शुक्रवार, 8 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 2)

आत्म निरीक्षण के पथ पर चलते हुए मनुष्य को अपने जीवन एवं तत्सम्बन्धित विषयों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते रहना चाहिए और उनका सुधार करना चाहिए। जिस प्रकार मुनीम अपनी रोकड़ को बड़े ध्यान से मिलाता है और एक पैसे की भूल हो जाने पर उसको निकाल कर ही पीछा छोड़ता है, उसी प्रकार हमें भी अपने दोषों का पूरा-पूरा निरीक्षण करके उन्हें दुरुस्त करना चाहिए। यही आत्म निरीक्षण रूपी छननी है जिसमें चरित्र व्यवहार, स्वभाव आदि की सारी अशुद्धियाँ बुराइयां दूर हों जाती हैं।

इसके लिए मनुष्य को दोषज्ञ बनना चाहिए। इसका तात्पर्य यह नहीं पर दोष दर्शन की वृत्ति अपनाई जाय वरन् स्व छिद्रान्वेषण की आदत डाली जाय। दोषज्ञ का अर्थ है अपने दोषों का जानकार होना। लेकिन स्वदोष दर्शन और उन्हें दूर करने के पथ पर बहुत ही कम व्यक्ति बढ़ पाते हैं। कई तो अपने आप के स्तर एवं दोषों को जानते भी नहीं।

स्वदोष दर्शन परक बुद्धि आत्म निरीक्षण की क्षमता प्राप्त करने में सर्वप्रथम अपने दोषों को लोक शास्त्र के आधार पर देखना चाहिए अधिकतर लोग मनुष्य के सम्मुख, उसकी बुराइयों तथा दोषों का बखान नहीं करते इसलिए लोक व्यापी आधार पर उन्हें पहचानना चाहिए जब लोक में किसी भी बात पर दोष मिलता हो, अपनी असफलता, हानि के कारण दूसरे लोग जान पड़े, दुख कठिनाई अपने पर विधाता को दोष दिया जाए, ऐसे समय अपने अंतर को ढूँढ़ना चाहिए। 

अपनी आन्तरिक स्थिति को टटोल कर देखने पर पता चलता है कि इन सबका कारण हमारे स्वयं के अन्तर में ही मौजूद है। ऐसी परिस्थितियों में सूक्ष्म अन्तः निरीक्षण करने पर पता चलता है कि मनुष्य की मानसिक कमजोरी के कारण ही वह अपनी हानि दोष का कारण दूसरों को बताता है। अपनी परिश्रम हीनता एवं आलस्यवश ही असफलतायें मिलती हैं। लोक व्यवहार की कुशलता मिलनसारी के अभाव में ही सामाजिक अवहेलना, तिरस्कार सहना पड़ता है। सहनशीलता के अभाव में संसार कठोर जान पड़ता है। इस प्रकार बहुत कुछ बाहर दीखने वाली बुराइयां कमजोरियाँ अपने अन्तर में ही छिपी रहती हैं। ढूंढ़ने पर उन्हें पहचाना जा सकता है। अपने अन्तर को टटोलते हुए ठीक ही कहा है-
बुरा जो ढूँढन मैं चला मुझसा बुरा न कोय-
इस प्रकार अपने अंतर को खोजने पर अपनी कमजोरियाँ स्पष्ट दिखाई देंगी।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (अंतिम भाग)

इस संसार का निमार्ण सत और तम शुद्ध और अशुद्ध, भले और बुरे तत्वों से मिल कर हुआ है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो पूर्णतः बुरा या पूर्णतः भला हो। समय-समय पर यह भली-बुरी परिस्थितियाँ दबती और उभरती रहती हैं। धूप-छाँव की तरह प्रिय और अप्रिय अवसर आते जाते रहते हैं। इनमें से किसे स्मरण रखा जाय और किसे भुलाया जाय यही विचार करना बुद्धिमत्ता का चिन्ह है। यदि हम दुखों को, अभावों को, असफलताओं को, दूसरों के अपकारों को ही स्मरण किया करें तो यह जीवन नरकमय दुखों से भर जायगा। हर घड़ी खिन्नता, निराशा और असंतुष्टि चित्त में छाई रहेगी। पर यदि दृष्टिकोण बदल लिया जाय और प्रिय प्रसंगों, सफलताओं, प्राप्त साधन सम्पदा के लोगों और दूसरों के किये हुए उपकारों को स्मरण किया जाय तो प्रतीत होगा कि भले ही थोड़े अभाव आज हों पर उनकी तुलना में सुख दायक वातावरण ही अधिक है, दुर्भाग्य की अपेक्षा सौभाग्य की ही स्थिति अपने को अधिक उपलब्ध है।

जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए सुविधा सामग्रियों की आवश्यकता अनुभव की जाती है, सो ठीक है। इसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। पर यह भी न भूल जाना चाहिए कि जो प्राप्त है उसका सदुपयोग किया जाय। उपलब्ध साधनों का सदुपयोग यदि हम सीख जायं, हर वस्तु का मितव्ययितापूर्वक उपयोग करें, उसका पूरा-पूरा लाभ लें तो जो कुछ प्राप्त है वही हमारे आनन्द को अनेकों गुना बढ़ा सकता है। अपनी धर्मपत्नी जैसी भी कुछ वह है यदि उसे अधिक शिक्षित, अधिक सुयोग्य बनाया जाय और उसके स्वभाव तथा गुणों का अपने कार्यक्रमों में ठीक प्रकार उपयोग किया जाय तो यही पत्नी जो आज व्यर्थ का बोझ जैसी मालूम पड़ती है- अत्यंत उपयोगी एवं लाभदायक प्रतीत होने लगेगी। जितनी आजीविका आज अपने को प्राप्त है यदि उसके खर्च को ही विवेक और मितव्ययितापूर्वक ऐसी योजना बनाई जाय कि प्रत्येक पैसे से अधिकाधिक लाभ उठाया जा सके तो यह आज की थोड़ी आजीविका भी आनंद और सुविधाओं में अनेक गुनी वृद्धि कर सकती है। इसके विपरीत यदि अपना दृष्टिकोण अस्त व्यस्त है तो बड़ी मात्रा में सुख−साधन उपलब्ध होते हुए भी वे कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे वरन् ‘जी के जंजाल’ बनकर परेशानियाँ और उलझनें ही उत्पन्न करेंगे।

सुखी जीवन की आकाँक्षा सभी को होती है। वह उचित और स्वाभाविक भी है पर उसकी उपलब्धि तभी संभव है जब हम अपने दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें। सुधरा हुआ दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें सुधरा हुआ दृष्टिकोण स्वल्प साधनों और कठिन परिस्थितियों में भी शान्ति और सन्तोष को कायम रख सकता है। गरीबी में भी लोग स्वर्ग का आनन्द उपलब्ध करते देखे जाते हैं। पर यदि दृष्टिकोण अनुपयुक्त है, तो संसार के समस्त सुख साधन उपलब्ध होते हुए भी हमें सुखी न बना सकेंगे। अतएव सुखी जीवन की आकाँक्षा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित है कि अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहे।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 08 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 08 May 2026


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‼️ यह सौभाग्य हर विवेकवान को मिल सकता है (भाग 1) ‼️

