गुरुवार, 25 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 2)

अस्तु इस जीवन का कुछ पता नहीं कि यह किस समय अपनी गति को मति में बदल दे। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि इसकी क्षणभंगुरता को स्वीकार कर तुरन्त इसी क्षण से अपने पारलौकिक जीवन की तैयारी में संलग्न जो जाया जाये। जो बिना संबल, संचय किये अनन्त प्रवास में चला जायेगा, उसे अनन्त कष्ट होंगे, यह निश्चय है। वहाँ यहाँ जैसी स्वाधीनता और सुविधा नहीं है, जो यहाँ से न भी ने जायें, वहाँ बना लेंगे, संचय कर लेंगे। वहाँ तो यहाँ साथ लिये पाथेय के बल पर ही अवधि यापन करनी होगी। वहाँ न सत्कर्म का अवसर मिलेगा और न अपकर्म का। वहाँ तो केवल यहीं के कर्मों के अनुसार आपको आपका संचय दे दिया जायेगा, जिसके ड़ड़ड़ड़ पर फिर चाहे आपको आनन्द भोगना पड़े और चाहें यातनाएँ।

यहाँ का संचय किया हुआ वह सम्बल क्या है, जो वहाँ काम आना है? वह सम्बल है पुण्य-परमार्थ निर्मोह और निर्लिप्तता पुण्य परमार्थ का अर्जन सत्कर्म और उसके साथ लगी हुई, सद्भावना से होता है। यदि सत्कर्म के साथ सद्भावना का संयोग नहीं है तो उस सत्कर्म का पुण्य परास्त हो जायेगा। एक मनुष्य किसी दुःखी की सहायता करता है पर भावना यह रखता कि ऐसा करने से यह मनुष्य मुझे अमीर और उदार समझेगा, मेरा आभारी होगा और यथासम्भव मेरी पूजा-प्रतिष्ठा करेगा। समाज में जो देखे, सुनेगा, वह मुझे सम्मान देगा, मेरा आदर करेगा, जिससे समाज में मेरा स्थान बनेगा। बस उसका सत्कर्म दूषित हो गया, उसका पुण्य ऋणी हो गया, ऐसा सत्कर्म पारलौकिक जीवन में सम्बल बन कर काम न आ सकेगा।

यह पुण्य बन कर सम्बल तब बनेगा, जब सहायता करने के पीछे कोई भाव ही न रहे और यदि रहे तो यह भाव रहे कि अमुक व्यक्ति हमारी तरह ही मनुष्य है। हमारा भाई है। उसकी आवश्यकता, उसकी तकलीफ और उसका कष्ट हमारा कष्ट है। हमारी सहायता पाना उसका नैसर्गिक अधिकार है और सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। मेरे पास जो कुछ है, वह सब प्राणी मात्र की धरोहर है, जो सबको उचित प्रकार से मिलनी ही है। मेरा इस पर कोई आभार नहीं, बल्कि इसका ही आभार मुझ पर है, जो यह मेरी सेवा, मेरी सहायता स्वीकार करने की कृपा कर रहा है। इस प्रकार के अहंकार रहित सत्कर्म ही पारलौकिक जीवन के सम्बल बना करते है।

किन्तु यह निरहंकार भावना प्राप्त कैसे हो? इसके लिये भी उपाय करना होगा। और वह उपाय है उपासना ईश्वर पुनीति। सम्पूर्ण आत्म-समर्पण के साथ परमात्मा की उपासना करते करते जब व्यक्ति के हृदय में उसका प्रकाश आ विराजेंगे, तब उसे सारा जड़-चेतन संसार परमात्मा रूप ही दीखने और अनुभव होने लगेगा। उसका ‘स्व’ सार्वभौम हो जायेगा। ऐसी स्थिति में उसे किसी से पृथकता का अनुभव ही न होगा। स्वयं सहायक, समानार्थी, सहायता और परिणाम सबका सब ईश्वर रूप ही दिखाई देगा। ऐसी दशा में उसे न तो यह पता चलेगा कि वह किसी की सहायता कर रहा है या कोई उससे सहायता पा रहा है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 25 June 2026


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 June 2026


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मंगलवार, 23 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 1)

