मानव जीवन में उपासना का बड़ा महत्व है। उपासना से सद्गुणों का विकास होता है और यावत् परमात्मा-दशा प्राप्त होती है। सद्गुणों के विकास का सबसे प्रधान साधन है-गुणी व्यक्तियों की आदर, भक्ति, पूजा, सेवा और गुणों की आराधना। आराधना और उपासना एक ही है।
उपासना का अर्थ है समीप बैठना, रहना और वह दो तरह से होता है (1) परमात्मा या सद्गुरु के पास बैठना और (2) आत्मा या आत्मीय गुणों के पास बैठना। वास्तव में हम इन दोनों तत्वों से बहुत दूर बैठे हुए हैं। परमात्मा को तो हम भूल से गये हैं, कभी दुःख-दर्द के समय ही उसका स्मरण आता है। यदि उसके नाम की माला भी फेरते हैं तो हमारा मन इधर उधर भटकता रहता है इसलिए हम परमात्मा के समीप नहीं पहुँच पाते। इसी प्रकार सद्गुरुओं के पास पहले तो हम अधिक समय बैठते ही नहीं हैं, और बैठते हैं तो भी मन घर और बाहर के कामों में लगा रहता है। उनकी वाणी को हम जीवन में स्थान नहीं देते, उनकी साधना से हम प्रेरणा ग्रहण नहीं करते। उनकी उपासना करते हैं, यह कह ही कैसे सकते हैं? आत्मा से भी हम बहुत दूर हैं। उसके दर्शन एवं अनुभव का प्रयत्न नहीं करते। शरीर में ही आत्म बुद्धि की हुई है। इसलिए आत्मा की उपासना हम नहीं कर रहे हैं यह निश्चित है।
उपासना और वासना में विरोध है अतः जहाँ तक तुम्हारा मन वासनाओं में भटकता है वहाँ तक सच्ची उपासना हो नहीं पाती बाहरी दिखावा तो ढोंग है उपासना नहीं।
‘उपासना’ में उपास्य के साथ तल्लीन हो जाने की परमावश्यकता है। जब तक वह स्थिति प्राप्त नहीं होती, साधक का चरम विकास नहीं हो सकता और उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय निग्रह की अत्यंत आवश्यकता है। जब तक इन्द्रिय के विषय भोगों में हमारा मन लगा रहता है तन जुड़ा रहता है-तब तक उपासना में तल्लीनता नहीं आ सकती। इसीलिये सभी धर्मों में इन्द्रिय दमन को महत्व दिया गया है। इन्द्रियों के बहिर्मुखी होने से हमारा मन चंचल रहता है। कभी सुन्दर पदार्थों या रूप के दर्शन में मन ललचाता है, कभी मधुर गायन को सुनने के लिए हम बड़े उत्सुक हो जाते हैं, कभी विविध रसों का आस्वादन करने को जिह्वा की लोलुपता नजर आती हैं। कभी सुगन्धित पदार्थों के प्रति आशक्ति देखी जाती है और कभी कोमल वस्तुओं के स्पर्श के लिए मन ललचा उठता है। इस तरह पाँचों इन्द्रियों के तेईस विषयों में मन भटकता रहता है। तब उपासना में तल्लीनता आयेगी कैसे?
जैन धर्म में संयम और तप को बहुत अधिक महत्व दिया गया है और इसका प्रधान कारण इन्द्रियों का निरोध करना ही है। संयम के सत्रह प्रकारों में पाँच इन्द्रियों का दमन सम्मिलित है ही, और तप का अर्थ भी है-इच्छाओं का निरोध। इसमें भी इन्द्रिय दमन की प्रधानता है। पाँचों इन्द्रियों में एक एक इन्द्रिय पर भी अंकुश न रहने से कितना दारुण दुख उठाना पड़ता है, इसके विषय में हाथी, हरिण, मच्छ आदि के दृष्टाँत दिये गये हैं और यह कहा गया है कि जब एक एक इन्द्रिय की विषयासक्ति का परिणाम दारुण है, तो जिनकी पाँचों इन्द्रियाँ छूट के साथ विषय-भोगों में लगी हुई हैं, उनका क्या हाल होगा ? यह तो प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सोचले। ‘इन्द्रिय-पराजय-शतक’ नामक प्राचीन प्राकृत ग्रन्थ में इसका बड़े सुन्दर रूप में विवेचन एवं ज्ञान उपदेश प्राप्त होता है। उसकी कुछ गाथाओं का हिन्दी पद्यानुवाद बुद्धू लाल श्रावक का बनाया हुआ नीचे दिया जा रहा है। इसके प्रारम्भ में ही कहा गया है कि वही शूरवीर और पंडित प्रशंसनीय है, जिसके चरित्र-धर्म को इन्द्रिय रूपी चोरों ने नहीं लूटा।
.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी
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