मंगलवार, 11 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १५)

प्याली में सागर समाने जैसा है भक्ति का भाव
    
देवर्षि ने भगवान दत्त को मन ही मन प्रणाम करते हुए कहा- ‘‘देव! आपके आगमन से मेरा यह सूत्र फलित हो गया है। इसकी व्याख्या आप स्वयं करें।’’ पर प्रकट रूप से वह मौन थे। हालाँकि देवर्षि की इस मनोवाणी को सप्तर्षियों सहित महर्षि लोमश एवं मार्कण्डेय आदि ने भी सुना और फिर सबने उनसे आग्रह किया कि वे देवर्षि के भक्ति सूत्र की व्याख्या करें। सभी के आग्रह पर भगवान दतात्रेय विंहसे और नारद की ओर देखते हुए बोले- ‘‘देवर्षि! आप धन्य हैं, जो इस भक्तिकथा में प्रवृत्त हुए हैं। आपका यह सूत्र यथार्थ है, सार्थक है, इसमें साधना जीवन का सार है।
    
भावों की परिशुद्धि के साथ जब ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होता है और यह जीवन का रूपान्तरण करती हुई, परमात्म-ऊर्जा में लय होती है, तभी इस सूत्र का अनुभव होता है। सामान्य भावचेतना तो अपनी अशुद्धियों के कारण परमात्म चेतना की अनुभूति कर ही नहीं सकती। पर रूपान्तरित होने के बावजूद इस अनुभव को सहन कर पाना कठिन है। कुछ ऐसा जैसे कि प्याली में सागर उमड़ आये। जीवात्मा में परमात्मा के उमड़ते ही एक अद्भुत सात्विक-आध्यात्मिक उन्माद छा जाता है, फिर नहीं बचती लोकरीति की लकीरें, नहीं बचती जीवन की क्षुद्रताएँ। होती है तो बस विराट्-व्यापकता में विलीनता। ऐसी मस्ती छाती है कि न मन रुकता है और न तन। जीवन झूम उठता है और गूँजता है भक्ति का भाव संगीत, जो किन्हीं भी सात सुरों का मोहताज नहीं होता, बल्कि इसमें तो सभी सुर-ताल लय हो जाते हैं।’’
    
भगवान दत्त कह रहे थे और सभी सुन रहे थे। अग-जग में, हिमालय के कण-कण में उनकी वाणी व्याप्त हो रही थी। सभी को यह बात ठीक लग रही थी कि छोटी सी प्याली में सागर समा जाय तो फिर प्याली का पागल होना स्वाभाविक है। बूँद में सागर उतर जाए तो भला बूँदों की दुनिया के नियम कैसे बचेंगे। कुछ वैसे ही जब भक्त के जीवन में सम्पूर्ण भगवत्ता अवतरित होने लगे तो एक आँधी तो आयेगी ही, एक तूफान तो उठेगा ही और फिर जो दृश्य उभरेंगे, जो कुछ घटेगा उससे भक्त स्तब्ध तो होगा ही। ऐसे में वह होता है जो कि कभी हुआ ही नहीं, जिसके बारे में न तो कभी सोचा और न ही कभी जाना। ऐसा बहुत कुछ, बल्कि कहें तो सब कुछ होने लगता है भक्त के जीवन में, जो उसे स्तब्ध करता है। वह हो जाता है अवाक्। उसकी गति रुक जाती है। पहले की सारी गतियाँ थम जाती हैं। अब तक जो भी जाना था, वह व्यर्थ हो जाता है। अब तक जिसे पहचाना था, वह बेगाना हो जाता है।
    
पहले मत्त, फिर स्तब्ध। ये घटनाएँ एक के बाद एक घटती हैं, फिर जब यह स्तब्धता थमती है तो अंतस् में बहती है एक अलौकिक धारा-आत्मरमण की धारा। बड़ा अद्भुत होता है यह सब। इसे जो जानता है वही जानता है। भगवान दत्त के शब्दों की लय में सभी के मन विलीन हो रहे थे। छायी हुई थी आत्मलीनता। देवर्षि स्वयं भी सुन रहे थे और अनुभव कर रहे थे कि उनके अंतर्यामी नारायण ही आज बाह्य रूप से दत्त भगवान बनकर पधारे हैं। आज भगवान स्वयं अपनी भक्ति की व्याख्या कर रहे हैं। उनकी यह भावनाएँ मौन में ही मुखर थीं। प्रकट में तो वह केवल प्रभु की दिव्यलीला के साक्षी थे।
    
मन ही मन उन्होंने कहा- ‘‘कुछ और कहें प्रभु!’’ देवर्षि की चेतना में उठे इन स्पन्दनों ने दत्तात्रेय को स्पन्दित किया और वह बोले- ‘‘जो भक्ति पथ पर चलना चाहते हैं, उनसे मेरा यही कहना है कि इस पथ पर पहले तो पीड़ा होगी बहुत, विरह भी होगा। मार्ग में काँटें भी चुभेंगे, आँसू भी बहेंगे, पर भक्त को बिना घबराये आगे बढ़ना है, क्योंकि जो मिलने वाला है वह अनमोल है। जिस दिन मिलेगा उस दिन भक्त उन्मत्त हुए, स्तब्ध हुए, आत्माराम हुए बिना न रहेगा। उसकी एक-एक आस पर हजार-हजार फूल खिलेंगे। उसकी एक-एक पीड़ा, हजार-हजार वरदान लेकर आयेगी।’’ इतना कहते हुए भगवान दत्तात्रेय ने सभी से विदा ली और अंतर्ध्यान हो गये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३४

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १५)

👉 समस्त दुखों का कारण अज्ञान

प्रगति वस्तुओं का बाहुल्य के, इन्द्रिय भोगों के अथवा प्रिय परिस्थितियों की उपलब्धि के साथ जुड़ी हुई नहीं है, वरन् ज्ञान के विस्तार से सम्बन्धित है। जिनका ज्ञान जितना सीमित है वह उतना ही पिछड़ा हुआ है। सम्भव है जिनकी ज्ञान सम्पदा बढ़ी-चढ़ी है, उसकी शक्ति और अशक्ति का लेखा जोखा भी ज्ञान सम्पदा की न्यूनाधिकता के साथ जुड़ा हुआ है।

