शनिवार, 22 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 Aug 2026



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👉 अधूरी शिक्षा से ही संतोष न कर लीजिए।

आज कल बौद्धिक ज्ञान को शिक्षा कहते हैं। मास्टरी, डाक्टरी, इंजीनियरी, कला-कौशल आदि की योग्यताएं शिक्षा कहलाती हैं इनके द्वारा धन, मान तथा सुख सामग्री की प्राप्ति होती है। क्या शिक्षा का प्रयोजन यही है? नहीं, केवल इतने मात्र से काम नहीं चल सकता। शरीर को आनन्द मिला पर आत्मा अशाँत रही तो वह वैभव फीका है, निस्सार है। सच्चा आनन्द वह है जिसमें साँसारिक और आत्मिक जीवन की उभय पक्षीय उन्नति एवं तृप्ति प्राप्त हो। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को पूर्णरूपेण सुखी बनाना है।

हम संसार की अनेक बातें जानते हैं, पर अपनी आत्म-सत्ता के संबंध में हमारा ज्ञान बहुत थोड़ा है। दुनियावी स्वार्थ में हम भले ही चौकस हों, पर आत्मिक स्वार्थों के क्षेत्र में पग-पग पर बाजी हारते हैं। थोड़ी सी भोग सामग्री हमारे पास भले ही जमा हो जाय पर आत्मिक सम्पत्तियों से प्रायः हम रीते ही रहते हैं। यह समझ किस काम की? इस शिक्षा से, इस चतुराई से क्या लाभ, जिसके द्वारा एकाँगी तुच्छ को प्राप्त करना तो सुलभ हो जाय पर वास्तविक लाभ की पहचान और उपलब्धि में कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न हो। शिक्षा तो वह है- जिससे बुद्धि का उचित परिमार्जन हो और जीवन के हर पहलू पर ठीक तरह विचार कर सकने की क्षमता प्राप्त हो जाय।

कहते हैं कि “इंसान को इशारा काफी होता है।” जो संकेत मात्र से साधारण विचार बुद्धि से अपना हित अनहित समझ ले। कुमार्ग पर चलने से अपरिमित हानि होती है और लाभ अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक। जिसे कौड़ी के मोल हीरा बेचते हुए झिझक नहीं होती उसे शिक्षित किस प्रकार कहा जाय? शिक्षित कहना तो दूर उसे तो इंसान तक नहीं कह सकते, क्योंकि “इन्सान को इशारा काफी होता है।” जब कोई अनुचित कार्य किया जाता है तो आत्मा इशारा करती है, अन्तःकरण पुकारता है कि यह न करो यह अनुचित है। यह बड़ा जोरदार इशारा है जो इशारा नहीं समझता और केवल लोभ तथा भय को ही समझता है वह तो पशु है। उसे तो नर पशु ही कहा जा सकता है।

साँसारिक जानकारी की बहुत सी बातें स्कूलों में सिखाई जाती है, वे उचित भी हैं और आवश्यक भी, पर इतने मात्र से ही संतुष्ट हो बैठना पर्याप्त न होगा। हमें शिक्षा का वह भाग भी प्राप्त करना चाहिए जिससे सत् असत् का विवेक होता है और सच्चे स्वार्थ साधन के लिए उत्साह पैदा होता है। ऐसी शिक्षा के लिए स्वाध्याय, सत्संग, संयम, सदाचार तथा सच्चिदानंद प्रभु का आश्रय लेना होता है। ऐसी शिक्षा अपने प्रकाश से अन्तरात्मा के अन्धकार को दूर करके आत्मिक और साँसारिक जीवन को सुखी बना सकती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949

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👉 प्रेम के अभाव ने ही हमें प्रेत पिशाच बनाया है। (भाग 2)

जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए प्रति अपने “मैं” को छोड़ देता है तो उसे प्रेम कहते हैं जब कोई ‘सर्व’ के प्रति अपने ‘मैं’ को छोड़ देता है तो वह भक्ति कहलाती है। 

