रविवार, 3 मई 2026

👉 संकल्प बल कैसे बढ़ाएं? ( भाग 1)

सब तरह के आध्यात्मिक साधन का आधार मन के संयम और नियंत्रण पर रहता है। मन ही इन्द्रियों का स्वामी है और इन्द्रियाँ उस हालत में सुमार्ग पर चल सकती हैं जब कि मन कुमार्ग गामी न हो। यदि मन हमारे वश में नहीं है, उच्छृंखल है, तो उससे कोई भजन साधन ठीक तरह से हो सकना असंभव है और उस हालत में आत्मोन्नति की आशा ही व्यर्थ है।

मन को साधने में बहुत कुछ सहायता ऐसे पुरुषों की संगति से मिल सकती है जिन्होंने हमसे अधिक उन्नति करली है और जिनकी मानसिक शक्ति हम से बहुत अधिक बड़ी चढ़ी है। उच्च विचार वाला पुरुष हमें वास्तविक सहायता दे सकता है, क्योंकि जिस प्रकार के कम्प (गति) हम पैदा कर सकते हैं, उससे अधिक उच्च प्रकार के कम्प (गति) वह पुरुष पैदा करके जगत में प्रेरित करता रहता है। पृथ्वी पर पड़ा हुआ लोहे का टुकड़ा अपने आप गरम नहीं हो सकता, पर वह अग्नि के समीप रख दिया जाता है तो उष्ण कम्पों को ग्रहण करके गरम हो जाता है।

उसी प्रकार जब हम किसी शक्तिशाली विचार वाले महापुरुष के पास पहुँचते हैं, तो उसके मानसिक कम्पन हमारी देह पर प्रभाव डालते हैं और उसमें भी वैसे ही सजातीय कम्प उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण हमारा स्वर उनसे मिल जाता है अर्थात् उनके और हमारे मन में एक ही प्रकार के संकल्पों की प्रेरणा होती है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी मानसिक शक्ति बढ़ गई है और हममें ऐसे सूक्ष्म भावों को ग्रहण करने की सामर्थ्य आ गई है जो साधारण अवस्था में हमारी समझ आ सकने में बहुत कठिन थे। किन्तु जब हम फिर अकेले रह जाते हैं तो सूक्ष्म भाव ग्रहण करने की शक्ति फिर गायब हो जाती है।

श्रोतागण एक बड़े व्याख्यानदाता का भाषण सुनने जाते हैं, उसे भली प्रकार समझते जाते हैं और उसके सार को तत्काल बुद्धि में ग्रहण कर लेते हैं। वे प्रसन्न होकर लेक्चर से वापिस जाते हैं और दिल में समझते हैं कि आज हमें ज्ञान का उत्कृष्ट लाभ हुआ। पर अगले दिन जब वे किसी मित्र से उस व्याख्यान की चर्चा करते हैं, तो वे उन बातों को स्पष्ट रूप से नहीं बतला सकते, जो कल उनकी समझ में भली प्रकार आई थी। उस समय उनको यही कहना पड़ता है कि निःसंदेह कल मैंने व्याख्यान का आशय भली प्रकार समझ लिया था, पर आज वह पकड़ में नहीं आता।” इसका कारण यही होता है कि व्याख्यानदाता के भावों का अनुभव हमारे मानसिक शरीर और जीवात्मा को तो हो चुका है, पर वह अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि हम उसको बाह्य रूप में भी स्पष्ट प्रकट कर सकें। पहले दिन जब हम व्याख्यान के असली मर्म को भली प्रकार समझ रहे थे तब सामर्थ्यवान उपदेशक के शक्तिशाली कम्पों ने जिन रूपों की रचना की थी और उनको हमारी मानसिक देह ने ग्रहण कर लिया था। पर दूसरे दिन जब उन बातों को दोहराने में असमर्थता प्रतीत होती है तो इससे यह प्रकट होता है कि हमको उन विचारों को कई बार दोहराना चाहिये। वैसे भाषण कर्ता और श्रोता में एक ही शक्ति काम कर रही है, किन्तु एक ने उसे उन्नत बना लिया है और दूसरे में वह सोई हुई शिथिल पड़ी हुई है। ऐसी शिथिलता किसी बलवान व्यक्ति की शक्ति का संसर्ग होने से तेज हो सकती है।

अपने से अधिक उन्नत पुरुषों की संगति से दूसरा लाभ यह भी होता है कि उनके संसर्ग से हमारा कल्याण होता है और उनके उत्साह प्रदायक प्रभाव से हमारी वृद्धि होती है। इस रीति से सद्गुण शिष्यों को अपने समीप रख कर जो लाभ पहुँचा सकते हैं, वह केवल भाषण द्वारा उपदेश करने की अपेक्षा कहीं अधिक होता है। यदि इस प्रकार बिल्कुल निकट रहने का अवसर न मिल सके तो पुस्तकों द्वारा भी बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। पर पुस्तकें भी सावधानी के साथ चुनी जानी चाहिये। किसी वास्तविक महापुरुष के ग्रन्थ को पढ़ते समय हमें पूर्ण रीति से शिष्य की भावना रखनी उचित है। अर्थात् हमको अपना चित्त ऐसी निरपेक्ष अवस्था (साम्यावस्था) में रखना चाहिये कि जिससे हम उसके संकल्पों के कम्पों को, जहाँ तक संभव हो ग्रहण कर सकें। जब हम शब्दों को पढ़ चुकें तो हमें चाहिये कि उन पर ध्यान देवें, उनका चिन्तन करें, उनके असली आशय को अनुभव करें, उनके तमाम गुप्त अर्थों को उनमें से निकाल लेवें। हमारी चित्त वृत्ति एकाग्र होनी चाहिये ताकि शब्दों के अवसरण को छोड़कर हम ग्रंथकर्ता की चित्त वृत्ति का भाव ग्रहण कर सकें। इस प्रकार का पाठ करना अथवा पढ़ना शिक्षा का काम देता है और हमारी मानसिक उन्नति में बड़ा सहायक होता है। जिस पाठ में इतना प्रयत्न नहीं किया जायगा वह दिल को बहलाने वाला और हमारे ज्ञान भण्डार को कुछ बढ़ाने वाला ही हो सकता है, पर उससे हमारी उतनी मानसिक उन्नति और वृद्धि नहीं हो सकती जैसी कि पूर्ण चिन्तन और मनन द्वारा संभव होती है।

.......क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 नैतिकता की खरी कसौटी (अन्तिम भाग)

जो अच्छा काम अच्छी भावना से किया गया हो, उसका परिणाम हमेशा शुभ ही हो, यह आवश्यक नहीं है। कार्य के परिणाम को उसकी नैतिकता की माप मानना ठीक नहीं। उदाहरणार्थ मुझे एक घड़ी प्राप्त करनी है अब मैं इस लक्ष्य को कई तरीकों से सिद्ध कर सकता हूँ-यथा खरीदकर माँगकर, चोरी करके। साधन के अनुसार मेरी लक्ष्य-प्राप्ति का स्वरूप भी नैतिक से अनैतिक बनते जाता है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी लक्ष्य का ही शुद्ध होना आवश्यक नहीं बल्कि साधन का भी शुद्ध होना आवश्यक है, कहते थे। उनके अनुसार शुद्ध साधन से ही शुद्ध लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। साम्यवादी नैतिक भूमिका और गाँधीवादी नैतिक भूमिका में यह बुनियादी फर्क है।

