शनिवार, 18 सितंबर 2021

👉 "धीरे चलो"

नदी के तट पर एक भिक्षु ने वहां बैठे एक वृद्ध से पूछा "यहां से नगर कितनी दूर है?
सुना है, सूरज ढलते ही नगर का द्वार बंद हो जाता है।
अब तो शाम होने ही वाली है। क्या मैं वहां पहुंच जाऊंगा?'

वृद्ध ने कहा "धीरे चलो तो पहुंच भी सकते हो।" भिक्षु यह सुनकर हैरत में पड़ गया।
वह सोचने लगा कि लोग कहते हैं कि जल्दी से जाओ, पर यह तो विपरीत बात कह रहा है।
भिक्षु तेजी से भागा। लेकिन रास्ता ऊबड़-खाबड़ और पथरीला था। थोड़ी देर बाद ही भिक्षु लड़खड़ाकर गिर पड़ा।

किसी तरह वह उठ तो गया लेकिन दर्द से परेशान था।
उसे चलने में काफी दिक्कत हो रही थी। वह किसी तरह आगे बढ़ा लेकिन तब तक अंधेरा हो गया।
उस समय वह नगर से थोड़ी ही दूर पर था। उसने देखा कि दरवाजा बंद हो रहा है। उसके ठीक पास से एक व्यक्ति गुजर रहा था। उसने भिक्षु को देखा तो हंसने लगा भिक्षु ने नाराज होकर कहा, "तुम हंस क्यों रहे हो?"

उस व्यक्ति ने कहा, 'आज आपकी जो हालत हुई है, वह कभी मेरी भी हुई थी। आप भी उस बाबा जी की बात नहीं समझ पाए जो नदी किनारे रहते हैं।'

भिक्षु की उत्सुकता बढ़ गई। उसने पूछा "साफ साफ बताओ भाई।
" उस व्यक्ति ने कहा "जब बाबाजी कहते हैं कि धीरे चलो तो लोगों को अटपटा लगता है। असल में वह बताना चाहते हैं कि रास्ता गड़बड़ है, अगर संभलकर चलोगे तो पहुंच सकते हो

कथा का तात्पर्य
जिंदगी में सिर्फ तेज भागना ही काफी नहीं है। सोच-समझकर संभलकर चलना ज्यादा काम आता है।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६४)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

जीव-विज्ञान को दो भागों में बांटा जा सकता है। वनस्पति विज्ञान (वौटनी), प्राणि विज्ञान (जूलौजी) इन दो विभाजनों से भी इस महा समुद्र का ठीक तरह विवेचन नहीं हो सकता। इसलिए इसे अन्य भेद-उपभेदों में विभक्त करना पड़ता है।

सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से जिन जीवधारियों को देखा समझा जाता है उसके सम्बन्ध में जानकारी सूक्ष्म जैविकी (माइक्रो बायोलॉजी) कही जाती है।

आकारिकी (मारफोलाजी) शारीरिकी (अनाटोमी) ऊतिकी (हिस्टोलाजी) कोशिकी (साइटोलोजी) भ्रूणी (एम्ब्रोलाजी) शरीर क्रिया (फिजियोलॉजी) परिस्थिति की (एकोलाजी) आनुवंशिकी (जैनेटिक्स) जैव विकास (आरगैनिक एवूलेशन) आदि।

इन सभी जीव-विज्ञान धाराओं ने यह सिद्ध किया है कि जीवन और कुछ नहीं जड़ पदार्थों का ही विकसित रूप है।

रासायनिक दृष्टि से जीवन सेल और अणु के एक ही तराजू पर तोला जा सकता है। दोनों में प्रायः समान स्तर के प्राकृतिक नियम काम करते हैं। एकाकी एटम—मालेक्यूल्स और इलेक्ट्रोन्स के बारे में अभी भी वैसी ही खोज जारी है जैसी कि पिछली तीन शताब्दियों में चलती रही है। विकरण—रेडियेशन और गुरुत्वाकर्षण ग्रेविटेशन के अभी बहुत से स्पष्टीकरण होने बाकी हैं। जो समझा जा सका है वह अपर्याप्त ही नहीं असन्तोषजनक भी है।

यों कोशिकाएं निरन्तर जन्मती-मरती रहती हैं, पर उनमें एक के बाद दूसरी में जीवन तत्व का संचार अनवरत रूप से होता रहता है। मृत होने से पूर्व कोशिकाएं अपना जीवन तत्व नवजात कोषा को दे जाती हैं, इस प्रकार मरण के साथ ही जीवन की अविच्छिन्न परम्परा निरन्तर चलती रहती है। उन्हें मरण धर्मा होने के साथ-साथ अजर-अमर भी कह सकते हैं। वस्त्र बदलने जैसी प्रक्रिया चलते रहने पर भी उनकी अविनाशी सत्ता पर कोई आंच नहीं आती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६४)

अभिमानी से दूर हैं ईश्वर
    
अन्तर्प्रज्ञा से प्रकाशित देवर्षि के अन्तस को यह सत्य समझने में देर न लगी। वे कहने लगे, ‘‘मेरे इस अनुभव को यूँ तो युगों बीत गए, परन्तु ऐसा लगता है जैसे मानो यह अभी कल की ही बात हो। हिमवान के इस आंगन में यह अनुभव मुझे मिला था। हिमालय के श्वेत-शुभ्र शिखरों की आभा तब भी ऐसी ही थी। भगवान सूर्यदेव एवं अमृतवर्षी चन्द्रदेव तब भी इसी तरह इन श्वेत शिखरों से अपनी स्वर्ण व रजत रश्मियाँ बिखरते रहते थे। यहाँ की आध्यात्मिक प्रभा का अनोखापन, अनूठापन तो आप सभी अनुभव कर ही रहे हैं। मैं उन दिनों क्षीरशायी भगवान नारायण के पास से इस ओर आ रहा था। आकाशमार्ग से जाते समय हिमवान के अतुलनीय आध्यात्मिक वैभव ने मुझे खींच लिया। यहाँ के अनोखे चुम्बकत्व के प्रभाव से मैं आकाश से धरा पर आ गया।
    
आने के बाद बहुत समय तक हिमालय के हिम शिखरों में एकाकी भ्रमण करता रहा। यहाँ के पर्वतीय पादप, पक्षी एवं पशु मेरे सहचर हो गए। इस आनन्द भ्रमण में कितना समय बीता, पता ही न चला। पर तभी मन में सात्त्विक हिलोर उठी और मैं एक हिमगुहा में बैठकर समाधिमग्न हो गया। मेरे पूरे अस्तित्त्व में भगवत् सान्निध्य की सुवास फैल गयी। मेरी इस समाधि से स्वर्गाधिपति को पता नहीं क्यों भय हो आया और उन्होंने काम कला के अधिपति पुष्पधन्वा कामदेव को अपने सम्पूर्ण सहचरों के साथ भेज दिया। उन्होंने यहाँ हिमालय के आँगन में आकर अपनी कला की अनेकों छटाएँ बिखेरीं, अप्सराओं के सौन्दर्य एवं कामदेव के अनगिन बाण मुझ पर बरसते रहे, पर मैं प्रभु स्मरण के कवच के कारण सुरक्षित रहा। बाद में जब मेरा समाधि से व्युत्थान हुआ, तो उन सबने मुझसे चरणवन्दन के साथ क्षमा मांगी। मैंने भी सहज भाव से उन्हें क्षमा कर दिया।
    
यहाँ तक का घटनाक्रम एक सात्त्विक स्वप्न की तरह गुजर गया। परन्तु बाद में पता नहीं कहाँ से राजसिक अहं मेरी चित्तभूमि में अंकुरित हो गया और जो घटनाक्रम भगवद्कृपा से घटित हुआ था, मैंने स्वयं को उसका कर्त्ता मान लिया। फिर क्या था मेरा चित्त अज्ञान के आवरण एवं कर्त्तापन के मल के कारण धुँधला हो गया। फिर तो मैंने जहाँ-तहाँ अपने कर्त्तृत्व का बखान करना शुरू कर दिया। देवलोक में मुझे प्रशंसक मिले। इस प्रशंसा से मैं फूला न समाया और फिर ब्रह्मलोक पहुँचा, वहाँ भगवान ब्रह्मा ने मुझे चेताया। परन्तु अहं को भला चेतावनी कब पसन्द आती है सो मैंने शिवलोक प्रस्थान किया, वहाँ पर जब मैंने अपनी अहंकथा सुनायी तो माता पार्वती सहित भगवान सदाशिव ने मुझे चेताया- देवर्षि! यह कथा तुमने मुझे तो कह सुनायी, परन्तु इसे भगवान श्रीहरि से न कहना।
    
परन्तु प्रशंसित अहं तो तीव्र ज्वर की तरह सम्पूर्ण चिन्तन चेतना को ग्रस लेता है। उसी के प्रभाव से मैंने भगवान विष्णु के पास पहुँचकर अपनी अभिमान गाथा को बढ़ा-चढ़ाकर कह सुनाया। उत्तर में प्रभु मुस्कराए। उनकी इस मुस्कान का रहस्य मुझे तो नहीं समझ में आया, परन्तु भगवती योगमाया प्रभु का इंगित समझ गयी। वह जान गयीं कि प्रभु मेरे अभिमान का हरण करना चाहते हैं। सो उन्होंने एक लीलामय राज्य की रचना कर दी जिसके राजा शीलनिधि एवं राजकन्या विश्वमोहिनी थी। राह में गुजरते हुए मैं उनके नगर गया और उस राजकन्या से मिला। उसकी हस्तरेखाएँ पढ़ीं तो बस मैं काम-राग से विह्वल हो गया। अपनी इसी विह्वलता में मैंने भगवान से प्रार्थना भी कर डाली, कि प्रभु मेरा उस कन्या से विवाह करा दें।
    
