बुधवार, 20 मई 2026

👉 शरीर नहीं आदर्श की रक्षा आवश्यक

अग्नि बोले-महाराज! महाराज शिवि का धर्म और उनकी जीव दया उशीनर देश में ही नहीं सारे विश्व में विख्यात है। सभी जानते हैं कि राजसत्ता का स्वामी होकर भी शिवि ने न तो किसी के साथ अनीति बरती न छल किया इसलिये उनकी परीक्षा लेने की बात व्यर्थ ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं वे प्राणिमात्र को आत्मा की दृष्टि से ही प्यार करते हैं।

देवराज इन्द्र ने उत्तर दिया-साधन सम्पन्न व्यक्ति का कोई ठिकाना नहीं जातवेद। क्या पता शिवि जो कुछ कर रहे हैं वह एकमात्र दिखावा हो वे इस तरह सब का ध्यान अपने विलासी जीवन की ओर से बँटाये रखना चाहते हों। निष्ठा की परीक्षा लिये बिना किसी की शुद्धता का क्या प्रमाण। फिर यदि वे सचमुच अपने अन्तःकरण से पूर्ण निश्छल हैं और परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं तो उससे उनकी कीर्ति ही बढ़ेगी।

भगवान इन्द्र के तर्कों के आगे अग्नि देव की एक न चली। तब उन्होंने भी शिवि की परीक्षा लेने की बात स्वीकार कर ही ली।

एक निमेष के अन्तर से दृश्य पलट गया। महाराज शिवि सभासदों सहित राज दरबार में बैठे किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहे थे तभी एक श्वेत कपोत उड़ता हुआ आया और उनकी जंघा पर आ बैठा। पक्षी घबराया हुआ था लगता था वह किसी संकट से ग्रस्त है। महाराज शिवि अभी अच्छी तरह सोच भी नहीं सके थे कि कबूतर का पीछा करता हुआ एक बाज भी वहाँ आ पहुँचा। एक बार उसने ललचाई दृष्टि से कपोत की ओर देखा फिर सिंहासन के दक्षिण पार्श्व में बैठता हुआ बोला-महाराज! कबूतर मेरा आखेट है आप उसे मुझे सौंप दीजिये।

शिवि बोले- तात! मेरे राज्य में कहीं भी जीव-हिंसा नहीं होती फिर वह कबूतर तो मेरी शरण में आ गया उसे तुम्हें सौंप कर हम जीव हिंसा का पाप अपने सिर पर नहीं ले सकते। कबूतर के बदले तुम और जो कुछ भी चाहो ले सकते हो।

एक का अधिकार छीन कर दूसरे की रक्षा करना कहाँ का धर्म है-महाराज! बाज ने तर्क किया-प्रकृति ने मुझे माँस भोजी बनाया है इसलिये मुझे तो माँस ही चाहिये। जब भी माँस देने की बात आयेगी आपको जीव हिंसा करना ही पड़ेगी इसलिए अच्छा तो यही है कि आप इस कबूतर को ही लौटा दें।

महाराज शिवि! एक क्षण के लिए विचार मग्न से प्रतीत हुये-बाज का कथन गलत नहीं है धर्म की रक्षार्थ बाज को माँस दिया जाये तो वह किसी जीव को मार कर ही दिया जा सकता है। एक की रक्षार्थ दूसरे को मारना पाप ही तो है फिर-तब ऐसा करो बाज, महाराज बोले-तुम्हें इस कबूतर के बराबर तोल कर यदि अपने शरीर से माँस दे दूँ तो- “मुझे कोई इन्कार नहीं” बाज ने सहमति प्रकट कर दी।

क्षण-क्षण चढ़ते-उतरते दृश्यों में ठहराव आ गया। सारी सभा इस आलौकिक न्याय को निस्तब्ध होकर देख रही थी। तराजू मँगाया गया। एक पलड़े में कबूतर के रूप में अग्नि देव को बैठाया गया दूसरी ओर शिवि अपने शरीर का माँस काट कर चढ़ाने लगे। बाँया हाथ, बाँया पाँव, दाँया पाँव तीनों चढ़ गये फिर भी माँस कबूतर के बराबर न हुआ। महामंत्री ने टोका महाराज? कुछ छल हो रहा है तो उन्होंने कहा-धर्म की राह पर चलने वाले वीर, छल-कपट की बात नहीं सोचते महामंत्री उठो और मुझे उठा कर पलड़े पर रख दो यदि कबूतर की रक्षार्थ मेरे प्राण चले जाते हैं तो भी कुछ हर्ज नहीं।

महाराज को पलड़े पर रख दिया गया, दोनों पलड़े बराबर हो गये पर अब भगवान् इन्द्र को और देर तक छद्म वेष में रहना कठिन हो गया शिवि की निष्ठा ने उन्हें पराभूत कर दिया। वे अपने देव रूप में प्रकट हुये और शिवि के धर्मपालन की प्रशंसा करने लगे। उनकी कृपा से शिवि के कटे अंग भी जुड़ गये और जुड़ गया इतिहास में जीव दया और कर्त्तव्य पालन का एक ऐसा पृष्ठ जो युग-युगों तक मनुष्य को कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देता रहेगा।

📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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👉 अहंकारी बाध्यते लक्ष्यः

श्रावस्ती नगरी में सर्वत्र तपस्वी सुधारक की ही चर्चा थी। लोभ और मोह, वासना और तृष्णा पर उन्होंने विजय पा ली थी। तत्वदर्शियों ने साधना से सिद्धि के तीन सोपान बताये हैं–’मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु’। साधु−सुधारक रूपी आरम्भिक दो सोपानों पर चढ़ चुके थे। उनके तप और त्याग से–निस्पृह जीवन चर्या से हर कोई प्रभावित था। लोगों की श्रद्धा एवं सम्मान के सुमन उन पर चढ़ रहे थे। उग्र साधन के ताप में इन्द्रियों की वासना विगलित हो चुकी थी। संयम और तितिक्षा की अग्नि में तपने के बाद मन ने वित्तेषणा की निस्सारता सिद्ध कर दी थी, पर अभी भी लोकेषणा मन के एक कोने में अपना अड्डा मजबूती से जमाये हुई थी। जिसके कारण साधना की अहम्यता पोषण पा रही थी। शास्त्रकारों ने लोकेषणा को सबसे सूक्ष्म और प्रबलतम शत्रु माना है जिस पर विजय पाना प्रायः कठिन पड़ता है। यही तपस्वी सुधारक के साथ हुआ। सम्मान और श्रेय प्राप्त कर सुधारक का अहंकार बढ़ता ही गया।

