मंगलवार, 7 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (अंतिम भाग)

यह सुरदुर्लभ मानव-जीवन बहुत मूल्यवान उपलब्धि है। यह कल्प-वृक्ष ओर कामधेनु की तरह फलदायी हैं। आप इससे जो चाहें प्राप्त कर सकते है। किंतु यह फलदायक तभी होता है, जब इसे हरा-भरा और प्रसन्न रक्खा जाए। यदि आप इसको चिन्ता की चिंता में जलाते रहेंगे, तब तो यह सूख जायेगा। इसके सारे गुण, सारी विशेषताएँ और सारे अनुग्रह नष्ट हो जाएँगे। चिन्ता छोड़िये, यह मनुष्य की जीवित अवस्था में ही मृत बना देती है। चिन्ता में जल-जलकर मर जाने से कहीं अच्छा है कि आप पुरुषार्थ के मैदान में ही इसका बलिदान दे दें। इस निरर्थक मृत्यु से तो यह सार्थक अंत कहीं अच्छा है। उसमें एक आदर्श और एक ऊँचाई तो है। चिन्ता छोड़कर प्रसन्न होइए। पुरुषार्थ करिये, आप अवश्य सफल होंगे।

आप अभाव-ग्रस्त है। जरूरतों से पीड़ित है तो इसमें क्षुब्ध अथवा असंतुष्ट रहने का क्या काम। असन्तोष आपकी इन पीड़ाओं का उपचार नहीं है। इनका उपचार है, अधिकाधिक परिश्रम एवं पुरुषता। यह वे पैसे का उपचार करने में आपका क्या जाता है? पौरुष तथा श्रमशीलता की शक्ति आपको ईश्वर की ओर से मिली ही है। उसका उपयोग करिए तब अपनी पीड़ाओं से मुक्त हो जाइए। और यदि प्रसन्नता की स्थिति में भी आप संतुष्ट रहते हैं तो समझ लीजिए कि आप लोभ तथा तृष्णा के पिशाच से ग्रस्त है। इसका उपचार संतोष तथा उदारता ही है। अपनी वृत्ति पर विचार कीजिये, उसे बुरा समझकर त्याग दीजिए। लोभ तथा तृष्णा का उपचार उसका तिरस्कार तथा संसार की अमरता में विश्वास करना है। इन्हीं उपायों का अवलम्ब लीजिये, आप असंतोष के पिशाच से छूट कर सुखी हो जाइये।

कोई भी विपत्ति अथवा आपदा क्यों न आ जाए, मूल कर भी उद्वेग में मत बह जाइए। ईश्वर की कृपा में अखंड विश्वास रखिए। अपनी आत्मा तथा बुद्धि-विवेक में अखंड विश्राम रखिए। शान्त एवं गम्भीर बने रहिए। सारी आपदायें आप पर से ऐसे गुजर जायेगी, जैसे किसी सुदृढ़ वृक्ष पर से तूफान निकल जाता है। उद्वेग एक मानसिक त्रुटि है।

निराशा, चिन्ता, असंतोष अथवा उद्वेग किन्हीं समस्याओं का हल नहीं है। यह मानव-जीवन प्रकृति के दोष हैं, जो काम बनाने के बजाय बिगाड़ देते हैं। इसको त्याग कर मनुष्य को सृजनात्मक गुणों का ही अवलम्ब लेकर चलना चाहिए। तभी वह सफल होगा और तभी सुखी तथा संतुष्ट।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं। (भाग १ )

प्रसादे सर्व दुःखानाँ हानि रस्योपजायते।
प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धि पर्यवतिष्ठते॥ गीता 2 /65
अर्थात्- चित्त प्रसन्न रहने से उसके सब दुख दूर होते हैं और प्रसन्न चित्त होने से उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

प्रसन्न चित्त रहने से दो लाभ हैं (1) सब दुख दूर हो जाते हैं और (2) बुद्धि स्थिर होती है। सुखी आदमी का चित्त प्रसन्न रहता है। इसी बात को हम यों भी कह सकते हैं कि प्रसन्न चित्त मनुष्य सुखी होते हैं। सुख और चित्त की प्रसन्नता का आपस में अनन्य सम्बन्ध है। कई आदमी सोचते हैं कि जिसके पास साधन है वह सुखी रहता है और सुखी रहने से उसे प्रसन्नता होती है। पर सही बात यह है कि प्रसन्न रहने से सुख मिलता है और सुखी के पास साधनों की कमी नहीं रहती।

