शुक्रवार, 5 जून 2026

👉 प्राणशक्ति का अपव्यय−मूर्खतापूर्ण अनाचरण

अपनी प्राण−शक्ति को यदि हम मितव्ययता पूर्वक खर्च करें तो जीवन को लम्बा और निरोग बनाने में उसका उपयोग कर सकते हैं और इस बचत से कुछ महत्वपूर्ण उपार्जन कर सकते हैं।

प्राण−शक्ति का सबसे अधिक अपव्यय अनावश्यक भोजन भार वहन करने से होता है। शरीर रक्षा के लिए सरल और स्वल्प भोजन की आवश्यकता होती है किन्तु हम दुष्पाच्य रूप में अधिक मात्रा में उसे ग्रहण करते हैं। सोचते हैं कीमती, स्वादिष्ट और अधिक भोजन करने से बलिष्ठ बनेंगे पर होता ठीक उलटा है। गरिष्ठ और प्रचुर भोजन जितनी शक्ति उत्पन्न करता है उससे कहीं अधिक अपने पचाने में खर्च करा लेता है अस्तु हम प्रतिदिन घाटे में रहते हैं और अन्ततः दिवालिया बनकर असमय में ही जीवनलीला समाप्त कर देते हैं।

प्राण कहाँ से आता है? उसके उपलब्धि स्रोत कहाँ हैं? यह तलाश करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि यह बहुमूल्य सम्पदा हमें शुद्ध वायु,निर्मल जल, सात्विक आहार, सूर्य संपर्क, गहरी नींद संतुष्ट मनःस्थिति से प्राप्त होती है। इन शक्ति स्रोतों की जितनी उपेक्षा करेंगे, उनसे जितने दूर रहेंगे उसने ही क्षीण होते चले जायेंगे? कमाई कम और खर्च अधिक करने पर कोई व्यवसाय ठीक तरह नहीं चलता फिर जीवन व्यवसाय ही कैसे चलेगा?

हर काम की सीमा है। मर्यादा में रहकर ही स्थिरता प्राप्त हो सकती है। सामर्थ्य से अधिक काम करना—साधनों से असंबद्ध महत्वाकाँक्षाऐं गढ़ना— भोगासिक्त में निमग्न होकर इन्द्रियों से अधिक काम लेना, दिनचर्या की नियमितता का ध्यान न रखना आदि बातें देखने सुनने में कोई बहुत बड़ी गलतियाँ नहीं मालूम पड़ती, पर वे छोटी होने पर भी चिनगारी की तरह हमारे हँसते−खेलते जीवनोद्यान में आग लगा देने के लिए पर्याप्त है। नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला अपनी प्रामाणिकता खो बैठता है और जनसहयोग से वञ्चित होता चला जाता है। व्यक्ति गत जीवनचर्या में मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला उस बहुमूल्य सम्पदा को खोता चला जाता है जिसके आधार पर सर्वतोमुखी प्रगति की सम्भावनाओं की पृष्ठभूमि बनती है।

विषपान से आत्म−हत्या करने वाले की रक्षा कौन कब तक करेगा? जिनने नशे पीकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारने पर कमर ली है उनकी प्राण−शक्ति कब तक स्थिर रहेगी। उत्तेजक मसाले भी एक प्रकार के विष ही हैं। वासनात्मक उत्तेजनाओं से मन को निरन्तर उद्विग्न करते रहने से हम अपनी ही सुसंचित जीवन सम्पदा का क्षरण करते चले जाते हैं और अपने ही पापों का फल भोगने के लिए रुग्णता, अशक्त ता एवं अकाल मृत्यु के नरक में जा मिलते हैं।

दार्शनिक कन्फ्यूशियस ठीक ही कहते थे—जो मितव्ययता के नियम को भंग करेगा वह अन्त में दुसह दुख सहता हुआ मरेगा। उनकी यह उक्ति प्राण−शक्ति के अपव्यय के सम्बन्ध में सोलहों आने सच उतरती है। हम अपनी ही जीवन सामर्थ्य से खिलवाड़ करते हैं— उसे अनावश्यक रूप से बर्बाद करते हैं ऐसी दशा में पग−पग पर ठोकर खाने और अशान्त असफल रहने का दुष्परिणाम भोगें तो आश्चर्य ही क्या है?

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👉 कुकर्मों की सर्वनाशी विभीषिका (भाग 1)

पाप का आकर्षक सर्प की तरह सुहावना लगता है मनुष्य उसे लाभ और सुख की आशा से पकड़ने का प्रयत्न करता है और आरम्भ में उस पकड़ की सफलता पर प्रसन्न भी होता है पर कुछ ही समय में यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फाँसी का फन्दा गले में बाँध लेने की तरह कितना दुखद और कितना विषम था।

चूहा सरलता पूर्वक रोटी का, मिठाई का टुकड़ा पाने के लालच से पिंजड़े के छेद में प्रवेश करता है, इस सफलता को वह अपनी बुद्धिमत्ता और सौभाग्य भरी उपलब्धि मानता है। मिठाई में दाँत लगाते समय तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना ही नहीं रहता। दूसरे चूहे जबकि एक-एक दाना बीनते जहाँ-जहाँ भटकते हैं तब उसने सहज ही इतनी सारी मिठाई खाने का अवसर प्राप्त कर लिया-क्या यह कम आनन्द की बात है? चूहा इस सौमान्य कल्पना में अधिक देर नहीं उड़ पाता। कठोर वास्तविकता कुछ ही क्षणों में सामने आ खड़ी होती है। खटका गिरता है और उस कैद में जकड़ जाता है जिसका अन्त मृत्यु के साथ ही सम्भव होता है। तब उसे समझ आती है कि यह आकर्षण भरा प्रलोभन बहुत महंगा पड़ा। अच्छा होता वह एक-एक दाना बीनकर—भारी दौड़धूप करके—पेट भरने को सन्तोषजनक मान लेता।