इस जीवन के बाद मनुष्य का एक और भी जीवन है, जो कि इस जीवन से लाखों करोड़ों गुना लम्बा है। कितने वर्षा, युगों और कल्पों तक यह जीवन चलता है, इसका अनुमान सम्भव नहीं है। यह एक प्रकार से अपनी अपरिमित अवधि के कारण अनन्त और अमर भी कहा जा सकता है। उसे पारलौकिक जीवन कहा गया है।

पारलौकिक जीवन के विश्वास में सन्देह की गुँजाइश अब नहीं रह गई। आज का विज्ञान भी मनुष्य के रहस्यों को खोजता हुआ, कुछ ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच रहा है, जिसमें पारलौकिक जीवन के प्रमाण मिले है। किन्तु भारतीय ऋषि-मुनियों ने तो अपनी साधना, अपने ज्ञान और अपनी तपस्या के आधार पर इसका बहुत पहले पता लगाकर घोषणा कर दी थी और इसीलिए सारा भारतीय जीवन उसको ही लक्ष्य मानकर, उसको ही दृष्टि में रखकर निर्धारित किया गया है। पारलौकिक जीवन को अदृष्टिगोचर रखकर लौकिक जीवन नहीं जिया जा सकता और जो ऐसा करते है, अनियोजित तथा अबूझ जीवन जीते है, वे धोखा खाते है और अपने उस अनन्तकाल जीवन के लिये काँटे बो लेते है।

लौकिक जीवन पारलौकिक जीवन की तैयारी का अवसर है। इसको ही यथार्थ अन्तिम जीवन मान लेना भारी भूल है। मनुष्य यहाँ इस जीवन में जो कुछ पाप-पुण्य दुख-सुख भलाई-बुराई स्वार्थ-परमार्थ संचय करता है, वही उसके साथ जाकर उस पारलौकिक जीवन में फलित तथा प्रस्फुटित होता और उसी के अनुरूप जीव अनन्तकाल तक सुख दुख अथवा स्वर्ग नरक भोगा करता है। वर्तमान जीवन अनागत जीवन की तैयारी का एक अवसर है। इस तथ्य को कभी न भूलना चाहिये और उसको सुखद तथा सन्तोषप्रद बनाने के लिए, यहीं अभी से तैयारी कर लेनी चाहिये।

जीव का जागरूक जीवन अविश्वनीय तथा नश्वर है। इसे नष्ट तो होना ही है, पर साथ ही यह भी पता नहीं कि यह सौ वर्ष तक जायेगा या इसी क्षण अथवा अगले क्षण छुट जायेगा। इस नश्वरता और क्षणिकता के प्रमाण बनकर न जाने कितने ही आकस्मिक मरने वाले आँखों और कानों के सामने से गुजरते रहते है। सोते हुये, खाते और पीते हुए, हँसते और बोलते हुये, खेलते और काम करते हुये, न जाने कितने जीव नित्य ही इह लीला समाप्त कर अपने दीर्घकालीन पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने और यहाँ का लेखा जोखा भोगने के लिये चल देते है। बेटा बैठा रहता है, पत्नी खड़ी रहती है, सम्बन्धी देखते रहते हे, सम्पत्ति और संचय पड़ा रहता है पर आवाज सुनते ही पंछी पूरी अधूरी योजनाएँ, कार्यक्रम, बात-चीत और व्यवहार बर्ताव सब कुछ छोड़कर उड़ जाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 23 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 June 2026


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सोमवार, 22 जून 2026

👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (अंतिम भाग)

इस तरह के प्रतिरोध के लिए अकेले व्यक्ति को तो संकल्प करना ही चाहिए, किन्तु सारे समाज को संगठित होकर बुराइयों के विपरीत कदम उठाना चाहिए। कोई कारण नहीं कि समाज की संगठित शक्ति के समक्ष बुराइयाँ जीवित रह सकें। खेद है, सामाजिक उत्तरदायित्व हम लोग नहीं समझते। कोई व्यक्ति किसी गुण्डे से निपटते समय सहायता के लिए पुकार करता है, तो हम किवाड़ बन्द करके बैठ जाते हैं, सुनकर भी अनसुनी कर जाते हैं, देखकर भी अनदेखे बन जाते हैं। लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब हमें भी इन दूषित तत्वों से आक्रान्त होना पड़ेगा।

आज बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष में, भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सामूहिक अभियान की आवश्यकता है। जब तक लोगों में इस सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पैदा न होगी, तब तक बुराइयाँ एक-एक कर हम सबको प्रभावित करती रहेंगी, हानि पहुँचाती रहेंगी।