मनुष्य का नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर उसकी सुसंस्कृत ज्ञान चेतना के साथ जुड़ा हुआ है। भौतिक शक्तियों के उपार्जन और उपभोग को भी मानसिक विकास से पृथक नहीं रखा जा सकता। आदिकाल में मनुष्य शारीरिक दृष्ट से अब की अपेक्षा अधिक बलिष्ठ रहा होगा, पर उसकी चेतना पशु स्तर से कुछ ही ऊंची होने के कारण सुविकसित लोगों की तुलना में गया गुजरा ही सिद्ध होता रहा है। अतीत के पिछड़ेपन पर जब एक दृष्टि डालते है तो प्रतीत होता है कि चिन्तन क्षेत्र में अज्ञान की स्थिति कितनी कष्टकर और कितनी लज्जास्पद परिस्थितियों में मनुष्य को डाले रही है।

अमेरिकन म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री के पक्षी विभाग ऐसोसियेट क्यूरेटर द्वारा प्रकाशित विवरणों से पता चलता है कि न्यूगिनी के आदिम और आदिवासी किस तरह अपने क्षेत्र में जा भटकने वाले लोगों को भून-भूनकर खा जाते थे। उस क्षेत्र में पक्षियों की खोज में एक खोजी दल जा पहुंचा। पापुआन क्षेत्र के मियाओं कबीले के बड़े निर्दय क्रूर कर्मों के लिये प्रसिद्ध हैं। इस क्षेत्र में किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बिना किसी को जाने देने की इजाजत नहीं है, पर वह खोजी दल किसी प्रकार उस क्षेत्र में जा ही पहुंचा और उसके सभी सदस्यों का रोमांचकारी वध हो गया।

पादरी आइवोस्केफर उस क्षेत्र में 45 वर्ष से इन नर भक्षियों के बीच प्रभु ईसा का सन्देश सुनाने के लिये रहते थे। उन्होंने इन नर भक्षियों को अपने प्रेम एवं सेवा कार्य से प्रभावित कर रखा था। शिक्षा चिकित्सा आदि उपायों से उन्होंने इस क्षेत्र के निवासियों का मन जीत लिया था। उन्हें वे पवित्र आत्मा समझते थे और किसी प्रकार की हानि पहुंचाने के स्थान पर सम्मान प्रदान करते थे।

आरम्भ में उस निष्ठावान, धर्मात्मा किन्तु क्रिया कुशल पादरी ने बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ इन लोगों के बीच अपना स्थान बनाया था स्केफर ने अपनी पुस्तिका में लिखा है कि—पहली बार जब वे इस इलाके में अपने एक साथी के साथ गये तो उन्हें नर भक्षियों के द्वारा घेर लिया गया। उन्हें देखने वालों ने शोर मचाकर 40-50 योद्धाओं को बुला लिया—वे भाले ले लेकर आ गये और हम लोगों को चारों ओर से घेरे में लेकर हर्ष नृत्य करने लगे। उन्हें दो मनुष्य का—उसमें भी गोरों का ताजा मांस खाने को मिलेगा। इस कार्य का श्रेय वे लेंगे इस खुशी में उन्मत्तों जैसी उछल कूद कर रहे थे। घेरे में आये शिकार अब भाग तो सकते नहीं थे।

इस सम्बन्ध में वे निश्चित होकर देवता के बलिदान के उद्देश्य से गीत गा रहे थे और हर्ष मना रहे थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २३
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

रविवार, 9 मई 2021

👉 उम्मीद का दिया

एक घर मे पांच दिए जल रहे थे।

एक दिन पहले एक दिए ने कहा -

इतना जलकर भी मेरी रोशनी की लोगो को कोई कदर नही है...

तो बेहतर यही होगा कि मैं बुझ जाऊं।

वह दिया खुद को व्यर्थ समझ कर बुझ गया।

जानते है वह दिया कौन था?

वह दिया था उत्साह का प्रतीक।

यह देख दूसरा दिया जो शांति का प्रतीक था, कहने लगा -

मुझे भी बुझ जाना चाहिए।

निरंतर शांति की रोशनी देने के बावजूद भी लोग हिंसा कर रहे है।

और शांति का दिया बुझ गया।
उत्साह और शांति के दिये के बुझने के बाद, जो तीसरा दिया हिम्मत का था, वह भी अपनी हिम्मत खो बैठा और बुझ गया।

उत्साह, शांति और अब हिम्मत के न रहने पर चौथे दिए ने बुझना ही उचित समझा।

चौथा दिया समृद्धि का प्रतीक था।

सभी दिए बुझने के बाद केवल पांचवां दिया अकेला ही जल रहा था।

हालांकि पांचवां दिया सबसे छोटा था मगर फिर भी वह निरंतर जल रहा था।

तब उस घर मे एक लड़के ने प्रवेश किया।

उसने देखा कि उस घर में सिर्फ एक ही दिया जल रहा है।
वह खुशी से झूम उठा।
चार दिए बुझने की वजह से वह दुखी नही हुआ बल्कि खुश हुआ।
यह सोचकर कि कम से कम एक दिया तो जल रहा है।

उसने तुरंत पांचवां दिया उठाया और बाकी के चार दिए फिर से जला दिए।

जानते है वह पांचवां अनोखा दिया कौन सा था?

वह था उम्मीद का दिया...

इसलिए अपने घर में अपने मन में हमेशा उम्मीद का दिया जलाए रखिये।

चाहे सब दिए बुझ जाए लेकिन उम्मीद का दिया नही बुझना चाहिए।

ये एक ही दिया काफी है बाकी सब दियों को जलाने के लिए....
        
ख़ुशियाँ आएँगी, कुछ समय बाद सब सामान्य होगा, उम्मीद का दिया जलाए रखें।

शनिवार, 8 मई 2021

👉 चाफेकर बन्धु

8 मई, 1859 बलिदान दिवस
                    
चाफेकर बन्धु तीन भाई थे, तीनों सगे भाई थे और तीनों को ही फाँसी की सज़ा हुई. उनके नाम थे दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वासुदेव हरि चाफेकर.
                   
