सोमवार, 18 मई 2026

‼️ हमीं एक कदम और आगे बढ़ें ( भाग 2) ‼️

गीताकार ने योगी की व्याख्या करते हुए उसकी पहचान “दिन में सोने रात में जगने की” बताई है। इस अलंकारिक निरूपण का तात्पर्य है दुनियादारी की रीति-नीति को मूर्खतापूर्ण मानकर अपने एकाकी विवेक के आधार पर स्वतन्त्र निर्णय करना। भले ही वे लोक प्रचलन के साथ तालमेल न खाते हों। ऐसा कर गुजरना किसी के लिए भी सम्भव है। न इसमें घाटा है न मूर्खता। बहुत लोगों द्वारा अपनाये गये ढर्रे को उचित मान बैठना नहीं है। अन्धी भेड़ों के पीछे-पीछे चलने की अपेक्षा रवीन्द्र का वह उद्बोधन मार्मिक है जिसमें ‘एकला चलो रे ‘ का सूर्य चन्द्र जैसा साहस अपनाने और ज्वलनशील दीपक का अनुकरण करने की प्रेरणा दी गई है। चिन्तन का यह मर्म बिन्दु ही ऐसा है जिसको गर्त में गिरने या आकाश में उछलने की दिशाओं में से किसी एक का वरण किया जा सकता है।

युग मनीषियों की श्रेणी में सम्मिलित होने के लिए किसी उच्च शिक्षित होने के तनिक भी आवश्यकता नहीं है। उसके लिए कबीर जितना अक्षर ज्ञान भी पर्याप्त है। बड़े कुचक्र षड्यन्त्र रचते रहने वाले बहु पथिता को इस देव मानवों की बिरादरी में उनकी डिग्री के कारण सम्मिलित नहीं किया जा सकता। जिस विद्यालय में इन मनीषियों को पढ़ना है उसमें अपना उदाहरण प्रस्तुत करने की एकमात्र योग्यता ही काम करती है। बकवासी वाचालता का काम तो अब टेप रिकार्डर से भी मजे में लिया जा सकता है। आवश्यकता तो स्वल्प शिक्षित बुद्धी की है जिनके अनुगमन के लिए कोई-कोई अन्तःकरण उमड़ पड़े। इन दिनों तिलक चाहिए, सुभाष, पटेल, विनोबा, दयानन्द, विवेकानन्द जैसे धुनी के धनी।

अमृतवाणी:- गुरु शिष्य सम्बन्ध | Guru Shishya Sambandh | https://youtu.be/vwLT4WrMewg?si=i8HCNsd80Ur5ESun

यहाँ वाचालता या चतुरता की नहीं बड़े दिल, बड़े साहस और उदात्त दृष्टिकोण भर की आवश्यकता है। वह जितना जिस अनुपात में होगा वे उतने ही ऊँचे स्तर के युग मनीषा गिने जा सकेंगे और युग की पुकार पूरी करने में महती भूमिका निभाते हुए अपने को कृत-कृत्य कर सकेंगे। इस दिशा में तथाकथित व्यस्त और अभावग्रस्त लोग भी यदि ईमानदारी की यथार्थता अपनायें तो देखेंगे कि प्रतिकूलताओं के बीच भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। बड़ा न सही छोटा योगदान तो गिलहरी से भी बन पड़ा था। मनुष्य अपने को सर्वथा असमर्थ कहे यह बात हजार बार दुहराने पर भी किसी के गले नहीं उतरती है। आदर्शवादिता के क्षेत्र में आन्तरिक कृपणता के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं है। उसी के कारण तो अर्जुन, वकीलों जैसी दलीलें प्रस्तुत करता चला जा रहा है। उसी प्रवंचना को धमकाते हुए गीताकार ने कहा था-प्रज्ञा वाँदाश्च भाष से’। वाचालों की छल भरी भाषा मत बोल। वस्तुस्थिति को समझ और मन की आँखें खोल।

प्रज्ञा परिजनों में इन दिनों ऐसे ही असमंजस भरे व्यामोह से जूझना पड़ेगा। अच्छा हो वे जोखिम उठायें-छलाँग लगायें और हनुमान जैसा दुस्साहस अपनायें। इससे कम में बात बनेगी नहीं, दल-दल में फँसी हुई गाड़ी आगे बढ़ेगी नहीं। परमार्थ के सम्मुख स्वार्थ को सिकोड़ने का ठीक यही समय है। लोभ और मोह में कटौती करते ही ऐसा उपाय निकल आता है जिसमें निर्वाह और परिवार की उचित व्यवस्था पर बिना किसी प्रकार का आन्तरिक दबाव डाले युग धर्म की पुकार सुनने वाले-उसके लिए कुछ करने वाले प्राणवानों के साथ-साथ चला जा सके।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर

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‼️ हमीं एक कदम और आगे बढ़ें ‼️

युगान्तरीय चेतना से परिचित, प्रभावित, प्रशंसक, समर्थक, प्रज्ञा-परिवार को एक कदम आगे बढ़कर अब सघन सहयोग की भूमिका में प्रवेश करना होगा। उन्हें अपना एक विशिष्ट स्तर एवं स्वरूप विनिर्मित करना होगा। समय के परिवर्तन में उनकी भावभरी भूमिका होनी चाहिए। ऐसे भाव-भरी जो उन्हें महामानवों की-युग पुरुषों की-पंक्ति में खड़ा कर दे। ऐसी भावभरी जिसमें त्याग, बलिदान और सेवा साधना का गहरा पुट हो। जो विचार समर्थन से आगे बढ़कर कर्मभूमि में उतरे और एक कुछ करे जिससे समूचे संपर्क क्षेत्र को नव जीवन मिले। ऐसा नव जीवन जिसे उपलब्ध करने वाले कृत-कृत्य होकर रहें और कृतज्ञतापूर्वक अगणित पीढ़ियों तक स्मरण, नमन, वन्दन करते रहें।

बात दूसरे स्तर के साहस भर की है। मानव जीवन दुस्साहसियों से भरा है। इसमें पग-पग पर जोखिम है। त्याग और संयम की विवशता भी बनी ही रहती हैं। इच्छा से नहीं, अनिच्छा से प्रकृति प्रेरणा से करना तो वही पड़ता है। प्रश्न इतना भर है कि क्या वह सब ढर्रे से बाधित होकर करने की अपेक्षा विवेकपूर्वक, अन्तः प्रेरणा से, आदर्शों के निमित्त किया जा सकता है क्या? बाधित होकर या स्वेच्छा पूर्वक-व्यामोह के दबाव से या विवेक भरे उत्साह से चयन इन्हीं दो में से एक का काम करना पड़ता है। जोखिम दोनों में समान है। न चाहने पर भी जो करने के लिए प्रकृति बाधित करती है उसी को यदि अन्तः प्रेरणा से आपत्तिकालीन युग धर्म की पुकार पूरी करने के लिए किया जा सके तो एक शब्द में उसे विवेक भरी साहसिकता और मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली साहसिकता ही कहा जाएगा। समय आ गया कि इस परीक्षा की घड़ी में अपने चयन चुनाव में राजहंसों जैसी उत्कृष्टता का परिचय देना होगा। इस विषम बेला में उन्हें प्रेय का नहीं श्रेय का वरण करना चाहिए।

