बुधवार, 10 जून 2026

👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 1)

मौन वाणी की शक्ति को संशोधित और संवर्धित करने की साधना है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसलिए जिस तरह इन्द्रिय संयम के लिए ब्रह्मचर्य आदि का विधान है, उसी तरह वाणी के संयम के लिए मौन की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है, अगर बोलना ही हो तो कम-से-कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।” फैंकलिन के शब्दों में “चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती है।” कालाइल ने कहा है, “मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति होती है।”

मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे- सुने चल रहे हैं। संसार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान कार्य करना चाहे तो उसे एक लम्बे समय तक मौन का अवलम्बन लेना पड़ेगा, क्योंकि मौन से ही शक्ति का संग्रह और उद्रेक होता है।

आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिए तो मौन बहुत ही आवश्यक है। योगी अरविन्द ने कहा है “आध्यात्मिक जीवन अपने भीतर ईश्वरीय चेतना को प्रतिष्ठित करने और उसे सहज रूप में व्यक्त होने देने की साधना है और इस साधना में सबसे बड़ी बाधा हमारी वाचालता ही है, जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसके आदेशों को नहीं सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी ही उत्तम भाषा, बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”

शास्त्रकार ने कहा है- “मौन उस अवस्था को कहते हैं जो वाक्य और विचार से परे है। यह एक शून्य ध्यानावस्था है, जहाँ अनन्त वाणी की ध्वनि सुनी जा सकती है।” अध्यात्म जगत का साधक तो मौन के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। आत्मा से और विश्वव्यापी सूक्ष्मशक्ति से मनुष्य तब तक सम्बंध स्थापित नहीं कर सकता, जब तक वह बाह्य कोलाहल में उलझा रहेगा, बहिर्मुखी बना रहेगा। अन्तर्मुखी होने और अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को एकाग्र और संगठित करने के लिए मौन का अवलम्बन श्रेयार्थी के लिए आवश्यक है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (भाग ३)

निर्विकार, निर्लेप और निर्भय जीवन जीने के लिए सत्य से बढ़कर कोई उपाय नहीं। सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती। संसार में जहाँ जो भी धर्म-ग्रन्थ और आर्ष अभिवचन पाये जाते हैं, उनमें जिन नियमों की विशेषता दी गई है, सत्याचरण व सत्य भाषण उनमें सर्वप्रधान है। मनीषियों ने सत्य को मनुष्य के हृदय में रहने वाला ईश्वर बतलाया है और सत्य पर आरूढ़ रहने का उपदेश किया है। सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है।

सृष्टि के आदि में सत्य की जो महत्ता और श्रेष्ठता थी वैसी आज बनी बनी हुई है। कोई मानवीय नियम समय के अनुसार भले ही बदले और संशोधित किए गये हों किन्तु सत्य के नियम में आज तक परिवर्तन नहीं किया गया और न कभी किया जा सकता है। सत्य सारे जीवन और सारी सृष्टि का एक मात्र आधार है। सत्य की महत्ता बतलाते हुए महात्मा इमरसन ने एक स्थान पर कहा है- “जिस सुन्दरतम और श्रेष्ठतम आधार पर मनुष्य को अपना जीवन अवस्थित करना चाहिए वह है- सत्य। सत्य के विरुद्ध किया हुआ प्रत्येक आचरण मानव समाज के स्वस्थ शरीर में छुरी भौंकने के समान निन्दनीय है।”

आत्मिक उन्नति के जो साधन और उपाय ऋषियों, मुनियों और धर्म-प्रवर्तकों ने प्रतिपादित किए हैं, सत्य को उनमें सबसे पहला स्थान दिया है। कोई भी साधना, फिर वह कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सत्य के बिना सफल नहीं हो सकती। सत्य सारे साधनों की आधार-शिला है। एक सत्य का आधार ले लेने के बाद यह अनिवार्य नहीं रह जाता कि आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने के लिये अन्य बहुत से साधन भी किए जाएं। सत्य की महिमा वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने उसे सर्वोपरि साधन बतलाया है, एक सत्य का आधार ही व्यक्ति को संसार सागर से पार कर देता है। महाभारत के उद्योग पर्व में आया है-

“सत्य स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव।’’
-समुद्र में नाव के समान सत्य स्वर्ग का सोपान है। अर्थात्- जिस प्रकार नाव का सहारा व्यक्ति को समुद्र के बीच से पार कर किनारे पर पहुँचा देता है उसी प्रकार सत्य व्यक्ति को संसार से पार कर स्वर्ग पहुँचा देता है।
शाँति पर्व में कहा गया है-
“नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम।
श्रुतिहिं सत्य धर्मस्य तस्यात्सत्यं न लोप्यते॥”
-सत्य के बढ़ कर कोई धर्म नहीं। असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं है। सत्य ही धर्म का आधार है। अतएव सत्य का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिये।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 10 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 June 2026


मंगलवार, 9 जून 2026

👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (भाग २)

सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने एक स्वरूप में स्थिर रह कर आत्म-लाभ जैसा सुख भोगता है। उसका अन्तःकरण दर्पण की तरह स्वच्छ और मस्तिष्क प्रज्ञा की तरह संतुलित रहता है। उसे न तो मानसिक द्वन्द्वों से त्रस्त होना पड़ता है और न निरर्थक वितर्कों से अस्त व्यस्त। वह जो कुछ सोचता है सारपूर्ण सोचता है और जो कुछ करता है कल्याणकारी करता है। मिथ्यात्व के दोष से मुक्त सत्यनिष्ठ व्यक्ति के पास कुकल्पनाओं का रोग नहीं आता। वह तो अपनी सीमा, अपनी सामर्थ्य और अपने साधनों के अनुरूप ही जीवन की कल्पनाएं किया करता है और अधिक से अधिक यथार्थ के धरातल पर ही विचरण किया करता है।

सत्य प्रिय व्यक्ति मिथ्यावादियों की तरह कल्पना की न तो ऊँची-ऊँची उड़ानें भरता है और न अनहोनी कामनाएं करता है। वह जानता है कि ऐसा करने से महत्वाकाँक्षाओं में, ऐसी महत्वाकाँक्षाओं में फैलना पड़ेगा जो उसकी स्थिति से बाहर की होंगी और तब हो सकता है कि किन्हीं कामनाओं अथवा वांछाओं के दबाव में आकर उनकी पूर्ति के लिए ऐसा काम करना पड़े जो असत्य के दोष से दूषित हो। सत्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन में आकाँक्षाओं के पथ पर बड़ा सावधान होकर चलता है।