दुष्कर्मों और दुर्व्यसनों का स्वरूप और आकर्षण कुछ ऐसा ही है जिसे देखकर अदूरदर्शी उन पर बेतरह टूट पड़ने हैं। आगा-पीछा सोचने लायक विवेक भी हाथ में नहीं रहता। अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में—अधिक सुख पाने की लिप्सा उस सूक्ष्म चिंतन का  अपहरण कर लेती है जिससे यथार्थता क —प्रतिक्रिया को समझना सम्भव होता है। कुकर्मी के  आरम्भ में अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व होता है। अपने उस साहस की आप ही प्रशंसा करता है जिसे दूसरे लोग कर नहीं पाये और अधिक सुखोपभोग करने से वंचित रह गये। किन्तु उसकी यह मान्यता देर तक स्थिर नहीं रहती। कुछ ही समय में पता चलता है कि जो कमाया गया उससे हजारों गुना अधिक गँधा दिया गया।

कुकर्मी को अपना शील, सदाचार गँवाना पड़ता है। इसके साथ ही उसकी आन्तरिक गरिमा नष्ट हो जाती है। जिन आस्थाओं के कारण मनुष्य अपनी आँखों में सम्मानित होता है और दूसरों की आँखें उसे श्रेष्ठ सत् पुरुषों में गिनती है उन्हें गँवा देने के बाद आदमी एक ओछा और घिनौना प्राणी भर रह जाता है। इन्द्रिय सुख और अहंकार का पोषण एक सीमा तक कर लेने पर भी उसे निरन्तर यह लगता रहता है कि कोई ऐसी चीज हाथ से चली गई जो आत्मिक आनन्द एवं सन्तोष की दृष्टि से नितान्त आवश्यक थी। अपनी आँख में गिरने वाला व्यक्ति अन्य किसी की दृष्टि में सम्मानास्पद और प्रामाणिक नहीं हो सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 05 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 June 2026


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गुरुवार, 4 जून 2026

👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (अन्तिम भाग)

केवल पारमार्थिक विचार रखने अथवा परोपकार का म नहीं मन चिंतन करने से प्रयोजन पूर्ण न होगा। उसके लिये तदनुकूल सक्रियता की भी आवश्यकता है। भावनाओं को कार्य रूप में परिणित न करने से वे शीघ्र ही निष्क्रिय होकर मर जाती हैं और मनुष्य का मानसिक स्तर पुनः नीचे उतर जाता है। भावनाओं के परिपोषण के लिये उन्हें कार्यरूप में परिणित ही करते रहना चाहिये साथ ही केवल मनोरथ मात्र से ही तो किसी की सेवा सहायता नहीं हो सकती। जब तक किसी रोगी को दवा लाकर न दी जायेगी और यदि आवश्यक हो तो पिलाई न जायेगी, तब तक क्या तो उसकी सेवा होगी और क्या उसे सुख अथवा संतोष मिलेगा।

किसी असहाय को जब तक हाथ देकर नहीं उठाया जायेगा अथवा पदार्थ रूप में उसकी अपेक्षित सहायता न की जायेगी, तब तक उसका क्या दुःख दूर ही सकेगा। भूखे को रोटी, नंगे को वस्त्र, असहाय को हाथ, अज्ञानी को विद्या निरक्षर को अक्षर और रोगी को दवा देकर ही सुखी और शीतल बनाया जा सकता है। हमारी उदार, दयालु अथवा करुण भावनायें मात्र उसका न तो कोई हित कर सकती है और न हम ही परमार्थ पुण्य के अधिकारी बन सकते हैं।

मनुष्य की पूर्णता का चिन्ह यह हैं कि हममें कितनी उत्कृष्ट भावनाओं का विकास हुआ हैं और उन भावनाओं को यथार्थ रूप में परिणित करने की प्रेरणा कितनी प्रबल हुई है और हम परमार्थ कार्यों के लिये अपने कितने स्वार्थों और अधिकारों को त्याग करने में तत्पर होने लगे हैं और उस त्याग में हमें किस सीमा तक प्रसन्नता एवं सन्तोष मिलने लगा है। जिस दिन पूर्णरूप से हमारा स्वार्थ परमार्थ, हमारे अधिकार कर्तव्य और हमारा सुख दूसरों का सुख होकर सन्तुष्ट होने लगे, मानना चाहिये कि हम पूर्णता की परिधि में आ गये और अब उस भूमिका पर खड़े हुए हैं, जहाँ से देवत्व की ओर अभियान प्रारम्भ किया जा सकता है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 अकालमृत्यु और रुग्णता का कारण भ्रष्ट चिन्तन

स्वस्थ शरीर और दीर्घजीवन का सम्बन्ध साधारणतया खान-पान, व्यायाम आदि से माना जाता है, पर वस्तुतः समग्र आरोग्य मनुष्य की मनःस्थिति पर आधारित है।

जो मन से स्वस्थ है वह शरीर से भी स्वस्थ रह सकता है। यदि मनःक्षेत्र में उद्वेग और आवेश भरे हुए हैं तो रोग अकारण ही उत्पन्न होते रहेंगे और उनका निवारण पौष्टिक आहार एवं चिकित्सा उपचार से भी सम्भव न हो सकेगा।

यदि मन स्वस्थ हो तो बाह्य कारणों से उत्पन्न हुई रुग्णता अधिक समय न ठहर सकेगी उसका निराकरण जल्दी ही हो जायगा, शरीर संरचना में वे रोगों का समाधान स्वयमेव होता रहे।

मन में भरी दुर्भावनाएँ एवं दुष्प्रवृत्तियाँ मात्र मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहतीं उनकी प्रतिक्रिया ज्ञान तंतुओं के माध्यम हैं। इस अंतर्ग्रही विष को शरीर संरचना भी दूर नहीं कर सकती। सम्वेदनाएँ तो प्रकृति को ढालती हैं, मनोविकार धीरे-धीरे शरीर के समस्त अंगों को अपने दुष्प्रभाव से प्रभावित करते चले जाते हैं और उनका परिणाम शारीरिक रोगों के रूप में सामने आता है। निरोग और दीर्घजीवी बनने के लिए मनःक्षेत्र को पवित्र और प्रगतिशील बनाने की अपरिहार्य आवश्यकता है।

योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ और काकभुसुण्डि जी के सम्वाद का एक रोचक कथा प्रसंग आता है। वशिष्ठ जी पूछते हैं—हे काकभुसुण्डि आप इतने काल तक दीर्घजीवी और युवा किस कारण रहे हैं।