अमृतवाणी:- भावी महाभारत | Bhavi Mahabharat | Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/IdZz6NdR3IU?si=pEZWJZ2goASbNWUV

मनुष्य कमाता बहुत हैं, पर प्रकृति उसमें से थोड़ा-सा ही खाने की छूट देती है। चार रोटी ही पेट में प्रवेश कर पाती हैं। चाहने पर भी कोई अधिक उदरस्थ नहीं कर सकता। तन ढकने के वस्त्र, सोने का बिस्तर औसत लम्बाई से अधिक के प्रयुक्त नहीं हो सकते। जो खाया खर्चा उसके उपरान्त का बचत भाग किन्हीं दूसरों के लिए छोड़ना ही पड़ता है। मरने के बाद तो सिकन्दर कुछ न ले जा सका और ताबूत से बाहर खुले हाथ निकलवा कर ऐसे ही रोता-कलपता चला गया। प्रश्न इतना भर है कि उस बचत की अनावश्यक रूप से कुटुम्बियों पर ही लादा जाय या उस स्वाति-बूँद की तरह असंख्य प्यासों पर बरसा दिया जाय? चुना किसे गया इसी में अपनी सूझ-बूझ है। स्वयं के लिए तो सीमित उपयोग ही सम्भव है। यह समय साधना यह उदारता, अपनाने के लिए प्रकृति ने हर किसी को बाधित किया हैं बात इतनी भर है कि व्यामोह की जकड़न ही सब कुछ रही, या आदर्शवादी विवेकशीलता अपनाने वाली आत्म प्रेरणा से भी कुछ करते-धरते न बन पड़ा।

यह सोचना मात्र भ्रम है कि आदर्शवादी गतिविधियों में भाग लेने से-परमार्थ प्रयोजनों में सहयोग करने से घाटा पड़ता है और घर वालों की सुविधा में कमी पड़ती है। इस चिन्तन के पीछे मिथ्या और डर मात्र है। महामानवों में से प्रत्येक की जीवनचर्या पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ढर्रा बदलते समय की थोड़ी-सी असुविधा के अतिरिक्त उनमें से किसी को भी घाटे में नहीं रहना पड़ा। बुद्ध ने क्या खोया? गाँधी को कितना घाटा पड़ा? शंकराचार्य, चाणक्य आदि अन्यान्यों की तरह गोरख धन्धे में उलझे रहने को बुद्धिमानी और आदर्शवादी साहस अपनाने की मूर्खता माने बैठे रहते तो उनकी गणना पेट प्रजनन के कोल्हू में पिलने वाले नर पामरों से अधिक न रही होती। दुनियादार कबीर, नानक दादू, रैदास, ज्ञानेश्वर, चैतन्य, वह न बन सके होते जो कृपणता का परित्याग करने के उपरान्त बन गये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर

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👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (भाग 2)

बुरी आदतें अक्सर दूसरों की देखा-देखी या सम्बद्ध वातावरण के कारण क्रियान्वित होती और स्वभाव का अंग बनती चली जाती हैं। मन का स्वभाव पानी की तरह नीचे की ओर लुढ़कने का है। इन दिनों लोक प्रवाह भी अवांछनियता का पक्षधर ही बन गया है। दोस्ती गाँठने वाले चमकदार व्यक्तियों में से अधिकाँश की आदतें घटिया स्तर की होती हैं। उनके प्रभाव संपर्क से भी वैसा ही अनुकरण चल पड़ता है। इस प्रकार अनायास ही मनुष्य बुरी आदतों का शिकार बनता जाता है। यही है वह चंगुल जिसमें जकड़े हुए लोग हेय जीवन जीते और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम सहते हैं।

जिस क्रम से आदतें अपनाई जाती हैं, उसी रास्ते उन्हें छोड़ा या बदला भी जा सकता है। रुझान, संपर्क, वातावरण, अभ्यास यदि बदला जा सके तो कुछ दिन हैरान करने के बाद आदतें बदल भी जाती हैं। कई बार प्रबल मनोबल के सहारे उन्हें संकल्पपूर्वक एवं झटके से भी उखाड़ा जा सकता है। पर ऐसा होता बहुत ही कम है। बाहर की अवांछनियताओं से जूझने के तो अनेक उपाय हैं, पर आन्तरिक दुर्बलताओं से एकबारगी गुंथ जाना और उन्हें पछाड़ कर ही पीछे हटना किन्हीं मनस्वी लोगों के लिए ही सम्भव होता है। दुर्बल मन वाले तो छोड़ने पकड़ने आगे बढ़ने पीछे हटने के कुचक्र में ही फंसे रहते हैं। अभीष्ट परिवर्तन होने पर उसका दोष जिस-तिस पर मढ़ते रहते हैं। किन्तु वास्तविकता इतनी ही है कि आत्म परिष्कार के लिए- सत्प्रवृत्तियों के अभ्यस्त बनने के लिए- सुदृढ़ निश्चय के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं। जिन्हें पिछड़ेपन से उबरने और प्रगतिशील जीवन अपनाने की वास्तविक इच्छा हो उन्हें अपनी आदतों का पर्यवेक्षण करना चाहिए और उनमें से जो अनुपयुक्त हों उन्हें छोड़ने, बदलने का सुनिश्चित निर्धारण करना चाहिए। स्वभाग्य निर्माता, प्रगतिशील महामानवों में से प्रत्येक को यही उपाय अपनाना पड़ता है।

अनगढ़ स्थिति में आमतौर से सभी मनुष्य कुसंस्कारी होते हैं। जीव ने क्रमिक विकास के लम्बे रास्ते पर चलते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचने में सफलता पाई है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। महत्वाकाँक्षा ने अधिक उत्तम परिस्थिति प्राप्त करने के लिए तद्नुरूप मनःस्थिति बनाई है। सदुद्देश्य के लिए किये गये प्रयत्नों में नियति भी सहायक होती है और ईश्वर की अनुकम्पा भी। अस्तु जीवधारी को उच्च स्तरीय स्थिति तक पहुँचने की अभिलाषा उसे वहाँ ले आई जहाँ सृष्टि का मुकुट-मणि मनुष्य कहलाने का गर्व-गौरव उपलब्धि हो सके।

इतने पर भी अनेकों में कुसंस्कारों का अभ्यास अभी भी बना हुआ है जो निम्न योनियों की विषम परिस्थितियों में भले ही स्वाभाविक रहे हैं, पर आज उन्हें अपनाये रहने में हानि ही हानि है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1981 फरवरी

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👉 आत्म कल्याण का सरल मार्ग (अंतिम भाग)

जिन्होंने बहुत उपदेश सुने हैं, वे देवता रूप हैं। कारण, जब मनुष्य की प्रवृत्ति अच्छाई की और होती है, तभी वह सदुपदेशों को ग्रहण करता है। तभी सत्संग में बैठता है। तभी मन में और अपने चारों ओर वैसा शुभ सात्विक वातावरण बनाता है। किसी विचार को सुनने का तात्पर्य चुपचाप उसमें रस लेना, उसमें रमण करना भी है। जो जैसा सुनता है, कालान्तर में वैसा ही बन भी जाता है। हम जिन सदुपदेशों को ध्यानपूर्वक सुनेंगे, कल निश्चय ही वैसे बन भी जावेंगे।

