रविवार, 16 दिसंबर 2018

👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्राइवर को रास्ता दिखना भी बहुत मुश्किल हो रहा था। ड्राइवर ईश्वर पर बहुत आस्था रखने वाला व्यक्ति था। उसने किसी तरह सड़क किनारे एक पेड़ के पास गाड़ी रोक दी और यात्रियों से बोला कि मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि इस बस में एक पापी व्यक्ति बैठा हुआ है जिस कारण हम सब पर यह आफत आयी है। इसकी पहचान का एक सरल तरीका है।

हर आदमी बारी बारी से बस से उतरकर इस पेड़ को छूकर वापस बस में आकर बैठे। जो आदमी पापी होगा उसके छूते ही पेड़ पर बिजली गिर जाएगी और बस के बाकी यात्री सुरक्षित बच जाएँगे। सबसे पहले उसने खुद ऐसा ही किया और यात्रियों से भी ऐसा करने का दबाब बनाने लगा।

उसके ऐसा करने पर हर यात्री एक दूसरे को ऐसा करने को बोलने लगा। बाकी यात्रियों के दबाब पर एक यात्री बस से उतरा और पेड़ को छूकर जल्दी से बस में अपनी सीट पर आकर बैठ गया। इस तरह एक एक कर सभी यात्रियों ने ऐसा ही किया। अंत में केवल एक यात्री ऐसा करने से बचा रह गया। जब वह पेड़ को छूने के लिए जाने लगा तो सभी उसे ही वह पापी समझकर घृणा से उसे देखने लगे। उस व्यक्ति ने जैसे ही पेड़ को छुआ आकाश में तेज गड़गड़ाहट हुई और बस पर बिजली गिर गयी। बस धू धू कर जलने लगी और कोई भी जीवित नहीं बचा।उधर वह यात्री जिसे सभी पापी समझ रहे थे वह बिल्कुल सुरक्षित था।

*Moral of the story*

जीवन में कोई भी मुसीबत आने पर हम सभी सबसे पहले ईश्वर को कोसना शुरू कर देते हैं, उसे ही त्याग देते हैं। ये नहीं समझने की कोशिश करते कि उसी ईश्वर के कारण आज हम जिंदा हैं ठीक उसी तरह जैसे कोई भी यात्री यह समझने को तैयार नहीं था कि एक उस यात्री के कारण सबकी जान बची हुई थी। उस यात्री को जैसे ही सबने अपने से अलग किया सभी की जान चली गयी।

ईश्वर उसी को मुसीबत देता है जिसे वह इस काबिल समझता है कि वह इससे पार पा लेगा। अतः हम पर जब भी कोई मुसीबत आये,चाहे वह मुसीबत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, हमें ईश्वर का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने हमें कम से कम जिंदा तो रखा। अगर जान चली जाती तो न तो हम ईश्वर को कोस पाते और न ही धन्यवाद दे पाते। उसने हमें जिंदा बचाये रखा केवल इसलिए कि हम उसके इस एहसान को स्वीकार करें और अपनी भूल सुधार कर उस मुसीबत से पार पाने का उपाय ढ़ूँढ़ सकें। मुसीबत के समय ईश्वर को कोसने से हमारी मुसीबत कम नहीं हो सकती उलटा।

अतः मुसीबत के समय ईश्वर को कोसने की बजाय अपनी जान बख्शने के लिए उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें इस मुसीबत को सहने की शक्ति देने के साथ ही इससे बाहर निकालने का रास्ता दिखायें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 Dec 2018



👉 आज का सद्चिंतन 17 Dec 2018



👉 अभागो! आँखें खोलो!!

अभागे को आलस्य अच्छा लगता है। परिश्रम करने से ही है और अधर्म अनीति से भरे हुए कार्य करने के सोच विचार करता रहता है। सदा भ्रमित, उनींदा, चिड़चिड़ा, व्याकुल और संतप्त सा रहता है। दुनिया में लोग उसे अविश्वासी, धोखेबाज, धूर्त, स्वार्थी तथा निष्ठुर दिखाई पड़ते हैं। भलों की संगति उसे नहीं सुहाती, आलसी, प्रमादी, नशेबाज, चोर, व्यभिचारी, वाचाल और नटखट लोगों से मित्रता बढ़ाता है। कलह करना, कटुवचन बोलना, पराई घात में रहना, गंदगी, मलीनता और ईर्ष्या में रहना यह उसे बहुत रुचता है।

ऐसे अभागे लोग इस दुनिया में बहुत है। उन्हें विद्या प्राप्त करने से, सज्जनों की संगति में बैठने से, शुभ कर्म और विचारों से चिढ़ होती है। झूठे मित्रों और सच्चे शत्रुओं की संख्या दिन दिन बढ़ता चलता है। अपने बराबर बुद्धिमान उसे तीनों लोकों में और कोई दिखाई नहीं पड़ता। खुशाकय, चापलूस, चाटुकार और धूर्तों की संगति में सुख मानता है और हितकारक, खरी खरी बात कहने वालों को पास भी खड़े नहीं होने देता नाम के पथ पर सरपट दौड़ता हुआ वह मंद भागी क्षण भर में विपत्तियों के भारी भारी पाषाण अपने ऊपर लादता चला जाता है।

कोई अच्छी बात कहना जानता नहीं तो भी विद्वानों की सभा में वह निर्बलता पूर्वक बेतुका सुर अलापता ही चला आता है। शाम का संचय, परिश्रम, उन्नति का मार्ग निहित है यह बात उसके गले नहीं उतरती और न यह बात समझ में आती है कि अपने अन्दर की त्रुटियों को ढूँढ़ निकालना एवं उन्हें दूर करने का प्रचण्ड प्रयत्न करना जीवन सफल बनाने के लिए आवश्यक है। हे अभागे मनुष्य! अपनी आस्तीन में सर्प के समान बैठे हुए इस दुर्भाग्य को जान। तुम क्यों नहीं देखते? क्यों नहीं पहचानते?

✍🏻 समर्थ गुरु रामदास
📖 अखण्ड ज्योति जून 1943 पृष्ठ 12

👉 Happiness lies in contentment.

On a hot summer day a traveler stopped under a shady tree and lay down on the bare ground to rest for a while. Looking up at the sky, he wished he could be lying on a comfortable bed.

He did not know that he was lying under a magical tree that made every thought come true.

Lo! In no time a bed appeared and he was lying on it. ‘This is perfect,’ the traveler thought. “Now all I need is a maiden to give me company in this lonely place.’ Poof! A beautiful young maiden immediately appeared before him. She sat next to him, fanning him for his pleasure. ‘Wow!’ the traveler exclaimed, enjoying the cool breeze. ‘The only thing that could make things any better would be to have some food and drink to enjoy with my lovely companion here.”

As soon as he thought this, a wonderful feast lay before him. The maiden served him the food and drink. Lying in bed eating grapes the maiden served him, the traveler thought, ‘This is the peak of happiness! Wouldn’t it just be awful if it all disappeared and a tiger were to attack me instead?’