फाँसी लगने के पश्चात् स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता चाफेकर बन्धुओं की माँ को सांत्वना देने के लिए उनके परिवार में पहुँची. उनकी माँ को देखकर वह स्तब्ध रह गयीं.
                  
उनकी कल्पना के विपरीत वह माँ बिलकुल शान्त, अविचल, मुख मण्डल पर वेदना की एक भी रेखा नहीं बल्कि गर्व से माथा उन्नत. सांत्वना के कोई भी शब्द कहे बिना केवल चरणस्पर्श करके वह वापस आ गयीं.
                   
सन् 1857 में पूना में प्लेग की महामारी फैली. लोग चूहों की तरह फटाफट मरने लगे. सरकार ने उसकी रोकथाम के लिए चार्ल्स रैंड को लगाया. उसके सिपाही रोकथाम के नाम पर हर घर में घुस जाते. जूता पहनकर पूजा गृह तथा रसोईघर में घुस जाते.
                    
महिलाओं द्वारा विरोध करने पर उनसे अशिष्ट एवं अभद्र व्यवहार करते. यहाँ तक घर का सामान उठाकर चले जाते. रैंड की कठोरता के विरुद्ध चाफेकर बन्धुओं ने उसे सबक सिखाने का निश्चय किया.
                   
22 जून,1857 को महारानी विक्टोरिया के राज्यभिषेक की हीरक जयंती का समारोह किया जाना था. दामोदर और बालकृष्ण ने विचार किया कि उस दिन मौज मस्ती के कारण रैंड असावधान होगा तब उसका काम तमाम किया जा सकता है.
                   
सांयकाल के समय गवर्नमेंट हाऊस के विशाल समारोह में लगभग साढ़े सात बजे चार्ल्स रैंड की बग्घी पहुँची. तीनों भाई उसकी घात लगाए बैठे थे. रात्रि 12 बजे समारोह समाप्त हुआ. धीरे-धीरे बग्घी वापस आने लगी और बालकृष्ण ने बग्घी को पहचान लिया.
                    
उसने 'नारया नारया' की आवाज़ लगाई आवाज सुनते ही दामोदर पायदान पर चढ़ गया, बायें हाथ से पर्दा हटाया और बिलकुल पास से रैंड पर गोली दाग़ दी, रैंड वहीं ढेर हो गया. दामोदर भाग खड़े हुए.
                       
रैंड की बग्घी के बिलकुल पीछे मि. आयरिश की बग्घी आ रही थी और वह शराब के नशे में धुत था. उनकी पत्नी ने उन्हें सावधान किया किन्तु निष्फल. इसी दौरान एक युवक ने उस पर गोली चला दी और वो भी वहीं ढेर हो गया. वह युवक था बालकृष्ण चाफेकर.
                      
दोनों अंग्रेज़ी अफ़सरों के वध का गुप्तचर विभाग के अध्यक्ष मि. ब्रुइन को सौंपा गया. किन्तु दो महीनों के प्रयास के पश्चात् निराशा ही हाथ लगी. तब उन्हें पकड़वाने के लिए 20 हज़ार रुपये का ईनाम घोषित किया गया. अंत में रामचंद्र द्रविड़ और गणेश शंकर द्रविड़ इस लोभ में आ गये.
                     
उन्होंने ही मि.ब्रुइन को बताया कि यह काम दामोदर चाफेकर और बालकृष्ण चाफेकर का हो सकता है. दामोदर चाफेकर पकड़े गए लेकिन बाल कृष्ण चाफेकर बच निकले.
                    
दामोदर के ख़िलाफ़ कोई सबूत न होते हुए भी न्यायाधीश ने हत्या का मामला बनाकर 18 अप्रैल,1858 को दामोदर हरि चाफेकर को फाँसी की सज़ा दे दी.
                     
अब बालकृष्ण को पकड़ने की बारी थी. उसे पकड़ने के लिए उसके सगे, सम्बन्धियों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही थी. तब बालकृष्ण ने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे भी 12 मई,1858 को फाँसी दे दी गयी.
                      
अब गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड़ को सबक सिखाने की बात थी. महादेव रानडे और वासुदेव चाफेकर दोनों ने मिलकर द्रविड़ बन्धुओं को अपनी गोली का शिकार बनाया. गणेश तो वहीं ढेर हो गया, रामचंद्र को अस्पताल ले जाया गया, उसने भी वहाँ पहुँचकर दम तोड़ दिया. 20 हज़ार ईनाम के बदले उन्हें मौत का सामना करना पड़ा.
                     
वासुदेव चाफेकर और महादेव रानडे पकड़े गए. मुकद्दमा चला और फाँसी की सज़ा हुई. वासुदेव चाफेकर को 8 मई और महादेव रानडे को 10 मई को फाँसी दे दी गई.

शुक्रवार, 7 मई 2021

👉 बीतेगा ये बुरा वक्त


अवसादों  के  अब  तमस हटेंगे, आशाओं के दीप जलेंगे।
बीतेगा  ये  बुरा  वक्त  फिर, खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

अंधियारी मिट जाएगी फिर, विश्वासों  का  सूर्य उगेगा।
उमंगों की बगिया में फिर से, हर्ष-हर्ष का फूल खिलेगा।।
नया  सूर्य गगन  में  होगा, अमन  चैन  के  दिन  फिरेंगे।
बीतेगा  ये बुरा   वक्त फिर,  खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

जीतेंगे ये  जारी  जंग  को, दुःख:  निराशा पास न  होगा।
फिर से सबकुछ अच्छा होगा, अब कोई निराश न होगा।।
कोई  नहीं  अब कष्ट  सहेगा, सभी सुखी  निरोग  रहेंगे।
बीतेगा  ये  बुरा वक्त  फिर,  खुशियों  के  संगीत  बजेंगे।।

मिट जाएगी महामारी अब, परजीवी  का कोप न  होगा।
बहुत सहे  हैं  परेशानी अब, शांति का  साम्राज्य बढेगा।।
कामयाब मिलकर हम होंगे, सबके सुख सौभाग्य बढ़ेंगे।
बीतेगा  ये   बुरा  वक्त  फिर, खुशियों  के संगीत बजेंगे।।