हमारी एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बड़े-बड़े सिद्धान्त बघारते हैं, नीति और न्याय की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, लेकिन यह सब दूसरों के लिए। अपने कार्य कलापों को न्याय, नीति की कसौटी पर हम बहुत ही कम कसते हैं। एक दुकानदार बाजार में बैठकर सरकार, पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोज कर आलोचना करता है, किन्तु उसकी आलोचक वृत्ति उस समय गायब हो जाती है, जब वह वस्तुओं में मिलावट करता है, ग्राहकों को कम तोलता है, अधिक मुनाफा वसूल करता है। आततायी और गुण्डों को हम लोग कोसते हैं, उन्हें बुरा कहते हैं, किन्तु हमारी समीक्षात्मक बुद्धि उस समय जाने कहाँ चली जाती है, जब हम पराई स्त्री को बुरी निगाह से देखते हैं। बिना प्रति-मूल्य दिए समाज के साधनों का उपभोग करते हैं, अनीति के साथ धन एकत्र करते हैं, दूसरों के श्रम अधिकार एवं साधनों का अनुचित शोषण करते हैं।

जिस तरह हम दूसरों की आलोचना करते हैं, उसके लिए न्याय नीति की माँग करते हैं, उसी तरह यह भी आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार को नीति, धर्म की कसौटी पर कसें। जो बुरा है उसे न करें।

हम दूसरों के साथ कोई ऐसी बात न करें जो स्वयं अपने लिए न चाहते हों। बुराइयों को मिटाने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व जो हम पर हैं, उसे सब तरह के खतरे उठाकर भी पूरा करने में न चूकें। कार्य व्यवहार को नीति, न्याय और धर्म की कसौटी पर परखें, जो बुराई है उससे दूर रहें। ये तीन बातें हमारे जीवन में ढल जायँ तो कोई सन्देह नहीं कि ये बुराइयां आज नहीं तो कल समाप्त ही हो जायगी।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 3)

इस सुख की अनुभूति तभी मिल सकती है, जब स्त्री-पुरुषों में पारस्परिक विश्वास सुदृढ़ बना रहे। इससे आत्मीयता बनी रहती है, स्नेह स्थिर रहता है। छोटी-मोटी गलतियाँ भी हो जाती हैं, तो उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा कर देने से सम्बन्धों में बिगाड़ पैदा नहीं होता। जो इतना भी न कर सकें, उसे मनुष्य कहना भी भूल है। मनुष्य की सच्ची कसौटी वह है कि यह अपने संरक्षण में निवास करते वालों का शारीरिक और मानसिक भरण पोषण करने हुए दूसरों के हितों में ही अपना सुख माने। अपनी पत्नी, अपने बच्चों को सुखी, हँसता-खेलता देखकर कौन ऐसा सद्गृहस्थ होगा, जिसे खुशी न होती हो। 

छोटी-छोटी गलतियाँ प्रायः सबसे होती रहती हैं। दाल में थोड़ा नमक ज्यादा हो गया, बच्चे ने दूध बिखेर दिया या भोजन पकाने में थोड़ा विलम्ब हो गया, इतने मात्र से यह मान लेना कि आपकी पत्नी आपका ध्यान नहीं रखती, उचित प्रतीत नहीं होता। जिस प्रकार पुरुषों को बाह्य जीवन में अनेकों उलझनें आती हैं, वैसी ही घर में भी सम्भव हैं। इन समस्याओं को लेकर अपने मधुर सम्बन्ध क्यों खराब करें? उदारता पूर्वक गलतियों को क्षमा कर देने से दूसरे भी सोचते है कि आपको उनका कितना ध्यान है। इसी बात को लेकर तो नारियाँ अपने पिता का घर छोड़कर पतियों का सहचर्य स्वीकार करती हैं जिससे इसकी पूर्ति भी सम्भव न हो सकी, इतना भी नहीं बन पड़ा तो उस अभागे पति को कंजूस ही कहा जायगा।

आनन्द का वातावरण पति-पत्नी के स्नेहपूर्ण सम्बन्धों पर आधारित है। उनमें आत्मीयता हो तो कम-शिक्षित और कम सुन्दर दम्पत्ति भी अभावपूर्ण जीवन में भी सुख का रसास्वादन प्राप्त कर सकते हैं। आकर्षण का कारण बाह्य सौंदर्य नहीं कहा जा सकता। आन्तरिक पवित्रता, स्नेह और आत्मीयता के कारण अपनी कम सुन्दर पत्नी भी प्राण-प्रिय होती है। घर का सौंदर्य भी मधुर सम्बन्धों से ही फलता-फूलता है।-शास्त्रों का कथन है-

