शनिवार, 20 जून 2026

👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (भाग 1)

बुराई, भ्रष्टाचार, अपराधों के सम्बन्ध में हमारी शिकायतें दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस सम्बन्ध में टीका टिप्पणी करते हैं, तरह-तरह की आलोचनायें करते हैं। कभी सरकार को दोष देते हैं तो कभी प्रशासन व्यवस्था की छीछालेदार करते हैं। कभी किन्हीं व्यक्तियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह की शिकायतें एक सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च-स्थिति के लोगों तक से भी सुनी जा सकती हैं। इनमें बहुत कुछ ठीक भी हो सकती हैं। लेकिन कभी हमने यह भी सोचा है कि इनके लिए हम स्वयं कितने जिम्मेदार हैं। हम भूल जाते है कि बहुत कुछ अपराध, बुराइयाँ हमारे व्यवहारिक जीवन में अपने ही प्रयत्नों का परिणाम हैं। 

हमारे अनीतिपूर्ण जीवन, सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उपेक्षा, सच्चाई के प्रति आँख मूँद कर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाने की प्रवृत्ति से ही बुराइयों को प्रोत्साहन मिलता है। यदि हम इनके लिए स्वयं को उत्तरदायी मानकर अपना सुधार करने में लगें, अपने कर्तव्यों को समझने लगें तो कोई सन्देह नहीं कि बुराइयाँ घटने लगें और एक दिन समाप्त भी हो जायें।

बुराइयों को मिटाने के लिए हमारा सर्व-प्रथम कर्तव्य है-हम दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करें, जिसे हम स्वयं अपने लिए न चाहते हों। भगवान मनु ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए अपनी प्रजा को बताया था- “आत्मनः प्रतिकूलिति परेषाँ न समाचरेत्” जिस बात को तुम अपने लिए नहीं चाहते, उसे दूसरों के लिए मत करो।

हम नहीं चाहते कि कोई हमारा अपमान करे तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम किसी का अपमान न करें। इसी तरह विश्वासघात, छल, कपट, धोखादेही ही, उत्पीड़न, शोषण आदि बुराइयों का शिकार हम स्वयं नहीं होना चाहते तो हमारा भी धर्म है कि हम दूसरों के साथ ऐसा न करें। लेकिन खेद है कि जब कोई हमारे ऊपर अत्याचार करता है, तो हम बुराई, की सिद्धान्तों की दुहाई देते हैं और बचाव के लिए गुहार मचाते हैं। किन्तु जब हम स्वयं दूसरों के साथ ऐसा करते हैं, तब किसी के कुछ कहने सुनने पर भी हमारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। और यही कारण है कि बुराइयाँ दिनों दिन बढ़ती जाती है। हम उनकी शिकायतें करने, आलोचना करने में ही अपना काम पूरा समझ लेते हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 1)

लोगों की ऐसी मान्यता है कि इस धरती से अन्यत्र कहीं ऊपर आसमान में स्वर्ग अवस्थित है। इसके बारे में उन्हें तरह-तरह की कल्पनायें करते देखा जाता है। कहते हैं वहाँ सभी प्रकार के शरीर-सुख मिलते हैं। इस स्वर्ग की प्राप्ति के लिए लोग तरह-तरह के कर्मकाण्ड करते रहते हैं।

ऊपर कोई स्वर्ग है या नहीं, इस पचड़े में पड़ने की अपेक्षा यह देखना अधिक अच्छा है कि उस स्वर्ग जैसी परिस्थितियों को अपनी इस धरती पर भी उतारा जाना सम्भव है?
साधनों की दृष्टि से इस धरती में किसी प्रकार का अभाव नहीं है। रुपया-पैसा,धन-जायदाद, वस्त्र-आभूषण, फल-फूल, मेवा-मिष्ठान आदि सभी सुख सामग्रियों से धरती-माता की गोद भरी पूरी है। यदि यहाँ कुछ कमी हो सकती है तो वह भावनात्मक न्यूनता ही होती है। सुख के साधनों के साथ स्नेह, प्रेम और आत्मीयतापूर्ण भावनाओं के सम्मिश्रण को ही स्वर्ग कहा जा सकता है।

यह स्वर्ग आपके घर में ही मौजूद है, आप भले ही उसे न देख पाते हों। यह स्वर्ग-दाम्पत्य-जीवन का स्वर्ग, किसी ऊपर वाले स्वर्ग से कम सरस, सुखद और सुरुचिपूर्ण नहीं है। जिसने इसका रसास्वादन कर लिया वह अन्यत्र स्वर्ग की क्यों कामना करेगा?

पति और पत्नी का मिलन एक आध्यात्मिक मिलन होता है। दो आत्माओं का सम्मिलन इतना आनन्ददायक होता है कि वे दोनों अपने इस सुमधुर सम्बन्ध का परिपाक बनाये रखने के लिये सम्पूर्ण जीवन कठिनाइयों और मुसीबतों का खुशी-खुशी सामना करते रहते हैं। घर गृहस्थी जुटाने के लिए कितना श्रम, उद्योग और अध्यवसाय करना पड़ता है, इसे प्रत्येक सद्गृहस्थ भली प्रकार जानता है। इसी प्रकार घर के आन्तरिक मामलों की देख−रेख, बच्चों के लालन-पालन, भोजन व्यवस्था, पतियों की समुचित सेवा में बेचारी गृहणियों को कितनी दौड़-धूप करनी पड़ती है, यह किससे छुपा है। एक दूसरे के प्रति आत्म-उत्सर्ग की भावना निश्चय ही आध्यात्मिक तथ्य है। युग-युगान्तरों के संस्कारों के परिणामस्वरूप यह सुखद संयोग मिलता है। एक प्राण दो शरीरों की यह सम्मिलित इकाई जितनी प्रगाढ़ आत्मत्याग की भावनाओं से ओत-प्रोत होगी, उसी अनुपात से आपके आँगन में स्वर्ग बिखरा पड़ा होगा। उस वातावरण में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति जीवन के सच्चे सुख का रसास्वादन कर रहा होगा। जहाँ इस आत्मीयता में कमी होगी, वहाँ दुःख और दारिद्रय की परिस्थितियाँ ही दिखाई देंगी। स्वर्ग का आधार जिस प्रकार भावनात्मक परिष्कार है, उसी प्रकार कलह और कटुता के आधार पर नारकीय जीवन का सूत्रपात होता है। मनुस्मृति में कहा गया है :-