                                                                   उमेश यादव

👉 भक्तिगाथा (भाग १४)

प्याली में सागर समाने जैसा है भक्ति का भाव

महर्षि के होठों का मन्द हास्य भक्ति-किरणों की तरह सभी की अंतर्भावना में व्याप्त हो गया। सबकी रोमावलि पुलकित हो आयी। दीर्घजीवी महर्षि लोमश का सान्निध्य था ही कुछ ऐसा अनूठा। अपनी भक्ति के प्रभाव से वह भगवन्मय हो गये थे। उनसे कुछ और सुनने की चाहत सभी को थी। सम्भवतः हिमशिखर भी इसी आशा में मौन साधे नीरव खड़े थे। हिमप्रपातों की गूँज मद्धम हो गयी थी। आकाश भी भक्त के अंतःकरण की भाँति निरभ्र और शान्त था। सभी को प्रतीक्षा थी तो बस महर्षि के वचनों की।
    
अंतर्यामी ऋषि कहने लगे- ‘‘महनीय जनों! जीवन की दीर्घता नहीं, लोकसेवापरायणता ही वरेण्य है। कौन कितनी आयु जिया, इसकी गणना करने के बजाय यह महत्त्वपूर्ण है कि कौन उसे किस तरह जिया। भगवान की चेतना का विस्तार ही यह संसार है। जो इस अनुभव को जीता है, वही भक्त है। भावों की शुद्धि, भावों की भगवान में विलीनता, भगवन्मय जीवन यही भक्त के लक्षण हैं। इन्हीं की व्याख्या देवर्षि ने अपने सूत्रों में की है। मेरा आग्रह है कि देवर्षि अपनी भक्ति गाथा का विस्तार करें।’’
    
महर्षि लोमश के इन वचनों के साथ ही सभी के नेत्र देवर्षि के मुख पर जा टिके। देवर्षि के चेहरे पर सात्विक सौम्यता विद्यमान थी। उनके होठों से मन्दगति से नारायण नाम का जप चल रहा था। उनके हृदय की भावनाएँ इस नामजप के साथ प्रभु को अर्पित हो रही थीं। महर्षि लोमश के वचनों को सुनकर उन्होंने एक सूत्र का उच्चारण किया-
‘यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति॥ ६॥’
भक्ति के तत्त्व को जानने वाला उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध हो जाता है और आत्मा में रमण करने वाला हो जाता है।
    
देवर्षि के इस सूत्र में उपस्थित जनों के चिंतन सूत्र गुँथने लगे। उनकी भाव चेतना में कुछ अनोखा स्पन्दित हुआ। वहाँ की सूक्ष्मता में कई लहरें उठीं और भक्ति प्रवाह में विलीन हो गयीं। जिज्ञासाएँ भी सघन हुईं, मस्ती, स्तब्धता और आत्मरमण की यह सघनता कैसी है? यह जहाँ अपने पूर्ण रूप में है, वहाँ कैसी है भक्ति की ज्योत्सना? कैसी है छवि और छटा? ऋषियों एवं देवों के चिंतन की इस लय में प्रकृति ने कुछ घोला, मौन हिमालय के अंतर में भी आह्वान के मूक स्वर उठे और तभी सभी की आँखें उस ज्योतिपुञ्ज की ओर उठीं जो इन्हीं क्षणों में साकार हुआ था। यह दैवी उपस्थिति मुग्ध करने वाली थी। इस उपस्थिति मात्र से ही कुछ भाव घटाएँ घिरीं और अंतस् में बरस गयीं।
    
इस भाववृष्टि के बीच सभी ने उस ओर निहारा जिधर ज्योतिपुञ्ज प्रकट हुआ था। अब उस स्थान पर भगवान दत्तात्रेय खड़े थे, साथ में थे उनके पार्षद। दत्तात्रेय और उनके पार्षदों की ज्योतिर्मयी उपस्थिति ने देवात्मा हिमालय के इस आँगन में नयी पावनता एवं चेतनता का संचार कर दिया। दत्तात्रेय ने अपनी उपस्थिति के साथ ही सप्तर्षियों को प्रणाम किया। विशेषतया महर्षि अत्रि को जो उनके पिता भी थे। इसके बाद उन्होंने सभी ऋषियों का अभिवादन किया। महर्षि लोमश जैसे परमर्षियों ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपने पास आसीन किया।

देवर्षि तो दत्तात्रेय के आगमन से गद्गद् हो गये, क्योंकि उन्हें इस सत्य पर पूर्ण आस्था थी कि उनके आराध्य भगवान नारायण ही अपने एक अंश से दत्तात्रेय के रूप में प्रकट हुए हैं। भक्ति की परम पूर्णता सहज ही उनमें वास करती है। जो दत्तात्रेय की विशेषताओं से परिचित हैं, उन्हें मालूम है कि ये अवधूत शिरोमणि साधकों को मार्गदर्शन करने के लिए इस धराधाम में विचरण करते हैं। जूनागढ़ में गिरनार पर्वत इनका स्वाभाविक वास स्थान है। तंत्र, भक्ति एवं योग की अनगिनत साधनाएँ इनसे प्रकट हुई हैं। रसेश्वर तंत्र इन्हीं की देन है। ये परम योगी, महातंत्रेश्वर एवं श्रेष्ठतम भक्त हैं। अपने साधना जीवन में इनकी एक झलक भर मिलना साधकों का विरल सौभाग्य होता है। वाणी जहाँ रुकती है, शब्द जहाँ थकते हैं, मन जहाँ मौन होता है, वहाँ से परम भक्त अवधूत शिरोमणि दत्तात्रेय का चरित्र प्रारम्भ होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३३

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १४)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

