मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८१)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि असाध्य रोग, भयंकर दुर्घटना, मारण, कृत्या आदि अभिचार कर्म दुर्भाग्य, दैत्य और प्रेतबाधा, पागलपन को आध्यात्म चिकित्सा का मर्मज्ञ केवल सिर पर जल छिड़कर या सिर पर हाथ रखकर अथवा मणियां बांधकर दूर कर सकता है। जो इन प्रयोगों को जानते हैं, उन्हें इस सत्य का ज्ञान है कि अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा कोई चमत्कार न होकर एक प्रायोगिक व वैज्ञानिक व्यवस्था है।

परम पूज्य गुरुदेव के ज्येष्ठ पुत्र श्री ओमप्रकाश जो अपनी किशोरावस्था में उनके साथ रहा करते थे, गुरुदेव की आध्यात्मिक चिकित्सा से जुड़ी अनेकों अनुभूतियाँ सुनाते हैं। उन्हें अभी भी हैरानी होती है कि कैसे एक ही पत्ती, जड़ अथवा किसी छोटी सी आटे से बनी गोली से वे असाध्य रोगों को ठीक कर दिया करते थे। श्री ओमप्रकाश जी बताते हैं कि चिकित्सा के नाम पर हम उन दिनों आयुर्वेद जानते थे। गुरुदेव के एक ज्येष्ठ भ्राता भी वैद्य थे। उनके द्वारा दी जाने वाली दवाओं का स्वरूप, प्रकार व उनकी विविधता अलग ढंग की होती थी। पर गुरुदेव का तो सभी कुछ अद्भुत था। यहाँ तो वे सामान्य सी पत्ती द्वारा मरणासन्न को जीवनदान देते थे।

श्री ओमप्रकाश जी का कहना है कि उनके प्रयोगों में एक विचित्रता और भी थी। वह यह कि जरूरी नहीं कि रोगी उनके समीप ही हो, उसके हजारों किलोमीटर दूर होने से भी उनकी चिकित्सा में कोई कमी नहीं आती थी। एक सामान्य से धागे को उसके पास भेजकर वह उसे भला- चंगा बना देते थे। वह कहते हैं कि उन दिनों तो मैं अनजान था। पर आज लगता है कि सचमुच ही यह अथर्ववेदीय आध्यात्मिक चिकित्सा थी। शान्तिकुञ्ज में तप की अवधि में परम पूज्य गुरुदेव अपने विश्व कल्याण सम्बन्धी उच्चस्तरीय प्रयोगों में संलग्र हो गए थे। और उनकी चिकित्सा का स्वरूप संकल्प प्रयोगों व इच्छाशक्ति तक ही सिमट गया था। रोगी अभी भी ठीक होते थे। उनकी संख्या भी पहले से अनेकों गुना बढ़ गयी थी। किन्तु अब प्रयोग- प्रक्रियाएँ बदली हुई थी। अब इन अनेकों के लिए उनका संकल्प ही पर्याप्त था।

जीवन के अन्तिम वर्षों में उनकी दृष्टि भविष्य की ओर थी। सन् १९८९ में जाड़ों में जब वह अपने कमरे के बगल वाले आंगन में पलंग पर बैठे हुए थे। उन्होंने पास बैठे हुए अपने शिष्यों से पूछा- क्यों जी मेरे जाने के बाद तुम लोग आने वालों का किस तरह कल्याण करोगे? उत्तर में सन्नाटा छाया रहा। कोई कुछ न बोला। तब वह स्वयं बोले, देखो देह छोड़ने के बाद भी मेरी चेतना हमेशा ही शान्तिकुञ्ज परिसर में व्याप्त रहेगी। भविष्य में जो लोग यहाँ आएँ उनसे कहना कि गुरुदेव ने केवल शरीर छोड़ा है, वे कहीं गए नहीं हैं, यहीं पर हैं। उनका तप प्राण यहाँ के कण- कण में व्याप्त है। तुम लोग इसे अपने मन, प्राण में अनुभव करो। और जितने समय यहाँ रहो, यह सोचो कि मैं अपने रोम- रोम से प्रत्येक श्वास से गुरुदेव के तप प्राण को धारण कर रहा हूँ। इससे उनकी सभी तरह की चिकित्सा हो जाएगी। गुरुदेव के द्वारा कहा हुआ यह सच आज भी प्रामाणित हो रहा है। उन्होंने आध्यात्मिक चिकित्सा का जो प्रवर्तन किया आज उसे विश्वदृष्टि में मान्यता मिल रही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११३

👉 आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है (भाग ३)

आलसी का हठ रहता है कि शरीर उसका अपना है। मान लो उसका है तब भी तो उसे नष्ट करने का अधिकार उसे नहीं हो सकता है। शरीर उसका है तो शरीर जन्य सन्तानें भी तो उसकी ही होती हैं और उनका भी उसके शरीर पर कुछ अधिकार होता है। शरीर नष्ट कर वह उनके शरीर का हनन तो नहीं कर सकता। शरीर से उपार्जन होता है और उपार्जन से बच्चों का पालन-पोषण। शिथिल एवं अशक्त शरीर आलसी उपार्जन से ऐसे घबराता है जैसे भेड़ भेड़िये से दूर भागती है। धन तो परिश्रम का मीठा फल है आलसी जिसे लाकर परिवार को नहीं दे पाता और रो-झींक कर, मर-खप कर विवश हो कर लाता भी है वह अपर्याप्त तो होता ही है साथ ही उसकी कुढ़न उसके साथ जुड़ी रहती है जो कि बच्चों के संस्कारों एवं शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालती है। इस प्रकार आलसी बच्चों का पालन करने के स्थान पर परोक्ष रूप से उनका भावनात्मक हनन ही किया करता है, जो एक अक्षम्य अपराध तथा पाप है। यदि बच्चों का सम्बन्ध न भी जोड़ा जाये तो भी अपने कर्मों से शरीर का सत्यानाश करना आत्महत्या के समान है जो उसी तरह पाप ही माना जायेगा।

आलस्य के कुठार द्वारा कल्पवृक्ष के समान उस शरीर की जड़ काटते रहना, उसकी शक्ति , क्षमताओं एवं योग्यताओं को नष्ट करते रहना पाप ही है जो मानव के महान से महान मनोरथों को चूर कर सकता है। शक्ति , सम्पन्नता, गौरव, ज्ञान, मान, प्रतिष्ठा, यश, कीर्ति आदि ऐसी कौन-सी समृद्धि अथवा ऐश्वर्य है जो शरीररूपी देवता को प्रसन्न करने पर नहीं मिल सकता। ऐसा कौन-सा पुण्य-परमार्थ है जो आत्मा की मुक्ति में सहायक हो और शरीर द्वारा सम्पन्न न किया जा सकता हो। मनुष्य श्रम-साधना द्वारा इस पंच-तात्विक देवता को प्रसन्न करने, समृद्धिय पाने, पुण्य-परमार्थ करके आत्मा को मुक्त करने के लिए है, वचन-बाध्य है। “मैं नहीं चाहता”—कहकर मनुष्य इस उद्देश्य से मुक्त नहीं हो सकता।

उसका जन्म, उसकी नियुक्ति इस कर्तव्य के लिये ही की गई है और उसने जीवन-लाभ के लिए सर्व समर्थ को यह वचन दिया था कि वह उसके दिये जीवन को सुन्दर एवं समृद्ध बनाकर संसार की शोभा बढ़ायेगा और उसके आत्मा रूपी प्रकाश की किरणें आवरण से मुक्त कर उसमें ही मिला देने की लिए किसी परिश्रम, पुरुषार्थ तथा परमार्थ से विमुख न होगा। परमात्मा ने उसके इसी वचन पर विश्वास करके उसे सृष्टि की सर्वश्रेष्ठता प्रदान की। बल, बुद्धि एवं विवेक सब योग्य बना दिया। अब वचन से फिरकर कर्तव्य से विमुख हो जाना कहाँ तक उचित है? यह भयंकर पाप है, विश्वासघात के समान ही पाप है और आलसी इस पाप को जान-बूझकर किया करता है। मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी और जीव-जगत का राजा है। संसार की व्यवस्था एवं सुन्दरता का भार उसके परिश्रम एवं पुरुषार्थ पर निर्भर है। किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह उत्तरदायित्व से फिरकर आलस्य, प्रमाद अथवा निष्क्रियता द्वारा पृथ्वी का भार बने और उसे असुन्दर, अव्यवस्थित, अशाँत अथवा असुखकर बनाने की दुरभिसन्धि किया करे। आलसी एवं अकर्मण्य लोग निश्चय ही यह अपराध किया करते हैं जबकि उन्हें अपना सुधार कर ऐसा नहीं करना चाहिए। उनकी यह दुष्प्रवृत्ति अपरिमार्जन किसी प्रकार भी शोभनीय अथवा वाँछनीय नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 24

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.24

👉 गुरुवर की वाणी

★ गायत्री परिवार का हर व्यक्ति बड़ा है। छोटेपन का उसने मुखौटा भर पहन रखा है। उतारने भर की देर है कि उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। हमें हमारे मार्गदर्शक ने एक पल में क्षुद्रता का लबादा झटककर महानता का परिधान पहना दिया था। इस काया कल्प में मात्र इतना ही हुआ था कि लोभ, मोह की कीचड़ से उबरना पड़ा। जिस-तिस के परामर्शों—आग्रहों की उपेक्षा करनी पड़ी और आत्मा-परमात्मा के संयुक्त निर्णय को शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा। इसके बाद एकाकी नहीं रहना पड़ा।
(हमारी वसीयत और विरासत-174)

◆ इस समय जो भगवान के भक्त हैं, जिन्हें इस संसार के प्रति दर्द है, उनके नाम हमारा यही सन्देश है कि वे अपने व्यक्तिगत लाभ के कार्यों में कटौती करें एवं भगवान् का काम करने के लिए आगे आएं। अगर इस समय भी आप अपना मतलब सिद्ध करते रहे और मालदार बनते रहे, तो पीछे आपको बहुत पछताना पड़ेगा। अब आपकी इज्जत- आपकी इज्जत नहीं, हमारी इज्जत है। हमारी और मिशन की इज्जत की रक्षा करना अब आपका काम है।
(गुरु पूर्णिमा संदेश-1980)

■ भगवान् कृष्ण ने महाभारत के उपरान्त राजसूय यज्ञ में आग्रहपूर्वक आगन्तुकों के  पैर धोने का काम अपने जिम्मे लिया था और सज्जनोचित विनम्रता का परिचय दिया था। गांधीजी कांग्रेस के पदाधिकारी नहीं रहे, किन्तु फिर भी सबसे अधिक सेवा करने और मान पाने में समर्थ हुए। चाणक्य झोपड़ी में रहते थे, ताकि राजमद उनके ऊपर न चढ़े और किसी साथी के मन में प्रधानमन्त्री का ठाट-बाट देखकर वैसी ही ललक न उठे। राजा जनक हल जोतते थे। बादशाह नसीरुद्दीन टोपी सीकर गुजारा करते थे। यह वे उदाहरण हैं जिनसे साथियों को अधिक विनम्र और संयमी बनने की प्रेरणा मिलती है।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन स्वरूप-32)