इसके उत्तर में काकभुसुण्डि कहते हैं—’मैं सदा आत्म-भाव में तन्मय रहता हूँ। मनोरथों में शक्ति नष्ट नहीं करता। चिन्ता और विषाद में नहीं फँसता। भविष्य के लिए आशंकाएँ नहीं करता। मन को आवेशग्रस्त नहीं होने देता। सबको समान मानता हूँ। मोह और प्रमाद से दूर रहता हूँ। बीती दुर्घटनाओं से दुखित नहीं रहता। दूसरों के सुख दुख में ही सुखी-दुखी होता हूँ। प्राणिमात्र के प्रति सुहृद सहायक रहता हूँ। विपत्ति में न धैर्य खोता हूँ और न सम्पत्ति से उन्मत्त बनता हूँ। यह मेरे दीर्घजीवन तथा अक्षययौवन का कारण है।

अकाल मृत्यु और रुग्णता का आधार शास्त्रकारों ने मानसिक असंतुलन को ही बताया है और कहा है जिसे दीर्घजीवन एवं समग्र आरोग्य अपेक्षित हो उन्हें अपने चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बनाने का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। 

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1974

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‼️ पुरुषार्थ का पुरस्कार सम्पन्नता है ‼️

“पुरुषार्थ का पुरस्कार सम्पन्नता है-यह ए ईश्वरीय नियम है। परमात्मा का बनाया हुआ, उसी का प्रेरित किया हुआ नियम है। यदि वह स्वयं ही इस विषय में स्वेच्छाचारिता बरतें और उसका अपवाद करने लगे तो उसके विश्व-विधान का क्या महत्व रह जाये। एक नियम का भावुकता विधान के सारे नियमों को महत्व और भावहीन बना देता है। सृष्टि-चक्र नियम की धुरी पर ही घूम रही है। यदि ईश्वर स्वयं ही उसको भंग कर दे तो उसकी यह सृष्टि, उसकी यह लीला और उसका यह निर्माण ही न नष्ट हो जाय। जो पुरुषार्थी है-परिश्रमी है, उद्योग है, उस पर अपने नियमानुसार परमात्मा कृपा करता ही है, वह ऐसा करने को विवश है। सम्पन्नता और सफलता जो पुरुषार्थ का पुरस्कार है, मनुष्य का अपरिहार्य अधिकार है, कोई शक्ति अथवा कोई भी सत्ता उसे इससे वंचित नहीं कर सकेगी।

कोई जेठ परिश्रम का सहज फल है-यह एक निर्विवाद सत्य है। तथापि उसको परमात्मा की कृपा मानना पुरुषार्थी का एक विनम्र आस्तिक भाव है, जो बढ़ा शुभ है। इसलिये कि अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को दे देने से मनुष्य अहंकार के दोष से सुरक्षित रहता है। यह सब मैंने किया, यह सब मेरे बल-बूते का चमत्कार है-ऐसा अहंभाव लाने अथवा रखने से एक तो उपलब्धियों की सात्विकता नष्ट होती है, दूसरे विवेक भ्रष्ट होता है। इस विषय में आत्म-विश्वास तो ठीक है, किन्तु आत्म-अहंकार ठीक नहीं है। क्योंकि जहाँ आत्म-विश्वास का सृजनात्मक भाव है, वहाँ आत्म-अहंकार ध्वंसक वृति है।

अपने पुरुषार्थ का श्रेय परमात्मा को सौंप देने से और भी अनेक लाभ होते हैं। जैसे उदारता, त्याग और निस्पृहता का भाव विकसित होता है। स्वार्थ, लोभ और लिप्सा से रक्षा होती है। निष्काम कर्मभाव का विकास होता है और सफलता, असफलता में समभाव रहने से कर्मों में अखण्डता बनी रहती है। इसीलिये लाखों में अपने सब कर्म उनके फलों सहित परमात्मा को समर्पित कर देने का निर्देश किया गया है। निश्चय ही यह आस्तिक भाव बड़ा शुभ तथा सात्विक है। तथापि यह कभी न भूलना चाहिये कि श्रेय और सफलता मनुष्य को अपने पुरुषार्थ के बल पर ही प्राप्त होती है। इससे परमात्मा की अनायास कृपा का कोई सम्बन्ध नहीं है।

सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्त करें | Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | https://youtu.be/VAuLh_IObak?si=lWEUN38jcBOJzX4E

बहुत बार लोगों को उत्तराधिकार में बहुत बड़ी सम्पत्ति मिल जाती है। इसे परमात्मा की अनायास कृपा कहा जा सकता है। बहुत बार लोग लाटरी आदि के आधार पर भी बिना किसी पुरुषार्थ के धनवान् बन जाते हैं और बहुत बार गुप्त धन मिल जाने से भी धनात्मक प्राप्त हो जाती है। स्थूलता यह परमात्मा की अनायास कृपा ही मालूम होती है। किन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो पता चलेगा कि उस धन के पीछे किसी न किसी का पुरुषार्थ छिपा रहता है। जो धन अनायास मिला होता है, वह उसके वर्तमान अधिकारी के पुरुषार्थ का न सही किसी न किसी विगत अधिकारी के पुरुषार्थ का फल तो होता ही है। बिना किसी के पुरुषार्थ अथवा परिश्रम के उस धन का आपसे आप अस्तित्व में आ जाना सम्भव हो ही नहीं सकता है। कोई भी धन, कोई भी सम्पत्ति और कोई भी साधन आत्मोत्कर्ष नहीं होते। उनके लिये किसी न किसी को उद्योग करना ही होता है।

सत्य बात तो यह है कि वह सम्पत्ति हो तो उसी की है, जिसने उसके लिये उद्योग किया होता है। अ*ब यह उसको चाहे दे जाये, दे दे अथवा किसी को पाने के लिये धरती में रख जाये। किन्तु पाने वाला उसका अधिकारी होने पर भी यथार्थ अधिकारी नहीं होता।* ऐसी आकस्मिक सम्पत्ति बहुधा लोगों के पास ठहरी नहीं। वह किसी न किसी बहाने से वह ही जाती है। इस प्रकार बहुत-सा धन पाकर यदि कोई आदमी उसका ढेर सामने रखकर बैठ जाये और बिना कुछ किये उसे व्यय करता रहे तो वह कितने दिन चल सकेगी? शीघ्र ही जल-तपकर समाप्त हो जायेगी।