निरासक्त तपस्वी के प्रति उमड़ने वाली श्रद्धा ने वन, सम्पत्ति, वस्त्र आदि उपादानों के अम्बार लगा दिए। यह देखकर सुधारक के मन में वितर्क उठा कि–अब मेरी तपस्या सफल हो गयी। योग सिद्ध हो गया, जीवन मुक्ति का अधिकारी बन गया। अहंकार साधक के पतन का कारण बनता है। अनेकों स्थानों पर परिव्रज्या के निर्मित परिभ्रमण करने के उपरान्त जब वे आश्रम में वापिस लौटे तो वृद्ध गुरु की तीक्ष्ण दृष्टि से उनका अहंभाव छुपा न रह सका। एक दिन गुरु ने उन्हें पास बुलाया और कहा “वत्स! आश्रम में समिधाएँ समाप्त हो चुकी है। जाओ जंगल से समिधाएँ ले आओ। प्रातःकाल के यज्ञ की तैयारी करनी है। सुधारक ने उपेक्षा दर्शाते हुए कहा–”मुझे अब कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अर्हत् मार्ग पर आरुढ़ हो चुका हूँ।” तत्वदर्शी गुरु भावी आशंका से चिन्तित हो उठे। उन्होंने स्नेह मिश्रित स्वर में कहा–”तात! तुम यह काम रहने दो, पर एक काम अवश्य करो। भगवान बुद्ध श्रावस्ती नगरी में पधारे है। उनसे एक बार अवश्य मिल आओ।” सुधारक ने बुद्ध की ख्याति सुन रखी थी। मन में उत्कण्ठा भी थी मिलने की। गुरु के प्रस्ताव को स्वीकार करके वह महाप्राज्ञ से मिलने चल पड़े।

जैतवन बौद्ध बिहार में बौद्ध भिक्षुकों की मण्डली ठहरी थी। वहाँ पहुँचने पर सुधारक को मालूम हुआ कि बुद्ध भिक्षाटन कि लिए गये है। इतने भिक्षुओं के रहते हुए भी बुद्ध को भिक्षाटन के लिए जाना पड़ता है, यह बात सुधारक की समझ में न आ सकी। खोजते−खोजते एक गृहस्थ के यहाँ भीख मांगते बुद्ध से उनकी भेंट हो गयी। अपना परिचय सुधारक न स्वयं एक तपस्वी के रूप में दिया तथा बन्धन मुक्ति का उपदेश देने का आग्रह किया। महाप्राज्ञ मौन रहे और सुधारक के साथ जैतवन वापिस लौटे। रात्रि विश्राम करने का आदेश देने तथा प्रातः− कान सम्बन्धित विषय पर चर्चा करने के साथ संक्षेप में वार्ता समाप्त की।

दूसरे दिन भगवान बुद्ध के सामने अपनी जिज्ञासा लिए सुधाकर बैठे थे। अंतर्दृष्टा महाप्राज्ञ से सुधारक की स्थिति दर्पण की भाँति स्पष्ट थी। तपस्वी और त्यागी होते हुए भी सुधारक अहंकारी है, यह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से, वे देख चुके थे। उनकी मर्मभेदी वाणी फूट पड़ी–”वत्स! जीवन मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोधक है–अहंकार। यह लोकेषणा की कामना से बढ़त है, पर निरासक्त कर्मयोग–सेवा भावना से भावना से घटता है। लोकसेवा में निरत होकर ही अहंकार पर विजय प्राप्त की जा सकती है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की उच्चस्तरीय अनुभूति इस सेवा साधना से ही सम्भव है।”

सुधारक को अपनी भूल ज्ञान हुई। भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर उन्होंने क्षमा माँगी और लोकसेवा में प्रवृत्त होकर अपनी अवरुद्ध आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने में लग गये।

📖 अखण्ड ज्योति 1982 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 20 May 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 May 2026


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मंगलवार, 19 मई 2026

👉 भावना सर्वोपरि है, विधि−विधान नहीं

कल जन्माष्टमी का उत्सव था। आज राधा गोविन्द जी के मन्दिर में नन्दोत्सव है। दक्षिणेश्वर के काली मन्दिरों की सजावट आज देखते ही बनती है। भक्तजनों के झुँड के झुँड गोविन्दजी के दर्शनों के लिये आ रहे हैं। कीर्तन अपनी चरम सीमा पर है। भक्ति रस की धारा प्रवाहित हो रही है।

दोपहर के भोग के पश्चात् गोविन्दजी के विग्रह को शयन के लिये भीतरी प्रकोष्ठ में ले जाते समय पूजक क्षेत्रनाथ का पाँव फिसल जाने से रंग में भंग हो गया। वह मूर्ति सहित फर्श पर जा गिरे, जिससे मूर्ति का एक पाँव टूट गया। भक्ति रस की धारा मन्द पड़ गयी उसके स्थान पर भय और आशंका के मेथ मंडराने लगे। मन्दिर में बड़ा कोलाहल मच उठा। अपने−अपने मन से सभी भावी अमंगल की सूचना दे रहे थे। सबके चेहरों पर भय की रेखायें खिंच गयी। निश्चय हीं कोई सेवा अपराध हुआ है। उसका दण्ड अमंगल के रूप में सबको भोगना होगा।

रानी रासमणी ने सुना तो वह एक दम सिहर उठी। अब क्या होगा? किन्तु जो कुछ हो चुका था, उसे टाल सकने की सामर्थ्य किस में थी। अब क्या किया जाय, इसके लिये पण्डितों की सभा बुलायी गयी। पण्डित लोगों ने ग्रन्थ देखे, सोच−विचार किया और यह विधान दिया—भग्न विग्रह को गंगा में विसर्जित करके उसके स्थान पर नयी मूर्ति की स्थापना की जाय।

रानी रासमणी को पंडितों का यह निष्ठुर विधान रुचा नहीं किन्तु उसके हाथ की बात भी क्या थी। ब्राह्मणों की सम्मति को टालना उसके बस में कहाँ था। निदान नयी मूर्ति बनवाने का आदेश दे दिया गया। रानी उदास हो गयी। भला इतनी श्रद्धा और प्रेम से जिन गोविन्दजी को इतने दिन पूजा जाता रहा, उन्हें थोड़ी सी बात पर जल में विसर्जित कर देने का कारण उसकी समझ में नहीं आया।

जामाता मधुरबाबू रानी की इस उदासी को ताड़ गये। उन्होंने सम्मति दी—’रानी माँ क्यों न इस विषय में छोटे भट्टाचार्य (स्वामी रामकृष्ण परमहंस) की राय भी जान ली जाय?
रानी स्वामी रामकृष्ण पर विशेष श्रद्धा रखती थीं। उनकी अनूठी निष्ठा व भक्ति के कारण वे उनके द्वारा दिये जाने वाले निर्णय को स्वीकार करने की स्थिति में भी थीं। रानी ने अपने मन की व्यथा रामकृष्ण से कह सुनायी। सुन कर उन्होंने रानी से प्रश्न किया—यदि आप के जामाताओं में से किसी एक का पाँव टूट जाता तो वह उनकी चिकित्सा करवातीं या उनके स्थान पर दूसरे को ले आतीं?