उस कन्या के विवाह स्वयंवर में भगवान शिव के गण भी थे। उन्होंने बहुत चेताने की कोशिश की। परन्तु अहंता से अन्धा, काम से विह्वल और राग में रंगा मन भला कब किसकी सुना करता है। उन्होंने मेरा उपहास भी किया, फिर भी मैं नहीं चेता। मेरी आँखें तो तब खुलीं जब उस राजकन्या ने भगवान विष्णु को वरमाला पहना दी। अब तो मेरा राग, रोष में बदल गया। फिर तो मैंने उन प्रभु को शाप भी दे डाला। शाप-वरदान जिन्हें कभी छू भी नहीं सकता, उन भक्तवत्सल भगवान ने मेरा शाप शिरोधार्य भी कर लिया। प्रभु के अधरों पर अभी भी मुस्कान थी। इस मुस्कान ने मेरी चेतना पर छाए अँधेरे को हटा दिया, मिटा दिया। होश आने पर मैंने प्रभुलीला का सत्य अनुभव किया। अपने अहं विनाश का वह आयोजन मुझे तब समझ में आया।
    
परन्तु अब करता भी क्या? भगवान् से ही मैंने प्रायश्चित्त विधान की याचना की। उन्होंने कृपा करके भगवान शिव के शतनाम जप का उपदेश दिया। प्रभु आदेश को शिरोधार्य करके मैंने वैसा ही किया। सदाशिव की कृपा से ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की महासम्पदा मुझे फिर से मिल गयी। यह अनुभव मुझे आज भी भुलाए नहीं भूलता है। मेरे हृदय में हमेशा यह अनुभव सत्य सदा ही दीप्त रहता है कि भगवान् के भक्त को अहं शोभा नहीं देता। उसका कल्याण सदा ही अपने प्रभु का निमित्त बनने में है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११४

बुधवार, 15 सितंबर 2021

👉 सेवाभाव ओर संस्कार

एक संत ने एक विश्व- विद्यालय का आरंभ किया, इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य था ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण करना था जो समाज के विकास में सहभागी बन सकें।

एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया, जिसका विषय था - "जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा।"

निर्धारित तिथि को तयशुदा वक्त पर विद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रतियोगिता आरंभ हुई।

किसी छात्र ने सेवा के लिए संसाधनों की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि- हम दूसरों की तभी सेवा कर सकते हैं, जब हमारे पास उसके लिए पर्याप्त संसाधन हों।

वहीं कुछ छात्रों की यह भी राय थी कि सेवा के लिए संसाधन नहीं, भावना का होना जरूरी है।

इस तरह तमाम प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में शानदार भाषण दिए।

आखिर में जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे विद्यार्थी को चुना, जो मंच पर बोलने के लिए ही नहीं आया था।

यह देखकर अन्य विद्यार्थियों और कुछ शैक्षिक सदस्यों में रोष के स्वर उठने लगे।

संत ने सबको शांत कराते हुए बोले:- 'प्यारे मित्रो व विद्यार्थियो, आप सबको शिकायत है कि मैंने ऐसे विद्यार्थी को क्यों चुना, जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था।
दरअसल, मैं जानना चाहता था कि हमारे विद्यार्थियों में कौन सेवाभाव को सबसे बेहतर ढंग से समझता है।

इसीलिए मैंने प्रतियोगिता स्थल के द्वार पर एक घायल बिल्ली को रख दिया था।
आप सब उसी द्वार से अंदर आए, पर किसी ने भी उस बिल्ली की ओर आंख उठाकर नहीं देखा।

यह अकेला प्रतिभागी था, जिसने वहां रुक कर उसका उपचार किया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया।

सेवा-सहायता डिबेट का विषय नहीं, जीवन जीने की कला है।
जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसके वक्तव्य कितने भी प्रभावी क्यों न हों, वह पुरस्कार पाने के योग्य नहीं है।'

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६३)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

आइन्स्टाइन एक ऐसे फार्मूले की खोज में थे, जिससे जड़ और चेतन की भिन्नता को एकता में निरस्त किया जा सके। प्रकृति अपने आप में पूर्ण नहीं है, उसे पुरुष द्वारा प्रेरित प्रोत्साहित और फलवती किया जा रहा है। यह युग्म जब तक सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक विज्ञान के कदम लंगड़ाते हुए ही चलेंगे।

जड़ और चेतन के बीच की खाई अब पटने ही वाली है। द्वैत को अद्वैत में परिणत करने का समय अब बहुत समीप आ गया है। विज्ञान क्रमशः इस दिशा में बढ़ रहा है कि वह जड़ को चेतन और चेतन को जड़ सिद्ध करके दोनों को एक ही स्थान पर संयुक्त बनाकर खड़ा करके। जीवन रासायनिक पदार्थों से—पंचतत्वों से बना है इस सिद्धान्त को सिद्ध करते-करते हम वहीं पहुंच जाते हैं जहां यह सिद्ध हो सकता है कि जीवन से पदार्थों की उत्पत्ति हुई है।

उपनिषद् का कहना है कि ईश्वर ने एक से बहुत बनने की इच्छा की, फलतः यह बहुसंख्यक प्राणी और पदार्थ बन गये। यह चेतन से जड़ की उत्पत्ति हुई। नर-नारी कामेच्छा से प्रेरित होकर रति कर्म में निरत होते हैं फलतः रज शुक्र के संयोग से भ्रूण का आरम्भ होता है। यह भी मानवी चेतना से जड़ शरीर की उत्पत्ति है। जड़ से चेतन उत्पन्न होता है, इसे पानी में काई और मिट्टी में घास उत्पन्न होते समय देखते हैं। गन्दगी में मक्खी-मच्छरों का पैदा होना, सड़े हुए फलों में कीड़े उत्पन्न होना यह जड़ से चेतन की उत्पत्ति है।

पदार्थ विज्ञानी इस बात पर बहुत जोर देते हैं कि ‘जड़’ प्रमुख है। चेतन उसी की एक स्थिति है। ग्रामोफोन का रिकार्ड और उसकी सुई का घर्षण प्रारम्भ होने पर आवाज आरम्भ हो जाती है, उसी प्रकार अमुक स्थिति में—अमुक अनुपात में इकट्ठे होने पर चेतन जीव की स्थिति में जड़ पदार्थ विकसित हो जाते हैं। जीव-विज्ञानी अपने प्रतिपादनों में इसी तथ्य को प्रमुखता देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०१
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६३)

अभिमानी से दूर हैं ईश्वर

देवर्षि के मुख से उच्चारित सूत्र को सुनकर ऋषिगण पुलकित हुए और देवगण हर्षित। सभी ने इस सच को जान लिया था कि यदि भावों में भक्ति समा जाय तो अध्यात्म के सभी तत्त्व स्वतः प्रकाशित हो जाते हैं। अन्तःकरण अनोखी उजास से भर जाता है। भगवान और भक्त के मिलन का प्रधान अवरोध अहं तो भक्ति की आहट पाते ही गिर जाता है। और यदि भक्ति न रहे तो साधन कोई भी, और कितने भी क्यों न किए जाएँ परन्तु विषय भोगों की लालसा-लपटें उठाने वाली हवाएँ, विवेक के दीप को कभी न कभी बुझा ही देती हैं। यदि चित्त चेतना में ऐसा हो गया तो फिर बचा रह जाता है बस अहं का उन्मादी खेल। साधना का सच और साधकों का सच युगों से यही रहा है। युग-युग में अध्यात्म पथ के पथिक यही अनुभव करते रहे हैं।
    
भगवान् के लीला पार्षद नारद के अन्तःसरोवर में उठ रही चिन्तन की इन उर्मियों ने उन्हें गहरे अतीत में धकेल दिया। वह बस भावमग्न हो सोचते रहे। हालांकि वहाँ उपस्थित सभी को उनके अगले सूत्र की प्रतीक्षा थी। पर उनके भावों का आवेग थम ही नहीं रहा था। वह अपनी अनुभूतियों में डूबे हुए थे। ये अनुभूतियाँ उन्हें आत्मसमीक्षा के लिए प्रेरित कर रही थीं। उनका अपना अतीत उनसे कुछ कह रहा था। यह वह गहरा अनुभव था जिसने उन्हें भक्ति का एक सत्य दिया था। जिसे वह अब तक अपने सूत्र में पिरो चुके थे। यह देवर्षि की अपनी आपबीती थी। हालांकि उन्होंने अपने अन्तर्भाव किसी से नहीं कहे परन्तु यह पार्थिव चेतना की भूमि नहीं थी, यह तो प्रज्ञा-लोक था। इस लोक में, प्रज्ञा के आलोक में सभी कुछ प्रकाशित था।
    
इस आलोक की प्रखर दीप्ति में रमे ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने मधुर स्वर में कहा- ‘‘देवर्षि हम सभी आपके भक्ति सत्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’’ उत्तर में नारद ने अहं विगलित मौन के साथ उन्हें निहारा और फिर मन्द स्वर में बोले-
‘ईश्वरस्याप्यभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च’॥२७॥
ईश्वर को भी अभिमान से द्वेष है और दैन्य से प्रिय भाव है।’’
    
इस सूत्र का उच्चारण करते हुए नारद ने सभी महनीय जनों की ओर देखा, उनके मुख पर कुछ और अधिक सुनने की लालसा थी। वे जानना चाहते थे इस सूत्र में पिरोया रहस्यपूर्ण सत्य।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११३

रविवार, 12 सितंबर 2021

👉 !! चिंता !!