मानव में प्रभु के मिलन के लिए प्रेम आवश्यक है। श्री रामानुजाचार्य के पास एक व्यक्ति दीक्षित होने आया और बोला प्रभु के पाने के लिए आप मुझे दीक्षा दीजिए। श्री रामानुजाचार्य बोले तुमने किसी से प्रेम किया है उसने कहा कि नहीं हम तो प्रभु से मिलना चाहते हैं। तब रामानुजाचार्य बोले मैं दीक्षा देने में असमर्थ हूँ क्योंकि यदि तुम्हारे पा सप्रेम होता तो मैं उसे परिशुद्ध कर ईश्वर की ओर ले जाता लेकिन तुम में प्रेम ही नहीं है।

प्रेम और सत्य एक रुपये के दो पहलू है एक दूसरे के पूरक और आधार है। सत्य का आधार मस्तिष्क है तो प्रेम का आधार हृदय है। सत्य में वह आत्मीयता नहीं जो प्रेम में है। सत्य यदि रुक्ष और कटु है तो प्रेम मधुर और कोमल है। सत्य जैसे जानने की बात है तो प्रेम वैसा ही होने की भी। सत्य से निर्भयता आती है और प्रेम से निराभिमानता।

आज कल प्रेम के विषय में गलत भ्रान्ति है। काम को ही प्रेम समझा जाता है। इस भ्रम के फैलाने में सिनेमा गन्दे उपन्यास तथा कहानियों का प्रधान हाथ है। जो दर्शकों और पाठकों को गलत दिशा दे रहे हैं। काम प्रेम का आभास तथा भ्रम है। जैसे कोई व्यक्ति कोहरे का धुँआ समझ लेता है मृग मरुभूमि में प्रकाश के झिलमिलाने से उसे पानी समझ लेता है। और प्यास बुझाते को दौड़ता है। जिसे मृग तृष्णा कहते हैं। जैसे उसे आभास और भ्रम हो जाता है। वैसे ही मान को भी काम में प्रेम का आभास या भ्रम दिखाई देता है।

प्रेम और काम में बहुत अन्तर है प्रेम जितना विकसित होता है काम उतना ही संकीर्ण हो जाता है। प्रेम सृजनात्मक शक्ति का ऊर्ध्वीकरण है तो काम सृजनात्मक शक्ति की पतनोन्मुखी स्थिति है इसलिए जब प्रेम पूर्णता की स्थिति में बढ़ता है तो काम शून्यता की स्थिति में पहुँचता जाता है। इस प्रकार की स्थिति में जीने वाला व्यक्ति ब्रह्मचर्य की दशा को प्राप्त करता जाता है। अपनी सृजनात्मक शक्ति के द्वारा ही आत्मबल दूसरों के हित में रह रहना प्रेम का रूप है। प्रेम का व्यावहारिक रूप सेवा है। काम तो प्रकृति ही सम्मोहन शक्ति है जो सन्तति के उत्पन्न हेतु निर्मित है उसकी अधिकता या उसका दुरुपयोग करना व्यभिचार है। काम के दमन से काम से मुक्ति नहीं हो सकती और प्रेम के द्वारा ही उससे मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। तुलसीदास जी बड़े कामुक थे। जब उनका प्रेम भगवान में लग गया तो काम वासना छूट गई। राम गुणगान में रामचरित मानस का सृजन किया। सही सृजनात्मक शक्ति प्रेम के द्वारा पतनोन्मुख दिशा में न बहकर सर्वभूत हिते रता हुई यही प्रेम और भक्ति का परिणाम है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 21 Aug 2026


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👉 सन्तोष की साँस लें आशावान् रहें।

यह संसार अपूर्ण है। उसके सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि वह अपूर्णता से पूर्णता की ओर चल रहा है। मनुष्य भी अपूर्ण है और उसकी क्रमिक प्रगति पूर्णता की दिशा में हो रही है। इतना मानकर ही संतोष किया जा सकता है और आगे बढ़ने का उत्साह संजोये रखा जा सकता है।