As soon as had he thought this, everything disappeared, and the scene was replaced by a ferocious tiger. The man scurried up the tree, thinking to himself - ‘If only I had been content with just the shade of this tree, I wouldn’t be at the mercy of this beast!’

👉 जीवन दिशा

आज झूठ बोलने, मनोभावों को छिपाने और पेट में कुछ रखकर मुंह से कुछ कहने की प्रथा खूब प्रचलित है। कोई व्यक्ति मुख से धर्मचर्चा करते हैं, पर उनके पेट में पाप और स्वार्थ बरतता है। यह पेट में बरतने वाली स्थिति ही मुख्य है। उसी के अनुसार जीवन की गति संचालित होती है। एक मनुष्य के मन में विश्वास जमा होता है कि 'पैसे की अधिकता ही जीवन की सफलता है।' वह धन जमा करने के लिए दिन-रात जुटा रहता है।

जिसके हृदय में यह धारणा है कि ‘इंद्रिय भोगों का सुख ही प्रधान है’, वह भोगों के लिए बाप-दादों की जायदाद फूँक देता है। जिसका विश्वास है कि ‘ईश्वरप्राप्ति सर्वोत्तम लाभ है,’ वह और भोगों को तिलांजलि देकर संत का सा जीवन बिताता है। जिसे देशभक्ति की उत्कृष्टता पर विश्वास है, वह अपने प्राणों की भी बलि देश के लिए देते हुए प्रसन्नता अनुभव करता है।

जिसके हृदय में जो विश्वास जमा बैठा है, वह उसी के अनुसार सोचता है, कल्पना करता है और इस कार्य के लिए जो कठिनाईयाँ आ पड़ें उन्हें भी सहन करता है। दिखावटी बातों से, बकवास से, बाह्य विचारों से नहीं, वरन भीतरी विश्वास-बीजों से जीवन दिशा का निर्माण होता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आत्मज्ञान और आत्मकल्याण पृष्ठ 3

👉 "Direction of life

Nowadays there is a general tendency to tell a lie, live a lie and behave like a wolf in sheep's clothing. Someone may be talking a lot about morals, righteousness or religious matters but his/her life could well beriddled with wrongdoings and selfish acts. The only thing that really matters is person’s deep-rooted beliefs. That is what decides the overall direction of life. Someone may have a firm belief that having lots of money is a sign of a successful life and would keep busy, day and night, amassing money.

Someone else may have a notion that having sensual pleasures is the most important thing in the life and may squander away the family fortune in the pursuit of having such pleasures. Someone who strongly believes that realising God is the ultimate achievement of life may give up all the worldly pleasures and live a devout life like that of a saint. Someone who cherishes patriotism would happily sacrifice his/her life for the sake of the nation.

The deep-seated beliefs of a person influence and shape his/her way of thinking and imagination. He/she would even endure any amount of difficulties that may arise along the way to realising them. It is not the pretended talks, gossips or the outward thoughts but the deep-seated inner beliefs of individual that actually decide the direction of his/her life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Aatmagyaan aur Atmakalyaan  (Self-realization and Self-benefit) Page 3

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Dec 2018

◼ सुख-दुःख हमारे अपने ही पैदा किए हुए, हमारी अपनी ही मनोभूमि के परिणाम हैं। हम अपनी मनोभूमि परिष्कृत करें, विचारों को उत्कृष्ट और रचनात्मक बनायें, भावनाएँ शुद्ध करें, इसी शर्त पर जीवन हमें सुख, शान्ति, प्रसन्नता, आनंद प्रदान करेगा, अन्यथा वह सदा असंतुष्ट और रूठा ही बैठा रहेगा और अपने लिए आनंद के द्वार सदैव बंद रखे रहेगा।

◼ शुभ कार्यों में लगने वालों, उन्नति और विकास की ओर बढ़ने वालों के समक्ष एक ही मार्ग है दृढ़ता के साथ अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर गतिशील रहना।  एक बार शुभ लक्ष्य और उत्कृष्ट मार्ग का चुनाव कर फिर उस ओर निरन्तर आगे बढ़ते रहना कर्मवीर के लिए आवश्यक है।

◼ कुछ व्यक्ति कहते हैं कि फिजूलखर्ची समाज कराता है, हम क्या करें? समाज आर्थिक मूल्यों को ही मान्यता देता है। यदि हम बन-ठन कर समाज में दिखावा नहीं करेंगे तो समाज में हमारी कौन पूछ होगी। खरबूजा को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। हम समाज का जैसा रूप देखते हैं, वैसा ही करते हैं-ये तर्क थोथे और सारहीन हैं। फिजूलखर्ची तो एक व्यक्तिगत चीज है। इस गलती का जिम्मेदार व्यक्ति है, समाज नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 1)

आगे बढ़ने का क्रम यह है कि एक कदम पीछे से उठा कर आगे रखा जाय और जो आगे रखा था उसे और आगे बढ़ाया जाय। इसी प्रकार चलने की क्रिया संपन्न होती है और लम्बी मंजिल पार की जाती है। आत्मिक प्रगति का मार्ग भी यही है। पिछड़ी योनियों में रहते समय जो पिछड़े संस्कार चेतना भूमि में जड़ जमाकर जहाँ-तहाँ बैठे हुए हैं उनका उन्मूलन किया जाय और दैवी प्रवृत्तियाँ, जो अभी तक समुचित परिणाम में प्राप्त नहीं हो पाई हैं, उन्हें प्रयत्न पूर्वक अपनाया और बढ़ाया जाय। किसान यही करता है। खेत को जोतता है, उसमें से पिछली फसल के पौधों की सूखी हुई जड़ों को हल चला कर उखाड़ता है।

कंकड़ पत्थर बीनता है और नई फसल उगाने में जो भी अवरोध थे, उन्हें समाप्त करता है। इसके उपरान्त उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद पानी का प्रबन्ध करता है और बीज बोने के उपरान्त नई फसल अच्छी होने की आशा करता है। आत्मिक प्रगति के मार्ग को कृषि कर्म के समतुल्य गिना जा सकता है। मनुष्य पद के लिए अनुपयुक्त पिछले कुसंस्कारों को उखाड़ कर उन्मूलन करना एक काम है और जो इस पद को सफल सार्थक बना सके ऐसे उत्कृष्ट स्तर के गुण कर्म स्वभावों को अभ्यास में लाना, यही है वह उभय-पक्षीय क्रिया-कलाप जिसमें आत्मिक प्रगति का उद्यान विकसित होते और फलते-फूलते देखा जा सकता है।

प्रगतिशीलता अपनाने का उपाय एक ही है कि अवांछनीयताओं को निरस्त करते चला जाय और जो अभीष्ट आवश्यक है उसे अपनाने के लिए पूरे उत्साह का प्रयोग किया जाय। उत्कर्ष के उच्च शिखर पर चढ़ने के लिए इस रीति-नीति को अपनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं।