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्रवैवम्॥
स्त्रियाँ तु रोचमानायाँ सर्व तद्रोचते कुलम्।
तस्याँ त्वरोचमानायाँ सर्वमेव न रोचते॥
अर्थात् जिस कुल में पत्नी से पति और पति से पत्नी अच्छी प्रकार सन्तुष्ट रहते हैं, उसी घर में सौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते है। जहाँ उनमें कलह होता हैं। वहाँ दुर्भाग्य और दारिद्रय स्थिर रहता है। स्त्री की प्रसन्नता से घर की प्रसन्नता मुखरित रहती है। यदि वह अप्रसन्न रही तो सभी ओर अप्रसन्नता और दुःखद परिस्थितियाँ उठ पड़ती हैं।

👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 1)
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 20 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 June 2026




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शुक्रवार, 19 जून 2026

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( अंतिम भाग )

एक गिलास ठंडा पानी पीकर अपना क्रोध शाँत करने की विद्या बड़ी उत्तम है। क्रोध आये तो आप कुछ देर के लिये उस स्थान से हट जाइये किसी शीतल बगीचे में घूम आइये। एक अत्यन्त सरल उपाय यह भी है कि अपने किसी प्रियजन के पास बैठकर थोड़ी देर स्नेहपूर्ण बात करके उसकी सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयत्न कीजिए।

क्रोध का एक कारण असात्विक आहार भी होता है। “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” की कहावत सर्व विदित है। अधिक तीखा, कडुआ, कसैला, बासी-बुसा भोजन मानसिक विकार पैदा करता है। मिर्च-मसाले तथा खटाई खाने वाले अधिकाँश व्यक्ति क्रोधी और चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं। इसलिये जो भी आहार हम ग्रहण करें, उसमें सात्विकता का पूर्ण ध्यान बनाये रखें। भोजन करते समय बड़ी प्रसन्नता होनी चाहिये। परमात्मा का प्रसाद मान कर आहार ग्रहण करने से जैसा भी रूखा-सूखा आहार हो, वही अतीव संस्कारवान और पुष्टिदायक बन जाता है। कुढ़ते हुये भोजन करना एक बहुत बड़ा दुर्गुण है। इससे आहार का सात्विक लक्ष्य पूरा नहीं होता। वह चाहे कितना ही पुष्टि-दायक क्यों न हो, जीवन-तत्व प्राप्त न होगा।

कदाचित आपको क्रोध आता ही है तो एक और प्रयोग कीजिये। जैसे ही क्रोध आये, चुपचाप अपने कमरे में चले जाइये और एक स्वच्छ-सा शीशा लेकर उसमें अपनी आकृति देखिये। अनुभव कीजिये कि क्रोध के कारण आपका मुँह तमतमा उठा था, सो बड़ी शिथिलता आ गई। सारा सौंदर्य चला गया है। मुँह फीका पड़ गया है। अब थोड़ा जल लेकर साबुन से मुँह धो कर तौलिये से मुँह साफ कर लीजिये और फिर शीशे के सामने खड़े होइये। देखिए, आपने अपनी सुन्दरता फिर से प्राप्त करली है। अब जरा-सा मुस्कराइए। आपको प्रसन्नता मिलेगी। दुबारा जब कभी कोई घटना घटेगी तो आपको आज के सौंदर्य में जो कमी दिखाई दी थी, वह एकदम से याद आ जायेगी और आप क्रोध करने से बच जायेंगे।

मीठे शब्दों में वह शक्ति होती है जो बड़े अड़ियल तथा तीखे स्वभाव के व्यक्तियों को भी नम्र बनाती है। प्यार और पुचकार कर बात करने से क्रोधी व्यक्तियों के हृदय की कोमलता जागृत होती है। कुछ दिन उन्हें यह संस्पर्श निरन्तर मिलता रहे तो क्रोध से बचे रहने का उनका भी अभ्यास हो जाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965+

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गुरुवार, 18 जून 2026

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 2)

हार्वर्ड मेडिकल कालेज के प्रोफेसर डॉक्टर वाल्टर केनिन लिखते हैं कि “मनुष्य के दोनों गुर्दों के ऊपर चने के आकार की दो छोटी -छोटी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनमें ‘एडरेनलिन’ तत्व भरा होता है। यह खून के साथ मिलकर जब जिगर में पहुँचता है तो वहाँ जमे हुये ग्लाइकोजन को शक्कर में बदल देता है।” यह शक्कर शरीर के तमाम अंगों में पहुँच कर रगों और पुट्टों को फाड़ देता है। क्रोधी मनुष्य को कोई रोग न होते हुए भी इसी हानिकार स्थिति में होकर गुजरना पड़ता हैं।

