मंगलवार, 16 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (अंतिम भाग)

काम करने से प्रसन्नता, सन्तोष व शान्ति मिलती है। मानसिक या शारीरिक दोनों ही श्रम समान रूप से आवश्यक हैं। दोनों में समन्वय बना रहे तो ही काम चलेगा। किन्तु इनमें में किसी एक को प्राथमिकता देना, दूसरे को गौण मानने की बात न्याय संगत नहीं लगती। खेती का कार्य भी मानवता के विकास में उतना ही उपयोगी है, जितना आफिस के क्लर्क का कार्य। शारीरिक श्रम का महत्व कम नहीं। स्वास्थ्य का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए बुद्धि जीवियों को शारीरिक और शारीरिक श्रम करने वालों को बौद्धिक कार्य भी करने चाहिये। दोनों में तालमेल बनाये रखने से ही मनुष्य जीवन के सच्चे आनन्द की उपलब्धि सम्भव है।

लाचारी से, बेमन काम करना एक भारी दुर्गुण है। इससे सफलता का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वृद्धावस्था में नितान्त निष्क्रिय होकर बैठ जाने की नीति गलत है। ढलती उम्र में भी सक्रिय बने रहने से दुःखद परिस्थितियाँ नहीं टकराती। दार्शनिक सुकरात का कथन है-”मनुष्य की सक्रियता का चरम उत्कर्ष तीसरे प्रहर, अर्थात् जीवन के सन्ध्या काल वृद्धावस्था में होता है। इस समय तक मानसिक शक्तियाँ पूर्ण परिपक्व हो जाती है।” प्रबुद्ध ज्ञान और जीवन के लम्बे अनुभवों के आधार पर महत्वपूर्ण कार्य जीवन के अन्तिम दिनों ही होते हैं। हमारे यहाँ चतुर्थ आश्रम संन्यास का अधिक महत्व इसी दृष्टि से माना गया है। लोक सेवा का यह सब से अच्छा समय होता है।

आज की परिस्थितियों में नैतिक उत्थान की, मानवीय कल्याण की जो-योजनायें चलाई जा रही हैं, उनका पूरा किया जाना तभी सम्भव है जब लोग श्रम की सार्थकता समझें, कर्म के महत्व को पहचाने। श्रम धरती का देवता है। कर्म मनुष्य का आभूषण है। यह वह कसौटी है, जिसमें रगड़ खाकर अनेक सद्गुणों का विकास निखर आता है। श्रम के सहारे धरती से सोना पैदा करते हैं। कर्म से ही यहाँ सुख-शान्ति, समृद्धि और सफलता का अवतरण होता है। धरती में स्वर्ग की-सी परिस्थितियों का निर्माण जिन सद्गुणों से सम्भव है, उनमें से कर्मशीलता प्रमुख है। आइये हम सब मिलकर श्रम-पूर्वक निरन्तर कर्म करने की आदत डालें और व्यक्तिगत जीवन को समृद्ध एवं सामूहिक वातावरण को उल्लासमय बनाने की एक आवश्यक शर्त पूरी करें। ताकि आसमान के स्वर्ग को अपनी वसुन्धरा में उतार कर ले आयें, युग की यही माँग है, होना भी यही है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 2)

इच्छा एक भाव है, जो किसी अभाव, सुख या आत्मतुष्टि के लिये उदित होता है। इस प्रकार की इच्छाओं का सम्बन्ध भौतिक जगत से होता है। इनकी आवश्यकता या उपयोगिता न हो, सो बात नहीं। दैनिक जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन चाहिये ही। सृष्टि संचालन का क्रम बना रहे इसके लिये दाम्पत्य जीवन की उपयोगिता से कौन इनकार करेगा? पर केवल भौतिक सुखों के दाँव-फेर में हम लगे रहें तो हमारा आध्यात्मिक विकास न हो पायेगा।

तब सौमनस्यता व सौहार्दपूर्ण सदिच्छाओं की आवश्यकता दिखाई देती है। प्रेम, आत्मीयता और मैत्री की प्यास किसे नहीं होती। हर कोई दूसरों से स्नेह और सौजन्य की अपेक्षा रखता है। पर इनका प्रसार तो तभी सम्भव है, जब हम भी शुभ इच्छायें जागृत करें। दूसरों से प्रेम करें, उन्हें विश्वास दें और उनके भी सम्मान का ध्यान रखें। इन इच्छाओं के प्रगाढ़ होने से सामाजिक, नैतिक व्यवस्था सुदृढ़, सुखद होती है, पर इनके अभाव में चारों ओर शुष्कता का ही साम्राज्य छाया दिखाई देगा।

मानव जीवन गतिवान् बना रहे, इसके लिये स्व-प्रधान इच्छायें उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। पर इनके पीछे फलासक्ति की प्रबलता रही तो उसकी तृप्ति न होने पर अत्यधिक दुःखी हो जाना स्वाभाविक है। इच्छाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ भी मिल जायेंगी, ऐसी कोई व्यवस्था यहाँ नहीं। कोई लखपति बनना चाहे, पर व्यवसाय में लगाने के लिये कुछ भी पूँजी पास न हो तो इच्छा पूर्ति कैसे होगी। ऐसी स्थिति में दुःखी होना ही निश्चित है। जो भी इच्छायें करें वह पूरी ही होती रहें, यह सम्भव नहीं। इनके साथ ही आवश्यक श्रम, योग्यता एवं परिस्थितियों का भी प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक है। किसी की शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक हो और वह कलक्टर बनना चाहे, तो यह कैसे सम्भव होगा? इच्छाओं के साथ वैसी ही क्षमता भी नितान्त आवश्यक है। विचारवान् व्यक्ति सदैव ऐसी इच्छायें करते हैं, जिनकी पूर्ति के योग्य साधन व परिस्थितियाँ उनके पास होती हैं।

इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम जिन परिस्थितियों में आज हैं, उन्हीं में पड़े रहें। जितनी हमारी क्षमता है, उसी से सन्तोष कर लें, तब तो विकास की गाड़ी एक पग भी आगे न बढ़ेगी। आज जो प्राप्त है उसमें सन्तोष अनुभव करें और कल अपनी क्षमता बड़े इसके लिये प्रयत्नशील हों, तो इसे शुभ परिणिति कहा जायेगा। नैपोलियन बोनापार्ट प्रारम्भ में मामूली सिपाही था। चीन के प्रथम राष्ट्रपति सनयात सेन अपने बाल्यकाल में किसी अस्पताल के मामूली चपरासी थे। इन्होंने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये क्रमिक विकास का रास्ता चुना और अपना लक्ष्य पाने में सफल भी हुये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 June 2026


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सोमवार, 15 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (भाग 2)

मनुष्य-जीवन का सच्चा सदुपयोग उसे सत्कर्मों में लगाने से ही होता है। कुछ दिन मौज-मजा लूटने में ही उसे बिता दिया तो इसमें श्रेय की कौन-सी बात रही। भावी सन्तति को सच्ची दिशा में ले जाने के लिये, प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करना आवश्यक है। निष्क्रियता से व्यक्तित्व का विकास रुकता है, जिससे मानवीय पतन की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। शिकागो विद्यालय के शरीर क्रिया विज्ञान के प्रख्यात पण्डित डॉक्टर एलेक्जेंडर क्लीटमैन ने 35 वर्षों के अन्वेषण से आलस्य की प्रतिक्रियाओं का पता लगाया, उन्होंने लिखा है-”आलस्य का अर्थ है व्यक्ति की मानसिक अयोग्यता और इसका परिणाम विनाश ही हो सकता है।”

आलस्य से शरीर का तापमान गिरता है। यह ह्रास एक-दो डिग्री तक होता है, इससे शिथिलता बढ़ जाती है।” आलस्य में जीवन बिताने वाले लोगों की उम्र इसीलिये कम हो जाती है। इसके विपरीत श्रमिकों, मजदूरों की आयु अधिक होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय भी यही हैं कि संसार की अधिक उम्र वाली जातियाँ वही हैं, जहाँ काम की प्रतिष्ठा होती है।

सन्त विनोबा ने अपने एक प्रवचन में काठियावाड़ के मध्यम वर्ग को सम्बोधित करते हुये बड़े महत्वपूर्ण शब्द कह थे । उन्होंने बताया “मैं इतना ही कहूँगा कि काम के लिये आपमें इज्जत और प्रेम का भाव होना चाहिये। इसके अभाव में अच्छी सेवा न हो सकेगी। काम तो होगा, लेकिन जिस हेतु से वह काम शुरू हुआ है, वह हेतु पूरा नहीं होगा। इसलिये काम के लिये शरीर अच्छा,मजबूत बनाओ और काम के लिये प्रीति और आदर रखो। इसके लिए अपनी चेष्टाओं को निरन्तर जागृत रखने और शक्ति शाली बनाने की अधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। शक्ति शरीर की बिजली है और कर्म प्रकाश। हमारी शक्ति जितनी प्रगाढ़ होगी, क्रिया की रोशनी उतना ही जगमगायेगी और दूसरों को रास्ता बतायेगी।

श्रमशीलता को असम्मान तथा हीनता का बोधक मानना नासमझ लोगों को शोभा दे सकता है। आज के शिक्षित वर्ग में यह बुराई गहराई तक प्रवेश कर गई है, जिससे सभी ओर दुःख और निराशा, आत्म-प्रवंचना और आत्महत्याओं के दृश्य दिखाई देते हैं। इससे जन-जीवन बड़ा अस्त-व्यस्त हुआ है। पाश्चात्य देशों की, जिनमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन आदि प्रमुख हैं, उन्नति का एक ही रहस्य है कि वहाँ काम की इज्जत है, आलस्य की नहीं। संसार के बड़े-बड़े महापुरुषों, सन्त-महात्माओं, समाज सुधारकों ने व्यवहारिक जीवन में इस बात के उदाहरण प्रस्तुत किये है कि काम बड़प्पन का चिन्ह है। भगवान कृष्ण, राम, बुद्ध, नामदेव, सुकरात, मुहम्मद आदि सभी महापुरुषों ने कर्म की महत्ता प्रतिपादित की है। महात्मा गान्धी जी स्वयं चक्की पीस कर उसका आटा खाते थे। इनमें से किसी की इज्जत कम नहीं हुई। आज भी लोग इन्हें श्रद्धा से माथा टेकते हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 1)