“मैं अपने जामाता की चिकित्सा कराती, उन्हें त्याग कर दूसरे नहीं ले आती।”

“बस उसी प्रकार विग्रह के टूटे पैर को जोड़ कर उसकी सेवा−पूजा यथावत् होती रहे तो उसमें दोष ही क्या है।”

श्री रामकृष्ण परमहंस के इस सहज विधान को सुन कर रानी हर्षित हो उठीं। यद्यपि उनकी यह व्यवस्था ब्राह्मणों के मनोनुकूल नहीं थी। उन्होंने उसका विरोध भी किया पर अब रानी का धर्म संकट समाप्त हो चुका था। उसे स्वामी जी की बात ही पसन्द थी। उसने ब्राह्मणों के विरोध की चिन्ता नहीं की। स्वामी जी ने टूटे विग्रह के पाँव को ऐसा जोड़ दिया कि कुछ पता ही नहीं चलता। पूजा−सेवा उसी प्रकार चलती रही।

एक दिन किन्हीं जमींदार महाशय ने उनसे पूछा— मैंने सुना है आपके गोविन्दजी टूटे हैं। इस पर वे हँस कर बोले—’आप भी कैसी भोली बातें करते हैं जो अखण्ड मंडलाकार हैं, वे कहीं टूटे हो सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति 1974 मार्च

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👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (अंतिम भाग)

मानवी प्रगति के मार्ग में अत्यन्त छोटी किन्तु अत्यन्त भयानक बाधा है- अनियमितता की आदत। आमतौर से लोग अस्त-व्यस्त पाये जाते हैं। हवा के झोंकों के साथ उड़ते रहने वाले पत्तों की तरह कभी इधर कभी उधर कुदकते-फुदकते रहते हैं। निश्चित दिशा न होने से परिश्रम और समय बेतरह बर्बाद होता रहता है। धीमी चाल से चलने की स्वल्प क्षमता रखते हुए भी सतत् प्रयत्न से कछुए ने बाजी जीती थी और बेतरतीब उछलने-भटकने वाला खरगोश अधिक क्षमता सम्पन्न होते हुए भी पराजित घोषित किया गया। सामर्थ्य का जितना महत्व है उससे अधिक महत्ता इस बात की है कि जो कुछ उपलब्ध है उसी को योजनाबद्ध रूप से, नियत क्रम व्यवस्था अपनाकर, सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त किया जाय। जो ऐसा कर पाते हैं वे ही क्रमिक विकास के राजमार्ग पर चलते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचते हैं। जो इस ओर ध्यान नहीं देते उन्हें योग्यता एवं सुविधा के रहते हुए भी पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े रहना पड़ता है। 

जबकि सुनियोजित जीवनचर्या बन सकने वाले एक के बाद दूसरी पीढ़ी पर चढ़ते हुए वहाँ पहुँचते हैं जहाँ साथियों के साथ तुलना करने पर प्रतीत होती है कि कदाचित किसी देव दानव ने ही ऐसा चमत्कार प्रस्तुत किया हो, पर वास्तविकता इतनी ही है कि प्रगतिशील ने नियमितता अपनाई। अपने समय, श्रम और चिन्तन को एक दिशा विशेष में संकल्पपूर्वक नियोजित रखा। इसके विपरीत दुर्भाग्य का पश्चाताप उन्हें सहन करना पड़ता है, जो लम्बी योजना बनाकर उस पर निश्चयपूर्वक चलते रहना तो दूर अपनी दिनचर्या बनाने तक की आवश्यकता नहीं समझते और बहुमूल्य समय को ऐसे ही आलस्य प्रमाद की अस्त-व्यस्तता में गंवाते रहते हैं। कहते हैं कि लक्ष्य और क्रम बनाकर चलने वाली चींटी पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है जब कि प्रमादी गरुड़ ऐसे ही जहाँ-तहाँ पंख फड़फड़ाता और बीट करता दिन गुजारता है।

अच्छी आदतों में सर्वप्रथम गिनने योग्य है- नियमितता। समय और कार्य की संगति बिठाकर योजनाबद्ध दिनचर्या बनाने और उस पर आरुढ़ रहने का नाम नियमितता है। उसके बन पड़ते ही चिन्तन को विचार करने के लिए एक दिशा मिलती है। व्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर चलने से शरीर को उसमें संलग्न रहने की इच्छा रहती तथा प्रवीणता मिलती है। फलतः सूझबूझ के साथ निश्चित किया गया कार्यक्रम सरलता और सफलतापूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है।

पराक्रमों में सबसे अधिक महत्व का वह है जिसमें अपनी अनगढ़ आदतों को सुधारने का श्रेय पाया जा सके। बाहरी संघर्षों से जूझने और कठिनाइयों को हटाने से दूसरे लोग भी सहायता कर सकते हैं और परिस्थिति वश भी श्रेय मिल सकता है किन्तु अनुपयुक्त आदतों को बदलना मात्र अपने निजी पुरुषार्थ के ऊपर ही रहता है इसलिए उसे प्रबल पराक्रम की संज्ञा दी गई है और ऐसे लोगों को सच्चे अर्थों में शूरवीर कहा गया है।

छोड़ने, बदलने, सुधारने, निखारने योग्य आदतें अनेकों हैं, पर उनमें प्रथम और प्रमुख है- नियमितता। अर्थात् समय, श्रम और चिन्तन को किसी सुनिश्चित दशा में निरन्तर गतिशील रखना।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1981 फरवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 May 2026


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सोमवार, 18 मई 2026

‼️ हमीं एक कदम और आगे बढ़ें ( भाग 2) ‼️

गीताकार ने योगी की व्याख्या करते हुए उसकी पहचान “दिन में सोने रात में जगने की” बताई है। इस अलंकारिक निरूपण का तात्पर्य है दुनियादारी की रीति-नीति को मूर्खतापूर्ण मानकर अपने एकाकी विवेक के आधार पर स्वतन्त्र निर्णय करना। भले ही वे लोक प्रचलन के साथ तालमेल न खाते हों। ऐसा कर गुजरना किसी के लिए भी सम्भव है। न इसमें घाटा है न मूर्खता। बहुत लोगों द्वारा अपनाये गये ढर्रे को उचित मान बैठना नहीं है। अन्धी भेड़ों के पीछे-पीछे चलने की अपेक्षा रवीन्द्र का वह उद्बोधन मार्मिक है जिसमें ‘एकला चलो रे ‘ का सूर्य चन्द्र जैसा साहस अपनाने और ज्वलनशील दीपक का अनुकरण करने की प्रेरणा दी गई है। चिन्तन का यह मर्म बिन्दु ही ऐसा है जिसको गर्त में गिरने या आकाश में उछलने की दिशाओं में से किसी एक का वरण किया जा सकता है।

युग मनीषियों की श्रेणी में सम्मिलित होने के लिए किसी उच्च शिक्षित होने के तनिक भी आवश्यकता नहीं है। उसके लिए कबीर जितना अक्षर ज्ञान भी पर्याप्त है। बड़े कुचक्र षड्यन्त्र रचते रहने वाले बहु पथिता को इस देव मानवों की बिरादरी में उनकी डिग्री के कारण सम्मिलित नहीं किया जा सकता। जिस विद्यालय में इन मनीषियों को पढ़ना है उसमें अपना उदाहरण प्रस्तुत करने की एकमात्र योग्यता ही काम करती है। बकवासी वाचालता का काम तो अब टेप रिकार्डर से भी मजे में लिया जा सकता है। आवश्यकता तो स्वल्प शिक्षित बुद्धी की है जिनके अनुगमन के लिए कोई-कोई अन्तःकरण उमड़ पड़े। इन दिनों तिलक चाहिए, सुभाष, पटेल, विनोबा, दयानन्द, विवेकानन्द जैसे धुनी के धनी।

अमृतवाणी:- गुरु शिष्य सम्बन्ध | Guru Shishya Sambandh | https://youtu.be/vwLT4WrMewg?si=i8HCNsd80Ur5ESun