राग-द्वेष, लोभ, मोह और मद, मत्सर आदि दुर्गुणों से सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई मित्रता नहीं होती। वह जानता है कि इन विकारों को प्रश्रय देना अपनी सत्यनिष्ठा के लिये खतरा पैदा करना है। यह विकार ही व्यक्ति के वे शत्रु हैं, जो उसे जीवन के पावन पथ से गिरा देते हैं। जिसके प्रति राग होगा उसके प्रति निष्पक्ष न रहा जायेगा। उसकी प्रसन्नता के लिये कुछ भी करना पड़ सकता है। जिससे द्वेष होगा उसका अनिष्ट चिन्तन का प्रेम पकड़ सकता है। लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया उसके सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल-कपट और असत्य आदि अपकर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।

इसी प्रकार मोह तो स्पष्ट अज्ञान ही है। अज्ञान से दूषित व्यक्ति जीवन में किसी भी व्रत का पालन ही कर पाता। मोहग्रस्त व्यक्ति अनिष्ट में इष्ट, हानि में लाभ और असत्य में सत्य का आभास पाने लगता है। मद और मत्सर अहंकार के ही दो प्रचंड प्रकार होते हैं। इनका प्रकोप व्यक्ति को कर्तव्य भ्रष्ट बना देता है। अहंकारी व्यक्ति स्वयं ही अपने की संसार में दूसरों से श्रेष्ठ मान बैठता है। अपनी बात मनवाना और दूसरे की बात न मानना उसका सहज स्वभाव होता है।

अपने दम्भ की रक्षा में उसके लिए कोई भी कार्य अकरणीय नहीं होता। इस प्रकार मद और मत्सर सत्य पालन में बहुत बड़ी बाधाएं हैं। सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन विकारों से सदा सावधान रहता है। ऐसे विचार मुक्त व्यक्ति और एक देवता में क्या अन्तर रहा जाता है? सत्याश्रमी व्यक्ति को यदि देवता कहा दिया जाय तो भी कोई अतिशयोक्ति न होगी। निश्चय ही सत्यनिष्ठ व्यक्ति देवता ही होते हैं। धरती के देवता।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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👉 वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बनें रहें (अंतिम भाग)

संसार की हर चीज अस्थिर है वह अपने रूप,रंग और स्तर निरन्तर बदलती है, इतना ही नहीं अपना मन भी तो एक जैसी स्थिति में नहीं रहता। उसे अभी एक वस्तु एक दृष्टिकोण के कारण प्रिय लगती है। आवश्यक नहीं कि वह दृष्टिकोण सदा ही बना रहे। आज का कामातुर व्यक्ति कल संन्यास धारण करने के लिए व्यग्र हो सकता है, तब जो कुछ प्रथम आवेश में प्राणप्रिय लगता था वह द्वितीय आवेश चढ़ आने के कारण निस्सार एवं घिनौना प्रतीत हो सकता है। यही बात उन व्यक्तियों पर भी लागू होती है जिन्हें हम अपना समझते है या प्यार करते हैं। वे हमें इस समय प्यार देते हैं, पर कल उनकी रुझान दूसरी ओर मुड़ सकती है और उपेक्षा अवज्ञा से उनका व्यवहार बदला हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है। संसार की यही घोर अस्थिर स्थिति है। पानी की लहरों की तरह यहाँ सब कुछ बदल रहा है। ऐसी दशा में जिस आकर्षक पर मुग्ध होकर आज हम सत्य जैसे शाश्वत तत्व की उपेक्षा करने को उद्यत हुए हैं और प्रिय पदार्थ स्वाद अथवा व्यक्ति के लिए बेतरह मर खप रहे हैं, नशा उतरने पर वह सारा आवेश मूर्खता पूर्ण ही प्रतीत होगा।

अनीति का समर्थन करते हुए सरलता पूर्वक उपार्जन किया जा सकता हो तो भी छोड़ देने में ही कल्याण है। सरलता,सुविधा और प्रचुरता की ललक में हम उन तरीकों को अपना लेते है जिनसे जल्दी सफलता मिल सके। ऐसे तरीके अनैतिक ही हो सकते हैं। सत्य के मार्ग पर चलने से कठोर परिश्रम के साथ स्वल्प उपार्जन ही सम्भव है। नीति पूर्वक तो उचित ही कमाया जा सकेगा और उसके लिए उचित पुरुषार्थ करना पड़ेगा। इसके लिए जिनमें साहस और धैर्य नहीं वे अनीति पर उतारू होते हैं या फिर अनीति वालों के सहायक होकर सरलता पूर्वक सुविधायें पाने के लिए सहमत होते हैं। यह स्थिति नितान्त दयनीय है। शरीरगत सुविधाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य की आत्मा का हनन करना पड़े तो यह इतनी बड़ी क्षति होगी जिसकी पूर्ति किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगी।

मानवी गरिमा की रक्षा कर सकना जीवन सफलता की दृष्टि से उच्चकोटि की उपलब्धि है। यदि आत्मा का —आदर्शों का— आत्म−सन्तोष का—कोई महत्व या स्थान हो सकता है तो उन्हें सँजोये रहने के लिए भी हमारी चेष्टाएँ होनी चाहिए। इस दिशा में बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि नीति पूर्ण उपार्जन से सन्तुष्ट रहने—उपभोग के स्वल्प साधन से काम चलाने और कठोर कष्ट साध्य जीवन क्रम का स्वागत कर सकने वाला अभ्यास डाला जाय। तप इसी का नाम है। तितीक्षा इसी को कहते हैं। धर्म और अध्यात्म की संरचना इसी स्तर की मनोभूमि को विनिर्मित एवं परिपक्व करने के लिए किया गया है। आस्तिकता की धुरी इसी केन्द्र पर घूमती है कि व्यक्ति आदर्शवादी और सत्यनिष्ठ जीवन पद्धति अपनाने के लिए अभीष्ट शौर्य साहस का सम्पादन कर सकें। किसी भी प्रकार—सुगमता पूर्वक प्रचुर सुख साधन संग्रह करने की—किसी भी मार्ग से अपनी अहंता का उद्धत प्रदर्शन कर सकने की ललक मनुष्य को कुपथगामी बनाती है और दुष्कर्म करने के लिए अग्रसर करती है। इसी आवेश में पतनोन्मुख एवं कलंक कालिमा से भरी रीति−नीति अपनानी पड़ती है। इतने पर भी जो पाया जाता है वह क्षणिक रहता है। जिस सरसता और सुविधा की आशा की गई थी वह भी तो दुराशा मात्र ही रहती है। बिजली की कौंध की तरह सुख शान्ति के सपने कुछ विलीन हो जाते हैं। मृग तृष्णा में व्यग्र हिरन की तरह एक के बाद दूसरी दिशा में प्यास बुझाने के लिए घोर प्रयत्न करते रहने पर भी अन्ततः गहरी निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