भार्यापत्युर्व्रतं कुर्याद् भार्यावाश्व पतिवतम्।
संसारोऽपि हि सारः स्याद दम्पत्योरेक कः॥
यदि पति-पत्नी एक हृदय हों तो यह अनुसार संसार भी सारवान् बन सकता है। वहाँ इसी धरती में भी स्वर्ग के दर्शन करने हों तो हर सद्गृहस्थ को अपने दाम्पत्य जीवन में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता और अभिन्नता की भावना पैदा करनी होगी।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 June 2026


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रविवार, 21 जून 2026

👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (भाग 2)

बुराइयों के सम्बन्ध में दूसरी विचारणीय बात है कि इन्हें रोकने के लिए हम स्वयं कितनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं? अपने कारोबार, मनोरंजन, आराम, घर गृहस्थी के अलावा हम समाजिक कर्तव्यों में कितना हाथ बटाते हैं, यह प्रश्न हमारे सबके लिए एक चुनौती है। भारतीय नागरिक की यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि वह अपने ही जीवन से इतना चिपका रहता है कि सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर आँख उठाकर नहीं देखता, उनकी ओर उपेक्षा भाव बनाये रखता है। पड़ौस में डाकू रहता है। अनैतिक कार्य का अड्डा है, समाज विरोधी हरकतें हमारे सामने होती रहती हैं। दूसरों को बदमाशी करते हम देखते हैं, किन्तु हम में से कितने इनकी सूचना सरकारी अधिकारियों को देते हैं, या इनके खिलाफ हममें से कितने लोग आवाज उठाते हैं? 

इनके विरोध में आन्दोलन हमसे से कितने चलाते हैं। बहुधा हम इन्हें चुपचाप देखते रहते हैं। बहुत बार हममें से ही बहुत से लोग अपराधियों को आश्रय देते हैं, सहायता पहुँचाते हैं, उन्हें बढ़ावा तक देते हैं। यह निश्चित सत्य है कि अपनी बुराइयों के बल पर जीवित नहीं रह सकते। अपराधी समाज के सहयोग पर ही उनका अस्तित्व कायम रहता है। जागरुक व्यक्ति जानते हैं कि समाज के तथाकथित स्वार्थी लोग ही अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अवाँछनीय तत्वों को प्रोत्साहित करते हैं, उन्हें सहारा देते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उनका बचाव भी करते है। फिर एक दिन एक-एक कर हम सभी को इन दूषित तत्वों से हानि उठानी पड़े तो इसमें दोष किसका? क्योंकि अपराधी किसी का सगा नहीं होता, अपना लाभ न होते देख वह अपने तथाकथित बचाव करने वाले व्यक्ति पर भी आक्रमण कर सकता है।

कई बार किसी नागरिक पर बदमाश लोगों के आक्रमण को देखकर भी हममें से बहुत से लोग चुपचाप आगे पग बढ़ा जाते हैं। हममें से कइयों की जानकारी में रिश्वत का दौर चलता रहता है। कई बार हम जानते हैं कि सार्वजनिक कार्यों में ठेकेदार तथा नौकरशाही अनावश्यक लाभ उठा रहें हैं। हममें से बहुत से लोग धोखा-धड़ी, ठगी, चोरबाजारी, मिलावट करने वालों को भली भाँति जानते हैं, किन्तु यह सब जानकर भी हम इनका भण्डाफोड़ नहीं करते। इनकी शिकायत पुलिस को या अपराध निरोधक संस्थाओं को नहीं करते। इनके खिलाफ संगठित होकर आन्दोलन नहीं होता ।

