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गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (अन्तिम भाग)

🌹 सद्विचारों का निर्माण सत् अध्ययन—सत्संग से

🔴 ज्ञान के अभाव में जनसाधारण भ्रांतिपूर्ण एवं निराधार बातों को उसी प्रकार समझ लेता है जिस प्रकार हिरन मरु-मरीचिका में जल का विश्वास कर लेता है और निरर्थक ही उसके पीछे दौड़-दौड़कर जान तक गंवा देता है। अज्ञान का परिणाम बड़ा ही अनर्थकारी होता है। अज्ञान के कारण ही समाज में अनेकों अन्ध-विश्वास फैल जाते हैं। स्वार्थी लोग किस अन्ध-परम्परा को चलाकर जनता में यह भय उत्पन्न कर देते हैं कि यदि वे उक्त परम्परा अथवा प्रथा को नहीं मानेंगे तो उन्हें पाप लगेगा जिसके फलस्वरूप उन्हें लोक में अनर्थ और परलोक में दुर्गति का भागी बनना पड़ेगा। अज्ञानी लोग ‘भय से प्रीति’ होने के सिद्धान्तानुसार उक्त प्रथा-परम्परा में विश्वास एवं आस्था करने लगते हैं और तब उसकी हानि को देखते हुए भी अज्ञान एवं आशंका के कारण उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते। मनुष्य आंखों देखी हानि अथवा संकट से उतना नहीं डरते जितना कि अनागत आशंका से। अज्ञानजन्य भ्रम जंजाल में फंसे मनुष्य दीन-दुःखी रहना स्वाभाविक ही है।

🔵 यही कारण है कि ऋषियों ने ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ का सन्देश देते हुए मनुष्यों का अज्ञान की यातना से निकलने के लिए ज्ञान-प्राप्ति का पुरुषार्थ करने के लिए कहा है। भारत का आध्यात्म-दर्शन ज्ञान-प्राप्ति के उपायों का प्रतिपादक है। अज्ञानी व्यक्ति को शास्त्रकारों ने अंधे की उपमा दी है। जिस प्रकार बाह्य-नेत्रों के नष्ट हो जाने से मनुष्य  भौतिक जगत का स्वरूप जानने में असमर्थ रहता है उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में बौद्धिक अथवा विचार-जगत की निर्भ्रान्त जानकारी नहीं हो पाती। बाह्य जगत के समान मनुष्य का एक आत्मिक जगत भी है, जो कि ज्ञान के अभाव में वैसे ही तमसाच्छन्न रहता है जैसे आंखों के अभाव में यह संसार।

🔴 सद्ज्ञान में ही वह सृजनात्मक शक्ति सन्निहित है, जो मनुष्य को प्रगति-पथ पर चढ़ने की प्रेरणा देती एवं सहायता करती है। इसलिए उन्नति के आकांक्षी व्यक्ति को सत्साहित्य के माध्यम एवं सत्संग के द्वारा सदा स्वयं को सद्विचारों से समृद्ध करते रहना चाहिए, ताकि वह उसकी सृजनात्मक शक्ति के सहारे उत्कर्ष की ऊंची मंजिलें पार करता चला जाए।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 29 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 48)

🌹 सद्विचारों का निर्माण सत् अध्ययन—सत्संग से

🔴 मस्तिष्क में हर समय सद्विचार ही छाये रहें इसका उपाय यही है कि नियमित रूप से नित्य सद्साहित्य का अध्ययन करते रहा जाय। वेद, पुराण, गीता, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि धार्मिक साहित्य के अतिरिक्त अच्छे और ऊंचे विचारों वाले साहित्यकारों की पुस्तकें सद्साहित्य की आवश्यकता पूरी कर सकती हैं। यह पुस्तकें स्वयं अपने आप खरीदी भी जा सकती हैं और सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत पुस्तकालयों से भी प्राप्त की जा सकती हैं आजकल न तो अच्छे और सस्ते साहित्य की कमी रह गई है और न पुस्तकालयों और वाचनालयों की कमी। आत्म-कल्याण के लिए इन आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठाना ही चाहिए।

🔵 समाज में फैली हुई अन्धता, मूढ़ता तथा कुरीतियों का कारण अज्ञान-अन्धकार होता है। अन्धकार में भ्रम होना स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार अंधेरे में वस्तुस्थिति का ठीक ज्ञान नहीं हो पाता— पास रखी हुई चीज का स्वरूप यथावत् दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार अज्ञान के दोष से स्थिति, विषय आदि का ठीक आभास नहीं होता। वस्तुस्थिति के ठीक ज्ञान के अभाव में कुछ का कुछ सूझते और होने लगता। विचार और उनसे प्रेरित कार्य के गलत हो जाने पर मनुष्य को विपत्ति संकट अथवा भ्रम में पड़कर अपनी हानि कर लेना स्वाभाविक ही है।