मनुष्य इच्छाओं का पुतला है। उसके व्यावहारिक जीवन में प्रतिक्षण अनेकों आकाँक्षायें उठा करती है। स्वास्थ्य की, धन की, स्त्री और यश की अनेकों कामनायें प्रत्येक मनुष्य में होती हैं। इसके विविध काल्पनिक चित्र मस्तिष्क में बनते बिगड़ते रहते हैं। जैसे ही कोई इच्छा स्थिर हुई कि मानसिक शक्तियाँ उसी की पूर्ति में जुट पड़ीं, शारीरिक चेष्टायें उसी दिशा में कार्य करने लगती हैं। संसार की विभिन्न गतिविधियाँ व क्रिया कलाप चाहे वह भौतिक हों अथवा आध्यात्मिक, इच्छाओं की पृष्ठभूमि पर निरूपित होते हैं। रचनात्मक कदम तो पीछे का है, पहले तो सारी योजनाओं को निर्धारित कराने का श्रेय इन्हीं इच्छाओं को ही है।

स्थिर तालाब के जल में जब किसी मिट्टी के ढेले या कंकड़ को फेंकते हैं तो उसमें लहरें उठने लगती हैं। पत्थर के भार व फेंकने की गति के अनुरूप ही लहरों का उठना, तेजी व सुस्त गति से होता है। ठीक इसी प्रकार हमारी इच्छायें क्या हैं, यह हमारी शारीरिक चेष्टायें, चेहरे के हाव-भाव बताते रहते है। व्यभिचारी व्यक्ति की आँखों से हर क्षण निर्लज्जता के भाव परिलक्षित होंगे। चेहरे का डरावनापन अपने आप व्यक्त कर देता है कि यह व्यक्ति चोर, डाकू, बदमाश है। कसाई की दुर्गन्ध से ही गाय यह पहचान लेती है कि वह वध करना चाहता है।

इसी प्रकार सदाचारी, दयाशील व्यक्तियों के चेहरे से सौम्यता का ऐसा माधुर्य टपकता है कि देखने वाले अनायास ही उनकी ओर खिंच जाते हैं। विचारयुक्त व गम्भीर मुखाकृति बता देती है कि यह व्यक्ति विद्वान, चिन्तनशील व दार्शनिक है। प्रेम व आत्मीयता की भावना से आप चाहे किसी जीव-जन्तु को देखें, वह भयभीत न होकर आपके उदार भाव की अन्तरमन से प्रशंसा करने लगेगा।

अनन्त आनन्द के केन्द्र परमात्मा के हृदय में एक भावना उठी- “एकोऽहंबहुस्यामि” और इसी का मूर्तिमान रूप यह मंगलमय संसार बन कर तैयार हो गया। यह उनकी सद्-इच्छा का ही फल है कि संसार में मंगलदायक और सुखकर परिस्थितियाँ अधिक हैं। यदि ऐसा न होता तो यहाँ कोई एक क्षण के लिये भी जीना न चाहता। पर अनेकों दुःख तकलीफों के होने पर भी हम मरना नहीं चाहते, इसलिये कि यहाँ आनन्द अधिक हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 15 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 June 2026


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रविवार, 14 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (भाग 1)

मकान-मालिक जब घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है तो उस मकान की दुर्दशा प्रारम्भ हो जाती है। मकड़ियाँ जाला बनाने लगती हैं। जगह-जगह चिड़ियाँ घोंसले बना लेती हैं। कीड़े-मकोड़े बढ़ जाते हैं। वर्षा और वायु के प्रकोप से दीवालों में दरारें पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे आलीशान मकान भी खाली पड़े रहने पर ध्वस्त होकर धराशायी बन जाते हैं। यह स्थिति घर में फली क्रियाशीलता के अभाव से हो जाती है। जब तक मालिक रहता है, तब तक उसकी लिपाई, पुताई, छानी-छप्पर, मिट्टी-मरम्मत होती रहती है। इससे वही मकान साफ -सुथरा और वर्षा में भी सुदृढ़ बना रहता है। ठीक यही बात मानव जीवन के बारे में भी लागू होती है। जब तक मनुष्य क्रिया-शील रहता है तब तक अंग-प्रत्यंग तथा मानसिक चेष्टायें सही दिशा में लगी रहती हैं, पर जैसे ही आलस्य और अकर्मण्यता संवार हुई कि रोग-शोक, असन्तोष और अशान्ति, दैन्य और दीनता के जीव-जन्तु अपना-अपना अड्डा मनःक्षेत्र में जमाने लग जाते हैं और चारों ओर निराशा की मुर्दनी छाई जान पड़ने लगती है।

लोहा देखने में कितना ठोस व मजबूत दिखाई पड़ता है। सारे शरीर की शक्ति लगा कर भी उसे तोड़ा जाना सम्भव नहीं। काटना हो तो पैनी छैनी और वजनदार घनों की चोट देनी पड़ेगी। पर उसी लोहे को किसी कूड़े-कचरे के ढेर में फेंक दीजिये तो कुछ ही दिन में जंग लग जायगी और सम्पूर्ण लोहे को चाट कर बैठ जायेगी। मनुष्य शरीर भी लोहे जैसा ही है। इसकी सुन्दरता और मजबूती तभी तक स्थिर समझिये, जब तक इसमें क्रियाशीलता है। काम से जी-चुराने और दूर भागने का परिणाम लोहे में जंग लग जाने जैसा ही हो सकता है। शरीर का महत्व काम से ही है।