क्रोध करने के कारणों पर यदि विचार करे तो वे बिलकुल छोटे दिखाई देते हैं। कई बार तो वे बिलकुल निराधार दिखाई पड़ते हैं। संयत मनःस्थिति के अभाव में प्रायः लोग एकाएक उत्तेजित होकर अनर्थ कर डालते हैं। कई बार यह कारण इतने छोटे होते है कि उनके कारण किये गये अपराध पर विश्वास तक नहीं होता। कानपुर का एक समाचार है कि रेलवे स्टेशन पर ननकू नामक व्यक्ति फल बेचा करता था। किसी व्यक्ति ने उससे उधार लीची माँगी पर ननकू ने इनकार कर दिया। इस पर क्षुब्ध होकर उक्त व्यक्ति ने ननकू की चाकू से हत्या कर दी। ये कारण इतने छोटे हैं कि मनुष्य थोड़ा भी अगर ध्यान दे ले, तो इन भयंकर परिणामों से बचा जा सकता है। घरों में थाली फेंकने, कपड़े फाड़ने, बच्चों को पीटने, स्त्रियों को मारने, धमकाने के हेय दृश्य जो उपस्थित हुआ करते हैं, उनमें मानव स्वभाव की छोटी छोटी गलतियाँ और भूलों के सिवाय और कुछ नहीं होता।

घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि क्रोध के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का सम्पूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें। इससे सदैव हानि ही होती है। प्रायः देखा गया है कि क्रोध का कारण जल्दबाजी है। किसी वस्तु को प्राप्त करने या इच्छापूर्ति में कुछ विलम्ब लगता है तो लोगों को क्रोध आ जाता है। इसलिये अपने स्वभाव में धैर्य और संतोष का विकास करना चाहिये।

जब कोई कार्य गलत हो जाय या कोई हानि हो जाय तो उसे समझने में जल्दबाजी न करें। गम्भीरतापूर्वक सोचें कि यह सब किस कारण से हुआ। आप निर्णय करते समय बुद्धि में पर्याप्त उदारता बनाये रखिये, इससे आपको बड़ी शाँति मिलेगी। यदि कोई दूसरा व्यक्ति आपको अपशब्द या कड़ुवे वचन कहता है, तो आप यह समझ कर कि यह व्यक्ति मूर्ख है, कुछ न बोलिये, मौन व्रत कर लीजिये। इससे आप अकारण उत्तेजित भी नहीं होंगे और कोई अयाचित घटना भी नहीं घटेगी। मन-ही मन सामने वाले की बेवकूफी पर मुस्कराते रहिये, देखिये आपके जी में जरा भी दुःख नहीं आयेगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (अंतिम भाग)

अच्छी या बुरी, जैसी भी इच्छा लेकर हम जीवन क्षेत्र में उतरते हैं, वैसी ही परिस्थितियाँ, सहयोग भी जुटते चले जाते हैं। हमारी इच्छा होती है एम॰ ए॰ पास करें तो स्कूल की शरण लेनी पड़ती है, अध्यापकों का सहचर्य प्राप्त करते हैं, पुस्तकें जुटाते हैं। तात्पर्य यह है कि इच्छाओं के अनुरूप ही साधन जुटाने की आदत मानवीय है। पर यदि यही इच्छायें अहितकर हों तो दुराचारिणी परिस्थितियाँ और बुरे लोगों का संग भी स्वाभाविक ही समझिये। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी कामना भले ही पूर्ण कर ले, पर पीछे उसे निन्दा, परिताप एवं बुरे परिणाम ही भोगने पड़ेंगे। व्यभिचारी व्यक्ति अपयश और स्वास्थ्य की खराबी से बचा रहे, यह असम्भव है। चोर को अपने कुकृत्य का दण्ड न भोगना पड़े, यह हो नहीं सकता। तब आवश्यकता इस बात की होती है कि हम अच्छी कामनायें ही करें।

विशुद्ध आत्मा से की गई सदिच्छायें बड़ी बलवती होती हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं तो स्वर्गीय सुख अहर्निश आस्वादन करता ही है, साथ ही अनेकों औरों को भी सन्मार्ग की प्रेरणा देकर उन्हें भी सदाचार में प्रवृत्त कर देता है। दूसरों की भलाई करने वालों को सदैव, सर्वत्र सम्मान सुख मिलेगा ही। औरों के दुःख में हाथ बटाने वाले ही सच्चे मित्र प्राप्त करते हैं। परमार्थ की जिनकी वृत्ति होती है, उन्हें औरों की आत्मीयता से वंचित रहते कभी किसी ने न देखा होगा।

दक्षिण के महान् सन्त तिरुवल्लुवर ने लिखा है- “योगी वही है जो साँसारिक इच्छाओं को वशवर्ती करे, औरों की हित-कामना में रत हो।” यह सच ही है कि मनुष्य इस धरती पर एक महान् उद्देश्य लेकर अवतरित हुआ है। यह सुयोग उसे बार-बार नहीं मिलता। आज जो शारीरिक, मानसिक और भावनाओं की क्षमता हमें मिली है, कौन जाने अगले जन्मों में भी मिलेगी अथवा नहीं। फिर हमें सच्चे हृदय से आत्म-कल्याण की ही कामना करनी चाहिये। अपना जीवन लक्ष्य भी पूरा हो सकेगा तथा औरों के प्रति कर्तव्य पालन भी हो सकेगा।

हम स्वास्थ्य, सद्गृहस्थ, धन और यश की कामना करें, पर परमार्थ को भी भुलायें नहीं। आत्म-तुष्टि का जहाँ ध्यान रहे, वहाँ यह भी न भूलें कि इस संसार में हजारों लाखों ऐसे भी हैं, जो हमारी परिस्थितियों से कोसो पीछे पड़े अभाग्य का रोना रो रहे हैं। इनके भी हित एवं कल्याण की इच्छा करना हमारा परम धर्म है। इसके अभाव में तो वह परिस्थितियाँ भी देर तक न टिक सकेंगी, जो आज हमें मिली है। कोई धनी व्यक्ति यदि सारा धन समेट कर बैठ जाय, आस-पास के लोग भूखे मरते रहें, तो वह व्यक्ति सुरक्षा स्थिर रखे रहेगा ऐसी आशा बहुत कम करनी चाहिये।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। अपने परिवार, पड़ोस, गाँव राष्ट्र की अनेक जिम्मेदारियाँ उस पर होती हैं। हम अपनी सुख सुविधाओं की बात सोचें, पर औरों के प्रति सच्चे हृदय से कर्तव्य पालन करने की इच्छा करे तभी हमारा भला होगा। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी तभी सम्भव है, जब हम में सदिच्छायें जागृत हों, औरों के प्रति शुभ कामनाओं का विकास हो।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 June 2026