हंसोड़ आदमी मोटे देखे जाते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि मोटे होने की खुशी में हंसी आती है। पर सच्ची बात यह है कि वे हंसते स्वभाव के कारण मोटे हो जाते हैं। प्रसन्नता एक जादू भरी साधना है उसमें चतुर्मुखी सिद्धियाँ मिलती हैं। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक, चारों प्रकार के दुख दूर करने में और इन चारों दिशाओं में उन्नति एवं समृद्धि प्राप्त करने में प्रसन्नता एक अचूक ब्रह्मास्त्र है।

नस नाड़ियों में खून का दौरा भली प्रकार होता है, गर्मी पर्याप्त मात्रा में रहती है। माँस पेशियों में चैतन्यता और फुर्ती भरी रहती है। हंसते रहने से जबड़े, कंठ, श्वांस नाड़ियों और फेफड़े का और पेट का अच्छा व्यायाम होता रहता है। विशेष व्यायामों में तो किन्हीं अंगों पर थोड़ी देर के लिए बहुत दबाव पड़ता है पर हंसने से धीरे धीरे मालिश की तरह भीतरी अंगों का हलका व्यायाम होता रहता है। फलतः उनकी शक्ति बढ़ती है। हंसोड़ आदमियों के फेफड़े, जिगर तिल्ली एवं गुर्दे विशेष रूप से मजबूत पाये जाते हैं। साधारण साँस लेने से फेफड़े का आधा भाग क्रियाशील रहता है आधा भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। इस निष्क्रिय भाग में खाँसी, श्वांस, क्षय आदि के रोग कीटाणु घुस जाते हैं और निर्विरोध रूप से अपनी वंशवृद्धि करते हुए उस व्यक्ति को मृत्यु के मुँह में घसीट ले जाते हैं। परन्तु हंसने से फेफड़ों का समस्त भाग हिलता है, इस हलचल से उनकी सफाई भली प्रकार हो जाती है जिसमें उन रोग कीटों की दाल नहीं गलने पाती। अप्रसन्न, निराश, दुखी, शोकग्रस्त, क्रोधी, ईर्ष्यालु स्वभाव के मनुष्यों का स्वास्थ भट्टी में पड़ी हुई लकड़ी की भाँति जल जाता है पर जो प्रसन्न चित्त हैं, वे इस विपत्ति से बचे रहते हैं। सही कारण है कि खुश मिज़ाज आदमी प्रायः दीर्घ जीवी होते हैं। बीमारी और अकालमृत्यु उन्हें परास्त करने में प्रायः बहुत ही कम सफल होती है।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1947

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 07 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 July 2026


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सोमवार, 6 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (भाग 3)

जीवन की पूर्णता और सफलता के लिए मनुष्य को सबसे पहले निराशा, असंतोष, चिन्ता अथवा उद्वेग आदि के दोषों का परिमार्जन करके उनके स्थान पर आशा, निश्चिन्तता, संतोष तथा गम्भीरता के गुण विकसित करने होंगे। यह गुण सृजनात्मक प्रकृति के होते है। इनके द्वारा मनुष्य की शक्तियों का क्षय नहीं अभिवर्धन होता है। उनकी कार्य क्षमता बढ़ती, दक्षता तथा उत्साह की प्राप्ति होती है।

आशा का विकास सद्विचारों द्वारा आसानी से क्रिया जा सकता है। मनुष्य को सोचना चाहिये कि उसकी जीवन इसलिये नहीं मिला कि उसे निराशा के अन्धकार में इस प्रकार बिता दिया जाये। वह संसार में आनन्द खोजने पर और पाने के लिए भेजा गया है। उसका लक्ष्य प्रकाश है अन्धकार नहीं। वह एक आत्मवान् प्राणी है। उसकी आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश की किरणें भरी हैं। उसे संसार की जरा-जरा-सी प्रतिकूलताओं से निराश होकर इस प्रकार बैठे न रहना चाहिये। उसे जीवन की सफलता और प्रगति के उद्देश्य से परिस्थितियों से संघर्ष करना चाहिये। लोहा लेना चाहिये। निराश हो जाने का अर्थ है जीवन-समर में हथियार डाल देना। हार मानकर पीछे हट जाना।