अखण्ड-ज्योति परिजनों ने लम्बे समय से जो पढ़ा और समझा है अब उसे मस्तिष्क की उथली परतों तक सीमित न रहने देकर अन्तराल की गहराई में उतरना चाहिए और भुलकर आगत के सम्बन्ध में नई नीति निर्धारण कर सकने योग्य विवेक एवं साहस जुटाना चाहिए।

समस्याएं जानी पहचानी हैं। समाधान भी प्रायः सभी विचारवानों को विदित हैं। फिर से उस सर्न्दभ में अधिक ध्यान देने के लिए इसलिए कहा जाता है कि तथ्यों पर जिस हलके ढंग से विचार किया जाता रहा है वह अपर्याप्त है। ढर्रे आवरण उठाकर हमें वास्तविक को देखना चाहिए। इसी को तत्वदर्शन या ईश्वर दर्शन कहतें हैं। इसी का नाम आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म निर्वाण है। ढर्रे का अभ्यास ही भव बन्धन है। माया अर्थात् आवास्तविकता की खुमारी। इसे हटाया और तथ्य को अपनाया जा सके तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति के मार्ग का अवरोध मिट गया।

मनुष्य जीवन ईश्वर का बहुमूल्य अनुदान है। इसे इनाम नहीं अमानत माना जाय। भव-बन्धनों के कुचक्र से निवृति, पर्णता की प्राप्ति-र्स्वग और मुक्ति की उपलब्धि-सिद्धियों की विभूति आत्मा और परमात्मा की एकता है कि यर्थर्थता को हृदयंगम करना सम्भव हो सका या नहीं ?

पूज्य गुरुदेव के "दस सूत्रीय कार्यक्रम" क्या है ? अमृत सन्देश, https://youtu.be/osWWkn6frZ0?si=yGzD1yJe13boxQpo

कहने सुनने को तो आदर्शवादी बकवास आये दिन चलती रहती है, पर वस्तुतः उसमें कुछ सार नहीं। अध्यात्म का लाभ एवं चमत्कार मात्र उन्हीं को मिलता है जो उसे कल्पना लोक की उड़ान न मानकर जीवन-दर्शन के रुप में मान्यता देते और नदनुरुप दिशा धारा का निर्धारण करते हैं।

युग-सन्धि की ब्रह्म वेला में जागृत आत्माओं का आत्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन की यथार्थत के साथ जुड़ सके तो काम चले। सोचा जाय कि अन्य प्राणीयों की तुलना में मनुष्य को जो ‘विशेष’ मिला है वह शौक-मौज भर के लिए है ? विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के-पूर्णता तक पहुँचने के ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस र्स्वण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है जैसा कि अब तक किया जाता रहा ? लोग कहते और क्या करते हैं इसे देखने, सुनने और उन्हीं का अनुकरण करने से तो एक के पीछे एक एक करके गर्त में गिरने वानी भेड़ों की तरह अपनी भी दुर्गति ही होनी है। क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल

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गुरुवार, 7 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 1)

कस्यं मृजाना अतियन्तिरिप्रमायुर्दधानाः प्रतरंनवीय॥
आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु॥
अ. 18। 31।17॥

“आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बन कर अपनी अशुद्धि, मल अथवा अपमृत्यु को साफ कर दूर करते हैं। और नव दीर्घ आयुष्य धारण करते हैं। तत्पश्चात् हम धन और प्रजा के साथ अभ्युदय को प्राप्त होते हुए अपने घर में सुगन्धि रूप बन कर रहें।”

उक्त वेदमंत्र में आत्मसुधार के लिए बहुत ही सरल और स्पष्ट राजमार्ग बताते हुए आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा दी गई है। मंत्र के प्रारम्भ में आया है आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बनकर अपनी अशुद्धि व भल अथवा अपमृत्यु को साफ करते हैं। इसके अनुसार आत्मनिरीक्षण करते रहने से सारे दोष, बुराइयाँ, दुर्व्यसन आदि ठीक उसी प्रकार अलग-अलग हो जाते हैं जैसे छलनी में किसी पदार्थ को छानने पर उसका खराब अंश अलग रह जाता है और वस्तु शुद्ध और मल रहित बन जाती है। आत्मनिरीक्षण का अवलम्बन लेने पर मनुष्य के दोष अशुद्धि, बुराइयाँ आदि भी ठीक इसी प्रकार दूर हो जाती हैं।

मानव स्वभाव की कमजोरी के कारण उसमें कुछ न कुछ दोष, बुराइयाँ आदि अपना घर बनाये रहती हैं। किन्तु इन्हें स्वच्छन्दतापूर्वक पनपने देना मनुष्य के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है। उस समय मनुष्य की वही हालत होती है जैसे उस खेत की, जो मालिक की देखभाल आदि से वंचित झाड़ झंखाड़, अनावश्यक कूड़ा, घास-पत्ता आदि से अनुपयोगी बन जाता है। ऐसे मालिक की देखभाल के अभाव में घर की दुर्दशा होती है। ठीक उसी प्रकार मानव जीवन बंजर जमीन, सफाई और निरीक्षण के अभाव में घर की तरह बेढंगा, दोषपूर्ण, अशुद्ध और विकृत बन जाता है। एक छोटे से अवगुण दोष के कारण जीवन में बट्टा लग जाता है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि थोड़ी सी खराबी होने पर चाँदी का सिक्का बेकार हो जाता है, अच्छे से अच्छे भोजन को एक मक्खी अथवा कीड़ा घृणा युक्त बना देता है। घड़े में छोटा सा छेद होने पर उसको खाली कर देता है, एक छोटा सा फोड़ा जानलेवा बन जाता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी सुपात्र की उपयोगिता एवं महत्ता उसके एक अवगुण एवं दोष से नष्ट हो जाती है। एक दोष से मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है पचास वर्षों की बहुत बड़ी नेकनामी को कुछ क्षण की बदनामी नष्ट कर देती है।

मनुष्य के चरित्र व्यवहार, स्वभाव, विचार, जीवन यापन दृष्टिकोण आदि में कुछ न कुछ कमी रह जाना स्वाभाविक है किन्तु जैसा कि ऊपर व्यक्त किया जा चुका है, एक छोटी सी बुराई भी जीवन की समस्त अच्छाइयों पर पानी फेर देती है। जिस प्रकार एक हल्के से धब्बे से किसी भी चित्र की सुन्दरता नष्ट हो जाती है उसी प्रकार किसी भी दोष से दूषित मनुष्य का जीवन कलंकित हो जाता है। चन्द्रमा के छोटे दो धब्बे उसके सौंदर्य में कितने बड़े बाधक हैं जो हर देखने वाले की आँखों में खटक जाते हैं। किसी मशीन का एक भी पुरजा बिगड़ जाने पर सारी मशीन का संतुलन और तत्परता नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार मनुष्य जीवन व्याप्त दोष, बुराइयों, अशुद्धियों आदि को दूर करके पूर्णता व अभ्युदय की ओर अग्रसर होने के लिए आत्म निरीक्षण रूपी छलनी की आवश्यकता है।

.....क्रमशः जारी
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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 3)