मनुष्यता की आत्मा सत्यनिष्ठा के साथ जुड़ी हुई है। यह मन्द अथवा तीव्र स्वर में एक ही घोषणा करेगी—भले ही समस्त सुविधाएँ छिन जाँय और समस्त प्रियजनों का विरोध सहना पड़े तो भी यथार्थता को—न्याय नीति को −विवेक औचित्य को तिलाँजलि नहीं दी जानी चाहिए। गरीबी की अभावग्रस्त रीति−नीति अपनाकर इस संसार में असंख्यों मनुष्य जीवित है फिर हर भी वैसा क्यों नहीं कर सकते?

मित्रताएँ टूटती हों—प्रियजन विमुख होते हों—गरीबी को सहचरी बनाना पड़ता हो—असुविधाओं का वरण करना पड़ता हो तो इन सबका सम्मिलित कष्ट इतना बड़ा नहीं हो सकता जितना कि सत्य के परित्याग का। सचाई की राह पर चलने वालों को अक्सर दुनिया वाले मूर्ख कहते हैं और व्यंग करते हैं कि सन्त बनकर क्या पा लिया? इतना ही नहीं—कई बार तो दुष्ट लोग ऐसे व्यक्ति को अपने भंडाफोड़ का भय दिखाकर दूर भगाने या हानि पहुँचाने से भी नहीं चूकते और उसे अकारण कष्ट जाल में फँसना पड़ता है। इन अग्नि परीक्षाओं से गुजरते हुए भी यदि प्रहलाद की तरह कोई सत्यनिष्ठ बन सके तो समझना चाहिए कि मनुष्य का महान गौरव और उत्तरदायित्व सँजोये रखने में उसने वह सफलता प्राप्त करली, जिसका उपहार सत्यनिष्ठ महामानव बनने के रूप में प्राप्त होता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 09 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 09 June 2026


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सोमवार, 8 जून 2026

👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (भाग 1)

जिस प्रकार सोना आग में तप कर और कसौटी पर कस कर ही अपना खरापन सिद्ध कर पाता है। इसी प्रकार व्यक्ति का खरापन तब ही सिद्ध हो पाता है, जब वह समाज में सत्याचरण का प्रमाण दे पाता है। एक बार खरा सिद्ध हुआ सोना संसार में कही भी अपना पूरा मूल्य पा जाता है। उसी प्रकार सत्याचरण का प्रामाणिक व्यक्ति सब जगह समाज का विश्वास प्राप्त कर लेता है।

सत्य मानव-जीवन की अनमोल विभूति है। जो अपने प्रति, अपनी आत्मा के प्रति, अपने कर्तव्यों के प्रति, परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति मन-वचन-क्रम से सच्चा रहता है वह इसी जीवन, इसी देह और इसी संसार में स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करता है। उसके लिए सुख-शाँति और साधन संतोष की कमी नहीं रहती।

सत्य मानव जीवन की सबसे शुभ और कल्याणकारी नीति है। इसका अवलम्बन लेकर चलने वाले जीवन में कभी असफल नहीं होते। यह बात मानी जा सकती है कि सत्य का आश्रय लेकर चलने पर प्रारम्भ में कुछ कठिनाई हो सकती है। किन्तु आगे चलकर उसका आशातीत लाभ होता है। सत्य, पुण्य की खेती है। जिस प्रकार अन्न की कृषि करने में प्रारम्भ में कुछ कठिनाई उठानी पड़ती हैं और उसकी फसल के लिए थोड़ी प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। किन्तु बाद में जब वह कृषि फलीभूत होती है तो घर, धन-धान्य से भर देती है। उसी प्रकार सत्य की कृषि भी प्रारम्भ में थोड़ा त्याग, बलिदान और धैर्य लेती है। किन्तु जब वह फलती है तो लोक से लेकर परलोक तक मानव-जीवन को पुष्पों से भर कर कृतार्थ कर देती है।

सत्य मानव-जीवन को महानता और उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने वाला प्रशस्त और निरापद राज-मार्ग है। इस पर निष्ठापूर्वक चलने वाले पथिक को किसी भी देशकाल में भय अथवा संकट नहीं रहता। सत्य-निष्ठा व्यक्ति को पाप कर्मों से निरत रखती है। सत्यवादी व्यक्ति इस डर से कोई अकरणीय कार्य करेगा ही नहीं कि दण्ड अथवा निन्दा के भय से कहीं उसे असत्य का सहारा न लेना पड़े। जो अपकर्मों और अपाशयों से बचा रहता है, वह अपवाद, अपमान अथवा आघातों से भी सुरक्षित बना रहता है। सत्याश्रमी व्यक्ति का जीवन सुख और शाँति से भरा पुरा रहता है। उसकी प्रसन्नता में विघ्न डालने वाले तत्व उसके पास कदाचित ही आ पाते हैं।

सत्य मनुष्य के सम्मान, प्रतिष्ठा और आत्म-गौरव के लिए अमोघ कवच के समान होता है। जिसने इस कवच को धारण कर लिया है, उसके लिए अपमान, निन्दा और अपवाद का कोई कारण ही नहीं रहता। सत्यनिष्ठ व्यक्ति संसार में निर्भय होकर विचरण करता है और स्पष्ट होकर व्यवहार करता है। उसने तो कही भय होता है और न आशंका। वह अजातशत्रु होकर समाज को अपने व्यवहार से जीत लेता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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👉 वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बनें रहें