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बुधवार, 17 जून 2026

👉 क्रोध-एक घातक मनोविकार ( भाग 1)

मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लोभ जैसे दुर्गुणों को स्वच्छन्दता देने से मानसिक विष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो जाता है। इससे बुद्धि, ज्ञान, स्वास्थ्य आदि पर विषैला प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति दिन-दिन हीन परिस्थितियों की ओर गिरता चला जाता है। किन्तु क्रोध तो इन समस्त दुर्गुणों का सम्राट है। इससे होने वाले तात्कालिक परिणाम भी इतने भयंकर होते हैं कि उन्हें देखकर जी काँप उठता है। ऐसी घटनायें आये दिन आँखों के आगे से गुजरा करती हैं, जिनमें मनुष्य छोटे से कारण से उत्तेजित होकर वीभत्स दृश्य उपस्थित कर देते हैं।

महर्षि बाल्मीक ने लिखा है :-
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधोऽमित्र मुखो रिपुः।
क्रोधोऽसि महातीक्ष्णः सर्वक्रोधोऽपकर्षति॥
तपते यतते चैवं दानं प्रयच्छति।
क्रोधेनं सर्व हरति तस्मात् क्रोध विवर्जंयेत्॥
(उत्तरकाँड 71)

अर्थात्- क्रोध प्राण हरण करने वाला शत्रु है, क्रोध अमित्र मुखधारी बेरी है, क्रोध एक तीक्ष्ण तलवार है, क्रोध सब प्रकार से गिरा देने वाला है, क्रोध तप, संयम और दान का अपहरण कर लेता है, अतएव क्रोध से सदैव बचना चाहिये।

क्रोध का मन के दूसरे विकारों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। उत्तेजना और आवेश आते ही सत्य-असत्य का विवेक मारा जाता है, जिससे लड़ाई, झगड़ा, कटुता, मारपीट, हत्याओं की घटनायें तक हो जाती है, किसी व्यक्ति के प्रति निरन्तर क्रोध बनाये रखने से स्थायी कटुता का भाव पैदा हो जाता है। जिससे दोषदर्शन, उत्पीड़न और अकारण औरों का नुकसान करते रहने की आदत पड़ जाती है। इस प्रकार एक ही विकार से अनेकों विकारों की शाखा-प्रशाखायें फूट पड़ती हैं। अस्थिरता, क्षणिकता, बुद्धि का कुण्ठित होना, उद्विग्नता, अहंकार असहिष्णुता आदि दुर्गुण क्रोधी मनुष्य में अपने आप ही आ जाते हैं। चिड़चिड़ापन भी क्रोध का ही एक छोटा रूप है। यह प्रायः अशक्त पुरुषों का मनोविकार है, इसलिये एक आवेश में ही वह समाप्त भी हो जाता है। किन्तु क्रोध मन को एक उत्तेजित और खिंची हुई अवस्था में रख देता है। जिससे रक्त में गर्मी पैदा होती है। इससे उसके संचालन में तेजी आती है। यह झटके तीव्रता से आते रहे तो स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। विचारों में भी प्रेम, सत्य, न्याय, दया और विवेक आदि का लोप हो जाता है। आध्यात्मिक शक्तियों के विषय में तो यह सबसे प्रबल शत्रु माना गया है।

क्रोध से शारीरिक शक्तियों का पतन हो जाता है। किसी क्रोधी व्यक्ति को देखिये, किस प्रकार उसका चेहरा तमतमा उठता है, नेत्र लाल हो जाते हैं, ओठ चलने लगते हैं। आन्तरिक अवयवों पर भी इसका दूषित प्रभाव पड़ता है। हृदय धड़कने लगता है। आँतों का पानी सूख जाता है, जिससे शरीरस्थ मल सूख कर आँतों से चिपक जाता है। इससे शरीर सूख कर काँटा हो जाता है पाचन क्रिया शिथिल पड़ जाती है। खून में एक प्रकार का विष पैदा हो जाता है, जिससे जीवन-शक्ति कमजोर पड़ जाती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 3)

इस व्यवस्था में लम्बी अवधि की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है, पर व्यक्तित्व के निखार का यही रास्ता है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पहले आप उस काम के करने की दृढ़ इच्छा मन में करलें, पीछे सारी मानसिक शक्तियों को उसमें लगा दें, तो सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है। दृढ़ इच्छा शक्ति से किये गये कार्यों को विघ्न बाधायें भी देर तक रोक नहीं पातीं। संसार में जिन लोगों ने भी बड़ी इच्छाओं की पूर्ति की, उन्होंने पहले उसकी पृष्ठभूमि को अधिक सुदृढ़ बनाया, पीछे उन कार्यों में जुट पड़े। तीव्र विरोध के बावजूद भी सिकन्दर झेलम पार कर भारत विजय दृढ़ मनस्विता के बल पर ही कर सका। शाहजहाँ की उत्कृष्ट अभिलाषा का परिणाम ताजमहल आज भी इस धरती पर विद्यमान् है।

जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी ऐसे ही महान् कार्यों की श्रेणी में आती है। दूसरों से सिद्धियों सामर्थ्यों की बात सुनकर, आवेश में आकर आत्म-साक्षात्कार की इच्छा कर लेना हर किसी के लिये आसान है। पर पीछे देर तक उस पर चलते रहना, तीव्र विरोध और अपने स्वयं के मानसिक झंझावातों को सहते हुये इच्छा पूर्ति की लम्बे समय तक प्रतीक्षा की लगन हम में बनी रहे तो परमात्मा की प्राप्ति के भागीदार बन सकना भी असम्भव न होगा।