इस प्रकार अकस्मात् मिली सम्पत्ति भी तभी उपयोगी होती है और तभी ठहरती है, जब मनुष्य अपना भी कुछ पुरुषार्थ करता चलता है और उस उपार्जन के अनुपात से व्यय करता है। इस प्रकार उसकी बनावटता की स्थिरता का आधार उसका अपना पुरुषार्थ ही होगा न कि वह आकस्मिक सम्पत्ति जो उसे उत्तराधिकार, लाटरी अथवा धरती आदि से अनायास मिल गई होती है। सफलता, श्रेय और सम्पन्नता का आधार मनुष्य का अपना पुरुषार्थ ही होता है। इस सत्य को कभी न भूलना चाहिये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 04 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 June 2026


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बुधवार, 3 जून 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (अंतिम भाग)

निर्बल मन वाला व्यक्ति स्वभावतः निराशावादी होता है। उसे पग-पग पर अनर्थ ही दिखाई देता हैं। साधारण सी बीमारी-जैसे सर्दी-जुकाम खाँसी या बुखार आ जाने पर बुरी तरह घबरा उठता है। सोचने लगता हैं कहीं सर्दी बढ़कर निमोनिया न बन जाये। कहीं ऐसा न हो कि खाँसी बुखार मिलकर हमें यक्ष्मा कर दें। जरा-सी चोट लग जाने पर उसे ऐसा लगता है मानो उसकी हड्डी टूट गई है। किसी ऐसी रंग में जरा-सी भूल हो जाने पर ऐसा घबरा जाता हैं। जैसे उसकी बरखास्तगी का फरमान आने वाला हो। व्यापार में जरा-सा घाटा आते ही उसे अपनी घर-मकान नीलाम होता दिखाई देता है। निराशा के दोष के कारण उसे अनर्थ के सिवाय वह विचार कदाचित ही आता है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी बलवती होती हैं यह जरा-सी बीमारी मेरा क्या बिगाड़ सकती है, मैं इसे उपचार, आहार-बिहार और नियम, संयम पर जड़मूल से नष्ट कर दूँगा।

नौकरी में भूल हो जाने पर वह यह नहीं सोच पाता कि धोखे से गलती हो गई, आगे के लिये सावधान रहूँगा। सारी स्थिति सुधार लूँगा। व्यापारिक घाटे के प्रसंग में वह इस प्रकार सोच सकने से बाधित रहता है-कि व्यापार में हानि लाभ तो चलता ही रहता हैं। आज यदि हानि हो गई तो आगे लाभ भी होगा। मैं परिश्रम, पुरुषार्थ, सावधानी और साख के बल पर सारी कमी पूरी कर लूँगा। इस प्रकार अपनी निराश भावना के कारण मनो-हीन व्यक्ति प्रकाश के स्थान पर अन्धकार ही देखा करता है।

मानसिक दौर्बल्य अथवा मनोहीनता मानव-जीवन के लिये भयानक अभिशाप है। अदम्य शारीरिक शक्ति और प्रचुर साधन होने पर भी मनोहीन व्यक्ति जीवन में असफल ही रह जाता हैं। जबकि मनोबली व्यक्ति सामान्य शारीरिक क्षमता और साधनों की कमी में भी अपने साहस, उत्साह और संलग्नता के बल पर क्षमता और साधनों की वृद्धि कर लेते हैं और संसार के सफल व्यक्तियों की पंक्ति में अपना स्थान बना लेते है।

यदि किन्हीं कारणों से कोई मानसिक दौर्बल्य का बन्दी बन गया है तो ऐसा नहीं कि उसका यह अभिशाप दूर नहीं हो सकता। अवश्य ही दूर हो सकता है। प्रयत्न द्वारा संसार का हर काम सम्भव हो जाता है। यदि कोई अपने में मनोबल की कमी पाता है तो उसे चाहिये कि वह धीरे-धीरे उन कामों में पड़ना आरम्भ करें, जिनसे उसे भय लगता है ओर अपनी सारी प्राप्त एवं प्रबुद्ध शक्ति को लगाकर पुरुषार्थ करें। असफल होने पर जरा भी निराश न हों और बार-बार प्रयत्न करते चलें। इस प्रकार धीरे-धीरे अभ्यास द्वारा उसका मनोबल बढ़ने लगेगा और एक दिन वह सुयोग्य बन जायेगा।

मीटर, रेल, और हवाई-जहाज चलाना सीखने वाले आरम्भ में डरते हैं किन्तु तब भी वे लगनपूर्वक उस काम में लगे ही रहते हैं। धीरे-धीरे उनका मनोबल बढ़ता जाता है और एक दिन वे इतने आत्म-विश्वासी हो जाते हैं कि बिना किसी शंका के दुरूह स्थानों पर भी अपना यान चलाते चले जाते हैं।

मनोबल मनुष्य का प्रधान बल है। इसकी वृद्धि किए बिना जीवन के क्या सामाजिक, क्या आर्थिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल सकी। अस्तु इस प्रधान बल को निरन्तर बढ़ाते ही रहना चाहिये।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 4)

मनुष्य के कर्तव्य क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर यह हैं कि जिन कामों, भावों तथा विचारों का प्रभाव दूसरों पर अवांछनीय हो, उनका त्याग और जिनका प्रभाव अनुकूल हो उनका ग्रहण। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। निषेध की अपेक्षा विधेयक उपाय अधिक समीचीन होते हैं। हम क्या न करें, जिससे किसी पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसी चिन्ता करते रहने की अपेक्षा यह अधिक सरल एवं सुखद है कि हम वह करें, जिसका प्रभाव दूसरों पर प्रतिकूल पड़े। यह काम सेवा, सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति परक ही हो सकते हैं।

मानव समाज पारस्परिकता के ही आधार पर बना, विकसित हुआ, बढ़ा और उसी के आधार पर ठहरा हुआ है। यदि हम सब एक दूसरे का सहयोग करना छोड़ दें तो जीवन, अन्न तथा वस्त्र जैसी साधारण समस्यायें भी हल न हो सकें जीवन की सारी सुविधा साधनों का निर्माण, जिनका कि हम सब उपभोग करते है, परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से सबके सहयोग से ही होता है। यदि हम एक दूसरे की सेवा करना छोड़ दें अथवा सहायता से विरत हो जायें तो हमारा समाज किसी भी विपत्ति आपत्ति का सामना करने में असमर्थ हो जाये। जो बीमार पड़ जाये वे बीमार ही पड़े रहे, जो आश्रित है वे निराश्रित होकर नष्ट हो जायें। जो धनपति हैं, वे सारा धन अपने पास ही रखें और सारा समाज दो दिन में ही असुविधा से त्रस्त हो उठे।