इस सम्बन्ध में हमारी यह शिकायत हो सकती है कि आजकल कोई सुनता नहीं, जो इस तरह के कदम उठाता है, उसे उल्टी परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं। बहुत कुछ अंशों में यह ठीक भी है। किसी बात की सूचना देने पर गुण्डे के बजाय सूचना देने वाले को ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। बुराई का प्रतिरोध करने वाले को दूषित तत्वों का कोप भाजन बनना पड़ता है। यह सब ठीक है, किन्तु बिना कोई खतरा उठाये बुराइयों को दूर तो नहीं किया जा सकता। सुधार के लिए एक ही मार्ग है, वह है सब तरह के खतरे उठाकर बुराइयों का मुकाबला करना। यदि प्रशासन इस सम्बन्ध में ढील दे, तो उसके खिलाफ भी आवाज उठाई जाय। कोई सरकारी कर्मचारी या समाज का सदस्य इन दूषित तत्वों का बचाव करे, इन्हें प्रोत्साहन दे तो उनकी भी आलोचना करने में नहीं चूकना चाहिए।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 2)

दाम्पत्य-जीवन के सुख का चाव विवाह के थोड़े दिन तक पूर्ण स्थिर रहता है। जब तक दोनों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहता है, तब तक दोनों ही एक विलक्षण सुख का अनुभव किया करते है। थोड़ी देर तक पति दिखाई न दे, तो नव-वधू का हृदय आशंका से छटपटाने लगता है। तरह-तरह की मंगल कामनायें अन्तःकरण से उठने लगती है। पति आ जाता है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे खोए हुए प्राण वापस हुए हों। पुरुषों की भी ऐसी ही अवस्था होती है। उन्हें भी अपनी पत्नी के लिए तरह-तरह की वस्तुएं एकत्रित करने में बड़ा आनन्द आता है। इसके लिये वे अनेकों प्रयत्न भी करते हैं। जब तक यह भावनाओं का आदान-प्रदान चलता रहता है, तब तक घर का वातावरण अत्यन्त रोचक और सजीव बना रहता है।

किन्तु आकर्षण की कमी के साथ भावनाओं का स्तर भी गिरने लगता है। पारस्परिक प्रिय-दर्शन और आत्मदान के स्थान पर एक दूसरे के दोष, ऐब और कमियाँ ढूँढ़ने लग जाते है। यही से गृहस्थ की दुर्दशा प्रारम्भ होती है जो घर को अन्ततः नरक जैसी दुःखद परिस्थितियों में जा पटकती है।

आकर्षण में गिरावट का प्रमुख कारण अनियन्त्रित काम वासना ही है। इसका प्रधान दोषी पुरुष है। भारतीय परम्पराओं के अनुसार पुरुषों के अधिकार बड़े माने जाते हैं। अधिकाँश व्यक्ति इस स्वामित्व का दुरुपयोग अपनी क्षणिक इन्द्रिय उत्तेजना की पूर्ति में किया करते है। इससे सौंदर्य का आकर्षण कम होने लगता है और लोग आध्यात्मिक सन्निकटता से दूर हटने लगते हैं।

स्त्रियों को अपनी सम्पत्ति मानकर उनसे व्यवहार करने की पुरुष की आदत नितान्त दुर्भाग्यपूर्ण है। जो कर्त्तव्य स्त्रियों के पुरुषों के प्रति होते हैं, वैसा ही निर्वाह यदि पुरुष भी अपनी पत्नियों के प्रति करें तो दाम्पत्य जीवन को चिरकाल तक सुखद शान्तिमय बनाये रखा जा सकता है। पुरुषों के कर्त्तव्यों की विवेचना करते हुए पद्मपुराण में लिखा है।

नास्तिभार्या समंतीर्थं नास्ति भार्या समंसुखम्।
नास्ति भार्या सर्मंपुण्य, तारणाय हिताय च॥
पुरुष के हित व कल्याण के लिए पत्नी से बढ़कर न तो कोई तीर्थ है न पुण्य, स्त्री के समान सुख अन्यत्र मिलना असम्भव है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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शनिवार, 20 जून 2026

👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (भाग 1)

बुराई, भ्रष्टाचार, अपराधों के सम्बन्ध में हमारी शिकायतें दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस सम्बन्ध में टीका टिप्पणी करते हैं, तरह-तरह की आलोचनायें करते हैं। कभी सरकार को दोष देते हैं तो कभी प्रशासन व्यवस्था की छीछालेदार करते हैं। कभी किन्हीं व्यक्तियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह की शिकायतें एक सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च-स्थिति के लोगों तक से भी सुनी जा सकती हैं। इनमें बहुत कुछ ठीक भी हो सकती हैं। लेकिन कभी हमने यह भी सोचा है कि इनके लिए हम स्वयं कितने जिम्मेदार हैं। हम भूल जाते है कि बहुत कुछ अपराध, बुराइयाँ हमारे व्यवहारिक जीवन में अपने ही प्रयत्नों का परिणाम हैं। 