एक विद्वान ने कहा है, जल जैसी जमीन पर बहता है उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे विचारों का लोगों की संगति के अनुसार बदल जाता है। इसलिये चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन मूर्ख व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल मिल जाते हैं और उनके संपर्क से अपने आपको भी दुष्ट ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, किन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भय रहती है जहाँ वह, उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे जहाँ हो पर वास्तव में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों या विचारों की सोहबत पसन्द है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति पर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे कर्म करे, यह बहुत ही कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग या सदुपदेशों से ही प्राप्त होती है। स्मरण रखिये कुसंग से बढ़कर कोई हानिकारक वस्तु नहीं हैं सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं है।

जब हम सदुपदेशों की संगति में रहते हैं, तो गुप्त रूप से अच्छाई में बदलते भी रहते हैं। वह सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक क्रिया स्थूल नेत्रों से दीखती नहीं हैं किन्तु इसका प्रभाव तीव्र होता है। अन्ततः मनुष्य उन्हीं के अनुसार बदल जाता है।

गंगा जल से जिस प्रकार शरीर शुद्ध होता है, सदुपदेश से मन बुद्धि और आत्मा पवित्र होती है। धर्मात्मा पुरुषों की शिक्षा एक सुदृढ़ लाठी के समान है जो गिरे हुये पतितों को सहारा देकर ऊंचा उठती है और बुरे अवसरों पर, गिरने से बचा लेती है। जो शिक्षित हैं, उनके लिये सैकड़ों एक से एक सुन्दर अनुभव पूर्ण ग्रन्थ विद्यमान हैं, कवियों, विचारकों इनका मनन व आचरण करना चाहिए। जो अशिक्षित है वे लोग भी धर्मात्माओं के संग से इतनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं कि जिसमें अपने आपको संभाल सकें और विपत्ति के समय अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। स्वयं भगवान गीता में कहते हैं।

नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसं सिद्धः कालेनात्मनि विन्दति
॥4।38
*अर्थात् इस संसार में सद्ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कोई भी पदार्थ नहीं है उस ज्ञान को कितने ही काल से कार्य योग के द्वारा सुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है।*

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2026


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रविवार, 17 मई 2026

👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (भाग 1)

विचार दिशा देते हैं, पर सामर्थ्य आदतों से रहती है। वे ही मनुष्य को किसी निर्धारित दिशा में चलने के लिए न केवल प्रेरणा देती हैं वरन् कई बार तो उसे वे अपने अनुरूप करा लेने के लिए विवश तक कर देती हैं भले ही परिस्थितियाँ अनुकूल न हो। नशेबाजी जैसी आदतें इसका उदाहरण हैं। स्वास्थ्य, पैसा, यश आदि की हानियों को समझते हुए भी नशे के आदी मनुष्य नशा करते और उसके दुष्परिणाम भुगतते हैं। छोड़ने की बात सोचते हुए भी वे वैसा कर नहीं पाते। कारण कि विचारों की तुलना में आदतों की सामर्थ्य अत्यधिक होती है। अनुपयोगी होते हुए भी वे कई बार इतनी प्रबल होती हैं कि पूरा करने के अतिरिक्त और कोई चारा दिखाई नहीं पड़ता। भले या बुरे जीवन क्रम में जितना योगदान आदतों का होता है उतना और किसी का नहीं।

आदतें, आसमान से नहीं उतरतीं। विचारों को कार्यान्वित करते रहने का लम्बा क्रम चलते रहने पर वह अभ्यास आदत बन जाती है और उसे अपनाये रहने में जितना समय बीतता जाता है, उतना ही वह ढर्रा सुदृढ़ होता चला जाता है। वह परिपक्वता कालान्तर में इतनी गहराई से जड़ें जमा लेती है कि उखाड़ने के असामान्य उपाय ही भले सफल हों। सामान्यतया तो वह अभ्यस्त ढर्रा ही जीवन क्रम पर सवार रहता है और उसी पटरी पर गाड़ी लुढ़कती रहती है।

आदतें बनाई जाती हैं, भले ही उनका अभ्यास योजना बनाकर किया गया हो अथवा रुझान, संपर्क, वातावरण परिस्थिति आदि कारणों से अनायास ही बनता चला गया हो। यह आदतें ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व या चरित्र होता है। मनुष्य क्या सोचता है क्या चाहता है, इसका अधिक मूल्य नहीं। परिणाम तो उन गतिविधियों के ही निकलते हैं जो आदतों के अनुरूप क्रियान्वित होती रहती हैं। प्रतिफल तो कर्म ही उत्पन्न करते हैं और वे कर्म अन्य कारणों के अतिरिक्त प्रधानतया आदतों से प्रेरित होते हैं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1981 फरवरी

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👉 आत्म कल्याण का सरल मार्ग (भाग 1)

आत्म कल्याण के लिये परिश्रम तो मनुष्य को स्वयं ही करना पड़ता है, पर सत्संग और सदुपदेश उसके प्रधान अवलम्ब हैं। हमारे कानों को सदुपदेश रूपी सुधा निरन्तर प्राप्त होती ही रहनी चाहिये। मनुष्य का स्वभाव चंचल है। इन्द्रियों की अस्थिरता प्रसिद्ध है। यदि आत्म सुधार में सभी इन्द्रियों को वश में रक्खा जाय तो उचित है। क्योंकि अवसर पाते ही इनकी प्रवृत्ति पतन की ओर होने लगती है। सदुपदेश वह अंकुश है, जो मनुष्य को कर्त्तव्य पथ पर निरन्तर चलते रहने को प्रेरित करता रहता है सत्य से विचलित होते ही कोई शुभ विचार या स्वर्ण-सूत्र पुनः ठीक मार्ग पर ले आता है।

प्रत्येक सदुपदेश एक ठोस प्रेरक विचार है। जैसे कोयले के छोटे से कण में विध्वंशकारी विपुल शक्ति भरी हुई है, उसी प्रकार प्रत्येक सदुपदेश शक्ति का जीता-जागता ज्योति पिंड है। उससे हमको नया प्रकाश और नवीन प्रेरणा प्राप्त होती है। महापुरुषों की अमृतमयी वाणी, कबीर, रहीम, मीरा बाई सूरदास आदि महापुरुषों के प्रवचन, दोहों ओर गीतों में ये महान जीवन सिद्धान्त कूट-कूट कर भरे हुये हैं। जिनका आधार गहरे अनुभव के ऊपर रक्खा गया है। आज ये अमर तत्व-वेत्ता हमारे मध्य नहीं हैं, उनका आर्थिक-शरीर विलुप्त हो गया है पर अपने सदुपदेश के रूप में, वे वह जीवन सार छोड़ गये हैं जो हमारे पथ प्रदर्शन में बड़ा सहायक हो सकता है।