प्रकृति मनुष्य से बड़ी है और पुरानी भी। फिर भी उसे पूर्णता का सौभाग्य प्राप्त नहीं है। हर साल वर्षा आती है और धरती को हरी भरी बनाकर चली जाती है किन्तु ग्रीष्म आते आते वह सारी हरीतिमा सूख जाती है जिसे वर्षा ने जमीन पर कोमल कालीन की तरह बिछा दिया था। वर्षा एक हाथ से जमीन को देती है दूसरे हाथ से उसकी मिट्टी और खनिज सम्पदा को बहा कर समुद्र में धकेल जाती है। धरती यदि वर्षा के अनुदानों को सौभाग्य मानती होगी तो सुखी रहती रहेगी और यदि उसने उपकार वाले पक्ष को प्रधानता दी तो फिर उसका रोना कल्पना बन्द नहीं हो सकेगा।

सुखी मनुष्य वह है जो अपनी वर्तमान उपलब्धियों पर सन्तोष करके ईश्वर को धन्यवाद देता है और साथ ही अधिक पाने तथा अधिक बढ़ने के लिए खिलाड़ी जैसे प्रयत्न जारी रखता है। कौन ऐसा है जिसे सदा सफलता ही मिलती हो? कौन ऐसा है जिसे प्रियजनों का विछोह न सहना पड़ा हो। किस की सब मनोकामनाएँ पूरी हो सकी है? चैन की जिन्दगी किसने काटी है? जीवन का स्वरूप ही ऐसा है कि उसमें खोने और पाने का सिलसिला चलता बने। अगला कदम आगे बढ़ता है तो पीछे वाला अपनी जगह खाली करता है। इसे खोने और पाने की ही गति कहते हैं। लम्बी मंजिलें इसी तरह पूरी होती हैं। जिसे पाने की खुशी मनाने की आदत नहीं-जो गया उसी पर पश्चाताप करना जिसे आता है, वह प्रगति के हर कदम पर अपेक्षाकृत खिन्न ही होता चला जाएगा ।

भविष्य के गर्भ में क्या है? कौन जानता है? विपत्ति के पहाड़ टूट सकते हैं और सफलताओं के सुख साधन भी जुट सकते हैं। जब सब कुछ अनिश्चित ही है तो भयानक विभीषिकाओं की कल्पना करके उद्विग्न रहने की क्या आवश्यकता? फिर सुखद सम्भावनाओं के सपने गढ़ने में ही क्या हानि है? उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशावान् रहना, यही है सुख का सबसे बड़ा स्त्रोत। वर्तमान की समीक्षा करते समय यदि उसे करोड़ों से अच्छा अनुभव कर सके तो वह यथार्थता ही सदा मुसकान बनाये रह सकती है। इसके विपरीत यदि सर्वतोमुखी होने पर शान्ति पाने के लिए आकुल रहेंगे तो खिन्नता और उद्विग्नता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगेगा।

कुरूपता से तुलना करने पर ही सौंदर्य की उत्कृष्टता प्रकट होती है। सर्दी के कारण ही गर्मी की-महत्ता का बोध होता है, अभावों के कारण भावों का सुख मिलता है। रात्रि से तुलना करने पर दिन का आनन्द मिलता है। विछोह के कष्ट की अनुभूति ही मिलन को सरस बनाती है। असफलताओं की स्मृति में ही सफलता के महत्व का पता चलता है। यदि प्रतिकूलता और अनुकूलता में से एक ही रह जाय तो फिर यहाँ सरसता और आनन्द जैसी कोई वस्तु शेष न रह जायगी।

श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा रखें, प्रगति की आशा करें, प्रभात की कल्पना करें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास रखें तो ही जीवन को सुखी बनाने वाली किरणें उमंगों को जीवित रख सकेंगी। निराशा तो मृत्यु है। वर्तमान को दुःखपूर्ण और भविष्य को अंधकारयुक्त मानकर हम केवल दुःख पाते हैं, विनाश को न्यौता देते हैं और आग्रहपूर्वक अकाल मृत्यु के मुख में घुसते हैं।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1977 