इस प्रकार हथियार डाल कर पीछे हट जाने से भी प्रयोजन पूरा नहीं होता। निराश होने से आज तक किसी का दुःख दूर नहीं हुआ है। दुःख-कष्टों से उन्हीं को छुटकारा मिलता है, जो वीर पुरुष की तरह हजार बार हारने पर भी साहस नहीं हारते। हर बार एक नई तैयारी के साथ खड़े होकर अपने कर्तव्य में लग जाते हैं और अन्ततः परिस्थितियों, प्रतिकूलताओं तथा विषमताओं पर विजय प्राप्त ही कर लेते है। असफलताओं से निराश होकर बैठे रहने के बजाय, आँख खोलकर संसार में देखना चाहिये। देखने में आएगा कि अपने जैसे न जाने कितने मनुष्य नित्य ही असफलताओं और विषमताओं में फँसते है। किन्तु वे हार मानकर बैठे नहीं रहते और न निराश होकर संघर्ष से मुख मोड़ लेते हैं। वे नये उत्साह, नये साहस और नये उपाय के साथ फिर मैदान में जाते हैं, और अन्त में विजय प्राप्त ही कर लेते है। 

संसार में सफलताओं के जो भी उन्नत स्तम्भ खड़े दीखते हैं, वे सब योंही एक साथ उठते नहीं चले गये हैं। पूरा होने तक उन पर हजारों बार पड़े हैं, अनेक बार गिरे हैं, टूटे और मिटे हैं, किन्तु उनको उठाने वाले इन सब विपरीतताओं से निराश अथवा हतोत्साह नहीं हुए। वे सारे आघात सहते हुए अपने निर्माण कार्य में लगे रहे और अंत में इन उन्नत स्तम्भों को स्थित करने में सफल हो ही गये। संसार में ऐसे उदाहरण होते हुये आपको निराश हो जाने का कोई कारण नहीं दीखता। उन्हीं की तरह आपमें भी शक्ति तथा क्षमता है। निराशा छोड़िये और आशावाद के साथ पुनः मैदान में आइये आपके सारे दुःख दूर होंगे, आप एक सफल व्यक्ति बन जायेंगे।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 दृष्टिकोण का सम्यक् परिष्कार (अंतिम भाग )

सम्यक् दृष्टि प्राप्त होने पर संसार अपना नहीं भगवान का प्रतीत होता है। उस पर स्वामित्व जमाने की भ्रान्ति नहीं उभरती है। आत्मीयता तो किसी पर भी आरोपित की जा सकती है पर ममता के आँचल में सबको नहीं समेटा जा सकता। वस्तुओं को व्यक्तियों को मेरा कहने पर उनके संदर्भ में अनेकानेक जिम्मेदारियों सिर पर लदती है और बदलाव आते ही रौब जमाने का सिलसिला चल पड़ता है। अधिकार जमाने के कारण ही बैल भैंसे, भेड़ें और कुत्ते आपस में लड़ते है। वस्तुएं जहाँ की तहाँ रहती है पर अधिकार जमाने वाले खून–खराबा करते और कराते देखे जाते है।

सम्यक् दृष्टि न होने के कारण ही मनुष्य अपने को शरीर मान बैठता है और उसकी ललक लिप्साओं के लिए सारा प्रयत्न खपा देता है। इतना ही नहीं नीति मर्यादाओं के उल्लंघन में भी नहीं हिचकता। यदि उसे भगवान का मंदिर माना जा सके और संयम एवं पुण्य द्वारा उसकी अभ्यर्थना की जा सके तो यह शरीर न केवल स्वस्थ समर्थ रहता है, पर पुण्य यश और वैभव कमाते हुए लोक परलोक को सब प्रकार सुसम्पन्न बनाता है। छोटी दृष्टि शरीर या घर-परिवार का ही सब कुछ मानती है और उसी छोटे परिवार के लिए मरती खपती रहती है पर विशाल दृष्टिकोण के लिए सब अपने होते है। मनुष्य ही नहीं अन्यान्य प्राणी भी प्रकृति के सभी पक्ष और घटक भी इस अपनेपन के दायरे में आ जाते है। तब दूसरों का दुख बंटाने और अपना सुख बाँटने की आकाँक्षा सहज उठती है। आत्मीयता के चरितार्थ होने का यही एक मात्र आधार भर है।