आत्मिक प्रगति का भवन, चार दीवारों से मिल कर बनता है। इस तख्त में चार पाये हैं। चारों दिशाओं की तरह आत्मिक उत्कर्ष के भी चार आधार हैं। ब्रह्माजी के चार मुखों से निकले हुए चार वेदों में इसी ज्ञान-विज्ञान का वर्णन है। चार वर्ण-चार आश्रमों का विभाजन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया है। इन्हें (1) आत्म-चिन्तन (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म विकास के नाम से पुकारा जाता है। इन्हें एक एक करके नहीं वरन् समन्वित रूप से सम्पन्न किया जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 7

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/January/v1.7

👉 आशावादी आस्तिक

आशावाद आस्तिकता है। सिर्फ नास्तिक ही निराशावादी हो सकता है। आशावादी ईश्वर का डर मानता है, विनयपूर्वक अपना अन्तर नाद सुनता है, उसके अनुसार बरतता है और मानता है कि ‘ईश्वर जो करता है वह अच्छे के लिये ही करता है।’

निराशावादी कहता है ‘मैं करता हूँ।’ अगर सफलता न मिले तो अपने को बचाकर दूसरे लोगों के मत्थे दोष मढ़ता है, भ्रमवश कहता है कि “किसे पता ईश्वर है या नहीं’, और खुद अपने को भला तथा दुनिया को बुरा मानकर कहता है कि ‘मेरी किसी ने कद्र नहीं की’ ऐसा व्यक्ति एक प्रकार का आत्मघात कर लेता है और मुर्दे की तरह जीवन बिताता है।

आशावादी प्रेम में मगन रहता है, किसी को अपना दुश्मन नहीं मानता। भयानक जानवरों तथा ऐसे जानवरों जैसे मनुष्यों से भी वह नहीं डरता, क्योंकि उसकी आत्मा को न तो साँप काट सकता है और न पापी का खंजर ही छेद सकता है, शरीर की वह चिन्ता नहीं करता क्योंकि वह तो काया को काँच की बोतल समझता है। वह जानता है कि एक न एक दिन तो यह फूटने वाली है, इसलिए वह है, इसलिए वह उसकी रक्षा के निमित्त संसार को पीड़ित नहीं करता। वह न किसी को परेशान करता है न किसी की जान पर हाथ उठाता है, वह तो अपने हृदय में वीणा का मधुर गान निरंतर सुनता है और आनन्द सागर में डूबा रहता है।

निराशावादी स्वयं राग-द्वेष से भरपूर होता है, इसलिए वह हर एक को अपना दुश्मन मानता है और हर एक से डरता है, वह मधु-मक्खियों की तरह इधर उधर भिनभिनाता हुआ बाहरी भोगों को भोग कर रोज थकता है और रोज नया भोग खोजता है। इस तरह वह अशान्त, शुष्क और प्रेमहित होकर इस दुनिया से कूच कर देता है।

✍🏻 समर्थ गुरु रामदास
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/October/v1.4

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्येक ऊँची सफलता के लिए पहले मजबूत, दृढ़, आत्म श्रद्धा का होना अनिवार्य है। इसके बिना सफलता कभी मिल नहीं सकती। भगवान् के इस नियमबद्ध और श्रेष्ठ व्यवस्थायुक्त जगत् में देवयोग के लिए कोई स्थान नहीं है।

ऐसा विचार मत करो कि उसका भाग्य उसे जहाँ-तहाँ भटका रहा है और इस रहस्यमय भाग्य के सामने उसका क्या बस चल सकता है। उसको मन से निकाल देने का प्रयत्न करना चाहिए। किसी तरह के भाग्य से मनुष्य बड़ा है और बाहर की किसी भी शक्ति की अपेक्षा प्रचण्ड शक्ति उसके भीतर मौजूद है, इस बात को जब तक वह नहीं समझ लेगा, तब तक उसका कदापित कल्याण नहीं हो सकता।

दूसरों को सुधारने से पहले हमें अपने सुधार की बात सोचनी चाहिए। दूसरों की दुर्बलता के प्रति एकदम आगबबूला हो उठने से पहले हमें यह भी देखना उचित है कि अपने भीतर कितने दोष-दुर्गुण भरे पड़े हैं। बुराइयों सको दूर करना एक प्रशंसनीय प्रवृत्ति है। अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरंभ करना चाहिए। हम सुधरें-हमारा दृष्टिकोण सुधरे तो दूसरों का सुधार होना कुछ भी कठिन नहीं।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Dec 2018



👉 आज का सद्चिंतन 16 Dec 2018


शनिवार, 15 दिसंबर 2018

उठो चेतना के नये गीत गाओ (kavita)

उठो चेतना के नये गीत गाओ।
न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥

अभी तम निगलते हुये दीप जागे,
अभी आँख मलते हुये गीत जागे,
अभी फूल खिलते हुये मीत जागे,

अभी भोर की गुनगुनी धूप लाओ।
न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥

अभी रात वाली उदासी भरी है।
अभी प्यार की आँख, प्यासी भरी है,
मनुजता देखी है, रूंवासी डरी है,

उठो प्राण फूंको, प्रभाती सुनाओ।
न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥

अभी आत्मघाती, पतन से लड़े हैं,
समर आसुरी आचरण से लड़े हैं,
अभी देव-परिवार, उजड़े पड़े हैं,

अभी दिव्यता को बसाओ, हँसाओ।
न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥

अभी क्रान्ति-अभियान जारी रहेगा,
अभी शान्ति-संग्राम जारी रहेगा,
अभी प्राण-अनुदान जारी रहेगा,

अभी ज्योति से विश्व को जगमगाओ।
न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥

अभी आदमी का परिष्कार होगा,
अभी प्यार का दिव्य अवसर होगा,
अभी विश्व ही, एक परिवार होगा,

जलाके दिये, आरती को सजाओ।
न हम हार जायें, न तुम हार जाओ॥

👉असफलताओं की लंबी रात्रि के बाद होता है सफलता का सूर्योदय

जीवन में सफल होने की मंशा हर कोई अपने मन में पाले हुए है, मगर यह ऐसा नायाब उपहार है, जो सभी को नहीं मिलता । इसके हकदार तो सिर्फ वे लोग ही होते हैं, जिनके सिर पर कुछ कर गुजरने का जुनून होता है या फिर वे जो समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए आतुर होते हैं ।

आज के तकनीकी युग में युवा वर्ग जीवन में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए लालायित है, लेकिन थोड़ा-सा परिश्रम या फिर कड़ी मेहनत के बावजूद नकारात्मक परिणाम उन्हें पूरी तरह से निराश कर देता है ।

यही वक्त मानव जीवन का अहम मोड़ होता है, क्योंकि ऐसे समय पर जो व्यक्ति हिम्मत हार कर असफलता को अपनी किस्मत मान लेता है, वे जिंदगी भर सिर्फ दूसरों की सफलता का दर्शक मात्र बन कर रह जाता हैं ।