यदि दोनों प्रकार के प्रयत्न करते हुए भी समस्या हल नहीं होती तो किसी प्रकार काम चलाऊ रास्ता निकाल कर उसी में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की कोशिश करनी चाहिए। अपने से अधिक दुखी लोगों के साथ अपनी तुलना करने से मनुष्य यह अनुभव कर सकता है कि कुछ कष्ट होते हुए भी भगवान पर उसकी बड़ी कृपा है कि उसने उतना दुखी नहीं बनाया जितने अन्य लोग दुखी हैं। अस्पतालों में पड़े हुए बीमार, अंग-भंग, साधनहीन, संकट जंजालों में फँसे हुए, पारिवारिक उलझनों में बुरी तरह उलझे हुए अनेकों व्यक्ति इस संसार में बहुत ही दयनीय स्थिति में जीवन यापन करते हैं। उनसे अपनी तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि उनकी अपेक्षा अपनी स्थिति हजारों गुनी अच्छी है। यदि पशु पक्षियों, कीट पतंगों से अपनी तुलना की जाए तब तो निश्चय ही यह प्रतीत होगा कि अपने को प्राप्त सुविधाएं इतनी अधिक हैं कि इन थोड़ी सी कठिनाइयों को नगण्य ही माना जा सकता है।

इसी प्रकार जो व्यक्ति अभी हमें बुरे और अपने शत्रु प्रतीत होते हैं, उनके कुछ अपकारों की बात सोचना छोड़कर यदि उनके उपकारों को उनके द्वारा किये हुए सद्व्यवहारों को स्मरण करें तो निश्चय ही वे हमें शत्रु नहीं मित्र दिखाई पड़ेंगे। माता-पिता ने हमें एम.ए. तक नहीं पढ़ाया, यदि वे उतनी शिक्षा दिला देते तो आज हम ऊँची सर्विस प्राप्त करते होते, यह विचार मन में आने पर माता-पिता शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं उनके प्रति द्वेष एवं दुर्भाव उत्पन्न होता है। पर यदि हम अपनी विचार धारा बदल दें और उनने जिन आर्थिक कठिनाइयों में रहते हुए उतने बड़े कुटुम्ब का पालन करते हुए, हमारा पालन पोषण किया एवं जितनी संभव थी उतनी शिक्षा व्यवस्था की, तो उनके उपकारों के प्रति मन श्रद्धा से झुक जाएगा और वे मित्र ही नहीं देवता के समान उपकारी प्रतीत होंगे।

दृष्टिकोण में थोड़ा अन्तर कर देने से हम असंतुष्ट और खिन्न जीवन को संतोष में परिणित कर सकते हैं। ईश्वर ने सुर दुर्लभ मानव जीवन प्रदान करके इतनी बहुमूल्य सम्पदा हमें प्रदान की है कि उसका मूल्य लाखों करोड़ों रुपयों में भी नहीं चुकाया जा सकता। जैसा शरीर कुल, सम्मान, विद्या, परिवार आदि अपने को प्राप्त है उसमें से प्रत्येक को विशेषता और सुविधा का चिन्तन करें, साथ ही यह भी सोचें कि यदि यह बातें उपलब्ध न होती तो उनके अभाव में अपना जीवन कितना नीरस होता- तो इस चिन्तन से हमें प्रतीत होगा कि हमारी वर्तमान परिस्थिति दुख दारिद्र से भरी नहीं, वरन् सुख सुविधाओं से सम्पन्न है।

दूसरों के द्वारा अपने प्रति जो उपकार हुए हैं उनका यदि हम विचार करते रहें तो यही अनुभव होगा कि हमारे निकटवर्ती सभी लोग बड़े उपकारी और सेवाभावी और स्वर्गीय प्रकृति के हैं। इनके साथ रहने में अपने को सुख ही सुख अनुभव करना चाहिए। इसके विपरीत यदि उनके दोष ढूँढ़ने लगे और उन घटनाओं को स्मरण किया करें जिसमें उनने कुछ अपकार किये तो हमें अपने सभी स्वजन संबंधी बड़े दुष्ट प्रकृति के, अपकारी, असुर एवं शत्रु प्रतीत होंगे और ऐसा लगेगा कि इन लोगों का संपर्क हमारे लिए नरक के समान दुखदायी है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 May 2026


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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 07 May 2026


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बुधवार, 6 मई 2026

👉 उपासना में इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता (अंतिम भाग)

शूरवीर पंडित वही, सदा प्रशंसागार।
चारित्र धन जाको नहीं, हरत अक्ष-वटमार॥

दूसरी गाथा में कहा गया है कि इन्द्रिय चपल तुरंग के समान है। दुर्गति के गर्त में वे खींच ले जाती है। यह जानकर सत्पुरुषों के वचन रूपी लगाम से इन्द्रिय रूपी घोड़ों को वश में करना चाहिये। इन्द्रियों को थोड़ी सी ढीली छोड़ने पर बहुत दुःख उठाना पड़ता है। तुच्छ विषय भोगों में सुख नाम मात्र का है, दुःख का पार नहीं। देवलोक के देव, इन्द्रिय दमन नहीं कर सकने के कारण ही मोक्ष नहीं पा सकते। विषय भोगों में ही वे लगे रहते हैं अतः व्रत नियम ग्रहण नहीं कर पाते! मनुष्य व्रती बनने के कारण मोक्ष पा सकता है।
सभी व्रतों-नियमों का भी उद्देश्य है- इन्द्रियों का निग्रह। जब तक इन्द्रियाँ वश में नहीं, तब तक न तो अहिंसा धर्म का पालन हो सकता है, न अपरिग्रह आदि का। अधिकाँश पाप इन इन्द्रियों के विषयों की आसक्ति के कारण ही किये जाते हैं। साधना में चित्त की एकाग्रता और अन्तर्मुखता की बड़ी आवश्यकता है और विषयासक्ति वाले व्यक्ति की चंचलता मिट नहीं सकती क्योंकि कभी अच्छा खाने की इच्छा होती है, कभी देखने, सुनने आदि की। इच्छाओं का अंत नहीं, एक की पूर्ति हुई नहीं, दूसरी अनेक इच्छाएं तैयार। अतः उपासक को इन्द्रिय निग्रह अवश्य करना चाहिये।

इन्द्रिय-निग्रह का अर्थ है बाह्य पदार्थों के आकर्षण को कम करना अंतर्मुखी बनना विषयों की ओर दौड़ने वाली इन्द्रियों को रोकना, इन्द्रियों का निग्रह करके हमें उन्हें अपने बस में लाना है। वे स्वेच्छाचारी न रहकर हमारे आधीन हो जायं और हम उनसे जो काम लेना चाहें, जहाँ लगाना चाहें वहीं वे लग जायं ऐसा अभ्यास कर लेने से इन्द्रियाँ हमारी उपासना में बाधक न बनकर साधक बन सकती हैं। जैन-आगमों में कहा गया है कि- “जे आसवा ते परिसवा” अर्थात् जो कर्म बंधन के कारण हैं वे मुक्ति के कारण भी बन सकते हैं। अपनी इन्द्रियों के सदुपयोग करने की कला यदि हम सीख लें तो इस शरीर और इन्द्रिय के द्वारा हम आत्मोत्थान कर सकते हैं। कानों का विषय है सुनना अतः यदि हम विषय विकार-वर्धक और मन को चंचल करने वाली क्रोधादि काषाय-रागद्वेष उत्पन्न करने वाली बातों को न सुनकर सत्पुरुषों की वाणी को सुनें तो हमारा उद्धार सहज ही हो सकता है। इसी तरह अन्य इन्द्रियों का भी हम सदुपयोग करके अपनी उपासना को आगे बढ़ा सकते हैं।