सम्यक्-दृष्टि परिणाम को देखने, परखने के उपरान्त कार्य आरम्भ करती है। वर्तमान को सुखद सम्भावनाओं के लिए आरंभ करती है। वर्तमान को सुखद संभावनाओं के लिए न्यौछावर भी कर सकती है। वृक्ष बनने के लिए बीज को अपना वर्तमान स्वरूप गलाना पड़ता है। विज्ञजन भी आज की सुविधाओँ की इसलिए उपेक्षा करते है कि उज्ज्वल भविष्य का दिग्दर्शन हो सके। अदूरदर्शी .... वर्तमान की सुविधा देखते हैं और उसके लिए आतुर होकर भविष्य को अन्धकारमय बनाते है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 July 2026



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शनिवार, 4 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (भाग 2)

प्रगति और उन्नति का उत्साह मन में उत्पन्न होता है। बुद्धि उसकी योजना बनाती है और शरीर उसकी कार्यान्वित करता हैं जिसका मन और मस्तिष्क चिन्ता से तप रहा हो, शारीरिक स्वास्थ्य उसकी आग में आहुति वन रहा हो, ऐसे व्यक्ति के हृदय में उत्साह का जन्म होना असम्भव है। बुद्धि का कुण्ठित तथा कलुषित हो जाना स्वाभाविक है। और अस्वस्थ शरीर तो किसी योग्य रह ही नहीं सकता। इस प्रकार जिस मनुष्य की यह तीनों शक्तियों बेकार हो जाएँ, उसे प्रगति और उन्नति के शब्द अपने शब्द-कोष से निकाल ही देने चाहिये।

असन्तोष भी एक प्रकार की मानसिक व्याधि ही होती हैं। यह मनुष्य की सुख-शान्ति की हरण कर लेता है। संतोषी सदा सुखी-की तरह करना होगा-असन्तोषी सदा दुःखी’। यह गलत भी नहीं है। असन्तोष का जन्म अभाव से बतलाया गया है। जिसके पास काम न हो, भोजन-वस्त्र का अभाव हो, जीवन यापन के सामान्य साधनों की कमी हो। उसे असन्तोष होना स्वाभाविक है। किन्तु यह असन्तोष वह असन्तोष नहीं होता, जिसको मानसिक व्याधि कहकर निन्दा की जाती है। इस प्रकार का अभाव जन्य असन्तोष वास्तव में असन्तोष न होकर आवश्यक का दबाव होता है। यह बुरा नहीं। यदि आवश्यकताओं का दबाव अकारण सह लेने का अभ्यास बना लिया जाये तो मनुष्य सामान्य स्थिति से भी नीचे गिरकर दीन और दरिद्री ही बन जाए। कहीं से कुछ मिल गया खा लिया, नहीं तो भूखे पड़े तरह रहे हैं। कपड़ों के स्थान पर चीथड़ों को ही लपेटे है। इस प्रकार की विवशतापूर्वक जीवन मनुष्य के योग्य नहीं। वह तो बुद्धि एवं पुरुषार्थ से वंचित पशुओं का जीवन हैं। आवश्यकतायें मनुष्य को पुरुषार्थ एवं परिश्रम को प्रेरणा देती हैं। उनकी माँग का उचित उत्तर दिया ही जाना चाहिये।

मानसिक व्याधि वाला असंतोष दूसरी चीज है। उसका जन्म अभाव अथवा आवश्यकता से नहीं, बल्कि लोभ और तृष्णा से होता हैं यह एक असात्विक स्वभाव और आसुरी वृत्ति होती है। जो अकारण ही यातना दिया करती है। इस वृत्ति का व्यक्ति सब कुछ होने पर भी उसके सुख से वंचित ही रहता है। असंतोष की पीड़ा उसे घेरे ही रहती है। लोभ के कारण असंतोषी व्यक्ति सम्पत्ति एवं सम्पन्नता की दशा में भी अपने को अभावग्रस्त अनुभव किया करता है। लक्ष्मी का भंडार, पृथ्वी की वसुधा और कुबेर का कोष क्यों न दे दिया जाए। किन्तु असंतोष का रोगी तब भी संतुष्ट न होगा। तब भी उसे अभाव और आवश्यकता अनुभव होती रहेगी। ऐसा वितृष्णा व्यक्ति सम्पन्नता में भी विपन्नता का दुःख भोगने पर मजबूर रहता है।