आदमी मर जाता है, उसके साथ उसके साज सामान, महल, दीवारें टूट-फूटकर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु उसके जीवन का सार उपदेश और शिक्षायें-वह अमर वस्तु है नव युगों तक जीवित रहती है। इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने व्यक्ति आये और मृत्यु के प्राप्त हुये, उनका नाम निशान तक शेष नहीं बचा, किन्तु जिन विचारकों, तत्ववेत्ताओं और महापुरुषों ने अपने जीवन के अनुभव रक्खे हैं वे आज भी मशाल की तरह प्रकाश दे रहे हैं।

मनुष्य का अनुभव धीमी गति से धीरे-2 बढ़ता है अब यदि हम केवल अपने ही अनुभवों पर टिके रहें तो, बहुत दिनों में जीवन का सार पा सकेंगे। इस से अच्छा यही है कि हम विद्वानों के अनुभवों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और इन्हें अपने अनुभवों से परखें, तोलें और जीवन में ढालें। सदुपदेशों को ग्रहण करना अपने आप को लाभान्वित करने का एक सरल उपाय है। सदुपदेश हमारे लिये जीते जागते प्रकाश स्तम्भ हैं। जैसे समुद्र में जहाजों को उचित मार्ग बताने के लिये “प्रकाश स्तम्भ” बनाये जाते हैं विद्वानों के ये उपदेश ऐसे ही प्रकाश स्तम्भ हैं।

हमको कोई दूसरा अच्छी सलाह दे, उसको सुनना हमारा कर्त्तव्य है, परन्तु आपके पास अंतरात्मा का निर्देश है। आप अपनी आत्मा की सलाह से काम करते रहिये। कभी धोखा नहीं खावेंगे।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 May 2026


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शनिवार, 16 मई 2026

👉 दूसरों की भावनाओं का भी ध्यान रखिए

अँग्रेजी में एक कहावत है “दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें” तुम नहीं चाहते कि कोई तुम्हारे साथ अशिष्ट व्यवहार करे, तुम्हारा अपमान करे, तुम्हारी अवहेलना करे यदि कोई ऐसा करता है तो तुम्हें बुरा लगता है। अतः सोचो कि जैसा तुम्हें इन बातों से बुरा लगता है, वैसे ही यदि तुम दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करोगे तो उन्हें भी बुरा लगेगा। अतः कर्त्तव्य है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। यह साधारण कर्त्तव्य है, समझदारी है, मनुष्यता है। मनुष्य के चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा इसी के द्वारा सम्भव है कि उसका व्यवहार दूसरों के प्रति कैसा होता है। एक संभ्रान्त सज्जन मनुष्य वह है जो कि अपने आश्रितों अपने से दुर्बलों तथा परिस्थितियों से लाचार मनुष्यों के प्रति सहृदयता, उदारता तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करता है। जो किसी के बिगड़े समय तथा उसकी प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उससे बेजा फायदा उठाता है, वह और भले ही कुछ हो पर निश्चय ही भला आदमी नहीं हैं।

प्रत्येक से मृदु और शिष्ट व्यवहार करो। इससे दूसरों को तुम्हारे प्रति प्रेम और श्रद्धा होगी। इससे अप्रत्यक्ष रूप से तुम्हारा ही लाभ है। अतः यदि पुण्य और परोपकार के भाव से नहीं, निस्वार्थ और त्याग के भाव से नहीं तो व्यक्तिगत लाभ, स्वार्थ व्यवहारिकता की दृष्टि से ही दूसरों के प्रति सदय और विनम्र रहो। लेडी माँटग्यू का कहना है कि शिष्टता में जेब से कुछ खर्च नहीं और वह सब कुछ खरीद लेती है। आप अपने गुरुजनों, बड़ों, बराबर वालो, मित्रों छोटों तथा आश्रितों के प्रति समुचित तथा सद्व्यवहार करेंगे तो उनके लिए तथा अपने लिए आनन्द का स्रोत बहावेंगे। दूसरों को इससे इसलिये प्रसन्नता होती है क्योंकि वे समझते हैं कि आप उनके व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धावान हैं। परन्तु हमें स्वयं तो उनसे भी अधिक हर्ष होता है-इसलिये कि हम में दूसरों के हृदयों को जीत लेने की क्षमता है।

सच पूछा जाय तो अच्छे व्यवहार की शिक्षा हमें स्वयं से प्राप्त होती है। यदि हम समझदार हैं तो अपना ही अनुभव हमें इस स्वप्राप्त शिक्षा की उपादेयता बता देगा। यह शिक्षा किसी स्कूल, कालेज या पुस्तक से इतनी और इतनी अच्छी तरह सीखी जा सकती है जितनी कि स्वयं की बुद्धि से। विनम्र, दयालु, शिष्ट, परोपकारी होने में हमें कौन पैसा खर्चना पड़ता है। केवल इच्छा मात्र की आवश्यकता है। श्री सैमुअल स्माइल्स का कहना है कि समाज में भलमनसाहत का व्यवहार एक उस प्रकाश के शान्त प्रभाव के समान है जो समस्त प्रकृति को रंग देता है। मुखरित शक्ति से यह प्रभाव अधिक शक्तिशाली होता है, कहीं अधिक लाभप्रद है।

साधारण छोटी शिष्टतायें या शिष्टतापूर्ण व्यवहार, जीवन के क्षीण परिवर्तन का आधार बनती हैं। अलग-अलग देखने पर वे बहुत थोड़े मूल्य की जँचेगी, पर उनके एकत्रीकरण में बार-बार दोहराने से वे महत्वपूर्ण बन जाती हैं। वे इसी भाँति साधारण हैं जैसे प्रतिदिन एक पैनी बचाने पर बारह मास में या जीवनभर वैसा करने से क्या महत परिणाम होगा, इस सम्बन्ध में सर्वविदित कहावत वाली बात सामने आती है।

अच्छे श्रोता बनिये। हर मनुष्य अपनी ही कहना चाहता है। कोई किसी की सुनना नहीं चाहता। आप पहले समझदारी से दिल के साथ उसकी पूरी बात सुन तो लीजिये उसे सब कुछ कह तो लेने दीजिये, उसे अपना हृदय तो हल्का कर लेने दीजिये। एक बार उसे मनमानी कह लेने दीजिये। फिर तो आपका बिना मोल का गुलाम हो जायगा। और तब आप उससे चाहे जो कुछ कहेंगे वह ध्यान और प्रेम से आपकी बातें सुनेगा और मानेगा।