एक एक इन्द्रिय के संयम से मनुष्य में कितनी अद्भुत-शक्तियों का विकास होता है इसका कुछ विवरण पातंजलि के ‘योग सूत्र’ में पाया जाता है। वास्तव में इन्द्रियाँ अपने आप में भली बुरी कुछ भी नहीं हैं। उनको प्रेरणा देने वाला मन और आत्मा है। अतः हमें अपने मन को वश में करना आवश्यक है और वह वश में होगा आत्मा द्वारा। क्योंकि सर्वोपरि सत्ता आत्मा ही है। उसने अपना मान भुला दिया है अपनी अनंत शक्तियों को वह भूल बैठा है इसीलिये मन उस पर हावी हो गया है। पर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा विवेक और ज्ञान की लगाम में मन रूपी घोड़े को वश में किया जा सकता है। यदि हम अपनी इन्द्रियों और मन की एकाग्रता के साथ उपासना करेंगे तो सच्ची उपासना होगी और वैसी उपासना से ही हमारा कल्याण हो सकेगा। परमात्मा और आत्मा की दूरी को कम कर उसके साथ एकरूप हो जाना ही उपासना का उद्देश्य है। उपास्य और उपासक के अभिन्न हो जाने में ही उसकी सफलता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 2)

जीवन को शान्तिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँके। वरन् उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में है तो हमारी अनेकों दुश्चिंताएं आसानी से नष्ट हो सकती हैं।

एक विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। फेल होने के समाचार से उसका मानसिक सन्तुलन डगमगा जाता है। वह इस असफलता को वज्रपात जैसी मानता है। सोचता है सारी दुनिया मुझे धिक्कारेगी, मूर्ख या आलसी समझेगी, मित्रों के सामने मेरी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जायगी, अभिभावक कटु शब्द कह कर मेरा तिरस्कार करेंगे, यह कल्पना उसे असह्य लगती है, चित्त में भारी क्षोभ उत्पन्न होता है और रेल के आगे कटकर, नदी में कूद कर या और किसी प्रकार वह अपनी आत्महत्या कर लेता है। घर भर में कुहराम मच जाता है। वृद्ध माता-पिता रो-रो कर अन्धे हो जाते हैं। एक उल्लास पूर्ण हंसते खेलते घर का वातावरण शोक, क्षोभ और निराशा में परिणत हो जाता है। इस विपन्न स्थिति को उत्पन्न करने में सारा दोष उस गलत दृष्टिकोण का है जिसके अनुसार एक छोटी सी असफलता का मूल्य इतना बढ़ा-चढ़ा कर आँका गया।

एक दूसरा विद्यार्थी भी उसी कक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। उसे भी दुख होता है पर वह वस्तुस्थिति का सही मूल्याँकन कर लेता है और सोचता है इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा फल 43 प्रतिशत ही तो रहा। मेरे समान अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या 57 प्रतिशत है। वर्तमान परिस्थितियों में अनुत्तीर्ण होना एक साधारण सी बात है इसमें सदा विद्यार्थी ही दोषी नहीं होता वरन् प्रायः शिक्षकों की उदासीनता बिना पढ़े हुए विषयों के पर्चे आ जाना और नम्बर देने वालों की लापरवाही भी उसका कारण होती हैं। इस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गये तो अगले वर्ष अधिक परिश्रम करने से अच्छे डिवीजन में उत्तीर्ण होने की आशा रहेगी आदि बातों से अपने मन को समझा लेता है और अनुत्तीर्ण होने की खिन्नता को जल्दी ही अपने मन में से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है।

दोनों ही छात्र एक ही समय एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे। एक ने आत्महत्या कर ली दूसरे ने उस बात को मामूली मान कर अपना साधारण क्रम जारी रखा। अन्तर केवल समझ का था परिस्थिति का नहीं। यदि परिस्थिति का होता तो दोनों को समान दुख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी। पर ऐसा होता नहीं, इससे स्पष्ट है कि परिस्थितियों के मूल्याँकन में गड़बड़ी होने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।

हमें चाहिए कि अपनी कठिनाइयों को बड़ा चढ़ा कर न देखें, वरन् उनको दूसरे अधिक आपत्ति ग्रस्त लोगों के साथ तुलना करके अपने आपको अपेक्षाकृत कम दुखी अनुभव करें। आपको आर्थिक कठिनाई रहती है, सभ्य सोसाइटी के लोगों जैसा जीवन यापन करने में वर्तमान आर्थिक स्थिति कुछ दुर्बल मालूम पड़ती है। थोड़ा आर्थिक अभाव अनुभव होता है और चिन्ता रहती है। इस स्थिति से छुटकारा प्राप्त करने के कई उपाय हो सकते हैं एक यह कि कुछ अधिक उपार्जन करने का प्रयत्न किया जाय। वर्तमान समय में जितना श्रम, समय और मनोयोग व्यवसाय में लगाया जाता है उससे अधिक लगाया जाए, कोई और सहायक धंधा ढूंढ़ा जाए या वर्तमान व्यवसाय में ही जो आय बढ़ने के उपाय संभव हों और दौड़-धूप करके जुटाया जाए। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि अपने खर्चे कम किये जाएं। दुनिया में सभी तरह के गरीब-अमीर लोग रहते हैं, अपनी-अपनी आमदनी के अनुसार जीवन यापन करने की योजना बनाते हैं। यदि अपनी आमदनी कम है तो क्यों न कम खर्च का बजट बनाकर काम चलाया जाए? खर्चा घटा लेने से कुछ सुविधाएं कम हो सकती हैं पर उस कमी का दुख उतना न होगा जितना बढ़े हुए खर्च की पूर्ति न होने पर दिन रात चिन्तित रहने के कारण होता है।

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 06 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 May 2026


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मंगलवार, 5 मई 2026

👉 उपासना में इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता (भाग 1)

मानव जीवन में उपासना का बड़ा महत्व है। उपासना से सद्गुणों का विकास होता है और यावत् परमात्मा-दशा प्राप्त होती है। सद्गुणों के विकास का सबसे प्रधान साधन है-गुणी व्यक्तियों की आदर, भक्ति, पूजा, सेवा और गुणों की आराधना। आराधना और उपासना एक ही है।

उपासना का अर्थ है समीप बैठना, रहना और वह दो तरह से होता है (1) परमात्मा या सद्गुरु के पास बैठना और (2) आत्मा या आत्मीय गुणों के पास बैठना। वास्तव में हम इन दोनों तत्वों से बहुत दूर बैठे हुए हैं। परमात्मा को तो हम भूल से गये हैं, कभी दुःख-दर्द के समय ही उसका स्मरण आता है। यदि उसके नाम की माला भी फेरते हैं तो हमारा मन इधर उधर भटकता रहता है इसलिए हम परमात्मा के समीप नहीं पहुँच पाते। इसी प्रकार सद्गुरुओं के पास पहले तो हम अधिक समय बैठते ही नहीं हैं, और बैठते हैं तो भी मन घर और बाहर के कामों में लगा रहता है। उनकी वाणी को हम जीवन में स्थान नहीं देते, उनकी साधना से हम प्रेरणा ग्रहण नहीं करते। उनकी उपासना करते हैं, यह कह ही कैसे सकते हैं? आत्मा से भी हम बहुत दूर हैं। उसके दर्शन एवं अनुभव का प्रयत्न नहीं करते। शरीर में ही आत्म बुद्धि की हुई है। इसलिए आत्मा की उपासना हम नहीं कर रहे हैं यह निश्चित है।