हमारे अनीतिपूर्ण जीवन, सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उपेक्षा, सच्चाई के प्रति आँख मूँद कर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाने की प्रवृत्ति से ही बुराइयों को प्रोत्साहन मिलता है। यदि हम इनके लिए स्वयं को उत्तरदायी मानकर अपना सुधार करने में लगें, अपने कर्तव्यों को समझने लगें तो कोई सन्देह नहीं कि बुराइयाँ घटने लगें और एक दिन समाप्त भी हो जायें।

बुराइयों को मिटाने के लिए हमारा सर्व-प्रथम कर्तव्य है-हम दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करें, जिसे हम स्वयं अपने लिए न चाहते हों। भगवान मनु ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए अपनी प्रजा को बताया था- “आत्मनः प्रतिकूलिति परेषाँ न समाचरेत्” जिस बात को तुम अपने लिए नहीं चाहते, उसे दूसरों के लिए मत करो।

हम नहीं चाहते कि कोई हमारा अपमान करे तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम किसी का अपमान न करें। इसी तरह विश्वासघात, छल, कपट, धोखादेही ही, उत्पीड़न, शोषण आदि बुराइयों का शिकार हम स्वयं नहीं होना चाहते तो हमारा भी धर्म है कि हम दूसरों के साथ ऐसा न करें। लेकिन खेद है कि जब कोई हमारे ऊपर अत्याचार करता है, तो हम बुराई, की सिद्धान्तों की दुहाई देते हैं और बचाव के लिए गुहार मचाते हैं। किन्तु जब हम स्वयं दूसरों के साथ ऐसा करते हैं, तब किसी के कुछ कहने सुनने पर भी हमारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। और यही कारण है कि बुराइयाँ दिनों दिन बढ़ती जाती है। हम उनकी शिकायतें करने, आलोचना करने में ही अपना काम पूरा समझ लेते हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 1)

लोगों की ऐसी मान्यता है कि इस धरती से अन्यत्र कहीं ऊपर आसमान में स्वर्ग अवस्थित है। इसके बारे में उन्हें तरह-तरह की कल्पनायें करते देखा जाता है। कहते हैं वहाँ सभी प्रकार के शरीर-सुख मिलते हैं। इस स्वर्ग की प्राप्ति के लिए लोग तरह-तरह के कर्मकाण्ड करते रहते हैं।

ऊपर कोई स्वर्ग है या नहीं, इस पचड़े में पड़ने की अपेक्षा यह देखना अधिक अच्छा है कि उस स्वर्ग जैसी परिस्थितियों को अपनी इस धरती पर भी उतारा जाना सम्भव है?
साधनों की दृष्टि से इस धरती में किसी प्रकार का अभाव नहीं है। रुपया-पैसा,धन-जायदाद, वस्त्र-आभूषण, फल-फूल, मेवा-मिष्ठान आदि सभी सुख सामग्रियों से धरती-माता की गोद भरी पूरी है। यदि यहाँ कुछ कमी हो सकती है तो वह भावनात्मक न्यूनता ही होती है। सुख के साधनों के साथ स्नेह, प्रेम और आत्मीयतापूर्ण भावनाओं के सम्मिश्रण को ही स्वर्ग कहा जा सकता है।

यह स्वर्ग आपके घर में ही मौजूद है, आप भले ही उसे न देख पाते हों। यह स्वर्ग-दाम्पत्य-जीवन का स्वर्ग, किसी ऊपर वाले स्वर्ग से कम सरस, सुखद और सुरुचिपूर्ण नहीं है। जिसने इसका रसास्वादन कर लिया वह अन्यत्र स्वर्ग की क्यों कामना करेगा?