★ हनुमान ने कितनी उपासना की थी, नल-नील, जामवन्त, अर्जुन ने कितनी पूजा एवं तीर्थयात्रा की थी? यह हम नहीं कह सकते, परन्तु उन्होंने भगवान् का काम किया था। ये लोग घाटे में नहीं रहे। इस समय महाकाल कुछ गलाई-ढलाई करने जा रहे हैं। अब नये व्यक्ति, नयी परम्पराएं, नये चिन्तन उभरकर आयेंगे। अगले दिनों यह सोचकर अचम्भा करेंगे कितने कम समय में इतना परिवर्तन कैसे हो गया। अगर हम समय को पहचान पाये तो आप सच्चे अर्थों में भाग्यवान बन सकते हैं।
(गुरु पूर्णिमा संदेश-1980)

108 Gayatri Mantra Gurudev Pt. Shriram Sharma Acharya's Voice



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सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

👉 वरिष्ठता: -

एक बगीचे में एक बाँस का झुरमुट था और पास ही आम का वृक्ष उगा खड़ा था।

ऊँचाई में बाँस ऊपर था और आम नीचा। बाँस ने आम से कहा- "देखते नहीं मैं तुमसे कितना ऊँचा हूँ। मेरी वरिष्ठता तुम्हें स्वीकार करनी चाहिए।"

आम कुछ बोला नहीं- चुप होकर रह गया।

गर्मी का ऋतु आई। आम फलों से लद गया। उसकी टहनियाँ फलों के भार से नीची झुक गई।

बाँस तना खड़ा था। वह आम से बोला- "तुम्हें तो इन फलों की फसल ने और भी अधिक नीचे गिरा दिया अब तुम मेरी तुलना में और भी अधिक छोटे हो गए हो।"

आम ने फिर भी कुछ नहीं कहा। सुनने के बाद उसने आंखें नीची कर ली।

उस दिन थके मुसाफिर उधर से गुजरे। कड़ाके की दुपहरी आग बरसा रही थी सो उन्हें छाया की तलाश थी। भूख-प्यास से बेचैन हो रहे थे अलग। पहले बाँस का झुरमुट था। वही बहुत दूर से ऊंचा दीख रहा था। चारों ओर घूमकर देखा उसके समीप छाया का नाम भी नहीं था। कंटीली झाड़ियां सूखकर इस तरह घिर गई थी कि किसी की समीप तक जाने की हिम्मत न पड़े।

निदान वे कुछ दूर पर उगे आम के नीचे पहुँचे। यहाँ दृश्य ही दूसरा था। सघन छाया की शीतलता और पककर नीचे गिरे हुए मीठे फलों का बिखराव। उन्होंने आम खाकर भूख बुझाई। समीप के झरने में पानी पिया और शीतल छाँह में संतोषपूर्वक सोये।

जब उठे तो बाँस और आम की तुलनात्मक चर्चा करने लगे।

उस खुसफुस की भनक बाँस के कान में पड़ी। उसने पहली बार उस समीक्षा के आधार पर जाना कि ऊँचा होने में और बड़प्पन में क्या कुछ अंतर होता है।

"दोस्तों..! हम सभी में अपने तरह की खूबियाँ और ख़ामियाँ मौजूद हैं...कुछ हमने अपनी मेहनत से पाईं हैं और कुछ हमें ईश्वर की देन हैं..। पर कोई भी पूरी तरह न सर्वश्रेष्ट है न निकृष्ट... इसलिए घमंड या निराशा का भी कोई कारण नहीं है..। हमें बस अपनी ख़ामियों/ख़ूबियों का जानने, स्वीकार करने और तराशने की आवश्यकता है..और यह तभी संभव है जब हम औरों की खूबियों से ईर्ष्या करने और खराबियों की आलोचना करने की बजाय खुद को जानने और तराशने में अपना वक्त और उर्जा लगाएं

हमें दुनिया से अपनी श्रेष्ठता स्वीकार करवाने की कोई आवश्यकता नहीं... आवश्यकता है तो खुद को 'कल जो हम थे' या 'आज जो हम हैं' उससे बेहतर बनाने का प्रयास करते रहने की..। समाज आपकी श्रेष्ठता तभी स्वीकार करेगा जब वो आपको दिन ब दिन निखरता देखेगा और आपकी खूबियों से लाभान्वित होगा..। तब आपको कुछ कहने की जरूरत न पडेगी आपके कर्म ही आपकी श्रेष्ठता का बयान होंगे...। कर्मों से बोला हुआ चरित्र ही देर तक याद रखा जाता है..॥"

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जुलाई-1975

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 14 Oct 2019



👉 आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है (भाग २)

शरीर की सुरक्षा श्रम द्वारा ही की जा सकती है। आलस्य में निष्क्रिय पड़े रहने से इसके सारे कल-पुर्जे ढीले तथा अशक्त हो जाते हैं, अनेक व्याधियाँ घेर लेती हैं। आरोग्य चला जाता है। अस्वस्थ शरीर आत्मा को भी अस्वस्थ कर डालता है। आत्मा चेतनास्वरूप परमात्मा का पावन अंश है, उसे इस प्रकार निस्तेज, निश्चेष्ट अथवा अपावन बनाने का अधिकार किसी जीव को नहीं है। और जो अबुद्धिमान ऐसा करता है वह नास्तिक जैसा ही माना जायेगा। आलसी निश्चय ही इस पाप का दोषी होता है।

परमात्मा ने शरीर दिया, शक्ति दी, चेतना दी और बोध दिया। इसलिये कि मनुष्य अपनी उन्नति करें और जीवन-पथ पर आगे बढ़े। स्वयं सुख पाये और उसके प्यारे अन्य प्राणियों को सुखी होने में सहयोग दे। मनुष्य का कर्तव्य है कि ईश्वर की इस अनुकम्पा को सार्थक करे और अपने उपकारी के प्रति भक्ति- भावना से कृतज्ञता प्रकट करे। पर क्या आलसी अपने इस कर्तव्य को पूरा करता है? निश्चय ही नहीं। वह दिन-रात प्रमाद में पड़ा ऊँघता रहता है। औरों को सुखी करना तो दूर, उल्टा उन्हें दुःख ही देता रहता है और स्वयं भी दीनता, दरिद्रता, रोग तथा निस्तेजता का दुःख भोगा करते हैं। क्या इस प्रकार की अकर्तव्य शालीनता पाप नहीं कही जायेगी?

जो अभागा आलसी अपने साधारण जीवन-क्रम का निर्वाह प्रसन्नता, तत्परता तथा कुशलता से नहीं कर पाता वह स्वस्थ तन, प्रसन्न मन एवं उज्ज्वल आत्मा द्वारा कृतज्ञता प्रदर्शन रूप, पूजा-पाठ, जप-तप, सेवा-उपासना, भजन-कीर्तन का नियमित आयोजन कहाँ निभा सकता है? दोपहर तक सोते रहने, दिन में खाकर पड़े रहने और कष्टपूर्वक कोई आवश्यक कार्य कर सकने वाला प्रमाद उन्मादी भगवत्-भक्ति करता अथवा कर सकता है, ऐसा सम्भव नहीं। नियमित रूप से, भक्ति-भावना से भरी उपासना न करना उस अनुग्राहक ईश्वर के प्रति कृतघ्नता है। कृतघ्नता का पाप जघन्यता की कोटि का पाप है जिसका सबसे पहले अपराधी आलसी ही होता है। जिसके पास समय ही समय रहता हो वह परमात्मा की उपासना न करे उससे बढ़कर पापी और कौन हो सकता है जबकि व्यस्त जीवन में से भी समय निकाल कर प्रभु की याद न करने वाले आत्मधारी तक आलोचना एवं निन्दा के पात्र बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 24


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.24

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८०)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि

इसका सत्य यह है कि ‘अथर्वा’ और ‘आङ्गिरस’ ये दो अलग- अलग ऋषि थे। इन्होंने ही सर्वप्रथम अग्रि को प्रकट करके यज्ञ चिकित्सा का आविष्कार किया था। अथर्ववेद में अथर्वा ऋषि द्वारा दृष्ट ऋचाएँ अध्यात्मपरक, सुखकारक, अभ्युदय प्रदान करने वाली और श्रेय- प्रेय देने वाली हैं। और अंगिरस ऋषि द्वारा दृष्ट ऋचाएँ अभिचार परक, शत्रुसंहारिणी, कृत्यादूषण, शापनिवारिणी, मारण, मोहन, वशीकरण आदि प्रधान हैं। सार तथ्य यह है कि आथर्वण मंत्र सृजनात्मक हैं और अंगिरस मंत्र संहारात्मक हैं। अथर्ववेद में आथर्वण और अंगिरस दो प्रकार की चिकित्सा विधियाँ होने के कारण अथर्ववेद को ‘अथर्वाङ्गिरस’ कहा जाता है।

शब्द व्युत्पत्ति की दृष्टि से हम अथर्वा का मर्म तो जान चुके अब यदि ‘आङ्गिरस’ का मर्म अनुभव करें तो शब्द व्युत्पत्ति ‘आङ्गिरस’ का अर्थ अंगों में प्रवाहित होने वाला रस बताती है। मनुष्य शरीर के प्रत्येक अंग अवयव में ‘प्राणरस’ प्रवाहित होता रहता है। इसी प्राणरस का प्रवाह प्रत्येक अंग- अवयव को सक्षम व सशक्त बनाया करता है। इस रस के सूखने पर या अवरूद्ध होने पर अथवा इसका अभाव होने पर इन्द्रियाँ शिथिल और निष्क्रय हो जाती हैं। और इनका कार्य- व्यापार ठप्प पड़ जाता है। जब मनुष्य के शरीर की यह स्थिति होती है, तब उसे लकवा, फालिज और मधुमेह आदि रोग हो जाया करते हैं।

शरीर में प्रवाहित होने वाले इस रस में जब विकार उत्पन्न हो जाते हैं, तब अनेकों तरह की विकृतियाँ व व्याधियाँ पनपने लगती हैं। मनुष्य के मन- मस्तिष्क व हृदय रोगी हो जाते हैं। शरीर के इस तरह रोगग्रस्त होने पर अथर्ववेद के आध्यात्मिक चिकित्सा विधान द्वारा जलावसेचन, हस्तामिमर्श, मणिबन्धन, हवन एवं उपस्थान आदि करने से यथा अथर्ववेदीय मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित औषधि, भेषज उपचार से मनुष्य रोग- दोष मुक्त होकर स्वस्थ और निरोग बनता है। जलावसेचन, मणिबन्धन, औषधि, भेजष आदि उपचार से शरीर के अंगों के विकृत या शुष्क रस सजीव व सशक्त बनते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११२

👉 गुरुवर की वाणी

★ मेरी चाह है कि हाथ से सत्य न जाने पाये। जिस सत्य को तलाशने और पाने के लिए मैंने कंकरीले, रेतीले मार्ग पर चलना स्वीकार किया है, वह आत्म-स्वीकृति किसी भी मूल्य पर, किसी भी संकट के समय डगमगाने न पाये। सत्य का अवलम्बन बना रहे, क्योंकि उसकी शक्ति असीम है। मैं उसी के सहारे अपनी हिम्मत संजोये रहूंगा।
(अखण्ड ज्योति 1985, मई)