सत्य और न्याय के पीछे चलने में हमें सब कुछ छोड़ना पड़ता हो तो उसके लिए अपने को तैयार करना चाहिए। सत्य ही परमेश्वर है। उससे बढ़कर इस संसार का सारतत्त्व और कुछ नहीं है। सत्य अपने हाथ रहा और उसके बदले सब कुछ चला गया तो हर्ज नहीं, किन्तु यदि सत्य को गँवा कर कुबेर की सम्पदा और इन्द्र का सिंहासन भी पाया तो समझना चाहिए कि यह बहुत महंगा और बहुत घाटे को सौदा खरीदा गया है।

जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं अथवा चलने के लिए विवश किये जा रहे हैं यदि वह असत्य और अन्याय से भरा है—उससे आदर्शों का हनन होता है और भ्रष्ट परम्पराएँ जन्मती हैं समझना चाहिए या कुमार्ग गमन बड़ी से बड़ी भौतिक उपलब्धि के बदले भी महंगा है उसे खरीदने का विचार छोड़ ही देना चाहिए।

सत्य को त्याग कर वैभव का वरण अथवा वैभव को छोड़कर सत्य का वरण इन दोनों में से किसे चुनना किसे नहीं चुनना यह धर्म संकट उत्पन्न होने पर सजीव और सजग आत्मा का निर्णय यही हो सकता है कि वैभव को छोड़ देना चाहिए और सत्य का वरण करना चाहिए। सत्य शाश्वत है। उसके परिणाम दूरगामी हैं। उसकी उपलब्धि से जो हित साधन होने वाला है वह चिरस्थायी है, जबकि वैभव बिजली की चमक की तरह क्षणिक चकाचौंध उत्पन्न करने के बाद गहन अन्धकार में विलीन हो जाता है।

इस विश्व की संरचना जिन परमाणुओं से हुई है वे द्रुतगति से भाग रह है। उनसे बनी वस्तुएँ भी अपने क्रम से बनती, बढ़ती, बदलती और मरती दिखाई पड़ती हैं। वस्तु की जो स्थिति अभी है वैसी अगले क्षण रहने वाली नहीं है। अस्तु जिस रूप में उसे इस समय आकर्षक पाया जाता है वैसा कुछ ही समय बाद रहने वाला नहीं है।
 
रूप,यौवन,धन,बुद्धि,पद,स्वाद,इन्द्रियानुभूति से जो आकर्षण अब है वह निश्चित रूप से अगले दिनों बदल जायगा। जो बालक अभी तोतली बोली बोलते और खिलौने जैसे हँसते−हँसाते दीखते हैं वे कुछ समय बाद वयस्क होकर अपना घर, परिवार बसायेंगे और अभिभावकों को भारभूत मानकर उनसे सीधे मुँह बात भी न करेंगे। पत्नी को जिस रूप, यौवन के आधार पर परमप्रिय समझा जा रहा है। आयुष्य वृद्धि के साथ−साथ उसमें भी घटी ही आने वाली है। उसका आज का अत्यधिक आकर्षण कल बच्चों में बँटने वाला है। प्रणय के आरम्भ काल का आकर्षण देर तक कहाँ टिकता है? इस बदलती स्थिति में वस्तुओं अथवा व्यक्तियों के साथ मोह जोड़ना और उन तुच्छ सी उपलब्धियों के लिए सत्य जैसे बहूमूल्य तथ्य की उपेक्षा करना किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण नहीं हो सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 08 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 June 2026


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रविवार, 7 जून 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 07 June 2026


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👉 आत्मा-कल्याण की भूमिका

कुछ घुड़सवारों के संरक्षण में आई मगध की साम्राज्ञी महारानी क्षेमा ने तथागत के आश्रम की शाँति भंग कर। पक्षी चहक उठे, रथ के पहियों की गड़गड़ाहट सुनकर मोर कुहुक उठे। सम्पूर्ण बनस्थली एक बार चौकन्नी हो गई। महारानी क्षेमा का पदार्पण कुछ महत्त्वपूर्ण अर्थ रखता था।

वे धीरे-धीरे रथ से उत्तरी। घुड़सवार सैनिकों ने सम्मान से गर्दनें नीचे झुका लीं। शेरनी के समान उन्होंने उन पर दृष्टि डाली और कहा अब तुम लोग जा सकते हों। आई हुई गड़बड़ाहट थोड़ी ही देर में दूर-दूर-बहुत दूर क्षितिज में जाकर विलीन हो गई।

सान्ध्य वेला में क्षेमा ने तथागत के निजी आवास गृह में प्रवेश किया। वैराग्य से आविर्भूत क्षेमा की मुखाकृति बड़ी ही सलोनी लग रही थी। बुद्ध के चरणों पर झुक कर कहा- “भगवन्! मैं अब तक अंधकार में भटकती रही। मुझे पता होता, ईश्वरीय नियमों के सम्मुख राजा और प्रजा दोनों ही समान हैं, मृत्यु और आधि-भौतिक कष्ट, परेशानियों के जाल से कोई भी नहीं बचता तो इतना जीवन व्यर्थ न जाता। अब तक आत्म-कल्याण के कई चरण पूरे कर लिये होते। भगवन्! अब मुझे शिष्या बना कर मेरे आत्म-कल्याण का मार्ग प्रदर्शित करें।”

भगवान् बुद्ध ने गम्भीर दृष्टि से क्षेमा की ओर देखा। एक क्षण कुछ अध्ययन किया। फिर पूछा- “भद्रे! आत्म-कल्याण के लिये साधना करने और गृह-परित्याग से पूर्व यह आवश्यक हैं कि जिन लोगों के प्रति अपने कर्त्तव्य है, उनकी पूर्ण स्वीकृति और सहमति प्राप्त की जाये। जब तक आप महाराज विस्विसार से आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेती, आप दीक्षा की अधिकारिणी नहीं।”

क्षेमा पुनः मगध लौटी। वे सीधे बिम्विसार के पास पहुँचा। आकर्षण रहित वेष और खुले हुए केश देखकर महाराज पहल ही समझ गये क्षेमा के अन्तःकरण में तीव्र आन्दोलन है। उन्होंने उठी हुई जिज्ञासा को रोकना उचित न समझा। महारानी के आग्रह पर उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी। क्षेमा पुनः भगवान् बुद्ध के पास लौट आई।