यदि विचारक अपने विचार, शक्तिवान अपनी शक्ति और शिल्पी अपना शिल्प अपने तक ही सीमित कर ले और दूसरों को उसका लाभ न दे तो शीघ्र ही पूरा समाज जड़वत् होकर एक स्थान पर रुक कर खड़ा हो जाये। तात्पर्य यह कि सारा मानव समाज ही क्यों संसार ही पारस्परिकता, सहायता, सहयोग और आदान प्रदान पर चल रहा है। जो स्वार्थी एवं संकीर्ण व्यक्ति इस पारस्परिकता का महत्व नहीं समझते अथवा इसके प्रतिपादन में प्रमाद करते हैं वे अविकसित एवं अपूर्ण मनुष्य ही हैं।

मनुष्यता की पूर्णता के लिये हमें संग्रह की नहीं त्याग की नीति अपनानी चाहिये। दूसरों से अपना स्वार्थ कैसे सधे यह सोचने के स्थान पर यह सोचना चाहिये कि ऐसा कुछ क्या किया जा सकता है, जिससे दूसरों का कुछ हित हो। जिस दिन हमारी अन्तःचेतना, सेवा, पुण्य, परोपकार, त्याग, उदारता, पारस्परिकता, सहायता, सहयोग, प्रेम, दया करुणा आदि की उदार भावनाओं से ओत प्रोत हो जाये, उस दिन समझना चाहिये कि हम मनुष्यता की पूर्णता की ओर अग्रसर हो आये हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

‼️ पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी ‼️

“लक्ष्मी उद्योगी पुरुष सिंहों को प्राप्त होती है”- वह केवल सूक्ति नहीं, बल्कि एक सिद्धान्त है। ऐसा सिद्धान्त जो युग-युग के अनुभव के बाद स्थिर किया गया है। उन्नति, प्रगति, सफलता और सम्पन्नता का एक मात्र आधार उद्योग अथवा पुरुषार्थ नहीं करेगा, परिश्रम में अपना पसीना नहीं बहाएगा तब तक किसी प्रकार के श्रेय का अधिकारी नहीं बन सका। लक्ष्मी श्रम और उद्योग की ही अनुगामिनी होती है।

कहा जाता है कि लक्ष्मी, श्रेय, सफलता और सम्पन्नता आदि उपलब्धियाँ भगवान् की कृपा से ही मिलती है। ऐसी मान्यता आस्तिकता की द्योतक है, अच्छी है। इस धारणा को बनाकर चलने में कोई हानि नहीं। किन्तु इसका रहस्य समझ लेना भी आवश्यक है।

संसार में चारों ओर जो सुख-सम्पन्नता के साधन और कारण बिखरे पड़े हैं, वह सब एकमात्र उस परमात्मा की ही कृपा है। सुख-दुःख और साधन सुविधा भी उसकी रचना के उसी प्रकार अंग है, जिस प्रकार मनुष्य स्वयं। किसी को मिलने वाली सम्पत्ति उसे तभी ही मिल सकती है, जब उसमें मूल स्वामी की सहमति तथा स्वीकृति सम्मिलित हो इस प्रकार निश्चय ही संसार के सुख-साधन और सम्पत्ति सम्पन्नता परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती है।

संसार क्या है और हम कैसा जीवन जिये? | Sansaar Kya Hai Aur Hum Kaisa Jeevan Jiyen | 

किन्तु, इस विश्वास के साथ वह न भूल जाना चाहिये कि उसकी कृपा यों ही अनायास मिल जाती है। अथवा वह मनमौजी परमात्मा योंही बैठा-बैठा जिसे चाहता है सम्पन्नता अथवा सफलता वितरित करता रहता है और किसी को असफलता एवं विपन्नता, ऐसा नहीं है। उसके विधान में एक नियम और न्यायशीलता रहती है। वह किसी पर न तो अनायास नर अकारण कृपा करता है। और न कोप। सफलता और सम्पन्नता के लिये उस न्यायपरायणता की कृपा अर्जित करनी पड़ती है। जो व्यक्ति नियमपूर्वक उसकी पूजा नियमपूर्वक उसकी कृपा अर्जित कर लेते हैं, संसार में सब कुछ पा जाते हैं और जो इस विषय में प्रभारी अथवा अन्ध-विश्वासी बने रहते हैं, उन्हें खाली हाथ ही रहना पड़ता है।

सम्पन्नता के सम्बन्ध में परमात्मा की कृपा पाने का केवल एक ही आधार है और वह है पुरुषार्थ अथवा परिश्रम। जो व्यक्ति प्रमाद त्याग कर उद्योग परिश्रम अथवा पुरुषार्थ करते हैं, उन पर परमात्मा कृपा करता ही नहीं उसे करनी पड़ती है। वह अपने इस नियम को इस विषय में भंग करने के लिये सक्षम नहीं है। यह अक्षमता उसकी असमानता नहीं, महिमा है। जो व्यक्ति अपने बनाये नियमों के प्रति जितना भीरु और भावुक रहता है, वह उतना ही दृढ़ और महान माना जाता है। उसी व्यक्ति के बनाये विधान का मान तथा पालन होता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 03 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 June 2026


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सोमवार, 1 जून 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 3)

यदि भय और आशंकाओं का सम्बन्ध मनुष्य की हृदय-स्थिति से न होता और उनका निवास प्रसंग अथवा परिस्थितियों में होता तो वह उस स्थिति में सभी मनुष्यों पर समान रूप से प्रतिक्रियाएँ होना चाहिये। जब ऐसा होता नहीं, किसी भयानक परिस्थिति को देखकर कहाँ कोई एक बुरी तरह डर कर घबरा कर भागने का रास्ता खोजने लगता है, वहाँ कोई दूसरा उसी परिस्थिति में अपने संतुलन ओर साहस के आधार पर वीरतापूर्वक उसका सामना करने के लिये उत्साहित हो उठता है। यह अन्तर परिस्थिति का नहीं केवल मनःस्थिति का होता है। जिसका मन निर्बल और कायर होगा, उसका घबरा जाना स्वाभाविक है। जिसका मनोबल बढ़ा-चढ़ा होगा, उसके मन में भय अथवा पलायन का भाव ही न आयेगा। वह तो ताल ठोक कर टक्कर लेने को उद्यत हो उठेगा।