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया। राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं? संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

शिक्षा:
अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ पुकारें, सच मानिये थोड़ी देर में आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६२)

तत्वदर्शन से आनन्द और मोक्ष

इसी उपनिषद् में आगे क्रमशः इसे विक्षेप से आत्मा, आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी आदि उत्पन्न हुए बताये हैं। वस्तुतः यह परतें एक ही तत्व की क्रमशः स्थूल अवस्थायें हैं, जो स्थूल होता गया वह अधिकाधिक दृश्य, स्पर्श होता गया। ऊपरी कक्षा अर्थात् ईश्वर की ओर वही तत्व अधिक चेतन और निर्विकार होता गया। वायु की लहरों के समान विभिन्न तत्व प्रतिभासिक होते हुए भी संसार के सब तत्व एक ही मूल तत्व से आविर्भूत हुए हैं उसे महाशक्ति कहा जाये, आत्मा या परमात्मा सब एक ही सत्ता के अनेक नाम हैं।

विज्ञान की आधुनिक जानकारियां भी उपरोक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करती हैं। कैवल्योपनिषद् में पाश्चात्य वैज्ञानिक मान्यताओं और अपने पूर्वात्म दर्शन को एक स्थान पर लाकर दोनों में सामंजस्य व्यक्त किया गया है और कहा है—

यत् परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत् ।
सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं नित्यं तत्वमेव त्वमेव तत् ।।16।।
अणोरणीयान्हमेव तद्वत्महान्
विश्वमिदं विचित्रम् ।
पुरातनोऽहं पुरुषोऽमीशो
हिरण्ययोऽहं शिवरूपमस्मि ।।20।।

अर्थात्—जिस परब्रह्म का कभी नाश नहीं होता, जिसे सूक्ष्म यन्त्रों से भी नहीं देखा जा सकता जो इस संसार के इन समस्त कार्य और कारण का आधारभूत है, जो सब भूतों की आत्मा है, वही तुम हो, तुम वही हो। और ‘‘मैं छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा हूं, इस अद्भुत संसार को मेरा ही स्वरूप मानना चाहिये। मैं ही शिव और ब्रह्मा स्वरूप हूं, मैं ही परमात्मा और विराट् पुरुष हूं।’’

उपरोक्त कथन में और वैज्ञानिकों द्वारा जीव-कोश से सम्बंधित जो अब तक की उपलब्धियां हैं, उनमें पाव-रत्ती का भी अन्तर नहीं है। प्रत्येक जीव-कोश का नाभिक (न्यूक्लियस) अविनाशी तत्व है वह स्वयं नष्ट नहीं होता पर वैसे ही अनेक कोश (सेल्स) बना देने की क्षमता से परिपूर्ण है। इस तरह कोशिका की चेतना को ही ब्रह्म की इकाई कह सकते हैं, चूंकि वह एक आवेश, शक्ति या सत्ता है, चेतन है, इसलिये वह अनेकों अणुओं में भी व्याप्त इकाई ही है। इस स्थिति को जीव भाव कह सकते हैं पर तो भी उनमें पूर्ण ब्रह्म की सब क्षमतायें उसी प्रकार विद्यमान् हैं, जैसे समुद्र की एक बूंद में पानी के सब गुण विद्यमान् होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १००
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६२)

समस्त साधनाओं का सुफल है भक्ति

फिर उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की ओर देखते हुए कहा- ‘‘आप दोनों तो जानते ही हैं कि मेरे प्राण तो ‘राम’ में बसते थे। ‘राम’ का नाम ही मेरे अस्तित्त्व का सारभूत तत्त्व है। देवाधिदेव भोलेनाथ यही कहते हैं। यही कारण है कि मैं और भोलेनाथ सदा ही श्रीराम को कहते-सुनते रहते हैं। अब जब यहाँ शबरी की कथा सुना रहे थे तो उसे सुनकर मेरे यहाँ विराज रहे भोलेनाथ एवं माता पार्वती के नेत्र अश्रु से भीग गए। उन्होंने नारद की बड़ी प्रशंसा करते हुए रामभक्त गिलहरी की कथा सुनायी। भोलेनाथ के मुख से सुनकर यह कथा मुझे बहुत भायी। आप आदेश दें तो यह कथा मैं आप सब को भी सुनाऊँ।’’
    
‘‘हम सब धन्य हो जाएँगे भगवन्!’’ वसिष्ठ, विश्वामित्र के साथ सप्तर्षिगण व देवर्षि नारद सहित अन्य ऋषियों एवं देवों ने कहा। उनमें से कोई भी इस अहोभाग्य को खोना नहीं चाहता था। महर्षि अगस्त्य तो श्रीराम कथा के परम आनन्द को वितरित करने के लिए व बटोरने के लिए सदा ही तैयार रहते थे। उन्होंने बिना पल की देर लगाए कहना शुरू किया, ‘‘घटना सेतुबन्धन के समय की है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम वानर-भालुओं के साथ सेतुबन्धन का कार्य सम्पन्न कर रहे थे। सभी इस कार्य में तत्पर व तल्लीन थे। भक्तराज महावीर हनुमान भी विशालकाय पर्वत शिलाओं को शीघ्र लाकर नल-नील के हाथों में थमा रहे थे।
    
यह अपूर्व दृश्य था। यह कहते हुए ऋषि अगस्त्य जैसे भावसमाधि में प्रवेश कर उस बीते युग को निहारने लगे। कुछ क्षणों के बाद उनके मुख से उच्चारित हुआ, उसी समय महावीर हनुमान ने देखा कि एक क्षुद्र प्राणी इधर-उधर दौड़ रहा है। उन्होंने उसे अपने हाथों में थाम लिया, तुम यहाँ क्यों दौड़-भाग कर रहे हो, यहाँ तुम्हें चोट लग सकती है। चोट से क्या डर, उस क्षुद्र प्राणी ने कहा- रामकाज में प्राण निकलें, मेरी तो यही कामना है। तुम क्या रामकाज कर रही हो गिलहरी? वह क्षुद्र प्राणी गिलहरी थी, उससे हनुमान ने पूछा। मैं आपकी ही भांति प्रभु के सेतुबन्धन में सहयोगी हूँ। अब आपकी भांति भारी-भरकम शिलाएँ तो ला नहीं सकती इसलिए मैं धूल में लोटकर अपने शरीर के रोएँ में धूल भर लेती हूँ, फिर जहाँ सेतु बन रहा है, वहाँ यह धूल झाड़ देती हूँ। बहुत ज्यादा न सही लेकिन कुछ सहयोग तो कर ही रही हूँ।
    
उस गिलहरी की बातें सुनकर महावीर हनुमान का भी कण्ठ रुद्ध हो गया। उनके भाव भीग गए। वह चाहते थे कि वे उसे भगवान तक पहुँचा दे। परन्तु गिलहरी ने उनसे कहा- तुम तो भली-भाँति प्रभु का स्वभाव जानते हो महाबली! वे भला अपने भक्त को कब बिसारते हैं। वे स्वयं ही मुझे बुला लेंगे, तब तक मुझे अपना काम करने दें। ऐसा कहकर वह गिलहरी हनुमान के हाथों से उछलकर अपने उसी काम में जुट गयी। हनुमान चकित हो उसकी भक्ति को निहारते रहे। उन्होंने सोचा- भगवान तो संकटहारी हैं, अगर यह भक्त संकट में पड़े तो वे जरूर उसे अपने पास बुला लेंगे। ऐसा सोचकर उन्होंने अपने पाँव के नाखून से बहुत धीरे से गिलहरी की पूँछ दबा दी। उस गिलहरी ने इस पीड़ा से तड़पकर राम नाम का स्मरण किया।
    
भक्त गिलहरी की पीड़ा से विकल भगवान् राम दौड़ कर आए और उस गिलहरी को अपने हाथों में उठा लिया। फिर हनुमान की ओर कृत्रिम रोष से देखते हुए गिलहरी से बोले- प्रिय गिलहरी! तुम महाबली को उनके इस कृत्य के लिए क्या दण्ड देना चाहती हो। उत्तर में गिलहरी मुस्करा दी और बोली- प्रभु! भला भक्तों के संकटमोचन, कभी किसी भक्त को संकट में डाल सकते हैं। इन्होंने मुझे आप तक पहुँचाने के लिए यह किया था। इसलिए इन्हें तो पुरस्कार मिलना चाहिए। गिलहरी के इस कथन पर हनुमान की आँखें भीग गयीं और श्रीराम मुस्करा दिए।’’ अपनी इस कथा को सुनाते हुए ऋषि अगस्त्य बोले- ‘‘भक्ति तो सभी साधनाओं का सुफल है।’’ अगस्त्य के इन वचनों पर पुलकित होते हुए देवर्षि बोल उठे- ‘‘आपने मेरे अन्तःकरण की बात कह दी। मेरा अगला सूत्र भी यही कहता है-
‘फलरूपत्वात्॥२६॥’
यह भक्ति फलरूपा है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११०

शनिवार, 11 सितंबर 2021

👉 !! शब्दों की ताकत !!

