना सकता है।

जिस भय के कारण लोग कायर-कुचाल और कापुरुष बन जाते है, उसकी जननी आसक्ति ही है देहासक्ति के कारण ही लोग इस भय से उसके रंजन, भंजन में लगे रहते है कि कहीं यह बूढ़ी न हो जाये, कहीं इसकी शक्ति न चली जाये, कहीं भोग वासना के अयोग्य न हो जाये। इसी भय के कारण ही उसे विधि और पट-परिधानों की पूजा पगार चढ़ाते रहते है। वे पता नहीं, यह क्यों नहीं सोच पाते कि यह नश्वर मिट्टी एक दिन मिट ही जानी है। इस पर कितना ही चन्दन बदन क्यों न चढ़ाया जाये, कितनी ही मनौती और भिन्न क्यों न की जाये समय पाकर यह बूढ़ी तथा कुरूप हो ही जायेगी। आवश्यकता से अधिक शरीर को मान्यता देने का कारण यह देहासक्ति ही है। इस निःसार देहासक्ति के कारण मनुष्य न तो दृढ़ता पूर्वक साधन कर पाता है और न नियम, संयम का निर्वाह। अधिक साधने अथवा बाल खींचने से कहीं यह निर्बल न हो जाये-अधिक संयम, नियमों से इसको कष्ट होगा। परमार्थ पथ पर डाल देने से इसके भोग विलास के अधिकार छिन जायेंगे आदि आदि न जाने कितनी कल्पनायें मनुष्य को देहारोधक बना देती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 26 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 June 2026


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गुरुवार, 25 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 2)

अस्तु इस जीवन का कुछ पता नहीं कि यह किस समय अपनी गति को मति में बदल दे। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि इसकी क्षणभंगुरता को स्वीकार कर तुरन्त इसी क्षण से अपने पारलौकिक जीवन की तैयारी में संलग्न जो जाया जाये। जो बिना संबल, संचय किये अनन्त प्रवास में चला जायेगा, उसे अनन्त कष्ट होंगे, यह निश्चय है। वहाँ यहाँ जैसी स्वाधीनता और सुविधा नहीं है, जो यहाँ से न भी ने जायें, वहाँ बना लेंगे, संचय कर लेंगे। वहाँ तो यहाँ साथ लिये पाथेय के बल पर ही अवधि यापन करनी होगी। वहाँ न सत्कर्म का अवसर मिलेगा और न अपकर्म का। वहाँ तो केवल यहीं के कर्मों के अनुसार आपको आपका संचय दे दिया जायेगा, जिसके ड़ड़ड़ड़ पर फिर चाहे आपको आनन्द भोगना पड़े और चाहें यातनाएँ।

यहाँ का संचय किया हुआ वह सम्बल क्या है, जो वहाँ काम आना है? वह सम्बल है पुण्य-परमार्थ निर्मोह और निर्लिप्तता पुण्य परमार्थ का अर्जन सत्कर्म और उसके साथ लगी हुई, सद्भावना से होता है। यदि सत्कर्म के साथ सद्भावना का संयोग नहीं है तो उस सत्कर्म का पुण्य परास्त हो जायेगा। एक मनुष्य किसी दुःखी की सहायता करता है पर भावना यह रखता कि ऐसा करने से यह मनुष्य मुझे अमीर और उदार समझेगा, मेरा आभारी होगा और यथासम्भव मेरी पूजा-प्रतिष्ठा करेगा। समाज में जो देखे, सुनेगा, वह मुझे सम्मान देगा, मेरा आदर करेगा, जिससे समाज में मेरा स्थान बनेगा। बस उसका सत्कर्म दूषित हो गया, उसका पुण्य ऋणी हो गया, ऐसा सत्कर्म पारलौकिक जीवन में सम्बल बन कर काम न आ सकेगा।