अंधेरे में झाड़ी भूत जैसी लगती है—रस्सी का टुकड़ा सांप प्रतीत होता है, मरीचिकाएं थल में जल का और जल में थल का भान कराती हैं। यथार्थता से सर्वथा भिन्न अनुभूतियों का होना कोई अनहोनी बात नहीं है। आकाश में बहुत ऊंचे उड़ने वाले वायुयान छोटे पक्षी जैसे लगते हैं। पृथ्वी की अपेक्षा लाखों गुने बड़े और अपने सूर्य से हजारों गुने अधिक चमकदार तारागण नन्हे से दीपक की तरह टिमटिमाते दीखते हैं। क्या यह सारे दृश्य यथार्थ में वैसे ही हैं जैसे कि आंखें हमें अनुभव कराती हैं? आंखों की तरह ही अन्य इन्द्रियों की बात है। वे एक सीमा तक ही वस्तुस्थिति का ज्ञान कराती हैं और जो बताती जताती हैं उसमें से भी अधिकांश भ्रान्त होता है। बुखार आने पर गर्मी की ऋतु में शीत का और शीत में गर्मी का अनुभव होता है। मुंह का जायका खराब होने पर हर चीज कड़वी लगती है। जुकाम हो जाने पर चारों ओर बदबू का अनुभव होता है। पीलिया रोग होने पर आंखें पीली हो जाती हैं और हर चीज पीले रंग की दिखाई पड़ती है। क्या यह अनुभूतियां सही होती हैं?

जिस वस्तु का जैसा स्वाद प्रतीत होता है वह वास्तविक नहीं है। यदि ऐसा होता तो मनुष्य को जो नीम के पत्ते कडुए लगते हैं, वे ऊंट को भी वैसे ही क्यों न लगते, वह उन्हें रुचि पूर्वक स्वादिष्ट पदार्थों की तरह क्यों खाता? खाद्य पदार्थों का स्वाद हर प्राणी की जिह्वा से निकलते रहने वाला अलग अलग स्तर के रसों तथा मुख के ज्ञान तन्तुओं की बनावट पर निर्भर है। भोजन मुंह में गया—वहां के रसों का सम्मिश्रण हुआ और उस मिलाप की जैसी कुछ प्रतिक्रिया मस्तिष्क पर हुई उसी का नाम स्वाद की अनुभूति है। खाद्य पदार्थ की वास्तविक रासायनिक स्थिति इस स्वाद अनुभूति से सर्वथा भिन्न है। जो कुछ चखने पर अनुभव होता है वह यथार्थता नहीं है।

शरीर विज्ञानी जानते हैं कि काया का निर्माण अरबों खरबों कोशिकाओं के सम्मिलन से हुआ है। उनमें से प्रतिक्षण लाखों मरती हैं और नई उपजती हैं। यह क्रम बराबर चलता रहता है और थोड़े ही दिनों में, कुछ समय पूर्व वाली समस्त कोशिकाएं मर जाती हैं और उनका स्थान नई ग्रहण कर लेती हैं। इस तरह एक प्रकार से शरीर का बार-बार काया कल्प होता रहता है। पुरानी वस्तु एक भी नहीं रहती उनका स्थान नये जीव कोष ग्रहण कर लेते हैं। देह के भीतर एक प्रकार श्मशान जलता रहता है और प्रसूति ग्रह में प्रजनन की धूम मची रहती है। इतनी बड़ी हलचल का हमें तनिक भी बोध नहीं होता और लगता है देह जैसी की तैसी रहती है। जिन इन्द्रियों के सहारे हम अपना काम चलाते हैं उनमें इतना भी दम नहीं होता कि बाहरी वस्तुस्थिति बनाना तो दूर अपने भीतर की इतनी महत्वपूर्ण हलचलों का तो आभास दे सकें। ऐसी इन्द्रियों के आधार पर यथार्थ जानकारी का दावा कैसे किया जाय? जिस मस्तिष्क को अपने कार्यक्षेत्र-शरीर के भीतर होने वाले रोगों में क्या स्थिति बनी हुई है, इतना तक ज्ञान नहीं है और घर की बात को बाहर वालों से पूछना पड़ता है वैद्य डाक्टरों का दरवाजा खट-खटाना पड़ता है, उस मस्तिष्क पर यह भरोसा कैसे किया जाय कि वह इस ज्ञान का वस्तुस्थिति में हमें सही रूप में अवगत करा देगा।

ज्ञान जीवन का प्राण है। पर वह होना यथार्थ स्तर का चाहिए। यदि कुछ का कुछ समझा जाय, उलटा देखा और जाना जाय, भ्रम विपर्यय हमारी जानकारियों का आधार बन जाय तो समझना चाहिए यह ज्ञान प्रतीत होने वाली चेतना वस्तुतः अज्ञान ही है। उसमें जकड़े रहने पर हमें विविध विधि त्रास ही उठाने पड़ेंगे, पग-पग पर ठोकरें खानी पड़ेंगी।* इसी स्थिति को माया कहते हैं। माया कोई बाहरी संकट नहीं, मात्र भीतरी भ्रान्ति भरी मनःस्थिति ही है, यदि उसे सुधार लिया जाय, तो समझना चाहिए माया के बन्धनों से मुक्ति मिल गई वह मुक्ति वस्तुतः हर किसी को मिलना गलत है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ २०
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

बुधवार, 5 मई 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १३)

जिसे भक्ति मिल जाए, वो और क्या चाहे?
    
‘‘हम सब भी आपके दर्शन से अनुग्रहीत हैं भगवन्!’’ देवर्षि ने लोमश ऋषि के कथन को पूर्णता दी और वहाँ उपस्थित ऋषियों व देवों को सम्बोधित करते हुए बोले- ‘‘मैं भक्ति के जिस सूत्र को कह रहा था, उसके साकार विग्रह ये लोमश ऋषि हैं। आज के सूत्र की व्याख्या में मैं इन्हीं महाभाग के जीवन का एक प्रसंग कहूँगा।’’ ‘अवश्य’ सप्तऋषियों सहित सभी ने अनुमोदन किया और ऋषि लोमश को एक पुष्पासन पर बिठाया। यह पुष्पासन ब्रह्मकमल से बना था। इसमें अनोखी सुगन्ध आ रही थी।
    