🔴 अन्धकार के समान अज्ञान में भी एक अनजान भय समाया रहता है। रात के अन्धकार में रास्ता चलने वालों को दूर के पेड़-पौधे, ठूंठ, स्तूप तथा मील के पत्थर तक चोर-डाकू, भूत-प्रेत आदि से दिखाई देने लगते हैं। अन्धकार में जब भी जो चीज दिखाई देगी वह शंकाजनक ही होगी, विश्वास अथवा उत्साहजनक नहीं। घर में रात के समय पेशाब, शौच आदि के लिए आने-जाने वाले अपने माता-पिता, बेटे-बेटियां तक अन्धकाराच्छन्न  होने के कारण चोर, डाकू या भूत-चुड़ैल जैसे भान होने लगते हैं और कई बार तो लोग उनकी पहचान न कर सकने के कारण टोक उठते हैं या भय से चीख मार बैठते हैं। यद्यपि उनके वे स्वजन पता चलने पर भूत-चुड़ैल अथवा चोर-डाकू नहीं निकले जो कि न पहचानने से पूर्व थे किन्तु अन्धकार के दोष से वे भय एवं शंका के विषय बने। भय का निवास वास्तव में न तो अन्धकार में होता है और न वस्तु में, उसका निवास होता है उस अज्ञान में जो अंधेरे के कारण वस्तुस्थिति का ज्ञान नहीं होने देता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 27 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 48)

 🌹 सद्विचारों का निर्माण सत् अध्ययन—सत्संग से

🔴 असद्विचारों के जाल में फंस जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। अज्ञान, अबोध अथवा असावधानी से ऐसा हो सकता है। यदि यह पता चले कि हम किसी प्रकार असद्विचारों के पाश में फंस गए हैं तो इसमें चिन्तित अथवा घबराने की कोई बात नहीं है। यह बात सही है कि असद्विचारों में फंस जाना बड़ी घातक घटना है। किन्तु ऐसी बात नहीं कि इसका कोई उपचार अथवा उपाय न हो सके। संसार में ऐसा कोई भी भवरोग नहीं है, जिसका निदान अथवा उपाय न हो। असद्विचार से मुक्त होने के भी अनेक उपाय हैं। पहला उपाय तो यही है कि उन कारणों का तुरन्त निवारण कर देना चाहिए जो कि असद्विचारों में फंसाते रहे हैं। यही कारण हैं—कुसंग, अनुचित साहित्य का अध्ययन, अवांछनीय वातावरण।

🔵 खराब मित्रों और संगी-साथियों के सम्पर्क में रहने से मनुष्य के विचार दूषित हो जाते हैं। अस्तु ऐसे अवांछनीय संग का तुरन्त त्याग कर देना चाहिए। इस त्याग में संपर्कजन्य संस्कार अथवा मोह का भाव आड़े आ सकता है। कुसंग त्याग में दुःख अथवा कठिनाई अनुभव हो सकती है। लेकिन नहीं, आत्म-कल्याण की रक्षा के लिए उस भ्रामक कष्ट को सहना ही होगा और मोह का वह अशिव बन्धन तोड़कर फेंक देना होगा। कुसंग त्याग के इस कर्तव्य में किन्हीं साधु पुरुषों के कुसंग की सहायता ली जा सकती है। बुरे और अविचारी मित्रों के स्थान पर अच्छे, भले और सदाचारी मित्र, सखा और सहचर खोजे और अपने साथ लिए जा सकते हैं अन्यथा अपनी आत्मा सबसे सच्ची और अच्छी मित्र है। एक मात्र उसी से सम्पर्क में चले जाना चाहिए।

🔴 असद्विचारों के जन्म और विस्तार का एक बड़ा कारण असद्साहित्य का पठन पाठन भी है। जासूसी, अपराध और अश्लील श्रृंगार से भरे सस्ते साहित्य को पढ़ने से भी विचार दूषित हो जाते हैं। गन्दी पुस्तकें पढ़ने से जो छाया मस्तिष्क पर पड़ती हैं, वह ऐसी रेखायें बना देती हैं जिनके द्वारा असद्विचारों का आवागमन होने लगता है। विचार विचारों को भी उत्तेजित करते हैं। एक विचार अपने समान ही दूसरे विचारों को उत्तेजित करता और बढ़ाता है। इसलिए गन्दा साहित्य पढ़ने वाले लोगों का अश्लील चिन्तन करने का व्यसन हो जाता है। 

🔵 बहुत से ऐसे विचार जो मनुष्य के जाने हुए नहीं होते यदि उनका परिचय न कराया जाय तो न तो उनकी याद आए और न उनके समान दूसरे विचारों का ही जन्म हो। गन्दे साहित्य में दूसरों द्वारा लिखे अवांछनीय विचारों से अनायास ही परिचित हो जाता है और मस्तिष्क में गन्दे विचारों की वृद्धि हो जाती है। अस्तु गन्दे विचारों से बचने के लिए अश्लील और असद्साहित्य का पठन-पाठन वर्जित रखना चाहिए। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 26 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 47)