एक नौजवान चीता पहली बार शिकार करने निकला। अभी वो कुछ ही आगे बढ़ा था कि एक लकड़बग्घा उसे रोकते हुए बोला, ” अरे छोटू, कहाँ जा रहे हो तुम ?” “मैं तो आज पहली बार खुद से शिकार करने निकला हूँ !”,

चीता रोमांचित होते हुए बोला। “हा-हा-हा-, लकड़बग्घा हंसा,” अभी तो तुम्हारे खेलने-कूदने के दिन हैं, तुम इतने छोटे हो, तुम्हे शिकार करने का कोई अनुभव भी नहीं है, तुम क्या शिकार करोगे !! लकड़बग्घे की बात सुनकर चीता उदास हो गया।

दिन भर शिकार के लिए वो बेमन इधर-उधर घूमता रहा, कुछ एक प्रयास भी किये पर सफलता नहीं मिली और उसे भूखे पेट ही घर लौटना पड़ा। अगली सुबह वो एक बार फिर शिकार के लिए निकला।

कुछ दूर जाने पर उसे एक बूढ़े बन्दर ने देखा और पुछा, ” कहाँ जा रहे हो बेटा ?” “बंदर मामा, मैं शिकार पर जा रहा हूँ। ” चीता बोला। बहुत अच्छे ” बन्दर बोला , ” तुम्हारी ताकत और गति के कारण तुम एक बेहद कुशल शिकारी बन सकते हो।

जाओ तुम्हे जल्द ही सफलता मिलेगी।” यह सुन चीता उत्साह से भर गया और कुछ ही समय में उसने के छोटे हिरन का शिकार कर लिया।

मित्रों, हमारी ज़िन्दगी में “शब्द” बहुत मायने रखते हैं। दोनों ही दिन चीता तो वही था, उसमे वही फूर्ति और वही ताकत थी पर जिस दिन उसे डिस्करेज किया गया वो असफल हो गया और जिस दिन एनकरेज किया गया वो सफल हो गया।

📚शिक्षा--:--
इस छोटी सी कहानी से हम तीन ज़रूरी बातें सीख सकते हैं । -:-

🌹 पहली, हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अपने “शब्दों” से किसी को Encourage करें, Discourage नहीं। Of Course, इसका ये मतलब नहीं कि हम उसे उसकी कमियों से अवगत न करायें, या बस झूठ में ही एन्करजे करें।

🌹 दूसरी  हम ऐसे लोगों से बचें जो हमेशा निगेटिव सोचते और बोलते हों, और उनका साथ करें जिनका Outlook Positive हो।

🌹 तीसरी और सबसे अहम बात,
हम खुद से क्या बात करते हैं, Self-Talk में हम कौन से शब्दों का प्रयोग करते हैं इसका सबसे ज्यादा ध्यान रखें, क्योंकि ये “शब्द” बहुत ताकतवर होते हैं।

क्योंकि ये “शब्द” ही हमारे विचार बन जाते हैं, और ये विचार ही हमारी ज़िन्दगी की हकीकत बन कर सामने आते हैं, इसलिए दोस्तों, Words की Power को पहचानिये, जहाँ तक हो सके पॉजिटिव वर्ड्स का प्रयोग करिये, इस बात को समझिए कि ये आपकी ज़िन्दगी बदल सकते हैं।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६१)

तत्वदर्शन से आनन्द और मोक्ष

पेंगल तब महर्षि नहीं बने थे। उसके लिए आत्म-सिद्धि आवश्यक थी। पर पेंगल साधना करते-करते पदार्थों की विविधता में ही उलझ कर रह गये। पशु-पक्षी, अन्य जन्तु, मछलियां, सांप, कीड़े मकोड़ों में शरीरों और प्रवृत्तियों की भिन्नता होने पर भी शुद्ध अहंकार और चेतना की एकता तो समझ में आ गई पर विस्तृत पहाड़, टीले, जंगल, नदी, नाले, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकाश और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध खनिज, धातुयें, गैसें, ठोस आदि क्या हैं, क्यों हैं, और उनमें यह विविधता कहां से आई है—यह उनकी समझ में नहीं आया। इससे उनकी आत्म-दर्शन की आकांक्षा और बेचैन हो उठी।

ये याज्ञवल्क्य के पास गये और उसकी बाहर वर्ष तक सेवा सुश्रुषा कर पदार्थ-विद्या का ज्ञान प्राप्त किया। इस अध्ययन से पेंगल का मस्तिष्क साफ हो गया कि जड़ पदार्थ भी एक ही मूल सत्ता के अंश हैं। सब कुछ एक ही तत्व से उपजा है। ‘एकोऽहं बहुस्यामः’, ‘एक नूर से सब जग उपजिआ’ वाली बात उन्हें पदार्थ विषम में भी अक्षरशः सत्य प्रतीत हुई। पेंगलोपनिषद् में इस कैवल्य का उपदेश मुनि याज्ञवलक्य ने इस प्रकार दिया है—

‘‘सदैव सोग्रयदमग्र आसीत् । तन्नित्यनुक्तमविक्रियं सत्य ज्ञानानन्द परिपूर्ण सनातनमेकवातीयं ब्रह्म ।। तस्मिन् मरुशुक्तिमस्थाणुस्फाटि कादो जल रौप्य पुरुष रेखाऽऽदिशल्लोहित शुक्ल कृष्ण गुणमयी गुण साम्या निर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत् । तत्प्रतिबिम्बितं यत्तद् साक्षि चैतन्यमासीत् ।।—’’
—पैंगलोपनिषद् 1।2-3

हे पैंगल! पहले केवल एक ही तत्व था। वह नित्य मुक्त, अविकारी, ज्ञानरूप चैतन्य और आनन्द से परिपूर्ण था, वही ब्रह्म है। उससे लाल, श्वेत, कृष्ण वर्ण की तीन प्रकाश किरणों या गुण वाली प्रकृति उत्पन्न हुई। यह ऐसा था जैसे सीपी में मोती, स्थाणु में पुरुष और मणि में रेखायें होती हैं। तीन गुणों से बना हुआ साक्षी भी चैतन्य हुआ। वह मूल प्रकृति फिर विकारयुक्त हुई तब वह सत्व गुण वाली आवरण शक्ति हुई, जिसे अवयक्त कहते हैं।.....उसी में समस्त विश्व लपेटे हुए वस्त्र के समान रहता है। ईश्वर में अधिष्ठित आवरण शक्ति से रजोगुणमयी विक्षेप शक्ति होती है, जिसे महत् कहते हैं। उसका जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह चैतन्य हिरण्य गर्भ कहा जाता है। वह महत्तत्व वाला कुछ स्पष्ट और कुछ अस्पष्ट आकार का होता है.....।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६१)

समस्त साधनाओं का सुफल है भक्ति

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की वाणी पर्वतीय प्रपात की भांति थी, जिससे अमृत झर-झर बह रहा था। इस अमृत प्रवाह से सभी के मन-अन्तःकरण भीगते रहे, हृदय सिंचित होते रहे। सभी ने अनोखी अनुभूति पायी। ऐसी तृप्ति किसी को कभी न मिली थी, जैसी कि वे सब आज अनुभव कर रहे थे। इन अनुभूति में देवों, ऋषियों, सिद्धों एवं दिव्य देही आत्माओं का वह समुदाय पता नहीं कब तक खोया रहता, लेकिन तभी गगन में महासूर्य के समान प्रचण्ड ज्योतिर्मय पुञ्ज का उदय हुआ। इसे देखकर अनेकों मुखों पर आश्चर्य की रेखाएँ गहरी हुईं, परन्तु ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के अधरों पर स्मित रेखा झलकी और वह हल्के से मुस्करा दिए।
    
जो आश्चर्यचकित थे वे यह सोच रहे थे कि इस अरुणोदय काल में भगवान् भुवनभास्कर ने यह अपना दूसरा प्रचण्ड रूप क्यों धारण कर लिया। अभी तो प्रातः की अमृत बेला प्रारम्भ ही हुई थी। सूर्य की अरूण किरणों ने अभी हिमालय के श्वेत हिम शिखरों को छुआ ही था, पक्षियों ने प्रभाती के अपने प्रथम बोल गाए ही थे। इसी बीच यह असामान्य आकाशीय घटना चौंकाने वाली थी। जो चौंके थे, वे यह देखकर और भी चकित हुए कि वह सूर्यसम प्रकाशित प्रचण्ड तेजपुञ्ज उन्हीं की ओर आ रहा था। इस विस्मयकारी घटना से थकित-चकित जनों को सम्बोधित करते हुए तेजस्वी ऋषि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘आप सब परेशान होने की जगह उन महान विभूति की अभ्यर्थना के लिए अपने स्थान पर खड़े हों, क्योंकि आज हम सबके बीच स्वयं अगस्त्य ऋषि पधार रहे हैं।’’
    
