सत्यनिष्ठ व्यक्ति अपने एक स्वरूप में स्थिर रह कर आत्म-लाभ जैसा सुख भोगता है। उसका अन्तःकरण दर्पण की तरह स्वच्छ और मस्तिष्क प्रज्ञा की तरह संतुलित रहता है। उसे न तो मानसिक द्वन्द्वों से त्रस्त होना पड़ता है और न निरर्थक वितर्कों से अस्त व्यस्त। वह जो कुछ सोचता है सारपूर्ण सोचता है और जो कुछ करता है कल्याणकारी करता है। मिथ्यात्व के दोष से मुक्त सत्यनिष्ठ व्यक्ति के पास कुकल्पनाओं का रोग नहीं आता। वह तो अपनी सीमा, अपनी सामर्थ्य और अपने साधनों के अनुरूप ही जीवन की कल्पनाएं किया करता है और अधिक से अधिक यथार्थ के धरातल पर ही विचरण किया करता है।
सत्य प्रिय व्यक्ति मिथ्यावादियों की तरह कल्पना की न तो ऊँची-ऊँची उड़ानें भरता है और न अनहोनी कामनाएं करता है। वह जानता है कि ऐसा करने से महत्वाकाँक्षाओं में, ऐसी महत्वाकाँक्षाओं में फैलना पड़ेगा जो उसकी स्थिति से बाहर की होंगी और तब हो सकता है कि किन्हीं कामनाओं अथवा वांछाओं के दबाव में आकर उनकी पूर्ति के लिए ऐसा काम करना पड़े जो असत्य के दोष से दूषित हो। सत्यनिष्ठ व्यक्ति जीवन में आकाँक्षाओं के पथ पर बड़ा सावधान होकर चलता है।
राग-द्वेष, लोभ, मोह और मद, मत्सर आदि दुर्गुणों से सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई मित्रता नहीं होती। वह जानता है कि इन विकारों को प्रश्रय देना अपनी सत्यनिष्ठा के लिये खतरा पैदा करना है। यह विकार ही व्यक्ति के वे शत्रु हैं, जो उसे जीवन के पावन पथ से गिरा देते हैं। जिसके प्रति राग होगा उसके प्रति निष्पक्ष न रहा जायेगा। उसकी प्रसन्नता के लिये कुछ भी करना पड़ सकता है। जिससे द्वेष होगा उसका अनिष्ट चिन्तन का प्रेम पकड़ सकता है। लोभ तो सत्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है। जिसे लोभ के पिशाच ने पकड़ लिया उसके सत्य की रक्षा हो ही नहीं सकती। लोभ सदैव ही अपने अधिकार से अधिक पाने की लिप्सा किया करता है। अधिकार से अधिक पाने के लिए छल-कपट और असत्य आदि अपकर्मों को ग्रहण करना पड़ता है।
इसी प्रकार मोह तो स्पष्ट अज्ञान ही है। अज्ञान से दूषित व्यक्ति जीवन में किसी भी व्रत का पालन ही कर पाता। मोहग्रस्त व्यक्ति अनिष्ट में इष्ट, हानि में लाभ और असत्य में सत्य का आभास पाने लगता है। मद और मत्सर अहंकार के ही दो प्रचंड प्रकार होते हैं। इनका प्रकोप व्यक्ति को कर्तव्य भ्रष्ट बना देता है। अहंकारी व्यक्ति स्वयं ही अपने की संसार में दूसरों से श्रेष्ठ मान बैठता है। अपनी बात मनवाना और दूसरे की बात न मानना उसका सहज स्वभाव होता है।
अपने दम्भ की रक्षा में उसके लिए कोई भी कार्य अकरणीय नहीं होता। इस प्रकार मद और मत्सर सत्य पालन में बहुत बड़ी बाधाएं हैं। सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन विकारों से सदा सावधान रहता है। ऐसे विचार मुक्त व्यक्ति और एक देवता में क्या अन्तर रहा जाता है? सत्याश्रमी व्यक्ति को यदि देवता कहा दिया जाय तो भी कोई अतिशयोक्ति न होगी। निश्चय ही सत्यनिष्ठ व्यक्ति देवता ही होते हैं। धरती के देवता।
.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968
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