इसके विपरीत यदि हमारी इच्छा शक्ति ही निर्बल, क्षुद्र और कमजोर बनी रही तो हमें अभीष्ट लाभ कैसे मिल सकेगा? अधूरे मन से ही कार्य करते रहे तो लाभ के स्थान पर हानि हो जाना सम्भव है। इच्छायें जब तक बुद्धि द्वारा परिमार्जित होकर संकल्प का रूप नहीं ले लेतीं, तब तक उनकी पूर्ति संदिग्ध ही बनी रहेगी। इच्छा-शक्ति यदि प्रखर न हुई तो वह लगन और तत्परता कहाँ बन पायेगी जो उसकी सिद्धि के लिये आवश्यक है।

मनुष्य इच्छायें करें, यह उचित ही नहीं आवश्यक भी है। इसके बिना प्राणि जगत निःचेष्ट एवं जड़वत् लगने लगेगा, किन्तु इसका एक विषाक्त पहलू भी है, वह है इनकी अति और अनौचित्य। मनुष्य जीवन को क्लेशदायक परिणामों की ओर ले जाने में अति और अनुचित इच्छाओं का ही प्रमुख हाथ है। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे-मनुष्य के भय और चिन्ताओं का कारण उसकी अपनी इच्छायें ही हैं। इच्छाओं की प्यास कभी पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं हो पाती। बात भी ऐसी ही है। आज जो 100 रुपये पाता है वह कल 1000 रुपये की सोचता है और यदि यह इच्छा पूरी तो गई तो दूसरे ही क्षण 1 लाख की कामना करने लग जाता है। इच्छा वह आग है जो तृप्ति की आहुति से और प्रखर हो उठती है। एक पर एक अंधाधुंध इच्छायें यदि उठती रहें तो मानव जीवन नारकीय यन्त्रणाओं से भर जाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 June 2026


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मंगलवार, 16 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (अंतिम भाग)

काम करने से प्रसन्नता, सन्तोष व शान्ति मिलती है। मानसिक या शारीरिक दोनों ही श्रम समान रूप से आवश्यक हैं। दोनों में समन्वय बना रहे तो ही काम चलेगा। किन्तु इनमें में किसी एक को प्राथमिकता देना, दूसरे को गौण मानने की बात न्याय संगत नहीं लगती। खेती का कार्य भी मानवता के विकास में उतना ही उपयोगी है, जितना आफिस के क्लर्क का कार्य। शारीरिक श्रम का महत्व कम नहीं। स्वास्थ्य का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए बुद्धि जीवियों को शारीरिक और शारीरिक श्रम करने वालों को बौद्धिक कार्य भी करने चाहिये। दोनों में तालमेल बनाये रखने से ही मनुष्य जीवन के सच्चे आनन्द की उपलब्धि सम्भव है।

लाचारी से, बेमन काम करना एक भारी दुर्गुण है। इससे सफलता का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वृद्धावस्था में नितान्त निष्क्रिय होकर बैठ जाने की नीति गलत है। ढलती उम्र में भी सक्रिय बने रहने से दुःखद परिस्थितियाँ नहीं टकराती। दार्शनिक सुकरात का कथन है-”मनुष्य की सक्रियता का चरम उत्कर्ष तीसरे प्रहर, अर्थात् जीवन के सन्ध्या काल वृद्धावस्था में होता है। इस समय तक मानसिक शक्तियाँ पूर्ण परिपक्व हो जाती है।” प्रबुद्ध ज्ञान और जीवन के लम्बे अनुभवों के आधार पर महत्वपूर्ण कार्य जीवन के अन्तिम दिनों ही होते हैं। हमारे यहाँ चतुर्थ आश्रम संन्यास का अधिक महत्व इसी दृष्टि से माना गया है। लोक सेवा का यह सब से अच्छा समय होता है।

आज की परिस्थितियों में नैतिक उत्थान की, मानवीय कल्याण की जो-योजनायें चलाई जा रही हैं, उनका पूरा किया जाना तभी सम्भव है जब लोग श्रम की सार्थकता समझें, कर्म के महत्व को पहचाने। श्रम धरती का देवता है। कर्म मनुष्य का आभूषण है। यह वह कसौटी है, जिसमें रगड़ खाकर अनेक सद्गुणों का विकास निखर आता है। श्रम के सहारे धरती से सोना पैदा करते हैं। कर्म से ही यहाँ सुख-शान्ति, समृद्धि और सफलता का अवतरण होता है। धरती में स्वर्ग की-सी परिस्थितियों का निर्माण जिन सद्गुणों से सम्भव है, उनमें से कर्मशीलता प्रमुख है। आइये हम सब मिलकर श्रम-पूर्वक निरन्तर कर्म करने की आदत डालें और व्यक्तिगत जीवन को समृद्ध एवं सामूहिक वातावरण को उल्लासमय बनाने की एक आवश्यक शर्त पूरी करें। ताकि आसमान के स्वर्ग को अपनी वसुन्धरा में उतार कर ले आयें, युग की यही माँग है, होना भी यही है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 2)

इच्छा एक भाव है, जो किसी अभाव, सुख या आत्मतुष्टि के लिये उदित होता है। इस प्रकार की इच्छाओं का सम्बन्ध भौतिक जगत से होता है। इनकी आवश्यकता या उपयोगिता न हो, सो बात नहीं। दैनिक जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन चाहिये ही। सृष्टि संचालन का क्रम बना रहे इसके लिये दाम्पत्य जीवन की उपयोगिता से कौन इनकार करेगा? पर केवल भौतिक सुखों के दाँव-फेर में हम लगे रहें तो हमारा आध्यात्मिक विकास न हो पायेगा।