मनुष्य की सारी बाह्य क्रियाओं की जड़ उसके मन में ही होती है। मनुष्य की शारीरिक क्रियाओं का संचालक मन ही होता है। मन स्वस्थ, बलवान, ओर संतुलित होगा, क्रियायें भी सुन्दर, सतेज ओर व्यवस्थित होंगी। मन निर्बल और अस्थिर होगा, क्रिया-कलाप भी सारहीन और अस्त-व्यस्त होगा।

कारण कोई भी रहे हों, किन्तु जिनके मन क्षीण, निर्बल ओर निस्तेज हो जाते हैं, उनका सारा जीवन भय, आशंकाओं, कट्टरता और संदेहों से भरा रहता है। मनोहीन मनुष्य हर बात में भयानक घटनाओं, सम्भावनाओं और परिणामों की कल्पना किया करते है। उन्हें सब ओर सब जगह अमंगल और अकल्याण ही दिखाई देता है। जिस प्रकार कायर और भीरु सिपाही को मोर्चे पर सिवाय मौत के और कुछ दिखाई नहीं देता, जबकि वहाँ पर विजय, यश और प्रतिष्ठा की भी सम्भावना होती है, उसी प्रकार निर्बल मन वाले को सब जगह असफलता और आशंका ही दीखती रहती है, जबकि सभी क्षेत्रों और कार्यों में दूसरे लोग सफल और कृतकृत्य होते रहते हैं।

निर्बल मन वालों की विचार-धारा प्रतिगामिनी हो जाती है। ऐसा मनुष्य यदि एक सफल और एक असफल आदमी को एक साथ देखता है तो भी वह असफल व्यक्ति की स्थिति से प्रभावित होता। वह सोचता है यदि में भी इस काम को करूँ तो असफल हो जाऊँगा। उसका विश्वास उस सफल व्यक्ति पर नहीं जाता ओर न अपने लिये उसे उदाहरण ही बना पाता है। कायर व्यक्ति जिस प्रकार मैदान छोड़कर भागने वालों को अपना आदर्श बनाता है, मोर्चे पर डटने वालों को नहीं, उसी प्रकार मनोहीन व्यक्ति भी असफल, अकर्मण्य और अग्राह्य उदाहरणों को अपना आदर्श बनाता है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 3)

मनुष्य जीवन एक अनुपम अवसर है। इसी बात का कि इस श्रेणियों में से जिस श्रेणी में चाहे अपना उत्थान अथवा पतन कर सकता है। किन्तु जीवन की सफलता एवं सार्थकता इसी बात में है कि मनुष्य अधिकाधिक उन्नति की ओर बढ़ता हुआ ईश्वरत्व प्राप्त कर ले। वह उन्नति करता हुआ मनुष्य से देवता और देवता से ईश्वर रूप होकर सदा सर्वदा के लिये जन्म मरण के चक्र से निवृत्त हो जाये। किसी कार्य की सार्थकता सफलता ही हैं और सफलता का अर्थ है उन्नति एवं विकास। मनुष्यता से देवत्व की ओर पहुँचना ही उसकी सार्थकता है। पतन की ओर प्रगति करना अग्रसर होना नहीं कहा जा सकता है और न मनुष्य से असुर बन जाना सार्थकता ही। सुन्दर से असुन्दर बनना नहीं, सुन्दर, सुन्दरतम बनना ही विकास है। अस्तु हमारी, आप सबके जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम सब श्रेष्ठता की ओर बढ़कर देवत्व की कक्षा में प्रवेश करें।

एक कक्षा से दूसरी कक्षा की ओर उछाल मारना ठीक नहीं। इस अभियान की क्रमिक प्रगति ही अधिक समुचित, सरल एवं विशद होगी। पहले हम मनुष्य से पूर्ण मनुष्य बनने के प्रयत्न में लगें और तब मनुष्यता की पूर्णता के बाद देवत्व की ओर बढ़ें।

मानना ही होगा, अभी हम मात्र मनुष्य ही हैं, पूर्ण मनुष्य नहीं। हमें अपने स्वार्थों एवं अधिकारों के प्रति काफी स्पृहा है। कभी कभी जब हमारी आसुरी वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं, तब उनके प्रभाव में अपना कर्तव्य भूल जाते हैं और दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण भी कर बैठते हैं। यह बात अवश्य है कि बाद में समाधान होने के पश्चाताप भी करते हैं और क्षमा भी माँगते हैं। अच्छा हो कि हमसे यह भूल कभी न हो। इसका एक सरल सा उपाय यह है कि हम अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने कर्तव्यों पर अधिक ध्यान दें। अपने कर्तव्यों तक सीमित रहने से स्वाभाविक है कि अधिकारों की जागरूकता कम हो जायेगी और इस प्रकार उनके प्रति हमारा ममत्व घटने लगेगा और निःस्वार्थ बुद्धि का विकास होने लगेगा। कर्तव्यों का अधिक भान ही तो स्वार्थ को प्रबुद्ध किया करता है। इस उपाय में अधिकारों के हनन होने का भय इसलिये नहीं है कि जब कोई नेक आदमी स्वयं अपने अधिकारों की स्पृहा न कर कर्तव्य करता रहता है, तब दूसरे लोग उसके अधिकार रक्षा को अपना कर्तव्य मान लेते हैं। कर्तव्यशील सत्पुरुष अपने अधिकारों से वंचित रह जाये यह सम्भव नहीं।

इस प्रकार स्वार्थ के प्रति ममत्व कम होते ही परमार्थ बुद्धि का विकास प्रारम्भ हो जायेगा और मनुष्य देवत्व की ओर चल पड़ेगा।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 01 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 June 2026


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रविवार, 31 मई 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 2)

जिन मनुष्यों के मन बलवान और सतेज होते हैं, वे कम समय में ही पर्याप्त विकास कर लेते हैं। जो काम हाथ में लेते हैं, उत्साह और अभिरुचि से करते है। इस गुण के कारण उनकी ग्रहणशीलता भी बड़ी-बड़ी रहती है। कम-कम से ज्ञान ओर गुणों को हृदयंगम करते चले जाते हैं। मनोबली लोगों का आत्म-विश्वास बड़ा प्रबल होता है। उनकी संसार का काम कठिन ओर दुस्सह मालूम ही नहीं होता। आत्म-विश्वास के कारण वे अपने को हर काम के योग्य समझा करते है। जो भी काम उन्हें सौंप दिया जाता है, उसे पूरा करके दिखलाते हैं।