◆ प्रज्ञा परिवार को अन्य संगठनों, आन्दोलनों, सभा-संस्थाओं के समतुल्य नहीं मानना चाहिए। वह युग सृजन के निमित्त अग्रगामी मूर्धन्य लोगों का एक सुसंस्कारी परिकर-परिसर है। उन्हें केवल एक ही बात सोचनी चाहिए कि समय की जिस चुनौती ने जाग्रत् आत्माओं को कान पकड़कर झकझोरा है, उसके उत्तर में उन्हें दांत निपोरने हैं या सीना तानना है?
(वाङ्मय क्र.1, पेज-6.1)

■ यह क्षुद्रता कैसी, जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर अड़ गई है। समर्थ को असहाय बनाने वाला यह व्यामोह आखिर कैसा भवबन्धन है? कुसंस्कार है? दुर्विपाक है या मकड़ी का जाल? कुछ ठीक से समझ नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है। इस विषम वेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गांडीव क्यों छूटे जा रहे हैं? सिद्धान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखी जाने का कभी अवसर ही न आये?
(वाङ्मय क्र.1, पेज-6.1)

★नवनिर्माण के कंधे पर लदे उत्तरदायित्व मिल-जुलकर संपन्न हो सकने वाला कार्य था, सो समझदारों में कोई हाथ न लगा तो अपने बाल परिवार-गायत्री परिवार को लेकर जुट पड़े। बात अगले दिनों की आती है। इस सम्बन्ध में स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकांक्षा और आवश्यकताओं को भुला न दिया जाय। समय विकट है। प्रत्येक परिजन का भावभरा सहयोग हमें चाहिए।
(हमारी वसीयत और विरासत-174)

रविवार, 13 अक्तूबर 2019

👉 आभास

एक बार एक व्यक्ति की उसके बचपन के टीचर से मुलाकात होती है, वह उनके चरण स्पर्श कर अपना परिचय देता है।

वे बड़े प्यार से पुछती है, 'अरे वाह, आप मेरे विद्यार्थी रहे है, अभी क्या करते हो, क्या बन गए हो?'

'मैं भी एक टीचर बन गया हूं ' वह व्यक्ति बोला,' और इसकी प्रेरणा मुझे आपसे ही मिली थी जब में 7 वर्ष का था।'

उस टीचर को बड़ा आश्चर्य हुआ, और वे बोली कि,' मुझे तो आपकी शक्ल भी याद नही आ रही है, उस उम्र में मुझसे कैसी प्रेरणा मिली थी??'

वो व्यक्ति कहने लगा कि ....

'यदि आपको याद हो, जब में चौथी क्लास में पढ़ता था, तब एक दिन सुबह सुबह मेरे सहपाठी ने उस दिन उसकी महंगी घड़ी  चोरी होने की आपसे शिकायत की थी, आपने क्लास का दरवाज़ा बन्द करवाया और सभी बच्चो को क्लास में पीछे एक साथ लाइन में खड़ा होने को कहा था, फिर आपने सभी बच्चों की जेबें टटोली थी, मेरी जेब से आपको घड़ी मिल गई थी, जो मैंने चुराई थी, पर चूंकि आपने सभी बच्चों को अपनी आंखें बंद रखने को कहा था तो किसी को पता नहीं चला कि घड़ी मैंने चुराई थी।

टीचर उस दिन आपने मुझे लज्जा व शर्म से बचा लिया था, और इस घटना के बाद कभी भी आपने अपने व्यवहार से मुझे यह नही लगने दिया कि मैंने एक गलत कार्य किया था, आपने बगैर कुछ कहे मुझे क्षमा भी कर दिया और दूसरे बच्चे मुझे चोर कहते इससे भी बचा लिया था।'

ये सुनकर टीचर बोली,
'मुझे भी नही पता था बेटा कि वो घड़ी किसने चुराई थी' वो व्यक्ति बोला,'नहीं टीचर, ये कैसे संभव है? आपने स्वयं अपने हाथों से चोरी की गई घड़ी मेरे जेब से निकाली थी।'

टीचर बोली.....
'बेटा मैं जब सबके पॉकेट चेक कर रही थी, उस समय मैने कहा था कि सब अपनी आंखे बंद रखेंगे, और वही मैंने भी किया था, मैंने स्वयं भी अपनी आंखें बंद रखी थी'

मित्रो....
किसी को उसकी ऐसी शर्मनाक परिस्थिति से बचाने का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है?

यदि हमें किसी की कमजोरी मालूम भी पड़ जाए तो उसका दोहन करना तो दूर, उस व्यक्ति को ये आभास भी ना होने देना चाहिये कि आपको इसकीं जानकारी भी है।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 13 Oct 2019




👉 आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है (भाग १)

 ‘आलस्य एक घोर पाप है’—ऐसा सुनकर कितने ही आश्चर्य में पड़कर सोच सकते हैं क्या अजीब-सी बात है! भला आलस्य किस प्रकार पाप हो सकता है? पाप तो चोरी, डकैती, लूट-खसोट, विश्वासघात, हत्या, व्यभिचार आदि कुकर्म ही होते हैं। इनसे मनुष्य का नैतिक पतन होता है और वह धर्म से गिर जाता है। आलस्य किस प्रकार पाप माना जा सकता है? आलसी व्यक्ति तो चुपचाप एक स्थान पर पड़ा-पड़ा जिन्दगी के दिन काटा करता है। वह न तो अधिक काम ही करता है और न समाज में घुलता-मिलता है, इसलिये उससे पाप हो सकने की सम्भावना नहीं के समान ही नगण्य रहती है।

पाप क्या है? वह हर आचार-व्यवहार एवं विचार पाप ही है जिससे किसी को अनुचित रीति से शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट अथवा हानि हो। आत्म-हिंसा अथवा आत्म-हानि एक जघन्य-पाप कहा गया है। आलसी सबसे पहले इसी पाप का भागी होता है। मनुष्य को शरीररूपी धरोहर मिली हुई है। निष्क्रिय पड़ा रहकर आलसी इसे बरबाद किया करता है जबकि उसे ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई समझदार व्यक्ति उससे इस अपराध का उपालम्भ करता है तो वह बड़े दम्भ से यही कहता है कि शरीर उसका अपना है। रखता है या बर्बाद करता है—इस बात से किसी दूसरे का क्या सम्बन्ध हो सकता है?

आलसी का यह अहंकार स्वयं एक पाप है। उसका यह कथन उसकी अनधिकारिक अहमन्यता को घोषित करता है। शरीर किसी की अपनी संपत्ति नहीं। वह ईश्वर-प्रदत्त एक साधन है जो भव बन्धन में बँधी आत्मा को इस शरीर रूपी साधन को उद्देश्य-दिशा में उपभोग करने क  कर्तव्य भर ही मिला है। उसे अपना समझने अथवा बरबाद करने का अधिकार किसी को नहीं है। आलसी निरन्तर इस अनधिकार चेष्टा को करता हुआ पाप करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 23

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.23

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७९)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि

आध्यात्मिक चिकित्सा के आचार्य परम पूज्य गुरुदेव ने वैदिक महर्षियों की परम्परा के इस युग में नवजीवन दिया। उन्होंने अध्यात्म चिकित्सा के वैदिक सूत्रों, सत्यों एवं रहस्यमय प्रयोगों की कठिन साधना दुर्गम हिमालय में सम्पन्न की। उनके द्वारा दिए गए संकेतों के अनुसार यह जटिल साधना स्वयं वैदिक युग के महर्षियों के सान्निध्य में सम्पन्न हुई। वामदेव, कहोड़, अथर्वण एवं अंगिरस आदि ये महर्षि अभी भी अपने अप्रत्यक्ष शरीर से देवात्मा हिमालय में निवास करते हैं। परम गुरु स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी ने पूज्य गुरुदेव को उनसे मिलवाया था। उन सबने गुरुदेव की पात्रता, पवित्रता व प्रामाणिकता परख कर उन्हें अध्यात्म चिकित्सा के सभी रहस्यों से अवगत कराया।

यूं तो ऐसी रहस्यात्मक चर्चाएँ गुरुदेव कम ही किया करते थे। फिर भी यदा- कदा प्रश्रों के समाधान के क्रम में उनके मुख से ऐसे रहस्यात्मक संकेत उभर आते थे। ऐसे ही क्रम में एक दिन उन्होंने कहा था कि अध्यात्म चिकित्सा की बातें बहुत लोग करते हैं, लेकिन इसका मर्म बहुत इने- गिने लोग जानते हैं। अध्यात्म चिकित्सा दरअसल वेदविद्या है। यूं तो इसका प्रारम्भ ऋग्वेद से ही हो जाता है, यजुष और साम में भी इसके प्रयोग मिलते हैं। लेकिन इसका समग्र व संवर्धित रूप अथर्ववेद में मिलता है। इस अथर्वण विद्या को सही व सम्यक् ढंग से जानने पर ही अध्यात्म चिकित्सा के सभी रहस्य जाने जा सकते हैं। यह बताने के बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा कि मैंने स्वयं महर्षि अथर्वण एवं महर्षि अंगिरस से इन रहस्यों का ज्ञान प्राप्त किया है।

शब्द व्युत्पत्ति के आधार पर ‘अथर्वा’ शब्द का अर्थ ‘अचंचलता की स्थिति’ है। ‘थर्व इति गतिर्नाम न थर्व इति अथर्वा’। थर्व का मतलब गति है और गति का अर्थ चंचलता है। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक आदि सभी प्रकार की चंचलता को अथर्वविद्या की अध्यात्म चिकित्सा से नियंत्रित करके साधक सम्पूर्ण स्वस्थ व स्थितप्रज्ञ बनाया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव के मुख से हमने एक और बात सुनी है। वह कहते थे कि वैदिक वाङ्मय में अथर्ववेद के ‘ब्रह्मवेद’, ‘भैषज्यवेद’ आदि कई नाम मिलते हैं। इन्हीं में से एक नाम ‘अथर्वाङ्गिरस’ भी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १११

👉 गुरुवर की वाणी

आज की विषम परिस्थितियों में युग निर्माण परिवार के व्यक्तियों को महाकाल ने बड़े जतन से ढूंढ़-खोजकर निकाला है। आप सभी बड़े ही महत्त्वपूर्ण एवं सौभाग्यशाली हैं। इस समय कुछ खास जिम्मेदारियों के लिए आपको महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है। भगवान् के कार्य में भागीदारी निभानी है। आप धरती पर केवल बच्चे पैदा करने और पेट भरने के लिए नहीं आए हैं, बल्कि आज की इन विषम परिस्थितियों को बदलने में भगवान् की मदद करने के लिए आए हैं।

भगवान् अगर किसी पर प्रसन्न होते हैं, तो उसे बहुत सारी धन-सम्पत्ति देते हैं तथा औलाद देते हैं, यह बिलकुल गलत ख्याल है। वास्तविकता यह है कि जो भगवान् के नजदीक होते हैं उन्हें धन-सम्पत्ति एवं औलाद से अलग कर दिया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में ही उनके द्वारा यह संभव हो सकता है कि वे भगवान् का काम करने के लिए अपना साहस एकत्रित कर सकें और श्रेय प्राप्त कर सके। इससे कम कीमत पर किसी को भी श्रेय नहीं मिला है।