तब सौमनस्यता व सौहार्दपूर्ण सदिच्छाओं की आवश्यकता दिखाई देती है। प्रेम, आत्मीयता और मैत्री की प्यास किसे नहीं होती। हर कोई दूसरों से स्नेह और सौजन्य की अपेक्षा रखता है। पर इनका प्रसार तो तभी सम्भव है, जब हम भी शुभ इच्छायें जागृत करें। दूसरों से प्रेम करें, उन्हें विश्वास दें और उनके भी सम्मान का ध्यान रखें। इन इच्छाओं के प्रगाढ़ होने से सामाजिक, नैतिक व्यवस्था सुदृढ़, सुखद होती है, पर इनके अभाव में चारों ओर शुष्कता का ही साम्राज्य छाया दिखाई देगा।

मानव जीवन गतिवान् बना रहे, इसके लिये स्व-प्रधान इच्छायें उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। पर इनके पीछे फलासक्ति की प्रबलता रही तो उसकी तृप्ति न होने पर अत्यधिक दुःखी हो जाना स्वाभाविक है। इच्छाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ भी मिल जायेंगी, ऐसी कोई व्यवस्था यहाँ नहीं। कोई लखपति बनना चाहे, पर व्यवसाय में लगाने के लिये कुछ भी पूँजी पास न हो तो इच्छा पूर्ति कैसे होगी। ऐसी स्थिति में दुःखी होना ही निश्चित है। जो भी इच्छायें करें वह पूरी ही होती रहें, यह सम्भव नहीं। इनके साथ ही आवश्यक श्रम, योग्यता एवं परिस्थितियों का भी प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक है। किसी की शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक हो और वह कलक्टर बनना चाहे, तो यह कैसे सम्भव होगा? इच्छाओं के साथ वैसी ही क्षमता भी नितान्त आवश्यक है। विचारवान् व्यक्ति सदैव ऐसी इच्छायें करते हैं, जिनकी पूर्ति के योग्य साधन व परिस्थितियाँ उनके पास होती हैं।

इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम जिन परिस्थितियों में आज हैं, उन्हीं में पड़े रहें। जितनी हमारी क्षमता है, उसी से सन्तोष कर लें, तब तो विकास की गाड़ी एक पग भी आगे न बढ़ेगी। आज जो प्राप्त है उसमें सन्तोष अनुभव करें और कल अपनी क्षमता बड़े इसके लिये प्रयत्नशील हों, तो इसे शुभ परिणिति कहा जायेगा। नैपोलियन बोनापार्ट प्रारम्भ में मामूली सिपाही था। चीन के प्रथम राष्ट्रपति सनयात सेन अपने बाल्यकाल में किसी अस्पताल के मामूली चपरासी थे। इन्होंने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये क्रमिक विकास का रास्ता चुना और अपना लक्ष्य पाने में सफल भी हुये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 June 2026


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सोमवार, 15 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (भाग 2)

मनुष्य-जीवन का सच्चा सदुपयोग उसे सत्कर्मों में लगाने से ही होता है। कुछ दिन मौज-मजा लूटने में ही उसे बिता दिया तो इसमें श्रेय की कौन-सी बात रही। भावी सन्तति को सच्ची दिशा में ले जाने के लिये, प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करना आवश्यक है। निष्क्रियता से व्यक्तित्व का विकास रुकता है, जिससे मानवीय पतन की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। शिकागो विद्यालय के शरीर क्रिया विज्ञान के प्रख्यात पण्डित डॉक्टर एलेक्जेंडर क्लीटमैन ने 35 वर्षों के अन्वेषण से आलस्य की प्रतिक्रियाओं का पता लगाया, उन्होंने लिखा है-”आलस्य का अर्थ है व्यक्ति की मानसिक अयोग्यता और इसका परिणाम विनाश ही हो सकता है।”

आलस्य से शरीर का तापमान गिरता है। यह ह्रास एक-दो डिग्री तक होता है, इससे शिथिलता बढ़ जाती है।” आलस्य में जीवन बिताने वाले लोगों की उम्र इसीलिये कम हो जाती है। इसके विपरीत श्रमिकों, मजदूरों की आयु अधिक होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय भी यही हैं कि संसार की अधिक उम्र वाली जातियाँ वही हैं, जहाँ काम की प्रतिष्ठा होती है।

सन्त विनोबा ने अपने एक प्रवचन में काठियावाड़ के मध्यम वर्ग को सम्बोधित करते हुये बड़े महत्वपूर्ण शब्द कह थे । उन्होंने बताया “मैं इतना ही कहूँगा कि काम के लिये आपमें इज्जत और प्रेम का भाव होना चाहिये। इसके अभाव में अच्छी सेवा न हो सकेगी। काम तो होगा, लेकिन जिस हेतु से वह काम शुरू हुआ है, वह हेतु पूरा नहीं होगा। इसलिये काम के लिये शरीर अच्छा,मजबूत बनाओ और काम के लिये प्रीति और आदर रखो। इसके लिए अपनी चेष्टाओं को निरन्तर जागृत रखने और शक्ति शाली बनाने की अधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। शक्ति शरीर की बिजली है और कर्म प्रकाश। हमारी शक्ति जितनी प्रगाढ़ होगी, क्रिया की रोशनी उतना ही जगमगायेगी और दूसरों को रास्ता बतायेगी।