वैसे ही दूसरों की सम्मति का आदर कीजिये। कुछ लोग दूसरों की सन्मति सुनना ही नहीं चाहते आपको उससे मतभेद हो सकता है, पर आपमें सहनशीलता तो होनी ही चाहिये। ‘सुने सब की करे मन की’ में भी यही बात बताई गई है। आपको विरोध ही, मतभेद प्रकट करना है तो खूबसूरती से मिठास से, समझदारी से प्रकट करना चाहिये। यह तो आपके हाथ में है। अपने इतिहास में हमने पढ़ा है कि एक महान् यवन सम्राट की लिखी हुई बातों को एक व्यक्ति ने गलत बनाया। सम्राट ने उसके कहे अनुसार परिवर्तन कर दिया। उसके जाने के बाद महामन्त्री ने पूछा आपने ऐसा क्यों किया जबकि आप जानते थे कि आप ठीक थे। सम्राट ने कहा मुझे अपनी बात पर विश्वास था। उसके जाने के बाद मैं फिर पहले का जैसा रहने दूँगा। पर उसके कहे अनुसार करने से मेरी कुछ हानि नहीं हुई और उसको आत्मिक प्रसन्नता हुई होगी। अब आप ही सोचिये यदि उक्त मनुष्य को सम्राट की इस उदारता का जब पता चला होगा तो वह सदा को उनके हाथों बिक गया होगा। उक्त उदाहरण दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो की महत्ता का द्योतक है। सिद्धान्तों और सम्मतियों पर दृढ़ता के साथ स्थिर रहना बुरा नहीं है पर यह काम विनम्रता और स्नेहपूर्वक भी किया जा सकता है, न कि जोर जबरदस्ती लड़ झगड़ कर, घूसों और गालियों के बल पर। कड़े शब्द तथा व्यंग ऐसे है जिनकी चोट का जख्म कभी नहीं भरता। प्रत्येक वस्तु में अपनी आत्मीयता स्थापित करो। दूरी और परायापन अच्छी बात नहीं है। हो सकता है जिसे आज तुम गैर, दूसरा और विरोधी समझ रहे हो, ठीक से देखने-परखने पर तुम्हें अपना और निकट का ही लगे। शर्त केवल एक है, अपनी ही मत हाँके जाओ। अपनी ही भावनाओं इच्छाओं, विचारों का ध्यान मत करो। दूसरों की भावनाओं, विचारों का भी ध्यान रखो। एक बार एक अंग्रेज उपदेशक ने एक सुन्दर चुटकुला कहा। यह वह था- एक दिन प्रातः जब धुन्ध छाया था मैं पर्वत पर जा रहा था। दूर पर्वत पर एक विचित्र सी लगती हिलती-जुलती वस्तु मुझे दीखी जो राक्षस की भाँति मुझे लगी। परन्तु जब मैं अधिक निकट आ गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह एक मनुष्य था। और जब मैं उसके बहुत निकट पहुँच गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह तो मेरा ही भाई है।

दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखने पर तुम उसके निकट पहुँच सकोगे। उसकी आत्मीयता के कारण तुम उसके वास्तविक, सच्चे रूप को पहचानने में अधिक समर्थ होंगे। अतः संसार को अपने अनुकूल कर लेने का, जीवन में सदा सफलता पाने का दूसरों के हृदयों को जीतने का, स्वार्थ और परमार्थ दोनों के लिये यह आवश्यक है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। गरीब, अमीर, विद्वान, मूर्ख, राजा, पुरोहित, व्यापारी, विद्यार्थी, स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, युवा सभी के लिए सुलभ है कि वे सहृदय, सरल, सरस सहानुभूतिपूर्ण, सच्चा और खुला हुआ हृदय सबके लिए रखें। यह एक ईश्वरीय वरदान है। जो दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना जानते हैं उनमें ये समस्त गुण स्वतः आ जाते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 इस पवित्र देह से पाप मत कीजिए

मनुष्य का पतन शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से होता है। हमको जिस प्रकार शरीर और व्यवहार सम्बन्धी विषयों में सावधान रहने की आवश्यकता है, उसी प्रकार मानसिक दोषों से भी सतर्क रहना आवश्यक है। मानसिक दोष सूक्ष्म इन्द्रियों के विषय होने के कारण अधिक कठिनता से दूर किये जा सकते हैं। मानसिक दोष ही वास्तविक पाप हैं और उनसे प्रत्येक क्षण सावधान रहना बचे रहना परमावश्यक है।

काम क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असंयम, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा मनुष्य में रहने वाले ये बाहरी दोष तनिक सा अवसर पाते ही उत्तरोत्तर बढ़ने लगते हैं।
मुनि सनत्सुजात के अनुसार, “जैसे व्याध मृगों को मारने का अवसर देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक-एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उस पर आक्रमण करता है।”

अपनी बहुत बड़ाई करने वाला, लोलुप, अहंकारी, क्रोधी, चंचल और आश्रित की रक्षा न करने वाले ये 6 प्रकार के मनुष्य पापी होते हैं। महान संकट के पड़ने पर भी जो निडर होकर पाप कर्मों का आचरण करते हैं। सम्भोग में ही मन रखने वाला, विषमता रखने वाले, अत्यन्त भारी दान देकर पश्चाताप करने वाला, कृपण, काम की प्रशंसा करने वाला तथा स्त्रियों के द्वेषी ये सात तथा पहले के छः ये तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंस कहे गये हैं। इनसे सावधान रहें?

मनुष्य प्रायः तीन तरह से पाप में प्रवृत्त होता है। (1) शरीर (2) वाणी और (3) मन द्वारा। इनके भी विभिन्न रूप हो सकते हैं। विभिन्न अवस्थायें और स्तर हो सकते हैं। ये प्रत्येक मनुष्य का अधःपतन करने में समर्थ हैं। तीनों द्वार बन्द रक्खें, शरीर, मन और वाणी का उपयोग करते हुये बड़े सचेत रहें। कहीं ऐसा न हो कि आत्म संयम की शिथिलता आ जाए और पाप पथ पर चले जायं।

शरीर के पापों में से समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं। जिन्हें रखने से ईश्वर के भव्य मन्दिर रूपी पार कराने वाले पवित्र मानव शरीर को भयंकर हानि पहुँचती है। कंचन तुल्य काया में ऐसे विचार उपस्थिति हो जाते हैं जिनसे जीवित अवस्था में ही मनुष्य नर्क की यन्त्रणायें प्राप्त करता है।

हिंसा प्रथम कायिक पाप है। आप सशक्त हैं, तो हिंसा द्वारा अशक्त पर अनुचित दबाव डालकर पाप करते हैं। मद् ईर्ष्या द्वेष आदि की उत्तेजना में आकर निर्बलों को दबाना, मारपीट या हत्या करना जीवन को गहन अवसाद से भर लेना। हिंसक की आत्मा मर जाती है। उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, उसकी मुख मुद्रा से क्रोध, घृणा, द्वेष की अग्नि निकला करती है।

चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती, रिश्वत आदि तो स्थूल रूप में चोरी है ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, या सहायता या वस्तु देने आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। इसलिये ये कार्य अनिष्टकारी एवं त्याजनीय हैं।

व्यभिचार मानवता का सबसे निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य-पाप-पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनायें सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान् दुःख होता है। मनुष्य आत्म उन्नति का रोगी बन जाता है, जिससे आत्मा तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक सुख, बाल बच्चों, पत्नि का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है। परमपिता परमात्मा ने यह मनुष्य देह सुकार्य करने के लिए दी है। इसलिए इस जीवन में अच्छे कर्म ही करते रहना चाहिये जिनसे आत्मा का कल्याण हो। तथा साथ ही समाज का भी भला हो, जिससे सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो सके।

📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 May 2026

 