अच्छे काम का, अच्छी भावना से शुद्ध साधनों के द्वारा किया जाना, उसके नैतिक होने के लिये अपरिहार्य शर्तें हैं। साथ ही वह काम आत्म स्फूर्त भी हो। जो कार्य दबाव या भय से किया जावेगा, वह दबाव या भय के कारण दूर होते ही लुप्त हो जावेगा। यदि कोई विनोबा जी के साथ पद यात्रा में सुबह शाम होने वाली प्रार्थना में उनके नैतिक भय या नियम के दबाव से शामिल होकर प्रार्थना करता है तो उसका वह कार्य नैतिक नहीं कहा जा सकता। ऊपर से लादा हुआ कार्य नैतिक नहीं हो सकता है। यहाँ तक नैतिकता की मान्यता पर विषय गत दृष्टि से विचार किया गया। लेकिन यह प्रश्न तो रह ही जाता है कि हम कैसे जाने कि कौन काम शुभ है? कौन अशुभ है? कौन सत है और कौन असत कार्य है? इसके लिये सर्वमान्य एक मापदण्ड न हो सकने पर भी वैसे मापदण्ड का सर्वथा अभाव नहीं है। संसार से जितने नीतिशास्त्र के आचारवान विचारक संत महात्मा हो गए हैं एक स्वर से घोषित करते हैं कि आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्। सारे संसार के नीतिशास्त्र का सार संक्षेप है। रूसी ऋषि टॉलस्टाय कहते थे जो व्यक्ति जितना कम लेता है और जितना ज्यादा वापस देता है उसी अनुपात में वह उतना ही नैतिक है। महात्मा गाँधी की अहिंसा क्या है-सर्वभूतों से आत्मवत् प्रेम ही तो है।

आपको जीवन में आगे बढ़ने के लिए खुद को कैसे बदलना चाहिए ? अमृतवाणी https://youtu.be/RGc8RJNy0ZY?si=M4Sne1jaIPk6q6F0

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत् इस पाँच शब्दों के लघु वाक्य में समस्त नीतिशास्त्र का निचोड़ सम्मिलित है-यह सहसा विश्वास नहीं होता है। सत्य की सरलता ही उसे पहिचानने में कठिनाई उपस्थित करती है समस्त नैतिक सिद्धान्त क्या बताते हैं? यही न कि हमारे सारे व्यवहार दूसरों के प्रति इस प्रकार हों जिससे हम अपना सर्वतोमुखी विकास करते हुए दूसरों के उसी प्रकार के विकास में सर्व भावेन सहयोग कर सकें। इस प्रकार का व्यवहार नहीं हो सकता है जो ऊपर के पाँच शब्दों में प्रकट किया गया है। इसी वाक्य का अविकल अनुवाद सा करते हुए संत कन्फ्यूशियस ने कहा “जो व्यवहार तुम अपने प्रति नहीं पसन्द करते, वह दूसरों के प्रति न करो।” साक्षात् धर्म के लक्षण बताते हुए मनु ने कहा-स्वस्थ न प्रियमात्मनः धर्म का एक प्रबल लक्षण अपनी आत्मा को जो प्रिय लगे, वह करना है। अब कोई कह सकता है कि हमारी आत्मा को तो चोरी करना प्रिय है। जो उसका धर्म वही है परन्तु आपको चोरी करना प्रिय नहीं है क्योंकि जिसे जो काम प्रिय है, उसे यदि और लोग करें तो उसे खुश होना चाहिये। कोई चोर नहीं चाहेगा कि सब चोर हों क्योंकि वैसी हालत में उसका काम नहीं बनेगा। अतः हम जिस कार्य को अपने प्रति नहीं चाहते कि कोई करे उसका आचरण हम दूसरों के प्रति करें-एक सच्ची कसौटी है। हम नहीं चाहते कि कोई हमारे साथ झूठा व्यवहार करे अतः हमें चाहिए कि हम सबके साथ सत्य व्यवहार करें। हम नहीं चाहते कि कोई हमारा जी दुखाए, अतः हमें चाहिए कि हम अपने आचरणों से किसी को कष्ट न दे। हम अपनी जान की रक्षा करते हैं, हमें अपनी जान प्यारी है। इसी से यह अपरिहार्य व्यवहार निश्चित हो जाता है कि हम दूसरे की जान की रक्षा करें। सत्य, अहिंसा के सिद्धान्त का मूल यही विचार है। इसी प्रकार अस्तेय, अपरिग्रह आदि अन्य सार्वभौम नैतिक सिद्धान्तों के विषय में आप अपने अन्तःकरण से स्वयं जान सकते हैं।

उपर्युक्त नीति वाक्य के अनुसार अपने आचरण की जाँच करने के लिये जितनी सद्विवेक बुद्धि की जरूरत है उतनी प्रत्येक सामान्य व्यक्ति को प्रकृति से प्राप्त है। *हमारी समस्या नीति की अज्ञानता उतनी नहीं है जितना नीति का आचरण है। अर्जुन के समान हम सबकी स्थिति है- “जा नाभि धर्न्य न धमे प्रवृतिः जानन्यः धर्न्य न चम निवृत्तिः।” धर्माधर्म का ज्ञान इन सबको रहता है तदनुकूल आचरण के अभाव से सारी समस्या खड़ी होती है। यदि हम वसुधैव कुटुम्बकम, का आदर्श अपनाकर अपने व्यवहारिक जीवन में आत्मनः प्रतिकूलानिपरेषाँ न समाचरेत् का आचरण करें तो हम धर्म और नीति की रक्षा करते हुए सच्चे अर्थों में स्व, पर कल्याण कर सकते हैं।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 नैतिकता की खरी कसौटी (भाग 1)

पाप क्या है? पुण्य क्या है? सत् क्या है? असत् क्या है? उचित क्या है? अनुचित क्या है? शुभ क्या है? अशुभ क्या है? अच्छा क्या है? बुरा क्या है? मानव जाति ने जबसे विचार करना आरम्भ किया तब से ये प्रश्न उसके सामने हैं। ऐसा नहीं है कि इनके सार्वभौम उत्तर प्राप्त करने की कोशिश नहीं की गई। परन्तु प्रयत्न के बावजूद भी कोई ऐसा समाधान कारक उत्तर नहीं मिला है जिसे सब देश और सब काल में सबके लिए उपयुक्त कह सकें। यही कारण है कि परम पुरातन होते हुए भी ये प्रश्न नित्य नवीन बने हुए हैं।

नैतिकता की मान्यताओं को अधिकाँश विचारक देशकाल और पात्र सापेक्ष मानते हैं। इस कारण से एक ही कार्य एक समय, एक स्थान में एक व्यक्ति के लिये अच्छा सिद्ध होता है और वही कार्य दूसरे समय, दूसरे स्थान में दूसरे व्यक्ति के लिये अनैतिक बन जाता है जैसे-युद्ध के समय सामूहिक हत्या उचित मानी गई किन्तु अन्य परिस्थिति में हत्या पाप है, अपराध है। इस अनिश्चयात्मक स्वरूप के कारण ही लगता है नैतिक मान्यताएँ जनसाधारण को अनावश्यक, अनाकर्षक जँचती हैं। उन्हें लगता है कि अच्छा-बुरा का विचार करना समय की बरबादी और निरी मूर्खता है। आज भी संसार में ऐसे लोगों का अभाव नहीं है जो सुकरात को मूर्खराज की उपाधि से निःसंकोच विभूषित करते हैं।

ध्यान:- मन को शांत कैसे करें | Man Ko Shant Kaise Karen | Meditation, 

सामान्यजन प्रत्येक प्रश्न पर व्यापारी दृष्टि से विचार करते हैं। वे प्रत्येक कार्य को लाभ-हानि की तुला पर तोलते हैं। नैतिक मान्यताएँ इस तुला से हानिकारक जँचती है और इस स्वार्थी निष्कर्ष को नैतिक मान्यताओं के स्वरूप की अनिश्चयात्मकता का बल मिल जाता है। फिर क्या गिलोय और नीम चढ़ी। जनसामान्य में नैतिकता की ऐसी शोचनीय अवस्था होते हुए भी ऐसा कह सकना सम्भव नहीं है कि वे नैतिक मान्यताओं की पूर्ण उपेक्षा कर सकते हैं। वे जाने-अनजाने कहते ही रहते हैं कि अमुक ने अच्छा नहीं किया, अमुक अन्यायी है, पापी है, दुराचारी है इत्यादि। उनके ये कथन सिद्ध करते हैं कि कोई व्यक्ति भले ही अपने लिये नैतिक आचरण को अनावश्यक कहे पर जहाँ दूसरे के आचरण का प्रश्न आता है, उसको आवश्यक मानता है। जिस व्यक्ति से हमारा कोई सरोकार नहीं, हानि-लाभ की आशा नहीं उसके आचरण की भी हम आलोचना करते ही हैं, अच्छा-बुरा का निर्णय करते हैं। इससे स्पष्ट है कि नैतिकता की कसौटी हमारी हानि लाभ वाली तुला नहीं हो सकती। वह उससे सर्वथा पृथक है।