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👉 प्रेम के अभाव ने ही हमें प्रेत पिशाच बनाया है। (भाग 1)

प्रेम के अभाव में हमारी सत्ता पृथक और अकेली रह जाती है मानव अपने को निस्सहाय महसूस करते हैं। अहं का भाव उभरकर प्रधान बनता है। स्वार्थ का विकास होने लगता है। वह अपने तक ही सीमित रहता है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में बन्द हो जाता है। इस प्रकार की संकीर्णता की गति मृत्यु की ओर अग्रसर होती है। जीवन तो पारस्परिकता में है संबंधों में है जितनी पारस्परिकता एवं आत्मीयता बढ़ेगी उतना ही जीवन खिलेगा विकसित होगा उत्कृष्ट होगा।

प्रेम का तत्व सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है किन्तु कही अधिक और कही कम। अपनत्व सभी में स्थित है पशु पक्षी मानव आदि सभी अपने का प्यार कतरे है। डाकू दूसरों की हत्या करता है किन्तु अपनी तथा अपने बाल बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखता है। हिंसक सिंह भी पशुओं का भक्षण करता है। किन्तु अपनी सिंहनी के प्रति प्रेम का ही व्यवहार करता है विकराल सर्प दूसरों के लिए काल है किन्तु अपनी नागिन के लिये प्रेम विह्वल है। यदि प्रेम या निजत्व न हो तो सृष्टि ही नष्ट हो जावे।

आत्मा और परमात्मा एक ही है तुलसीदास जी ने कहा है ईश्वर अंश जीवन अविनाशी “समुद्र की लहर समुद्र से भिन्न नहीं है, छटाकाश आकाश से भिन्न नहीं है। वैसे ही आत्मा परमात्मा से भिन्न नहीं है। आत्मा से ही आत्मीयता शब्द बना है जो आत्म का भाव वाचक नाम है। इसी को निजत्व अपनत्व कहते हैं यही प्रेम है। यदि दूसरे शब्दों में कहें तो इस प्रकार कह सकते हैं कि मैं सर्व सत्ता से पृथक और अन्य नहीं हूँ आत्मा परमात्मा सर्वव्यापक है। यह हम भूल जाते है और अपने को पृथक अकेला रात लेते हैं। लहर अपने को समुद्र से पृथक कहे तो यह उसका अज्ञान ही है। जो व्यक्ति आत्म सर्वभूतेषु देखता है वही समझदार और पण्डित है। जब वह आत्मनः प्रतिकूलानि न समाचरेत्। का व्यवहार करता है वही प्रेम का प्रकाशन है। जितनी प्रेम की व्यापकता में वृद्धि करता जायेगा उतना ही अहं अथवा मैं का घेरा कम होता जाएगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 

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बुधवार, 19 अगस्त 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 19 Aug 2026


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👉 धीरे-धीरे सीख

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहिए जो मुझे चिंतित करती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देना है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है वह आपको खाली कर देती है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक देती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगा जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है।

आप अपने आप पर और अपनी आंतरिक शांति के लिए काम करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है।

सच कहें तो
कभी कभी कुछ अपनी ही मूर्खता पूर्ण बातों या कामों से पछतावा भी होता है तो कभी कभी कुछ ईमानदारी भरा ठीक कर पाने की खुशी भी।

अब पता नहीं क्यों दूसरों की निंदा प्रशंसा में कुछ ज्यादा अंतर नहीं सा लगता।

पर जो भी हो ये भरोसा सा है कि अब समझदारी की तरफ सुनिश्चित कदम दर कदम बढ़ रहे हैं,
मन में छाई रहने वाली शांति, खुशी, संतुष्टि इसकी गवाह है कि पथिक की राह ठीक है,
एक दिन मंजिल भी मिल ही जाएगी।
उस मंजिल को तय करने का मजा ही शायद जिंदगी के अनूठे से जगह जगह बिखरे रंग हैं।