हमारी उनसे प्रार्थना है, जो जागरूक हैं। जो सोये हुए हैं उनसे हम क्या कह सकते हैं। आपसे कहना चाहते हैं कि फिर कोई ऐसा समय नहीं आयेगा, जिसमें आपको औलाद या धन से वंचित रहना पड़े, परन्तु अभी इस जन्म में इन दोनों की बाबत न सोचें। विराम लगा दें। आपको भगवान् के काम के अन्तर्गत रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता सदा पूरी होती रहेगी, इसके लिए किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।

अगले दिनों धन का संग्रह कोई नहीं कर सकेगा, क्योंकि आने वाले दिनों में धन के वितरण पर लोग जोर देंगे। शासन भी अगले दिनों आपको कुछ जमा नहीं करने देगा। अतः आप मालदार बनने का विचार छोड़ दें। आप अगर जमाखोरी का विचार छोड़ देंगे तो इसमें कुछ हर्ज नहीं है। अगर आप पेट भरने-गुजारे भर की बात सोचें तो कुछ हर्ज नहीं है। आप सन्तान के लिए धन जमा करने, उनके लिए व्यवस्था बनाने की चिन्ता छोड़ देंगे। उन्हें उनके ढंग से जीने दें। संसार में जो आया है, वह अपना भाग्य लेकर आया है।

आगामी दिनों प्रज्ञावतार का कार्य विस्तार होने वाला है। उस काम की जिम्मेदारी केवल ब्राह्मण तथा संत ही पूरा कर सकते हैं। आपको इन दो वर्गों में आकर खड़ा हो जाना चाहिए तथा प्रज्ञावतार के सहयोगी बनकर उनके कार्य को पूरा करना चाहिए। अगर आप अपने खर्च में कटौती करके तथा समय में से कुछ बचत करके इस ब्राह्मण एवं सन्त परम्परा को जीवित कर सकें, तो आने वाली पीढ़ियां आप पर गर्व करेंगी। अगर समस्याओं के समाधान करने के लिए खर्चे में कुछ कमी आती है, तो हम आपको सहयोग करेंगे।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
सितम्बर-1980 शान्तिकुंज में उद्बोधन

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

Karmphal Ka Siddhant | कर्मफल का सिद्धांत | Dr Chinmay Pandya



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Intercession & its Significance | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 शुक्राना करने का फल

रूप सिंह बाबा ने अपने गुरु अंगद देव जी की बहुत सेवा की। 20 साल सेवा करते हुए बीत गए। गुरु रूप सिंह जी पर प्रसन्न हुए और कहा मांगो जो माँगना है। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मुझे तो मांगने ही नहीं आता। गुरु के बहुत कहने पर रूप सिंह जी बोले मुझे एक दिन का वक़्त दो घरवाले से पूछ्के कल बताता हु। घर जाकर माँ से पुछा तो माँ बोली जमीन माँग ले।

मन नहीं माना। बीवी से पुछा तो बोली इतनी गरीबी है पैसे मांग लो। फिर भी मन नहीं माना।

छोटी बिटिया थी उनको उसने बोला पिताजी गुरु ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना। इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले कल तू ही साथ चल गुरु से तू ही मांग लेना।

अगले दिन दोनो गुरु के पास गए। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह।

वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी। रूप सिंह जी इतने गरीब थे के घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते। इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप के हम लोगो पे बहुत एहसान है। आपकी बड़ी रहमत है। बस मुझे एक ही बात चाहिए कि आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते है। कभी आगे एसा वक़्त आये के हमे चार पांच दिन में भी अगर एक बार खाए तब भी हमारे मुख से शुक्राना ही निकले। कभी शिकायत ना करे।

शुकर करने की दान दो।

इस बात से गुरु महाराज इतने प्रसन्न हुए के बोले जा बेटा अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे। तू क्या तेरे घर पे जो आएगा वोह भी खाली हाथ नहीं जाएगा।

तो यह है शुकर करने का फल।
सदा शुकर करते रहे।
सुख में सिमरन।
दुःख में अरदास।
हर वेले शुकराना।

👉 मंदबुद्धि से प्रख्यात बुद्धिमान

मस्तिष्क की स्मरण शक्ति और बुद्धि प्रखरता बढ़ाने में इंग्लैंड के डब्ल्यू.जे.एम. बाटन की कोई सानी नहीं रखता। इंग्लैंड के केंट कस्बे में जन्मा बाटन आरंभ में इतना मंदबुद्धि था कि उसे पढ़ी हुई कोई बात याद नहीं रहती। कमजोर भी काफी था और कमजोरी, बीमारी के कारण उसे 11 वर्ष की आयु में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा। अब वह इधर-उधर की बातें याद कर लेता और उनका स्थान, समय, घटना क्रम आदि का ठीक-ठीक विवरण बताकर लोगों पर अपनी स्मरण शक्ति का रौबद्धि के विकास की क्या कल्पना या आशा की जा सकती थी। लेकिन इस स्थिति में भी बाटन ने अपने पिता की प्रेरणा से मनोरंजन का एक शौक बढ़ाया जमाता।

धीरे-धीरे उसने अपनी स्मरण शक्ति को इतना अधिक विकसित कर लिया कि वह चलता फिरता विश्वकोश समझा जाने लगा। यह अभ्यास उसने इस लक्ष्य के प्रति गाँठ-बाँधकर किया कि उसे अपनी याददास्त को बढ़ाना है। पूरी तत्परता के साथ इस दिशा में लगे रहने के बाद उसने अपनी याददास्त को इतना तेज कर लिया कि उसकी ख्याति चारों दिशाओं में फैलने लगी।

एक बार उससे यूरोप के प्रमुख ज्योतिषियों, राजनीतिज्ञों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने ऐसी घटनाओं के विवरण पूछे जो विस्मृति के गर्त में गुम गए ही प्रतीत होते थे, पर उसने पूछी गई सारी घटनाओं को सिलसिलेवार सन्, तारीख सहित इस प्रकार बताया कि पूछने वालों को आश्चर्य चकित रह जाना पड़ा। बाटन अपने समय में इतना प्रसिद्ध हो गया था कि उसकी मृत्यु के बाद अमेरिका के एक स्वास्थ्य संस्थान ने उसका सिर 10 हजार डालर में खरीदा ताकि उसकी मस्तिष्कीय विलक्षणताओं का रहस्य मालूम किया जा सके।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 20

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 11 Oct 2019



👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७८)

👉 अचेतन की चिकित्सा करने वाला एक विशिष्ट सैनिटोरियम

सूक्ष्म में विद्यमान सद्गुरु की सत्ता के संकेतों के अनुसार संचालित ऐसों की साधना अदृश्य की प्राण ऊर्जा को सधन करती है। युगऋषि के महाप्राणों में विलीन होने वाले उनके प्रण दृश्य में प्रेरणा बनकर उभरते हैं। इन प्रेरणाओं से विचार तंत्र प्रशिक्षित होता है और व्यवहार रूपान्तरित। मानव जीवन में शान्तिकुञ्ज की अदृश्य संवेदनाएँ एवं दृश्य क्रियाकलाप चौंकाने वाले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। ये प्रभाव किसी एक की विचार संकल्पना नहीं, बल्कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अनेकों शोधार्थियों के अनुसंधान का निष्कर्ष है।

पिछले सत्र में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मानव चेतना व योग विज्ञान विभाग एवं नैदानिक मनोविज्ञान विभाग के विद्यार्थियों ने अपने लघुशोध अध्ययन के लिए शान्तिकुञ्ज को विषय चुना था। इन शोध करने वाले छात्र- छात्राओं की संख्या ७५ थी और इनमें से आधे से अधिक छात्र- छात्राओं के शोध की विषयवस्तु यही थी कि शान्तिकुञ्ज किस भाँति आध्यात्मिक चिकित्सा का कार्य कर रहा है। यहाँ का वातावरण, यहाँ का प्रशिक्षण, यहाँ की जीवनशैली किस भाँति यहाँ आने वाले लोगों की शारीरिक व मानसिक व्याधियों का शमन करते हैं।

इसके लिए शोध छात्र- छात्राओं ने शान्तिकुञ्ज के आध्यात्मिक अनुभूतियों के काव्य को अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोगों में रूपान्तरित किया। इस रूपान्तरण में उन्होंने शान्तिकुञ्ज की अदृश्य एवं दृश्य गतिविधियों के निम्र आयामों की व्याख्या की। इन शोध विद्यार्थियों ने इस आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र में संवेदित अदृश्य के दिव्य स्पन्दनों को अभिप्रेरक कारकों (मोटीवेशन फैक्टर्स) के रूप में स्वीकारा। उन्होंने यहाँ स्वयं रहकर अनुभव किया कि शान्तिकुञ्ज में प्रवेश करते ही कोई दिव्य प्रेरणा हृदय में हिलोरे की तरह उठती है और आदर्शवादी दिशा में कुछ विशेष करने के लिए प्रेरित करती है। इनके अनुसार इन प्रेरणाओं में इतना प्राण बल होता है कि वे अभिवृत्तियों में परिवर्तन लाती हैं।

इसी के साथ इन शोधार्थियों ने यह कहा कि शान्तिकुञ्ज के दृश्य क्रियाकलापों में सर्वप्रथम यहाँ चलने वाला प्रशिक्षण है। जिसे वैज्ञानिक भाषा ‘काग्रीटिव रिस्ट्रक्चरिंग  यानि कि बोध तंत्र का पुनर्निर्माण कह सकते हैं। व्यक्ति के जीवन की प्रधान समस्या है- विचार तंत्र की गड़बड़ी, जिसके कारण ही उसके जीवन में शारीरिक- मानसिक परेशानियाँ आ खड़ी हुई हैं। इन शोध विद्यार्थियों ने अपने शोध कार्यों में यह अनुभव किया है। शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षण के द्वारा सफलतापूर्वक काग्नीटिव रिस्ट्रक्चरिंग होती है। इससे चिंतन को नयी दृष्टि मिलती है और यहाँ आने वालों को मनोरोगों से छुटकारा मिलता है।

शान्तिकुञ्ज के क्रियाकलापों का अगला आयाम यहाँ की जीवन शैली है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘बिहैवियरल मॉडीफिकेशन’ या व्यावहारिक बदलाव की प्रक्रिया कहा जा सकता है। यह सच है कि व्यावहारिक तकनीकों द्वारा मनुष्य को अनेकों रोगों से मुक्त किया जा सकता है। शान्तिकुञ्ज की जीवनशैली के ये चमत्कार शोध प्रयासों के निष्कर्ष के रूप में सामने आये। इन निष्कर्षों में पाया यही गया है कि यहाँ नौ दिवसीय एवं एक मासीय में आने वाले लोग असाधारण रूप से अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को उपलब्ध करते हैं। एक- दो नहीं, दो दर्जन से भी अधिक शोध निष्कर्षों से आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज की सफलता प्रभावित हुई है और यह सब इस महान् ऊर्जा केन्द्र के संस्थापक आध्यात्मिक चिकित्सा के परमाचार्य युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव की सक्रिय तपश्चेतना का सुफल है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०९