मगर अपनी कमियों एवं खामियों को दूर कर सही दिशा में मेहनत करने का मार्ग चुनने और उस पर चलने वाले ही सफलता हासिल करते हैं ।

हालांकि ऐसे लोगों की सफलता की इबारत के पीछे कई बार मुंह की  खाने (हार) वाली कहानी भी छिपी होती है, क्योंकि जीवन में मिलने वाली अनेक विफलताएं ही व्यक्ति की सफलता का आधार रखती हैं ।

बस शर्त इतनी है कि व्यक्ति अपनी विफलताओं से सबक ले और दोगुनी ऊर्जा के साथ निर्धारित लक्ष्य (Goal) की ओर बढ़े।
आज के युवा वर्ग को यह बात हमेशा अपने जेहन में रखनी चाहिए कि सफलता के आयाम स्थापित करने वाला व्यक्ति कोई भी हो, हम सब को केवल उसकी सफलता नजर आती है, मगर उसके पीछे का कड़ा परिश्रम, लक्ष्य पाने का जुनून और इच्छाओं का त्याग नहीं दिखाई देता ।

समाज में अनेक ऐसे उदाहरण (Successful People) है, जिन्हें आज का युवा वर्ग अपना आदर्श मानता है, मगर उनके सफल होने से पहले का संघर्षपूर्ण जीवन जानने तक की कोशिश नहीं की जाती । हां लोगों को नजर आती है, तो सिर्फ उनकी सफलता ।

कोई माने या फिर न माने, यह सच्चाई है कि हर सफल व्यक्ति का जीवन कभी न कभी संघर्षपूर्ण रहता है । हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि जिंदगी का दूसरा नाम संघर्ष (Struggle) है ।

इसलिए आज के युवा वर्ग को यह बात समझनी होगी कि संघर्ष (Struggle), सही दिशा में की गई कड़ी मेहनत, विपरीत परिस्थितियों एवं असफलताओं की लंबी रात के बाद ही सफलता का सूर्योदय होता है ।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर और चाणक्य जैसे कुरूप को वह प्राप्त होती है। उसके अनुशासन में जो आ जाता है, वह बिना भेदभाव के उसका वरण कर लेती है।

 ईश्वर विश्वास का अर्थ है-एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना, जो सर्वव्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है। यदि यह विश्वास कोई सच्चे मन से कर ले तो उसकी विवेक बुद्धि कुकर्म करने की दिशा में एक कदम भी न बढ़ने देगी।
 

 ईश्वर और धर्म की मान्यताएँ केवल इसलिए हैं कि इन आस्थाओं को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति निजी जीवन में सदाचारी और सामाजिक जीवन में परमार्थी बने। यदि यह दोनों प्रयोजन सिद्ध न होते हों, तो यही कहना पड़ेगा कि तथाकथित ईश्वर भक्ति और धर्मात्मापन दम्भ है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रेरणादायक प्रसंग 15 Dec 2018



👉 आज का सद्चिंतन 15 Dec 2018


शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)


प्रभु जीवन ज्योति जगादे!
घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो।
हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।।

अहे सच्चिदानन्द! बहे आनन्दमयी निर्झरिणी
नन्दनवन सा शीतल इस जलती जगती का तल हो।।

सत् की सुगन्ध फैलादे।
प्रभु जीवन ज्योति जगादे।।

विश्वे देवा! अखिल विश्व यह देवों का ही घर हो।
पूषन्! इस पृथ्वी के ऊपर असुर न कोई नर हो।।

इन्द्र! इन्द्रियों की गुलाम यह आत्मा नहीं कहावे—
प्रभुका प्यारा मानव, निर्मल, शुद्ध, स्वतन्त्र, अमर हो।।

मन का तम तोम भगादे।
प्रभु जीवन ज्योति जगादे।।

इस जग में सुख शान्ति विराजे, कल्मष कलह नसावें।
दूषित दूषण भस्मसात् हों, पाप ताप मिट जावें।।

सत्य, अहिंसा, प्रेम, पुण्य जन जन के मन मन में हो।
विमल “अखण्ड ज्योति” के नीचे सब सच्चा पथ पावें।।

भूतल पर स्वर्ग वसादे।
प्रभु जीवन ज्योति जगादे।।

शकडाल भाग्यवादी (kahani)

शकडाल भाग्यवादी था। वह पुरुषार्थ की उपेक्षा करता और हर बात में भाग्य की दुहाई देता। जाति का वह कुम्भकार था। उस दिन वह अपने विश्वास की पुष्टि कराने भगवान महावीर के पास पहुँचा और अपनी मान्यता के समर्थन में उनका अभिमत प्राप्त करने की हठ करने लगा।

भगवान ने उससे उलटकर कुछ प्रश्न किये, कोई तुम्हारे बनाये बर्तन को तोड़-फोड़ करने लगे तो? कोई तुम्हारी पत्नी का शील भंग करने लगे तो? कोई तुम्हारे धन का अपहरण करने लगे तो? क्या करोगे। चुप बैठे रहोगे न?

शकडाल ने कहा-देव, ऐसा अनाचार सहन नहीं हो सकेगा, मैं उसके साथ लड़ पड़ूंगा और अच्छी तरह खबर लूँगा।

भगवान ने कहा- तो फिर तुम्हारा भाग्यवाद कहाँ रहा? मान्यता तो तब सही होती जब तक सब कुछ होते देखकर भी चुप बैठे रहते यहाँ तक कि बर्तन बनाने और रोग की चिकित्सा तक न करते। शकडाल समझ गया कि भाग्यवाद का सिद्धान्त निरर्थक है। पुरुषार्थ ही सब कुछ है। कर्म ही भाग्य बनता है।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 Dec 2018

अवांछनीय चिंतन और चरित्र अपनाये रहने पर किसी भी पूजा-पाठ के सहारे किसी को दैवी अनुकम्पा का एक कण भी हस्तगत नहीं होता। जब पात्रता को परखे बिना भिखारियों तक को लोग दुत्कार देते हैं, तो बिना अपनी स्वयं की उत्कृष्टता सिद्ध किये कोई व्यक्ति दैवी शक्तियों को बहका-फुसला सकेगा, इसकी आशा नहीं ही करना चाहिए।

बातों का जमाना बहुत पीछे रह गया है। अब कार्य से किसी व्यकित के झूठे या सच्चे होने की परख की जायेगी। कुछ लोग आगे बढ़कर यह सिद्ध करें कि आदर्शवाद मात्र चर्चा का एक मनोरंजक विषय भर नहीं है, वरन् उसका अपनाया जाना न केवल सरल है, बल्कि हर दृष्टि से लाभदायक भी।


भाग्यवाद एवं ईश्वर की इच्छा से सब कुछ होता है- जैसी मान्यताएँ विपत्ति में असंतुलित न होने एवं संपत्ति में अहंकारी न होने के लिए एक मानसिक उपचार मात्र है। हर समय इन मान्यताओं का उपयोग अध्यात्म की आड़ में करने से तो व्यक्ति कायर, अकर्मण्य, निरुत्साही हो जाता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Dec 2018