विश्वामित्र के इन वचनों ने सभी को आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता से पुलकित कर दिया क्योंकि ऋषि अगस्त्य के दर्शन पाना देवों एवं ऋषियों के लिए भी दुर्लभ था। जब से ऋषि अगस्त्य ने पंचभौतिक देह का त्याग कर दिव्य देह धारण की थी, वह सभी के लिए अगम्य हो गए थे। उन्होंने दिव्य देह से अपने लिए एक दिव्य लोक का निर्माण किया था। उनका यह लोक सब प्रकार से अपूर्व एवं अगम्य था। वहाँ विभूति सम्पन्न देवता एवं सिद्धियों से सम्पन्न ऋषि भी अपनी इच्छा से प्रवेश नहीं कर सकते थे। यहाँ स्वाभाविक प्रवेश केवल देवाधिदेव महादेव के लिए ही सम्भव था। भगवान विष्णु एवं परम पिता ब्रह्मा भी अगस्त्य के आह्वान पर ही पधारते थे। अपने इस अपूर्व लोक में ऋषि अगस्त्य अखिल सृष्टि के कल्याणकारी प्रयोगों में संलग्न रहते थे। हाँ! बीच-बीच में वह अपने यहाँ श्रीराम कथा का आयोजन अवश्य करते थे, जिसमें भगवान् भोलेनाथ अवश्य पधारते थे। कभी वे लीलामय प्रभु श्रोता बनते थे, कभी वक्ता।
    
भक्त-भगवान् की इस लीला का रहस्य वे दोनों ही जानते थे। वही समुद्रपान करने वाले ऋषि अगस्त्य के स्वयं पधारने की बात ने सभी को प्रसन्नता से पूरित कर दिया। सब के सब उनकी अभ्यर्थना के लिए खड़े हो गए। इस बीच सूर्यसम तेजस्वी ऋषि अगस्त्य उनके बीच प्रकट हो गए। आते हुए उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मर्षि वसिष्ठ एवं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की ओर देखकर हाथ जोड़े। सप्तऋषियों का अभिवादन किया। इसी के साथ वहाँ उपस्थित सभी देवों एवं ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया। देवर्षि नारद को तो उन्होंने भावों के अतिरेक में छाती से चिपका लिया। वह कहने लगे- ‘‘देवर्षि! आपके इस भक्ति समागम की चर्चा सभी लोकों में व्याप्त हो रही है। भक्ति के इस अपूर्व भावप्रवाह से समस्त लोकों में नवचेतना प्रवाहित करने के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०९

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

👉 सच्चे शौर्य और सत्साहस की कसौटी (अंतिम भाग)

अनीति को मिटाने के लिए-अनाचार से जूझने के लिए-कोई शूरवीर ही खड़ा हो सकता है। असुरता- अवाँछनीय मार्ग पर चलकर आक्रमणकारी साधनों से सम्पन्न हो जाती है। उसके प्रहार बड़े क्रूर होते हैं। वह किसी पर भी- किसी भी बहाने कितना ही बड़ा अत्याचार कर सकती है। उससे सर्वत्र भय और आतंक छाया रहता है। जो विरोध के लिये उठता है वही पिसता है। ऐसे समय में अग्रणी बनकर अनाचार का प्रतिरोध करना सहज नहीं होता। उसके लिए सच्चा साहस चाहिए। आत्म रक्षा और आक्रमण के समुचित साधन पास में रहने पर लड़ सकना सरल है क्योंकि उसमें सुरक्षा और विजय की आशा बनी रहती है। पर जहाँ अपने साधन स्वल्प और विरोधी अति समर्थ हों, वहाँ तो संकट ही संकट सामने रहता है। इन विभीषिकाओं के बीच भी जो साहसपूर्वक आगे बढ़ सकता है। अनीति की चुनौती स्वीकार कर सकता है, उसे वीरता की कसौटी पर सही उतरा समझना चाहिए।

भारत के हजार वर्ष लम्बे स्वतंत्रता संग्राम में अगणित शूरवीरों ने अपने प्राण दिये। वे विजयी नहीं हुए- पराजित रहे पर उनकी वीरता को विजयी ही माना जाता- और कोई कोई विजेताओं पर निछावर किया जाता रहेगा। रावण की असुर सेना से लड़ने की हिम्मत जिन रीछ, वानरों ने दिखाई उन्हें संसार के अग्रगामी योद्धाओं की पंक्ति में रखते हुए अनन्त काल तक अभिनंदनीय माना जायेगा। प्रहलाद की तरह जिन्होंने सत्य को सर्वोत्तम शस्त्र माना उन्हीं की वीरता खरी है।

योद्धा का काम मात्र लड़ना-तोड़ना-बिगाड़ना ही नहीं, निर्माण करना भी है। तोड़ना सरल है बनाना कठिन है। एक लोहे की कील से किसी के प्राण लिये जा सकते हैं पर एक सुविकसित और सुसंस्कृत मनुष्य का निर्माण करना कठिन है। किसी बड़ी इमारत को थोड़े समय में स्वल्प प्रयत्नों से गिराया जा सकता है पर उसका निर्माण करने के साधन जुटाना कठिन है। कपास के गोदाम को एक दियासलाई जला सकती है पर उतनी कपास उगाने के लिए कितना श्रम और कितने साधन की आवश्यकता पड़ेगी ? किसी को कुमार्ग पर लटका देना सरल है पर कुमार्गगामी को सन्मार्ग की ओर उन्मुख करना कठिन है। पानी ऊपर से नीचे की ओर सहज ही बहता है पर नीचे से ऊपर चढ़ाने के लिए कितने साधन जुटाने पड़ते हैं। ध्वंस में नहीं सृजन में मनुष्य का शौर्य परखा जाता है।

उत्कर्ष के अभियान में जिसका जितना बड़ा योगदान है उसे उतना ही बड़ा बहादुर माना जायेगा। लड़ाई, क्रोध और आवेश में लड़ी जा सकती है। उत्तेजना तो नशे से भी पैदा हो सकती है। किसी का अहंकार भड़काकर अथवा विजय के बड़े लाभ का प्रलोभन देकर किसी को लड़ने के लिये आसानी से तैयार किया जा सकता है। पर सृजन के लिए बड़ी सूझ-बूझ की, सन्तुलित एवं निष्ठा सम्पन्न परिपक्व मनोभूमि की जरूरत पड़ती है। उस महत्ता की पौध पहले भीतर उगानी पड़ती है और जब वह जम जाती है तब उसे कार्यक्षेत्र में आरोपित किया जाता है। ऐसी निष्ठा शूरवीर में ही पाई जाती है। मित्रों के बीच विग्रह पैदा कर देना किसी भी धूर्त, चुगलखोर या षड्यंत्रकारी के लिए बाएं हाथ का खेल हो सकता है, पर शत्रुता मित्रता में परिणत कर देना किसी शालीन सज्जन और विवेकवान के लिए ही सम्भव हो सकता है।

बहादुर वह है जिसने अपनी अहन्ता, स्वार्थपरता और संकीर्णता पर विजय प्राप्त कर ली। जिसने संकीर्णता के सीमित दायरे को तोड़कर विशालता को वरण कर लिया। अपने ऊपर विजय प्राप्त करना विश्व विजय से बढ़कर है। जो वासना और तृष्णा की कीचड़ से निकल कर आदर्शवादिता और उत्कृष्टता की गतिविधि अपनाने में सफल हो गया उसे दिग्विजय का श्रेय दिया जायेगा जो अपने ऊपर शासन कर सकता है वह चक्रवर्ती शासक से बढ़कर है और जिसने नीति का समर्थन- अनीति का विरोध करने में कुछ भी कष्ट सहने का संकल्प कर लिया उसे शूरवीरों का शिरोमणि कहा जायेगा। ऐसे शूरवीरों का यश गान करते हुए ही इतिहास अपने को धन्य बनाता रहा है।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972 पृष्ठ ३१

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६०)

हम विश्वात्मा के घटक

पृथ्वी का मात्र सूर्य से अथवा अपने ही उपग्रह चन्द्र से ही अन्तर्सम्बन्ध नहीं है। प्रोफेसर ब्राउन ने मंगल, शुक्र, बृहस्पति आदि ग्रहों का अध्ययन कर यह सिद्ध किया है कि इनकी गतियों और स्थितियों के परिवर्तन से पृथ्वी भी प्रभावित होती है। ये सभी सूर्य सन्तति ही तो हैं और जुड़वां बच्चों वाला सिद्धान्त यहां भी घटित होता है, तो आश्चर्य ही क्या?
रूसी वैज्ञानिक चीजेवस्की ने 1920 में ही यह सिद्ध कर दिया था कि सूर्य पर प्रति ग्यारहवें वर्ष होने वाले आणविक विस्फोट से पृथ्वी पर युद्ध एवं क्रान्तियों का उद्भव-विकास होता है। उनका कहना था कि पृथ्वी पर घटित होने वाले प्रत्येक प्रमुख परिवर्तन का सम्बन्ध सूर्य से होता है।

ऐसे ही निष्कर्षों के विस्तृत अध्ययन व इस दिशा में व्यापक अनुसन्धान प्रयासों के लिए 1950 में वैज्ञानिक जियोजारजी गिआर्डी ने ब्रह्माण्ड रसायन को जन्म दिया। गिआर्डी के अनुसार समूचा ब्रह्माण्ड एक शरीर है और इसके सभी अंग इससे सम्पूर्णतः एकात्म हैं। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक नक्षत्र पिण्ड फिर वह कितनी भी दूरी पर क्यों न हो पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करता है।