श्रमशीलता को असम्मान तथा हीनता का बोधक मानना नासमझ लोगों को शोभा दे सकता है। आज के शिक्षित वर्ग में यह बुराई गहराई तक प्रवेश कर गई है, जिससे सभी ओर दुःख और निराशा, आत्म-प्रवंचना और आत्महत्याओं के दृश्य दिखाई देते हैं। इससे जन-जीवन बड़ा अस्त-व्यस्त हुआ है। पाश्चात्य देशों की, जिनमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन आदि प्रमुख हैं, उन्नति का एक ही रहस्य है कि वहाँ काम की इज्जत है, आलस्य की नहीं। संसार के बड़े-बड़े महापुरुषों, सन्त-महात्माओं, समाज सुधारकों ने व्यवहारिक जीवन में इस बात के उदाहरण प्रस्तुत किये है कि काम बड़प्पन का चिन्ह है। भगवान कृष्ण, राम, बुद्ध, नामदेव, सुकरात, मुहम्मद आदि सभी महापुरुषों ने कर्म की महत्ता प्रतिपादित की है। महात्मा गान्धी जी स्वयं चक्की पीस कर उसका आटा खाते थे। इनमें से किसी की इज्जत कम नहीं हुई। आज भी लोग इन्हें श्रद्धा से माथा टेकते हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 1)

मनुष्य इच्छाओं का पुतला है। उसके व्यावहारिक जीवन में प्रतिक्षण अनेकों आकाँक्षायें उठा करती है। स्वास्थ्य की, धन की, स्त्री और यश की अनेकों कामनायें प्रत्येक मनुष्य में होती हैं। इसके विविध काल्पनिक चित्र मस्तिष्क में बनते बिगड़ते रहते हैं। जैसे ही कोई इच्छा स्थिर हुई कि मानसिक शक्तियाँ उसी की पूर्ति में जुट पड़ीं, शारीरिक चेष्टायें उसी दिशा में कार्य करने लगती हैं। संसार की विभिन्न गतिविधियाँ व क्रिया कलाप चाहे वह भौतिक हों अथवा आध्यात्मिक, इच्छाओं की पृष्ठभूमि पर निरूपित होते हैं। रचनात्मक कदम तो पीछे का है, पहले तो सारी योजनाओं को निर्धारित कराने का श्रेय इन्हीं इच्छाओं को ही है।

स्थिर तालाब के जल में जब किसी मिट्टी के ढेले या कंकड़ को फेंकते हैं तो उसमें लहरें उठने लगती हैं। पत्थर के भार व फेंकने की गति के अनुरूप ही लहरों का उठना, तेजी व सुस्त गति से होता है। ठीक इसी प्रकार हमारी इच्छायें क्या हैं, यह हमारी शारीरिक चेष्टायें, चेहरे के हाव-भाव बताते रहते है। व्यभिचारी व्यक्ति की आँखों से हर क्षण निर्लज्जता के भाव परिलक्षित होंगे। चेहरे का डरावनापन अपने आप व्यक्त कर देता है कि यह व्यक्ति चोर, डाकू, बदमाश है। कसाई की दुर्गन्ध से ही गाय यह पहचान लेती है कि वह वध करना चाहता है।

इसी प्रकार सदाचारी, दयाशील व्यक्तियों के चेहरे से सौम्यता का ऐसा माधुर्य टपकता है कि देखने वाले अनायास ही उनकी ओर खिंच जाते हैं। विचारयुक्त व गम्भीर मुखाकृति बता देती है कि यह व्यक्ति विद्वान, चिन्तनशील व दार्शनिक है। प्रेम व आत्मीयता की भावना से आप चाहे किसी जीव-जन्तु को देखें, वह भयभीत न होकर आपके उदार भाव की अन्तरमन से प्रशंसा करने लगेगा।

अनन्त आनन्द के केन्द्र परमात्मा के हृदय में एक भावना उठी- “एकोऽहंबहुस्यामि” और इसी का मूर्तिमान रूप यह मंगलमय संसार बन कर तैयार हो गया। यह उनकी सद्-इच्छा का ही फल है कि संसार में मंगलदायक और सुखकर परिस्थितियाँ अधिक हैं। यदि ऐसा न होता तो यहाँ कोई एक क्षण के लिये भी जीना न चाहता। पर अनेकों दुःख तकलीफों के होने पर भी हम मरना नहीं चाहते, इसलिये कि यहाँ आनन्द अधिक हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 June 2026


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रविवार, 14 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (भाग 1)

मकान-मालिक जब घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है तो उस मकान की दुर्दशा प्रारम्भ हो जाती है। मकड़ियाँ जाला बनाने लगती हैं। जगह-जगह चिड़ियाँ घोंसले बना लेती हैं। कीड़े-मकोड़े बढ़ जाते हैं। वर्षा और वायु के प्रकोप से दीवालों में दरारें पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे आलीशान मकान भी खाली पड़े रहने पर ध्वस्त होकर धराशायी बन जाते हैं। यह स्थिति घर में फली क्रियाशीलता के अभाव से हो जाती है। जब तक मालिक रहता है, तब तक उसकी लिपाई, पुताई, छानी-छप्पर, मिट्टी-मरम्मत होती रहती है। इससे वही मकान साफ -सुथरा और वर्षा में भी सुदृढ़ बना रहता है। ठीक यही बात मानव जीवन के बारे में भी लागू होती है। जब तक मनुष्य क्रिया-शील रहता है तब तक अंग-प्रत्यंग तथा मानसिक चेष्टायें सही दिशा में लगी रहती हैं, पर जैसे ही आलस्य और अकर्मण्यता संवार हुई कि रोग-शोक, असन्तोष और अशान्ति, दैन्य और दीनता के जीव-जन्तु अपना-अपना अड्डा मनःक्षेत्र में जमाने लग जाते हैं और चारों ओर निराशा की मुर्दनी छाई जान पड़ने लगती है।