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Oct 2019

★ भाग्यवाद एवं ईश्वर की इच्छा से सब कुछ होता है- जैसी मान्यताएँ विपत्ति में असंतुलित न होने एवं संपत्ति में अहंकारी न होने के लिए एक मानसिक उपचार मात्र हैं। हर समय इन मान्यताओं का उपयोग अध्यात्म की आड़ में करने से तो व्यक्ति कायर, अकर्मण्य एवं निरुत्साही हो जाता है।
 
□  प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती।  वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर और चाणक्य जैसे कुरूप को  प्राप्त होती है। उसके अनुशासन में जो आ जाता है, वह बिना भेदभाव के उसका वरण कर लेती है।
 
◆ अपव्ययी अपनी ही बुरी आदतों से अपनी संपत्ति गँवा बैठता है और फिर दर-दर का भिखारी बना ठोकरें खाता फिरता है। व्यसनी अपना सारा समय निरर्थक के शौक पूरे करने में बर्बाद करता रहता है। जिस बहुमूल्य समय में वह कुछ कहने लायक काम कर सकता था, वह तो व्यसन पूरे करने में ही चला जाता है।

◇ गुण्डागर्दी और बदमाशी इसलिए सफल होती रही हैं क्योंकि उनके प्रतिरोध में कोई तन कर नहीं खड़ा होता, अन्यथा संसार में दुष्टता की तुलना में सज्जनता का अनुपात कहीं अधिक है, पर सज्जनों की कायरता अपने ऊपर मुसीबत आने पर ही कुछ करने की बात सोचती है। यह ऐसी दुष्प्रवृत्ति है, जिससे सज्जनता पर भी कायरता का कलंक लगता है।

□  ईश्वर विश्वास का अर्थ है- एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना, जो सर्वव्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक बुद्धि कुकर्म करने की दिशा में एक कदम भी न बढ़ने देगी।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 रत्नों से श्रेष्ठ चक्का:-

एक राजा ने महात्मा को अपने हीरे-मोतियों से भरा खजाना दिखाया। महात्मा ने पूछा- 'इन पत्थरों से आपको कितनी आय होती है? राजा ने कहा- आय नहीं होती बल्कि इनकी सुरक्षा पर व्यय होता है? महात्मा राजा को एक किसान की झोपड़ी में ले गया। वहाँ एक स्त्री चक्की से अनाज पीस रही थी। महात्मा ने उसकी ओर संकेत कर कहा- पत्थर तो चक्की भी है और तुम्हारे हीरे मोती भी। परन्तु इसका उपयोग होता है और यह नित्य पूरे परिवार का पोषण करने योग्य राशि दे देती है। तुम्हारे हीरे-मोती तो उपयोग हीन है। उन्हें यदि परमार्थ में खर्च करोगे तो सुरक्षा-व्यय तो बचा ही लोगे बदले में जन श्रद्धा, दैवी अनुदान अजस्र मात्रा में पाओगे।''

👉 तीन प्रकार के धनिक:-

एक बार एक भक्त ने नानक से पूछा आप कहते है कि सब पैसे वाले एक से नहीं होते। इसका क्या तात्पर्य है।' नानक बोले- 'उत्तम लोग वे है जो उपार्जन को सत्प्रयोजनों के निमित्त खर्च कर देते हैं। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति वे है जो कमाते है, जमा करते हैं पर सदुपयोग करना भी जानते है। तीसरी श्रेणी उनकी है जो कमाते नहीं, कहीं से पा जाते है और उडा़ जाते हैं। ऐसे लोग संसार में पतन का कारण बनते है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

Nari Ki Mahima Nari Shaktiyan | नारी की महिमा नारी शक्तियाँ



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मैं ढूँढ़ता तुझे था, जब कुञ्ज और वन में | Mai Dhundta Tujhe Tha | Pragya...



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👉 हार-जीत का फैसला!

बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ मे निर्णायक थी- मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती। हार-जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया।

लेकिन जाने से पहले देवी भारती ने दोनो ही विद्वानो के गले मे एक-एक फूल माला डालते हुए कहा, ये दोनो मालाएं मेरी अनुपस्थिति मे आपके हार और जीत का फैसला करेगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गई। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।

कुछ देर पश्चात् देवी भारती अपना कार्य पुरा करके लौट आई। उन्होने अपनी निर्णायक नजरो से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।

सभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थी फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया ?

देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मे पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रुध्द हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे है। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।

विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।

दोस्तो क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तो मे दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को  मुरझाने मत दीजिये।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 10 Oct 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 10 Oct 2019


👉 प्रभु की माया

जो जानता है कि मैं नहीं जानता, पर कहता है कि मैं जानता हूँ, वह झूठा है। जो जानता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं जानता हूँ, वह वास्तव में नहीं जानता है, कारण कि पूर्णरूपेण जानना वास्तव में असंभव ही है।

जो जानता है कि मैं नहीं जानता और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह सत्य कहता है। जो जनता है कि मैं अंश रूप में जानता हूँ और कहता है कि मैं नहीं जानता हूँ, वह कुछ जानता है, पर है वह अधूरा ही। यह भी प्रभु की माया है।

जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता और यही कहता भी है, वह औरों से अधिक जानता है, परंतु जो जानता है कि मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता, इसी कारण चुप रहता है, किसी से कुछ नहीं कहता, वह वास्तव में बहुत जानता है। इतना जानकर भी जो प्रभु के प्रेम में सब कुछ भूल जाता है, वह प्रभु में लय हो जाता है। वह धन्य है।

वही पूर्णतया जानता है, जो जानकर भी भूल गया है, जो भक्त है, अनन्य प्रेमी है। वह अब क्या बताए? उसके पास बताने की कोई बात ही नहीं है, उसके द्वंद्व मिट चुके हैं। अब कौन बताए और किसे बताए, बताने को धरा ही क्या है? यही प्रभु की माया है। उसकी माया वही जाने। प्रभु की महिमा अपरंपार है।

📖 अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७७)

👉 अचेतन की चिकित्सा करने वाला एक विशिष्ट सैनिटोरियम

आध्यात्मिक चिकित्सा केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज द्वारा की जा रही सेवाएँ विश्वविदित हैं। ब्रह्ममुहूर्त से ही यहाँ मानवीय चेतना के जागरण के स्वर ध्वनित होने लगते हैं। गायत्री महामंत्र के जप एवं भगवान् सूर्य के ध्यान के साथ यहाँ रहने वाले व यहाँ आये अनगिन साधक अरुणोदय का अभिनन्दन करते हैं। और इन्हीं क्षणों में मिलती है उन्हें उस प्रकाश दीप की प्रेरणा जिसे शान्तिकुञ्ज के संस्थापक ने सन् १९२६ ई. के वसन्त पर्व पर देवात्मा हिमालय की दिव्य विभूति की साक्षी में जलाया था। जो तब से लेकर अब तक अखण्ड जलते हुए असंख्य जनों को प्रकाशभरी प्रेरणाएँ बाँट रहा है। अनन्त अनुभूतियाँ इसकी साक्षी में उभरीं और चिदाकाश की धरोहर बनी हैं। यह अविरल कथा- गाथा आज भी कही जा रही है।

सूर्योदय के साथ ही इसके मद्धम स्वर मेघमन्द्र हो जाते हैं। शिवालिक पर्वतमालाओं की घाटियों में बसे शान्तिकुञ्ज के मध्य बनी यज्ञशाला में वैदिक मंत्रों के सविधि सस्वर गान के साथ स्वाहा की गूँज उभरती है तो न जाने कितने लोगों की शारीरिक- मानसिक व्याधियाँ एक साथ भस्म हो जाती हैं। यह स्वाहा का महाघोष ऐसा होता है जैसे भगवान् महाकाल ने विश्व के महारोगों को भस्मीभूत करने के लिए महास्वाहा का उच्चारण किया हो। पवित्र यज्ञ के अनन्तर यहाँ आये हुए लोग विशिष्ट साधकों के पवित्र वचनों को सुनते हैं। इससे उनकी विचार चेतना नया प्रशिक्षण पाती है। इन विचार औषधियों के बाद उन्हें माँ गायत्री का महाप्रसाद मिलता है।

महाप्रसाद के अनन्तर साधक- साधिकाएँ यहाँ अपने प्रशिक्षण का नया क्रम प्रारम्भ करते हैं। इसके द्विआयामी दृश्य है। पहले आयाम में नव दिवसीय सत्र के कार्यक्रम हैं जो व्यक्ति की आत्मचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए हैं। दूसरा आयाम एक मासीय सत्र के कार्यक्रमों का है, जो सामूहिक लोकचेतना को परिष्कृत व प्रशिक्षित करने के लिए है। यह प्रशिक्षण सम्पूर्ण दिवस चलता रहता है। साँझ होते ही भगवान् भुवन भास्कर तो विश्व के दूसरे गोलार्ध को प्रकाशित करने चले जाते हैं। परन्तु जाते- जाते वे यहाँ के साधकों को आशीष देना नहीं भूलते। उनके आशीष की यह लालिमा काफी समय तक साधकों के मन को अपने रंग में रँगती रहती है।

इसी के साथ साधकों के रंग में रँगी साँझ साधकों के अन्तर्गगन में विलीन होती है। और निशा के प्रथम प्रहर में साधकों के प्रशिक्षण का शेष भाग पूरा होता है। इसके बाद सभी विधाता का स्मरण करते हुए निद्रालीन होने लगते हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे होते हैं, जो अपने अन्तराल में सद्गुरु के संकेतों को पल- पल अवतरित होते हुए अनुभव करते हैं। इस अकथनीय अनुभवों के साथ उनकी निशीथ कालीन साधना प्रारम्भ होती है। ये साधक अपने आराध्य गुरुदेव को दिये गये वचन के अनुसार महानिशा में शयन को महापाप समझते हैं। जो सचमुच में साधक हैं वे महानिशा में कभी सोते नहीं। उनके लिए यह समय सघन साधना में विलीन विसर्जित होने के लिए है, न कि मोह निद्रा के महापाश में बँधने के लिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०७

👉 The Illusive Reality

One who knows that he knows not, but claims he knows – is a liar. One who knows little bit but thinks he knows – is ignorant. One who knows not and knows and accepts that he knows not – is sincere. One who knows partially and knows that he knows not – is a learner. But none can know it because it is impossible to know it. This is what, is the maya – the ‘grand illusion’ of our perception of the gigantic creation of God.

One who knows that he knows and also knows that he does not – is wise. He does not say it despite knowing a lot. Because he knows a lot and therefore knows that nothing could be said or discussed about it. One who knows that it is undecipherable infinity and immerses and ‘illusion’ of self-identity into devotion of the Omniscient – is enlightened…

His existence is unified with the devotion and love of god. He has realized the absolute void in the infinity (of maya – the illusive creation) and the infinity (of God) in the void (sublime). What doubts or queries he would have? Nothing! What he would know and about what? Nothing! He says nothing. What he would say and to whom? He knows God and knows that God alone knows his maya.

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Oct 2019

★ किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो।
 
□  हे सखे, तुम क्यों रो रहे हो? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ!
 