हम दूसरे व्यक्ति को उसके बाह्य आचरण से अच्छा या बुरा ठहराते हैं। हमारे पास इसके अतिरिक्त दूसरा साधन भी नहीं हैं। पर बाह्य आचार के आधार पर किया गया नैतिक निर्णय हमेशा ठीक ही होगा, ऐसा नहीं कह सकते। दो व्यक्तियों का बाहरी व्यवहार एकसार होते हुए भी एक नीति युक्त और दूसरा अनैतिक हो सकता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति ने दया से द्रवित होकर एक भिखारी को एक रुपया दिया और दूसरे ने उसे अपनी आँखों के सामने से हटाने के लिए एक रुपया दिया। कहने का मतलब यह है कि एक ने पसीज कर और दूसरे खीझकर रुपया दिया। जहाँ तक देने का संबंध है इस उदाहरण में दोनों ने दिये हैं, समान दिये हैं पर दान के पीछे जो भावना है उनमें जमीन-आसमान का अन्तर है। भावना के कारण एक का वही कार्य नैतिक है तो दूसरे का वही कार्य अनैतिक है। काम अच्छा हो इतना ही बस नहीं है बल्कि अच्छी भावना से भी किया गया होना चाहिए।

.....क्रमशः जारी
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 03 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 May 2026


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शनिवार, 2 मई 2026

👉 नैतिकता की खरी कसौटी (भाग 1)

पाप क्या है? पुण्य क्या है? सत् क्या है? असत् क्या है? उचित क्या है? अनुचित क्या है? शुभ क्या है? अशुभ क्या है? अच्छा क्या है? बुरा क्या है? मानव जाति ने जबसे विचार करना आरम्भ किया तब से ये प्रश्न उसके सामने हैं। ऐसा नहीं है कि इनके सार्वभौम उत्तर प्राप्त करने की कोशिश नहीं की गई। परन्तु प्रयत्न के बावजूद भी कोई ऐसा समाधान कारक उत्तर नहीं मिला है जिसे सब देश और सब काल में सबके लिए उपयुक्त कह सकें। यही कारण है कि परम पुरातन होते हुए भी ये प्रश्न नित्य नवीन बने हुए हैं।

नैतिकता की मान्यताओं को अधिकाँश विचारक देशकाल और पात्र सापेक्ष मानते हैं। इस कारण से एक ही कार्य एक समय, एक स्थान में एक व्यक्ति के लिये अच्छा सिद्ध होता है और वही कार्य दूसरे समय, दूसरे स्थान में दूसरे व्यक्ति के लिये अनैतिक बन जाता है जैसे-युद्ध के समय सामूहिक हत्या उचित मानी गई किन्तु अन्य परिस्थिति में हत्या पाप है, अपराध है। इस अनिश्चयात्मक स्वरूप के कारण ही लगता है नैतिक मान्यताएँ जनसाधारण को अनावश्यक, अनाकर्षक जँचती हैं। उन्हें लगता है कि अच्छा-बुरा का विचार करना समय की बरबादी और निरी मूर्खता है। आज भी संसार में ऐसे लोगों का अभाव नहीं है जो सुकरात को मूर्खराज की उपाधि से निःसंकोच विभूषित करते हैं।

सामान्यजन प्रत्येक प्रश्न पर व्यापारी दृष्टि से विचार करते हैं। वे प्रत्येक कार्य को लाभ-हानि की तुला पर तोलते हैं। नैतिक मान्यताएँ इस तुला से हानिकारक जँचती है और इस स्वार्थी निष्कर्ष को नैतिक मान्यताओं के स्वरूप की अनिश्चयात्मकता का बल मिल जाता है। फिर क्या गिलोय और नीम चढ़ी। जनसामान्य में नैतिकता की ऐसी शोचनीय अवस्था होते हुए भी ऐसा कह सकना सम्भव नहीं है कि वे नैतिक मान्यताओं की पूर्ण उपेक्षा कर सकते हैं। वे जाने-अनजाने कहते ही रहते हैं कि अमुक ने अच्छा नहीं किया, अमुक अन्यायी है, पापी है, दुराचारी है इत्यादि। उनके ये कथन सिद्ध करते हैं कि कोई व्यक्ति भले ही अपने लिये नैतिक आचरण को अनावश्यक कहे पर जहाँ दूसरे के आचरण का प्रश्न आता है, उसको आवश्यक मानता है। जिस व्यक्ति से हमारा कोई सरोकार नहीं, हानि-लाभ की आशा नहीं उसके आचरण की भी हम आलोचना करते ही हैं, अच्छा-बुरा का निर्णय करते हैं। इससे स्पष्ट है कि नैतिकता की कसौटी हमारी हानि लाभ वाली तुला नहीं हो सकती। वह उससे सर्वथा पृथक है।

हम दूसरे व्यक्ति को उसके बाह्य आचरण से अच्छा या बुरा ठहराते हैं। हमारे पास इसके अतिरिक्त दूसरा साधन भी नहीं हैं। पर बाह्य आचार के आधार पर किया गया नैतिक निर्णय हमेशा ठीक ही होगा, ऐसा नहीं कह सकते। दो व्यक्तियों का बाहरी व्यवहार एकसार होते हुए भी एक नीति युक्त और दूसरा अनैतिक हो सकता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति ने दया से द्रवित होकर एक भिखारी को एक रुपया दिया और दूसरे ने उसे अपनी आँखों के सामने से हटाने के लिए एक रुपया दिया। कहने का मतलब यह है कि एक ने पसीज कर और दूसरे खीझकर रुपया दिया। जहाँ तक देने का संबंध है इस उदाहरण में दोनों ने दिये हैं, समान दिये हैं पर दान के पीछे जो भावना है उनमें जमीन-आसमान का अन्तर है। भावना के कारण एक का वही कार्य नैतिक है तो दूसरे का वही कार्य अनैतिक है। काम अच्छा हो इतना ही बस नहीं है बल्कि अच्छी भावना से भी किया गया होना चाहिए।

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👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (अंतिम भाग)

आत्म-निरीक्षण कर देखिए कि किस प्रकार की भावात्मक शक्ति आप में जमी पड़ी है? और उसके विकास का सबसे स्वस्थ रूप क्या हो सकता है? किससे आपकी आन्तरिक तृप्ति होती है? क्रोध का ज्वालामुखी, घृणा का तूफान, आवेश की सुलगती अग्नि मनोनुकूल प्रिय कार्यों से लगने से शान्त होती है। जिस भावना से सम्बन्धित रुकी हुई शक्ति हो, उसके अनुकूल ही रुचिकर उत्पादक प्रिय कार्य का चुनाव कीजिए। इन माध्यमों पर सही सफलता निर्भर है।

हमें अपने एक उत्पातकारी विद्यार्थी की स्मृति आज भी हरी है। वह कालेज आते हुए बाग के पेड़ और फल तोड़ता, मालियों को परेशान करता, छोटे विद्यार्थियों को पीटता था। सभी उससे तंग थे। पढ़ने में उसका किंचित भी मन न था। उसे फौज में जाने की सलाह दी गई। वही पेशा उसके कठोर भावों के अनुकूल पड़ता था। विद्यार्थी ने राय मान ली। आज वही उत्पातकारी विद्यार्थी अच्छा जनरल है। फौजी जीवन की कठोरताओं में भी सफलता प्राप्त करता जा रहा है। जब तक उसे अपनी रुचि, प्रकृति, स्वभाव, संस्कारों के अनुकूल क्षेत्र नहीं मिला, तभी तक वह शरारती रहा। अपना क्षेत्र मिलते ही, वह द्रुतगति से आगे बढ़ने लगा। अभी सफलता तो तभी मिली हुई समझिये जब मनुष्य अपने मनोनुकूल क्षेत्र पा ले।

जीविका उपार्जन के बाद किसी दूसरे प्रिय आनन्ददायक, प्रेरणाप्रद, मनोरंजक कार्य में तन्मय हो जाने से अवरुद्ध मनोग्रन्थियों को खुलने और बचपन तक की भावात्मक शक्ति को बाहर निकलने का स्वस्थ अवसर मिलता है।

अपने से पूछिए क्या मैं अपने भावों को ठीक तरह पहचानता हूँ? जब मैं क्रोधित हो उठता हूँ तो क्या उसमें दूसरे का कसूर होता है या यह स्वयं मेरी भावात्मक कमजोरी है? मेरे व्यक्तित्व में वह छिपा हुआ भाव कौन सा है, जो प्रायः मुझे परेशान किया करता है? क्या मैं उसे किसी उत्पादक शुभ कार्य की ओर मोड़ सकता हूँ?