महारानी का धर्म-पन्थ में प्रवेश राज्य की प्रजा के लिये कौतूहल और आस्था का विषय बन गया। हजारों की संस्था में नर-नारी एकत्रित हो-होकर आश्रम पहुँचने और आत्म-कल्याण की दीक्षा का आग्रह करने लगे। जब आश्रम में यह कोलाहल बढ़ता हुआ जा रहा था, तभी महारानी क्षेमा ने वहाँ प्रवेश किया।

भीड़ की ओर इंगित करते हुए भगवान् बुद्ध न कहा- “क्षेमा! देखो कितनी लम्बी भीड़ तुम्हारा अनुकरण कर रही है, जानती हो क्यों? सामान्य प्रजा के पास भी ऐसी ही भक्ति होती है, जैसी तुम्हारे हृदय में उमड़ रही हैं, किन्तु इनके पास न विचार होता है, न विवेक। इसलिये इनका वैराग्य दृढ़ नहीं, प्रबुद्ध व्यक्तियों के पद-चिन्हों का अनुसरण करने का नियम इस संसार में सर्वत्र हैं, आज तक तुम्हारा वैभव-विलास का जीवन रहा, उसका अनुकरण यह लोग करते रहे। जान-पान, रहन-सहन, व्यवहार-बर्ताव में इनने वह सब बुराइयाँ पाल ली हैं, जो राजघरानों में होती है इस स्थिति में क्या इन्हें छोड़कर अकेले तुम्हें दीक्षा दी जा सकती हैं।”

नहीं महाराज! श्रेमा ने संक्षिप्त उत्तर दिया। तो फिर यह भी आवश्यक है कि इन सबमें भी उसी तरह का विचार, विवेक और वैराग्य हुआ है। इसके लिये तुम्हें कुछ दिन इनके बीच रहकर इनके विकास की साधना कर-पड़ेगी। जब तुम यह दूसरा चरण भी पूरा कर लोगों, तब दीक्षा की पात्र बनोगी।

क्षेमा उस दिन से भटकते हुए लोगों की ज्ञान-दान देने में जुट गई। कई वर्षों तक समाज-सेवा से जब उनका वैराग्य दृढ़ हो गया, तब भगवान् बुद्ध ने दीक्षा भी दी और आत्म-कल्याण की साधना में प्रवेश भी कराया।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1969

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👉 कुकर्मों की सर्वनाशी विभीषिका (भाग 3)

उद्दण्ड उच्छृंखलता अपनाकर कई आतंकवादी यह सोचते हैं कि उन्होंने दूसरों को अपना लोहा मानने के लिए घिघियाने, गिड़गिड़ाने के लिए बाध्य कर दिया और डरा दिया। इस सफलता पर गर्व करने या प्रसन्न होने की जरूरत नहीं है। ऐसा तो विषैले कृमि−कीटक और हिंस्र पशु भी कर सकते है। आतंकित व्यक्ति चुप रहे, डर जाय, विरोध न करे यह हो सकता है पर उसके अन्तर में भरी हुई घोर घृणा को नहीं रोका जो सकता। जन-मानस से निकलने वाला यह घृणा भरा अभिशाप उस घिनौने व्यक्ति पर अगणित विपत्तियाँ बनकर बरसता है और कठिन समय में उसका कोई साथी सहायक शेष नहीं रहता। 

लाभ की आशा से जो मित्र बने थे और आतंक के भय से जिन्होंने हाँ में हाँ मिलाई थी वे दोनों ही वर्ग अवसर आते ही आतंकवादी के कुकृत्यों पर अपना रोष व्यक्त करते हैं और उसे नीचा दिखाने के लिए जो कुछ करे सकते हैं, कर गुजरते हैं। आतंकवादियों की सत्ता क्षीण होते ही उनके साथी संबंधी ही शत्रु बन जाते है। असल में दुष्ट का कोई मित्र होता ही नहीं। भीतर से घृणा भरे अन्त करणों का परिकर कभी भी किसी का सच्चा सहायक नहीं हो सकता।

जो उचित परिश्रम करके न्यायोचित मार्ग से कमाया गया है उसका परिणाम सुखद हो सकता है। अनीति का ओत-प्रोत होता है। ऐसी कमाई बीमारी, चोरी तथा फिजूलखर्ची में नष्ट होती है। व्यसन, व्यभिचार और कुकर्म अनाचार ही अनीति उपार्जित सम्पदा से बन पड़ते हैं। इससे पाप का भार और दूना चौगुना बढ़ता है। हराम की कमाई खाकर कभी कोई फला-फला नहीं है। जिनने पाप की पूँजी संग्रह करके अपनी औलाद के लिए छोड़ी उनमें से अधिकांश को वह विष भोजन बहुत भारी और बहुत महंगा पड़ा है। किसी भी प्रकार कमा कर-कितना ही अधिक घन सन्तान को छोड़ने वाले लोग इस उद्देश्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते कि उसे खाकर उसके उत्तराधिकारी सुख पूर्वक रह सकेंगे।

कुकर्मी समाज में एक भ्रष्ट परम्परा उत्पन्न करता है। उसकी देखा−देखी अन्य नासमझ लोग उसी, मार्ग का अनुसरण करने लगते हैं। पाप का आकर्षण छूत के रोग की तरह एक से दूसरे को लगता है और महामारी का रूप धारण करता है। एक चिनगारी अवसर पाकर दावानल का भयानक रूप धारण कर लेती है। एक की पाप प्रवृत्ति अनेकों को अपना अनुगामी बनाकर संसार का इतना अनर्थ उत्पन्न करती है जिसकी भयंकरता को कुकर्मी व्यक्ति कदाचित ही कभी समझ पाता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974 

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 June 2026


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शनिवार, 6 जून 2026

‼️ सेवा और प्रार्थना ‼️

तुम मुझे प्रभु कहते हो, गुरु कहते हो, उत्तम कहते हो, मेरी सेवा करना चाहते हो और मेरे लिए सब कुछ बलिदान कर देने को तैयार रहते हो। किन्तु मैं तुम से फिर कहता हूँ, तुम मेरे लिये न तो कुछ करते हो और न करना चाहते हो।