◆ लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।

◇ अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं; सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) ...धीरे - धीरे सब होगा। वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द

👉 दो मित्र की की गति परिणति

दो मित्र एक साथ खेले, बड़े हुए। पढ़ाई में भी दोनों आगे रहते थे। एक धनी घर का था और उसे खर्च की खुली छूट थी। दूसरा निर्धन पर संस्कारवान घर से आया था व सदैव सीमित खर्च करता। धनी मित्र जब तक साथ रहा उसे अपनी फिजूलखर्ची में साथ रहने को आमंत्रित करता रहा। पर उसने उसकी यही बात न मानी शेष बातों पर सदैव परामर्श लेता भी रहा और उसे सुझाव देता भी कि अक्षय सम्पदा होते हुए भी तुम्हें खर्च अनावश्यक नहीं करना चाहिए।

दोनों कालान्तर में अलग हुए। निर्धन मित्र ने अध्यापक की नौकरी स्वीकार कर ली व धनी मित्र ने व्यापार में धन लगाकर अपना कारोबार अलग बना लिया। १० वर्ष बाद दोनों की सहसा मुलाकात एक औषधालय में हुई। धनी मित्र अपना धन तो चौपट कर ही चुका था, अन्य दुव्यर्सनों के कारण जिगर खराब होने से औषधालय में चिकित्सार्थ भर्ती था। दूसरी ओर उसका मित्र अब एक विद्यालय का प्रधानाचार्य था। पति-पत्नी व एक बालक सीमित खर्च में निर्वाह करते थे। प्रसन्न उल्लास युक्त जीवन जीते थे। दोनों ने एक दूसरे की कथा-गाथा सुनी। धनी मित्र की आँखों से आँसू लुढ़क पड़े "मित्र ! मैंने तुम्हारा कहा माना होता तो आज मेरी यह स्थिति न होती। अनावश्यक खर्च की मेरी वृत्ति ने आज मुझे यहाँ तक पहुँचा दिया।'' दूसरे ने सहानुभूति दर्शायी, यथा सम्भव आर्थिक सहयोग देकर उसे नये सिरे से जीवन जीने योग्य बना दिया।

धनार्जने यथा बुद्धेरपेक्षा व्ययकर्मणि।
ततोऽधिकैव सापेक्ष्या तत्रौचित्सस्य निश्चये।। प्रज्ञा पुराण ।।

धन कमाने में जितनी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता पड़ती है, उससे अनेक गुनी व्यय के औचित्य का निर्धारण करते समय लगनी चाहिए।।

सही तरीके से कमाना व सही कामों में औचित्य-अनौचित्य का ध्यान रखकर खर्च करना ही लक्ष्मी का सम्मान है। इसलिए अर्थ संतुलन के मितव्ययिता पक्ष को प्रधानता दी जाती है। ध्यान यही रखा जाय कि जो भी बचाया जाय उसको उचित प्रयोजनों में नियोजित कर दें।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

पूजा-उपासना के लाभ | Pooja Upasna Ke Labh | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

Sai Ka Panchhi Bole Re | साँई का पंछी बोले रे | Pragya Bhajan Sangeet



Title

👉 माँ

एक दिन अचानक मेरी पत्नी मुझसे बोली - "सुनो, अगर मैं तुम्हे किसी और के साथ डिनर और फ़िल्म के लिए बाहर जाने को कहूँ तो तुम क्या कहोगे"। मैं बोला - " मैं कहूँगा कि अब तुम मुझे प्यार नहीं करती"।

उसने कहा - "मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह औरत भी आपसे बहुत प्यार करती है और आप के साथ कुछ समय बिताना उनके लिए सपने जैसा होगा"।

वह अन्य औरत कोई और नहीं मेरी माँ थी। जो मुझ से अलग अकेली रहती थी। अपनी व्यस्तता के कारण मैं उन से मिलने कभी कभी ही जा पाता था। मैंने माँ को फ़ोन कर उन्हें अपने साथ रात के खानेे और एक फिल्म के लिए बाहर चलने के लिए कहा।

"तुम ठीक तो हो,ना। तुम दोनों के बीच कोई परेशानी तो नहीं" माँ ने पूछा। मेरी माँ थोडा शक्की मिजाज़ की औरत थी। उनके लिए मेरा इस किस्म का फ़ोन मेरी किसी परेशानी का संकेत था।

नहीं कोई परेशानी नहीं। बस मैंने सोचा था कि आप के साथ बाहर जाना एक सुखद अहसास होगा" मैंने जवाब दिया और कहा 'बस हम दोनों ही चलेंगे"। उन्होंने इस बारे में एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, 'ठीक है।'

शुक्रवार की शाम को जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो मैंने देखा है वह भी दरवाजे पर इंतजार कर रही थी। वो एक सुन्दर पोशाक पहने हुए थी और उनका चहेरा एक अलग सी ख़ुशी में चमक रहा था।

कार में माँ ने कहा " 'मैंने अपनी दोस्त को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर खाना खाने के लिए जा रही हूँ। वे काफी प्रभावित थी"। हम लोग माँ की पसंद वाले एक रेस्तरां पहुचे जो बहुत सुरुचिपूर्ण तो नहीं मगर अच्छा और आरामदायक था। हम बैठ गए, और मैं मेनू देखने लगा। मेनू पढ़ते हुए मैंने आँख उठा कर देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रहीं थी और एक उदास सी मुस्कान उनके होठों पर थी।

'जब तुम छोटे थे तो ये मेनू मैं तुम्हारे लिए पढ़ती थी' उन्होंने कहा। 'माँ इस समय मैं इसे आपके लिए पढना चाहता हूँ,' मैंने जवाब दिया।

खाने के दौरान, हम में एक दुसरे के जीवन में घटी हाल की घटनाओं पर चर्चा होंने लगी। हम ने आपस में इतनी ज्यादा बात की, कि पिक्चर का समय कब निकल गया हमें पता ही नही चला।

बाद में वापस घर लौटते समय माँ ने कहा कि अगर अगली बार मैं उन्हें बिल का पेमेंट करने दूँ, तो वो मेरे साथ दोबारा डिनर के लिए आना चाहेंगी। मैंने कहा "माँ जब आप चाहो और बिल पेमेंट कौन करता है इस से क्या फ़र्क़ पड़ता है।

माँ ने कहा कि फ़र्क़ पड़ता है और अगली बार बिल वो ही पे करेंगी।

"घर पहुँचने पर पत्नी ने पूछा" - कैसा रहा।

"बहुत बढ़िया, जैसा सोचा था उससे कही ज्यादा बढ़िया" - मैंने जवाब दिया।

इस घटना के कुछ दिन बाद, मेरी माँ का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह इतना अचानक हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाया ।

माँ की मौत के कुछ समय बाद, मुझे एक लिफाफा मिला जिसमे उसी रेस्तरां की एडवांस पेमेंट की रसीद के साथ माँ का एक ख़त था जिसमे माँ ने लिखा था " मेरे बेटे मुझे पता नहीं कि मैं तुम्हारे साथ दोबारा डिनर पर जा पाऊँगी या नहीं इसलिए मैंने दो लोगो के खाने के अनुमानित बिल का एडवांस पेमेंट कर दिया है। अगर मैं नहीं जा पाऊँ तो तुम अपनी पत्नी के साथ भोजन करने जरूर जाना।

उस रात तुमने कहा था ना कि क्या फ़र्क़ पड़ता है। मुझ जैसी अकेली रहने वाली बूढी औरत को फ़र्क़ पड़ता है, तुम नहीं जानते उस रात तुम्हारे साथ बीता हर पल मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन समय में एक था।

भगवान् तुम्हे सदा खुश रखे।
I love you".
तुम्हारी माँ

जीवन में कुछ भी आपके अपने परिवार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है।

अपने परिजनों को उनके हिस्से का समय दीजिए.. क्योंकि आपका साथ ही उनके जीवन में खुशियाँ का आधार है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 8 Oct 2019


👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 8 Oct 2019


👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७६)

👉 जीवनशैली आध्यात्मिक हो

यहाँ परम क्रान्तिवीर चन्द्रशेखर आजाद के बचपन चर्चा प्रासंगिक होगी। यूँ तो वह बचपन से साहसी थे। पर कुछ चीजें उन्हें डरा देती थी। इनमें से एक अँधेरा था और एक दर्द। दस- बारह साल की उम्र में उनके यहाँ एक महात्मा आये। यह महात्मा महावीर हनुमान जी के भक्त थे। हनुमान जी की पूजा करना और रामकथा कहना यही उनका काम था। चन्द्रशेखर के गाँव में भी उनकी रामकथा हो रही थी। रामकथा के मर्मिक अंश बालक चन्द्रशेखर को भावविह्वल कर देते थे। तो कुछ प्रसंगों को सुनकर वह रोमाँचित हो जाता। अपनी भावनाओं के उतार- चढ़ावों के बीच बालक चन्द्रशेखर ने सोचा कि ये महात्मा जी जरूर हमारी समस्या का समाधान कर सकते हैं।

और बस उसने अपनी समस्याएँ महात्मा जी को कह सुनायी। उसने कहा- स्वामी जी! मुझे अँधेरे से डर लगता है। महात्मा जी बोले- क्यों बेटा? तो उन्होंने कहा कि अँधेरे में भूत रहते हैं इसलिए। यह सुनकर महात्मा जी बोले- और भी किसी चीज से डरते हो। बालक ने कहा हाँ महाराज- मुझे मार खाने बहुत डर लगता है। उनकी यह सारी बातें सुनकर महात्मा जी ने उन्हें साँझ के समय झुरमुटे में बुलाया। और अपने पास बिठाकर बातें करते रहे। जब रात थोड़ी गाढ़ी हो चली तो वह उन्हें लेकर गाँव के बाहर श्मशान भूमि की ओर ले चले। जहाँ के भूतों के किस्से गाँव के लोग चटखारे लेकर सुनाते थे।

राह चलते हुए महात्मा जी ने उनसे कहा- जानते हो बेटा- भूत कौन होते हैं? बालक ने कहा नहीं महाराज। तो सुनो, वे स्वामी जी बोले- भूत वे होते हैं जिनकी अकाल मृत्यु होती है। जो जिन्दगी से डरकर आत्महत्या कर लेते हैं। जो आदमी अपनी जिन्दगी में डरपोक था वह पूरे जीवन कुछ ढंग का काम न कर सका। वह भला मरने के बाद तुम्हारा क्या बिगाड़ेगा? रही बात मार खाने से डरने की तो शरीर तो वैसे भी एक दिन मरेगा और मन- आत्मा मरने वाले नहीं है। इन बातों को करते हुए वे महात्मा गाँव के बाहर श्मशान भूमि में आ गये। श्मशान भूमि में कहीं कोई डर का कारण न था। इस अनुभव ने बालक चन्द्रशेखर को परम साहसी बना दिया। हाँ यह जरूर है कि महात्मा जी ने उन्हें रामभक्त हनुमान जी की भक्ति सिखायी। महात्मा जी की इस आध्यात्मिक चिकित्सा ने उन्हें इतना साहसी बना दिया कि अंग्रेज सरकार भी उनसे डरने लगती। उन महात्मा जी का यह भी कहना था कि यदि कोई विशिष्ट आध्यात्मिक प्रयोग करने हों तो किसी तपस्थली का चयन करना चाहिए, क्योंकि ये आध्यात्मिक चिकित्सा के केन्द्र होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०५