कहावत है- “खाली दिमाग शैतान का घर” अर्थात् निरर्थक समय बिताने और आलस्य में पड़े रहने से उत्पन्न शिथिलता अनेक प्रकार की विकृतियाँ ही पैदा करती है। अपने साथ अनेक औरों को भी इससे हानि ही होती है। पारस्परिक कलह, अनैतिक तत्व और दुराचार बरतने वाले वे ही लोग होते हैं जो श्रम से जी चुराते हैं। जो फैशनपरस्ती को ही जीवन मानकर केवल बन ठन कर इधर-उधर घूमते रहते हैं, ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिये अभिशाप माने जाते हैं । ऐसे आदमियों को कोई अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। उनका सभी जगह निरादर होता है। प्यारा चाम नहीं काम होता है।

जीवन-विद्या के विद्वान व प्रमुख आचार्य टिनमैन अपने अनुयाइयों को सम्बोधित कर कहा करते थे-”जो आलस्य में अपना मूल्यवान् समय गँवाता है वह अभागा है। पृथ्वी पर परिश्रम से मुक्ति नहीं है । मनुष्य कर्म के लिये उत्पन्न हुआ है। उसे जीवन भर परिश्रम करना चाहिये।” एक कर्मशील महापुरुष का कथन है-”जीवन के उपरान्त चिर-काल तक मुझे विश्राम ही तो करना है।”

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 बुद्धिमान ही नहीं संवेदनशील भी बनें (भाग 2)

अस्त्र-शस्त्रों एवं अन्याय विनाशकारी यन्त्रों के निर्माण में बात सुरक्षा की होती तो समझ में भी आती। किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा इन विनाशकारी यंत्रों पर नहीं टिकी है। उसके लिये तो सामान्य अस्त्र, शस्त्र एवं कुशल सैनिक भी पर्याप्त होते हैं। उनके शौर्य, पराक्रम के विकास से ही राष्ट्र को बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रखा जा सकता है। विनाशकारी बमों तथा अन्याय विस्फोटक यन्त्रों में तो बुद्धि की कुटिलता ही झाँकती दिखाई देती है।

समाज में जैसा भी आदर्श होगा, उसके अनुरूप ही प्रवृत्तियां पनपेंगी एवं गतिविधियाँ चल पड़ेंगी। आदर्श विलासिता और सम्पन्नता को बनाया गया। फलस्वरूप संसार उसी ओर चल पड़ा। श्रेष्ठ आदर्शों एवं सिद्धांतों के अभाव में गतिविधियों में उत्कृष्टता का समावेश नहीं रहा। कारणों की गहराई में जाने पर एक ही तथ्य का पता लगता है वह है- बुद्धि द्वारा मानवी सम्वेदना की उपेक्षा की जाना। बुद्धि की निरंकुशता इसी कारण बढ़ी। संकीर्णताओं को प्रोत्साहन मिला। ध्वंसात्मक गतिविधियाँ अपनाकर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने का सिलसिला चल पड़ा।

बुद्धि का महत्व एवं उसकी उपयोगिता असंदिग्ध है। किन्तु यह तभी बन पड़ती है जब उसके साथ सम्वेदनाओं का संयोग हो। बुद्धि की उच्चतम स्थिति को ‘प्रज्ञा’ के नाम से विभूषित किया गया है। सघन सम्वेदनाओं के साथ जुड़कर ही वह इस उच्चतम स्थिति तक पहुँचती है। सृजनात्मक प्रवृत्तियों को इसी के द्वारा प्रोत्साहन मिलता है। साँस्कृतिक विकास की सारी सम्भावनाएँ इसी पर आधारित हैं। बुद्धि की प्रखरता एवं उससे मिलने वाले भौतिक अनुदानों का सही उपयोग विकसित भाव-सम्वेदनाओं द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

महापुरुषों द्वारा छेड़े जाने वाले अभियानों में इस तत्व को विकसित करने का ही महान लक्ष्य अनिवार्य रूप से जुड़ा होता है। वे इस तथ्य से परिचित होते हैं कि इसको उभारे बिना मनुष्य को श्रेष्ठता की ओर नहीं मोड़ा जा सकता। वे साधनों के विकास की उपेक्षा तो नहीं करते किन्तु उनको अधिक प्रधानता भी नहीं देते। उनकी सामर्थ्य मानवोचित्त गुणों के विकास के लिये ही प्रयुक्त होती है। साधना एवं अन्य आध्यात्मिक उपचारों के पीछे भी इसी उद्देश्य की पूर्ति ही निहित होती है।

आदर्शवादी भाव-सम्पन्नता से ही भौतिक उपलब्धियाँ भी मानव मात्र के लिये उपयोगी बन सकती हैं। बुद्धि की प्रखरता भावनाओं की उदात्तता से जुड़कर ही सर्वतोमुखी विकास का आधार प्रस्तुत कर सकती है। इस तथ्य को हृदयंगम कर उसे विकसित करने के लिए हर सम्भव प्रयास किये जाने चाहिए।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1981

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 June 2026


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शनिवार, 13 जून 2026

👉 बुद्धिमान ही नहीं संवेदनशील भी बनें (भाग 1)