आज का सद्चिंतन 14 Dec 2018


गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

👉भक्त के लिए ईश्वर का उपहार

ईश्वर अपने हर भक्त को एक प्यार भरी जिम्मेदारी सौंपता है और कहता है इसे हमेशा सम्भाल का रखा जाय। लापरवाही से इधर-उधर न फेंका जाय। भक्तों में से हर एक को मिलने वाली इस अनुकम्पा का नाम है- दुःख। भक्तों को अपनी सच्चाई इसी कसौटी पर खरी साबित करनी होती है।

दूसरे लोग जब जिस-तिस तरीके से पैसा इकट्ठा का लेते हैं और मौज-मजा उड़ाते हैं तब भक्त को अपनी ईमानदारी की रोटी पर गुजारा करना होता है। इस पर बहुत से लोग बेवकूफ बताते हैं न बनायेंगे तो भी उनकी औरों के मुकाबले तंगी की जिन्दगी अपने को अखरती, और यह सुनना पड़ता है कि भक्ति का बदला खुशहाली में क्यों नहीं मिला। यह परिस्थितियाँ सामने आती हैं। इसलिए भक्त को बहुत पहले से ही तंगी और कठिनाई में रहने का अभ्यास करना पड़ता है। जो इससे इनकार करता है उसकी भक्ति सच्ची नहीं हो सकती। जो सौंपी हुई अमानत की जिम्मेदारी सम्भालने से इन्कार करे उसकी सच्चाई पर सहज ही सन्देह होता है।

दुनिया में दुःखियारों की कमी नहीं। इनकी सहायता करने की जिम्मेदारी भगवान भक्त जनों को सौंपते हैं। पिछड़े हुए लोगों को ऊंचा उठाने का काम हर कोई नहीं सम्भाल सकता। इसके लिए भावनाशील और अनुभवी आदमी चाहिए। इतनी योग्यता सच्चे ईश्वर भक्तों में ही होती है। करुणावान के सिवाय और किसी के बस का यह काम नहीं कि दूसरों के कष्टों को अपने कन्धों पर उठाये और जो बोझ से लदे हैं उनको हलका करें। यह रीति-नीति अपनाने वाले को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ईश्वर का सबसे प्यारा बेटा है ‘‘दुःख’’। इसे सम्भाल कर रखने की जिम्मेदारी ईश्वर अपने भक्तों को ही सौंपता है। कष्ट को मजबूरी की तरह कई लोग सहते हैं। किन्तु ऐसे कम हैं जो इसे सुयोग मानते हैं और समझते हैं कि आत्मा की पवित्रता के लिए इसे अपनाया जाना आवश्यक है।

जो सम्पन्न हैं, जिन्हें वैभव का उपयोग करने की आदत है उन्हें भक्ति रस का आनन्द नहीं मिल सकता। उपयोग की तुलना में अनुदान कितना मूल्यवान और आनंददायक होता है, जिसे यह अनुभव हो गया वह देने की बात निरन्तर सोचता है। अपनी सम्पदा, प्रतिभा और सुविधा को किस काम में उपयोग करूं इस प्रश्न का भक्त के पास एक ही सुनिश्चित उत्तर रहता है दुर्बलों को समर्थ बनाने, पिछड़ों को बढ़ाने और गिरों को उठाने के लिए। इस प्रयोजन में अपनी विभूतियाँ खर्च करने के उपरान्त संतोष भी मिलता है और आनन्द भी होता है। यही है भगवान की भक्ति का प्रसाद जो ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ के हिसाब से मिलता रहता है।

भक्त की परीक्षा पग-पग पर होती है। सच्चाई परखने के लिए और महानता बढ़ाने के लिए। खरे सोने की कसौटी पर कसने और आग पर तपाने में उस जौहरी को कोई एतराज नहीं होता जो खरा माल बेचने और खरा माल खरीदने का सौदा करता है। भक्त को इसी रास्ते से गुजरता पड़ता है। उसे दुःख प्यारे लगते हैं क्योंकि वे ईश्वर की धरोहर हैं और इसलिए मिलते हैं कि आनन्द, उल्लास, संतोष और उत्साह में क्षण भर के लिए भी कमी न आने पाये।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Dec 2018

दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं-अपने को सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचे उठना भी चाहते हैं और उसका साधन भी हमारे हाथ में है तो आत्म सुधार के लिए, आत्म निर्माण के लिए और आत्म विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों

 पाप की अवहेलना न करो। वह थोड़ा दिखते हुए भी बड़ा अनिष्ट कर डालता है। जैसे आग की छोटी सी चिनगारी भी मूल्यवान वस्तुओं के ढेर को जलाकर राख कर देती है। पला हुआ सांप कभी भी डस सकता है। उसी प्रकार मन में छिपा हुआ पाप कभी भी हमारे उज्ज्वल जीवन का नाश कर सकता है।


 अक्लमंदी की दुनिया में कमी नहीं। स्वार्थियों और धूर्तों का समुदाय सर्वत्र भरा पड़ा है। पशु प्रवृत्तियों का परिपोषण करने वाला और पतन के गर्त में धकेलने वाला वातावरण सर्वत्र विद्यमान है। इसका घेरा ही भव बंधन है। इस पाश से छुड़ा सकने की क्षमता मात्र बुद्धिमत्ता में ही है। बुद्धिमत्ता अर्थात् विवेकशीलता-दूरदर्शिता। इसी की उपासना में मनुष्य का लोक-परलोक बनता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Dec 2018




आज का सद्चिंतन 13 Dec 2018



बुधवार, 12 दिसंबर 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 Dec 2018

आज आदमी खुशी के लिए तरस रहा है। जिन्दगी की लाश इतनी भारी हो गई है कि वजन ढोते-ढोते आदमी की कमर टूट गई है। वह खुशी ढूँढने के लिए सिनेमा, क्लब, रेस्टारेंट, कैबरे डांस सब जगह जाता है, पर वह कहीं मिलती नहीं। खुशी जबकि दृष्टिकोण है, जिसे  ज्ञान की संपदा कहना चाहिए। वही व्यक्ति  ज्ञानवान्  है, जिसे खुशी तलाशना-बाँटना आता है।

आज हर आदमी यही सोचता है कि अनैतिक रहने में उसका भौतिक लाभ है। इसलिए वह बाहर से नैतिकता का समर्थन करते हुए भी भीतर ही भीतर अनैतिक रहता है। हमें मानसिक स्वच्छता का वह पहलू जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा, जिसके अनुसार यह भली प्रकार समझा जा सके कि अनैतिकता व्यक्तिगत स्वार्थपरता की दृष्टि से भी घातक है।

अपने समाज के सुधार पर ध्यान देना उतना ही आवश्यक है, जितना अपना स्वास्थ्य एवं उपार्जन की समस्याओं का सुलझाना। समाजगत पापों से हम निर्दोष होते हुए भी पापी बनते हैं। भूकम्प, दुर्भिक्ष, युद्ध, महामारी आदि के रूप में ईश्वर भी हमें सामूहिक दण्ड दिया करता है और सचेत करता है कि हम अपने को ही नहीं, सारे समाज को भी सुधारें। स्वयं ही सभ्य न बनें, सारे समाज को भी सभ्य बनायें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

