इस तरह के प्रतिरोध के लिए अकेले व्यक्ति को तो संकल्प करना ही चाहिए, किन्तु सारे समाज को संगठित होकर बुराइयों के विपरीत कदम उठाना चाहिए। कोई कारण नहीं कि समाज की संगठित शक्ति के समक्ष बुराइयाँ जीवित रह सकें। खेद है, सामाजिक उत्तरदायित्व हम लोग नहीं समझते। कोई व्यक्ति किसी गुण्डे से निपटते समय सहायता के लिए पुकार करता है, तो हम किवाड़ बन्द करके बैठ जाते हैं, सुनकर भी अनसुनी कर जाते हैं, देखकर भी अनदेखे बन जाते हैं। लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब हमें भी इन दूषित तत्वों से आक्रान्त होना पड़ेगा।
आज बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष में, भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सामूहिक अभियान की आवश्यकता है। जब तक लोगों में इस सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पैदा न होगी, तब तक बुराइयाँ एक-एक कर हम सबको प्रभावित करती रहेंगी, हानि पहुँचाती रहेंगी।
हमारी एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बड़े-बड़े सिद्धान्त बघारते हैं, नीति और न्याय की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, लेकिन यह सब दूसरों के लिए। अपने कार्य कलापों को न्याय, नीति की कसौटी पर हम बहुत ही कम कसते हैं। एक दुकानदार बाजार में बैठकर सरकार, पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोज कर आलोचना करता है, किन्तु उसकी आलोचक वृत्ति उस समय गायब हो जाती है, जब वह वस्तुओं में मिलावट करता है, ग्राहकों को कम तोलता है, अधिक मुनाफा वसूल करता है। आततायी और गुण्डों को हम लोग कोसते हैं, उन्हें बुरा कहते हैं, किन्तु हमारी समीक्षात्मक बुद्धि उस समय जाने कहाँ चली जाती है, जब हम पराई स्त्री को बुरी निगाह से देखते हैं। बिना प्रति-मूल्य दिए समाज के साधनों का उपभोग करते हैं, अनीति के साथ धन एकत्र करते हैं, दूसरों के श्रम अधिकार एवं साधनों का अनुचित शोषण करते हैं।
जिस तरह हम दूसरों की आलोचना करते हैं, उसके लिए न्याय नीति की माँग करते हैं, उसी तरह यह भी आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार को नीति, धर्म की कसौटी पर कसें। जो बुरा है उसे न करें।
हम दूसरों के साथ कोई ऐसी बात न करें जो स्वयं अपने लिए न चाहते हों। बुराइयों को मिटाने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व जो हम पर हैं, उसे सब तरह के खतरे उठाकर भी पूरा करने में न चूकें। कार्य व्यवहार को नीति, न्याय और धर्म की कसौटी पर परखें, जो बुराई है उससे दूर रहें। ये तीन बातें हमारे जीवन में ढल जायँ तो कोई सन्देह नहीं कि ये बुराइयां आज नहीं तो कल समाप्त ही हो जायगी।
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965
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