उपासना और वासना में विरोध है अतः जहाँ तक तुम्हारा मन वासनाओं में भटकता है वहाँ तक सच्ची उपासना हो नहीं पाती बाहरी दिखावा तो ढोंग है उपासना नहीं।
‘उपासना’ में उपास्य के साथ तल्लीन हो जाने की परमावश्यकता है। जब तक वह स्थिति प्राप्त नहीं होती, साधक का चरम विकास नहीं हो सकता और उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय निग्रह की अत्यंत आवश्यकता है। जब तक इन्द्रिय के विषय भोगों में हमारा मन लगा रहता है तन जुड़ा रहता है-तब तक उपासना में तल्लीनता नहीं आ सकती। इसीलिये सभी धर्मों में इन्द्रिय दमन को महत्व दिया गया है। इन्द्रियों के बहिर्मुखी होने से हमारा मन चंचल रहता है। कभी सुन्दर पदार्थों या रूप के दर्शन में मन ललचाता है, कभी मधुर गायन को सुनने के लिए हम बड़े उत्सुक हो जाते हैं, कभी विविध रसों का आस्वादन करने को जिह्वा की लोलुपता नजर आती हैं। कभी सुगन्धित पदार्थों के प्रति आशक्ति देखी जाती है और कभी कोमल वस्तुओं के स्पर्श के लिए मन ललचा उठता है। इस तरह पाँचों इन्द्रियों के तेईस विषयों में मन भटकता रहता है। तब उपासना में तल्लीनता आयेगी कैसे?

जैन धर्म में संयम और तप को बहुत अधिक महत्व दिया गया है और इसका प्रधान कारण इन्द्रियों का निरोध करना ही है। संयम के सत्रह प्रकारों में पाँच इन्द्रियों का दमन सम्मिलित है ही, और तप का अर्थ भी है-इच्छाओं का निरोध। इसमें भी इन्द्रिय दमन की प्रधानता है। पाँचों इन्द्रियों में एक एक इन्द्रिय पर भी अंकुश न रहने से कितना दारुण दुख उठाना पड़ता है, इसके विषय में हाथी, हरिण, मच्छ आदि के दृष्टाँत दिये गये हैं और यह कहा गया है कि जब एक एक इन्द्रिय की विषयासक्ति का परिणाम दारुण है, तो जिनकी पाँचों इन्द्रियाँ छूट के साथ विषय-भोगों में लगी हुई हैं, उनका क्या हाल होगा ? यह तो प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सोचले। ‘इन्द्रिय-पराजय-शतक’ नामक प्राचीन प्राकृत ग्रन्थ में इसका बड़े सुन्दर रूप में विवेचन एवं ज्ञान उपदेश प्राप्त होता है। उसकी कुछ गाथाओं का हिन्दी पद्यानुवाद बुद्धू लाल श्रावक का बनाया हुआ नीचे दिया जा रहा है। इसके प्रारम्भ में ही कहा गया है कि वही शूरवीर और पंडित प्रशंसनीय है, जिसके चरित्र-धर्म को इन्द्रिय रूपी चोरों ने नहीं लूटा।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 1)

अधिकाँश व्यक्ति इस संसार में ऐसे हैं जो अपने आपको बहुत, हैरान, परेशान, अभागा और संकट ग्रस्त मानते हैं। इनकी मनोव्यथा सुनी जाय और ये जी खोल कर अपनी अन्तर्वेदना सुनावें तो ऐसा लगता है मानो भगवान् ने संसार का सारा दुख इन्हीं के मत्थे पटक दिया है, बेचारे रात दिन दुखी दशा पर खिन्न रहते हैं, रात-रात भर रोते रहते हैं, नींद नहीं आती। चिन्ता और वेदना में घुलते रहते हैं। कई बार तो ऐसा होता देखा गया है कि दुखी होकर वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। कई घर छोड़ कर चले जाते हैं, साधु बाबा जी बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद ऐसा करने से उनकी अन्तर्व्यथा दूर हो जायगी।

संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जिसे सब सुख हों, किसी बात का अभाव न हो, सारी परिस्थितियाँ मनोनुकूल ही हों, कोई कष्ट न हो, कभी असफलता न मिले, कोई जिसका विरोधी न हो, ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर ढूंढ़े न मिलेगा। जहाँ अनेक सुख साधन मनुष्य को भगवान ने दिये हैं वहाँ कुछ थोड़े अभाव रखे हैं। विवेकशील व्यक्ति जीवन में उपलब्ध सुख सुविधाओं का अधिक चिन्तन करते हैं और उन उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते हुए प्रसन्न रहते हैं और उस कृपा के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहते हैं। थोड़े से अभाव एवं कष्ट उन्हें वैसे ही कौतूहल वर्धक लगते है जैसे माता अपने सुन्दर बालक के माथे पर काजल की बूँद लगा कर “डिढौरा” बना देती है कि कहीं ‘नजर’ न लग जाय।

इसके विपरीत अनेकों लोग उपलब्ध अनेकों सुख साधनों को तुच्छ मानते हैं और जो थोड़े से कष्ट एवं अभाव हैं उन्हें ही पर्वत तुल्य मान कर अपने आपको भारी विपत्तिग्रस्त अनुभव करते हैं। ऐसे लोग निरन्तर असन्तुष्ट रहते हैं, अपने सभी सम्बन्धित लोगों पर दोषारोपण करते रहते हैं ईश्वर को गाली देते हैं कि उसने हमें अमुक अभाव क्यों दिया? भाग्य को कोसते हैं कि वह इतना दुर्भाग्यपूर्ण क्यों है? माता-पिता और अभिभावक को बुरा कहते हैं कि उन्होंने अमुक साधन नहीं जुटाये जिससे हम उन्नतिशील स्थिति में होते? मित्रों और अफसरों को कोसते हैं कि उन्होंने उन्नति के लिए असाधारण सहयोग देकर बड़ा क्यों नहीं बना दिया? परिस्थिति,ग्रहदशा,दुनिया की बेवफाई, कलियुग का जमाना आदि जो भी उनकी समझ में आता है उसे बुरा भला कहते हैं और अपनी कठिनाईयों का दोष उनके मत्थे मढ़ते रहते हैं।

ऐसे लोगों की अधिकाँश मानसिक शक्ति इस रोने झींकने में ही चली जाती है। उनके बहुमूल्य समय का बहुत सा भाग इस कोसते रहने की प्रक्रिया में नष्ट हो जाता है। जिस समय का उपयोग वे अपनी कठिनाइयों को पार करने का उपाय सोचने और प्रयत्न करने में कर सकते थे उसको वे अपनी खिन्नता बनाये रखने और बढ़ाने में करते हैं। यह तरीका अपने समय और बल को नष्ट करने का ही है इसमें लाभ कुछ नहीं, उलटे उन कीमती शक्तियों के नष्ट होने की हानि ही है जिन्हें यदि बर्बाद होने से बचा लिया गया होता तो वे कठिनाईयों का एक बहुत बड़ा भाग आसानी से हल कर देतीं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 05 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 May 2026


