व्यवहारिक जीवन में भी मौन अनर्थों को पैदा होने से रोकता है। मौन कभी भी दूसरों को हानि नहीं पहुँचा सकता। समाज में विग्रह, लड़ाई, झगड़े, कलह, आदि को शुरुआत वाणी से ही होती है। एक दूसरे को भला बुरा कहने पर ही लोग उत्तेजित होकर अनर्थ करते हैं। लेकिन जब मौन का अवलम्बन लिया जाय, तो बुरे शब्द मुख से नहीं निकलेंगे और विग्रह की स्थिति ही पैदा होगी। इतना ही नहीं कोई व्यक्ति लड़ना चाहे, चलाकर छेड़छाड़ करे, झगड़ने लगे, ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष यदि मौन का अवलम्बन ले ले तो झगड़ा कभी हो ही नहीं सकता।
मौन की स्थिति में ही हम दूसरों को अधिक सुन सकते हैं और अपने ज्ञानकोष को बढ़ा सकते हैं। लोगों को समझने, उनका अध्ययन करने के लिए भी मौन की आवश्यकता होती है। एक कहावत के अनुसार- “मौन बुद्धिमानी है और अच्छे मित्र बनाता है।” सचमुच जो वाचाल होते है उनसे भले आदमी दूर रहने की ही प्रयत्न करते हैं। मौन की स्थिति में हम अपने अज्ञान, मूर्खता फूहड़पन को भी प्रकाशित होने से रोक सकते हैं। भर्तृहरि ने कहा है- “विधाता ने मौन अर्थात् चुप रहना अज्ञानता का ढक्कन बनाया है। ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों के लिए मौन ही सर्वोत्तम आभूषण और रक्षक कवच है।” अज्ञानी आदमी यदि वाचाल होगा तो जल्दी ही अपनी मूर्खता प्रकट कर देगा लेकिन मौन का अवलंबन लेकर वह अज्ञान-प्रदर्शन से अपने आपको रोक सकता है। जिस तरह गन्दगी के दुष्प्रभाव और बदबू को दूर करने के लिये उसे ढक देना आवश्यक है, उसी तरह अज्ञान, मूर्खता, फूहड़पन को छिपाये रखने के लिए मौन अपेक्षित है।
शास्त्रों में तीन तरह के पाप बताए हैं। वाणी, कर्म और मन से किए गये दुष्कृत्य ही ये त्रिपाप हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मौन के अवलम्बन से हम वाणीकृत पापों से तो निश्चित रूप से बच ही सकते हैं। किसी को अप्रिय, कठोर वचन बोलना, गाली देना, झूठ बोलना, चुगलखोरी, आलोचना, आदि वाचिक पापों से मौन ही हमें बचा सकता है। इस तरह मौन का अवलम्बन लेने से हम जीवन में किए जाने वाले एक तिहाई पापों से बच जाते हैं।
हम जीवन में जितना अनर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं, यदि उतने समय में कुछ काम किया जाय, तो उतने से एक नया हिमालय पहाड़ बन जाय। शब्दों की इस अथाह शक्ति को व्यर्थ ही नष्टकर क्या हम दीन नहीं बन रहे? यदि इन शब्दों का उपयोग हम किसी को सांत्वना देने में भगवद् भजन, प्रभु नाम स्मरण, संगीत, जप कीर्तन आदि में, करें तो हमारा और समाज का कितना भला हो? साथ ही हम वाचालता से उत्पन्न दोष, जिनसे लड़ाई, झगड़े, क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष आदि का उदय होता है, उनसे बच जायें।
वाचालता, व्यर्थ प्रलाप, चाहे वह किसी प्रेरणा से क्यों न हो हानिकर है। इस सम्बन्ध में एक्रेन रिवले से लिखा है “अण्डे देने के बाद मुर्गी यह मूर्खता करती है कि वह चहचहाने लगती है। उसकी चहचहाहट सुन कर डोमकौवा आ जाता है, वह उसके अण्डे भी छीन लेता है तथा उन वस्तुओं को भी खा जाता है, जो उसने अपनी भावी सन्तान के लिए रखी थीं।” कहावत है “वह कुत्ता अच्छा नहीं होता जो ज्यादा भौंकता है। इसी तरह वाचाल व्यक्ति को भला नहीं कहा जा सकता।”
.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965
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