🌹 सद्विचारों का निर्माण सत् अध्ययन—सत्संग से

🔴 कोई सद्विचार तभी तक सद्विचार हैं जब तक उसका आधार सदाशयता है। अन्यथा वह असद्विचारों के साथ ही गिना जायेगा। चूंकि वे मनुष्य के जीवन और हर प्रकार और हर कोटि के असद्विचारों विष की तरह की त्याज्य हैं। उन्हें त्याग देने में ही कुशल, क्षेम, कल्याण तथा मंगल है।

🔵 वे सारे विचार जिनके पीछे दूसरों और अपनी आत्मा का हित सान्निहित हो सद्विचार ही होते हैं। सेवा एक सद्विचार है। जीव मात्र की निःस्वार्थ सेवा करने से किसी को कोई प्रत्यक्ष लाभ तो होता दीखता नहीं। दीखता है उस व्रत की पूर्ति में किया जाने वाला त्याग और बलिदान। जब मनुष्य अपने स्वार्थ का त्याग कर सेवा करता है, तभी उसका कुछ हितसाधन कर सकता है। स्वार्थी और सांसारिक लोग सोच सकते हैं कि अमुक व्यक्ति में कितनी समझ है, जो अपनी हित-हानि करके अकारण ही दूसरों का हित साधन करता रहता है। निश्चय ही मोटी आंखों और छोटी बुद्धि से देखने पर किसी का सेवा-व्रत उसकी मूर्खता ही लगेगी। किन्तु यदि उस व्रती से पता लगाया जाय तो विदित होगा कि दूसरों की सेवा करने में वह जितना त्याग करता है, वह उस सुख—उस शान्ति की तुलना में एक तृण से भी अधिक नगण्य है, जो उसकी आत्मा अनुभव करती है।

🔴 एक छोटे से त्याग का सुख आत्मा के एक बन्धन को तोड़ देता है। देखने में हानिकर  लगने पर भी अपना वह हर विचार सद्विचार ही है जिसके पीछे परहित अथवा आत्महित का भाव अन्तर्हित हो। मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य लोक नहीं परलोक ही है। इसकी प्राप्ति एकमात्र सद्विचारों की साधना द्वारा ही हो सकती है। अस्तु आत्म-कल्याण और आत्म-शान्ति के चरम लक्ष्य की सिद्धि के लिए सद्विचारों की साधना करते ही रहना चाहिए। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 25 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 46)


🌹 सर्वश्रेष्ठ साधना

🔴 परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं। परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है। वह तो मनुष्य की दुर्बल वृत्ति ही है। मैं अपनी इस दुर्बल वृत्ति का त्याग कर दूंगा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा अपने मनोरथ सफल करूंगा। परावलम्बी व्यक्ति पराधीन रहता है और पराधीन व्यक्ति संसार में कभी भी सुख और शान्ति नहीं पा सकता, मैं साधना द्वारा अपनी आन्तरिक शक्तियों का उद्घाटन करूंगा, शारीरिक शक्ति का उपयोग और इस प्रकार स्वावलम्बी बनकर अपने लिए सुख-शान्ति की स्थिति स्वयं अर्जित करूंगा।’’ निश्चय ही इस प्रकार के अनुकूल विचारों की साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।

🔵 सुख शान्ति का अपना कोई अस्तित्व नहीं। यह मनुष्य के विचारों की ही एक स्थिति होती है। यदि अपने अन्तःकरण में उल्लास, उत्साह, प्रसन्नता एवं आनन्द अनुभव करने की वृत्ति जगा ली जाय और दुख, कष्ट और अभाव की अनुभूति की हठात् उपेक्षा दूर की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य सुख-शान्ति के लिए लालायित बना रहे। मैं आनन्द रूप परमात्मा का अंश हूं, मेरा सच्चा स्वरूप आनन्दमय ही है, मेरी आत्मा में आनन्द के कोष भरे हैं, मुझे संसार की किसी वस्तु का आनन्द अपेक्षित नहीं है। जो आनन्दरूप, आनन्दमय, और आनन्द का उद्गम आत्मा है, उससे दुःख, शोक अथवा ताप संताप का क्या सम्बन्ध? किन्तु यह सम्भव तभी है, जब तदनुरूप विचारों की साधना में निरत रहा जाय, उनकी सृजनात्मक शक्ति को सही दिशा में नियोजित रखा जाय। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 45)

🌹 सर्वश्रेष्ठ साधना

🔴 प्राचीन भारतीयों की आयु औसतन सौ वर्ष कही होती थी। जो व्यक्ति संयोगवश सामान्य जीवन में सौ वर्ष से कम जीता था, उसे अल्प आयु का दोषी माना जाता था, उसकी मृत्यु को अकाल मृत्यु कहा जाता था। इस शतायुष्य का रहस्य जहां उनका सात्विक तथा सौम्य रहन-सहन, आचार-विचार और आहार-विहार होता था, वहां सबसे बड़ा रहस्य उनकी तत्सम्बन्धी विचार साधना रहा है। वे वेदों में दिये— ‘प्रव्रवाम शरदः शतम्। अदीनः स्याम शरद शतम्।’ जैसे अनेकों मन्त्रों का जाप किया करते थे। यह मन्त्र जाप आयु सम्बन्धी विचार साधना के सिवाय और क्या होता था।