पति और पत्नी का मिलन एक आध्यात्मिक मिलन होता है। दो आत्माओं का सम्मिलन इतना आनन्ददायक होता है कि वे दोनों अपने इस सुमधुर सम्बन्ध का परिपाक बनाये रखने के लिये सम्पूर्ण जीवन कठिनाइयों और मुसीबतों का खुशी-खुशी सामना करते रहते हैं। घर गृहस्थी जुटाने के लिए कितना श्रम, उद्योग और अध्यवसाय करना पड़ता है, इसे प्रत्येक सद्गृहस्थ भली प्रकार जानता है। इसी प्रकार घर के आन्तरिक मामलों की देख−रेख, बच्चों के लालन-पालन, भोजन व्यवस्था, पतियों की समुचित सेवा में बेचारी गृहणियों को कितनी दौड़-धूप करनी पड़ती है, यह किससे छुपा है। एक दूसरे के प्रति आत्म-उत्सर्ग की भावना निश्चय ही आध्यात्मिक तथ्य है। युग-युगान्तरों के संस्कारों के परिणामस्वरूप यह सुखद संयोग मिलता है। एक प्राण दो शरीरों की यह सम्मिलित इकाई जितनी प्रगाढ़ आत्मत्याग की भावनाओं से ओत-प्रोत होगी, उसी अनुपात से आपके आँगन में स्वर्ग बिखरा पड़ा होगा। उस वातावरण में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति जीवन के सच्चे सुख का रसास्वादन कर रहा होगा। जहाँ इस आत्मीयता में कमी होगी, वहाँ दुःख और दारिद्रय की परिस्थितियाँ ही दिखाई देंगी। स्वर्ग का आधार जिस प्रकार भावनात्मक परिष्कार है, उसी प्रकार कलह और कटुता के आधार पर नारकीय जीवन का सूत्रपात होता है। मनुस्मृति में कहा गया है :-

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्रवैवम्॥
स्त्रियाँ तु रोचमानायाँ सर्व तद्रोचते कुलम्।
तस्याँ त्वरोचमानायाँ सर्वमेव न रोचते॥
अर्थात् जिस कुल में पत्नी से पति और पति से पत्नी अच्छी प्रकार सन्तुष्ट रहते हैं, उसी घर में सौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते है। जहाँ उनमें कलह होता हैं। वहाँ दुर्भाग्य और दारिद्रय स्थिर रहता है। स्त्री की प्रसन्नता से घर की प्रसन्नता मुखरित रहती है। यदि वह अप्रसन्न रही तो सभी ओर अप्रसन्नता और दुःखद परिस्थितियाँ उठ पड़ती हैं।

👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 1)
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 20 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 June 2026




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शुक्रवार, 19 जून 2026

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( अंतिम भाग )

एक गिलास ठंडा पानी पीकर अपना क्रोध शाँत करने की विद्या बड़ी उत्तम है। क्रोध आये तो आप कुछ देर के लिये उस स्थान से हट जाइये किसी शीतल बगीचे में घूम आइये। एक अत्यन्त सरल उपाय यह भी है कि अपने किसी प्रियजन के पास बैठकर थोड़ी देर स्नेहपूर्ण बात करके उसकी सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयत्न कीजिए।

क्रोध का एक कारण असात्विक आहार भी होता है। “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” की कहावत सर्व विदित है। अधिक तीखा, कडुआ, कसैला, बासी-बुसा भोजन मानसिक विकार पैदा करता है। मिर्च-मसाले तथा खटाई खाने वाले अधिकाँश व्यक्ति क्रोधी और चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं। इसलिये जो भी आहार हम ग्रहण करें, उसमें सात्विकता का पूर्ण ध्यान बनाये रखें। भोजन करते समय बड़ी प्रसन्नता होनी चाहिये। परमात्मा का प्रसाद मान कर आहार ग्रहण करने से जैसा भी रूखा-सूखा आहार हो, वही अतीव संस्कारवान और पुष्टिदायक बन जाता है। कुढ़ते हुये भोजन करना एक बहुत बड़ा दुर्गुण है। इससे आहार का सात्विक लक्ष्य पूरा नहीं होता। वह चाहे कितना ही पुष्टि-दायक क्यों न हो, जीवन-तत्व प्राप्त न होगा।

कदाचित आपको क्रोध आता ही है तो एक और प्रयोग कीजिये। जैसे ही क्रोध आये, चुपचाप अपने कमरे में चले जाइये और एक स्वच्छ-सा शीशा लेकर उसमें अपनी आकृति देखिये। अनुभव कीजिये कि क्रोध के कारण आपका मुँह तमतमा उठा था, सो बड़ी शिथिलता आ गई। सारा सौंदर्य चला गया है। मुँह फीका पड़ गया है। अब थोड़ा जल लेकर साबुन से मुँह धो कर तौलिये से मुँह साफ कर लीजिये और फिर शीशे के सामने खड़े होइये। देखिए, आपने अपनी सुन्दरता फिर से प्राप्त करली है। अब जरा-सा मुस्कराइए। आपको प्रसन्नता मिलेगी। दुबारा जब कभी कोई घटना घटेगी तो आपको आज के सौंदर्य में जो कमी दिखाई दी थी, वह एकदम से याद आ जायेगी और आप क्रोध करने से बच जायेंगे।