निश्चय जानिये, आपको अपनी भावना के उदात्तीकरण का कोई न कोई स्वस्थ मार्ग अवश्य मिल जायगा। यह मनुष्य के स्वयं अपने आपको अध्ययन करने, स्व परीक्षा द्वारा अपनी गुप्त रुचि का ज्ञान प्राप्त करने तथा मन की नाना क्रियाओं को देखने से सम्बन्ध रखता है। आप खुद ही अपनी मनोवृत्तियों की दिशा तथा प्रवाह को पहचान सकते हैं। भावनाओं के प्रवाह में केवल यह ध्यान रखिए कि वह दिशा स्वस्थ, सुन्दर और समाज के लिए कल्याणकारी हो, जन हितकारी हो। आपका भी लाभ हो तथा अधिक जनता का हित साधन हो। विषय वासना की कलुषितता तथा दुर्गन्धि से उसका सम्बन्ध तनिक भी न हो। आपका चुना हुआ मार्ग नैतिक हो और आपके अन्दर के देवता को जगाने वाला हो। उसके प्रति आपका उत्साह सदा ही बना रहे और उससे आपकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ सतत जागृत और विकसित होती रहें।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मार्च

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 02 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 02 May 2026


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शुक्रवार, 1 मई 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 2)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता है। औरतों में हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन, त्वचा रोग हो जाते हैं। पुरुष गन्दी गालियाँ देते हैं। इस भावना का उदात्तीकरण ही उचित है। उच्च साहित्य के अध्ययन, भजन कीर्तन, पूजन, काव्य-निर्माण, चित्रकारी, समाज सेवा के नाना कार्यों द्वारा वृत्ति को तृप्त किया जा सकता है।

वह लड़का, जो छोटे जानवरों को पीटने या सताने में आनन्द लेता है, वास्तव में अपने छिपे पौरुष और शासन करने के भाव को गलत तरीके से प्रकट कर रहा है। इस मार्ग पर चलते-2 संभव है वह एक मारने पीटने वाले दुष्ट व्यक्ति के रूप में पनप जाये। इसके विपरीत यदि वह अपनी इन्हीं भावनाओं को सुनियंत्रण करे, तो एक नेता, सैनिक, सर्जन बन सकता है। जो बच्चे छोटे-2 खिलौने या खेलने के नए-2 आविष्कार करते रहते हैं, वे उन्हीं भावनाओं का विकास कर अच्छे इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।

मान लीजिए एक युवक का विवाह उसकी प्रेमिका से तय हो चुका है। उसे उसमें नई प्रेरणा मिली है और वह नए जोश से अपना काम करने में लगा हुआ है। अक्समात वह सम्बन्ध टूट जाता है। उसे भारी निराशा का धक्का लगता है। संभव है आवेश में आकर वह आत्म हत्या कर डाले या किसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति में लग कर प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाय। यह भाव का गलत विकास है। इससे स्वयं उसके भी मस्तिष्क और शरीर को क्षति होगी। उसे किसी प्रिय कार्य में पूरी तरह प्रवृत्त होकर, तन्मय होकर आत्म-विस्मृति करनी चाहिए। भावात्मक शक्ति को उत्पादक मार्ग देना चाहिए जिससे स्वयं उनका और समाज का कुछ हित हो सके। महाकवि तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, प्रेम दिवानी मीराबाई, भावविह्वल भक्त कबीर, गुरु नानक आदि की भावनाएँ शाश्वत कवि के रूप में प्रवाहित हुई जिनसे युग दिव्य प्रेरणाएँ आज भी ले रहा है। तुलसी का प्रेम ईश्वरीय शक्ति के यशोगान में लगा, सूर के भजनों में आज भी उनकी आत्मा के दर्शन मिलते हैं। ये महामानव स्वयं अपने कार्य से ही प्रेम करने लगे थे। इन्होंने रुके हुए गुप्त भावों को प्रकट होने का स्वस्थ रूप दिया। हम स्वयं भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए मनोनुकूल इच्छानुरूप, माध्यम ढूँढ़ सकते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मार्च

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👉 उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है। (अंतिम भाग)

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि जो धर्म अथवा दर्शन आधुनिक विज्ञान के विरुद्ध होगा, उसकी गिनती आज दंभ और पाखंड में ही की जायगी। यदि मानव जाति को प्रगति और कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करना है तो विज्ञान तथा धर्म और राजनीति तथा धर्म के बीच पाई जाने वाली सब प्रकार की विसंगतियों (परस्पर विरोधी बातों) का अंत कर देना चाहिये। इसी से मनुष्यों में ऐक्य की स्थापना होकर शाँति का प्रसार हो सकता है। सौभाग्यवश भारतवर्ष का दर्शनशास्त्र अत्यंत प्राचीन होने पर भी विज्ञान के बहुत कुछ अनुकूल है। उस धर्म मूलक दर्शन शास्त्र से जो नीति शास्त्र विकसित हुआ है, वह बहुत न्यायपूर्ण है और उसके आधार पर आध्यात्मिकता की रक्षा करते हुये समाज का उचित आर्थिक और राजनैतिक संगठन किया जा सकता है। विदेशी लोगों को यह बात कुछ आश्चर्य जनक जान पड़ती है, पर इसमें संदेह नहीं कि विकास के सिद्धान्त और नीतियुक्त शासन का निरूपण हिंदू धर्म में पहले ही कर दिया गया है। हिंदू धर्म के मुख्य आधार वेदान्त में परमात्मा की जो परिभाषा की गई है, वह किसी ऐसे परमात्मा से सम्बन्ध नहीं रखती जिसे मनुष्य की कल्पना ने उत्पन्न किया हो। गीता में ईश्वर की चर्चा जिन शब्दों में की गई है और उसके जो लक्षण बतलायें गये हैं उनसे वैज्ञानिक भी विरोध नहीं कर सकते। नौवें अध्याय में एक जगह स्पष्ट कह दिया गया है-

“सब चराचर सृष्टि मुझ में स्थिति है, और फिर आश्चर्य की बात यह है कि मैं उससे अलग हूँ और प्रकृति अकेली ही काम किया करती है। प्रकृति ही मेरे हस्तक्षेप बिना, चर और अचर सृष्टि को उत्पन्न करती है।”

उपनिषदों में स्पष्ट शब्दों में यह घोषित कर दिया गया है कि आदि शक्ति का क्रम से जो विकास हुआ है, उसी से विश्व की उत्पत्ति हुई है। यही बात आज कल के वैज्ञानिक भी कह रहे हैं। विज्ञान पिछले कुछ वर्षों में अणु और परमाणुओं द्वारा जगत के निर्माण के जिस सिद्धान्त पर पहुँचा है, वह भी हिंदू दर्शन में ज्यों का त्यों हजारों वर्ष पहले से मिलता है।

पर इन बातों से आगे बढ़कर उपनिषदों ने यह भी प्रतिपादित किया है कि प्रकृति से उत्पन्न होने पर भी मनुष्य को आत्मा की ही भक्ति और खोज करना चाहिये। क्योंकि आत्मा ही सत्य है और जो व्यक्ति उससे विमुख होकर केवल भौतिक उन्नति पर ही ध्यान देते है वे अंत में भ्रष्टाचार और कपट के कैद में फँस जाते हैं।