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सोमवार, 4 मई 2026

👉 संकल्प बल कैसे बढ़ाएं? ( भाग 2)

मन की शक्ति को बढ़ाकर संकल्पों को जोरदार बनाने का दूसरा साधन है चित्त की एकाग्रता। हम ऊपर इस बात को दिखला चुकें हैं कि जिन विषयों की ओर वृत्ति लगाई जाती है, उन्हीं के रूप को मानसिक देह ग्रहण कर लेती है। पातंजलि योग सूत्र में “चित्तवृत्ति के निरोध” का यही अभिप्राय है कि बाह्य सृष्टि के मनोरम प्रतिबिंबों को जो प्रतिक्षण पलटते रहते हैं रोका जावे। मानसिक देह की निरन्तर चंचल वृत्तियों को रोकना, और नियत विशेष ध्येय के आकार में उनको संलग्न अथवा स्थित करना, एकाग्रता का प्रथम अंग है। यह एकाग्रता जड़रूप (मानसिक) देह से सम्बन्ध रखती है। उसको चित्तवृत्ति के साथ इतना संयुक्त करना चाहिये कि वह हमारे अन्तर में उतर जावें। यह एकाग्रता का दूसरा अंग होता है।

एकाग्रता के अभ्यास में अपने चित्त को केवल एक ही मूर्ति (रूप) पर टिकाया जाता है। अभ्यास करने वाले (ज्ञाता) का पूरा ध्यान एक ही लक्ष्य पर बिना हल चल के दृढ़ता पूर्वक स्थिर किया जाता है। बाह्य विषयों से आकर्षित होकर चित्त को निरन्तर इधर उधर जाने और भिन्न भिन्न बातों की चिन्ता करने से रोका जाता है। इसके लिये इच्छा शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है कि वह मन के अन्यत्र भटकते ही उसे पुनः खींच कर लक्ष्य पर ले आवे।

जब चित्त एक मूर्ति को स्थिरता से धारण कर लेता है, और ज्ञाता (अभ्यास) एकाग्र भाव से उसका ध्यान करता है, तो उसको ध्येय वस्तु का इतना ज्ञान हो जाता है जितना किसी अन्य वाचिक वर्णन (बातचीत) से नहीं हो सकता। किसी चित्र या प्राकृतिक दृश्य का जितना साँगोपाँग ज्ञान उसके प्रत्यक्ष दर्शक से होता है उतना उसके वर्णन को पढ़ने अथवा सुनने से नहीं हो सकता। पर यदि हम ऐसे वर्णन पर चित्त को एकाग्र कर लें तो उसका चित्र मानसिक देह पर बन जायेगा, और तब हमको जितना लाभ होगा उतना केवल शब्दों का पाठ करने से नहीं हो सकता। शब्द तो किसी विषय के संकेत मात्र हैं और उन पर मनन करने से उनकी मूर्ति हमारे मन में उत्पन्न हो सकती है। अगर हम उस पर बराबर ध्यान लगाते रहें तो वैसे वैसे ही उसका रूप हमारे मन में अधिकाधिक स्पष्ट होता जायेगा और हम उसके विषय में कही अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेंगे।

संकल्प शक्ति का विकास करने के जो अनेक मार्ग हैं उनमें सत्संग अथवा स्वाध्याय तथा चित्त को एकाग्र बनाना मुख्य है, क्योंकि उनको मनुष्य थोड़े प्रयत्न से कहीं भी प्राप्त कर सकता है। चित्त के एकाग्र होने से प्रत्येक प्रकार के जप और भजन का फल स्पष्ट देखने में आता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 May 2026


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रविवार, 3 मई 2026

👉 संकल्प बल कैसे बढ़ाएं? ( भाग 1)

सब तरह के आध्यात्मिक साधन का आधार मन के संयम और नियंत्रण पर रहता है। मन ही इन्द्रियों का स्वामी है और इन्द्रियाँ उस हालत में सुमार्ग पर चल सकती हैं जब कि मन कुमार्ग गामी न हो। यदि मन हमारे वश में नहीं है, उच्छृंखल है, तो उससे कोई भजन साधन ठीक तरह से हो सकना असंभव है और उस हालत में आत्मोन्नति की आशा ही व्यर्थ है।

मन को साधने में बहुत कुछ सहायता ऐसे पुरुषों की संगति से मिल सकती है जिन्होंने हमसे अधिक उन्नति करली है और जिनकी मानसिक शक्ति हम से बहुत अधिक बड़ी चढ़ी है। उच्च विचार वाला पुरुष हमें वास्तविक सहायता दे सकता है, क्योंकि जिस प्रकार के कम्प (गति) हम पैदा कर सकते हैं, उससे अधिक उच्च प्रकार के कम्प (गति) वह पुरुष पैदा करके जगत में प्रेरित करता रहता है। पृथ्वी पर पड़ा हुआ लोहे का टुकड़ा अपने आप गरम नहीं हो सकता, पर वह अग्नि के समीप रख दिया जाता है तो उष्ण कम्पों को ग्रहण करके गरम हो जाता है।

उसी प्रकार जब हम किसी शक्तिशाली विचार वाले महापुरुष के पास पहुँचते हैं, तो उसके मानसिक कम्पन हमारी देह पर प्रभाव डालते हैं और उसमें भी वैसे ही सजातीय कम्प उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण हमारा स्वर उनसे मिल जाता है अर्थात् उनके और हमारे मन में एक ही प्रकार के संकल्पों की प्रेरणा होती है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी मानसिक शक्ति बढ़ गई है और हममें ऐसे सूक्ष्म भावों को ग्रहण करने की सामर्थ्य आ गई है जो साधारण अवस्था में हमारी समझ आ सकने में बहुत कठिन थे। किन्तु जब हम फिर अकेले रह जाते हैं तो सूक्ष्म भाव ग्रहण करने की शक्ति फिर गायब हो जाती है।

श्रोतागण एक बड़े व्याख्यानदाता का भाषण सुनने जाते हैं, उसे भली प्रकार समझते जाते हैं और उसके सार को तत्काल बुद्धि में ग्रहण कर लेते हैं। वे प्रसन्न होकर लेक्चर से वापिस जाते हैं और दिल में समझते हैं कि आज हमें ज्ञान का उत्कृष्ट लाभ हुआ। पर अगले दिन जब वे किसी मित्र से उस व्याख्यान की चर्चा करते हैं, तो वे उन बातों को स्पष्ट रूप से नहीं बतला सकते, जो कल उनकी समझ में भली प्रकार आई थी। उस समय उनको यही कहना पड़ता है कि निःसंदेह कल मैंने व्याख्यान का आशय भली प्रकार समझ लिया था, पर आज वह पकड़ में नहीं आता।” इसका कारण यही होता है कि व्याख्यानदाता के भावों का अनुभव हमारे मानसिक शरीर और जीवात्मा को तो हो चुका है, पर वह अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि हम उसको बाह्य रूप में भी स्पष्ट प्रकट कर सकें। पहले दिन जब हम व्याख्यान के असली मर्म को भली प्रकार समझ रहे थे तब सामर्थ्यवान उपदेशक के शक्तिशाली कम्पों ने जिन रूपों की रचना की थी और उनको हमारी मानसिक देह ने ग्रहण कर लिया था। पर दूसरे दिन जब उन बातों को दोहराने में असमर्थता प्रतीत होती है तो इससे यह प्रकट होता है कि हमको उन विचारों को कई बार दोहराना चाहिये। वैसे भाषण कर्ता और श्रोता में एक ही शक्ति काम कर रही है, किन्तु एक ने उसे उन्नत बना लिया है और दूसरे में वह सोई हुई शिथिल पड़ी हुई है। ऐसी शिथिलता किसी बलवान व्यक्ति की शक्ति का संसर्ग होने से तेज हो सकती है।