इधर देवर्षि कह रहे थे कि ‘‘यह प्रसंग बहुत पूर्व का है। उन दिनों स्वर्गाधिपति इन्द्र ने एक महल निर्मित कराया था। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने अपनी समूची कुशलता उसमें डाल दी थी। इसके कक्ष, झरोखे, उद्यान, वापी सभी अद्भुत थे। सबसे आश्चर्य तो यह था कि इसकी जड़ता भी चैतन्य से आपूरित थी। इसके द्वार, इसमें रखी वस्तुएँ एक खास तरह के मानसिक संदेवनों से संचालित होती थीं। इसमें इच्छानुसार सभी विषय भोग उपस्थित हो जाते थे। अदृश्य देव-सेनायें इस अद्भुत महल की रक्षा के लिए सन्नद्ध थीं। देवशिल्पी अपनी कुशलता पर पुलकित थे। देवराज इन्द्र भी इसको ‘न भूतो न भविष्यति’ मान रहे थे।
    
जो भी स्वर्ग पधारता देवेन्द्र उसे अपना यह महल अवश्य दिखलाते और सबसे पूछते-ऐसा सुन्दर महल भी कहीं किसी ने बनाया है? इस प्रश्न के उत्तर में उच्चरित होने वाली महल की प्रशंसा उन्हें पुलकित कर देती। एक अवसर पर मैं स्वयं भी वहाँ पहुँचा। अपने स्वभाव के अनुसार देवेन्द्र ने अपने महल की चर्चा की और मुझे दिखाने ले गये। उनकी अपेक्षा थी कि मैं उसकी प्रशंसा में कुछ कहूँ, परन्तु मेरे आराध्य का संकेत देवेन्द्र को प्रबोध देने को था, सो मैंने उनसे कहा-देवाधिपति! यह सच है कि मैं लोकान्तरों में भ्रमण करता हूँ। मैंने शिल्प की कई विचित्रताएँ देखी हैं परन्तु अभी भी मुझमें अनुभव की कमी है। सत्य की सही व सटीक व्याख्या तो किसी ऐसे व्यक्ति से सम्भव है जो सबसे दीर्घायु हो। कौन है ऐसा? देवेन्द्र के कथन में त्वरा थी। उत्तर में मैंने इन महाभाग लोमश की चर्चा की।
    
अपनी समृद्धि, वैभव की प्रशंसा सुनने के लिए आतुर देवेन्द्र महर्षि लोमश से मिलने के लिए आकुल हो उठे। मैं उन्हें लेकर सुमेरू शिखर आया, उन दिनों महर्षि वहीं पर तप निरत थे। मेरा मन भी इन पूज्य चरणों के दर्शन का था। देवेन्द्र के साथ मैं सुमेरू शिखर पर पहुँचा। महर्षि आकाश की छाँव में सुमेरू शिखर पर तपोलीन थे। मैंने इन्हें प्रणाम किया। अंतर्यामी महर्षि को मेरे आगमन का हेतु पता चल गया था। फिर भी देवेन्द्र के संतोष के लिए मैंने उन्हें बताया कि ये स्वर्गाधिपति इन्द्र हैं। इन्होंने स्वर्गलोक में एक अनुपम महल का निर्माण किया है। ये जानना चाहते हैं कि क्या पहले भी किसी ने ऐसा महल बनाया था।
    
मेरे इस कथन पर महर्षि लोमश मुस्कराये और बोले-ये कौन से इन्द्र हैं देवर्षि? मैंने अपने सामने पाँच सौ इन्द्र एवं पचास ब्रह्म विनष्ट होते देखे हैं। महर्षि के इस कथन पर देवेन्द्र हैरान थे। उनकी हैरानी को दूर करते हुए मैंने उन्हें बताया-महर्षि लोमश अतिदीर्घायु हैं देवेन्द्र! इन्हें प्रभु का वर है कि एक ब्रह्मा के मरने पर इनके शरीर का एक लोम टूटेगा और जब तक शरीर की सभी लोम नहीं टूटेंगे, ये यूँ ही अमर रहेंगे। देवेन्द्र को मालूम था कि अखिल सृष्टि की आयु ब्रह्मा का एक दिन होती है और प्रलय रात्रि की अवधि उनकी एक रात्रि। ऐसे तीन सौ पैंसठ दिनों का वर्ष और फिर सौ वर्ष ब्रह्मा की आयु। उस पर भी ब्रह्मा के मरने पर इनका केवल लोम एक टूटता है और अभी तो शरीर के सारे लोम टूटेंगे।
    
महर्षि लोमश की आयु क्या होगी, यह सोचकर ही देवेन्द्र का सिर चकरा गया। उन्होंने लगभग काँपते हुए महर्षि से पूछा-भगवन्! आपको कभी अपने आश्रय की चिंता नहीं हुई। आपको किसी चाहत ने नहीं सताया। देवाधिपति के इस बाल कथन पर महर्षि हँसे और बोले-अरे! इस क्षणभंगुर जीवन के बारे में कितनी चिंता करनी इन्द्र! फिर मेरा योग-क्षेम तो प्रभु स्वयं करते हैं। जब से मुझे उनकी भक्ति का स्वाद मिला है, तब से मेरा मन न तो कुछ चाहता है, न सोचता है, न उसे किसी से द्वेष होता है, न कहीं रमता है और विषय भोगों में उसका उत्साह ही कहाँ।’’ नारद की बातों को सभी अनुभव कर रहे थे कि महर्षि सचमुच ही सूत्र का साकार स्वरूप हैं। जबकि स्वयं महर्षि के होठों पर मन्द हास्य था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ३०

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १३)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

स्पष्ट है सभी दृश्य पदार्थ एक विशेष प्रकार के परमाणुओं का एक विशेष प्रकार का संयोग मात्र हैं। प्रत्येक परमाणु अत्यन्त तीव्र गति से गतिशील है। इस प्रकार हर पदार्थ अपनी मूल स्थिति में आश्चर्यजनक तीव्र गति से हरकत कर रहा है। पर खुली आंखें यह सब कुछ देख नहीं पातीं और वस्तुएं सामने जड़वत् स्थिर खड़ी मालूम पड़ती है। ऐसा ही अपनी पृथ्वी के बारे में भी होता है। भूमण्डल अत्यन्त तीव्र गति से (1) अपनी धुरी पर (2) सूर्य की परिक्रमा के लिए अपनी कक्षा पर (3) सौर मंडल सहित महासूर्य की परिक्रमा के पथ पर (4) घूमता हुआ लट्टू जिस तरह इधर उधर लहकता रहता है उस तरह लहकते रहने के क्रम पर (5) ब्रह्माण्ड के फलते फूलते जाने की प्रक्रिया के कारण अपने यथार्थ आकाश स्थान को छोड़ कर फैलता स्थान पकड़ते जाने की व्यवस्था पर—निरन्तर एक साथ पांच प्रकार की चालें चलती रहती हैं। इस उद्धत नृत्य को हम तनिक भी अनुभव नहीं करते और देखते हैं कि जन्म से लेकर मरण काल तक धरती अपने स्थान पर जड़वत् जहां की तहां पड़ी रही है। आंखों के द्वारा मस्तिष्क को इस सम्बन्ध में जो जानकारी दी जाती है और जैसी कुछ मान्यता आमतौर से बनी रहती है उसका विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि हम भ्रम अज्ञान की स्थिति में पड़े रहते हैं और कुछ का कुछ अनुभव करते रहते हैं, यह माया ग्रस्त स्थिति कही जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।