विजय-गीत (kavita)

तुम न घबराओ,न आंसू ही बहाओ अब,और कोई हो न हो पर मैं तुम्हारा हूं।
मैं खुशी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा॥

मानता हूं, ठोकरें तुमने सदा खाईं, जिन्दगी के दांव में हारें सदा पाईं, बिजलियां दुख की,
निराशा की,सदा टूटीं, मन गगन पर वेदना की बदलियां छाईं,

पोंछ दूंगा मैं तुम्हारे अश्रु गीतों से, तुम सरीखे बेसहारों का सहारा हूं।
मैं तुम्हारे घाव धो मरहम लगाऊंगा। मैं विजय के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा॥

खा गई इंसानियत को भूख यह भूखी, स्नेह ममता को गई पी प्यास यह सूखी,
जानवर भी पेट का साधन जुटाते हैं,‘जिन्दगी का हक’ नहीं है रोटियां रूखी,

और कुछ मांगो, हंसी मांगो, खुशी मांगो, खो गये हो, दे रहा तुमको इशारा हूं।
आज जीने की कला तुमको सिखाऊंगा। जिन्दगी के गीत गा-गा कर सुनाऊंगा ॥

दान बड़ा या ज्ञान (kahani)

विवाद यह चल रहा था कि दान बड़ा या ज्ञान। दान के पक्षधर थे वाजिश्रवा और ज्ञान के समर्थक थे याज्ञवल्क्य।
निर्णय हो नहीं पा रहा था। दोनों प्रजापति के पास पहुँचे। वे बहुत व्यस्त थे सो निर्णय कराने के लिए शेष जी के पास भेज दिया।

दोनों ने अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत किये। शेष जी ने कहा मैं बहुत थक गया हूं। सिर पर रखा पृथ्वी का बोझ बहुत समय से लदा है। थोड़ी राहत पाऊँ तो विचारपूर्वक निर्णय करूं। आप में से कोई एक मेरे बोझ को एक घड़ी अपने सिर पर रख लें। इसी बीच निर्णय हो जायेगा।

वाजिश्रवा आगे आये। अपनी दानशीलता को दाँव पर लगाकर उनके धरती के बोझ को अपने सिर पर रखने का प्रयत्न किया। पर वे उसमें तनिक भी सफल न हुए।

याज्ञवल्क्य को आगे आना पड़ा। उनने अपने ज्ञान बल का प्रयोग किया और देखते-देखते भू-भार कन्धों पर उठा लिया।
निर्णय हो गया। शेष भगवान बोले- ज्ञान बड़ा है। उस अकेले के बलबूते भी अपना और असंख्यों का उद्धार हो सकता है जबकि दान अविवेक पूर्वक दिया जाने पर कुपात्रों के हाथ पहुँच सकता है और पुण्य के स्थान पर पाप बन सकता है।

👉 आज का सद्चिंतन 12 Dec 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Dec 2018


मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

आत्म-विश्वास जगाओ रे (kavita)

अरे! ईश के अंश, आत्म-विश्वास जगाओ रे।
होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥1॥

दीन, हीन बनकर, क्यों अपना साहस खोते हो।
 क्यों अशक्ति, अज्ञान, अभावों को ही रोते हो॥

जगा आत्म-विश्वास, दैन्य को दूर भगाओ रे।
होकर राजकुमार न तुम कंगाल कहाओ रे॥2॥

आत्म-बोध के बिना, सिंह-शावक सियार होता।
आत्म-बोध होने पर, वानर सिंधु पार होता॥

आत्म-शक्ति के धनी, न कायरता दिखलाओ रे।
 होकर राजकुमार तुम कंगाल कहाओ रे॥3॥

जिसके बल पर नैपोलियन, आल्पस से टकराया।
जिसके बल पर ही प्रताप से, अकबर घबराया॥

उसके बल पर अपनी बिगड़ी बात बनाओ रे।
होकर राजकुमार तुम कंगाल कहाओ रे॥4॥

सेनापति के बिना, न सेना लड़ने पाती है।
सेनापति का आत्म-समर्पण, हार कहाती है॥

गिरा आत्मबल, जीती बाजी हार न जाओ रे।
होकर राजकुमार तुम कंगाल कहारे रे॥5॥

आज मनुजता, अनगिन साधन की अधिकारी है।
बिना आत्म-विश्वास, मनुजता किन्तु भिखारी है॥

अरे! आत्मबल की पारस मणि तनिक छुआओ रे।
होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥6॥

अडिग आत्म-विश्वास, मनुज का रूप निखरेगा।
उसका संबल मनुज, धरा पर स्वर्ग उतारेगा॥

इसके बल पर जो भी चाहो, कर दिखलाओ रे।
होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥7॥

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Dec 2018

हम जियें, हँसी-खुशी और आनंदपूर्वक जियें-यह ठीक भी है और इसका हमें अधिकार भी है। तथापि हमें अपनी हँसी-खुशी में दूसरों को भी भाग देना चाहिए। हम तो आमोद-प्रमोद और आनंद-मंगल मनाते चलें और हमारे आसपास का समाज दुःख के आँसुओं से भीगता रहे, तो हमारी हँसी-खुशी एक सामाजिक अपराध है।

समाज का ऋण हर एक पर है। उसे चुकाना ही चाहिए। इस ऋण से उऋण हुए बिना कोई व्यक्ति जीवन लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। हमें अपनी विचार पद्धति में सामूहिकता के लिए, सामाजिकता के लिए समन्वय और सहिष्णुता के लिए समुचित स्थान रखना चाहिए। इसी में अपनी भलाई है और इसी में समस्त मानव जाति का कल्याण सन्निहित है।

इन दिनों अगणित संकटों और झंझटों का सामना करना पड़ रहा है। उनका निमित्त कारण अपना भटकाव ही है, जिसे कोई चाहे तो अनर्थ आचरण भी कह सकता है। गलती करने वाले पर ही यह दायित्व भी लद जाता है कि वही सुधारे भी। उलटी चाल चलने वाले को अपनी रीति-नीति सुधारने के अतिरिक्त और कोई चारा है नहीं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 December 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 December 2018


ईश्वर है या नहीं?

नास्तिकवाद का कथन यह है कि-”इस संसार में ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं, क्योंकि उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष उपकरणों से सिद्ध नहीं होता।” अनीश्वरवादियों की मान्यता है कि जो कुछ प्रत्यक्ष है, जो कुछ विज्ञान सम्मत है केवल वही सत्य है। चूंकि वैज्ञानिक आधार पर ईश्वर की सत्ता का प्रमाण नहीं मिलता इसलिये उसे क्यों मानें?
इस प्रतिपादन पर विचार करते हुए हमें यह सोचना होगा कि अब तक जितना वैज्ञानिक विकास हुआ है क्या वह पूर्ण है? क्या उसने सृष्टि के समस्त रहस्यों का पता लगा लिया है? यदि विज्ञान को पूर्णता प्राप्त हो गई होती तो शोधकार्यों में दिन-रात माथापच्ची करने की वैज्ञानिकों को क्या आवश्यकता रह गई होती? 