लोहा देखने में कितना ठोस व मजबूत दिखाई पड़ता है। सारे शरीर की शक्ति लगा कर भी उसे तोड़ा जाना सम्भव नहीं। काटना हो तो पैनी छैनी और वजनदार घनों की चोट देनी पड़ेगी। पर उसी लोहे को किसी कूड़े-कचरे के ढेर में फेंक दीजिये तो कुछ ही दिन में जंग लग जायगी और सम्पूर्ण लोहे को चाट कर बैठ जायेगी। मनुष्य शरीर भी लोहे जैसा ही है। इसकी सुन्दरता और मजबूती तभी तक स्थिर समझिये, जब तक इसमें क्रियाशीलता है। काम से जी-चुराने और दूर भागने का परिणाम लोहे में जंग लग जाने जैसा ही हो सकता है। शरीर का महत्व काम से ही है।

कहावत है- “खाली दिमाग शैतान का घर” अर्थात् निरर्थक समय बिताने और आलस्य में पड़े रहने से उत्पन्न शिथिलता अनेक प्रकार की विकृतियाँ ही पैदा करती है। अपने साथ अनेक औरों को भी इससे हानि ही होती है। पारस्परिक कलह, अनैतिक तत्व और दुराचार बरतने वाले वे ही लोग होते हैं जो श्रम से जी चुराते हैं। जो फैशनपरस्ती को ही जीवन मानकर केवल बन ठन कर इधर-उधर घूमते रहते हैं, ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिये अभिशाप माने जाते हैं । ऐसे आदमियों को कोई अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। उनका सभी जगह निरादर होता है। प्यारा चाम नहीं काम होता है।

जीवन-विद्या के विद्वान व प्रमुख आचार्य टिनमैन अपने अनुयाइयों को सम्बोधित कर कहा करते थे-”जो आलस्य में अपना मूल्यवान् समय गँवाता है वह अभागा है। पृथ्वी पर परिश्रम से मुक्ति नहीं है । मनुष्य कर्म के लिये उत्पन्न हुआ है। उसे जीवन भर परिश्रम करना चाहिये।” एक कर्मशील महापुरुष का कथन है-”जीवन के उपरान्त चिर-काल तक मुझे विश्राम ही तो करना है।”

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 बुद्धिमान ही नहीं संवेदनशील भी बनें (भाग 2)

अस्त्र-शस्त्रों एवं अन्याय विनाशकारी यन्त्रों के निर्माण में बात सुरक्षा की होती तो समझ में भी आती। किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा इन विनाशकारी यंत्रों पर नहीं टिकी है। उसके लिये तो सामान्य अस्त्र, शस्त्र एवं कुशल सैनिक भी पर्याप्त होते हैं। उनके शौर्य, पराक्रम के विकास से ही राष्ट्र को बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रखा जा सकता है। विनाशकारी बमों तथा अन्याय विस्फोटक यन्त्रों में तो बुद्धि की कुटिलता ही झाँकती दिखाई देती है।

समाज में जैसा भी आदर्श होगा, उसके अनुरूप ही प्रवृत्तियां पनपेंगी एवं गतिविधियाँ चल पड़ेंगी। आदर्श विलासिता और सम्पन्नता को बनाया गया। फलस्वरूप संसार उसी ओर चल पड़ा। श्रेष्ठ आदर्शों एवं सिद्धांतों के अभाव में गतिविधियों में उत्कृष्टता का समावेश नहीं रहा। कारणों की गहराई में जाने पर एक ही तथ्य का पता लगता है वह है- बुद्धि द्वारा मानवी सम्वेदना की उपेक्षा की जाना। बुद्धि की निरंकुशता इसी कारण बढ़ी। संकीर्णताओं को प्रोत्साहन मिला। ध्वंसात्मक गतिविधियाँ अपनाकर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने का सिलसिला चल पड़ा।

बुद्धि का महत्व एवं उसकी उपयोगिता असंदिग्ध है। किन्तु यह तभी बन पड़ती है जब उसके साथ सम्वेदनाओं का संयोग हो। बुद्धि की उच्चतम स्थिति को ‘प्रज्ञा’ के नाम से विभूषित किया गया है। सघन सम्वेदनाओं के साथ जुड़कर ही वह इस उच्चतम स्थिति तक पहुँचती है। सृजनात्मक प्रवृत्तियों को इसी के द्वारा प्रोत्साहन मिलता है। साँस्कृतिक विकास की सारी सम्भावनाएँ इसी पर आधारित हैं। बुद्धि की प्रखरता एवं उससे मिलने वाले भौतिक अनुदानों का सही उपयोग विकसित भाव-सम्वेदनाओं द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

महापुरुषों द्वारा छेड़े जाने वाले अभियानों में इस तत्व को विकसित करने का ही महान लक्ष्य अनिवार्य रूप से जुड़ा होता है। वे इस तथ्य से परिचित होते हैं कि इसको उभारे बिना मनुष्य को श्रेष्ठता की ओर नहीं मोड़ा जा सकता। वे साधनों के विकास की उपेक्षा तो नहीं करते किन्तु उनको अधिक प्रधानता भी नहीं देते। उनकी सामर्थ्य मानवोचित्त गुणों के विकास के लिये ही प्रयुक्त होती है। साधना एवं अन्य आध्यात्मिक उपचारों के पीछे भी इसी उद्देश्य की पूर्ति ही निहित होती है।

आदर्शवादी भाव-सम्पन्नता से ही भौतिक उपलब्धियाँ भी मानव मात्र के लिये उपयोगी बन सकती हैं। बुद्धि की प्रखरता भावनाओं की उदात्तता से जुड़कर ही सर्वतोमुखी विकास का आधार प्रस्तुत कर सकती है। इस तथ्य को हृदयंगम कर उसे विकसित करने के लिए हर सम्भव प्रयास किये जाने चाहिए।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1981

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 June 2026


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👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (भाग 1)

बुराई, भ्रष्टाचार, अपराधों के सम्बन्ध में हमारी शिकायतें दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस सम्बन्...