जल में सूर्य चन्द्र के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं और लगता है कि पानी में प्रकाश पिण्ड जगमगा रहे हैं। हल लहर पर प्रतिबिम्ब पड़ने से हर लहर पर एक चन्द्रमा नाचता थिरकता मालूम पड़ता है। रेल में बैठने वाले देखते हैं कि वे अपने स्थान पर स्थिर बैठे हैं केवल बाहर तार के खंभे और पेड़ आदि भाग रहे हैं। क्या यह अनुभूतियां सत्य हैं।

रात्रि को स्वप्न देखते हैं। उस स्वप्नावस्था में दिखाई पड़ने वाला घटना क्रम यथार्थ मालूम पड़ता है। देखते समय दुख-सुख भी होता है। यदि यथार्थ में संदेह होता तो कई बार मुख से कुछ शब्द निकल पड़ना—स्वप्नदोष आदि हो जाने की बात क्यों होती? जागने पर स्पष्ट हो जाता है कि जो अपना देखा गया था उसमें यथार्थ कुछ भी नहीं था। केवल कल्पनाओं की उड़ान को निद्रित मस्तिष्क ने यथार्थता अनुभव कर लिया। उतने समय की मूर्छित मनःस्थिति अपने को भ्रम जंजाल में फंसाये रह कर बेसिर पैर की उड़ानों में उड़ाती रही।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १९
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 1 मई 2021

👉 गुरु तेग बहादुर


देश धर्म संस्कृति के खातिर, अपना शीश कटाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

जालिम औरंगजेब ने भारत में, अत्याचार फैलाया था।
कश्मीरी पंडितों को जबरन ही, मुसलमान बनावाया था।।
हिन्दू सिखों पर जुल्मों का जब, क्रूर कहर बरपाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

धर्म संस्कृति की रक्षा को, घर घर अलख जगाये थे।
धैर्य त्याग वैराग्य मूर्ति थे, ’हिन्द दी चादर’कहलाये थे।।
इस्लाम नहीं स्वीकारा गुरु ने, हंसकर शीश कटाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।

धर्म नहीं वह होता है जो, बल पर ही अभिमान करे।
मानवीय मूल्यों को न समझे,मानव का अपमान करे।।
क्रांतिकारी गुरु ने तब सबको,धर्म का मर्म सिखाया था।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।  
 
‘सीस दिया पर सी न किया’था, धर्म हेतु बलिदान था।
शाश्वत मूल्यों की रक्षा को, साहस का अभियान था।।
धर्म विरोधी क्रूर शासक को, निर्भय हो धूल चटाया था।।
गुरु तेग बहादुर ने साहस से, धर्मांतरण रुकवाया था।।  

उमेश यादव

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग १२)

जिसे भक्ति मिल जाए, वो और क्या चाहे?

भगवन्नाम कीर्तन का सुरभित संगीत देवात्मा हिमालय के अणु-अणु में व्याप्त होता गया। भक्ति चेतना की सघनता से वहाँ उपस्थित ऋषियों, देवों एवं दिव्य विभूतियों के अंतस् स्पन्दित हो उठे। हिमालय की पावनता, भक्तिगाथा के निरन्तर श्रवण से और भी अधिक पावन हो रही थी। सब ओर विशुद्ध सत्त्व का भावमय उद्रेक हो रहा था। हिमालय के हिमाच्छादित शुभ्र शिखर मौन, नीरव समाधि में डूबे थे। निर्विचार भावमयता का अजस्र-अविरल-अदृश्य प्रवाह और भी कुछ सुनने को प्रेरित कर रहा था। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का महातेजस् भी आज रोमांचित था। उन्होंने भक्तिविह्वल हो सभी जनों को प्रणाम् करते हुए कहा- ‘‘भक्तिगाथा के श्रवण से अधिक और कोई सुख नहीं है। मेरा देवर्षि नारद से अनुरोध है कि हम सभी को अपने अगले सूत्र से अनुग्रहीत करें।’’

सभी ने इस कथन से अपनी समवेत सहमति जताई और कहा- ‘‘ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने हम सभी के हृदयों के उद्गार व्यक्त किये हैं। हम सभी देवर्षि से आग्रह करते हैं-कुछ और कहें।’’ महर्षियों के इस आग्रह से देवर्षि की भावमय तल्लीनता में कुछ नवस्फुरण हुए। वे कहने लगे- ‘‘हे महर्षिजन! हम बड़भागी हैं जो आप सबके पावन सान्निध्य में भक्ति, भक्त एवं भगवान की दिव्य लीला का अवगाहन कर रहे हैं। भक्ति की महिमा ही कुछ ऐसी है कि जो इसे पा लेता है उसे और कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। मेरा आज का सूत्र भी कुछ यही कहता है-
‘यात्प्राप्य न किञ्चद्वाञ्छति न शोचति
न द्वेष्टि न रमते नोत्साही भवति’॥ ५॥
    
भक्ति को प्राप्त करने वाला कुछ और नहीं चाहता, कुछ और नहीं सोचता, किसी से द्वेष नहीं करता, कहीं अन्य नहीं रमता, विषय-भोगों के लिए उत्साही नहीं होता।
    