व्यक्तिगत लाभ का उद्देश्य न रख कर केवल समाज के हित की दृष्टि के काम करना ही भगवत् गीता में जीवन का मार्ग बतलाया गया है। उसमें सब कामों को समान रूप से प्रतिष्ठा के योग्य बतलाया गया है, और प्रत्येक कार्य को निर्लिप्त भाव से सच्चाई के साथ करने पर जोर दिया गया है। वास्तव में गीता एक अनोखी रीति से धार्मिक दृष्टि कोण से समाजवादी विचारधारा का प्रतिपादन करती है। गीता में कहा गया है कि “अपने नियत कर्मों को उचित रीति से पूरा करते रहना ईश्वर की बहुत बड़ी उपासना है।”

वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार समाज-संगठन का उचित मार्ग यही है कि कुछ लोगों को विशेष अधिकार प्राप्त कर लेने के बजाय समस्त कामों का बँटवारा जनसाधारण के हित की दृष्टि से बुद्धिमत्ता पूर्वक किया जाय। यदि हम चाहते हैं कि समाज व्यक्तिगत जीवन का इस प्रकार नियंत्रण करें कि प्रत्येक व्यक्ति सुविधापूर्वक जीवन निर्वाह कर सके, तो यह कार्य केवल कानून, पुलिस और फौज के द्वारा नहीं हो सकता। इसके लिये हमको जनता के विचारों में आध्यात्मिकता का समावेश करना पड़ेगा, जिससे हम अपना निर्धारण कर्तव्य आनंदपूर्वक करते रहें और समस्त समाज के हित का ध्यान रखें।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (अंतिम भाग)

इच्छाओं के त्याग का अर्थ यह कदापि नहीं कि मनुष्य प्रगति, विकास, उत्थान और उन्नति की सारी कामनाएँ छोड़कर निष्क्रिय होकर बैठ जाये। इच्छाओं के त्याग का अर्थ उन इच्छाओं को छोड़ देना है जो मनुष्य के वास्तविक विकास में काम नहीं आतीं, बल्कि उलटे उसे पतन की ओर ही ले जाती हैं। जो वस्तुऐं आत्मोन्नति में उपयोगी नहीं, जो परिस्थितियाँ मनुष्य को भुलाकर अपने तक सीमित कर लेती हैं मनुष्य को उनकी कामना नहीं करनी चाहिये। साथ ही वाँछनीय कामनाओं को इतना महत्व न दिया जाये कि उनकी अपूर्णता शोक बनकर सारे जीवन को ही आक्रान्त कर ले।

मनुष्य का लगाव इच्छाओं से नहीं बल्कि उनकी पूर्ति के लिये किये जाने वाले कर्म से ही होना चाहिए। इससे कर्म की गति में तीव्रता आयेगी और मनुष्य की क्षमताओं में वृद्धि होगी जिससे मनोवाँछित फल पाने में कोई सन्देह नहीं रह जायेगा। इसके साथ ही केवल कर्म से लगाव होने पर यदि कोई प्रयत्न में लग जायेगा। असफलता उसे प्रभावित नहीं कर पायेगी। इच्छा के प्रति लगाव रहने से प्रयत्न की असफलता पर मनोवाँछा पूरी न होने से उसका जी रो उठेगा। वह अपनी कामना के लिए तड़पने और कलपने लगेगा। अपेक्षित फल न पाने से उसे कर्म के प्रति विरक्ति होने लगेगी, प्रयत्नों से घृणा हो जायेगी और तब कर्म का अभाव उसको निष्क्रिय बनाकर घोर निराशा की स्थिति में भेज देगा। अस्तु, मनुष्य को मनोवांछाएं प्राप्त करने और निराशा के भयानक अभिशाप से बचने के लिये अपना लगाव इच्छाओं के प्रति नहीं बल्कि उनके लिये आवश्यक प्रयत्नों के प्रति ही रखना चाहिये।

मनुष्य की वे ही वासनायें उपयुक्त कही जा सकती हैं जो उसके विकास में सहायक हों। सम्पत्ति की कामना तभी उपयुक्त है जब वह कोई महान कार्य सम्पादित करने में काम आये। सम्पत्ति की कामना इसलिये करना ठीक नहीं-कि लोग हमें धनवान समझें समाज में प्रभाव बढ़े, संसार की हर चीज प्राप्त की जाये, भोगों के अधिक साधन संग्रह किये जायें। लोग सन्तान की वासना करते हैं, ठीक है सन्तान की कामना स्वाभाविक है, किन्तु सन्तान को केवल इसलिए चाहना कि मैं पुत्रवान समझा जाऊँ सम्पत्ति का कोई उत्तराधिकारी हो जाये, बहुत उपयुक्त नहीं। देश को अपने प्रतिनिधि के रूप में एक अच्छा नागरिक देने के लिये सन्तान की कामना महान एवं उपयुक्त है। लोग जीवन में कीर्ति चाहते हैं, अपनी ख्याति चाहते हैं और उसके लिये न जाने कौन-कौन से उपाय प्रयोग किया करते हैं। ख्याति इसीलिए चाहना ठीक नहीं-कि समाज में प्रभाव बढ़ेगा उससे हजार प्रकार के काम निकलेंगे, लोग आदर करेंगे, चाटुकारी करेंगे, प्रतिष्ठा बढ़ेगी। मनुष्य को कीर्ति कामी होना चाहिए, किन्तु यह तभी ठीक होगा कि वह कीर्ति का उपार्जन अपने सत्कर्मों से करे, अन्याय और धूर्तता से नहीं।

इस प्रकार की उपयुक्त कामनाएं रखने वाला व्यक्ति कभी भी उनकी असफलताओं से दुःखी नहीं होता और न कभी निराशा की स्थिति में पहुँचता है। अपने व्यक्तिगत सुखभोग के लिए विषयों की कामना परिणाम में ही नहीं प्रारम्भ में भी दुःखदायी होती है। आत्म विकास और समाज कल्याण के लिये की हुई कामनायें आदि एवं अंत दोनों में ही सुखदायी एवं कल्याणकारी रहती है। जीवन में निराशा से बचने के लिये मनुष्य को कम से कम कामनाएँ रखना ही ठीक है। कामनाओं की अधिकता ही निराशा और पतन का कारण होती है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 01 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 01 May 2026



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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 1)

मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ही हैं। बचपन की किस कटु अनुभूति के कारण ये दलित भाव दुःख और व्याधि के कारण बनते हैं और मनुष्य को परेशान किए रहते हैं।

क्रोधी, चिड़चिड़ी, बात बात में झगड़ने वाली कर्कशा नारी के बिगड़े हुए स्वभाव का कारण बचपन में उस पर नाना प्रकार के दमन हैं। कठोर व्यवहार भी विकसित होकर गुप्त भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेता है। जो नारी या पुरुष बच्चों को घृणा करता है, उसका कारण यह है कि उसमें मातृत्व या पितृत्व के सहज स्वाभाविक भाव पनपने नहीं पाये हैं। अनेक पाश्चात्य अविवाहित नारियाँ पालतू कुत्तों तथा बिल्लियों को अपने पास रखती हैं, उनका प्रेम से चुम्बन करती हैं और अपने मातृत्व के सहज वात्सल्य का माधुर्य लूटती हैं। जो कोमल स्नेह नारी की प्राकृतिक सम्पदा है जिससे मानव शिशु पलता - पनपता है, वह कुत्ते बिल्लियों पर न्यौछावर कर के तृप्त किया जाता है। वात्सल्य और प्रेम की इन भावनाओं को निकालने से पाश्चात्य नारियाँ कृत्रिम मातृत्व के सुख का अनुभव करती हैं तथा मन में आह्लादित रहती हैं।