सच बात यह है कि विज्ञान का अभी अत्यल्प विकास हुआ है। उसे अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। कुछ समय पहले तक भाप, बिजली, पेट्रोल, एटम, ईथर आदि की शक्तियों को कौन जानता था, पर जैसे-जैसे विज्ञान में प्रौढ़ता आती गई, यह शक्तियाँ खोज निकाली गई। यह जड़ जगत् की खोज है। चेतन जगत् सम्बन्धी खोज तो अभी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। बाह्य मन और अंतर्मन की गति-विधियों को शोध से ही अभी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं हैं। यदि हम अधीर न हों तो आगे चलकर जब चेतन जगत् के मूल-तत्वों पर विचार कर सकने की क्षमता मिलेगी तो आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व भी प्रमाणित होगा। ईश्वर अप्रमाणित नहीं है।

 हमारे साधन ही स्वल्प है जिनके आधार पर अभी उस तत्व का प्रत्यक्षीकरण सम्भव नहीं हो पा रहा है।
पचास वर्ष पूर्व जब साम्यवादी विचारधारा का जन्म हुआ था तब वैज्ञानिक विकास बहुत स्वल्प मात्रा में हो पाया था। उन दिनों सृष्टि के अन्तराल में काम करने वाली चेतन सत्ता का प्रमाण पा सकना अविकसित विज्ञान के लिए कठिन था। पर अब तो बादल बहुत कुछ साफ हो गये हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मनीषियों के लिए चेतन सत्ता का प्रतिपादन कुछ कठिन नहीं रहा है। आधुनिक विज्ञान वेत्ता ऐसी संभावना प्रकट करने लगे है कि निकट भविष्य में ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक आधार पर भी प्रमाणित हो सकेगा। जो आधार विज्ञान को अभी प्राप्त हो सके हैं वे अपनी अपूर्णता के कारण आज ईश्वर का प्रतिपादन कर सकने में समर्थ भले ही न हों पर उसकी सम्भावना से इनकार कर सकना उनके लिए भी संभव नहीं है। 

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचर्डसन ने लिखा है-”विश्व की अगणित समस्याएँ तथा मानव की मानसिक प्रक्रियाएं वैज्ञानिक साधनों, गणित तथा यन्त्रों के आधार पर हल नहीं होतीं। भौतिक विज्ञान से बाहर भी एक अत्यन्त विशाल दुरूह अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के लिए कोई दूसरा साधन प्रयुक्त करना पड़ेगा। भले ही उसे अध्यात्म कहा जाय या कुछ और।” 

वैज्ञानिक मैकब्राइट का कथन है- “इस विश्व के परोक्ष में किसी ऐसी सत्ता के होने की पूरी सम्भावना है जो ज्ञान और इच्छायुक्त हो। विज्ञान की वर्तमान इस मान्यता को बदलने के लिए हमें जल्दी ही बाध्य होना पड़ेगा कि-” विश्व की गतिविधि अनियंत्रित और अनिश्चित रूप से स्वयमेव चल रही है।” 

विज्ञानवेत्ता डॉ. मोर्डेल ने लिखा है- “विभिन्न धर्म सम्प्रदायों में ईश्वर का जैसा चित्रण किया गया है, वैसा तो विज्ञान नहीं मानता। पर ऐसी सम्भावना, अवश्य है कि अणु-जगत् के पीछे कोई चेतन शक्ति काम कर रही है। अणु-शक्ति के पीछे उसे चलाने वाली एक प्रेरणा शक्ति का अस्तित्व प्रतीत होता है। इस सम्भावना के सत्य सिद्ध होने से ईश्वर का अस्तित्व भी प्रमाणित हो सकता है। 

विख्यात विज्ञानी इंग्लोड का कथन है कि -”जो चेतना इस सृष्टि में काम कर रही है उसका वास्तविक स्वरूप समझने में अभी हम असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में हमारी वर्तमान मान्यताएँ अधूरी, अप्रामाणिक और असन्तोषजनक हैं। अचेतन अणुओं के अमुक प्रकार मिश्रण से चेतन प्राणियों में काम करने वाली चेतना उत्पन्न हो जाती है, यह मान्यता संदेहास्पद ही रहेगी।” 

विज्ञान अब धीरे-धीरे ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने की स्थिति में पहुँचता जा रहा है। जॉन स्टुअर्ट मिल का कथन सच्चाई के बहुत निकट है कि -”विश्व की रचना में प्रयुक्त हुई नियमबद्धता और बुद्धिमत्ता को देखते हुए ईश्वर की सत्ता स्वीकार की जा सकती है।” कान्ट, मिल, हेल्स, होल्ट्ज, लाँग, हक्सले, काम्टे आदि वैज्ञानिकों ने ईश्वर की असिद्धि के बारे में जो कुछ लिखा है वह अब बहुत पुराना हो गया उनकी वे युक्तियाँ जिनके आधार पर ईश्वर का खण्डन किया जाया करता था, अब असामयिक होती जा रही हैं। डॉ. फ्लिन्ट ने अपनी पुस्तक ‘थीइज्म’ में इन युक्तियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण में ही खण्डन करके रख दिया है। 

भौतिक विज्ञान का विकास आज आशाजनक मात्रा में हो चुका है। यदि विज्ञान की यह मान्यता सत्य होती कि - “अमुक प्रकार के अणुओं के अमुक मात्रा में मिलने से चेतना उत्पन्न होती है” तो उसे प्रयोगशालाओं में प्रमाणित किया गया होता, कोई कृत्रिम चेतन प्राणी अवश्य पैदा कर लिया गया होता, अथवा मृत शरीरों को जीवित कर लिया गया होता। यदि वस्तुतः अणुओं के सम्मिश्रण पर ही चेतना का आधार रहा होता तो मृत्यु पर नियंत्रण करना मनुष्य के वश से बाहर की बात न होती। शरीरों में अमुक प्रकार के अणुओं का प्रवेश कर देना तो विज्ञान के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यदि नया शरीर न भी बन सके तो जीवित शरीरों को मरने से बचा सकना तो अणु विशेषज्ञों के लिए सरल होना ही चाहिए था? 