तुम जो कुछ करना चाहते हो मेरे लिये करना चाहते हो जबकि मैं चाहता हूँ तुम औरों के लिये ही सब कुछ करो। औरों के लिये कुछ न करने पर तुम मेरे लिये कुछ न कर सकोगे। मैं तुमसे सच कहता हूँ कि यदि तुमने इन छोटों के लिये कुछ न किया तो मेरे लिये भी कुछ न किया।

मैं फिर कहता हूँ कि मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न मत करो, मेरी प्रसन्नता तो इन छोटे और गरीब आदमियों की प्रसन्नता है। मुझे प्रसन्न करने के स्थान पर इनको प्रसन्न करो, मेरी सेवा की जगह इनकी सेवा और सहायता करो।

अमृतवाणी:- समाज निर्माण से पहले व्यक्ति निर्माण | Pt Shriram Sharma Acharya, 

तुम सब प्रार्थना करते हो। लेकिन मैं सच कहता हूँ, तुम प्रार्थना नहीं करते। अगर तुम प्रार्थना करते हो तो मुझे ठीक-ठीक बतलाओ, क्या तुम लोग प्रार्थना में खड़े हुए संसार को भूल जाते हो। तुम्हारे मन को सारा द्वन्द्व नष्ट हो जाता है और तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम्हारा कोई शत्रु नहीं है और न तुम ही किसी के शत्रु हो।

यदि ऐसा नहीं होता तो तुम प्रार्थना नहीं करते। तुम्हारी प्रार्थना में खड़ा होना ठीक वैसा ही है जैसे ग्वाले के डंडे से घिरी हुई भेड़े बाड़े में खड़ी हो जाती हैं।

मैं तुमसे सच कहता हूँ यदि पिता में विश्वास रखकर प्रार्थना की जाये तो मनुष्य को संसार की बुराइयों का स्मरण ही न आवे। यदि तुझमें राई के दाने भर भी सच्चा विश्वास हो तो तुम इस पहाड़ से अधिकारपूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरक जाने के लिये कह सकते हो और वह सरक कर चला भी जाये।

✍️ रामकृष्ण परमहंस
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम सब परस्पर एकता के सूत्र में जुड़े हैं

समुद्र में असंख्यों लहरें उठती हैं—उनका अस्तित्व अलग-अलग होता है। हर लहर पर एक स्वतन्त्र सूरज चमकता दिखाई देता है, इतने पर भी यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इस भिन्नता के भीतर एक अविछिन्न एकता की सत्ता विद्यमान है। सारा समुद्र एक ही है। एक ही सूर्य असंख्यों लहरों पर चमकता है। इन प्रतिबिंबों की अनेकता के कारण कितने ही सूर्यो की सत्ताएँ सिद्ध नहीं होती। हवा और जल के संयोग से उत्पन्न होते रहने वाले बबूले एक-दूसरे से अलग दिखाई भले ही दें वे सुविस्तृत जलाशय से पृथक नहीं माने जा सकते।

मनुष्य की संख्या करोड़ों में है। उनकी देह तथा आकृति-प्रकृति में भी अन्तर है। इतने पर भी वे सभी एक ही अनन्त विश्वात्मा के अविछिन्न अंग अवयव हैं। माला के मध्य पिरोये हुए सूत्र की तरह एक ही आत्मा सबको एकता के बन्धनों में बाँधे हुए है। देखने में हम एक दूसरे से पृथक लग सकते हैं,पर हमारा अस्तित्व पूर्ण तथा एक दूसरे पर निर्भर है। एकाकी जीवन एक क्षण के लिए भी सम्भव नहीं। सकते। दूसरे का सहयोग पाये बिना अपना निर्वाह किसी भी प्रकार नहीं हो सकता।

प्राणिमात्र के भीतर काम करने वाली इस एकात्म चेतना की अनुभूति ही अध्यात्म दर्शन का मूलभूत उद्देश्य है। समष्टि की इकाई ही व्यष्टि हे। समाज का एक पुर्जा ही मनुष्य है। इस मान्यता को अपनाकर आत्मोपभ्येन सर्वत्र की दृष्टि हम विकसित करें और आत्मा को विश्वात्मा का घटक मात्र माने तो वह जीवन लक्ष्य प्राप्त हो सकता है, जिसे ईश्वर की उपलब्धि कहते हैं।

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👉 कुकर्मों की सर्वनाशी विभीषिका (भाग 2)

प्रकृति का सारा कार्य व्यवस्थाओं और मर्यादाओं के आधार पर चल रहा है। इनका व्यतिक्रम सृष्टिकर्ता को सहन नहीं। उद्दण्ड उच्छृंखल को पनपने का अवसर मिले तो संसार की सारी व्यवस्था लड़खड़ा जायगी और अनैतिकता की अराजकता से वे समस्त आधार नष्ट हो जायेंगे जिनके सहारे मनुष्य जाति ने प्रगति की इतनी लम्बी मंजिल पार की है। सृजेता उन्हीं उद्दण्ड तत्वों को निर्दयता पूर्वक उखाड़ फेंकता है जो सृष्टि के सरल स्वाभाविक क्रम में व्यवधान उत्पन्न करने का दुस्साहस करने पर अड़े हुए हैं।

राजदण्ड, सामाजिक असहयोग और तिरस्कार के अतिरिक्त आत्मदण्ड भी कम भयंकर नहीं हैं। इन तीन को करारी चोटें कुकर्मी पर ऐसी आघात करती हैं जिन्हें तिलमिलाने वाली पीड़ा के बिना सहन नहीं किया जा सकता। आत्म-प्रताड़ना के विक्षोभ तरह-तरह के शारीरिक और मानसिक रोगों के रूप में सामने आते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव में निकृष्टताएं भर जाने से व्यक्ति प्रेत−पिशाचों की जैसी उद्विग्नता की आग में निरन्तर जलता, झुलसता रहता। वह शान्ति प्रफुल्लता उसे क्षण भर के लिए भी नहीं मलती जिसे मनुष्य जीवन की महानतम उपलब्धि माना जाता है।