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 May 2026


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शुक्रवार, 15 मई 2026

👉 चिन्तन कम ही कीजिए।

क्या आप अत्याधिक चिन्तनशील प्रकृति के हैं? सारे दिन अपनी बाबत कुछ न कुछ गंभीरता से सोचा ही करते हैं? कल हमारे व्यापार में हानि होगी या लाभ, बाजार के भाव ऊँचे जायेंगे, या नीचे गिरेंगे। अमुक ने हमारा रुपया उधार ले रखा है, वह वापस करेगा भी या हड़प लेगा? दिनों दिन बाजार में महंगाई उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। कल का खर्च कैसे चलेगा? कन्या बड़ी होती जा रही है। उसके लिये योग्य समृद्ध और शिक्षित वर का कैसे प्रबन्ध होगा? हमारा पुत्र पढ़ता कम है। सारा समय खेलने में व्यतीत करता है। परीक्षा में कैसे उत्तीर्ण होगा? हमारी नौकरी लगी रहेगी, या छूट जायगी? हमारा स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, कैसे सुधरेगा? हमें जल्दी ही लम्बी यात्रा पर जाना है। मार्ग की कठिनाइयाँ कैसे हल होंगी? ऐसी ही किसी समस्या को लेकर आप दिन-रात चिन्तन करते रहते हैं।

आप अपने मस्तिष्क को सारे दिन विशेषतः रात में किसी भी चिन्तन की क्रिया में डाल देते हैं। जैसे गाड़ी का पहिया किसी लीक में पड़ कर आगे निरन्तर उसी दिशा में बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मस्तिष्क को चिन्तन की किसी भी समस्या में उसको लगा देने से वह उसी में फँसा रहता है। वह खुद रुकता नहीं बल्कि चिन्तन के प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है। मस्तिष्क तो चिन्तन का एक यंत्र है। उसका कार्य चिन्तन करना ही है। यदि आप उसे कोई अच्छी या बुरी समस्या दिये रहेंगे, तो निश्चय जानिये, वह उसी समस्या के उखाड़-पछाड़ में संलग्न रहेगा। वह विश्राम की परवाह न कर बौद्धिक चिन्तन ही किए जायगा।

आधुनिक मनोविज्ञान वेत्ताओं की नई खोज यह है कि अधिक बौद्धिक चिन्तन मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक है। जो जितना अधिक मानसिक चिन्तन करता है, उसका शरीर उतना ही क्षीण होता जाता है। भूख नष्ट हो जाती है। भोजन में कोई भी रुचि नहीं रह जाती। रक्तचाप, व्रण, हृदय रोग, सिर दर्द आदि उभर उठते हैं। चिन्तनशील व्यक्ति प्रायः भयभीत से, शंकालु से और भविष्य के लिए चिन्तित रहते हैं। गुप्त मन में बैठा हुआ उनका भय ही उन्हें खाया करता है।

आप बौद्धिक चिन्तन या मानसिक श्रम करने वालों के स्वास्थ्य को देखिए। वे पहले दुबले रहते हैं तो भी शरीर पर माँस नहीं बढ़ता। उनकी हड़ियाँ ही हड्डियाँ चमका करती हैं। मेरे एक मित्र हैं जो लेखन का काम करते हैं। एक दिन मेरे पास आये। बोले रात में नींद नहीं आती। फल यह होता है कि सारे दिन थकान बनी रहती है। हाथ पाँव टूटते से रहते हैं। नेत्रों में नींद छाई रहती है और सर भारी रहता है। डॉक्टर को दिखाया तो न बुखार है, न इन्फ्यूलेन्जा, न और कोई शारीरिक विकार पर थकान बनी रहती है। दिमाग में सारे दिन रात एक अजीब प्रकार का तनाव बना रहता है।

हमने उन्हें बताया कि इस मानसिक व्यग्रता का मुख्य कारण सतत चिन्तन है। अधिक बौद्धिक चिन्तन से स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पड़ता है। उसी की प्रतिक्रिया इनके शरीर पर दिखाई देती है। इन्होंने अपने मस्तिष्क को आराम नहीं दिया वरन् लगातार चिन्तन करते-करते उसे इतना कार्य बोझिल बना दिया कि मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। अधिक सोचने-विचारने से, दिमाग सारे दिन चिन्तन में लगाये रखने से स्नायु पर अतिरिक्त भार पैदा हो गया। इससे शारीरिक क्रियाओं में रुकावट उत्पन्न होने लगी। फलस्वरूप अपने को मानसिक दृष्टि से थका हुआ पाने लगे।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये (अंतिम भाग)

बहुधा नये कामों का आरम्भ करते समय एक किस्म का संकोच होने लगता है। कारण वही है- अशुभ आशंका। उस स्थिति में अशुभ आशंकाओं को अपने मन से झटक कर विचार किया जाना चाहिए। सफलता और असफलता दोनों ही सम्भावनाएँ खुली हुई हैं। फिर क्या जरूरी है कि असफल ही होना पड़ेगा। मन में आशा का यह अंकुर जमा लिया जाए तो असफलता भी पराजित नहीं कर पाती। उस स्थिति में भी व्यक्ति को यह सन्तोष रहता है कि असफलता कोई नये अनुभव दे गई है। इन अनुभवों से लाभ उठाते हुए आशावादी व्यक्ति दुबारा प्रयत्न करता रहता है और तब तक प्रयत्न करता रहता है, जब तक कि सफलता हस्तगत नहीं हो जाती।

असफलताओं और दुःखदाई घटनाओं को स्मृति पटल पर बार-बार लाने की अपेक्षा ऐसी घटनाओं का स्मरण करना चाहिए जो अपने आपके प्रति आस्था और विश्वास को जगाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सफलता के और असफलता के दोनों ही अवसर आते हैं, दोनों तरह की परिस्थितियाँ आती हैं जो अच्छी और बुरी होती है। सुख-दुःख के क्षण सभी के जीवन में आते हैं। असफलताओं, कठिनाइयों और कष्टों को याद रखने तथा याद करने की अपेक्षा सफलताओं और सुखद क्षणों को याद करना आशा तथा उत्साह का जनक होता है। ये स्मृतियाँ व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती हैं और जो व्यक्ति अपने आप में विश्वास रखता है, हर कठिनाई को सामना करने के लिए प्रस्तुत रहता है उसके लिए कैसा भय और कैसी निराशा?