🔵 गायत्री मन्त्र की साधना का भी यही रहस्य है। इस मन्त्र का जाप करने वालों को बहुधा ही तेजस्वी समृद्धिवान् तथा ज्ञानवान् क्यों देखा जाता है? इसीलिए कि इस मन्त्र के माध्यम से सविता देव की उपासना के साथ, सुख समृद्धि तथा ज्ञान परक विचारों की साधना की जाती है। मनुष्य जीवन में जो कुछ पाता या खोता है, उसका हेतु मान भले ही किन्हीं और कारणों को लिया जाये, किन्तु उसका वास्तविक कारण मनुष्य के अपने विचार ही होते हैं, जिन्हें धारण कर वह जान अथवा अनजान दशा में प्रत्यक्ष से लेकर गुप्त मन तक चिन्तन तथा मनन करता है। 

🔴 विचार साधना मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है। इसके समान सरल तथा सद्यः फलदायनी साधना दूसरी नहीं है। मनुष्य जो कुछ पाना चाहता है, उसके अनुरूप विचार धारण कर उनकी साधना करते रहने से वह अपने मन्तव्य में निश्चय ही सफल हो जाता। यदि किसी में स्वावलम्बन की कमी है और वह स्वावलम्बी बनकर आत्मनिर्भरता की सुखद स्थिति पाना चाहता है तो उसे चाहिए कि वह तदनुरूप विचारों की साधना करने के लिए इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, ‘‘मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है। मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 23 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 44)

🌹 सर्वश्रेष्ठ साधना

🔴 वास्तविक सुख शान्ति पाने के लिए विचारों की साधना करनी होगी। सामान्य लोगों की अपेक्षा दार्शनिक, विचारक, विद्वान्, सन्त और कलाकार लोग अधिक निर्धन और अभावग्रस्त होते हैं तथापि उनकी अपेक्षा कहीं अधिक सन्तुष्ट, सुखी और शान्त देखे जाते हैं। इसका एक मात्र कारण यही है कि सामान्य जन सुख-शान्ति के लिए अधिकारी होते  थे। सुख-शान्ति के अन्य निषेध उपायों का न करते हुए भारतीय ऋषि-मुनि अपने समाज को धर्म का अवलम्बन लेने के लिए विशेष निर्देशन किया करते थे। जनता की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने जिन वेदों, पुराणों, शास्त्रों उपनिषदों आदिक धर्म-ग्रन्थों का प्रणयन किया है, उनमें मन्त्रों, तर्कों, सूत्रों व सूक्तियों द्वारा विचार साधना का ही पथ प्रशस्त किया है।

🔵 मन्त्रों का निरन्तर जाप करने से साधक के पुराने कुसंस्कार नष्ट होते और उनका स्थान नये कल्याणकारी संस्कार लेने लगते हैं। संस्कारों के आधार पर अन्तःकरण का निर्माण होता है। अन्तःकरण के उच्च स्थिति में आते ही सुख-शान्ति के सारे कोष खुल जाते हैं। जीवन में जिनका प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। मन्त्र वास्तव में अन्तःकरण को उच्च स्थिति में लाने के गुप्त मनोवैज्ञानिक प्रयोग हैं। जैसा कि पूर्व प्रकरण में कहा जा चुका है कि न तो सुख शान्ति का निवास किसी वस्तु अथवा व्यक्ति में है और न स्वयं ही उनकी कोई स्थिति है। वह वास्तव में मनुष्य के अपने विचारों की ही एक स्थिति है। सुख-दुःख, उन्नति-अवनति का आधार मनुष्य की शुभ अथवा अशुभ मनःस्थिति ही है। जिसकी रचना तदनुरूप विचार साधना से ही होती है। 

🔴 शुभ और दृढ़ विचार मन में धारण करने से, उनका चिंतन और मनन करते रहने से मनोदशा में सात्विक भाव की वृद्धि होती है। मनुष्य का आचरण उदात्त तथा उन्नत होता है। मानसिक शक्ति का विकास होता है, गुणों की प्राप्ति होती है। जिसका मन दृढ़ और बलिष्ठ है, जिसमें गुणों का भण्डार भरा है, उसको सुख-शान्ति के अधिकार से संसार में कौन वंचित कर सकता है। भारतीय मंत्रों का अभिमत दाता होने का रहस्य यही है कि बार-बार जपने से उनमें निवास करने वाला दिव्य विचारों का सार मनुष्य अन्तःकरण में भर जाता है, जो बीज की तरह वृद्धि पाकर मनोवांछित फल उत्पन्न कर देते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 22 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 43)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 इस प्रकार के उत्साही तथा सदाशयता पूर्ण चिंतन करते रहने से एक दिन आपका अवचेतन प्रबुद्ध हो उठेगा, आपकी सोई शक्तियां जाग उठेंगी, आप के गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार हो जायेगा और आप परमार्थ पथ पर उन्नति के मार्ग पर अनायास ही चल पड़ेंगे। और तब न आपको चिन्ता, न निराश और न असफलता का भय रहेगा न लोक परलोक की कोई शंका। उसी प्रकार शुद्ध-बुद्ध तथा पवित्र बन जायेंगे जिस प्रकार के आपके विचार होंगे और जिन के चिन्तन को आप प्रमुखता दिये होंगे।