मक्खी शीरे की गन्ध, रूप और स्वाद की कल्पना में इतनी विभोर हो जाती है कि उसे धैर्य और क्रम का ध्यान नहीं रहता। बेतहाशा टूट कर गिरती है और सोचती है कि जितना अधिक शीरा—जितनी अधिक मात्रा में खाया जा सके उसे उतना खा लेने का अवसर न चूका जाय। इस उतावली भरी मूर्खता में वह शीरे के भीतर धँस जाती है उसके पंख और पैर चिपक जाते हैं। जिस लिप्सा ने उसे अधीर बनाया वही उसके लिए प्राणघातक संकट भी प्रस्तुत खड़ा करती है। मूर्ख मक्खी को इतना बोध रहा होता कि सस्ते सुखोपभोग की आतुरता अन्ततः प्राणों को संकट में डालने वाली विपत्ति उत्पन्न कर सकती है तो शायद वह सोच−समझकर ही कदम बढ़ाती।

पाप कर्मों में अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में सरलता पूर्वक सुखोपभोग के साधन प्राप्त करने का आतुर आकर्षण ही प्रधान रहता है। यही प्रलोभन मनुष्य को नीति विरुद्ध कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। जन−साधारण का हृदय जीवन के लिए श्रेष्ठ सम्मानास्पद कार्य करने की और उत्कृष्ट जीवनयापन की आवश्यकता पड़ती है इसके लिए अपने को ढालना और सुधारना पड़ता है तब कहीं यह सम्भव होता है कि दूसरों का श्रद्धा सिक्त सम्मान प्राप्त करके अपने अन्तःकरण का भूख बुझाई जाय। आतुर व्यक्ति इस सरल मार्ग को छोड़कर आतंकवादी रीति−नीति अपनाते हैं और दूसरों को अपनी विघातक उद्दण्डता से भयभीत करके उन पर छा जाना चाहते हैं। इस तरह उन्हें बड़प्पन की एक उथली सी झलक मिलती तो है पर उससे चिरस्थायी प्रयोजन तनिक भी पूरा नहीं होता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 June 2026


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शुक्रवार, 5 जून 2026

👉 प्राणशक्ति का अपव्यय−मूर्खतापूर्ण अनाचरण

अपनी प्राण−शक्ति को यदि हम मितव्ययता पूर्वक खर्च करें तो जीवन को लम्बा और निरोग बनाने में उसका उपयोग कर सकते हैं और इस बचत से कुछ महत्वपूर्ण उपार्जन कर सकते हैं।

प्राण−शक्ति का सबसे अधिक अपव्यय अनावश्यक भोजन भार वहन करने से होता है। शरीर रक्षा के लिए सरल और स्वल्प भोजन की आवश्यकता होती है किन्तु हम दुष्पाच्य रूप में अधिक मात्रा में उसे ग्रहण करते हैं। सोचते हैं कीमती, स्वादिष्ट और अधिक भोजन करने से बलिष्ठ बनेंगे पर होता ठीक उलटा है। गरिष्ठ और प्रचुर भोजन जितनी शक्ति उत्पन्न करता है उससे कहीं अधिक अपने पचाने में खर्च करा लेता है अस्तु हम प्रतिदिन घाटे में रहते हैं और अन्ततः दिवालिया बनकर असमय में ही जीवनलीला समाप्त कर देते हैं।

प्राण कहाँ से आता है? उसके उपलब्धि स्रोत कहाँ हैं? यह तलाश करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि यह बहुमूल्य सम्पदा हमें शुद्ध वायु,निर्मल जल, सात्विक आहार, सूर्य संपर्क, गहरी नींद संतुष्ट मनःस्थिति से प्राप्त होती है। इन शक्ति स्रोतों की जितनी उपेक्षा करेंगे, उनसे जितने दूर रहेंगे उसने ही क्षीण होते चले जायेंगे? कमाई कम और खर्च अधिक करने पर कोई व्यवसाय ठीक तरह नहीं चलता फिर जीवन व्यवसाय ही कैसे चलेगा?

हर काम की सीमा है। मर्यादा में रहकर ही स्थिरता प्राप्त हो सकती है। सामर्थ्य से अधिक काम करना—साधनों से असंबद्ध महत्वाकाँक्षाऐं गढ़ना— भोगासिक्त में निमग्न होकर इन्द्रियों से अधिक काम लेना, दिनचर्या की नियमितता का ध्यान न रखना आदि बातें देखने सुनने में कोई बहुत बड़ी गलतियाँ नहीं मालूम पड़ती, पर वे छोटी होने पर भी चिनगारी की तरह हमारे हँसते−खेलते जीवनोद्यान में आग लगा देने के लिए पर्याप्त है। नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला अपनी प्रामाणिकता खो बैठता है और जनसहयोग से वञ्चित होता चला जाता है। व्यक्ति गत जीवनचर्या में मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला उस बहुमूल्य सम्पदा को खोता चला जाता है जिसके आधार पर सर्वतोमुखी प्रगति की सम्भावनाओं की पृष्ठभूमि बनती है।

विषपान से आत्म−हत्या करने वाले की रक्षा कौन कब तक करेगा? जिनने नशे पीकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारने पर कमर ली है उनकी प्राण−शक्ति कब तक स्थिर रहेगी। उत्तेजक मसाले भी एक प्रकार के विष ही हैं। वासनात्मक उत्तेजनाओं से मन को निरन्तर उद्विग्न करते रहने से हम अपनी ही सुसंचित जीवन सम्पदा का क्षरण करते चले जाते हैं और अपने ही पापों का फल भोगने के लिए रुग्णता, अशक्त ता एवं अकाल मृत्यु के नरक में जा मिलते हैं।

दार्शनिक कन्फ्यूशियस ठीक ही कहते थे—जो मितव्ययता के नियम को भंग करेगा वह अन्त में दुसह दुख सहता हुआ मरेगा। उनकी यह उक्ति प्राण−शक्ति के अपव्यय के सम्बन्ध में सोलहों आने सच उतरती है। हम अपनी ही जीवन सामर्थ्य से खिलवाड़ करते हैं— उसे अनावश्यक रूप से बर्बाद करते हैं ऐसी दशा में पग−पग पर ठोकर खाने और अशान्त असफल रहने का दुष्परिणाम भोगें तो आश्चर्य ही क्या है?