मीठे शब्दों में वह शक्ति होती है जो बड़े अड़ियल तथा तीखे स्वभाव के व्यक्तियों को भी नम्र बनाती है। प्यार और पुचकार कर बात करने से क्रोधी व्यक्तियों के हृदय की कोमलता जागृत होती है। कुछ दिन उन्हें यह संस्पर्श निरन्तर मिलता रहे तो क्रोध से बचे रहने का उनका भी अभ्यास हो जाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 18 जून 2026

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 2)

हार्वर्ड मेडिकल कालेज के प्रोफेसर डॉक्टर वाल्टर केनिन लिखते हैं कि “मनुष्य के दोनों गुर्दों के ऊपर चने के आकार की दो छोटी -छोटी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनमें ‘एडरेनलिन’ तत्व भरा होता है। यह खून के साथ मिलकर जब जिगर में पहुँचता है तो वहाँ जमे हुये ग्लाइकोजन को शक्कर में बदल देता है।” यह शक्कर शरीर के तमाम अंगों में पहुँच कर रगों और पुट्टों को फाड़ देता है। क्रोधी मनुष्य को कोई रोग न होते हुए भी इसी हानिकार स्थिति में होकर गुजरना पड़ता हैं।

क्रोध करने के कारणों पर यदि विचार करे तो वे बिलकुल छोटे दिखाई देते हैं। कई बार तो वे बिलकुल निराधार दिखाई पड़ते हैं। संयत मनःस्थिति के अभाव में प्रायः लोग एकाएक उत्तेजित होकर अनर्थ कर डालते हैं। कई बार यह कारण इतने छोटे होते है कि उनके कारण किये गये अपराध पर विश्वास तक नहीं होता। कानपुर का एक समाचार है कि रेलवे स्टेशन पर ननकू नामक व्यक्ति फल बेचा करता था। किसी व्यक्ति ने उससे उधार लीची माँगी पर ननकू ने इनकार कर दिया। इस पर क्षुब्ध होकर उक्त व्यक्ति ने ननकू की चाकू से हत्या कर दी। ये कारण इतने छोटे हैं कि मनुष्य थोड़ा भी अगर ध्यान दे ले, तो इन भयंकर परिणामों से बचा जा सकता है। घरों में थाली फेंकने, कपड़े फाड़ने, बच्चों को पीटने, स्त्रियों को मारने, धमकाने के हेय दृश्य जो उपस्थित हुआ करते हैं, उनमें मानव स्वभाव की छोटी छोटी गलतियाँ और भूलों के सिवाय और कुछ नहीं होता।

घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि क्रोध के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का सम्पूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें। इससे सदैव हानि ही होती है। प्रायः देखा गया है कि क्रोध का कारण जल्दबाजी है। किसी वस्तु को प्राप्त करने या इच्छापूर्ति में कुछ विलम्ब लगता है तो लोगों को क्रोध आ जाता है। इसलिये अपने स्वभाव में धैर्य और संतोष का विकास करना चाहिये।

जब कोई कार्य गलत हो जाय या कोई हानि हो जाय तो उसे समझने में जल्दबाजी न करें। गम्भीरतापूर्वक सोचें कि यह सब किस कारण से हुआ। आप निर्णय करते समय बुद्धि में पर्याप्त उदारता बनाये रखिये, इससे आपको बड़ी शाँति मिलेगी। यदि कोई दूसरा व्यक्ति आपको अपशब्द या कड़ुवे वचन कहता है, तो आप यह समझ कर कि यह व्यक्ति मूर्ख है, कुछ न बोलिये, मौन व्रत कर लीजिये। इससे आप अकारण उत्तेजित भी नहीं होंगे और कोई अयाचित घटना भी नहीं घटेगी। मन-ही मन सामने वाले की बेवकूफी पर मुस्कराते रहिये, देखिये आपके जी में जरा भी दुःख नहीं आयेगा।

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👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 2)

अस्तु इस जीवन का कुछ पता नहीं कि यह किस समय अपनी गति को मति में बदल दे। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि इसकी क्षणभंगुरता को स्वीकार कर तुरन्...