यहाँ वाचालता या चतुरता की नहीं बड़े दिल, बड़े साहस और उदात्त दृष्टिकोण भर की आवश्यकता है। वह जितना जिस अनुपात में होगा वे उतने ही ऊँचे स्तर के युग मनीषा गिने जा सकेंगे और युग की पुकार पूरी करने में महती भूमिका निभाते हुए अपने को कृत-कृत्य कर सकेंगे। इस दिशा में तथाकथित व्यस्त और अभावग्रस्त लोग भी यदि ईमानदारी की यथार्थता अपनायें तो देखेंगे कि प्रतिकूलताओं के बीच भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। बड़ा न सही छोटा योगदान तो गिलहरी से भी बन पड़ा था। मनुष्य अपने को सर्वथा असमर्थ कहे यह बात हजार बार दुहराने पर भी किसी के गले नहीं उतरती है। आदर्शवादिता के क्षेत्र में आन्तरिक कृपणता के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं है। उसी के कारण तो अर्जुन, वकीलों जैसी दलीलें प्रस्तुत करता चला जा रहा है। उसी प्रवंचना को धमकाते हुए गीताकार ने कहा था-प्रज्ञा वाँदाश्च भाष से’। वाचालों की छल भरी भाषा मत बोल। वस्तुस्थिति को समझ और मन की आँखें खोल।

प्रज्ञा परिजनों में इन दिनों ऐसे ही असमंजस भरे व्यामोह से जूझना पड़ेगा। अच्छा हो वे जोखिम उठायें-छलाँग लगायें और हनुमान जैसा दुस्साहस अपनायें। इससे कम में बात बनेगी नहीं, दल-दल में फँसी हुई गाड़ी आगे बढ़ेगी नहीं। परमार्थ के सम्मुख स्वार्थ को सिकोड़ने का ठीक यही समय है। लोभ और मोह में कटौती करते ही ऐसा उपाय निकल आता है जिसमें निर्वाह और परिवार की उचित व्यवस्था पर बिना किसी प्रकार का आन्तरिक दबाव डाले युग धर्म की पुकार सुनने वाले-उसके लिए कुछ करने वाले प्राणवानों के साथ-साथ चला जा सके।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर

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‼️ हमीं एक कदम और आगे बढ़ें ‼️

युगान्तरीय चेतना से परिचित, प्रभावित, प्रशंसक, समर्थक, प्रज्ञा-परिवार को एक कदम आगे बढ़कर अब सघन सहयोग की भूमिका में प्रवेश करना होगा। उन्हें अपना एक विशिष्ट स्तर एवं स्वरूप विनिर्मित करना होगा। समय के परिवर्तन में उनकी भावभरी भूमिका होनी चाहिए। ऐसे भाव-भरी जो उन्हें महामानवों की-युग पुरुषों की-पंक्ति में खड़ा कर दे। ऐसी भावभरी जिसमें त्याग, बलिदान और सेवा साधना का गहरा पुट हो। जो विचार समर्थन से आगे बढ़कर कर्मभूमि में उतरे और एक कुछ करे जिससे समूचे संपर्क क्षेत्र को नव जीवन मिले। ऐसा नव जीवन जिसे उपलब्ध करने वाले कृत-कृत्य होकर रहें और कृतज्ञतापूर्वक अगणित पीढ़ियों तक स्मरण, नमन, वन्दन करते रहें।

बात दूसरे स्तर के साहस भर की है। मानव जीवन दुस्साहसियों से भरा है। इसमें पग-पग पर जोखिम है। त्याग और संयम की विवशता भी बनी ही रहती हैं। इच्छा से नहीं, अनिच्छा से प्रकृति प्रेरणा से करना तो वही पड़ता है। प्रश्न इतना भर है कि क्या वह सब ढर्रे से बाधित होकर करने की अपेक्षा विवेकपूर्वक, अन्तः प्रेरणा से, आदर्शों के निमित्त किया जा सकता है क्या? बाधित होकर या स्वेच्छा पूर्वक-व्यामोह के दबाव से या विवेक भरे उत्साह से चयन इन्हीं दो में से एक का काम करना पड़ता है। जोखिम दोनों में समान है। न चाहने पर भी जो करने के लिए प्रकृति बाधित करती है उसी को यदि अन्तः प्रेरणा से आपत्तिकालीन युग धर्म की पुकार पूरी करने के लिए किया जा सके तो एक शब्द में उसे विवेक भरी साहसिकता और मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली साहसिकता ही कहा जाएगा। समय आ गया कि इस परीक्षा की घड़ी में अपने चयन चुनाव में राजहंसों जैसी उत्कृष्टता का परिचय देना होगा। इस विषम बेला में उन्हें प्रेय का नहीं श्रेय का वरण करना चाहिए।

अमृतवाणी:- भावी महाभारत | Bhavi Mahabharat | Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/IdZz6NdR3IU?si=pEZWJZ2goASbNWUV

मनुष्य कमाता बहुत हैं, पर प्रकृति उसमें से थोड़ा-सा ही खाने की छूट देती है। चार रोटी ही पेट में प्रवेश कर पाती हैं। चाहने पर भी कोई अधिक उदरस्थ नहीं कर सकता। तन ढकने के वस्त्र, सोने का बिस्तर औसत लम्बाई से अधिक के प्रयुक्त नहीं हो सकते। जो खाया खर्चा उसके उपरान्त का बचत भाग किन्हीं दूसरों के लिए छोड़ना ही पड़ता है। मरने के बाद तो सिकन्दर कुछ न ले जा सका और ताबूत से बाहर खुले हाथ निकलवा कर ऐसे ही रोता-कलपता चला गया। प्रश्न इतना भर है कि उस बचत की अनावश्यक रूप से कुटुम्बियों पर ही लादा जाय या उस स्वाति-बूँद की तरह असंख्य प्यासों पर बरसा दिया जाय? चुना किसे गया इसी में अपनी सूझ-बूझ है। स्वयं के लिए तो सीमित उपयोग ही सम्भव है। यह समय साधना यह उदारता, अपनाने के लिए प्रकृति ने हर किसी को बाधित किया हैं बात इतनी भर है कि व्यामोह की जकड़न ही सब कुछ रही, या आदर्शवादी विवेकशीलता अपनाने वाली आत्म प्रेरणा से भी कुछ करते-धरते न बन पड़ा।

यह सोचना मात्र भ्रम है कि आदर्शवादी गतिविधियों में भाग लेने से-परमार्थ प्रयोजनों में सहयोग करने से घाटा पड़ता है और घर वालों की सुविधा में कमी पड़ती है। इस चिन्तन के पीछे मिथ्या और डर मात्र है। महामानवों में से प्रत्येक की जीवनचर्या पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ढर्रा बदलते समय की थोड़ी-सी असुविधा के अतिरिक्त उनमें से किसी को भी घाटे में नहीं रहना पड़ा। बुद्ध ने क्या खोया? गाँधी को कितना घाटा पड़ा? शंकराचार्य, चाणक्य आदि अन्यान्यों की तरह गोरख धन्धे में उलझे रहने को बुद्धिमानी और आदर्शवादी साहस अपनाने की मूर्खता माने बैठे रहते तो उनकी गणना पेट प्रजनन के कोल्हू में पिलने वाले नर पामरों से अधिक न रही होती। दुनियादार कबीर, नानक दादू, रैदास, ज्ञानेश्वर, चैतन्य, वह न बन सके होते जो कृपणता का परित्याग करने के उपरान्त बन गये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर

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👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (भाग 2)