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👉 प्रेम का रहस्य

जिस दिन किसी वस्तु पर अथवा किसी प्राणी पर आपका प्रेम होगा फिर चाहे वह स्त्री हो, पुत्र हो अथवा दूसरा कोई हो, उस दिन आपको विश्वव्यापी प्रेम का रहस्य मालूम हो जावेगा। इन्द्रिय सुख के लिए प्रेम करने वाले मनुष्य का लक्ष बहुधा जड़ विषय के आगे नहीं जाता। हम कहते हैं कि अमुक पुरुष का अमुक स्त्री पर प्रेम हुआ, परन्तु वास्तव में प्रेम उस स्त्री के शरीर पर होता है। वह उसके भिन्न भिन्न अंगों का चिन्तन करता है। अर्थात् जड़ विषयों में जो आकर्षण रहता है, उस आकर्षण का ही स्वरूप प्रेम नाम से पहचाने जाने वाले विकार के स्वरूप हैं।

सच्चा प्रेम करने वाले, इस प्रकार के दो मनुष्य एक दूसरे से चाहे हजारों मील के अन्तर पर हों, पर उनके प्रेम में फर्क नहीं पड़ता। वह नष्ट नहीं होता और न उससे कभी दुख की उत्पत्ति होती है।

हम निग्रहित होते हैं, बन्धन में पड़ते हैं, कैसे इसलिये नहीं कि हम कुछ देते हैं बल्कि इसलिए कि कुछ चाहते हैं। प्रेम करके हम दुख पाते है। परन्तु दुख हमें इसलिए नहीं मिलता कि प्रेम किया है। दुख का कारण यह है कि हम प्रेम के बदले प्रेम प्राप्त करना चाहते हैं। जहाँ इच्छा नहीं है चाह नहीं है, वहाँ दुख, क्लेश भी नहीं है। निस्वार्थ भाव से दूसरों को देते रहो, तभी सुखी हो सकोगे यह प्रकृति का अखण्ड नियम है।

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति दिसंबर 1941 पृष्ठ 11

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गुरुवार, 6 अगस्त 2026

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (अंतिम भाग)

सुख-दुःख के प्रति यदि मनुष्य का दृष्टिकोण सम हो जाये तो उसके लिये चिन्ता, शोक, व्यग्रता तथा विकलता के सारे ही कारण समाप्त हो जायें। अपने प्रति सुखद परिस्थितियाँ पाकर जहाँ कोई प्रसन्न होता है, वहाँ प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उसे और न कुछ इसी विचार से प्रसन्न होना चाहिए जो परिस्थितियाँ मेरे लिए दुःख का हेतु बनी हुई हैं उनमें कहीं न कहीं हमारा कोई दूसरा मानव-बन्धु सुख का अनुभव प्राप्त कर रहा है।

निःसन्देह वह मनुष्य बहुत ही दयनीय है जो सुख में तो प्रसन्न और अप्रिय परिस्थिति में आँसू बहाता है। वह प्रकृति के इस मोटे से विधान को नहीं समझ पाता कि जब उसे प्रसन्नता प्राप्त हुई है उससे पहले वह प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशान था। दुःख के कारण दूर हुए और उसे सुख प्राप्त हुआ। आज जब वह दुखंद परिस्थितियों में है तो क्यों रोता है। दुःख के पीछे सुख और सुख के पीछे दुःख संसार का एक अविकल नियम है,न तो यह कभी बदला है और न बदला जा सकता है। तब फिर निरर्थक द्वन्द्वात्मक स्थिति को क्यों स्वीकार किया जाये। बड़ी से बड़ी आपत्ति और भयानक से भयानक दुःख आने पर मनुष्य उससे अभिभूत रहता हुआ भी किसी न किसी समय क्षण-भर को उसे भूल ही जाता है और एक शान्तिपूर्ण स्वाभाविक अवस्था में आ जाता है तब क्या कारण है कि शान्ति के उस क्षणिक समय को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