🔵 सभी का प्रयत्न रहता है कि उनका जीवन सुखी और समृद्ध बने। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोग पुरुषार्थ करते, धन-सम्पत्ति कमाते, परिवार बसाते और आध्यात्मिक साधना करते हैं। किन्तु क्या पुरुषार्थ करने, धन दौलत कमाने, परिवार बसाने और धर्म-कर्म करने मात्र से लोग सुख-शान्ति के अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। सम्भव है इस प्रकार प्रयत्न करने से कई लोग सुख शान्ति की उपलब्धि कर लेते हों, किन्तु बहुतायत में तो यही दीखता है कि धन-सम्पत्ति और परिवार परिजन के होते हुए भी लोग दुःखी और त्रस्त दीखते हैं। धर्म-कर्म करते हुए भी असन्तुष्ट और अशान्त हैं। 

🔴 सुख-शान्ति की प्राप्ति के लिए धन-दौलत अथवा परिवार परिजन की उतनी आवश्यकता नहीं है। जितनी आवश्यकता सद्विचारों की होती है। वास्तविक सुख-शान्ति पाने के लिए विचार साधना की ओर उन्मुख होना होगा। सुख-शान्ति न तो संसार की किसी वस्तु में है और न व्यक्ति में। उसका निवास मनुष्य के अन्तःकरण में है। जोकि विचार रूप से उसमें स्थित रहता है। सुख-शान्ति और कुछ नहीं, वस्तुतः मनुष्य के अपने विचारों की एक स्थिति है। जो व्यक्ति साधना द्वारा विचारों को उस स्थिति में रख सकता है, वही वास्तविक सुख-शान्ति का अधिकारी बन सकता है। अन्यथा, विचार साधना से रहित धन-दौलत से शिर मारते और मेरा-तेरा, इसका-उसका करते हुए एक झूठे सुख, मिथ्या शान्ति के मायाजाल में लोग यों ही भटकते हुए जीवन बिता रहे हैं और आगे भी बिताते रहेंगे। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 20 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 42)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 विचारों की व्यक्ति निर्माण में बड़ी शक्ति होती है। विचारों का प्रभाव कभी व्यर्थ नहीं जाता। विचार परिवर्तन के बल पर असाध्य रोगियों को स्वस्थ तथा मरणान्तक व्यक्तियों को नया जीवन दिया जा सकता है। यदि आपके विचार अपने प्रति ओछे, तुच्छ तथा अवज्ञा पूर्ण हैं तो उन्हें तुरन्त ही बदल दो और उनके स्थान पर ऊंचे उदात्त यथार्थ विचारों का सृजन कर लीजिए। वह विचार-कृषि आपको चिन्ता, निराशा अथवा पराधीनता के अन्धकार से भरे जीवन को हरा-भरा बना देगी। थोड़ा सा अभ्यास करने से यह विचार परिवर्तन सहज में ही लाया जा सकता है। इस प्रकार आत्म-चिंतन करिये और देखिये कि कुछ ही दिन में आप में क्रान्तिकारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगेगा।

🔵 विचार कीजिए—‘‘मैं सच्चिदानन्द परमात्मा का अंश हूं। मेरा उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध है। मैं उससे कभी दूर नहीं होता और न वह मुझसे ही दूर रहता है। मैं शुद्ध-बुद्ध और पवित्र आत्मा हूं। मेरे कर्तव्य भी पवित्र तथा कल्याणकारी हैं उन्हें मैं अपने बल पर आत्म-निर्भर रह कर पूरा करूंगा। मुझे किसी दूसरे का सहारा नहीं चाहिए, मैं आत्म-निर्भर, आत्मविश्वासी और प्रबल माना जाता हूं।