बुरी आदतें अक्सर दूसरों की देखा-देखी या सम्बद्ध वातावरण के कारण क्रियान्वित होती और स्वभाव का अंग बनती चली जाती हैं। मन का स्वभाव पानी की तरह नीचे की ओर लुढ़कने का है। इन दिनों लोक प्रवाह भी अवांछनियता का पक्षधर ही बन गया है। दोस्ती गाँठने वाले चमकदार व्यक्तियों में से अधिकाँश की आदतें घटिया स्तर की होती हैं। उनके प्रभाव संपर्क से भी वैसा ही अनुकरण चल पड़ता है। इस प्रकार अनायास ही मनुष्य बुरी आदतों का शिकार बनता जाता है। यही है वह चंगुल जिसमें जकड़े हुए लोग हेय जीवन जीते और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम सहते हैं।

जिस क्रम से आदतें अपनाई जाती हैं, उसी रास्ते उन्हें छोड़ा या बदला भी जा सकता है। रुझान, संपर्क, वातावरण, अभ्यास यदि बदला जा सके तो कुछ दिन हैरान करने के बाद आदतें बदल भी जाती हैं। कई बार प्रबल मनोबल के सहारे उन्हें संकल्पपूर्वक एवं झटके से भी उखाड़ा जा सकता है। पर ऐसा होता बहुत ही कम है। बाहर की अवांछनियताओं से जूझने के तो अनेक उपाय हैं, पर आन्तरिक दुर्बलताओं से एकबारगी गुंथ जाना और उन्हें पछाड़ कर ही पीछे हटना किन्हीं मनस्वी लोगों के लिए ही सम्भव होता है। दुर्बल मन वाले तो छोड़ने पकड़ने आगे बढ़ने पीछे हटने के कुचक्र में ही फंसे रहते हैं। अभीष्ट परिवर्तन होने पर उसका दोष जिस-तिस पर मढ़ते रहते हैं। किन्तु वास्तविकता इतनी ही है कि आत्म परिष्कार के लिए- सत्प्रवृत्तियों के अभ्यस्त बनने के लिए- सुदृढ़ निश्चय के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं। जिन्हें पिछड़ेपन से उबरने और प्रगतिशील जीवन अपनाने की वास्तविक इच्छा हो उन्हें अपनी आदतों का पर्यवेक्षण करना चाहिए और उनमें से जो अनुपयुक्त हों उन्हें छोड़ने, बदलने का सुनिश्चित निर्धारण करना चाहिए। स्वभाग्य निर्माता, प्रगतिशील महामानवों में से प्रत्येक को यही उपाय अपनाना पड़ता है।

अनगढ़ स्थिति में आमतौर से सभी मनुष्य कुसंस्कारी होते हैं। जीव ने क्रमिक विकास के लम्बे रास्ते पर चलते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचने में सफलता पाई है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। महत्वाकाँक्षा ने अधिक उत्तम परिस्थिति प्राप्त करने के लिए तद्नुरूप मनःस्थिति बनाई है। सदुद्देश्य के लिए किये गये प्रयत्नों में नियति भी सहायक होती है और ईश्वर की अनुकम्पा भी। अस्तु जीवधारी को उच्च स्तरीय स्थिति तक पहुँचने की अभिलाषा उसे वहाँ ले आई जहाँ सृष्टि का मुकुट-मणि मनुष्य कहलाने का गर्व-गौरव उपलब्धि हो सके।

इतने पर भी अनेकों में कुसंस्कारों का अभ्यास अभी भी बना हुआ है जो निम्न योनियों की विषम परिस्थितियों में भले ही स्वाभाविक रहे हैं, पर आज उन्हें अपनाये रहने में हानि ही हानि है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1981 फरवरी

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👉 आत्म कल्याण का सरल मार्ग (अंतिम भाग)

जिन्होंने बहुत उपदेश सुने हैं, वे देवता रूप हैं। कारण, जब मनुष्य की प्रवृत्ति अच्छाई की और होती है, तभी वह सदुपदेशों को ग्रहण करता है। तभी सत्संग में बैठता है। तभी मन में और अपने चारों ओर वैसा शुभ सात्विक वातावरण बनाता है। किसी विचार को सुनने का तात्पर्य चुपचाप उसमें रस लेना, उसमें रमण करना भी है। जो जैसा सुनता है, कालान्तर में वैसा ही बन भी जाता है। हम जिन सदुपदेशों को ध्यानपूर्वक सुनेंगे, कल निश्चय ही वैसे बन भी जावेंगे।

एक विद्वान ने कहा है, जल जैसी जमीन पर बहता है उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे विचारों का लोगों की संगति के अनुसार बदल जाता है। इसलिये चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन मूर्ख व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल मिल जाते हैं और उनके संपर्क से अपने आपको भी दुष्ट ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, किन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भय रहती है जहाँ वह, उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे जहाँ हो पर वास्तव में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों या विचारों की सोहबत पसन्द है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति पर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे कर्म करे, यह बहुत ही कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग या सदुपदेशों से ही प्राप्त होती है। स्मरण रखिये कुसंग से बढ़कर कोई हानिकारक वस्तु नहीं हैं सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं है।

जब हम सदुपदेशों की संगति में रहते हैं, तो गुप्त रूप से अच्छाई में बदलते भी रहते हैं। वह सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक क्रिया स्थूल नेत्रों से दीखती नहीं हैं किन्तु इसका प्रभाव तीव्र होता है। अन्ततः मनुष्य उन्हीं के अनुसार बदल जाता है।

गंगा जल से जिस प्रकार शरीर शुद्ध होता है, सदुपदेश से मन बुद्धि और आत्मा पवित्र होती है। धर्मात्मा पुरुषों की शिक्षा एक सुदृढ़ लाठी के समान है जो गिरे हुये पतितों को सहारा देकर ऊंचा उठती है और बुरे अवसरों पर, गिरने से बचा लेती है। जो शिक्षित हैं, उनके लिये सैकड़ों एक से एक सुन्दर अनुभव पूर्ण ग्रन्थ विद्यमान हैं, कवियों, विचारकों इनका मनन व आचरण करना चाहिए। जो अशिक्षित है वे लोग भी धर्मात्माओं के संग से इतनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं कि जिसमें अपने आपको संभाल सकें और विपत्ति के समय अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। स्वयं भगवान गीता में कहते हैं।

नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसं सिद्धः कालेनात्मनि विन्दति
॥4।38
*अर्थात् इस संसार में सद्ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कोई भी पदार्थ नहीं है उस ज्ञान को कितने ही काल से कार्य योग के द्वारा सुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है।*

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2026


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रविवार, 17 मई 2026

👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (भाग 1)

विचार दिशा देते हैं, पर सामर्थ्य आदतों से रहती है। वे ही मनुष्य को किसी निर्धारित दिशा में चलने के लिए न केवल प्रेरणा देती हैं वरन् कई बार तो उसे वे अपने अनुरूप करा लेने के लिए विवश तक कर देती हैं भले ही परिस्थितियाँ अनुकूल न हो। नशेबाजी जैसी आदतें इसका उदाहरण हैं। स्वास्थ्य, पैसा, यश आदि की हानियों को समझते हुए भी नशे के आदी मनुष्य नशा करते और उसके दुष्परिणाम भुगतते हैं। छोड़ने की बात सोचते हुए भी वे वैसा कर नहीं पाते। कारण कि विचारों की तुलना में आदतों की सामर्थ्य अत्यधिक होती है। अनुपयोगी होते हुए भी वे कई बार इतनी प्रबल होती हैं कि पूरा करने के अतिरिक्त और कोई चारा दिखाई नहीं पड़ता। भले या बुरे जीवन क्रम में जितना योगदान आदतों का होता है उतना और किसी का नहीं।