जिन पुरुषों तथा नारियों में इस प्रकार की अन्य अनेक इच्छाएँ कुँठित पड़ी हैं, वे समाज के भय से दलित होकर मन में कुण्ठा उत्पन्न कर सकती हैं। महत्वाकाँक्षा, प्रसिद्धि, महत्ता आदि न मिलने से मनुष्य चोर, डाकू या शैतान बन सकता है। नारियों की सेक्स भावना अतृप्त रहने से उनमें हिस्टीरिया, प्रमाद, चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकते हैं। अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक स्वस्थ स्त्री पुरुष का अवरुद्ध भावनाओं को निकालने के मार्ग ढूँढ़िये। ऐसी नारियाँ समाज सेवा में तन मन लगा कर अपने हृदय का भार हलका कर सकती हैं अथवा यतीम खाने के अनाथ बच्चों की देख रेख, प्यार, सेवा, पालन, पोषण, सेवा, सुश्रूषा कर मातृत्व की सहज वृत्ति की तृप्ति कर सकती हैं। उन्हें चाहिए कि वे गरीबों की बस्तियों की ओर निकल जाया करें। वहाँ के अर्द्धनग्न और भूखे बच्चों की देख रेख किया करें। उन्हें स्नान करायें और स्वच्छ वस्त्र धारण करायें, उनके साथ खेलें, गायें, बातचीत करें। इस प्रेम से गुप्त भावनाओं को निकालने का स्वस्थ मार्ग मिलता है जो मानसिक स्वास्थ्य और सुख के लिए अमृत तुल्य है। आपके मन की कोई भी भावना, यदि अतृप्त है तो मानसिक संस्थान में भावना ग्रन्थि (काम्लेक्त) उत्पन्न करेंगी और नाना मनोविकारों में प्रस्फुटित होंगी। वह हमारे गुप्त प्रदेश में बाहर निकलने और तृप्ति प्राप्त करने के अवसर देखा करती हैं। जो उसे निर्दयता से कुचल डालते हैं, वे मानसिक रोगों के शिकार बनते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मार्च

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👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (भाग 2)

साहस रहित मनुष्य का वैराग्य, असफलता जन्य विरक्ति और निराशा से उपजी हुई आत्म-ग्लानि बड़ी भयंकर होती है। इससे मनुष्य की अन्तरात्मा कुचल जाती है।

ऐसे असात्विक वैराग्य का मुख्य करण मनुष्य की मनोवाँछाओं की असफलता ही है जिसके कारण अपने से तथा संसार से घृणा हो जाती है। प्रतिक्रिया स्वरूप संसार भी उससे नफरत करने लगता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की मनोदशा उस भयानक बिन्दु के पास तक पहुँच जाती है जहाँ पर वह त्रास से त्राण पाने के लिए आत्म-हत्या जैसे जघन्य पाप की ओर तक प्रवृत्त होने लगता है।

जो भी अधिक इच्छाएं रखेगा बहुत प्रकार की कामनाएँ करेगा उसका ऐसी स्थिति में पहुँच जाना स्वाभाविक ही है। किसी मनुष्य की सभी मनोकामनाएं सदा पूरी नहीं होती। वह हो भी नहीं सकतीं। मनुष्य की वांछाएं इतनी अधिक होती हैं कि यदि संसार के समस्त साधन लगा दिये जायें, तब भी वे पूरी न होंगी।

ऐसा नहीं है कि मनुष्यों की इच्छायें पूर्ण नहीं होती हों, किन्तु इच्छायें उसी मनुष्य की पूर्ण होती हैं जो उनको सीमित एवं नियंत्रित रखता है। जिसकी आकाँक्षायें अनियंत्रित हैं जिनका कोई ओर-छोर ही नहीं है उसकी कोई भी महत्वाकाँक्षा पूर्ण होने में सन्देह रहता है। बहुधा अनन्त आकाँक्षाओं वाले व्यक्ति को घोरतम निराशा का ही सामना करना पड़ता है।

इच्छाओं के ऐसे दुष्परिणाम देखकर ही भारतीय मनीषियों ने इच्छाओं को त्याज्य बतलाया है। उन्होंने अच्छी प्रकार इस सत्य को अनुभव कर लिया था कि जो इच्छाओं के प्रति त्याग भावना नहीं रखता उसकी इच्छायें धीरे-धीरे एक से दो और दो से चार होती हुई शीघ्र ही बढ़ती चली जाती हैं और फिर वे न तो नियंत्रण में आ पाती हैं न पूरी हो पाती हैं। फलस्वरूप मनुष्य को घोर निराशा की स्थिति में पहुँचा देती हैं। अतएव ऋषि मुनियों ने हृदय को पूर्ण रूप से निष्काम रखने का ही आदेश दिया है।

इस इच्छा त्याग का गलत अर्थ लगाकर लोग यह कह उठते हैं कि जिसमें कोई इच्छा नहीं होगी, वह कोई काम ही न करेगा और यदि एक दिन संसार का हर मनुष्य इच्छा रहित निष्काम हो जाये तो सृष्टि की सारी गति-विधि ही नष्ट हो जाये और यह चौपट हो जाये।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

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👉 उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है। (भाग 1)

वर्तमान समय में अपने को धार्मिक कहने वाले व्यक्ति प्रायः यह मत प्रकट किया करते हैं कि संसार में धर्म ही सर्वोपरि है, इसलिये जीवन से सम्बन्ध रखने वाले आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक आदि विषयों को गौण समझना चाहिये, और उनका निर्णय धर्म को प्रमुख स्थान देकर ही करना चाहिये। यह बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है, पर कार्य रूप में इसका पालन संभव नहीं होता। क्योंकि धर्म राजनीति, विज्ञान आदि सभी मानव-प्रकृति के अंग हैं और उनका आधार “सत्य” पर है। जिस चीज का आधार सत्य के बजाय असत्य पर होगा, वह न तो कल्याणकारी हो सकती है और न स्थायी। इसलिये जो लोग अर्थ और राजनीति, विज्ञान आदि की उपेक्षा करके धर्म को ही प्रधानता देते हैं, वे प्रायः पाखंडी और ढोंगी हो जाते हैं, उनके कहने और करने में ऐक्य का भाव नहीं पाया जाता। वे मुँह से धर्म के लिये गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने पर भी जहाँ अपना स्वार्थ होता है वहाँ सर्वथा विपरीत मार्ग से चलते हैं और इस प्रकार संसार के अन्य लोगों को भी धर्म-विमुख करने में सहायक बनते हैं।

प्राचीनकाल में मनुष्य जीवन में इतना अधिक विरोध-भाव नहीं पाया जाता था। इसका खास कारण यह था कि उस समय विज्ञान की इतनी प्रगति नहीं हुई थी, और जो कुछ हुई थी वह साधारण जनता में वर्तमान समय की भाँति प्रचारित नहीं की गई थी। इसलिये धर्म और दर्शन के सिद्धान्तों के अनुसार ही राज्य और समाज के नियम भी निश्चित किये गये थे। इससे लोगों के व्यवहार और सिद्धान्तों में इतना परस्पर विरोधी-भाव उत्पन्न नहीं होता था। अब विज्ञान का विकास बहुत अधिक हो गया है और उसे सर्वसाधारण की शिक्षा का एक प्रमुख अंग बना दिया गया है, इससे परस्पर विरोधिता का भाव अकल्पित रूप से बढ़ गया है।

इससे भी अधिक विचारणीय दशा धर्म और राजनीति के सम्बन्ध में दिखलाई पड़ती है। इसका बहुत स्पष्ट उदाहरण देखना हो तो वर्तमान ईसाई राष्ट्रों पर निगाह डालना चाहिये। कहाँ तो ईसा का पूर्ण क्षमा-भाव रखने का उपदेश, और कहाँ आज कल के ईसाई कहलाने वाले शासकों की कूट नीति, हथियारों की प्रतिद्वंदिता और करोड़ों व्यक्तियों का संहार करने वाले महासमरों का आयोजन। ये ईसाई जिस प्रकार अपने व्यापारिक लाभ को अधिकाधिक बढ़ाने के लिये युद्ध-कला की दृष्टि से निर्बल राष्ट्रों का शोषण करते हैं और बराबरी वाले राष्ट्रों को युद्ध की भीषणता द्वारा नष्ट करने के उपाय करते हैं- ये दोनों बातें ईसा के उपदेशों के सर्वथा विपरीत हैं। पर ईसा के इन्हीं उपदेशों को बाईबल में प्रतिदिन पढ़ते और स्कूलों में सर्वत्र उनकी शिक्षा देते हुये ये लोग किस हृदय से लाखों करोड़ों लोगों के संहार की योजना बनाते रहते हैं, यह समझ में नहीं आता। एक ओर तो ये लोग गिरिजाघरों के लिये करोड़ों रुपए खर्च करते रहते हैं और बाईबल का संसार के कोने-काने में प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, और दूसरी ओर वे ही लोग घातक से घातक अस्त्र तैयार करके अन्य देशों के बड़े-बड़े नगरों को दो चार मिनट के भीतर ही मटियामेट कर डालते हैं। इस प्रकार का कार्य एक बड़ा मिथ्याचार है और उसके फल से ईसाई सभ्यता का भवन ढहे बिना नहीं रह सकता।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 30 April 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 April 2026