उद्वेग एक तरह का पागलपन होता है। उत्तेजना, आवेग और आवेश आदि के सारे उन्माद इसी के अंतर्गत आते है। उद्वेग दूषित व्यक्ति अकारण ही आने भीतर तना-तना-सा रहता है। वह किसी बात अथवा काम के विषय में पहले तो मौन रहता है, किन्तु जब खुलता है तो विस्फोट की तरह। इससे उसकी बात अथवा काम बिगड़ जाती है। उद्वेग मानसिक न्यूनता का लक्षण है। जो अन्दर से गम्भीर और सम्पन्न होते है। वे सब कुछ शाँति पूर्वक सोचते और सरलतापूर्वक करते है, इसलिये उनके सारे काम बनते चले जाते है, किसी अभाव अथवा आवश्यकता से दुःखी होकर उद्वेग व्यक्ति या तो अपने आप पर खीजते रहते है अथवा दूसरों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से लड़ते-झगड़ते रहते है। जिस काम में हाथ डालते है, उसको सुचारु रूप से करने के बजाय उससे झगड़ते से रहते है। जो काम करेंगे बेगार की तरह। उनका चंचल तथा क्षुब्ध मन काम में तन्मयता आने ही नहीं देता। किन्हीं अभावों अथवा कमियों को दूर करने की उत्सुकता में उद्वेग का प्रयोग करने से अपकृत्यता के सिवाय कृतकृत्वता प्राप्त नहीं होती।

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👉 दृष्टिकोण का सम्यक् परिष्कार (भाग 2)

यों अशिक्षितों को भी कूप मंडूक कहते हैं, वह भी अपने निकटवर्ती तथा उपलब्ध जानकारी से ही परिलक्षित होते है। उसी से प्रभाव परिष्कार प्राप्त करते है। संसार कितना विस्तृत है और उसमें कितनी विविधताएं, ज्ञान सम्पदाएं भरी पड़ी है, इसे जान सकना उनकी सीमित दृष्टि के लिए संभव ही नहीं हो सकता। पुस्तकों के पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से वे जितना जान सकते है उसके लिए अवसर ही नहीं रहता। सीमित ज्ञान के आधार पर ही उन्हें जानकारियों पाने, निष्कर्ष निकालने और कदम उठाने का अवसर मिलता है। इन परिस्थितियों को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। अशिक्षा एक प्रकार की दरिद्रता है, जिसके कारण ज्ञानधन कमा सकने और सच्चे अर्थों में धनी बनने का सुयोग प्राप्त कर ही नहीं पाते। विद्वानों की, सभ्यजनों की पंक्ति में बैठ सकना उनके लिए संभव ही नहीं हो पाता। बहुज्ञता और सभ्यता की दृष्टि से उनमें अनेकों त्रुटियाँ पाई जाती है।

निरक्षरों और साक्षरों की दृष्टि में स्तर में अन्तर रहने के अतिरिक्त यह भी जानना आवश्यक है कि इन दोनों ही स्थितियों से ऊंची है-दिव्य-दृष्टि। जिसको सम्यक् दृष्टि भी कहा गया है। दूसरे शब्दों में इसे दूरदर्शी विवेकशीलता भी कहा जा सकता है। यह जिन्हें उपलब्ध है, उन्हीं की मेधा तत्व दर्शन कर सकने में समर्थ होती है। यथार्थता का सत्य का दर्शन इन्हीं से बन पड़ता है। ईश्वर का साक्षात्कार भी इन्हीं के सहारे संभव है।