भारत में इसी तत्वदर्शन के अनुरूप अतीत में ज्योतिर्विज्ञान का विकास हुआ था। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त, कालक्रिया पाद, गोलपाद, और सूर्य सिद्धान्त, फिर नारदेव, ब्रह्मगुप्त आदि द्वारा उन सिद्धान्तों का संशोधन-परिवर्धन, भाष्कराचार्य का महाभाष्करीय आदि ग्रन्थ उस महत् प्रयास के कुछ सुलभ अवशिष्ट परिणाम हैं। बाद में इस विशुद्ध विज्ञान का जो दुरुपयोग हुआ, उसे जातीय-जीवन क्रम के ह्रास-काल की अराजकता समझते हुए उसके मूल सिद्धान्त सूत्रों तथा संकेतों के आधार पर इस दिशा में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

भारतीय तत्व मनीषी हजारों वर्ष पूर्व इस तथ्य से परिचित थे कि जड़ता वस्तुतः कहीं है नहीं। वह हमारी स्थूल दृष्टि की ‘एपियरेन्स’ या आभास मात्र है। यथार्थतः सर्वत्र आत्मचेतना ही विद्यमान है। यह सर्वव्यापी चैतन्यसत्ता ही विश्वात्मा है। विश्वात्मा के साथ आत्मा की जितनी समीपता घनिष्ठता होती है उसी अनुपात से उसे विशिष्ट अनुदान प्राप्त होते हैं।
भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में एक मूल द्रव्य हिरण्यगर्भ था। उसी के विस्फोट से आकाश गंगायें विनिर्मित हुईं। इस विस्फोट की तेजी कुछ तो धीमी हुई है पर अभी भी उस छिटकाव की चाल बहुत तीव्र है। अनन्त आकाश में यों आकाश गंगाएं अपनी अपनी दिशा में द्रुतगति से दौड़ती जा रही हैं। इस संदर्भ में अपनी आकाश गंगा की चाल 24,300 मील प्रति सैकिंड नापी गयी है।

यह विश्व अनन्त है और उसके सम्बन्ध में जानकारियां प्राप्त करने का क्षेत्र भी असीम है। इस असीम और अनन्त की खोज के लिए बिना निराश हुए मनुष्य की असीमता किस उत्साह के साथ अग्रगामी हो रही है यह देख कर विश्वास होता है कि मानवी महत्ता अद्भुत है और यदि वह सही राह पर चले तो न केवल प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करने में वरन् उन्हें करतलगत करने में भी समर्थ हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९६
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६०)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति

नारद के इस कथन पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ कहने लगे- ‘‘जब मैं महर्षि मतंग के आश्रम में पहुँचा था, तब वह शबरकन्या मुझे प्रणाम करने आयी थी। वह कितनी भोली, सरल, निश्छल व निर्दोष थी यह उससे मिलकर ही जाना जा सकता था। भक्ति का साकार विग्रह थी वह। महर्षि मतंग ने मुझे उसके बारे में बताया- यह एक वनवासी शबर की कन्या है। इसके पिता अपने कबीले के सरदार हैं। यह कन्या बचपन से ही सरल सात्त्विक थी। वनवासियों की प्रथा के मुताबिक इसकी शादी शीघ्र ही तय होगी। प्रथा के मुताबिक उसके विवाह में अनेकों पशुओं की बलि दी जानी थी। अनेकों पशुओं को मारकर उनके मांस के भोज्य पदार्थ बनने थे।
    
मेरे कारण इतने निर्दोष पशु मारे जाएँगे, यह सोचकर यह शबर कन्या घर से भाग आयी और मेरे आश्रम के पास आकर रहने लगी। यहाँ रहते हुए यह नित्य प्रति आश्रम से सरोवर तक का मार्ग साफ करती। चुपचाप आश्रम में आकर समिधा के लिए लकड़ी रख जाती। एक दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में सरोवर जाते समय मैंने इसे मार्ग बुहारते हुए देखा। मेरे पुकारने पर वह भय से सहमकर मेरे पास खड़ी हो गयी और बहुत आग्रह करने पर उसने मुझे अपनी आपबीती सुनायी। उसकी बातें सुनकर मैं इसे अपने साथ आश्रम ले आया। अब वह मेरी पुत्री भी है और शिष्या भी।’’
    
इतना कहकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ रुक गए। काफी देर चुप रहकर वह शून्य की ओर ताकते रहे फिर बोले- ‘‘आगे की कथा मुझे वत्स लक्ष्मण ने सुनायी थी। इस बीच कई घटनाएँ घट चुकी थीं और महर्षि मतंग ने शरीर छोड़ दिया था। शरीर छोड़ते समय उन्होंने शबरी से कहा था कि तुम्हें यहीं रहकर भगवान् को पुकारना है, वे स्वयं चलकर तुम्हारे पास आएँगे। महर्षि मतंग के जाने के बाद, वहाँ पास रहने वाले लोगों ने उसे बहुत सताया। इनमें से कई ऐसे भी थे, जो स्वयं को ज्ञानी, योगी और कर्मकुशल कहते थे परन्तु शबरी अविचल भाव से अपने राम को पुकारती रही। वह नियमित उनके लिए मार्ग बुहारती, उनके लिए मीठे फल लाती। उसकी पुकार गहरी होती गयी।
    
और एक दिन वत्स रामभद्र के रूप में भगवान् साकार रूप धर कर अपनी इस प्रिय भक्त को खोजने चल दिए। शबरी की पुकार, उसके आँसू, उसका रुदन उसकी साधना बन गया। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, मेरे वत्स रामभद्र, वत्स लक्ष्मण के साथ पहुँच गए- अपनी इस प्रिय भक्त के पास। वत्स लक्ष्मण ने मुझे बताया कि भ्राता राम उसके पास जाते समय कितने भावविह्वल थे, इसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। वह विकल और व्याकुल थे- भक्त शबरी को मिलने के लिए। उन्होंने शबरी के आश्रम जाकर उसके झूठे बेर खाये। अपने को ज्ञानी, योगी एवं कर्म-परायण कहने वालों की ओर उन्होंने देखा भी नहीं। जबकि शबरी उन्हीं के सामने समाधि लीन हुई। उसका अन्तिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने किया। अपने मुख से श्रीराम ने अनेकों बार उसकी महिमा गायी। और यह प्रमाणित कर दिया कि भक्ति ज्ञान से, कर्मयोग से और योगसिद्धि से श्रेष्ठतर है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०७

सोमवार, 6 सितंबर 2021

👉 सच्चे शौर्य और सत्साहस की कसौटी (भाग २)

भय सामने आते हैं और बच निकलने के लिये अनीति मूलक रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। ऊँचे ऑफिसर दबाते हैं कि हमारी इच्छानुसार गलत काम करो अन्यथा तुम्हें तंग किया जायेगा। आतंकवादी गुण्डा तत्व धमकाते हैं कि उनका सहयोग करो-विरोध में मुँह न खोलो अन्यथा खतरा उठाओगे। अमुक अवाँछनीय अवसर छोड़ देने पर लाभ से वञ्चित रहने पर स्वजन सम्बन्धी रुष्ट होंगे। कन्या के विवाह आदि में कठिनाई आयेगी आदि अनेक भय सामने रहते हैं और वे विवश करते हैं कि झंझट में पड़ने की अपेक्षा अनीति के साथ समझौता कर लेना ठीक है। इस आतंकवादी दबाव को मानने से जो इनकार कर देता है, आत्म गौरव को-आदर्श को-गँवाने गिराने की अपेक्षा संकट को शिरोधार्य करता है वह बहादुर है। योद्धा वे हैं जो नम्र रहते हैं, उदारता और सज्जनता से भरे होते हैं पर अनीति के आगे झुकते नहीं, भय के दबाव से नरम नहीं पड़ते भले ही उन्हें टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो जाना पड़े।

जो अपने चरित्र रूपी दुर्ग को भय और प्रलोभन की आक्रमणकारी असुरता से बचाये रहता है, उस प्रहरी को सचमुच शूरवीर कहा जायेगा। जिसने आदर्शों की रक्षा की, जिसने कर्त्तव्य को प्रधानता दी-जिसने सच्चाई को ही स्वीकार किया उसी को योद्धा का सम्मान दिया जाना चाहिए। हथियारों की सहायता से एक आदमी दूसरे आदमी की जान ले ले यह कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात यह है कि औचित्य की राज-सभा में मनुष्य अंगद की तरह पैर जमा दे और फिर कोई भी न उखाड़ सके भले ही वह रावण जैसा साधन सम्पन्न क्यों न हो।

अनीतिपूर्वक देश पर आक्रमण करने वाले शत्रुओं का प्राण हथेली पर रखकर सामना करने वाले सैनिक इसलिए सराहे जाते हैं कि वे आदर्श के लिए देश रक्षा के लिए लड़े। उनका युद्ध पराक्रम इसलिए सम्मानित हुआ कि उसमें आदर्श प्रधान था। उसी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित होकर कोई समूह कहीं अनीति पूर्वक चढ़ दौड़े और कितनों को ही मार गिराये तो बंगाल देश में बरती गई बर्बरता की तरह उस शस्त्र संचालन को भी निन्दनीय ही ठहराया जायेगा, डाकू भी तो शस्त्र ही चलाते हैं- साहस तो वे भी दिखाते हैं पर उस क्रिया के पीछे निष्कृष्ट स्वार्थपरता सन्निहित रहने के कारण सब और से धिक्कारा ही जाता है। उत्पीड़ित वर्ग, समाज, शासन, अन्तःकरण सभी ओर से उन पर लानत बरसती है। उसे योद्धा कौन कहेगा जिसके उद्देश्य को घृणित ठहराया जाय।