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‼️ आत्मबोध चिन्तन—तत्वबोध मनन ‼️

“हर दिन नया जन्म, हर रात नयी मौत” की मान्यता लेकर जीवनक्रम बनाकर चला जाए तो वर्तमान स्तर से क्रमशः ऊँचे उठते चलना सरल पड़ेगा। मस्तिष्क और शरीर की हलचलें अन्तःकरण में जड़ जमाकर बैठने वाली आस्थाओं की प्रेरणा पर अवलंबित रहती हैं। आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य इस संस्थान को प्रभावित एवं परिष्कृत करना ही होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में वह साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नये जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवन्त बनाया जाता है।

प्रातः बिस्तर पर जब आँख खुलती है तो कुछ समय आलस को दूर करके शैया से नीचे उतरने में लग जाता है। प्रस्तुत उपासना के लिए यही सर्वोत्तम समय है। मुख से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पर यह मान्यता−चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमाना चाहिए कि “आज का एक दिन एक पूरे जीवन की तरह है; इसका श्रेष्ठतम, सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक भी क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाना चाहिए।” सोचा जाना चाहिए कि “ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं; वरन् विशुद्ध अमानत है। जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति−नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने—स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पूरा होता है जब ईश्वर की इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उपलब्ध जीवन सम्पदा का उपयोग किया जाय। उपयोग के लिए यह सुर−दुर्लभ अवसर मिला है। यह योजनाबद्ध सदुपयोग करने में ईश्वर की प्रसन्नता और जीवन की सार्थकता है।”

मंत्र जाप की तरह इन शब्दों को दुहराने की जरूरत नहीं है वरन् अत्यंत गम्भीरतापूर्वक इस तथ्य को हृदयंगम किया जाना चाहिए। कल्पना चित्र सिनेमा फिल्म की तरह स्पष्ट उभरने चाहिएँ और उनके साथ इतनी गहरी आस्था का पुट देना चाहिए कि यह चिन्तन, वस्तु स्थिति बनकर मस्तिष्क को पूरी तरह आच्छादित कर ले।

अमृत सन्देश:- हर सुबह नया जन्म हर रात नई मौत : संध्या वंदन, https://youtu.be/sdkyVwe0pnk?si=GN0GZYPcYQlkHxv1

*शौच जाने की आवश्यकता अनुभव हो तो विलम्ब नहीं करना चाहिए और शय्या त्याग कर नित्य कर्म में लग जाना चाहिए। थोड़ी गुंजाइश हो तो उठने से लेकर सोने के समय तक की दिन−चर्या इसी समय बना लेनी चाहिए। यों नित्य कर्म करते हुए भी दिन भर का समय विभाजन कर लेना कुछ कठिन नहीं है। फुर्ती और चुस्ती से काम निपटाये जायं तो कम समय में अधिक काम हो सकता है। सुस्ती और उदासी में ही समय का तो भारी अपव्यय होता है, योजनाबद्ध दिन−चर्या बनाई जाय और उसका मुस्तैदी से पालन किया जाय तो ढेरों समय बच सकता है। एक काम के साथ दो काम हो सकते हैं। जैसे आजीविका उपार्जन के बीच खाली समय में स्वाध्याय तथा मित्रों में परामर्श हो सकता है। 
परिवार, व्यवस्था में मनोरंजन का पुट रह सकता है। निद्रा, नित्य कर्म, आजीविका उपार्जन, स्वाध्याय, उपासना, परिवार व्यवस्था, लोक−मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार कितना समय देगा यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें जिनमें आत्मकल्याण परिवार निर्माण एवं लोक−मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रिया−कलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाय। दुष्प्रवृत्तियों को दुर्भावनाओं को स्थान न मिलने दिया जाय। जहाँ भी जब भी गड़बड़ दिखाई पड़े तब वहीं उसकी रोकथाम की जाय और गिरते कदमों को संभाल लिया जाय। समय, श्रम, चिन्तन एवं धन का तनिक−सा अंश भी अवाँछनीय प्रयोजन में नष्ट न होने दिया जाये इन चारों ही सम्पदाओं का एक−एक कण सदुपयोग में लगता रहे, इस तथ्य पर तीखी दृष्टि रखी जाय, भूलों को तत्काल सुधारते रहा जाय तो उस दिन के —उस जीवन को संतोषजनक रीति से जिया जा सकता है।*

जल्दी सोने और जल्दी उठने का नियम जीवन साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनाना ही चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त का समय अमृतोपम है, उस समय किया गया हर कार्य बहुत ही सफलतापूर्वक संपन्न होता है। अस्तु जो भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य प्रतीत होता हो उसे उसी समय में करना चाहिए। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए सम्भव है जो रात्रि को जल्दी सोते हैं। इस मार्ग में जो अड़चने हों उन्हें बुद्धिमतापूर्वक हल करना चाहिए; किन्तु जल्दी सोने और जल्दी उठने की परम्परा तो अपने लिए ही नहीं पूरे परिवार के लिए बना ही लेनी चाहिए।

रात्रि को सोते समय वैराग्य एवं संन्यास जैसी स्थिति बनानी चाहिए। बिस्तर पर जाते ही यह सोचना चाहिए कि निद्रा काल एक प्रकार की मृत्यु विश्राम है। आज का नाटक समाप्त कल दूसरा खेल खेलना है। परिवार ईश्वर का उद्यान है उसमें अपने को कर्तव्य−निष्ठ माली की भूमिका निभानी थी। शरीर, मन, ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा करने के लिए मिले जीवन रथ के दो पहिये हैं, इन्हें सही राह पर चलाना था। धन, प्रभाव, पद यह विशुद्ध धरोहर है उन्हें सत्प्रयोजनों में ही लगाना था। देखना चाहिए कि वैसा ही हुआ या नहीं? जहाँ गड़बड़ी हुई दिखाई दे वहाँ पश्चाताप करना चाहिए और अगले दिन वैसी भूल न होने देने में कड़ी सतर्कता बरतने की अपने आपको चेतावनी देनी चाहिए।

संन्यासी अपना सब कुछ ईश्वर अर्पण करके परमार्थ प्रयोजन में लगता है। सोते समय साधक की वैसी ही मनःस्थिति होनी चाहिए। मिली हुई अमानतें और सौंपी हुई जिम्मेदारियाँ आज ईमानदारी के साथ संभाली गईं। यदि कल वे फिर मिलीं तो फिर उन्हें ईश्वरीय आदेश मान कर संभाला जायगा। अपना स्वामित्व किसी भी व्यक्ति या पदार्थ पर नहीं। यहाँ जो कुछ है सो सब ईश्वर का है। अपना तो केवल कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व भर है। उसे पूरी ईमानदारी और पूरी तत्परता से निवाहते भर रहना अपने लिये पर्याप्त है। परिणाम क्या होते हैं, क्या नहीं—यह परिस्थितियों पर निर्भर है अस्तु सफलता असफलता की चिन्ता न करते हुए हमें आदर्शवादी कर्तव्य परायणता अपनाये रहने मात्र में पूरा−पूरा संतोष अनुभव करना चाहिए।

सोते समय ईश्वर की अमानतें ईश्वर को सौंपने और स्वयं खाली हाथ प्रसन्न चित्त विदा होने की—निद्रा देवी की गोद में जाने की बात सोचनी चाहिए। हलके मन से शाँति पूर्वक गहरी नींद में सो जाना चाहिए। चिन्ता, आशंका, खीज, क्रोध जैसी किसी भी उद्विग्नता को मन पर लाद कर नहीं सोना चाहिए। यह प्रयास शाँत निद्रा लाने की दृष्टि से भी उपयोगी है। साथ ही आत्म-परिष्कार की दृष्टि से भी अति−महत्वपूर्ण है।