आदतें, आसमान से नहीं उतरतीं। विचारों को कार्यान्वित करते रहने का लम्बा क्रम चलते रहने पर वह अभ्यास आदत बन जाती है और उसे अपनाये रहने में जितना समय बीतता जाता है, उतना ही वह ढर्रा सुदृढ़ होता चला जाता है। वह परिपक्वता कालान्तर में इतनी गहराई से जड़ें जमा लेती है कि उखाड़ने के असामान्य उपाय ही भले सफल हों। सामान्यतया तो वह अभ्यस्त ढर्रा ही जीवन क्रम पर सवार रहता है और उसी पटरी पर गाड़ी लुढ़कती रहती है।

आदतें बनाई जाती हैं, भले ही उनका अभ्यास योजना बनाकर किया गया हो अथवा रुझान, संपर्क, वातावरण परिस्थिति आदि कारणों से अनायास ही बनता चला गया हो। यह आदतें ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व या चरित्र होता है। मनुष्य क्या सोचता है क्या चाहता है, इसका अधिक मूल्य नहीं। परिणाम तो उन गतिविधियों के ही निकलते हैं जो आदतों के अनुरूप क्रियान्वित होती रहती हैं। प्रतिफल तो कर्म ही उत्पन्न करते हैं और वे कर्म अन्य कारणों के अतिरिक्त प्रधानतया आदतों से प्रेरित होते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1981 फरवरी

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👉 आत्म कल्याण का सरल मार्ग (भाग 1)

आत्म कल्याण के लिये परिश्रम तो मनुष्य को स्वयं ही करना पड़ता है, पर सत्संग और सदुपदेश उसके प्रधान अवलम्ब हैं। हमारे कानों को सदुपदेश रूपी सुधा निरन्तर प्राप्त होती ही रहनी चाहिये। मनुष्य का स्वभाव चंचल है। इन्द्रियों की अस्थिरता प्रसिद्ध है। यदि आत्म सुधार में सभी इन्द्रियों को वश में रक्खा जाय तो उचित है। क्योंकि अवसर पाते ही इनकी प्रवृत्ति पतन की ओर होने लगती है। सदुपदेश वह अंकुश है, जो मनुष्य को कर्त्तव्य पथ पर निरन्तर चलते रहने को प्रेरित करता रहता है सत्य से विचलित होते ही कोई शुभ विचार या स्वर्ण-सूत्र पुनः ठीक मार्ग पर ले आता है।

प्रत्येक सदुपदेश एक ठोस प्रेरक विचार है। जैसे कोयले के छोटे से कण में विध्वंशकारी विपुल शक्ति भरी हुई है, उसी प्रकार प्रत्येक सदुपदेश शक्ति का जीता-जागता ज्योति पिंड है। उससे हमको नया प्रकाश और नवीन प्रेरणा प्राप्त होती है। महापुरुषों की अमृतमयी वाणी, कबीर, रहीम, मीरा बाई सूरदास आदि महापुरुषों के प्रवचन, दोहों ओर गीतों में ये महान जीवन सिद्धान्त कूट-कूट कर भरे हुये हैं। जिनका आधार गहरे अनुभव के ऊपर रक्खा गया है। आज ये अमर तत्व-वेत्ता हमारे मध्य नहीं हैं, उनका आर्थिक-शरीर विलुप्त हो गया है पर अपने सदुपदेश के रूप में, वे वह जीवन सार छोड़ गये हैं जो हमारे पथ प्रदर्शन में बड़ा सहायक हो सकता है।

आदमी मर जाता है, उसके साथ उसके साज सामान, महल, दीवारें टूट-फूटकर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु उसके जीवन का सार उपदेश और शिक्षायें-वह अमर वस्तु है नव युगों तक जीवित रहती है। इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने व्यक्ति आये और मृत्यु के प्राप्त हुये, उनका नाम निशान तक शेष नहीं बचा, किन्तु जिन विचारकों, तत्ववेत्ताओं और महापुरुषों ने अपने जीवन के अनुभव रक्खे हैं वे आज भी मशाल की तरह प्रकाश दे रहे हैं।

मनुष्य का अनुभव धीमी गति से धीरे-2 बढ़ता है अब यदि हम केवल अपने ही अनुभवों पर टिके रहें तो, बहुत दिनों में जीवन का सार पा सकेंगे। इस से अच्छा यही है कि हम विद्वानों के अनुभवों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और इन्हें अपने अनुभवों से परखें, तोलें और जीवन में ढालें। सदुपदेशों को ग्रहण करना अपने आप को लाभान्वित करने का एक सरल उपाय है। सदुपदेश हमारे लिये जीते जागते प्रकाश स्तम्भ हैं। जैसे समुद्र में जहाजों को उचित मार्ग बताने के लिये “प्रकाश स्तम्भ” बनाये जाते हैं विद्वानों के ये उपदेश ऐसे ही प्रकाश स्तम्भ हैं।

हमको कोई दूसरा अच्छी सलाह दे, उसको सुनना हमारा कर्त्तव्य है, परन्तु आपके पास अंतरात्मा का निर्देश है। आप अपनी आत्मा की सलाह से काम करते रहिये। कभी धोखा नहीं खावेंगे।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 May 2026


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शनिवार, 16 मई 2026

👉 दूसरों की भावनाओं का भी ध्यान रखिए

अँग्रेजी में एक कहावत है “दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें” तुम नहीं चाहते कि कोई तुम्हारे साथ अशिष्ट व्यवहार करे, तुम्हारा अपमान करे, तुम्हारी अवहेलना करे यदि कोई ऐसा करता है तो तुम्हें बुरा लगता है। अतः सोचो कि जैसा तुम्हें इन बातों से बुरा लगता है, वैसे ही यदि तुम दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करोगे तो उन्हें भी बुरा लगेगा। अतः कर्त्तव्य है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। यह साधारण कर्त्तव्य है, समझदारी है, मनुष्यता है। मनुष्य के चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा इसी के द्वारा सम्भव है कि उसका व्यवहार दूसरों के प्रति कैसा होता है। एक संभ्रान्त सज्जन मनुष्य वह है जो कि अपने आश्रितों अपने से दुर्बलों तथा परिस्थितियों से लाचार मनुष्यों के प्रति सहृदयता, उदारता तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करता है। जो किसी के बिगड़े समय तथा उसकी प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उससे बेजा फायदा उठाता है, वह और भले ही कुछ हो पर निश्चय ही भला आदमी नहीं हैं।

प्रत्येक से मृदु और शिष्ट व्यवहार करो। इससे दूसरों को तुम्हारे प्रति प्रेम और श्रद्धा होगी। इससे अप्रत्यक्ष रूप से तुम्हारा ही लाभ है। अतः यदि पुण्य और परोपकार के भाव से नहीं, निस्वार्थ और त्याग के भाव से नहीं तो व्यक्तिगत लाभ, स्वार्थ व्यवहारिकता की दृष्टि से ही दूसरों के प्रति सदय और विनम्र रहो। लेडी माँटग्यू का कहना है कि शिष्टता में जेब से कुछ खर्च नहीं और वह सब कुछ खरीद लेती है। आप अपने गुरुजनों, बड़ों, बराबर वालो, मित्रों छोटों तथा आश्रितों के प्रति समुचित तथा सद्व्यवहार करेंगे तो उनके लिए तथा अपने लिए आनन्द का स्रोत बहावेंगे। दूसरों को इससे इसलिये प्रसन्नता होती है क्योंकि वे समझते हैं कि आप उनके व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धावान हैं। परन्तु हमें स्वयं तो उनसे भी अधिक हर्ष होता है-इसलिये कि हम में दूसरों के हृदयों को जीत लेने की क्षमता है।