पानी के बहाव में हाथी बहते चले जाते हैं पर मछली उस तेज प्रवाह को चीरकर उलटी चल सकने में समर्थ होती है। लोक मान्यता और परम्परा में विवेक कम और रूढ़िवादिता के तत्व अधिक रहते हैं। इसमें से हंस की तरह नीर क्षीर का विवेक कौन करता रहता है। ‘सब धान बाईस पसेरी’ बिकते रहते हैं। भला-बुरा सब कुछ लोक प्रवाह में बहता रहता है। उसमें काट-छाँट करने का कष्ट कौन उठाता है। फिर जो अनुचित है उसका विरोध कौन करता है। लोक प्रवाह के विपरीत जाने में विरोध, उपहास, तिरस्कार का भय रहता है। ऐसी दशा में अवाँछनीय परम्पराओं का विरोध करने की हिम्मत कौन करता है। यह शूरवीरों का काम है जो सत्य की ध्वजा थामे अकेले ही खड़े रहे। शंकराचार्य, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राजाराम मोहनराय, स्वामी दयानन्द, महात्मा गाँधी सरीखे साहसी कोई विरले ही निकलते हैं जो परम्पराओं और प्रचलित मान्यताओं को चुनौती देकर केवल न्याय और औचित्य अपनाने का आग्रह करते हैं। ऐसे लोगों को ईसा, सुकरात, देवी, जॉन अब्राहम लिंकन आदि की तरह अपनी जाने भी गँवानी पड़ती हैं पर शूरवीर इसकी परवा कहाँ करते हैं। सत्य की वेदी पर प्राणों की श्रद्धाञ्जली समर्पित करते हुए उन्हें डर नहीं लगता वरन् प्रसन्नता ही होती है।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972 पृष्ठ ३०

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५९)

हम विश्वात्मा के घटक

अमेरिका के पागलखानों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगी अधिक विक्षिप्त हो जाते हैं, जबकि अमावस के दिन यह दौर सर्वाधिक कम होता है। विक्षिप्त ही नहीं, सामान्य मनुष्यों की चित्त-दशा पर भी चन्द्रकलाओं के उतार-चढ़ाव का प्रभाव पड़ना सामूहिक मनश्चेतना का ही द्योतक है।

वनस्पति विज्ञानी वृक्षों के तनों में बनने वाले वर्तुलों द्वारा वृक्षों के जीवन का अध्ययन करते हैं। देखा गया है कि वृक्ष में प्रतिवर्ष एक वृन्त बनता है, जोकि उसके द्वारा छोड़ी गई छाल से विनिर्मित होता है। हर ग्यारहवें वर्ष यह वृन्त सामान्य वृन्तों की अपेक्षा बड़ा बनता है। अमेरिका के रिसर्च सेन्टर आफ ट्री रिंग ने पता लगाया कि ग्यारहवें वर्ष जब सूर्य पर आणविक विस्फोट होते हैं तो वृक्ष का तना मोटा हो जाता है और उसी कारण वृन्त बड़ा बनता है। स्पष्ट है कि सूर्य और चन्द्र के परिवर्तनों से मनुष्यों एवं पशु-पक्षी तथा पेड़ पौधे भी प्रभावित होते हैं। तब क्या मात्र मनुष्यों में ही सामूहिक मनश्चेतना न होकर सम्पूर्ण सृष्टि में ही कोई एक समष्टि चेतना विद्यमान है, यह प्रश्न आज वैज्ञानिकों के सामने खड़ा उन्हें आकर्षित कर रहा है।

डा. हेराल्ड श्वाइत्जर के नेतृत्व में आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण के प्रभावों का निरीक्षण-परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सामान्य कीट-पतंग भी विचित्र आचरण करने लगते हैं।

अनेक पक्षी सूर्यग्रहण के चौबीस घण्टे पूर्व ही चहचहाना बन्द कर देते हैं। चींटियां सूर्यग्रहण के आधा घण्टे पूर्व से भोजन की खोजबीन बन्द कर देती हैं और व्यर्थ ही भटकती रहती है। सदा चंचल बंदर वृक्षों को छोड़कर जमीन पर आ बैठता है। वुड लाइस, बीटल्स, मिली पीड्स आदि ऐसे कीट-पतंग जो सामान्यतः रात्रि में ही बाहर निकलते हैं, वे भी सूर्यग्रहण के दिन बाहर निकले देखे जाते हैं। दिशा-विज्ञान में दक्ष चिड़ियां चहकना भी भूल-सी जाती हैं।

जापान के प्रख्यात जैविकीविद् तोनातो के अनुसार हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य पर होने वाले आणविक विस्फोटों के समय पृथ्वी पर पुरुषों के रक्त में अम्ल तत्व बढ़ जाते हैं और उनका रक्त पतला पड़ जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५९)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति

देवर्षि के इन स्वरों में वीणा की झंकृति थी। यह झंकृति कुछ ऐसी थी कि उपस्थित सभी लोगों की हृदय वीणा अपने आप ही झंकृत हो उठी। सभी के भाव अपने आप ही समस्वरित हो गए। जो वहाँ थे सबके सब विभूति सम्पन्न थे। महान् कर्मयोगी, महाज्ञानी, योगसिद्ध महामानव उस समागम में उपस्थित थे। ब्रह्मा जी के मानसपुत्र नारद की बातों ने सबको चौंकाया, चकित किया, पर सब चुप रहे। हाँ, देवर्षि अवश्य अपनी रौ में कहे जा रहे थे- ‘‘भक्ति की श्रेष्ठता यही है कि यह भगवान् के द्वारा भक्त की खोज है। सुरसरि सागर की तरफ जाय तो कर्म, योग और ज्ञान, पर जब सागर सुरसरि की ओर दौड़ा चला आए तो भक्ति। भक्ति कुछ ऐसी है कि छोटा बच्चा पुकारता, रोता है, तो माँ दौड़ी चली आती है। भक्ति तो बस भक्त का रुदन है। भक्त के हृदय से उठी आह है।
    
भक्ति जीवन की सारी साधना, सारे प्रयास-प्रयत्नों की व्यर्थता को स्वीकार है। भक्ति तो बस भक्त के आँसू है, जो अपने भगवान् को पुकारते हुए बहाता है। कर्मयोग कहता है- तुम गलत कर रहे हो, ठीक करने लगो तो पहुँच जाओगे। ज्ञान योग कहता है कि तुम गलत जानते हो, सही जान लो तो पहुँच जाओगे। योगशास्त्र कहता है तुम्हें विधियों का ज्ञान नहीं है, राहें मालूम नहीं है, विधियाँ सीख लो, उनका अभ्यास करो तो पहुँच जाओगे। भक्ति कहती है- तुम ही गलत हो- न ज्ञान से पहुँचोगे, न कर्म से और न योग से। बस तुम अपने अहं से छूटकर अपने भगवान के हो जाओ। अब न रहे तुम्हारा परिचय, बस केवल तुम्हारे प्रभु ही तुम्हारा परिचय बन जायें तो पहुँच जाओगे। भला छोटा सा बच्चा कैसे ढूँढे अपनी माँ को, वह तो रोएगा, माँ अपने आप ही उसे ढूँढ लेगी। भक्त बस रो-रो कर पुकारेगा अपने भगवान को, वे स्वयं ही उसे ढूँढ लेंगे। यही तो भक्ति है।’’
    
देवर्षि नारद की बातों में भावों का अपूर्व आवेग था। इस आवेग ने सबको अपने में समेट लिया। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की भी आँखें भीग गयीं। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह बोले- ‘‘शबरी ऐसी ही भक्त थी। मैंने एक बार उस भोली बालिका को तब देखा था, जब वह महर्षि मतंग के आश्रम में आयी थी। बाद में बहुत समय के बाद युगावतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने प्रिय भ्राता लक्ष्मण के साथ उससे मिलने गए थे। इस मिलन की कथा वत्स लक्ष्मण ने मुझे अयोध्या वापस आने पर सुनायी थी।’’ ब्रह्मर्षि की ये बातें सुनकर समूची सभा ने समवेत स्वर में कहा- ‘‘उन महान भक्त की कथा सुनाकर हमें भी अनुग्रहीत करें देवर्षि!’’ इस निवेदन के उत्तर में वशिष्ठ ने नारद की ओर देखा। उन्हें अपनी ओर देखकर नारद ने गद्गद् कण्ठ से कहा- ‘‘आपके मुख से शबरी की कथा सुनकर हम सभी धन्य होंगे।’’
    
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०६

रविवार, 5 सितंबर 2021

👉 सच्चा शूरवीर कौन?

