यह करूंगा−−वह करूंगा ऐसी घोषणाएं करते फिरना निरर्थक है। यह निश्चित नहीं कि जो करने के लिए आज कहा जा रहा है उसे अगले दिन किया भी जा सकता है या नहीं। कल संयोग वश ऐसी परिस्थितियाँ आ सकती हैं कि जो कल करने की घोषणा की गई है वह सम्भव ही न रहें।
अप्रत्याशित घटना क्रम का घटित हो जाना असम्भव नहीं कोन जाने अपना शरीर आज जिस स्थिति में हैं कल उसमें रहेगा भी या नहीं। बीमारी और मौत का आक्रमण कब किस पर हो जाय इसे कोन जानता है। ईश्वर न करे अपना शरीर ही कल दस याग्य न रहे कि घष्ए को कार्यान्वित किया जा सके। इसी प्रकार अन्य ऐसी घटनाएँ भी घटित हो सकती हैं जो अपने भविष्य कथन को निरस्त कर दें। चोरी, अग्निकांड, दुष्काल, घाटा आदि ऐसे हो दरिद्र बना कर रख दें। तब उन घोषणाओं की पूर्ति कैसे हो सकेगी जो आज की सुसंपन्न स्थिति को ध्यान में रखकर की गई थी।
भविष्य अनिश्चित है। नियति के गर्भ में कितनी मृदुल और कितनी दुखद सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं इसे कौन जानता है कल हम क्या करेंगे क्या नहीं—यह निर्णय आज नहीं कल ही किया जा सकता है। समय से पूर्व तो उसकी घोषणा करना तो बचकानापन है। आज तो हमें वही सोचना−−वही कहना और वही करना चाहिए को आश्वासन देना सम्भव है। भविष्य के लिए किसी को आश्वासन देना व्यर्थ है। देना ही हो तो इस शर्त के साथ देना चाहिए कि आज जैसी परिस्थिति कल भी बनी रही तो वह किया जा सकेगा जो आज कहा जा रहा है।
बूढ़े मनुष्य भूतकाल के घटनाक्रम में बहुत दिलचस्पी रखते हैं ओर बीती हुई बातों की चर्चा बड़े उत्साह के साथ करते या सुनते हैं। उनका श्रेष्ठ समय भूतकाल ही था जो अब गुजर गया। वर्तमान नीरस है ओर भविष्य डरावना, इसलिए सुखानुभूति के लिए उन्हें मधुर भूतकाल का स्मरण करते हुए चैन मिलता है। कुछ विचित्र व्यक्ति ऐसे भी होते है जिन्हें दुखों की स्मृति भी ओर विपत्तियों की चर्चा करके अपने घाव हरे करते हैं और अभ्यस्त दुखी मनः स्थिति का जागृत करके विलक्षण प्रकार का आनन्द लेते है। सुखद हो अथवा दुखद जिन्हें भूतकाल जिन्हें भूतकाल की स्मृतियाँ ही सुहाती हैं—कथा पुराणों से लेकर व्यक्ति गत स्मृति की तथा स्वजन संबंधियों की पिछली चर्चाएँ जिन्हें सन्तोष देती हैं समझना चाहिए कि वे बूढ़े हो गये। उनका मन बुढ़ापे से ओत−प्रोत हो गया। भले ही ऐसे लोग आयु की दृष्टि से अधेड़ या युवक दिखाई पड़ते हों।
बालकों का स्वभाव भविष्य की कल्पनाएँ करते रहना होता है। चूँकि उनका भूतकाल कुछ महत्वपूर्ण नहीं था और न उसका स्मरण ही उन्हें होता वर्तमान भी अस्थिरता और अनिश्चितता से भरा रहता है, इसलिए अनेक लिए चिन्तन का एकमात्र आधार भविष्य ही रह जाता है। उसी पर वे तरह−तरह के सुखद आरोपण करते हैं। भविष्य में यह पावेंगे—वहाँ जावेंगे—यह खायेंगे—यह करेंगे जैसी चर्चाएँ ही उनके मुँह सुनी जाती हैं। वे कल्पनाओं को ही वास्तविकता समझने लगते हैं और सम्भावनाओं की सुनिश्चितता का ऐसा बाना पहनाते हैं मानों जो कुछ वे सोच या कह रहे हैं अवश्य ही वैसा होकर रहेगा। उनके इस भोलेपन पर अभिभावक रस लेते हैं, पर साथ ही उस बचपन पर हँसते भी हैं जिसकी कल्पना और यथार्थता के बीच में कितनी बड़ी खाई होती है बाल–कल्पनाओं और घोषणाओं का यदि कोई लेखा−जोखा रखा जा सके तो प्रतीत होगा कि वे जितनी भोली भाली और मृदुल थीं उससे अधिक वे अवास्तविक भी थीं।
.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई
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