देवर्षि नारद के इस स्वर सूत्र में सभी के मन अनायास गुँथने लगे थे। उनके भावों में एक अनोखी मिठास घुलने लगी थी, तभी एक अनोखी घटना ने सभी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लिया। सबने देखा कि दूसरे सूर्य के समान परम तेजस्वी ज्योतिपुञ्ज आकाश से अवतरित हो रहा था। हिमालय का यह पावन परिसर इस महासूर्य के प्रकाश से आपूरित हो जा रहा था। कुछ ही क्षणों में यह परम तेजस्वी ज्योतिपुञ्ज मानव आकृति में परिवर्तित हो गया। अद्भुत स्वरूप था इन  महाभाग का। इनके सारे शरीर पर सघन रोमावली थी परन्तु प्रत्येक रोम ज्योति किरण की भाँति प्रकाशित था। कुछ ऐसा जैसे कि भगवान भुवन-भास्कर के शरीर को उनकी सहस्र-सहस्र किरणें घेरे हों।
    
एकबारगी सभी चमत्कृत थे, परन्तु सप्तर्षियों, कल्पजीवी महर्षि मार्कण्डेय एवं देवर्षि नारद को उन्हें पहचानने में अधिक देर न लगी। ये भगवान भोलेनाथ एवं माता जगदम्बा के वरद् पुत्र शिवस्वरूप महर्षि लोमश थे। सभी जानते थे कि सृष्टि में इनसे अधिक दीर्घायु और कोई भी नहीं। सबने उन्हें प्रणाम् किया। महर्षि लोमश ने बड़े हर्षित मन से उन्हें आशीष दिया और बोले-‘‘ऋषियों! मैं चिरकाल से समाधिस्थ था। समाधि में ही मुझे भगवान सदाशिव एवं माता पार्वती के दर्शन हुए। उन्होंने मुझे चेताया-लोमश! हिमालय के आँगन में अद्भुत, अपूर्व भक्तिगंगा बह रही है और तू समाधि में खोया है। बस भगवान महादेव का इंगित मुझे यहाँ ले आया और यहाँ आप सभी के दर्शन हुए।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ २९

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग १२)

👉 कोई रंग नहीं दुनिया में

नशा पी लेने पर मस्तिष्क और इन्द्रियों का संबंध लड़खड़ा जाता है, फलस्वरूप कुछ का कुछ अनुभव होता है शराब के नशे में धुत्त व्यक्ति जैसा कुछ सोचता, समझता, देखता अनुभव करता है वह यथार्थता से बहुत भिन्न होता है। और भी ऊंचे नशे इस उन्मत्तता की स्थिति को और भी अधिक बढ़ा देते हैं। डी. एलस्केस. ए. सरीखे नवीन नशे तो इतने तीव्र हैं कि उनके सेवन के उपरान्त ऐसे विचित्र अनुभव मस्तिष्क को होते हैं जिनकी यथार्थता के साथ कोई संगति नहीं होती।

साधारणतया दैनिक जीवन में भी अधिकांश अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें यथार्थ नहीं कहा जा सकता। सिनेमा के पर्दे पर जो दीखता है सही कहां है? एक के बाद एक आने वाली अलग-अलग तस्वीरें इतनी तेजी से घूमती हैं कि उस परिवर्तन को आंखें ठीक तरह समझ नहीं पातीं और ऐसा भ्रम होता है मानो फिल्म में पात्र चल फिर रहे हैं। लाउडस्पीकर से शब्द अलग अन्यत्र निकलते हैं और पर्दे पर तस्वीर के होठ अलग चलते हैं पर दर्शकों को ऐसा ही आभास होता रहता है मानो अभिनेताओं के मुख से ही वार्तालाप एवं संगीत निकल रहा है। प्रकाश की विरलता और सघनता भर पर्दे पर उतरती है पर उसी से पात्रों एवं दृश्यों का स्वरूप बन जाता है और मस्तिष्क ऐसा अनुभव करता है मानो यथार्थ ही वह घटना क्रम घटित हो रहा है।

सिनेमा के दृश्य क्रम को देखकर आने वाला यह नहीं अनुभव करता कि उसे यांत्रिक जाल जंजाल में ढाई तीन घंटे उलझा रहना पड़ा है। उसे जो दुखद-सुखद रोचक भयानक अनुभूतियां उतने समय होती रही हैं वे सर्वथा भ्रान्त थीं। सिनेमा हाल में कोई घटना क्रम नहीं घटा। कोई प्रभावोत्पादक परिस्थिति नहीं बनी केवल प्रकाश यन्त्र या ध्वनि यन्त्र अपने-अपने ढंग की कुछ हरकतें भी करते रहे। इतने भर से दर्शक अपने सामने अति महत्वपूर्ण घटना क्रम उपस्थित होते का आभास करता रहा, इतना ही नहीं उससे हर्षातिरेक एवं अश्रुपात जैसी भाव भरी मनःस्थिति में भी बना रहा। इस इन्द्रिय भ्रम को माया कहा जाता है। मोटी दृष्टि से यह माया सत्य है। यदि सत्य न होती तो फिल्म उद्योग, सिनेमा हाल, उसमें युक्त हुए यन्त्र, दर्शकों की भीड़ उनकी अनुभूति आदि का क्या महत्व रह जाता? थोड़ी विवेचनात्मक गहराई से देखा जाय तो यह यन्त्रों की कुशलता और वस्तुस्थिति को समझ न सकने को नेत्र असमर्थता के आधार पर इस फिल्म दर्शन को मायाचार भी कह सकते हैं। दोनों ही तथ्य अपने अपने ढंग से सही हैं। संसार चूंकि हमारे सामने खड़ा है, उसके घटना क्रम को प्रत्यक्ष देखते हैं। इसलिए वह सही है किन्तु गहराई में प्रवेश करने पर वे दैनिक अनुभूतियां नितान्त भ्रामक सिद्ध होती हैं। ऐसी दशा में उन्हें भ्रम, स्वप्न या माया कहना भी अत्युक्ति नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १७
परम पूज्य गुरुदेव ने ये पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग १५)

प्याली में सागर समाने जैसा है भक्ति का भाव      देवर्षि ने भगवान दत्त को मन ही मन प्रणाम करते हुए कहा- ‘‘देव! आपके आगमन से मेरा यह सूत्र फलि...