भौतिक उपलब्धियाँ कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हों वे तब तक उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकतीं जब तक उनमें सृजनात्मक प्रवृत्तियां न जुड़ी हों। ध्वंस में प्रयुक्त होने वाले साधन तो सामूहिक विनाश के कारण बनते हैं। आग भोजन पकाने, मशीनें चलाने तथा अन्यान्य कार्यों में प्रयुक्त होती हैं? सृजन की दिशा में उसका प्रयोग मानव मात्र के लिये उपयोगी बनता है। ध्वंस में प्रयुक्त हो तो वही आग कुछ ही क्षणों में दावानल का स्वरूप ग्रहण करके अगाध संपत्ति को नष्ट कर डालती है। रचनात्मक कार्यों में आने वाली एक वस्तु उपयोगी बन जाती है। वही ध्वंस में प्रयोग होने पर विनाश का दृश्य उपस्थित करती है।

मानवी व्यक्तित्व का विश्लेषण करने पर उसमें दोनों ही प्रवृत्तियां पायी जाती हैं। बुद्धि का योगदान तो इन दोनों में ही होता है, किन्तु एक के साथ सम्वेदनाओं का गुट जुड़े होने से रचनात्मक बनकर मानव मात्र के लिये उपयोगी बनती है। वहीं दूसरी प्रखर होते हुये भी सम्वेदनाओं से रहित होने के कारण स्वार्थी, संकीर्ण बनकर संकट ही खड़ा करती है।
महत्व उपलब्धियों का नहीं उनके साथ जुड़े उद्देश्यों का है। आदर्शों एवं सिद्धांतों के लिये प्रयुक्त होने वाले साधन ही मानवी विकास के आधार बनते। भले ही वे अल्प क्यों न हों, किन्तु महत्व उनका ही है जो सदुद्देश्य के लिये प्रयुक्त हों। सही अर्थों में वे ही सामाजिक विकास कारण होते हैं। बढ़े हुये साधन व्यक्ति विशेष के लिये उपयोगी हो सकते हैं। किन्तु आदर्शों के अभाव में तो संकट ही खड़ा करते हैं। समीक्षा की जाय तो बुद्धि का सही उपयोग जिस कारण बन पड़ता है- वह है मानवी सम्वेदना। उससे जुड़कर बुद्धि सृजनात्मक प्रवृत्तियां अपनाती तथा सबके लिए उपयोगी बनती हैं। साधनों का प्रयोग श्रेष्ठ कार्यों के लिए तभी हो पाता है। व्यक्ति तथा समाज का उत्थान-पतन इसी आधार पर निर्भर करता है।

बुद्धि के अनुदान भौतिक उपलब्धियों के रूप में सर्वत्र परिलक्षित हो रहे हैं। प्रकृति के एक से बढ़कर एक रहस्य इसके द्वारा खोले जा रहे हैं। वैज्ञानिक शोधों में इसकी ही प्रखरता दिखायी पड़ती है। बहिरंग जगत की सम्पन्नताएँ इसी के द्वारा बढ़ी हैं। किन्तु इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि मनुष्य बुद्धि एवं साधनों की दृष्टि से कितना भी विकसित क्यों न हो गया हो, मानवी गुणों की दृष्टि से उसका पतन ही हुआ है। इसका एक ही कारण है- जिस आधार पर व्यक्तित्व की श्रेष्ठता विनिर्मित होती है, उसकी उपेक्षा करना। दिव्य सम्वेदनाओं से रहित होने पर तो पशु प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलाता है। निरंकुश बुद्धि स्वार्थी, संकीर्ण बनकर सामाजिक विग्रह खड़ा करती है।

उद्देश्य के अनुरूप मनुष्य की विचारणा चलती तथा उसकी पूर्ति के लिए अनेकों जाल-जंजाल खड़े करती है। मानवी आदर्श यदि भौतिक साधनों की प्राप्ति तक ही सिमट कर रह गया है तो स्पष्ट है कि उसकी प्राप्ति के लिये मनुष्य नीति, अनीति पर ध्यान दिये बिना वह मार्ग अपनायेगा जो उसकी गरिमा के अनुकूल नहीं है। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ेगी। अधिक संग्रह करने की होड़ चल पड़ेगी। मानवोचित्त आदर्शों से समाज विमुख हो जायेगा। स्पष्ट है कि इस प्रकार का दृष्टिकोण अपनाने पर परस्पर असहिष्णुता, ईर्ष्या की भावना को ही पोषण मिलेगा। पशु प्रवृत्तियां पनपने तथा नर पशुओं की संख्या ही बढ़ती जायेगी।

इसे समय का अभिशाप ही कहा जाना चाहिए कि बुद्धि ने भौतिक उपलब्धियों को ही अपना आदर्श माना। उसे पाने के लिये अपनी सारी सामर्थ्य झौंक दी। प्रयत्न करने पर सफलता का मिलना असंदिग्ध है। सम्पन्नताएँ अनुगामी हुईं, किन्तु इतने मात्र से मनुष्य सन्तुष्ट न हो सका। अधिक प्राप्त करने एवं संग्रह की ललक बनी रही। प्रकृति के सीमित साधनों को यदि एक मनुष्य की झोली में डाल दिया जाय तो भी उसकी असीम तृष्णा की पूर्ति सम्भव नहीं है। अपूर्तिनीय तृष्णा की पूर्ति के लिये बुद्धि ने वह मार्ग अपनाया जो समस्त मानव जाति के लिए हानिकारक है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1981