अपने से अधिक उन्नत पुरुषों की संगति से दूसरा लाभ यह भी होता है कि उनके संसर्ग से हमारा कल्याण होता है और उनके उत्साह प्रदायक प्रभाव से हमारी वृद्धि होती है। इस रीति से सद्गुण शिष्यों को अपने समीप रख कर जो लाभ पहुँचा सकते हैं, वह केवल भाषण द्वारा उपदेश करने की अपेक्षा कहीं अधिक होता है। यदि इस प्रकार बिल्कुल निकट रहने का अवसर न मिल सके तो पुस्तकों द्वारा भी बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। पर पुस्तकें भी सावधानी के साथ चुनी जानी चाहिये। किसी वास्तविक महापुरुष के ग्रन्थ को पढ़ते समय हमें पूर्ण रीति से शिष्य की भावना रखनी उचित है। अर्थात् हमको अपना चित्त ऐसी निरपेक्ष अवस्था (साम्यावस्था) में रखना चाहिये कि जिससे हम उसके संकल्पों के कम्पों को, जहाँ तक संभव हो ग्रहण कर सकें। जब हम शब्दों को पढ़ चुकें तो हमें चाहिये कि उन पर ध्यान देवें, उनका चिन्तन करें, उनके असली आशय को अनुभव करें, उनके तमाम गुप्त अर्थों को उनमें से निकाल लेवें। हमारी चित्त वृत्ति एकाग्र होनी चाहिये ताकि शब्दों के अवसरण को छोड़कर हम ग्रंथकर्ता की चित्त वृत्ति का भाव ग्रहण कर सकें। इस प्रकार का पाठ करना अथवा पढ़ना शिक्षा का काम देता है और हमारी मानसिक उन्नति में बड़ा सहायक होता है। जिस पाठ में इतना प्रयत्न नहीं किया जायगा वह दिल को बहलाने वाला और हमारे ज्ञान भण्डार को कुछ बढ़ाने वाला ही हो सकता है, पर उससे हमारी उतनी मानसिक उन्नति और वृद्धि नहीं हो सकती जैसी कि पूर्ण चिन्तन और मनन द्वारा संभव होती है।

.......क्रमशः जारी
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👉 नैतिकता की खरी कसौटी (अन्तिम भाग)

जो अच्छा काम अच्छी भावना से किया गया हो, उसका परिणाम हमेशा शुभ ही हो, यह आवश्यक नहीं है। कार्य के परिणाम को उसकी नैतिकता की माप मानना ठीक नहीं। उदाहरणार्थ मुझे एक घड़ी प्राप्त करनी है अब मैं इस लक्ष्य को कई तरीकों से सिद्ध कर सकता हूँ-यथा खरीदकर माँगकर, चोरी करके। साधन के अनुसार मेरी लक्ष्य-प्राप्ति का स्वरूप भी नैतिक से अनैतिक बनते जाता है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी लक्ष्य का ही शुद्ध होना आवश्यक नहीं बल्कि साधन का भी शुद्ध होना आवश्यक है, कहते थे। उनके अनुसार शुद्ध साधन से ही शुद्ध लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। साम्यवादी नैतिक भूमिका और गाँधीवादी नैतिक भूमिका में यह बुनियादी फर्क है।

अच्छे काम का, अच्छी भावना से शुद्ध साधनों के द्वारा किया जाना, उसके नैतिक होने के लिये अपरिहार्य शर्तें हैं। साथ ही वह काम आत्म स्फूर्त भी हो। जो कार्य दबाव या भय से किया जावेगा, वह दबाव या भय के कारण दूर होते ही लुप्त हो जावेगा। यदि कोई विनोबा जी के साथ पद यात्रा में सुबह शाम होने वाली प्रार्थना में उनके नैतिक भय या नियम के दबाव से शामिल होकर प्रार्थना करता है तो उसका वह कार्य नैतिक नहीं कहा जा सकता। ऊपर से लादा हुआ कार्य नैतिक नहीं हो सकता है। यहाँ तक नैतिकता की मान्यता पर विषय गत दृष्टि से विचार किया गया। लेकिन यह प्रश्न तो रह ही जाता है कि हम कैसे जाने कि कौन काम शुभ है? कौन अशुभ है? कौन सत है और कौन असत कार्य है? इसके लिये सर्वमान्य एक मापदण्ड न हो सकने पर भी वैसे मापदण्ड का सर्वथा अभाव नहीं है। संसार से जितने नीतिशास्त्र के आचारवान विचारक संत महात्मा हो गए हैं एक स्वर से घोषित करते हैं कि आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्। सारे संसार के नीतिशास्त्र का सार संक्षेप है। रूसी ऋषि टॉलस्टाय कहते थे जो व्यक्ति जितना कम लेता है और जितना ज्यादा वापस देता है उसी अनुपात में वह उतना ही नैतिक है। महात्मा गाँधी की अहिंसा क्या है-सर्वभूतों से आत्मवत् प्रेम ही तो है।

आपको जीवन में आगे बढ़ने के लिए खुद को कैसे बदलना चाहिए ? अमृतवाणी https://youtu.be/RGc8RJNy0ZY?si=M4Sne1jaIPk6q6F0

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत् इस पाँच शब्दों के लघु वाक्य में समस्त नीतिशास्त्र का निचोड़ सम्मिलित है-यह सहसा विश्वास नहीं होता है। सत्य की सरलता ही उसे पहिचानने में कठिनाई उपस्थित करती है समस्त नैतिक सिद्धान्त क्या बताते हैं? यही न कि हमारे सारे व्यवहार दूसरों के प्रति इस प्रकार हों जिससे हम अपना सर्वतोमुखी विकास करते हुए दूसरों के उसी प्रकार के विकास में सर्व भावेन सहयोग कर सकें। इस प्रकार का व्यवहार नहीं हो सकता है जो ऊपर के पाँच शब्दों में प्रकट किया गया है। इसी वाक्य का अविकल अनुवाद सा करते हुए संत कन्फ्यूशियस ने कहा “जो व्यवहार तुम अपने प्रति नहीं पसन्द करते, वह दूसरों के प्रति न करो।” साक्षात् धर्म के लक्षण बताते हुए मनु ने कहा-स्वस्थ न प्रियमात्मनः धर्म का एक प्रबल लक्षण अपनी आत्मा को जो प्रिय लगे, वह करना है। अब कोई कह सकता है कि हमारी आत्मा को तो चोरी करना प्रिय है। जो उसका धर्म वही है परन्तु आपको चोरी करना प्रिय नहीं है क्योंकि जिसे जो काम प्रिय है, उसे यदि और लोग करें तो उसे खुश होना चाहिये। कोई चोर नहीं चाहेगा कि सब चोर हों क्योंकि वैसी हालत में उसका काम नहीं बनेगा। अतः हम जिस कार्य को अपने प्रति नहीं चाहते कि कोई करे उसका आचरण हम दूसरों के प्रति करें-एक सच्ची कसौटी है। हम नहीं चाहते कि कोई हमारे साथ झूठा व्यवहार करे अतः हमें चाहिए कि हम सबके साथ सत्य व्यवहार करें। हम नहीं चाहते कि कोई हमारा जी दुखाए, अतः हमें चाहिए कि हम अपने आचरणों से किसी को कष्ट न दे। हम अपनी जान की रक्षा करते हैं, हमें अपनी जान प्यारी है। इसी से यह अपरिहार्य व्यवहार निश्चित हो जाता है कि हम दूसरे की जान की रक्षा करें। सत्य, अहिंसा के सिद्धान्त का मूल यही विचार है। इसी प्रकार अस्तेय, अपरिग्रह आदि अन्य सार्वभौम नैतिक सिद्धान्तों के विषय में आप अपने अन्तःकरण से स्वयं जान सकते हैं।