भविष्य के प्रति आशंका, भय को आमंत्रण मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं को कुँद बना देते हैं। अस्तु, जिन्हें जीवन में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा है उन्हें चाहिए कि वे अशुभ चिन्तन, भविष्य के प्रति आशंकित रहने और व्यर्थ के भयों को पालने की आदत से छुटकारा प्राप्त करें।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 May 2026


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गुरुवार, 14 मई 2026

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 2)

भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों की विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाए अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है तो इसमें किसी और का दोष नहीं है, दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिन्तन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिन्तन को ही अपनाया।

अशुभ चिन्तन चुनने के पीछे भी कारण है। विगत के कटु अनुभवों, असफलताओं और कठिनाइयों से पीड़ित मन वर्तमान में भी लौट-लौटकर उन्हीं स्मृतियों को दोहराता रहता है और जाने-अनजाने अशुभ कल्पनायें करता रहता है। यह कल्पनाएँ ही व्यक्ति में भय उत्पन्न करती हैं। जबकि स्मरण के लिए अतीत के सुखद अनुभव, सफलताएँ और अनुकूलताएँ भी हैं। यदि उन्हें याद किया जाता रहे तो भविष्य के प्रति आशंकित होने के स्थान पर सुखद सम्भावनाओं से आशान्वित भी हुआ जा सकता है।

भय और मनोबल, अशुभ और शुभ चिन्तन आशंकाएं और आशाएँ सब मन के ही खेल हैं। इनमें पहले वर्ग का चुनाव जहाँ व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में धकेलता है वही दूसरे प्रकार का चुनाव उसे उत्कर्ष तथा प्रगति के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है। सर्वविदित है कि आत्मघात, व्यक्तित्व का हनन या असफलता का चुनाव व्यक्ति किन्हीं विवशताओं के कारण ही चुनता है। अन्यथा सभी अपना विकास, प्रगति और अपने अभियानों में सफलता चाहते हैं। जब सभी लोग सफलता और प्रगति की ही आकाँक्षा करते हैं तो मन में समाये भय के भूत को जगाकर क्यों असफलताओं को आमन्त्रित करता है? इसके लिए मन की उस दुर्बलता को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिसे आत्मविश्वास का अभाव कहा जाता है।

प्रथम तो अशुभ चिन्तन और अमंगलकारी आशंकाओं से ही बचा जाना चाहिए। लेकिन यह स्वभाव में सम्मिलित हो गया है और अपने आपके प्रति अविश्वास बहुत गहरे तक बैठ गया तो उसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। इस दिशा में सचेष्ट होते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम स्वयं ही भय की रचना करते हैं, उसे बुलाते और अपनी हत्या के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह जान लिया गया तो यह समझ पाना भी कठिन नहीं है कि स्वयं ही भय को नष्ट भी किया जा सकता है। अपने लगाये पेड़ को स्वयं काटा भी जा सकता है और सन्दर्भों में यह बात लागू होती हो अथवा नहीं होती हो किन्तु मन के सम्बन्ध में यह बात शत प्रतिशत लागू होती है कि वह तभी भयभीत होता है, जब जाने अनजाने उसे भयभीत होने की आज्ञा दे दी जाती है। यह आज्ञा अशुभ आशंकाओं के रूप में भी हो सकती है और अतीत के कटु अनुभवों तथा दुःखद स्मृतियों के रूप में भी। कहने का आशय यह कि किसी भी व्यक्ति के मन में उसकी इच्छा और अनुमति के विपरीत भय प्रवेश कर ही नहीं सकता। तो भीरुता को अपने स्वभाव से हटाने के लिए पहली बात तो यह आवश्यक है कि भय को अपने मनःक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( अंतिम भाग )

पुण्य परमार्थ के अवसर अथवा भावना को टालने वाले जीवन में भारी भूल करते हैं। परमार्थ अथवा परोपकार की भावना अथवा अवसर का उदय होना किन्हीं पूर्व पुण्यों का उदय ही समझना चाहिए। अन्यथा इस प्रपंच एवं प्रवंचनापूर्ण संसार में, इसके दूषित वातावरण में ऐसे अवसर और ऐसी कल्याणकारी भावनाएं सुलभ ही कहाँ होती हैं। यदि आये हुए उत्साह को कार्यान्वित न करके आगे के लिये टाल दिया गया तो कोई ठीक नहीं कि वह भावना फिर उठे या न उठे, वह अवसर फिर आये न आये। इस नश्वर संसार में जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं। आज है कल नहीं भी रह सकता। तब तो पुण्य परमार्थ का एक अवसर भाग्यवश आया था उसके भी लाभ से वंचित रहना पड़ेगा! परमार्थ अथवा पुण्य-कार्य में तत्परता करने का महत्व समझने के लिए महाभारत का यह उपाख्यान बड़ा उपयोगी तथा शिक्षाप्रद है।

एक बार एक भिक्षुक ने महाराज युधिष्ठिर के सम्मुख उपस्थित होकर कुछ याचना की। महाराज युधिष्ठिर उस समय किसी अन्य कार्य में व्यस्त थे। निदान उन्होंने उससे दूसरे दिन आने को कह दिया। भिक्षुक चला गया!

उस अवसर पर भीम वहीं उपस्थित थे! भिखारी के चले जाने पर वे उठे और हर्ष सूचक दुन्दुभी बजाने लगे उसका संकेत स्वर सुनकर नगर में खुशी के बाजे बजने लगे। युधिष्ठिर ने सुना और भीम से पूछा। भीम यह हर्ष सूचक वाद्य सहसा क्यों बज उठे। भीम ने उत्तर दिया-वह इसलिए कि हमारे महाराज युधिष्ठिर ने काल को जीत लिया है!

भीम की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिर बड़े चकित हुए। बोले- “भीम यह तुम क्या कह रहे हो-मैंने काल को जीत लिया है। क्या कोई मनुष्य काल पर भी अधिकार कर सकता है।” भीम ने कहा क्यों नहीं महाराज-यदि आपने काल को न जीत लिया होता तो क्या उस भिक्षुक को कल के लिये कह कर वापस कर देते। ज्यादा तो नहीं कल के लिए तो आपने काल को अपने वश में कर ही लिया है।” महाराज युधिष्ठिर भीम का आशय समझ गये। उन्होंने अपनी भूल पर लज्जित होते हुए तुरन्त ही भिखारी को बुलाया और दान देकर कहा-भीम तुम ठीक कहते हो। पुण्य परमार्थ का कोई अवसर टालना नहीं चाहिए। क्योंकि अगले क्षण यह रहे न रहे! क्या ठिकाना।

अस्तु, पुण्य परमार्थ के बिना मनुष्य का कल्याण नहीं और जब तक उसे जीवन का अनिवार्य अंग नहीं बना लिया जावेगा उसका बन पड़ना सम्भव नहीं होगा! साथ ही उसके करने में न तो विलम्ब करना चाहिए और न प्रमाद! मानव जीवन की सार्थकता और आत्मा का कल्याण इसी में है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 May 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2026



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बुधवार, 13 मई 2026

👉 अशुभ चिंतन छोड़िये-भय मुक्त होइये ( भाग 1)

अपने कार्यकारी जीवन में लोग कई तरह की अशुभ आशंकाओं से आतंकित रहते हैं। रोजगार ठीक से चलेगा या नहीं, कहीं व्यापार में हानि तो नहीं हो जाएगी, नौकरी से हटा तो नहीं दिया जायेगा, अधिकारी नाराज तो नहीं हो जायेंगे जैसी चिन्ताएँ लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी होने लगती हैं तो वह जो काम हाथ में होता है, उसे भी सहज ढंग से नहीं कर पाता। इन अशुभ आशंकाओं के करते रहने से मन में जो स्थाई गाँठ पड़ जाती है उसकी का नाम भय है।