विज्ञान का क्रमिक विकास हो रहा है, उसे अपनी मान्यताओं को समय-समय पर बदलना पड़ता है। कुछ दिन पहले तक वैज्ञानिक लोग पृथ्वी की आयु केवल सात लाख सात वर्ष मानते थे और जिसके अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ वर्ष मानी गई है। अब रेडियम धातु तथा यूरेनियम नामक पदार्थ के आधार पर जो शोध हुई है, उससे पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब वर्ष सिद्ध हो रही है और वैज्ञानिकों को अपनी पूर्व मान्यताओं को बदलना पड़ रहा है। 

विज्ञान ने सृष्टि के कुछ क्रियाकलापों का पता लगाया है। क्या हो रहा है इसकी कुछ जानकारी उन्हें मिली है। पर कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है, यह रहस्य अभी भी अज्ञात बना हुआ है। प्रकृति के कुछ परमाणुओं के मिलने से प्रोटोप्लाज्म-जीवन तत्व बनता ही है, पर इस बनने के पीछे कौन नियम काम करते है इसका पता नहीं चल पा रहा है। इस असमर्थता की खोज को यह कहकर आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता कि--इस संसार में चेतन सत्ता कुछ नहीं है। 

जार्ज डार्विन ने कहा है - “जीवन की पहेली आज भी उतनी ही रहस्यमय है जितनी पहले कभी थी।” प्रोफेसर जे.ए. टामसन ने लिखा है -”हमें यह नहीं मालूम कि मनुष्य कहाँ से आया, कैसे आया, और क्यों आया। इसके प्रमाण हमें उपलब्ध नहीं होते और न यह आशा ही है कि विज्ञान इस सम्बन्ध में किसी निश्चयात्मक परिणाम पर पहुँच सकेगा।”
“आन दी नेचर आफ दी फिजीकल वर्ल्ड” नामक ग्रन्थ में वैज्ञानिक एडिंगटन ने लिखा है -”हम इस भौतिक जगत् से परे की किसी सत्ता के बारे में ठीक तरह कुछ जान नहीं पाये हैं। पर इतना अवश्य है कि इस जगत् से बाहर भी कोई अज्ञात सत्ता कुछ रहस्यमय कार्य करती रहती है।” 

विज्ञानवादी इतना कह सकते है कि जो स्वल्प साधन अभी उन्हें प्राप्त है उनके आधार पर ईश्वर की सत्ता का परिचय वे प्राप्त नहीं कर सके पर इतना तो उन्हें भी स्वीकार करना पड़ता है कि जितना जाना जा सकता है, उससे असंख्य गुना रहस्य अभी छिपा पड़ा हैं। उसी रहस्य में एक ईश्वर की सत्ता भी है। नवीनतम वैज्ञानिक उसकी सम्भावना स्वीकार करते है। वह दिन भी दूर नहीं जब उन्हें उस रहस्य के उद्घाटन का अवसर भी मिलेगा। अध्यात्म भी विज्ञान का ही अंग है और उसके आधार पर आत्मा-परमात्मा तथा अन्य अनेकों अज्ञात शक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर सकना भी सम्भव होगा।

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Dec 2018

 मनुष्यों पर ऋषियों का भी ऋण है। ऋषि का अर्थ है-वेद। वेद अर्थात् ज्ञान। आज तक जो हमारा विकास हुआ है, उसका श्रेय ज्ञान को है-ऋषियों को है। जिस तरह हम ज्ञान दूसरों से ग्रहण कर विकसित हुए हैं, उसी तरह अपने ज्ञान का लाभ औरों को भी देना चाहिए। यह हर विचारशील व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह समाज के विकास में अपने ज्ञान का जितना अंशदान कर सकता हो, अवश्य करे। 

बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, युद्ध आदि दैवी प्रकोपों को मानव जाति के सामूहिक पापों का परिणाम माना गया है। निर्दोष व्यक्ति भी गेहूँ के साथ घुन की तरह पिसते हैं। वस्तुतः वे भी निर्दोष नहीं होते। सामूहिक दोषों को हटाने का प्रयत्न न करना, उनकी ओर उपेक्षा दृष्टि रखना भी एक पाप है। इस दृष्टि से निर्दोष दीखने वाले व्यक्ति भी दोषी सिद्ध होते हैं और उन्हें सामूहिक दण्ड का भागी बनना पड़ता है।
 

 समाज में हो रही बुराइयों को रोकने के लिए ईश्वर ने सामूहिक जिम्मेदारी हर व्यक्ति को सौंपी है। उसका कर्त्तव्य है कि अनीति जहाँ कहीं भी हो रही है, उसे रोके, घटाने का प्रयत्न करे, विरोध करे, असहयोग बरते। जो भी तरीका उसको अनुकूल जँचे उसे अपनाये, पर कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि उस बुराई में अपना सहयोग प्रत्यक्ष और परोक्ष किसी भी रूप में न हो।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कायर नहीं कहाऊँगा (Kavita)

भारत माँ का सुत हूँ मैं तो, निज कर्तव्य निभाऊँगा,
चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥

इस जीवन के दीर्घ पथों पर जब चौराहें आते हैं।
लक्ष्य हीन नर मार्ग भ्रमित हो भटक भटक मर जाते हैं॥

भ्राँति दूर कर पथ शूलों को फूल समझ मुसकाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें कायर नहीं कहाऊँगा॥

चौराहे पर सही दिशा ले जो आगे बढ़ जाते हैं।
हर उलझन को सुलझा कर वे अविरत बढ़ते जाते हैं॥

जीवन के सब संघर्षों में नित ही भिड़ता जाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें निज कर्तव्य निभाऊँगा॥

भरतपुत्र हूँ शेर खिलाता हुलसित होकर आँगन में।
सीने पर हूँ खड्ग झेलता पुलकित होकर के मन में॥

भारत माँ के चरणों में निज जीवन सुमन चढ़ाऊँगा॥
चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥

ज्वलित ज्योति उर देश प्रेम की, भरित शौर्य सुषमा तनमें।
बल पौरुष पीयूष छलकता नव चेतन मय यौवन में॥

दानवता के दलन हेतु शिव प्रलयंकर बन जाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें निज कर्तव्य निभाऊँगा॥

मैं न भार हूँ भारत भू पर, हार सुशोभित जननी का।
देता हार सदा दुश्मन को, मातृ भाल का जय टीका॥

नवलसृजन पथ से भारत को श्रेय शिखर पहुँचाऊँगा।
चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥

पहले अपनी सेवा और सहायता करो

इस संसार में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। शास्त्रों में नाना प्रकार के धर्म अनुष्ठानों का सविस्तार विधि विधान है और उनके सुविस्तृत महात्म्यों का वर्णन है। दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति आत्म संतोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है।

पर इन सबसे बढ़ कर भी एक पुण्य परमार्थ है और वह है-आत्म निर्माण। अपने दुर्गुणों को, कुविचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, डाह, क्षोभ, चिन्ता, भय एवं वासनाओं को विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना इतना बड़ा यज्ञ है जिसकी तुलना सशस्त्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती।

अपने अज्ञान को दूर करके मन मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता, को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

हर मनुष्य अपना-अपना आत्म निर्माण करे तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्यों को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं के पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होगी। दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा सहायता करना इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना इतना बड़ा धर्म कार्य है जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य परमार्थ से नहीं हो सकती।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 December 2018

👉 आज का सद्चिंतन 10 December 2018


👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्...