👉 "बेईमानी से लाभ - बस एक भ्रम

बेईमानी की गरिमा स्वीकारने तथा आदर्श के रूप में अपनाने वाले वस्तुतः वस्तुस्थिति का बारीकी से विश्लेषण नहीं कर पाते। वे बुद्धि भ्रम से ग्रसित हैं। सच तो यह है, बेईमानी से धन कमाया ही नहीं जा सकता। इस आड़ में कमा भी लिया जाए तो वह स्थिर नहीं रह सकता। लोग जिन गुणों से कमाते हैं, वे दूसरे ही हैं । साहस, सूझ-बूझ, मधुर भाषण, व्यवस्था, व्यवहारकुशलता आदि वे गुण हैं जो उपार्जन का कारण बनते हैं।

बेईमानी से अनुपयुक्त रूप से अर्जित किए गए लाभ का परिणाम स्थिर नहीं और अंततः दुःखदायी ही सिद्ध होता है। ऐसे व्यक्ति यदि किसी प्रकार राजदंड से बच भी जाएँ तो भी उन्हें अपयश, अविश्वास, घृणा, असहयोग जैसे सामाजिक और आत्मप्रताड़ना तथा आत्मग्लानि जैसे आत्मिक कोप का भाजन अंततः बनना पड़ता है। बेईमानी से भी कमाई तभी होती है जब उस पर ईमानदारी का आवरण चढ़ा हो। किसी को ठगा तभी जा सकता है जब उसे अपनी प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता पर आश्वस्त कर दिया जाए। यदि किसी को यह संदेह हो जाए कि हमें ठगने का ताना बाना बुना जा रहा है तो वह उस जाल में नहीं फँसेगा तथा दूसरे को अपनी धूर्तता का लाभ नहीं मिल सकेगा।

वास्तवकिता प्रकट होने पर तो बेईमानी करने वाला न केवल उस समय के लिए वरन् सदा के लिए लोगों का अपने प्रति विश्वास खो बैठता है और लाभ कमाने के स्थान पर उल्टा घाटा उठाता है। रिश्वत लेते, मिलावट करते, धोखाधड़ी बरतते, सरकारी टैक्स हड़पते, काला बाजारी करते पकड़े जाने वाले सरकारी दंड पाते तथा समाज में अपनी प्रतिष्ठा गँवाते आए दिन देखे जाते हैं। उनकी असलियत प्रकट होते ही हर व्यक्ति घृणा करने लगता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 14

👉 सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा

श्रद्धा अर्थात् श्रेष्ठता से असीम प्यार, अटूट अपनत्व। सजलता - तरलता इसकी विशेषता है। पानी पर कितने भी प्रहार कि ए जाएँ, वह कटता - टूटता नहीं है। पानी से टकराने वाला उसे तोड़ नहीं पाता, उसी में समा जाता है। श्रद्धा की यही विशेषता उसे अमोघ प्रभाव वाली बना देती है।
  
प्रज्ञा अर्थात् जानने, समझने, अनुभव करनें की उत्कृष्ठ क्षमता, दूरदर्शी विवेकशीलता। प्रखरता इसकी विशेषता है। प्रखरता की गति अबाध होती है। प्रखरता युक्त प्रज्ञा हजार अवरोधों - भ्रमों को चीरती हुई यथार्थ तक पहुँचने एवं बुद्धि के उत्कृष्ठतम नियोजन में सफ ल होती है।
  
सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा तीर्थ के सनातन मूल घटक हैं। जहाँ ऋषियों अवतारी सत्ताओं के प्रभाव से यह दोनों धाराऐं सघन सबल हो जाती हैं वहीं तीर्थ विकसित - प्रतिष्ठित हो जाते हैं। युगतीर्थ - गायत्री तीर्थ के भी यही मूल घटक हैं।
  
युगतीर्थ के संस्थापक वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ, युगऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं स्नेह सलिला वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा की वास्तविक पहचान उनके शरीर नहीं, उनके द्वारा प्रवाहित प्रखर प्रज्ञा एवं सजल श्रद्धा की सशक्त धाराएँ रही हैं। इसलिए उनके स्मृति चिन्हों के रूप में उनकी स्थूल काया की मूर्तियाँ नहीं, उनके सूक्ष्म तात्विक प्रतीकों के रूप में उन स्मृति चिन्हों को स्थापित किया गया है। वेजीवन भर दो शरीर एक प्राण रहे, इसलिये उनके शरीर का अन्तिम संस्कार एक ही स्थान पर, उनके तात्विक प्रतीकों के समीप संपन्न कर उसी स्थल को उनके संयुक्त समाधि स्थल का रूप दे दिया गया है। तीर्थ चेतना के इन प्रतीकों पर अपनी श्रद्धा समर्पित करके सत्प्रयोजनों के लिये उनसे शक्ति, अनुदान, आशीर्वाद सभी श्रद्धालु प्राप्त कर सकते हैं।

👉 जहाँ सुमति तहाँ सम्पत्ति

अपव्यय एवं अनावश्यक संग्रह से अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं? अपव्यय करने वाले मानो बदले में दुष्प्रवृत्तियाँ खरीदते है और उनसे अपना तथा दूसरों का असीम अहित करते है।

बुद्धिमानी की सही परख यही है कि जो भी कमाया जाय, उसका अनावश्यक संचय अथवा अपव्यय न हो। जो उपार्जन को सदाशयता में नहीं नियोजित करता वह घर में दुष्प्रवृत्तियाँ आमंत्रित करता है। लक्ष्मी उसी घर में बसती है, फलती है जहाँ उसका सदुपयोग हो। आड़म्बर युक्त प्रदर्शन, फैशन परस्ती, विवाहों में अनावश्यक खर्च, जुआ जैसे दुर्व्यसन ऐसे ही घरों में पनपते हैं, जहाँ उपार्जन के उपयोग पर ध्यान नहीं दिया जाता, उपभोग पर नियंत्रण नहीं होता। भगवान की लानत किसी को बदले में लेनी हो तो धन को स्वयं अपने ऊपर अनाप-शनाप खर्च कर अथवा दूसरों पर अनावश्यक रूप से लुटाकर सहज ही आमंत्रित कर सकता है।

ऐसे उदाहरण आज के भौतिकता प्रधान समाज में चारों ओर देखने को मिलते हैं। परिवारों में कलह तथा सामाजिक अपराधों की वृद्धि का एक प्रमुख कारण अपव्यय की प्रवृत्ति भी है।

समुद्र संचय नहीं करता, मेघ बनकर बरस जाता है तो बदले में नदियाँ दूना जल लेकर लौटती हैं। यदि वह भी कृपण हो संचय करने लगता तो नदियाँ सूख जाती, अकाल छा जाता और यदि अत्यधिक उदार हो धनघोर बरसने लगता तो अतिवृष्टि की बिभीषिका आ जाती। अत: समन्वित नीति ही ठीक है।

एक सेठ बहुत धनी था। उसके कई लड़के भी थे। परिवार बढ़ा पर साथ ही सबमें मनोमालिन्य, द्वेष एवं कलह रहने लगा। एक रात को लक्ष्मीजी ने सपना दिया कि मैं अब तुम्हारे घर से जा रही हूँ। पर चाहो तो चलते समय का एक वरदान मांग लो। सेठ ने कहा- ''भगवती आप प्रसन्न हैं तो मेरे घर का कलह दूर कर दें, फिर आप भले ही चली जाँय।"

लक्ष्मीजी ने कहा- 'मेरे जाने का कारण ही गृह कलह था। जिन घरों में परस्पर द्वेष रहता है, मैं वहाँ नहीं रहती। अब जब कि तुमने कलह दूर करने का वरदान मांग लिया और सब लोग शांतिपूर्वक रहोगे तब तो मुझे भी यहीं ठहरना पड़ेगा। सुमति वाले घरों को छोड़कर मैं कभी बाहर नहीं जाती।"

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १ से

👉 चल पुस्तकालयों की अनिवार्य आवश्यकता-

इन दिनों की लोक रुचि घटिया मनोरंजन साहित्य पढ़ने भर की है इस कारण स्वाध्याय से चिन्तन को मिलने वाला पौष्टिक तत्व तो नहीं, उल्टे मनोभूमि में निकृष्टता बढ़ती जाती है। जहाँ तहाँ पुस्तकालय भी है, पर वह साहित्य अलमारियों में ही बन्द सड़ता रहता है। युग निर्माण साहित्य का सृजन मनो संस्थानों में व्याप्त कुविचारों के परिमार्जन के टानिक के रूप में गढ़ा गया है, पर उसकी उपयोगिता तब है जब यह साहित्य जन जन तक पहुँचे। चल पुस्तकालय अथवा ज्ञान रथ इस आवश्यकता को पूरा करेंगे।

ज्ञान रथ प्रत्येक शाखा के पास हो। उतरे साइकिल या रिक्शे के पहियों से एक धकेल सस्ते में बना ली जाये। उसे आकर्षक बनाने के लिये सजाया भी जा सकता है। इसी में युग निर्माण साहित्य तथा पत्रिकाओं की जिल्द बँधी पुरानी प्रतियाँ रहे। इन्हें लेकर गली गली मुहल्ले मुहल्ले जाया जाये तथा लोगों को आग्रह पूर्वक पढ़ने को यह साहित्य दिया जाए। एक कापी में उनके नाम नोट रहे। अगले सप्ताह उनसे वापिस लेने और नई पुस्तकें देने का क्रम बना रहे। विक्रयार्थ साहित्य भी रखा जा सकता है। सहायक आजीविका के रूप में या किसी बेकार व्यक्ति को थोड़ा वेतन देकर भी धकेले चलाई जा सकती है। इससे हुई छोटी आय से उस व्यक्ति का काम चल जायेगा। लोगों को इस साहित्य की उपयोगिता भी समझाई जा सके। तो यह धकेल सोने में सुगन्ध की कहावत चरितार्थ कर सकती है।

तीर्थ यात्रा धर्म प्रचार फेरी-

युग निर्माण परिवार के लिए ऐसी तीर्थ यात्राओं का प्रचलन करना चाहिए, जिसमें परिजन टोलियाँ बनाकर समीपवर्ती गाँवों में जाया करे, रास्ते में आदर्श वाक्य लेखन करे, दिन में जनसंपर्क और रात्रि को विचार गोष्ठी या छोटे से यज्ञायोजन के लिये आमंत्रण देना। भजन कीर्तन तथा प्रभात फेरियों का क्रम रखा जा सकता है। और सायंकाल जाकर रात्रि में विचार गोष्ठी दूसरे दिन एक छोटा सा आयोजन भी सम्पन्न किया जा सकता है। यात्रा टोलियाँ अवकाश के दिनों का तो इस पुण्य प्रयोजन में उपयोग करे ही। पीले वस्त्र, नियत झोला तथा अपने मिशन की परिचय सामग्री लेकर चला जाये तो अपना उद्देश्य अधिक सार्थक होगा ।

यह कार्य सदस्यों के ज्ञान घट की संचित राशि, उदारमना व्यक्तियों के सहयोग और चंदे से संग्रहित पूँजी-किसी भी प्रकार से सम्पन्न किये जा सकते हैं, पर इनकी उपयोगिता और उपादेयता को असंदिग्ध मानकर यह कार्य क्रम प्रत्येक शाखा को सम्पन्न करने ही चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५६


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/July/v1.56

सोमवार, 7 अक्तूबर 2019

👉 लोभ रूपी कुआं

एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ' ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?' इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया।

आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है, वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।

छः दिन बीत चुके थे। राज पंडित को जबाव नहीं मिला था। निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई। गड़रिए ने पूछा -" आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?

यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा। इस पर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा -" पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।" राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कलतक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।

गड़रिया बोला- "मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगे। बस, पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा।"

राज पंडित के अंदर पहले तो अहंकार जागा कि दो कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं? लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए तैयार हो गया। गड़रिया बोला -" *पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो। राजपंडित ने कहा कि यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पीयेगा तो उसकी बुद्धि मारी जायेगी। मैं दूध नहीं पीऊंगा। तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा - गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" ठीक है, दूध पीने को तैयार हूं, आगे क्या करना है?" गड़रिया बोला-" अब तो पहले मैं दूध को झूठा करूंगा फिर तुम्हें पीना पड़ेगा।" राजपंडित ने कहा -" तू तो हद करता है! ब्राह्मण को झूठा पिलायेगा?" तो जाओ, गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" मैं तैयार हूं झूठा दूध पीने को।" गड़रिया बोला-" वह बात गयी। अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा, उसको झूठा करूंगा, कुत्ते को चटवाऊंगा फिर तुम्हें पिलाऊंगा। तब मिलेगा पारस। नहीं तो अपना रास्ता लीजिए।"

राजपंडित ने खूब विचार कर कहा-" है तो बड़ा कठिन लेकिन मैं तैयार हूं। गड़रिया बोला-" मिल गया जवाब। यही तो कुआं है! लोभ का, तृष्णा का जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 7 Oct 2019


👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७५)

👉 जीवनशैली आध्यात्मिक हो

आध्यात्मिक चिकित्सक उनके इस दर्द को अपने दिल की गहराइयों में महसूस करते हैं। क्योंकि उन्हें इस सच्चाई का पता है कि यथार्थ में कोई भी बुरा या डरपोक नहीं है। सभी में प्रभु का सनातन अंश है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भूल रूप में परम दिव्य होने के साथ साहस और सद्गुणों का भण्डार है। बस हुआ इतना ही है कि किन्हीं कारणों से उसकी अन्तर्चेतना में कुछ गाँठें पड़ गई है, जिसकी वजह से उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह रुक गया है। यदि ये गाँठें खोल दी जाय तो फिर स्थिति बदल सकती है। हाँ इतना जरूर है कि ये गाँठें बचपन की भी हो सकती हैं और पिछले जीवन की भी। पर यह सौ फीसदी सच है कि व्यक्ति को बुरा या डरपोक बनाने में इन्हीं का प्रभाव काम करता है।

इस सच को अधिक जानने के लिए हमें व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया में प्रवेश करना पड़ेगा। किसी का बचपन उसके व्यक्तित्व का अंकुरण है। इसके बढ़तेक्रम में व्यक्तित्व भी बढ़ता है। इस अवधि में कोई भी घटना का मन- मस्तिष्क पर गहरा असर होता है। अब यदि किसी बच्चे को बार- बार अँधेरे से अथवा कुत्ते से डराय जाय और यदि यह डर गहरा होकर किसी मनोग्रंथि का रूप ले ले तो फिर यह बच्चा मन अपनी पूरी उम्र अँधेरे और कुत्तों से डरता रहेगा। यही स्थिति भावनात्मक आघात के बारे में है। जिन्हें हम बुरे और असामाजिक लोग कहते हैं, उनमें से कोई बुरा और असामाजिक नहीं होता। भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से उपजे विरोध के स्वर, उपजी विकृतियाँ उन्हें बुरा बना देती हैं। यदि इन  मनोग्रंथियों को खोल दिया जाय तो सब कुछ बदल सकता है।

आध्यात्मिक व्यवहार चिकित्सा में चिकित्सक सबसे पहले उसकी पीड़ा- परेशानी को भली प्रकार समझता है। अपने आत्मीय सम्बन्धों व अन्तर्दृष्टि के द्वारा उसकी मनोग्रन्थि के स्वरूप व स्थिति का आँकलन करता है। इसके बाद किसी उपयुक्त आध्यात्मिक तकनीक के द्वारा उसकी इस जटिल मनोग्रन्थि को खोलता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे यह जरूरी है कि चिकित्सक के व्यक्तित्व पर रोगी की गहरी आस्था हो। फिर सब कुछ ठीक होने लगता है। उदाहरण के लिए यदि बात किसी अँधेरे भयग्रस्त रोगी की है तो चिकित्सक सब से पहले अँधेरे के यथार्थ से वैचारिक परिचय करायेगा। फिर इसके बारे में और भी अधिक गहराई बतायेगा। बाद में उसे स्वयं लेकर उस अँधेरे स्थान पर ले जायेगा। जहाँ उसे डर लगा करता है। इस पूरी प्रक्रिया में जप या ध्यान की तकनीकों का उपयोग भी हो सकता है, क्योंकि इससे मनोग्रंथियाँ आसानी से खुलती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Oct 2019

★ दु:ख और क्लेशों की आग में जलने से बचने की जिन्हें इच्छा है उन्हें पहला काम यह करना चाहिए कि अपनी आकांक्षाओं को सीमित रखें। अपनी वर्तमान परिस्थिति में प्रसन्न और सन्तुष्ट रहने की आदत डालें। गीता के अनासक्त कर्मयोग का तात्पर्य यही है कि महत्वकांक्षायें वस्तुओं की न करके केवल कर्त्तव्य पालन की करें।
 
□  देवत्व वह आलोक है, जिसके हटते ही तमिस्ना और निस्तब्धता छाने लगती है। नरक क्या है ? देवत्व के आभाव में फैली हुई अव्यवस्था और उसकी सड़न-दुर्गंध। दैत्य क्या है? देवत्व के दुर्बल बनने पर परिपुष्ट हुआ औद्धत्य-अनौचित्य। देवमाता ही इस संसार में सत्यम् शिवम् सुन्दरम की अनुभूति एवं आभा बनकर प्रकट होती है। उसकी अवहेलना से ही पतन और पराभव का वातावरण बनता और विनाश का सरंजाम खडा होता है।
 
◆ सद्ज्ञान की मानव जाति को भारी आवश्यकता है, उसका भविष्य सद्विचारों पर ही निर्भर है। संसार को सुखी बनाने के लिए गायत्री परिवार ज्ञान की मशाल जलाये रखने का संकल्प किया है। परिवार के हर सदस्य को इस दिशा में कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए और भारत भूमि को प्रकाशित कर देने के संकल्प की पूर्ति में अपना हिस्सा आगे बढ़कर बढाना चाहिए।

◇ वर्तमान काल में मनुष्य जाति पर जो विपत्तियाँ आई है, उनके तत्कालिक कारण अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं, परन्तु इन सबके मूल में एक ही कारण काम कर रहा है वह यह है "धर्म के प्रति उपेक्षा" आत्मा का स्वाभाविक धर्म यह है कि सेवा बुद्धि से लोक कल्याणार्थ कर्तव्य करें। सब भूतों में ईश्वर की भावना रखकर उनकी क्रियात्मक पूजा करना, प्रेम, सहायता, सहयोग, करना सच्चा धर्म है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जन्म दिन मनाने की परिपाटी

युग निर्माण परिवार के सदस्यों में प्रेम परिचय बढ़े। घनिष्ठता स्थापित हो उसके लिये जन्म दिन मनाने की परम्परा विकसित की जाय। अपने व्रतधारी और सामान्य सदस्यों का जन्म दिन किस तारीख को पड़ता हे, इसका वर्ष के 365 दिनों का अनुक्रम से रजिस्टर तैयार कर लिया जाये तथा उसकी एक एक कार्बन कापी अथवा छपी कापी प्रत्येक सदस्य के पास रहे, ताकि उस दिन नियमित रूप से हर सदस्य उस सदस्य के घर बिना स्मरण दिलाये पहुँच जाया करे। जन्म दिवसोत्सवों में परिचितों, पड़ोसियों और सम्बन्धियों को भी अलग से आमंत्रित किया जाता रहे, इससे कुछ ही समय में सैकड़ों नये व्यक्तियों तक मिशन का प्रकाश अनायास ही पहुँच सकता है।

तैयारी सर्वत्र एक सी रहे इस परम्परा को लोकप्रिय बनाया जाना है, अतएव निर्धन और धनी वर्ग सब सीमित खर्च उठाये। पूजन सामग्री एवं उपकरणों की व्यवस्था शाखा अथवा टोली में रहे। स्वागत सत्कार में भी न्यूनतम खर्च हो। प्रसाद के लिये चीनी की गोली, चिनौरियाँ और सत्कार के लिये कटी सुपारी, तली-भुनी सौंफ पर्याप्त है। सम्भव हो तो, यह व्यवस्था भी शाखा में विद्यमान रहे। समय, प्रातः काम पर जाने से पूर्व, अन्यथा रात को रखा जाये और इतने समय से उसे सम्पन्न कर लिया जाये कि घर लौटने, काम पर जाने या रात्रि विश्राम में विलम्ब न हो।

एक घण्टे में यज्ञादि धर्मानुष्ठान, आधा घण्टा संगीत एक घण्टा प्रवचन प्रतिज्ञा, इस प्रकार दो ढाई घण्टे पर्याप्त है। सर्वतोमुखी पवित्रता का जल अभिसिंचन, पूजा वेदी पर देव पूजन, स्वस्ति वाचन, संक्षिप्त हवन, उपस्थित लोगों द्वारा शुभकामना, अक्षत पुष्प उपहार, अभिवादन, आशीर्वाद, भजन कीर्तन, प्रवचन, मार्गदर्शन जल इलाइची से सत्कार इतना कार्यक्रम पर्याप्त है। पूजा के मंत्र सभी पढ़े लिखे पुस्तकों से सामूहिक रूप से बोले। प्रवचन कर्ता कई तरह के प्रवचन तैयार रखे, ताकि यदि एक ही दिन कई जन्म दिन मनाने पड़े तो भी रुचि भिन्नता बनी रहे। अपने स्त्री बच्चों तथा मुहल्ले के जन्म दिन लोग स्वयं मनायें, उसमें शाखा सदस्यों का समय नहीं लगना चाहिए। इस तरह इस परम्परा के द्वारा पारस्परिक स्नेह सद्भाव के विकास का सुर सुलभ मनुष्य शरीर का लाभ किस प्रकार लिया जा सकता हे, थोड़े में ही यह उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।

जन्म दिन संस्कार से पारिवारिक स्नेह सद्भाव की वृद्धि और व्यक्ति निर्माण की आवश्यकता पुरी होती है, जन समुदाय को भी यह लाभ देने की दृष्टि से प्रत्येक शाखा को (1) आदर्श वाक्य लेखन (2) चल पुस्तकालय (3) धर्म फेरी तीर्थयात्रा-यह तीन कार्य क्रम अनिवार्य रूप से चलाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५५

Change Your Thoughts To Change Your Life | Pt Shriram Sharma Acharya



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