🔴 असद् तथा अनुचित विचार अथवा कार्यों से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है और न किसी रोग-दोष से ही मैं आक्रान्त हूं। संसार की सारी विषमतायें क्षणिक हैं जो मनुष्य की दृढ़ता देखने के लिए आती हैं। उनसे विचलित होना कायरता है। धैर्य हमारा धन और साहस हमारा सम्बल है। इन दो के बल पर बढ़ता हुआ मैं बहुत से ऐसे कार्य कर सकता हूं जिससे लोक-मंगल का प्रयोजन बन सके। आदि आदि।’’ 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 19 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 41)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 विचार-धारा में जीवन बदल देने की कितनी शक्ति होती है, इसका प्रमाण हम महर्षि बाल्मीकि के जीवन में पा सकते हैं। महर्षि बाल्मीकि अपने प्रारम्भिक जीवन में रत्नाकर डाकू के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका काम राहगीरों को मारना, लूटना और उससे प्राप्त धन से परिवार का पोषण करना था। एक बार देवर्षि नारद को उन्होंने पकड़ लिया। नारद ने रत्नाकर से कहा कि तुम यह पाप क्यों करते हो? चूंकि वे उच्च एवं निर्विकार विचारधारा वाले थे इसलिए रत्नाकर डाकू पर उनका प्रभाव पड़ा, अन्यथा भय के कारण किसी भी वंचित व्यक्ति ने उनके सामने कभी मुख तक नहीं खोला था। उसका काम तो पकड़ना, मार डालना और पैसे छीन लेना था, किसी के प्रश्नोत्तर से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। किन्तु उसने नारद का प्रश्न सुना और उत्तर दिया—‘‘अपने परिवार का पोषण करने के लिए।’’

🔵 नारद ने पुनः पूछा कि ‘‘जिनके लिए तुम इतना पाप कमा रहे हो, क्या वे लोग तुम्हारे पाप में भागीदार बनेंगे।’’ रत्नाकर की विचारधारा आन्दोलित हो उठी, और वह नारद को एक वृक्ष से बांधकर घर गया और परिजनों से नारद का जिक्र किया और उनके प्रश्न  का उत्तर पूछा। सबने एक स्वर में निषेध करते हुए कह दिया कि हम सब तो तुम्हारे आश्रित हैं। हमारा पालन तुम्हारा कर्तव्य है, तुम पाप करते हो तो इसमें हम लोगों को क्या मतलब? अपने पाप के भागी तुम खुद होंगे। 

🔴 परिजनों का उत्तर सुनकर रत्नाकर की आंखें खुल गईं। उसकी विचार-धारा बदल गई और नारद के पास आकर दीक्षा ली और तप करने लगा। आगे चलकर वही रत्नाकर डाकू महर्षि बाल्मीकि बने और रामायण महाकाव्य के प्रथम रचयिता। विचारों की शक्ति इतनी प्रबल होती है कि वह देवता को राक्षस और राक्षस को देवता बना सकती है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 18 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 40)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 कोई मनुष्य कितना ही अच्छा तथा भला क्यों न हो यदि हमारे विचार उसके प्रति दूषित हैं, विरोधी अथवा शत्रुता पूर्ण हैं तो वह जल्दी ही हमारा विरोधी बन जायेगा। विचारों की प्रतिक्रिया विचारों पर होना स्वाभाविक है। इसको किसी प्रकार भी वर्जित नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं यदि हमारे विचार स्वयं अपने प्रति ओछे तथा हीन हो जायें, हम अपने को अभागा एवं अक्षम चिन्तन करने लगें तो कुछ ही समय में हमारे सारे गुण नष्ट हो जायेंगे और हम वास्तव में दीन-हीन और मलीन बन जायेंगे हमारा व्यक्तित्व प्रभावहीन हो जायेगा जो समाज में व्यक्त हुए बिना बच नहीं सकता।

🔵 जो आदमी अपने प्रति उच्च तथा उदात्त विचार रखता है, अपने व्यक्तित्व का मूल्य कम नहीं आंकता, उसका मानसिक विकास सहज ही हो जाता है। उसका आत्मविश्वास आत्म-निर्भरता और आत्म-गौरव जाग उठता है। इसी गुण के कारण बहुत से लोग जो बचपन से लेकर यौवन तक दब्बू रहते हैं, आगे चलकर बड़े प्रभावशाली बन जाते हैं। जिस दिन से आप किसी दब्बू, डरपोक तथा साहसहीन व्यक्ति को उठकर खड़े होते और आगे बढ़ते देखें, समझ लीजिए कि उस दिन से उसकी विचारधारा बदल गई और अब उसकी प्रगति कोई रोक नहीं सकता।

🔴 विचारों के अनुसार ही मनुष्य का जीवन बनता-बिगड़ता रहता है। बहुत बार देखा जाता है कि अनेक लोग बहुत समय तक लोक प्रिय रहने के बाद बहिष्कृत हो जाया करते हैं पहले तो उन्नति करते रहते हैं, फिर बाद में उनका पतन हो जाता है। इसका मुख्य कारण यही होता है कि जिस समय व्यक्ति की विचार-धरा शुद्ध, स्वच्छ तथा जनोपयोगी बनी रहती है और उसके कार्यों की प्रेरणा स्रोत बनी रहती है, वह लोकप्रिय बना रहता है। किन्तु जब उसकी विचार-धारा स्वार्थ, कपट अथवा छल के भावों से दूषित हो जाती है तो उसका पतन हो जाता है।