सच पूछा जाय तो अच्छे व्यवहार की शिक्षा हमें स्वयं से प्राप्त होती है। यदि हम समझदार हैं तो अपना ही अनुभव हमें इस स्वप्राप्त शिक्षा की उपादेयता बता देगा। यह शिक्षा किसी स्कूल, कालेज या पुस्तक से इतनी और इतनी अच्छी तरह सीखी जा सकती है जितनी कि स्वयं की बुद्धि से। विनम्र, दयालु, शिष्ट, परोपकारी होने में हमें कौन पैसा खर्चना पड़ता है। केवल इच्छा मात्र की आवश्यकता है। श्री सैमुअल स्माइल्स का कहना है कि समाज में भलमनसाहत का व्यवहार एक उस प्रकाश के शान्त प्रभाव के समान है जो समस्त प्रकृति को रंग देता है। मुखरित शक्ति से यह प्रभाव अधिक शक्तिशाली होता है, कहीं अधिक लाभप्रद है।

साधारण छोटी शिष्टतायें या शिष्टतापूर्ण व्यवहार, जीवन के क्षीण परिवर्तन का आधार बनती हैं। अलग-अलग देखने पर वे बहुत थोड़े मूल्य की जँचेगी, पर उनके एकत्रीकरण में बार-बार दोहराने से वे महत्वपूर्ण बन जाती हैं। वे इसी भाँति साधारण हैं जैसे प्रतिदिन एक पैनी बचाने पर बारह मास में या जीवनभर वैसा करने से क्या महत परिणाम होगा, इस सम्बन्ध में सर्वविदित कहावत वाली बात सामने आती है।

अच्छे श्रोता बनिये। हर मनुष्य अपनी ही कहना चाहता है। कोई किसी की सुनना नहीं चाहता। आप पहले समझदारी से दिल के साथ उसकी पूरी बात सुन तो लीजिये उसे सब कुछ कह तो लेने दीजिये, उसे अपना हृदय तो हल्का कर लेने दीजिये। एक बार उसे मनमानी कह लेने दीजिये। फिर तो आपका बिना मोल का गुलाम हो जायगा। और तब आप उससे चाहे जो कुछ कहेंगे वह ध्यान और प्रेम से आपकी बातें सुनेगा और मानेगा।

वैसे ही दूसरों की सम्मति का आदर कीजिये। कुछ लोग दूसरों की सन्मति सुनना ही नहीं चाहते आपको उससे मतभेद हो सकता है, पर आपमें सहनशीलता तो होनी ही चाहिये। ‘सुने सब की करे मन की’ में भी यही बात बताई गई है। आपको विरोध ही, मतभेद प्रकट करना है तो खूबसूरती से मिठास से, समझदारी से प्रकट करना चाहिये। यह तो आपके हाथ में है। अपने इतिहास में हमने पढ़ा है कि एक महान् यवन सम्राट की लिखी हुई बातों को एक व्यक्ति ने गलत बनाया। सम्राट ने उसके कहे अनुसार परिवर्तन कर दिया। उसके जाने के बाद महामन्त्री ने पूछा आपने ऐसा क्यों किया जबकि आप जानते थे कि आप ठीक थे। सम्राट ने कहा मुझे अपनी बात पर विश्वास था। उसके जाने के बाद मैं फिर पहले का जैसा रहने दूँगा। पर उसके कहे अनुसार करने से मेरी कुछ हानि नहीं हुई और उसको आत्मिक प्रसन्नता हुई होगी। अब आप ही सोचिये यदि उक्त मनुष्य को सम्राट की इस उदारता का जब पता चला होगा तो वह सदा को उनके हाथों बिक गया होगा। उक्त उदाहरण दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो की महत्ता का द्योतक है। सिद्धान्तों और सम्मतियों पर दृढ़ता के साथ स्थिर रहना बुरा नहीं है पर यह काम विनम्रता और स्नेहपूर्वक भी किया जा सकता है, न कि जोर जबरदस्ती लड़ झगड़ कर, घूसों और गालियों के बल पर। कड़े शब्द तथा व्यंग ऐसे है जिनकी चोट का जख्म कभी नहीं भरता। प्रत्येक वस्तु में अपनी आत्मीयता स्थापित करो। दूरी और परायापन अच्छी बात नहीं है। हो सकता है जिसे आज तुम गैर, दूसरा और विरोधी समझ रहे हो, ठीक से देखने-परखने पर तुम्हें अपना और निकट का ही लगे। शर्त केवल एक है, अपनी ही मत हाँके जाओ। अपनी ही भावनाओं इच्छाओं, विचारों का ध्यान मत करो। दूसरों की भावनाओं, विचारों का भी ध्यान रखो। एक बार एक अंग्रेज उपदेशक ने एक सुन्दर चुटकुला कहा। यह वह था- एक दिन प्रातः जब धुन्ध छाया था मैं पर्वत पर जा रहा था। दूर पर्वत पर एक विचित्र सी लगती हिलती-जुलती वस्तु मुझे दीखी जो राक्षस की भाँति मुझे लगी। परन्तु जब मैं अधिक निकट आ गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह एक मनुष्य था। और जब मैं उसके बहुत निकट पहुँच गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह तो मेरा ही भाई है।

दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखने पर तुम उसके निकट पहुँच सकोगे। उसकी आत्मीयता के कारण तुम उसके वास्तविक, सच्चे रूप को पहचानने में अधिक समर्थ होंगे। अतः संसार को अपने अनुकूल कर लेने का, जीवन में सदा सफलता पाने का दूसरों के हृदयों को जीतने का, स्वार्थ और परमार्थ दोनों के लिये यह आवश्यक है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। गरीब, अमीर, विद्वान, मूर्ख, राजा, पुरोहित, व्यापारी, विद्यार्थी, स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, युवा सभी के लिए सुलभ है कि वे सहृदय, सरल, सरस सहानुभूतिपूर्ण, सच्चा और खुला हुआ हृदय सबके लिए रखें। यह एक ईश्वरीय वरदान है। जो दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना जानते हैं उनमें ये समस्त गुण स्वतः आ जाते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 इस पवित्र देह से पाप मत कीजिए

मनुष्य का पतन शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से होता है। हमको जिस प्रकार शरीर और व्यवहार सम्बन्धी विषयों में सावधान रहने की आवश्यकता है, उसी प्रकार मानसिक दोषों से भी सतर्क रहना आवश्यक है। मानसिक दोष सूक्ष्म इन्द्रियों के विषय होने के कारण अधिक कठिनता से दूर किये जा सकते हैं। मानसिक दोष ही वास्तविक पाप हैं और उनसे प्रत्येक क्षण सावधान रहना बचे रहना परमावश्यक है।

काम क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असंयम, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा मनुष्य में रहने वाले ये बाहरी दोष तनिक सा अवसर पाते ही उत्तरोत्तर बढ़ने लगते हैं।
मुनि सनत्सुजात के अनुसार, “जैसे व्याध मृगों को मारने का अवसर देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक-एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उस पर आक्रमण करता है।”

अपनी बहुत बड़ाई करने वाला, लोलुप, अहंकारी, क्रोधी, चंचल और आश्रित की रक्षा न करने वाले ये 6 प्रकार के मनुष्य पापी होते हैं। महान संकट के पड़ने पर भी जो निडर होकर पाप कर्मों का आचरण करते हैं। सम्भोग में ही मन रखने वाला, विषमता रखने वाले, अत्यन्त भारी दान देकर पश्चाताप करने वाला, कृपण, काम की प्रशंसा करने वाला तथा स्त्रियों के द्वेषी ये सात तथा पहले के छः ये तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंस कहे गये हैं। इनसे सावधान रहें?