वीरता की परीक्षा-साहस की कसौटी पर होती है और साहस का स्तर आदर्श की आग में परखा जाता है। आदर्श रहित साहस तो अभिशाप है। उसी को असुरता या दानवी प्रवृत्ति कहते हैं। ऐसा साहस जो आदर्शों का परित्याग कर उद्धत उच्छृंखलता अपनाये, केवल आतंक ही उत्पन्न कर सकता है। उससे क्षोभ और विनाश ही उत्पन्न हो सकता है। ऐसे दुस्साहस से तो भीरुता अच्छी भीरु व्यक्ति अपने को ही कष्ट देता है पर दुष्ट दुस्साहसी अनेकों को त्रास देता है और भ्रष्ट परम्परा स्थापित करके अपने जैसे अन्य अनेक असुर पैदा करता है।

साहस की सराहना तब है जब वह आदर्शों के लिये प्रयुक्त हो। अवाँछनीयता को निरस्त करने के काम आये और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में योगदान दे। इस प्रकार की गतिविधियाँ अपनाने वाले सत्साहसी लोगों को सच्चे अर्थों में शूरवीर कहा जा सकता है।

भय और प्रलोभन जिसे कर्तव्य पथ से डिगा नहीं सकते वह सचमुच बहादुर है। जीवन में पग-पग पर ऐसा अवसर आते हैं जिनमें अनीति अपनाकर प्रलोभन पूरा करने को गुंजाइश रहती है। आकर्षण कितनों के ही पैर फिसला देता है। रूप यौवन को देखकर शील सदाचार से पैर उखड़ने लगते हैं। मर्यादायें डगमगाने लगती हैं। पैसे का प्रलोभन समाने आने पर अनीति बरतने में संकोच नहीं होता। कोई देख नहीं रहा हो- भेद खुलने की आशंका न हो तो कोई विरले हो कुकर्म करने से मिलने वाला लाभ उठाने से चूकते हैं। आदर्शों के प्रति यह शिथिलता अन्तरात्मा की सबसे बड़ी दुर्बलता है। लोकलाज के कारण दण्ड भय का ध्यान न रखते हुए अनीति मूलक प्रलोभन से बचे रहना- यह तो संयोग की बात हुई। रोटी न मिली तो उपवास। विवशता ने दुष्कर्म का अवसर नहीं दिया, यह भी अच्छा ही हुआ। प्रतिष्ठा गँवाने की तुलना में लालच छोड़ देना ठीक समझा गया, यह बुद्धिमता और दूरदर्शिता रही, क्षणिक और तुच्छ लाभ के लिये प्रतिष्ठा से सम्बन्धित दूरगामी सत्परिणामों से वंचित होना व्यवहार बुद्धि को सहन न हुआ यह अच्छा ही रहा। पर इसे वीरता नहीं कह सकते।

साहस उसका है जो प्रलोभन के अवसर रहने पर भी- भेद न खुलने की निश्चिन्तता मिलने पर भी अनीति मूलक प्रलोभनों को इसलिए अस्वीकार कर देता है कि वह अपनी कर्तव्यनिष्ठा और आदर्शवादिता को किसी भी मूल्य पर नहीं बेचेगा। जो अमीरी का अवसर गँवा सकता है और गरीबी के दिन काट सकता है पर ईमान गँवाने को तैयार नहीं, वही बहादुरी की कसौटी पर खरा सोना सिद्ध हुआ समझा जायेगा।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972 पृष्ठ 29

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५८)

हम विश्वात्मा के घटक

मनुष्य अपने को एकाकी अनुभव करके स्वार्थान्ध रहने की भूल भले ही करता रहे, पर वस्तुतः इस विराट् ब्रह्म का-विशाल विश्व का—एक अकिंचन सा घटक मात्र है। समुद्र की लहरों की तरह उसका अस्तित्व अलग से दीखता भले ही हो, पर वस्तुतः वह समिष्टि सत्ता का एक तुच्छ सा परमाणु भर है। ऐसा परमाणु जिसे अपनी सत्ता और हलचल बनाये रहने के लिए दूसरी महा शक्तियों के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है।

अपनी पृथ्वी सूर्य से बहुत दूर है और उसका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ता फिर भी वह पूरी तरह सूर्य पर आश्रित है। सर्दी, गर्मी, वर्षा, दिन, रात्रि जैसी घटनाओं से लेकर प्राणियों में पाया जाने वाला उत्साह और अवसाद भी सूर्य सम्पर्क से सम्बन्धित रहता है। वनस्पतियों का उत्पादन और प्राणियों की हलचल में जो जीवन तत्व काम करता है उसे भौतिक परीक्षण से नापा जाय तो उसे सूर्य का ही अनुदान कहा जायेगा। असंख्य जीव कोशाओं से मिलकर एक शरीर बनता है, उन सबके समन्वित सहयोग भरे प्रयास से जीवन की गाड़ी चलती है। प्राण तत्व से इन सभी कोशाओं को अपनी स्थिति बनाये रहने की सामर्थ्य मिलती है। इसी प्रकार इस संसार के समस्त जड़ चेतन घटकों को सूर्य से अभीष्ट विकास के लिए आवश्यक अनुदान सन्तुलित और समुचित मात्रा में मिलता है।

यह सूर्य भी अपने अस्तित्व के लिए महासूर्य के अनुग्रह पर आश्रित है और महा सूर्यों को भी अतिसूर्य का कृपाकांक्षी रहना पड़ता है। अन्ततः सभी को उस महाकेन्द्र पर निर्भर रहना पड़ता है जो ज्ञान एवं शक्ति का केन्द्र है वह ब्रह्म है, सविता है। अति सूर्य, महासूर्य और सूर्य सब उसी पर आश्रित हैं।

प्राणियों, वनस्पतियों और पदार्थों की गतिविधियों पर सूर्य के प्रभाव का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उनकी स्वावलम्बी हलचलें वस्तुतः परावलम्बी हैं।
(1) संसार अन्योन्याश्रित
(2) सूर्य चन्द मनुष्य वृक्ष जीवों को प्रभावित करते हैं। सूर्य की उंगलियों में बंधे हुए धागे ही बाजीगर द्वारा कठपुतली नचाने की तरह विभिन्न गतिविधियों की चित्र-विचित्र भूमिकाएं प्रस्तुत करते हैं। यहां तक कि प्राणियों का, मनुष्यों का चिन्तन और चरित्र तक इस शक्ति प्रवाह पर आश्रित रहता है।  केवल सूर्य वरन् न्यूनाधिक मात्रा में सौर मण्डल के ग्रह, उपग्रह तथा ब्रह्माण्ड क्षेत्र के सूर्य तारक भी हमारी सत्ता-स्थिरता एवं प्रगति को प्रभावित करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ५८)

कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ है भक्ति
    
भक्तिसरिता की लहरों में भाव भीगते रहे। सप्तर्षियों के साथ अन्य ऋषियों, देवों, सिद्धों व गन्धर्वों का समुदाय भक्ति के सरस भावों में अपने को निमज्जित करता रहा। किसी को भी समय का चेत न रहा। बस उनकी चेतना के चैतन्य में भक्ति के अनेकों बिम्ब बनते और घुलते रहे। बड़ी अपूर्व स्थिति थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सभी काल की सीमा से दूर चले गए हों अथवा यदि काल का स्पर्श हो भी रहा हो तो यहाँ यह काल अतीत-वर्तमान व भविष्य में खण्डित न था। यहाँ तो काल अखण्ड-अविराम हो अविरल अपनी स्वयं की सत्ता में, स्वयं ही भूला हुआ था। यह अनुभूति अद्भुत थी। महाकाल की महिमा भक्ति के इस महाभाव में झलक रही थी- छलक रही थी।
    
देर तक यह स्थिति बनी रही। धीरे-धीरे अखण्ड महाकाल के महाप्रवाह से अतीत, वर्तमान व भविष्य के काल खण्ड प्रकट होना प्रारम्भ हुए। इसके वर्तमान कालखण्ड से दिवस, रात्रि, घटी, क्षण व पल का बोध चेतना के चैतन्य में प्रकट हुआ। यह कालबोध सबसे पहले ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की चेतना में उभरा। उन्हें चेत होने पर उनको बाह्य जगत् की स्थिति का बोध हुआ। उन्होंने देखा कि भक्ति समागम में उपस्थित सबके सब भक्ति की गहनता में खोए हुए हैं। उन्होंने निराकार ब्रह्म से एकाकार होकर ब्रह्मसंकल्प किया और फिर प्रभु के सगुण-साकार रूप का ध्यान धर सभी की चेतना के चैतन्य को बहिर्मुख किया। सचमुच ही यह बड़ी गहरी समाधि थी। अगर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ यह महत्कार्य न सम्पन्न करते तो पता नहीं कब तक सब की यह भावदशा बनी रहती।
    
परन्तु अब स्थिति भिन्न थी। अब भी सब के सब भाव विह्वल तो थे परन्तु उन्हें बाह्य जगत् का बोध था। देवर्षि को अभी भी अपनी सुधि नहीं थी। हाँ! उनके मुख से प्रभु नाम के अस्फुट स्वर अवश्य निकल रहे थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उनकी ओर बड़ी भावपूर्ण दृष्टि से देखा और मीठे स्वर में बोले- ‘‘हे देवर्षि! अब आप ही हम सबको भक्ति के नवीन आयाम की ओर ले चलें, अपने नवीन सूत्र का सत्य उच्चारें।’’ ब्रह्मर्षि के इस कथन पर देवर्षि नारद ने सभी को निहारा। सभी के मुख पर जिज्ञासा की चमक थी। सब को प्रतीक्षा थी कि ब्रह्मपुत्र नारद कुछ नया कहेंगे। स्थिति को देखकर नारद ने भी बिना पल की देर लगाए कहा-
‘सा तु कर्मज्ञान योगेभ्योऽप्यधिकतरा’॥ २५॥
वह (भक्ति) कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १०५

👉 "धीरे चलो"

नदी के तट पर एक भिक्षु ने वहां बैठे एक वृद्ध से पूछा "यहां से नगर कितनी दूर है? सुना है, सूरज ढलते ही नगर का द्वार बंद हो जाता है। अब त...