🔵 अच्छा माल देखकर और उचित मूल्य लेकर जो व्यवसायी अपनी नीति, ईमानदारी और सहयोग को दृढ़ रखते हैं, वे शीघ्र ही जनता का विश्वास जीत लेते हैं, और उन्नति करते जाते हैं। पर ज्यों ही उसकी विचार धारा में गैर-ईमानदारी, शोषण और अनुचित लाभ के दोषों का समावेश हुआ नहीं कि उसका व्यापार ठप्प होने लगता है। इसी अच्छी बुरी विचार-धारा के आधार पर न जाने कितनी फर्मे और कम्पनियां नित्य ही उठती गिरती रहती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 39)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 अन्धविश्वासियों के विचार में भूत प्रेतों का अस्तित्व होता है और उसी दोष के कारण वे कभी-कभी खेलने-कूदने और तरह तरह की हरकतें तथा आवाजें करने लगते हैं। यद्यपि ऊपर किसी बाह्य तत्व का प्रभाव नहीं होता तथापि उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें किसी भूत अथवा प्रेत ने दबा लिया है। किन्तु वास्तविकता यह होती है कि उनके विचारों का विकार ही अवसर पाकर उनके सिर चढ़कर खेलने लगता है। किसी दुर्बुद्धि अथवा दुर्बलमना व्यक्ति का जब यह विचार बन जाता है कि कोई उस पर उसे मारने के लिए टोना कर रहा है तब उसे अपने जीवन का ह्रास होता अनुभव होने लगता है।

🔵  जितना-जितना यह विचार विश्वास में बदलता जाता है उतना उतना ही वह अपने को क्षीण, दुर्बल तथा रोगी होता जाता है अन्त में ठीक-ठीक रोगी बन कर एक दिन मर तक जाता है। जबकि चाहे उस पर कोई टोना किया जा रहा होता है अथवा नहीं। फिर टोना आदि में उनके प्रेत पिशाचों में वह शक्ति कहां जो जीवन-मरण के ईश्वरीय अधिकार को स्वयं ग्रहण कर सकें यह और कुछ नहीं तदनुरूप विचारों की ही परिणति होती है। 

🔴 मनुष्य के आन्तरिक विचारों के अनुरूप ही बाह्य परिस्थितियों का निर्माण होता है उदाहरण के लिए किसी व्यापारी को ले लीजिए। यदि वह निर्बल विचारों वाला है और भय तथा आशंका के साथ खरीद फरोख्त करता है, हर समय यही सोचता रहता है कि कहीं घाटा न हो जाय, कहीं माल का भाव न गिर जाय, कोई रद्दी माल आकर न फंस जाय, तो मानो उसे अपने काम में घाटा होगा अथवा उसका दृष्टिकोण इतना दूषित हो जायेगा कि उसे अच्छे माल में भी त्रुटि दीखने लगेगी, ईमानदार आदमी बेईमान लगने लगेंगे और उसी के अनुसार उसका आचरण बन जायेगा जिससे बाजार में उसकी बात उठ जायेगी। उससे सहयोग करना छोड़ देंगे और वह निश्चित रूप से असफल होगा और घाटे का शिकार बनेंगे। अशुभ विचारों से शुभ परिणामों की आशा नहीं की जा सकती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 16 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 38)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार
🔴 इसी सन्दर्भ में एक गुरु ने अपने एक अविश्वासी शिष्य की शंका दूर करने के लिए उसे प्रायोगिक प्रमाण दिया—उन्होंने उस शिष्य को बड़े-बड़े सींगों वाला एक भैंस दिखाकर कहा कि इसका यह स्वरूप अपने मन पर अंकित करके और इस कुटी में बैठकर निरन्तर उसका ध्यान तब तक करता रहे जब तक वे उसे पुकारें नहीं। निदान शिष्य कुटी में बैठा हुआ बहुत समय तक उस भैंसे का और विशेष प्रकार से उसके बड़े-बड़े सींगों का स्मरण करता रहा। कुछ समय बाद गुरु ने उसे बाहर निकलने के लिए आवाज दी।

🔵 शिष्य ने ज्यों ही खड़े होकर दरवाजे में शिर डाला कि अटक कर रुक गया। ध्यान करते-करते उसके सिर पर उसी भैंसे की तरह बड़े-बड़े सींग निकल आये थे। उसने गुरु को अपनी विपत्ति बतलाई और कृपा करने की प्रार्थना की। तब गुरु ने उसे फिर आदेश दिया कि वह कुछ समय उसी प्रकार अपने स्वाभाविक स्वरूप का चिन्तन करे। निदान उसने ऐसा किया और कुछ समय में उसके सींग गायब हो गये।

🔴 आख्यान भले ही सत्य न हो किन्तु उसका निष्कर्ष अक्षरशः सत्य है कि मनुष्य जिस बात का चिंतन करता रहता है, जिन विचारों में प्रधानतया तन्मय रहता है वह उसी प्रकार का बन जाता है।