आध्यात्मिक विकास तो मनोबल के अभाव के में असंभव है। आध्यात्मिक विकास के लिये वृत्तियों ओर इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना होता है। यदि मन बलवान ओर स्वरूप है तो उसकी सहायता से वृत्तियों और इन्द्रियों की वश में किया जा सकता है। यदि मन कमजोर और अस्वस्थ है तो मनुष्य की वृत्तियाँ शासन-हीन हो जायेंगी। वे अपनी सत्ता स्वतन्त्र कर लेंगी। तब किसी दशा में भी उन्हें वशवर्ती नहीं किया जा सकता।

आध्यात्मिक विकास के लिये अनेक तरह के नियम, संयम और व्रतों का निर्वाह करना पड़ता है। बहुत-सी साधनाओं में उतरना पड़ता हैं साधना ओर संयत का यह कार्यक्रम केवल शारीरिक-बल के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिये मनोबल की आवश्यकता होती है। जिसका मन शक्तिशाली और अनुकूल होता है, वह किसी भी विकार, वेग अथवा उद्वेग पर आसानी से नियंत्रण ला सकता है। जिसका शरीर शक्तिशाली हो पर मन निर्बल हो तो ऐसे आदमी की आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल रहती है। वह तो अपने आवेशों और विकारों को जरा देर भी नहीं रोक सकता। संसार के सारे शासन, अनुशासन, नियम और संयम मनोबल के आधार पर सफल बनाये जा सकते है, शारीरिक-बल के आधार पर नहीं। किसी भी क्षेत्र की सफलता के लिये मानसिक-बल की अनिवार्य आवश्यकता है। उसे जागृत और विकसित करते ही रहना चाहिये।

निर्बल मन वाले कोई बड़ा काम तो दूर सामान्यतम कामों में भी घबरा जाते है। कोई भी प्रसंग उपस्थित होते ही वे भय, आशंका ओर सन्देह के वशीभूत हो जाते हैं, फिर चाहे उसे उस प्रसंग में भय, आशंका अथवा सन्देह का कारण हो या न हो। वास्तविकता यह है कि भय का कारण प्रसंग अथवा परिस्थितियों में नहीं होता, उसकी जड़ मनुष्य के अपने निर्बल मन में ही होती हैं। हृदय से ही होता है। इनका हेतु वह मानसिक कमजोरी ही होती है, जो किन्हीं भूलों अथवा भ्रमों से पैदा हो जाती है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 2)

वह जो कुछ सोचता है, दूसरों के हित के लिये, जो कुछ करता है दूसरों के लाभ के लिये। उसका खाना-पीना सोना-जागना उठना बैठना, हँसना बोलना वहाँ तक कि श्वाँस एवं प्रश्वास की प्रक्रिया तक दूसरों के हित के लिये ही सक्रिय रहती है। उसका सारा व्यक्तिगत एवं अस्तित्व लोक रंजन में विलीन हो जाता है। वह सम्पूर्ण रूप से परमार्थ रूप होकर ईश्वर की श्रेणी में पहुँच जाता है। ईश्वर का जो कुछ है, वह सब संसार के कल्याण के लिये। उसका अपना कोई स्वार्थ हो ही क्या सकता है?

असुर वह कहा जाता है, जिसकी भावनायें स्वार्थी एवं संकीर्ण हों। अपने सुख दुःख के अतिरिक्त दूसरों के सुख दुःख से कोई सम्बन्ध न रखता हो। केवल अपनी बात ही सोचना, दूसरों के विषय में कोई विचार न रखना, दूसरों के अधिकारों की उपेक्षा कर अपने अधिकारों को चाहना। दूसरे की हानि लाभ से निरपेक्ष रहकर अपना हित देखते रहना, स्वार्थपूर्ति के लिये पथ एवं प्रयत्न की कोई मर्यादा न मानना। स्वार्थ के लिये ईर्ष्या, द्वेप और क्रोध आदि वृत्तियों पर संयम न रखना असुरता के लक्षण हैं। जब यह असुरता अपनी परिधि से निरंतर पिशाचता अथवा पामरता की परिधि में प्रवेश कर जाती है, तब वह आततायी, अत्याचारी और असहनीय बन जाता है। अकारण एवं अनावश्यक रूप में दूसरों को सताना, दुःखी करना, हानि पहुँचाना उसका सामान्य मनोरंजन हो जाता है।

दूसरों के सुख में दुःख और दुःख में सुख अनुभव करना उसका विशेष लक्षण होता है। अपना कोई स्वार्थ न होते हुए भी दूसरों की उन्नति एवं विकास में बाधा डालना और प्राणपण से यह प्रयत्न करना कि दूसरा एक कदम आगे न बढ़ जाये, कहीं यह शांति अथवा सुख की एक बूँद न पाले आदि उच्छृंखल, अनर्गल एवं अन्यायपूर्ण कार्य करते रहने वाले पिशाच अथवा राक्षसों की कोटि में आते हैं। झूठ, छल, धूर्तता, कपट, मक्कारी, चोरी, विश्वासघात, प्रवंचना, शोषण आदि पैशाचिक प्रवृत्तियाँ ही तो हैं। ऐसे अभागे मानव पिशाचों को असाध्य ही मानना चाहिये। इनकी अपावन छाया तक जिस जिस स्थान पर पड़ जाती है, उस उस स्थान पर नरक निर्माण हो जाता है।

यह कोटियाँ अथवा श्रेणियाँ-इनमें से मनुष्य जिस कोटि में चाहे प्रवेश कर सकता है। उस पर किसी प्रकार का बाह्य प्रतिबन्ध नहीं है। वह देवता, असुर, राक्षस कुछ भी बन सकता है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 31 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 May 2026


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शनिवार, 30 मई 2026

👉 मन को दुर्बल न बनने दें (भाग 1)

सिद्धि का आधार शक्ति माना गया हैं। संसार का कोई उद्योग, कोई भी पुरुषार्थ और कोई भी कार्य शक्ति के बिना नहीं किया जा सकता। कोई बड़ा ही नहीं एक साधारण और सामान्य काम में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। अशक्त मनुष्य संसार में कुछ भी नहीं कर सकता।