वास्तविक बात तो यह है कि न तो दुःख हमें हर समय पकड़े रहता है और न उसमें ऐसी कोई शक्ति होती है कि हमारे अनचाहे वह हमें अप्रसन्न अथवा विषादग्रस्त बनाये रहें। यदि ऐसा होता तो एक बार आये हुये दुःख से मनुष्य कभी न छूट पाता। आठों याम जीवन-भर वह एक ही दुखंद स्थिति में तड़पता रहता। किन्तु ऐसा कभी होता नहीं। दुःखद परिस्थितियाँ आती हैं—मनुष्य परेशान होता है—और फिर एक दो दिन में वह स्थिति समाप्त हो जाती है। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है कि दुःख-सुख का अपना कोई अस्तित्व अथवा प्रभाव नहीं है। उसकी वेदना हमारे स्वीकृति, अस्वीकृति पर निर्भर करती है। जिन परिस्थितियों को हम दुःखद स्वीकृत कर लेते हैं वे हमें दुःख और जिन परिस्थितियों को हम सुखद स्वीकार कर लेते हैं वे हमें सुख देने लगती हैं।

मनुष्य की यह स्वीकृति, अस्वीकृति एक मात्र उसके दृष्टिकोण तथा मानसिक स्तक पर निर्भर करती है। यदि हमारा मानसिक स्तर गिरा हुआ है। हममें मनुष्योचित धीरता गम्भीरता और सहिष्णुता की कमी है तो अवश्य ही हम जरा-जरा-सी प्रतिकूलताओं में दुःखी होकर रोते कलपते रहेंगे। इसके विपरीत यदि हम अन्दर से गम्भीर आत्मा से ऊँचे हैं तो कोई भी परिस्थिति हमें प्रभावित नहीं कर सकती। हम सुख-दुःख मय इस नियति-नाटिका को उत्साहपूर्वक देखते हुए जीवन यापन करते रहेंगे। ऐसी स्थिति में तो हमें क्या दुःख और क्या सुख कोई भी विक्षुब्ध न बना पायेंगे।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 Aug 2026



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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 Aug 2026


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भगवान सब को देखता है।

एक बार एक भला आदमी बेकारी से दुखी था। उसकी यह दशा देखकर एक चोर को सहानुभूति उपजी। उसने कहा-मेरे साथ चला करो चोरी में बहुत धन मिला करेगा। वह बेकार आदमी तैयार हो गया। पर उसे चोरी आती न थी। उसने साथी से कहा मुझे चोरी आती तो है नहीं करूँगा कैसे? चोर ने कहा इसकी चिन्ता न करो मैं सब सिखा लूँगा। पहले हलका काम कराऊँगा फिर कठिनाई के मौके पर चलना। वह तैयार हो गया।

चोर एक किसान का पका हुआ खेत काटने गया। वह खेत गाँव से कुछ दूर जंगल में था। वैसे तो रात में उधर कोई रखवाली नहीं थी। तो भी चोर ने उस नये साथी को खेत के मेंड़ पर खड़ा कर दिया कि वह निगरानी करता रहे कि कही कोई देखता तो नहीं है। वह खुद खेत काटने लग गया।

नये चोर ने थोड़ी ही देर में आवाज लगाई कि -भाई जल्दी उठों ,यहाँ से भाग चलें ,खेत का मालिक पास ही खड़ा देख रहा है, मैं तो भागता हूँ।, चोर काटना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ ओर वह भी भागने लगा। कुछ दूर जाकर दोनों खड़े हुए तो चोर ने साथी से पूछा-मालिक कहाँ था? कैसे देख रहा था? उसने कहा- ईश्वर सब का मालिक है। इस संसार में जो कुछ है, उसी का है। वह हर जगह मौजूद है और सब कुछ देखता है। मेरी आत्मा ने कहा-ईश्वर यहाँ भी मौजूद है और हमारी चोरी को देख रहा है। ऐसी दशा में हमारा भागना ही उचित था।

भगवान सब जगह है और सब को देख रहा है। उसके न्याय और दंड से कोई बच नहीं सकता। यह विश्वास करने वाला मनुष्य ही पापों से बच सकता है।

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 Aug 2026

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