मनुष्य प्रायः तीन तरह से पाप में प्रवृत्त होता है। (1) शरीर (2) वाणी और (3) मन द्वारा। इनके भी विभिन्न रूप हो सकते हैं। विभिन्न अवस्थायें और स्तर हो सकते हैं। ये प्रत्येक मनुष्य का अधःपतन करने में समर्थ हैं। तीनों द्वार बन्द रक्खें, शरीर, मन और वाणी का उपयोग करते हुये बड़े सचेत रहें। कहीं ऐसा न हो कि आत्म संयम की शिथिलता आ जाए और पाप पथ पर चले जायं।

शरीर के पापों में से समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं। जिन्हें रखने से ईश्वर के भव्य मन्दिर रूपी पार कराने वाले पवित्र मानव शरीर को भयंकर हानि पहुँचती है। कंचन तुल्य काया में ऐसे विचार उपस्थिति हो जाते हैं जिनसे जीवित अवस्था में ही मनुष्य नर्क की यन्त्रणायें प्राप्त करता है।

हिंसा प्रथम कायिक पाप है। आप सशक्त हैं, तो हिंसा द्वारा अशक्त पर अनुचित दबाव डालकर पाप करते हैं। मद् ईर्ष्या द्वेष आदि की उत्तेजना में आकर निर्बलों को दबाना, मारपीट या हत्या करना जीवन को गहन अवसाद से भर लेना। हिंसक की आत्मा मर जाती है। उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, उसकी मुख मुद्रा से क्रोध, घृणा, द्वेष की अग्नि निकला करती है।

चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती, रिश्वत आदि तो स्थूल रूप में चोरी है ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, या सहायता या वस्तु देने आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। इसलिये ये कार्य अनिष्टकारी एवं त्याजनीय हैं।

व्यभिचार मानवता का सबसे निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य-पाप-पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनायें सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान् दुःख होता है। मनुष्य आत्म उन्नति का रोगी बन जाता है, जिससे आत्मा तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक सुख, बाल बच्चों, पत्नि का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है। परमपिता परमात्मा ने यह मनुष्य देह सुकार्य करने के लिए दी है। इसलिए इस जीवन में अच्छे कर्म ही करते रहना चाहिये जिनसे आत्मा का कल्याण हो। तथा साथ ही समाज का भी भला हो, जिससे सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो सके।

📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 May 2026

 

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 May 2026


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शुक्रवार, 15 मई 2026

👉 चिन्तन कम ही कीजिए।

क्या आप अत्याधिक चिन्तनशील प्रकृति के हैं? सारे दिन अपनी बाबत कुछ न कुछ गंभीरता से सोचा ही करते हैं? कल हमारे व्यापार में हानि होगी या लाभ, बाजार के भाव ऊँचे जायेंगे, या नीचे गिरेंगे। अमुक ने हमारा रुपया उधार ले रखा है, वह वापस करेगा भी या हड़प लेगा? दिनों दिन बाजार में महंगाई उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। कल का खर्च कैसे चलेगा? कन्या बड़ी होती जा रही है। उसके लिये योग्य समृद्ध और शिक्षित वर का कैसे प्रबन्ध होगा? हमारा पुत्र पढ़ता कम है। सारा समय खेलने में व्यतीत करता है। परीक्षा में कैसे उत्तीर्ण होगा? हमारी नौकरी लगी रहेगी, या छूट जायगी? हमारा स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, कैसे सुधरेगा? हमें जल्दी ही लम्बी यात्रा पर जाना है। मार्ग की कठिनाइयाँ कैसे हल होंगी? ऐसी ही किसी समस्या को लेकर आप दिन-रात चिन्तन करते रहते हैं।

आप अपने मस्तिष्क को सारे दिन विशेषतः रात में किसी भी चिन्तन की क्रिया में डाल देते हैं। जैसे गाड़ी का पहिया किसी लीक में पड़ कर आगे निरन्तर उसी दिशा में बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मस्तिष्क को चिन्तन की किसी भी समस्या में उसको लगा देने से वह उसी में फँसा रहता है। वह खुद रुकता नहीं बल्कि चिन्तन के प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है। मस्तिष्क तो चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा। वह विश्राम की परवाह न कर बौद्धिक चिन्तन ही किए जायगा।

आधुनिक मनोविज्ञान वेत्ताओं की नई खोज यह है कि अधिक बौद्धिक चिन्तन मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक है। जो जितना अधिक मानसिक चिन्तन करता है, उसका शरीर उतना ही क्षीण होता जाता है। भूख नष्ट हो जाती है। भोजन में कोई भी रुचि नहीं रह जाती। रक्तचाप, व्रण, हृदय रोग, सिर दर्द आदि उभर उठते हैं। चिन्तनशील व्यक्ति प्रायः भयभीत से, शंकालु से और भविष्य के लिए चिन्तित रहते हैं। गुप्त मन में बैठा हुआ उनका भय ही उन्हें खाया करता है।

आप बौद्धिक चिन्तन या मानसिक श्रम करने वालों के स्वास्थ्य को देखिए। वे पहले दुबले रहते हैं तो भी शरीर पर माँस नहीं बढ़ता। उनकी हड़ियाँ ही हड्डियाँ चमका करती हैं। मेरे एक मित्र हैं जो लेखन का काम करते हैं। एक दिन मेरे पास आये। बोले रात में नींद नहीं आती। फल यह होता है कि सारे दिन थकान बनी रहती है। हाथ पाँव टूटते से रहते हैं। नेत्रों में नींद छाई रहती है और सर भारी रहता है। डॉक्टर को दिखाया तो न बुखार है, न इन्फ्यूलेन्जा, न और कोई शारीरिक विकार पर थकान बनी रहती है। दिमाग में सारे दिन रात एक अजीब प्रकार का तनाव बना रहता है।

हमने उन्हें बताया कि इस मानसिक व्यग्रता का मुख्य कारण सतत चिन्तन है। अधिक बौद्धिक चिन्तन से स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। उसी की प्रतिक्रिया इनके शरीर पर दिखाई देती है। इन्होंने अपने मस्तिष्क को आराम नहीं दिया वरन् लगातार चिन्तन करते-करते उसे इतना कार्य बोझिल बना दिया कि मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिक सोचने-विचारने से, दिमाग सारे दिन चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया। इससे शारीरिक क्रियाओं में रुकावट उत्पन्न होने लगी। फलस्वरूप अपने को मानसिक दृष्टि से थका हुआ पाने लगे।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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