यह पुण्य बन कर सम्बल तब बनेगा, जब सहायता करने के पीछे कोई भाव ही न रहे और यदि रहे तो यह भाव रहे कि अमुक व्यक्ति हमारी तरह ही मनुष्य है। हमारा भाई है। उसकी आवश्यकता, उसकी तकलीफ और उसका कष्ट हमारा कष्ट है। हमारी सहायता पाना उसका नैसर्गिक अधिकार है और सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। मेरे पास जो कुछ है, वह सब प्राणी मात्र की धरोहर है, जो सबको उचित प्रकार से मिलनी ही है। मेरा इस पर कोई आभार नहीं, बल्कि इसका ही आभार मुझ पर है, जो यह मेरी सेवा, मेरी सहायता स्वीकार करने की कृपा कर रहा है। इस प्रकार के अहंकार रहित सत्कर्म ही पारलौकिक जीवन के सम्बल बना करते है।

किन्तु यह निरहंकार भावना प्राप्त कैसे हो? इसके लिये भी उपाय करना होगा। और वह उपाय है उपासना ईश्वर पुनीति। सम्पूर्ण आत्म-समर्पण के साथ परमात्मा की उपासना करते करते जब व्यक्ति के हृदय में उसका प्रकाश आ विराजेंगे, तब उसे सारा जड़-चेतन संसार परमात्मा रूप ही दीखने और अनुभव होने लगेगा। उसका ‘स्व’ सार्वभौम हो जायेगा। ऐसी स्थिति में उसे किसी से पृथकता का अनुभव ही न होगा। स्वयं सहायक, समानार्थी, सहायता और परिणाम सबका सब ईश्वर रूप ही दिखाई देगा। ऐसी दशा में उसे न तो यह पता चलेगा कि वह किसी की सहायता कर रहा है या कोई उससे सहायता पा रहा है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 25 June 2026


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 June 2026


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मंगलवार, 23 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 1)

इस जीवन के बाद मनुष्य का एक और भी जीवन है, जो कि इस जीवन से लाखों करोड़ों गुना लम्बा है। कितने वर्षा, युगों और कल्पों तक यह जीवन चलता है, इसका अनुमान सम्भव नहीं है। यह एक प्रकार से अपनी अपरिमित अवधि के कारण अनन्त और अमर भी कहा जा सकता है। उसे पारलौकिक जीवन कहा गया है।

पारलौकिक जीवन के विश्वास में सन्देह की गुँजाइश अब नहीं रह गई। आज का विज्ञान भी मनुष्य के रहस्यों को खोजता हुआ, कुछ ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच रहा है, जिसमें पारलौकिक जीवन के प्रमाण मिले है। किन्तु भारतीय ऋषि-मुनियों ने तो अपनी साधना, अपने ज्ञान और अपनी तपस्या के आधार पर इसका बहुत पहले पता लगाकर घोषणा कर दी थी और इसीलिए सारा भारतीय जीवन उसको ही लक्ष्य मानकर, उसको ही दृष्टि में रखकर निर्धारित किया गया है। पारलौकिक जीवन को अदृष्टिगोचर रखकर लौकिक जीवन नहीं जिया जा सकता और जो ऐसा करते है, अनियोजित तथा अबूझ जीवन जीते है, वे धोखा खाते है और अपने उस अनन्तकाल जीवन के लिये काँटे बो लेते है।

लौकिक जीवन पारलौकिक जीवन की तैयारी का अवसर है। इसको ही यथार्थ अन्तिम जीवन मान लेना भारी भूल है। मनुष्य यहाँ इस जीवन में जो कुछ पाप-पुण्य दुख-सुख भलाई-बुराई स्वार्थ-परमार्थ संचय करता है, वही उसके साथ जाकर उस पारलौकिक जीवन में फलित तथा प्रस्फुटित होता और उसी के अनुरूप जीव अनन्तकाल तक सुख दुख अथवा स्वर्ग नरक भोगा करता है। वर्तमान जीवन अनागत जीवन की तैयारी का एक अवसर है। इस तथ्य को कभी न भूलना चाहिये और उसको सुखद तथा सन्तोषप्रद बनाने के लिए, यहीं अभी से तैयारी कर लेनी चाहिये।