संसार में प्रधानतः दो शक्तियाँ काम करती हैं। एक शारीरिक-बल दूसरा मानसिक-बल आगे की अन्य शक्तियाँ-जैसे बौद्धिक-बल आध्यात्मिक अथवा आत्मिक-बल भी पूर्वोक्त दो बलों के आधार पर ही पाये ओर विकसित किये जाते हैं।

शारीरिक-बल और मानसिक-बल में भी मानसिक-बल की प्रधानता हैं। शारीरिक-बल का अपने-आपमें कोई अधिक महत्व नहीं है। मनोबल का सहयोग पाये बिना शारीरिक-बल निकम्मा बना रहता है। बहुत बार देखा जा सकता है कि शारीरिक-बल कम होने पर भी लोग मनोबल के आधार पर बहुत से काम कर जाते हैं। शरीर-बल प्रधान सैनिक जिनका मानसिक-बल निर्बल होता है। मनोबल प्रधान और इम्यून शारीरिक-बल वाले सैनिकों से परास्त हो जाते है। जंगल में शेर की तुलना में हाथी, गैंडे, सुअर आदि बहुत से जानवर शरीर-बल में बहुत अधिक होते हैं, किन्तु मनोबल की कमी के कारण शेर से डरते ओर उसका आतंक मानते रहते हैं। वास्तविक बल मनोबल ही होता है-शारीरिक-बल तो मात्र यांत्रिक बल ही होता हैं।

शरीर में क्षमता होते हुए भी जब मनुष्य का मन असहयोगी हो जाता है तो वह जरा देर भी काम नहीं कर सकता। मन में उत्साह ओर सहयोग होने पर यदि एक बार शरीर थका भी हो तो भी मनुष्य बहुत देर तक काम करता रहता है। शरीर की सारी क्रियायें मन की सहायता से ही सम्पादित होती है।

बौद्धिक-बल उत्पन्न करने के लिये भी मानसिक अभ्यास की आवश्यकता होती है। मनुष्य की बुद्धि का विकास अध्ययन, अनुभव और विषय में गहरे पैठने से होता है। जिसका मन निर्बल है, असहयोगी या उत्साह हीन है, वह न तो अध्ययन का परिश्रम कर सकता है, न सजग रहकर अनुभव संचय कर सकता है। और न उत्साहपूर्वक किसी विषय में गहरे पैठ सकता है। यदि वह यह सब करेगा भी तो मानसिक सहयोग के अभाव में कुछ लाभ नहीं उठा सकता।

न जाने कितने उत्साह अथवा अभिरुचि से रहित मन वाले लोग वर्षों पड़ते रहते हैं, नौकरी ओर व्यापार करते हैं, किन्तु प्रगति के नाम पर एक कदम भी आगे नहीं बड़ पाते पूरी सिद्धि तो उनके लिए असम्भव होती है। मन का असहयोग, विद्रोही, निरुत्साही, चंचल आदि होना उसकी निर्बलता के ही लक्षण होते हैं।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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👉 हम देवत्व की ओर बढ़ें असुरता की ओर नहीं (भाग 1)

किसी अवसर का समुचित लाभ उठा लेना ही उस अवसर की सार्थकता कही गई है। मानव जीवन भी एक अवसर ही नहीं एक अनुपम अवसर है। जो बुद्धिमान इस अवसर की महत्ता समझते हैं, वे इसका लाभ उठाने में कभी नहीं चूकते। जीवन का लाभ उठाने का अर्थ है, इसको सफल एवं सार्थक बना लेना। इसकी श्रेष्ठ रचना ही इसकी सार्थकता मानी गई है और सार्थकता का अभिप्राय है, इसकी चेतना को देवत्व की ओर उठाया जाये। मनुष्य से बढ़कर देवताओं की कक्षा में प्रवेश किया जाये।

मनुष्य जीवन मध्यम श्रेणी है। इसके दायें बायें दो और श्रेणियाँ हैं। देवता और असुर। मनुष्य की क्षमता में है कि वह चाहे तो अपनी गतिविधियों तथा विचार प्रवृत्तियों के आधार पर देवता बन जाये अथवा असुर रूप में पतित हो जाये।इन दोनों श्रेणियों के बीज मनुष्य के अन्दर विद्यमान् हैं। वह जितनी तत्परता से जिन बीजों का विकास कर लेगा उतने अनुपात में ही देवता अथवा असुर बन जायेगा। यद्यपि इन दोनों श्रेणियों की एक पराकाष्ठा भी है। वे हैं परमात्म रूप एवं पिशाचता। देवत्व जब बढ़कर अपनी परिधि पार कर जाता है तब ईश्वर रूप हो जाता है और असुरता उतरते उतरते पिशाचता के रूप में परिणत हो जाती है।

मनुष्यता की पहचान यह है कि वह अपने और दूसरों के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण रखता है। यद्यपि उसे अपने अधिकारों तथा स्वार्थों का ध्यान अवश्य रहता है तथापि दूसरों के अधिकारों का भी उल्लंघन नहीं करता उनके स्वार्थों का हनन नहीं करता। वह जो कुछ उसका है लेना चाहता है और जो कुछ दूसरों का है उसको देने का साहस रखता है। अपनी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हुए दूसरों की सुख सुविधाओं में व्याघात उत्पन्न नहीं करता।

देवता का लक्षण यह है कि वह अपने स्वार्थ तथा अधिकारों को द्वितीय स्थान पर तो रखते ही हैं बल्कि उनकी हानि करके भी दूसरों की सुख सुविधा बढ़ाने का प्रयत्न किया करते हैं। अपनी उन्नति रोक कर दूसरों को उन्नति पथ पर बढ़ाने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख समझकर परमार्थ में तत्पर रहते हैं। जब यह पुण्य प्रवृत्ति आगे बढ़कर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं रह जाता। उनके पास जो कुछ होता है, उसमें निस्पृह हो जाता है। उनकी सारी गतिविधियाँ और सारी चिन्ताएँ दूसरे की सेविका बन जाती हैं।

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✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 30 May 2026


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👉 प्राणशक्ति का अपव्यय−मूर्खतापूर्ण अनाचरण

अपनी प्राण−शक्ति को यदि हम मितव्ययता पूर्वक खर्च करें तो जीवन को लम्बा और निरोग बनाने में उसका उपयोग कर सकते हैं और इस बचत से कुछ महत्वपूर्ण...