भय का एक सामान्य रूप यह भी होता है कि अन्धेरे में जाते ही डर लगता है, अकेले यात्रा करने में किसी अनिष्ट की सम्भावना दिखाई देती है, रोगी होने बीमार पड़ने पर रोग के ठीक न होने तथा उसी के कारण मृत्युद्वार तह पहुँच जाने का डर रहता है। यह भी भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं का ही छोटा रूप है। अँधेरे में जाते समय जी क्यों काँपने लगाता है? इसलिए कि आशंका होती है कहीं कोई कीड़ा-काँटा न बैठा हो या कोई भूत-प्रेत ही न पकड़ ले। अकेले यात्रा करने में भी चोर डाकुओं द्वारा सताये जाने, लूट लेने की आशंका ही डराती है। इस तरह के डर भी एक तरह से भविष्य के प्रति अशुभ आशंकाओं के परिणाम ही हैं।

इस तरह की आशंकाएँ स्वभाव बन कर भय के रूप में परिणत हो जाती हैं और इन आशंकाओं या भयों का एक ही कारण है- मन की दुर्बलता। भय और कुछ नहीं मन की दुर्बलता से उत्पन्न हुआ भूत ही है। इस सम्बन्ध में एक जापानी लोक कथा प्रचलित है। किसी व्यक्ति को एक डरावना जिन्न सताया करता था। वह जागता था तो जिन्न सामने खड़ा रहता था और उसे तरह-तरह से सताया करता था, सोता था तो सपने में डरावनी हरकतों से उसे परेशान करता था। एक दिन उसने हिम्मत कर जिन्न से पूछ ही लिया, ‘तुम कहाँ से आ गए हो? क्यों मुझे इतना सताते रहते हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

इसके उत्तर में जिन्न ने कहा कि “तुम्हीं ने मुझे बुलाया है और तुम्हीं ने मुझे डराने के लिए जिम्मेदार किया है। इसके लिए तुम्हीं जिम्मेदार हो, क्योंकि तुम्हीं ने मुझे उत्पन्न किया है।” जापान के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों को यह कहानी सुनाते हुए बताते हैं कि यह जिन्न लोगों के बुलाने पर अब भी आता है तथा उन्हें तरह-तरह से परेशान करता है। इस जिन्न का नाम भय है। कुल मिलाकर यह कि भय अपने ही मन की उपज है। कौन यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि व्यापार में घाटा हो सकता है, परीक्षा में फेल हुआ जा सकता है, नौकरी में अधिकारी नाराज हो सकते हैं, काम धन्धा चौपट हो सकता है। बिना किसी के कहने पर व्यक्ति स्वयं ही तो इस तरह की बातें सोचता है। अन्यथा क्या यह नहीं सोचा जा सकता कि व्यापार में पहले की अपेक्षा अधिक लाभ होगा, नौकरी में तरक्की हो सकती है, परीक्षा में पहले की अपेक्षा अच्छे नम्बरों से पास हुआ जा सकता है। व्यक्ति इस तरह का शुभ और आशाप्रद चिन्तन क्यों नहीं करता, क्यों वह अशुभ ही अशुभ सोचता है?

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 3)

समयाभाव का बहाना भी इसी तरह का थोथा बहाना मात्र है और कुछ नहीं। एक दिन के चौबीस घंटों और गुजर गये जीवन की लम्बी अवधि में ऐसी कौन सी व्यस्तता रही हो सकती है जिसके कारण थोड़ा सा पुण्य परमार्थ, कोई छोटा सा सत्कर्म करने का भी समय न मिल सका। खाने, पीने, सोने, जागने, मनोरंजन करने और व्यापार व्यवसाय के बीच से क्या थोड़ा सा भी समय नहीं निकाला जा सकता जो कि किसी सत्कर्म में लगाया जा सके।

माना, व्यापार व्यवसाय के व्यस्त समय में कटौती नहीं कि जा सकती। ऐसा करने से सम्भव है कि किसी हानि का सामना करना पड़ जाये। तथापि विश्राम एवं मनोरंजन के समय में से तो कुछ समय ऐसा निकाला जा सकता है तो पुण्य परमार्थ के कर्म में लगाया जा सके! गद्दी पर बैठे बैठे दान किया जा सकता है। रास्ता चलते-चलते किसी की सहायता की जा सकती है। किसी समय थोड़ा सा समय देकर कुछ ऐसे विद्यार्थियों की परीक्षा ली जा सकती है जो सहायता के पात्र हों और उसी समय से उनको छात्रवृत्ति देकर एक साल तक परोपकार के उस कार्य को चलाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त मनोरंजन के उपायों में परमार्थ परक गतिविधियाँ और कार्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं। बहुत बार जहाँ सैर सपाटे के लिए यात्राओं पर जाया जा सकता है, वन-विहार और जल विहार के लिये प्रस्थान किया जा सकता है तो एक बार किसी दीन-हीन और पिछड़ी बस्ती की और भी जाया जा सकता है। उनकी आवश्यकताएँ और दुःख दर्द का पता लगाया और सहायता की जा सकती है। जहाँ सौ बार संगीत सुना जा सकता है वहाँ एक बार दुखियों की पुकार भी सुनी जा सकती है। जिस प्रकार उस पर खर्च किया जा सकता है, उसी प्रकार उन गरीबों पर भी किया जा सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परोपकार की भावना सच्ची हो और कुछ करने का उत्साह हो तो समय का प्रभाव आड़े नहीं आ सकता! हजारों ऐसे परोपकार के कार्य हो सकते हैं जो घूमते-चलते और बैठते-उठते किए जा सकते हैं।

अवसर न मिलने की बात भी व्यर्थ है। इसमें भी कोई तथ्य नहीं है। कोई आवश्यक नहीं कि परोपकार के लिए कोई बड़ी योजना बनाई जाये और खास तौर से उसका प्रबंध किया जाये। परमार्थ कोई बड़ा यत्न करने अथवा विश्वविद्यालय खड़ा करने में ही नहीं है और न गरीबों की बस्ती का पुनः-निर्माण करने मात्र में ही है। कहीं भी चल रहे इन आयोजनों में योगदान करने से भी परमार्थ का प्रयोजन पूरा हो जाता है। किसी के आयोजित यज्ञ में कुछ दे देने और किसी संस्था के निर्माण में सहयोग करने में भी उतना ही बड़ा पुण्य है जितना कि स्वयं उसका आयोजन करना! जिस प्रकार खड़े-खड़े व्यावसायिक सौदे कर लिए जाते हैं बैठे-बैठे, बड़े-बड़े कारोबार चला लिए जाते हैं, वैसे ही चलते-चलते किसी जन-निर्माण में चुपके से अपना अंश-दान भी लिखाया जा सकता है। बिना कहे साधन सामग्री भी भेजी जा सकती है। ऐसे कार्यों के लिए किसी अवसर की तलाश करना, किसी तीर्थ यात्रा की प्रतीक्षा करते रहना एक बहाने के सिवाय और कुछ नहीं है। श्रद्धापूर्वक अच्छे और निष्काम मन से किया हुआ एक छोटा सहयोग भी परमार्थ के बड़े आयोजन की तरह ही पुण्य प्रतापी होता है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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