योग-साधन में सबसे बड़ी कठिनाई मन को वश में करने की होती है। इसकी चंचलता और शैतानी का कुछ ठिकाना नहीं। मन बिल्ली की तरह ताक लगाये बैठा रहता है और जैसे ही कोई महान विचार उदय होता है यह उस पर झपट पड़ता है और फिर नई-नई वासनाओं या कामनाओं का पचड़ा आरम्भ कर देता है। इच्छा का स्वरूप भी लगभग ऐसा ही है। हमने प्रायः देखा है कि श्रेष्ठ इच्छा का आगमन होते ही पुरानी इच्छा अपने पुराने अभ्यास के अनुसार उस पर चढ़ बैठती है। थोड़ी दूर चलने पर मालूम पड़ता कि इस विचार या इच्छा में तो कोई भूल थी। तब फिर मन को शान्त अवस्था प्राप्त होती है। इस प्रकार यह मन का विद्रोह बहुत समय तक चलता रहता है। धैर्य धारण करके धीरता के सहारे ही मन के इन भोगों को हटाना चाहिये। इसके पश्चात् मन धीरे-धीरे शिष्ट बनने लगता है।
साधना दो प्रकार की होती है—एक अपने लिये तपस्या करना और दूसरी साधना। इन्हीं को “कर्म योग“ और “ज्ञान योग“ के नाम से पुकार सकते हैं। ज्ञान-योग का स्वरूप साधारणतः यह है कि हम सब से अलग होकर यह निरीक्षण करते रहें कि मन के भीतर कैसी-कैसी आकाँक्षाएँ, प्रभाव और विचार उमड़ रहे हैं और शान्त हो रहे हैं। हमें उदासीन भाव से यह देखना चाहिये कि किस वस्तु से हानि पहुँच रही है। आरम्भ में तो इन वस्तुओं के साथ स्वयं भी मिलना पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उन पर दृष्टि ही नहीं पड़ती। धीरे-धीरे अभ्यास हो जाने पर सभी बातें प्रकृति के त्रिगुण की क्रीड़ा-तरंगों से ही उत्पन्न होती हैं। वस्तुतः हम अपनी निजी शक्ति से किसी भी विचार, बोध या कार्य की उत्पत्ति होना नहीं मान सकते। सब प्रकृति का दिया हुआ ही होता है, प्रकृति द्वारा ही इन सब में हमारी प्रवृत्ति होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि यह सब प्रकृति की ही ठगविद्या या विशेषता है—हम तो सिर्फ उससे मिले हुये ज्ञान रहित होकर पड़े हैं।
सुख-दुख, पाप-पुण्य, फलाफल का द्वन्द्व मचा हुआ है। इससे बचने का एक मात्र उपाय यह है कि हम भी इसके विरुद्ध एक तरकीब या चाल से काम लेकर प्रकृति के कौशल को परास्त कर दें। वह चाल है अपना पृथक करण अर्थात् अपने को पूर्णतः प्रकृति से अलग समझना। भीतर का द्रष्टा पुरुष जितने अविचल भाव से स्थित हो सकेगा; उतना ही अधिक बन्धन स्वरूप द्वंद्व ढीला होगा और फिर अन्त में फिर द्वंद्व की इतिश्री हो जायगी। यही “ज्ञान योग“ का सार है। किन्तु इस ज्ञान योग के हो जाने से भी सब काम समाप्त नहीं हो जाता। प्रकृति के तीनों गुणों से अपने को मुक्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उन गुणों का रूपांतर हो जाना चाहिये। गीताकार ने भी “निस्त्रेगुण्य” के परे हो जाने का निर्देश किया है, पर उसकी विशेष व्याख्या नहीं की है। अब हमको इस ओर स्वयं ही ध्यान देना चाहिये।
“कर्म योग“ का रहस्य भी इसी तरह का है। पहले फलाफल को समर्पण करके—अर्थात् फलाफल की आशा त्यागकर कार्य करते जाना चाहिए। हृदय में भगवान है ऐसा समझ कर, उनका स्मरण करते हुये सब कामों को आरम्भ करना चाहिये, जैसे कि गीता में भगवान ने कहा “यथा नियुक्तोऽस्मि” (इनमें भी “मैं” करता हूँ) इसके पश्चात् इस कतृत्व (कर्तापन) के अभिमान का भी त्याग (उत्सर्ग) कर देना चाहिये। फल के साथ ही साथ कर्म का भी समर्पण करना पड़ता है। हमको यह समझना चाहिये कि सब कर्म प्रकृति के गुणों के अनुसार ही होते हैं, इसे पुरुष द्रष्टा भाव से देखता रहे। ऐसा होने से आपको जान पड़ेगा एक विश्वभाव-युक्त शक्ति ही समस्त विचारों, अनुभवों और कार्यों में चल कर सृष्टि का सम्पादन कर रही है। ऐसा होने से ही हमको एक शान्त, समदर्शी और साक्षी की अवस्था प्राप्त होती है। तब भी हमारे भीतर द्वंद्व रहता है, किन्तु वह मन, प्राण और शरीर के ऊपरी भाग में ही रहता है—भीतर तो समता ही स्थिर रहती है। इस अवस्था में बाहर के अन्य लोग इसमें भी दोष गुण, छोटे-बड़े का आस्तित्व ही देखते हैं, किन्तु साधक के भीतर का पुरुष गुणातीत और शाँति मग्न अवस्था में ही रहता है। यह अवस्था निःसंदेह बहुत ऊँची है, फिर भी हमको इससे आगे बढ़ना आवश्यक है क्योंकि पक्की अवस्था तभी मानी जायगी जब गुणों का भी परिवर्तन हो जाय।
*.....क्रमशः जारी*
योगीराज अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति जून 1959
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