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👉 कुकर्मों की सर्वनाशी विभीषिका (भाग 1)

पाप का आकर्षक सर्प की तरह सुहावना लगता है मनुष्य उसे लाभ और सुख की आशा से पकड़ने का प्रयत्न करता है और आरम्भ में उस पकड़ की सफलता पर प्रसन्न भी होता है पर कुछ ही समय में यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फाँसी का फन्दा गले में बाँध लेने की तरह कितना दुखद और कितना विषम था।

चूहा सरलता पूर्वक रोटी का, मिठाई का टुकड़ा पाने के लालच से पिंजड़े के छेद में प्रवेश करता है, इस सफलता को वह अपनी बुद्धिमत्ता और सौभाग्य भरी उपलब्धि मानता है। मिठाई में दाँत लगाते समय तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना ही नहीं रहता। दूसरे चूहे जबकि एक-एक दाना बीनते जहाँ-जहाँ भटकते हैं तब उसने सहज ही इतनी सारी मिठाई खाने का अवसर प्राप्त कर लिया-क्या यह कम आनन्द की बात है? चूहा इस सौमान्य कल्पना में अधिक देर नहीं उड़ पाता। कठोर वास्तविकता कुछ ही क्षणों में सामने आ खड़ी होती है। खटका गिरता है और उस कैद में जकड़ जाता है जिसका अन्त मृत्यु के साथ ही सम्भव होता है। तब उसे समझ आती है कि यह आकर्षण भरा प्रलोभन बहुत महंगा पड़ा। अच्छा होता वह एक-एक दाना बीनकर—भारी दौड़धूप करके—पेट भरने को सन्तोषजनक मान लेता।

दुष्कर्मों और दुर्व्यसनों का स्वरूप और आकर्षण कुछ ऐसा ही है जिसे देखकर अदूरदर्शी उन पर बेतरह टूट पड़ने हैं। आगा-पीछा सोचने लायक विवेक भी हाथ में नहीं रहता। अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में—अधिक सुख पाने की लिप्सा उस सूक्ष्म चिंतन का  अपहरण कर लेती है जिससे यथार्थता क —प्रतिक्रिया को समझना सम्भव होता है। कुकर्मी के  आरम्भ में अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व होता है। अपने उस साहस की आप ही प्रशंसा करता है जिसे दूसरे लोग कर नहीं पाये और अधिक सुखोपभोग करने से वंचित रह गये। किन्तु उसकी यह मान्यता देर तक स्थिर नहीं रहती। कुछ ही समय में पता चलता है कि जो कमाया गया उससे हजारों गुना अधिक गँधा दिया गया।

कुकर्मी को अपना शील, सदाचार गँवाना पड़ता है। इसके साथ ही उसकी आन्तरिक गरिमा नष्ट हो जाती है। जिन आस्थाओं के कारण मनुष्य अपनी आँखों में सम्मानित होता है और दूसरों की आँखें उसे श्रेष्ठ सत् पुरुषों में गिनती है उन्हें गँवा देने के बाद आदमी एक ओछा और घिनौना प्राणी भर रह जाता है। इन्द्रिय सुख और अहंकार का पोषण एक सीमा तक कर लेने पर भी उसे निरन्तर यह लगता रहता है कि कोई ऐसी चीज हाथ से चली गई जो आत्मिक आनन्द एवं सन्तोष की दृष्टि से नितान्त आवश्यक थी। अपनी आँख में गिरने वाला व्यक्ति अन्य किसी की दृष्टि में सम्मानास्पद और प्रामाणिक नहीं हो सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 05 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 June 2026


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गुरुवार, 4 जून 2026

👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (अन्तिम भाग)

केवल पारमार्थिक विचार रखने अथवा परोपकार का म नहीं मन चिंतन करने से प्रयोजन पूर्ण न होगा। उसके लिये तदनुकूल सक्रियता की भी आवश्यकता है। भावनाओं को कार्य रूप में परिणित न करने से वे शीघ्र ही निष्क्रिय होकर मर जाती हैं और मनुष्य का मानसिक स्तर पुनः नीचे उतर जाता है। भावनाओं के परिपोषण के लिये उन्हें कार्यरूप में परिणित ही करते रहना चाहिये साथ ही केवल मनोरथ मात्र से ही तो किसी की सेवा सहायता नहीं हो सकती। जब तक किसी रोगी को दवा लाकर न दी जायेगी और यदि आवश्यक हो तो पिलाई न जायेगी, तब तक क्या तो उसकी सेवा होगी और क्या उसे सुख अथवा संतोष मिलेगा।

किसी असहाय को जब तक हाथ देकर नहीं उठाया जायेगा अथवा पदार्थ रूप में उसकी अपेक्षित सहायता न की जायेगी, तब तक उसका क्या दुःख दूर ही सकेगा। भूखे को रोटी, नंगे को वस्त्र, असहाय को हाथ, अज्ञानी को विद्या निरक्षर को अक्षर और रोगी को दवा देकर ही सुखी और शीतल बनाया जा सकता है। हमारी उदार, दयालु अथवा करुण भावनायें मात्र उसका न तो कोई हित कर सकती है और न हम ही परमार्थ पुण्य के अधिकारी बन सकते हैं।

मनुष्य की पूर्णता का चिन्ह यह हैं कि हममें कितनी उत्कृष्ट भावनाओं का विकास हुआ हैं और उन भावनाओं को यथार्थ रूप में परिणित करने की प्रेरणा कितनी प्रबल हुई है और हम परमार्थ कार्यों के लिये अपने कितने स्वार्थों और अधिकारों को त्याग करने में तत्पर होने लगे हैं और उस त्याग में हमें किस सीमा तक प्रसन्नता एवं सन्तोष मिलने लगा है। जिस दिन पूर्णरूप से हमारा स्वार्थ परमार्थ, हमारे अधिकार कर्तव्य और हमारा सुख दूसरों का सुख होकर सन्तुष्ट होने लगे, मानना चाहिये कि हम पूर्णता की परिधि में आ गये और अब उस भूमिका पर खड़े हुए हैं, जहाँ से देवत्व की ओर अभियान प्रारम्भ किया जा सकता है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 1)

मौन वाणी की शक्ति को संशोधित और संवर्धित करने की साधना है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसलिए जिस तर...