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 13 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 June 2026



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शुक्रवार, 12 जून 2026

👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (अंतिम भाग)

संत ईसा ने कहा था “अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक बुरे शब्द के लिए मनुष्य को फैसले के दिन सफाई देनी होगी।” और बुरे शब्दों से हम मौन के द्वारा ही बच सकते है।

स्मरण रहे, सहज मौन ही हमारे ज्ञान की कसौटी है। “जानने वाला बोलता नहीं और बोलने वाला जानता नहीं।” इस कहावत के अनुसार जब हम सूक्ष्म रहस्यों को जान लेते हैं तो हमारी वाणी बन्द हो जाती है। ज्ञान की सर्वोच्च भूमिका में सहज मौन स्वयमेव पैदा हो जाता है। स्थिर जल बड़ा गहरा होता है। उसी तरह मौन मनुष्य के ज्ञान की गम्भीरता का चिन्ह है।

वाचालता पांडित्य की कसौटी नहीं है, वरन् गहन गम्भीर मौन ही मनुष्य के पण्डित, ज्ञानी होने का प्रमाण है।

मौन ही मनुष्य की विपत्ति का सच्चा साथी है, जो अनेक कठिनाइयों से उसे बचा लेता है। ड्राईडेन ने विपत्ति में मौन रहना सच्चा उपाय बताया है। सन्त रहीम ने भी फिरे दिनों में चुप होकर बैठने की सलाह दी है-
रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर
सन्त कबीर ने भी वादविवाद को मिटाने को गुरुमन्त्र बताते हुए कहा है-
“वाद विवाह विषधना बोले बहुत उपाध। मौन गहे सबकी सहे सुमिरे नाम अगाध ॥”

आत्मा की वाणी सुनने के लिए, जीवन और जगत के रहस्यों को जानने के लिये, लड़ाई झगड़े, वाद-विवादों को नष्ट करने के लिए, वाचिक पाप से बचने के लिए, ज्ञान की साधना के लिए, विपत्तियों के दिनों को गुजारने के लिये, वाणी के तप के लिए तथा अन्यान्य हितकर परिणामों के लिए हमें मौन का अवलम्बन लेना चाहिए।
दैनिक जीवन में मित भाषण और हित भाषण की आदत डालकर हम लौकिक और आध्यात्मिक प्रगति का द्वार ही प्रशस्त कर सकते हैं।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 12 June 2026




👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 June 2026



गुरुवार, 11 जून 2026

👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 2)

व्यवहारिक जीवन में भी मौन अनर्थों को पैदा होने से रोकता है। मौन कभी भी दूसरों को हानि नहीं पहुँचा सकता। समाज में विग्रह, लड़ाई, झगड़े, कलह, आदि को शुरुआत वाणी से ही होती है। एक दूसरे को भला बुरा कहने पर ही लोग उत्तेजित होकर अनर्थ करते हैं। लेकिन जब मौन का अवलम्बन लिया जाय, तो बुरे शब्द मुख से नहीं निकलेंगे और विग्रह की स्थिति ही पैदा होगी। इतना ही नहीं कोई व्यक्ति लड़ना चाहे, चलाकर छेड़छाड़ करे, झगड़ने लगे, ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष यदि मौन का अवलम्बन ले ले तो झगड़ा कभी हो ही नहीं सकता।

मौन की स्थिति में ही हम दूसरों को अधिक सुन सकते हैं और अपने ज्ञानकोष को बढ़ा सकते हैं। लोगों को समझने, उनका अध्ययन करने के लिए भी मौन की आवश्यकता होती है। एक कहावत के अनुसार- “मौन बुद्धिमानी है और अच्छे मित्र बनाता है।” सचमुच जो वाचाल होते है उनसे भले आदमी दूर रहने की ही प्रयत्न करते हैं। मौन की स्थिति में हम अपने अज्ञान, मूर्खता फूहड़पन को भी प्रकाशित होने से रोक सकते हैं। भर्तृहरि ने कहा है- “विधाता ने मौन अर्थात् चुप रहना अज्ञानता का ढक्कन बनाया है। ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों के लिए मौन ही सर्वोत्तम आभूषण और रक्षक कवच है।” अज्ञानी आदमी यदि वाचाल होगा तो जल्दी ही अपनी मूर्खता प्रकट कर देगा लेकिन मौन का अवलंबन लेकर वह अज्ञान-प्रदर्शन से अपने आपको रोक सकता है। जिस तरह गन्दगी के दुष्प्रभाव और बदबू को दूर करने के लिये उसे ढक देना आवश्यक है, उसी तरह अज्ञान, मूर्खता, फूहड़पन को छिपाये रखने के लिए मौन अपेक्षित है।

शास्त्रों में तीन तरह के पाप बताए हैं। वाणी, कर्म और मन से किए गये दुष्कृत्य ही ये त्रिपाप हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मौन के अवलम्बन से हम वाणीकृत पापों से तो निश्चित रूप से बच ही सकते हैं। किसी को अप्रिय, कठोर वचन बोलना, गाली देना, झूठ बोलना, चुगलखोरी, आलोचना, आदि वाचिक पापों से मौन ही हमें बचा सकता है। इस तरह मौन का अवलम्बन लेने से हम जीवन में किए जाने वाले एक तिहाई पापों से बच जाते हैं।