मृत्यु को भूलने से ही जीवन संपदा को निरर्थक कामों में गँवाते रहने की चूक होती है, दुष्कर्म बन पड़ते हैं और वासना तृष्णा अहंता की क्षुद्रताओं में समय गुजरता है। यदि यह ध्यान बना रहेगा कि मृत्यु का निमंत्रण कभी भी सामने आ सकता है तो यह ध्यान बना रहेगा कि इस महान अवसर का सही उपयोग किया जाय और पूरा लाभ उठाया जाय। निद्रा की तुलना मृत्यु से करते रहने पर मौत का भय मन से निकल जाता है और अलभ्य अवसर के सदुपयोग की बात चित्त पर छाई रहती है।

प्रातः उठते समय नये दिन की मान्यता—जीवनोद्देश्य की स्पष्टता तथा सुव्यवस्थित दिनचर्या बनाने का कार्य संपन्न करना चाहिए। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिन्तन, आत्म, निरीक्षण, पश्चाताप और कल के लिए सतर्कता—वैरागी एवं संन्यासी जैसी मालिकी त्यागने की हलकी फुलकी मनः स्थिति लेकर शयन किया जाय। दिन भर हर घड़ी चुस्ती फुर्ती मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ प्रस्तुत कार्यों को निपटाया जाय। भीतर दुर्भावनाओं और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों के उभरने का अवसर आते ही उनसे जूझ पड़ा जाय और निरस्त करके ही दम लिया जाय। यह है वह जीवन साधना जिसमें चौबीसों घन्टे निमग्न रह कर और इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास आनन्द और मुक्ति जैसे आनन्द का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1976 जनवरी

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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (भाग 1)

“मनुष्य कुछ भी नहीं है, वह एक चलता फिरता धूल-पिण्ड है, उसकी शक्तियाँ सीमित हैं। वह नियति के हाथ की कठपुतली है, भाग्य का खिलौना और हर समय काल का कवल है।”

इस प्रकार के निषेधात्मक एवं निराशापूर्ण विचार रखने वाले निःसन्देह धूल-पिंड भाग्य की कठपुतली और जीवित अवस्था में भी मृतक ही होते हैं। जो कायर और निराशावादी है वह अभागा ही है। जहाँ संसार में लोग कंधे से कंधा भिड़ाकर उन्नति और विकास के लिये निरंतर संघर्ष कर रहे हैं, वहाँ निराशावादी विषाद का रोग पाले हुए दुनिया के एक कोने में पड़े हुए मक्खियाँ मारा करते हैं। समाज की निरपेक्षता तथा संसार की नश्वरता को कोसा करते हैं। मनुष्य की इस दशा को दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जायेगा।

मनुष्य-योनि में आकर जिसने जीवन में कोई विशेष कार्य नहीं किया, किसी के कुछ काम नहीं आया, उसने मनुष्य शरीर देने वाले उस परमात्मा को लज्जित कर दिया। अपने में अनन्त शक्ति होने पर भी दीनतापूर्ण जीवन बिताना, दयनीयता को अंगीकार करना अपने साथ घोर अन्याय करना है। मनुष्य जीवन रोने कलपने के लिए नहीं, हँसते मुस्कराते हुए अपना तथा दूसरों का उत्कर्ष करने के लिए है।

मनुष्य जीवन के लिए निराशा अस्वाभाविक है। यह एक प्रकार का मानसिक रोग है जो मनुष्य को हीन विचारों, जीवन में आई कठिनाइयों और असफलता के कारण लग जाता है। इच्छाओं की पूर्ति न होने, मनचाही परिस्थितियाँ न पाने से मनुष्य में संसार के प्रति, अपने प्रति तथा समाज के प्रति घृणा हो जाती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का साहस टूट जाता है और वह निराश होकर बैठ जाता है। जीवन के प्रति उसका कोई अनुराग नहीं रह जाता।

निराशाग्रस्त मनुष्य दिन-रात अपनी इच्छाओं कामनाओं और वाँछाओं की आपूर्ति पर आँसू बहाता हुआ उनका काल्पनिक चिन्तन करता हुआ तड़पा करता है। एक कुढ़न, एक त्रस्तता एक वेदना हर समय उसके मनों-मन्दिर को जलाया करती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का अपने प्रति एक क्षुद्र भाव बन जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। उसमें कोई ऐसी क्षमता नहीं है, जिसके बल पर वह अपने स्वप्नों को पूरा कर सके, सुख और शान्ति पा सके।

*.....क्रमशः जारी*
✍️ *परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य* 
📖 *अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

👉 ईश्वर है या नहीं? (अंतिम भाग )

प्राणियों के शरीर में खाद्य पदार्थों को रक्त माँस के रूप में परिणत करते रहने वाली पाचन-प्रणाली ऐसी आश्चर्यजनक है कि उसकी रासायनिक क्षमता देखते ही बनती है। रोगों की निरोधक शक्ति स्वयं ही बीमारियों से लड़ती और रोग-मुक्ति का साधन बनती है। चिकित्सकों से उपचारों द्वारा उसे थोड़ी सहायता ही मिलती है। इस प्रक्रिया की आश्चर्यजनक शक्ति को देखते हुए वैज्ञानिकों को दांतों तले उँगली दबाकर रह जाना पड़ता है। शरीर में लगा हुआ एक- एक कल पुर्जा इतना संवेदनशील और अद्भुत कारीगरी से भरा हुआ है कि उसे अपने आप बना हुआ, अपने आप काम करने वाला नहीं माना जा सकता।

प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश की प्रक्रिया में सन्तुलन रहना एक ऐसा तथ्य है, जिसे किसी विचारवान् सत्ता का ही कार्य कहा जा सकता है। विभिन्न प्राणी अपनी सन्तानोत्पत्ति बड़ी तेजी से करते हैं। मनुष्य चार-छः बच्चे तो साधारणतः पैदा कर ही लेता है। सुअर और कुत्ते तो अपने जीवन काल में सौ-पचास बच्चे पैदा करते हैं। मक्खी,मच्छर, मछली, चींटी, दीमक आदि तो कई-कई सौ अण्डे देती है। मुर्गी को ही देखिए वह अपने जीवन में कई-सौ अण्डे देती होगी। यह उत्पादन-क्रम विश्व के लिए एक संकट सिद्ध हो सकता है। यदि एक भी प्राणी की यह वंश-वृत्ति निर्बाध गति से चले तो उसके बच्चे ही इस सारी धरती पर कुछ ही वर्षों में छा जावें और अन्य प्राणियों को खड़े रहने के लिए भी जगह न बचे। पर कोई सूक्ष्म सत्ता इस वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए रोग, युद्ध, दुर्भिक्ष, अभाव आदि पैदा करती रहती है और वे सीमित संख्या में उतने ही बने रहते हैं, जितने के लिए धरती पर गुंजाइश है। यदि ऐसा न होता तो करोड़ों वर्षों से चले आ रहे जीवधारी अब तक इतने हो गये होते कि उन्हें अन्य लोक में भेजने के अतिरिक्त और कोई मार्ग न रहता।

जिस ऋतु में जो रोग होता है, उसको शमन करने वाली जड़ी-बूटियाँ भी उसी ऋतु में होती हैं। फल, शाक और अन्नों के बारे में भी यही बात है। ऋतु की आवश्यकता के अनुसार ही पृथ्वी में से वनस्पति और फल-फूल पैदा होते हैं। जहाँ के निवासियों को वहीं की जलवायु और अन्न, शाक, औषधि अनुकूल पड़ती है। यह कार्य किसी विचारवान शक्ति का ही हो सकता है।

नियन्त्रण और सन्तुलन की यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया अपने आप होती रहे, ऐसा संभव नहीं। इसके पीछे कोई विचारशील चेतन सत्ता ही काम करती है। उस ज्ञानवान् चित्त-शक्ति को ईश्वर नाम दिया जाता है। उसके अस्तित्व से इन्कार करना, दिन रहते सूरज को न मानने जैसा दुराग्रह ही कहा जायेगा।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 April 2026


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