उपर्युक्त नीति वाक्य के अनुसार अपने आचरण की जाँच करने के लिये जितनी सद्विवेक बुद्धि की जरूरत है उतनी प्रत्येक सामान्य व्यक्ति को प्रकृति से प्राप्त है। *हमारी समस्या नीति की अज्ञानता उतनी नहीं है जितना नीति का आचरण है। अर्जुन के समान हम सबकी स्थिति है- “जा नाभि धर्न्य न धमे प्रवृतिः जानन्यः धर्न्य न चम निवृत्तिः।” धर्माधर्म का ज्ञान इन सबको रहता है तदनुकूल आचरण के अभाव से सारी समस्या खड़ी होती है। यदि हम वसुधैव कुटुम्बकम, का आदर्श अपनाकर अपने व्यवहारिक जीवन में आत्मनः प्रतिकूलानिपरेषाँ न समाचरेत् का आचरण करें तो हम धर्म और नीति की रक्षा करते हुए सच्चे अर्थों में स्व, पर कल्याण कर सकते हैं।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 नैतिकता की खरी कसौटी (भाग 1)

पाप क्या है? पुण्य क्या है? सत् क्या है? असत् क्या है? उचित क्या है? अनुचित क्या है? शुभ क्या है? अशुभ क्या है? अच्छा क्या है? बुरा क्या है? मानव जाति ने जबसे विचार करना आरम्भ किया तब से ये प्रश्न उसके सामने हैं। ऐसा नहीं है कि इनके सार्वभौम उत्तर प्राप्त करने की कोशिश नहीं की गई। परन्तु प्रयत्न के बावजूद भी कोई ऐसा समाधान कारक उत्तर नहीं मिला है जिसे सब देश और सब काल में सबके लिए उपयुक्त कह सकें। यही कारण है कि परम पुरातन होते हुए भी ये प्रश्न नित्य नवीन बने हुए हैं।

नैतिकता की मान्यताओं को अधिकाँश विचारक देशकाल और पात्र सापेक्ष मानते हैं। इस कारण से एक ही कार्य एक समय, एक स्थान में एक व्यक्ति के लिये अच्छा सिद्ध होता है और वही कार्य दूसरे समय, दूसरे स्थान में दूसरे व्यक्ति के लिये अनैतिक बन जाता है जैसे-युद्ध के समय सामूहिक हत्या उचित मानी गई किन्तु अन्य परिस्थिति में हत्या पाप है, अपराध है। इस अनिश्चयात्मक स्वरूप के कारण ही लगता है नैतिक मान्यताएँ जनसाधारण को अनावश्यक, अनाकर्षक जँचती हैं। उन्हें लगता है कि अच्छा-बुरा का विचार करना समय की बरबादी और निरी मूर्खता है। आज भी संसार में ऐसे लोगों का अभाव नहीं है जो सुकरात को मूर्खराज की उपाधि से निःसंकोच विभूषित करते हैं।

ध्यान:- मन को शांत कैसे करें | Man Ko Shant Kaise Karen | Meditation, 

सामान्यजन प्रत्येक प्रश्न पर व्यापारी दृष्टि से विचार करते हैं। वे प्रत्येक कार्य को लाभ-हानि की तुला पर तोलते हैं। नैतिक मान्यताएँ इस तुला से हानिकारक जँचती है और इस स्वार्थी निष्कर्ष को नैतिक मान्यताओं के स्वरूप की अनिश्चयात्मकता का बल मिल जाता है। फिर क्या गिलोय और नीम चढ़ी। जनसामान्य में नैतिकता की ऐसी शोचनीय अवस्था होते हुए भी ऐसा कह सकना सम्भव नहीं है कि वे नैतिक मान्यताओं की पूर्ण उपेक्षा कर सकते हैं। वे जाने-अनजाने कहते ही रहते हैं कि अमुक ने अच्छा नहीं किया, अमुक अन्यायी है, पापी है, दुराचारी है इत्यादि। उनके ये कथन सिद्ध करते हैं कि कोई व्यक्ति भले ही अपने लिये नैतिक आचरण को अनावश्यक कहे पर जहाँ दूसरे के आचरण का प्रश्न आता है, उसको आवश्यक मानता है। जिस व्यक्ति से हमारा कोई सरोकार नहीं, हानि-लाभ की आशा नहीं उसके आचरण की भी हम आलोचना करते ही हैं, अच्छा-बुरा का निर्णय करते हैं। इससे स्पष्ट है कि नैतिकता की कसौटी हमारी हानि लाभ वाली तुला नहीं हो सकती। वह उससे सर्वथा पृथक है।

हम दूसरे व्यक्ति को उसके बाह्य आचरण से अच्छा या बुरा ठहराते हैं। हमारे पास इसके अतिरिक्त दूसरा साधन भी नहीं हैं। पर बाह्य आचार के आधार पर किया गया नैतिक निर्णय हमेशा ठीक ही होगा, ऐसा नहीं कह सकते। दो व्यक्तियों का बाहरी व्यवहार एकसार होते हुए भी एक नीति युक्त और दूसरा अनैतिक हो सकता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति ने दया से द्रवित होकर एक भिखारी को एक रुपया दिया और दूसरे ने उसे अपनी आँखों के सामने से हटाने के लिए एक रुपया दिया। कहने का मतलब यह है कि एक ने पसीज कर और दूसरे खीझकर रुपया दिया। जहाँ तक देने का संबंध है इस उदाहरण में दोनों ने दिये हैं, समान दिये हैं पर दान के पीछे जो भावना है उनमें जमीन-आसमान का अन्तर है। भावना के कारण एक का वही कार्य नैतिक है तो दूसरे का वही कार्य अनैतिक है। काम अच्छा हो इतना ही बस नहीं है बल्कि अच्छी भावना से भी किया गया होना चाहिए।

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📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 03 May 2026


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👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 2)

आत्म निरीक्षण के पथ पर चलते हुए मनुष्य को अपने जीवन एवं तत्सम्बन्धित विषयों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते रहना चाहिए और उनका सुधार करना चाहिए। ...