जीव का जागरूक जीवन अविश्वनीय तथा नश्वर है। इसे नष्ट तो होना ही है, पर साथ ही यह भी पता नहीं कि यह सौ वर्ष तक जायेगा या इसी क्षण अथवा अगले क्षण छुट जायेगा। इस नश्वरता और क्षणिकता के प्रमाण बनकर न जाने कितने ही आकस्मिक मरने वाले आँखों और कानों के सामने से गुजरते रहते है। सोते हुये, खाते और पीते हुए, हँसते और बोलते हुये, खेलते और काम करते हुये, न जाने कितने जीव नित्य ही इह लीला समाप्त कर अपने दीर्घकालीन पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने और यहाँ का लेखा जोखा भोगने के लिये चल देते है। बेटा बैठा रहता है, पत्नी खड़ी रहती है, सम्बन्धी देखते रहते हे, सम्पत्ति और संचय पड़ा रहता है पर आवाज सुनते ही पंछी पूरी अधूरी योजनाएँ, कार्यक्रम, बात-चीत और व्यवहार बर्ताव सब कुछ छोड़कर उड़ जाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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सोमवार, 22 जून 2026

👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (अंतिम भाग)

इस तरह के प्रतिरोध के लिए अकेले व्यक्ति को तो संकल्प करना ही चाहिए, किन्तु सारे समाज को संगठित होकर बुराइयों के विपरीत कदम उठाना चाहिए। कोई कारण नहीं कि समाज की संगठित शक्ति के समक्ष बुराइयाँ जीवित रह सकें। खेद है, सामाजिक उत्तरदायित्व हम लोग नहीं समझते। कोई व्यक्ति किसी गुण्डे से निपटते समय सहायता के लिए पुकार करता है, तो हम किवाड़ बन्द करके बैठ जाते हैं, सुनकर भी अनसुनी कर जाते हैं, देखकर भी अनदेखे बन जाते हैं। लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब हमें भी इन दूषित तत्वों से आक्रान्त होना पड़ेगा।

आज बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष में, भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सामूहिक अभियान की आवश्यकता है। जब तक लोगों में इस सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पैदा न होगी, तब तक बुराइयाँ एक-एक कर हम सबको प्रभावित करती रहेंगी, हानि पहुँचाती रहेंगी।

हमारी एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बड़े-बड़े सिद्धान्त बघारते हैं, नीति और न्याय की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, लेकिन यह सब दूसरों के लिए। अपने कार्य कलापों को न्याय, नीति की कसौटी पर हम बहुत ही कम कसते हैं। एक दुकानदार बाजार में बैठकर सरकार, पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोज कर आलोचना करता है, किन्तु उसकी आलोचक वृत्ति उस समय गायब हो जाती है, जब वह वस्तुओं में मिलावट करता है, ग्राहकों को कम तोलता है, अधिक मुनाफा वसूल करता है। आततायी और गुण्डों को हम लोग कोसते हैं, उन्हें बुरा कहते हैं, किन्तु हमारी समीक्षात्मक बुद्धि उस समय जाने कहाँ चली जाती है, जब हम पराई स्त्री को बुरी निगाह से देखते हैं। बिना प्रति-मूल्य दिए समाज के साधनों का उपभोग करते हैं, अनीति के साथ धन एकत्र करते हैं, दूसरों के श्रम अधिकार एवं साधनों का अनुचित शोषण करते हैं।

जिस तरह हम दूसरों की आलोचना करते हैं, उसके लिए न्याय नीति की माँग करते हैं, उसी तरह यह भी आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार को नीति, धर्म की कसौटी पर कसें। जो बुरा है उसे न करें।

हम दूसरों के साथ कोई ऐसी बात न करें जो स्वयं अपने लिए न चाहते हों। बुराइयों को मिटाने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व जो हम पर हैं, उसे सब तरह के खतरे उठाकर भी पूरा करने में न चूकें। कार्य व्यवहार को नीति, न्याय और धर्म की कसौटी पर परखें, जो बुराई है उससे दूर रहें। ये तीन बातें हमारे जीवन में ढल जायँ तो कोई सन्देह नहीं कि ये बुराइयां आज नहीं तो कल समाप्त ही हो जायगी।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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