हम जीवन में जितना अनर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं, यदि उतने समय में कुछ काम किया जाय, तो उतने से एक नया हिमालय पहाड़ बन जाय। शब्दों की इस अथाह शक्ति को व्यर्थ ही नष्टकर क्या हम दीन नहीं बन रहे? यदि इन शब्दों का उपयोग हम किसी को सांत्वना देने में भगवद् भजन, प्रभु नाम स्मरण, संगीत, जप कीर्तन आदि में, करें तो हमारा और समाज का कितना भला हो? साथ ही हम वाचालता से उत्पन्न दोष, जिनसे लड़ाई, झगड़े, क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष आदि का उदय होता है, उनसे बच जायें।
वाचालता, व्यर्थ प्रलाप, चाहे वह किसी प्रेरणा से क्यों न हो हानिकर है। इस सम्बन्ध में एक्रेन रिवले से लिखा है “अण्डे देने के बाद मुर्गी यह मूर्खता करती है कि वह चहचहाने लगती है। उसकी चहचहाहट सुन कर डोमकौवा आ जाता है, वह उसके अण्डे भी छीन लेता है तथा उन वस्तुओं को भी खा जाता है, जो उसने अपनी भावी सन्तान के लिए रखी थीं।” कहावत है “वह कुत्ता अच्छा नहीं होता जो ज्यादा भौंकता है। इसी तरह वाचाल व्यक्ति को भला नहीं कहा जा सकता।”

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (अन्तिम भाग)

सत्य का सम्पूर्ण तत्व है। उसके खण्ड नहीं किये जा सकते। सत्य बोला जाय और उसके अनुसार आचरण न किया जाय। सत्याचरण और सत्य भाषण तो किया जाय किन्तु मनोदशा उसके अनुसार न रखी जाय तो उसे सत्यनिष्ठा नहीं कहा जायेगा। ऐसे विखंडित सत्य से किसी प्रकार के लाभ की आशा नहीं की जा सकती। टूटा-फूटा, अस्त-व्यस्त अथवा कौटिल्यपूर्ण सत्य भी अमृत का ही एक स्वरूप है। सत्य का स्वरूप वर्णन करते हुए शास्त्रकार ने कहा है-
“सत्य यथाथे वांग्  मनसे यथा दृष्टं तथानुमतिं तथा वांग् मनश्चेति, परत्र स्वबोध संक्रान्तये वागुप्ता सा यदि न वंचिता, भ्रान्ता वा, प्रतिपन्ति बन्ध्या व भवेत्।”

“सत्य का तात्पर्य है- वाणी के साथ-साथ मन का भी सच्चा होना। जैसा देखा जाय अथवा जैसा अनुमान किया जाय, वैसा ही भाव प्रकट करने का निश्चय रखते हुए बात कहना ‘सत्य’ माना जायेगा। उसमें छल न हो। दूसरों को भ्रम में डालने वाला अथवा वस्तुस्थिति से भिन्न ज्ञान देने का प्रयत्न न किया जाय।” इस प्रकार सर्वांगपूर्ण सत्य ही सत्य है, विखंडित सत्य-असत्य का ही एक प्रकार होता है।

जिस प्रकार सत्य का आचरण हर दशा में कल्याणकारी होता है, उसी प्रकार असत्य का आचरण हर प्रकार से अमाँगलिक होता है। भाषण, आचरण अथवा विचार किसी में भी असत्य का दोष मानव-जीवन में उसके अंतर और बाह्य दोनों में विषमता पैदा कर देता है। व्यक्तित्व को हर प्रकार से कलुषित और दोषपूर्ण बना देता है। असत्य का त्याग करना जीवन में आनन्द और विकास के बीज बोने के समान है। असत्य का त्याग और सत्य का आचरण मानव-जीवन की सबसे सुन्दर नीति है। इस नीति का अनुसरण करने वाला क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में असफल नहीं होता। सत्य बोलने, सत्य के अनुरूप सोचने और सत्य से स्वीकृत कर्म करने से ही मनुष्य सत्यस्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।

सत्य की यह महत्ता कोई कल्पना अथवा वैज्ञानिक विलास नहीं है। यह एक ठोस और सारपूर्ण सिद्धान्त है। विद्वान् जोफसपार्कर ने कहा है- “असत्य अस्थिर और उतावला होता है। उसे कभी भी पहचाना और दण्डित किया जा सकता है। सत्य शांत और गम्भीर होता है। उसे ईश्वर का उच्च न्यायालय भी केवल सम्मानित ही कर सकता है।”

सत्य संसार की सबसे बड़ी शक्ति और सबसे प्रभावकारी नीति है। इस पर चलने वाला व्यक्ति न तो कभी अशाँत होता है, न भयभीत और न उसे असफल होने की आशंका रहती है। भय-शोक, संताप और अशांति आदि आसुरी दण्ड केवल असत्य परायणों के लिये ही निश्चित है। सत्य परायण के लिए लोक में शाँति और सम्मान एवं परलोक में स्वर्ग सुरक्षित रखा है, जिसे वह अधिकार पूर्वक प्राप्त कर लेता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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बुधवार, 10 जून 2026

👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 1)

मौन वाणी की शक्ति को संशोधित और संवर्धित करने की साधना है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसलिए जिस तरह इन्द्रिय संयम के लिए ब्रह्मचर्य आदि का विधान है, उसी तरह वाणी के संयम के लिए मौन की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है, अगर बोलना ही हो तो कम-से-कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।” फैंकलिन के शब्दों में “चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती है।” कालाइल ने कहा है, “मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति होती है।”

मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे- सुने चल रहे हैं। संसार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान कार्य करना चाहे तो उसे एक लम्बे समय तक मौन का अवलम्बन लेना पड़ेगा, क्योंकि मौन से ही शक्ति का संग्रह और उद्रेक होता है।

आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिए तो मौन बहुत ही आवश्यक है। योगी अरविन्द ने कहा है “आध्यात्मिक जीवन अपने भीतर ईश्वरीय चेतना को प्रतिष्ठित करने और उसे सहज रूप में व्यक्त होने देने की साधना है और इस साधना में सबसे बड़ी बाधा हमारी वाचालता ही है, जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसके आदेशों को नहीं सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी ही उत्तम भाषा, बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”

शास्त्रकार ने कहा है- “मौन उस अवस्था को कहते हैं जो वाक्य और विचार से परे है। यह एक शून्य ध्यानावस्था है, जहाँ अनन्त वाणी की ध्वनि सुनी जा सकती है।” अध्यात्म जगत का साधक तो मौन के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। आत्मा से और विश्वव्यापी सूक्ष्मशक्ति से मनुष्य तब तक सम्बंध स्थापित नहीं कर सकता, जब तक वह बाह्य कोलाहल में उलझा रहेगा, बहिर्मुखी बना रहेगा। अन्तर्मुखी होने और अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को एकाग्र और संगठित करने के लिए मौन का अवलम्बन श्रेयार्थी के लिए आवश्यक है।

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👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (भाग ३)

निर्विकार, निर्लेप और निर्भय जीवन जीने के लिए सत्य से बढ़कर कोई उपाय नहीं। सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती। संसार में जहाँ जो भी धर्म-ग्रन्थ और आर्ष अभिवचन पाये जाते हैं, उनमें जिन नियमों की विशेषता दी गई है, सत्याचरण व सत्य भाषण उनमें सर्वप्रधान है। मनीषियों ने सत्य को मनुष्य के हृदय में रहने वाला ईश्वर बतलाया है और सत्य पर आरूढ़ रहने का उपदेश किया है। सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है।

सृष्टि के आदि में सत्य की जो महत्ता और श्रेष्ठता थी वैसी आज बनी बनी हुई है। कोई मानवीय नियम समय के अनुसार भले ही बदले और संशोधित किए गये हों किन्तु सत्य के नियम में आज तक परिवर्तन नहीं किया गया और न कभी किया जा सकता है। सत्य सारे जीवन और सारी सृष्टि का एक मात्र आधार है। सत्य की महत्ता बतलाते हुए महात्मा इमरसन ने एक स्थान पर कहा है- “जिस सुन्दरतम और श्रेष्ठतम आधार पर मनुष्य को अपना जीवन अवस्थित करना चाहिए वह है- सत्य। सत्य के विरुद्ध किया हुआ प्रत्येक आचरण मानव समाज के स्वस्थ शरीर में छुरी भौंकने के समान निन्दनीय है।”

आत्मिक उन्नति के जो साधन और उपाय ऋषियों, मुनियों और धर्म-प्रवर्तकों ने प्रतिपादित किए हैं, सत्य को उनमें सबसे पहला स्थान दिया है। कोई भी साधना, फिर वह कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सत्य के बिना सफल नहीं हो सकती। सत्य सारे साधनों की आधार-शिला है। एक सत्य का आधार ले लेने के बाद यह अनिवार्य नहीं रह जाता कि आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने के लिये अन्य बहुत से साधन भी किए जाएं। सत्य की महिमा वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने उसे सर्वोपरि साधन बतलाया है, एक सत्य का आधार ही व्यक्ति को संसार सागर से पार कर देता है। महाभारत के उद्योग पर्व में आया है-

“सत्य स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव।’’
-समुद्र में नाव के समान सत्य स्वर्ग का सोपान है। अर्थात्- जिस प्रकार नाव का सहारा व्यक्ति को समुद्र के बीच से पार कर किनारे पर पहुँचा देता है उसी प्रकार सत्य व्यक्ति को संसार से पार कर स्वर्ग पहुँचा देता है।
शाँति पर्व में कहा गया है-
“नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम।
श्रुतिहिं सत्य धर्मस्य तस्यात्सत्यं न लोप्यते॥”
-सत्य के बढ़ कर कोई धर्म नहीं। असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं है। सत्य ही धर्म का आधार है। अतएव सत्य का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिये।

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 June 2026


👉 काम करने से जी न चुराइये (अंतिम भाग)

काम करने से प्रसन्नता, सन्तोष व शान्ति मिलती है। मानसिक या शारीरिक दोनों ही श्रम समान रूप से आवश्यक हैं। दोनों में समन्वय बना रहे तो ही काम ...