चर्मचक्षुओं से मिट्टी का ढेला अनगढ़ स्थिति में ही दीख पड़ता है। उसका कुछ मूल्य भी नहीं होता। किन्तु जब वैज्ञानिक उपकरणों से उसका वर्गीकरण, विश्लेषण किया जाता है तो उसे परमाणु समुच्चय के रूप में जाना जाता है। इसमें से प्रत्येक परमाणु अपने में असाधारण शक्ति धारण किये होता है। जिसका विस्फोट होने से तहलका मच जाता है। यह सूक्ष्म दृष्टि है इसे प्राप्त कर सकने पर विश्व के कण कण में संव्याप्त ब्रह्म-चेतना का दर्शन होता है।

यही है वह दृष्टि जिसके मिलने पर आत्म-स्वरूप का बोध होता है। अपने को परमात्मा का युवराज होने का भान होता है। साथ ही यह विश्व परिवार भगवान का सुरम्य उद्यान प्रतीत होता है। उसे सींचने संजोने के लिए माली का दायित्व संभालने के लिए मन मचलता है। जीवन एक बहुमूल्य अवसर प्रतीत होता है। जिसका सदुपयोग बन पड़ने पर नर नारायण, पुरुष पुरुषोत्तम बन सकने की संभावना का आधार प्रत्यक्ष रूप में परिलक्षित होता है। साथ ही वह सम्यक् दृष्टि भी प्राप्त होती है, जिसे दूसरे शब्दों में स्वर्ग कहा जाता है।

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 July 2026



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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (भाग 1)

निराशा, चिन्ता, असन्तोष अथवा उद्वेग किसी भी, आपत्ति अथवा विषमताओं का उपचार नहीं है। यह विकास स्वयं ही रोग और विपत्ति माने गये है। संसार में जो भी व्यक्ति सफल हुये हैं, उन्होंने अपने जीवन में निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष की कभी अवसर नहीं दिया। उन्होंने विकट से विकट परिस्थितियों में अपने को इन विकारों से बचाया है। संसार में जो भी असफल होते हैं, उनकी असफलता का कारण अभाव अथवा प्रतिकूल परिस्थितियाँ नहीं होती। उनका एक मात्र कारण निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष ही होता है। असफलता का निवास बाह्य परिस्थितियों की प्रतिकूलता में नहीं मनुष्य की प्रति गामिनी भावनाओं में होता है।

निराशा एक मानसिक रोग है। यह मनुष्य की गतिशीलता को अस्वस्थ बना देता है। निराशावादी व्यक्ति प्रगति की भावना और उन्नति की जिज्ञासा से उदासीन हो जाता है। प्रगति अथवा उन्नति की बात मन में आते ही उसे ऐसा आभास होने लगता है, मानो वह अपने ऊपर कोई विपत्ति लाने की बात सोच रहा हे। काम में प्रवृत्ति लाने से पूर्व ही उसे आपत्तियाँ, कठिनाईयाँ और असफलता दिखलाई देने लगती है। उसका साहस मर जाता है, उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। आपने को जहाँ का तहाँ पड़ा सुरक्षित अनुभव करता है। एक निराशावादी और मृत व्यक्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। एक स्थित शव की तरह होता है, एक चलती-फिरती लाश की तरह।

चिन्ता की चिंता तक कहा गया है। किन्तु चिन्ता रूपी चिता श्मशान की चिता से अधिक भयंकर होती है। क्योंकि वह चिंता मेरे मनुष्य को जलाया करती है और यह जीवित मनुष्य को। चिंता-ग्रस्त मनुष्य अन्दर गीली लकड़ी की तरह सुलगता करता है। इस जलन में सबसे पहले उसकी प्रसन्नता जलती है, फिर जीवन की आशाएँ, अनन्त क्षमताएँ और अन्ततः शरीर। चिन्ता की आग इस प्रकार क्रम-क्रम से जलाकर मनुष्य का सारा जीवन खाक कर डालती है।

चिन्ता की चिंता में बैठा मनुष्य अपनी यातना पूर्ण मृत्यु की प्रतीक्षा करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता। जिस वृक्ष में आग लग गई हो अथवा जिसे दावाग्नि ने झुलस डाला हो उससे हरियाली की आशा करना दुराशा मात्र है। ऐसे दाव-दुग्ध वृक्ष में न नये पत्ते उग सकते हैं, न फूल खिल सकते हैं और न फल आ सकते है। उसका ठूँठ होकर निरुपयोगी हो जाना निश्चित है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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