🔵 दैनिक जीवन के सामान्य उदाहरणों को ले लीजिए। जिन बच्चों को भूतप्रेतों की काल्पनिक कहानियां तथा घटनायें सुनाई जाती रहती हैं वे उनके विचारों में घर कर लिया करती हैं, और जब कभी वे अंधेरे उजाले में अपने उन विचारों से प्रेरित हो जाते हैं तो उन्हें अपने आस-पास भूत-प्रेतों का अस्तित्व अनुभव होने लगता है जबकि वास्तव में वहां कुछ होता नहीं है। उन्हें परछाइयों तथा पेड़-पौधों तक में भूतों का आकार दिखलाई देने लगता है। यह उनके भूतात्मक विचारों की ही अभिव्यक्ति होती है जो उन्हें दूर पर भूतों के आकार में दिखलाई देती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 15 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 37)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 कितनी ही सज्जनोचित वेशभूषा में क्यों न हो, दुष्ट दुराचारी को देखते ही पहचान लिया जाता है, साधु तथा सिद्धों के वेश में छिपकर रहने वाले अपराधी अनुभवी पुलिस की दृष्टि से नहीं बच पाते और बात की बात में पकड़े जाते हैं। उनके हृदय का दुर्भाव उनका सारा आवरण भेद कर व्यक्तित्व के ऊपर बोलता रहता है।

🔵 जिस प्रकार के मनुष्य के विचार होते हैं वस्तुतः वह वैसा ही बन जाता है। इस विषय में एक उदाहरण बहुत प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि भृंगी पतंग झींगुर को पकड़ लाता है और बहुत देर तक उसके सामने रहकर गुंजार करता रहता है यहां तक कि उसे देखते-देखते बेहोश हो जाता है। उस बेहोशी की दशा में झींगुर की विचार परिधि निरन्तर उस भृंगी के स्वरूप तथा उसकी गुंजार से घिरी रहती है जिसके फलस्वरूप वह झींगुर भी निरन्तर में भृंगी जैसा ही बन जाता है। इसी भृंगी तथा कीट के आधार पर आदि कवि वाल्मीकि ने सीता और राम के प्रेम का वर्णन करते हुए एक बड़ी सुन्दर उक्ति अपने महाकाव्य में प्रस्तुत की है।

🔴 उन्होंने लिखा कि सीता ने अशोक-वाटिका की सहचरी विभीषण की पत्नी सरमा से एक बार कहा—सरमे! मैं अपने प्रभु राम का निरन्तर ध्यान करती रहती हूं। उनका स्वरूप प्रतिक्षण मेरी विचार परिधि में समाया रहता है। कहीं ऐसा न हो कि भृंगी और पतंग के समान इस विचार तन्मयता के कारण में राम-रूप हो ही जाऊं और तब हमारे दाम्पत्य-जीवन में बड़ा व्यवधान पड़ जायेगा। सीता की चिन्ता सुनकर सरमा ने हंसते हुए कहा—देवी! आप चिंता क्यों करती हैं, आपके दाम्पत्य-जीवन में जरा भी व्यवधान नहीं पड़ेगा।

🔵 जिस प्रकार आप भगवान के स्वरूप का विचार करती रहती हैं उसी प्रकार राम भी तो आपके रूप का चिन्तन करते रहते हैं। इस प्रकार यदि आप राम बन जायेंगे तो राम सीता बन जायेंगे। इससे दाम्पत्य-जीवन में क्या व्यवधान पड़ सकता है? परिवर्तन केवल इतना होगा कि पति पत्नी और पत्नी पति बन जायेगी।’’ इस उदाहरण में कितना सत्य है नहीं कहा जा सकता किन्तु यह तथ्य मनोवैज्ञानिक आधार पर पूर्णतया सत्य है कि मनुष्य जिन विचारों का चिन्तन करता है उसके अनुरूप ही बन जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 14 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 36)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 अविचारी व्यक्ति कितने ही सुन्दर आचरण अथवा आडम्बर में छिपकर क्यों न रहे। उसकी अविचारिता उसके व्यक्तित्व में स्पष्ट झलकती रहेगी।

🔵 नित्य प्रति के सामान्य जीवन का अनुभव इस बात का साक्षी है। बहुत बार हम ऐसे व्यक्तियों के सम्पर्क में आ जाते हैं जो सुन्दर वेश-भूषा के साथ-साथ सूरत-शकल से भी बुरे और भद्दे नहीं होते, तब भी उनको देख कर हृदय पर अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं होती। यदि हम यह जानते हैं कि हम बुरे आदमी नहीं हैं, और इस प्रतिक्रिया के पीछे हमारी विरोध भावना अथवा पक्षपाती दृष्टिकोण सक्रिय नहीं हैं, तो मानना पड़ेगा कि वे अच्छे विचार वाले नहीं हैं।

🔴 उनका हृदय उस प्रकार स्वच्छ नहीं है जिस प्रकार बाह्यवेष।  इसके विपरीत कभी-कभी ऐसा व्यक्ति सम्पर्क में आ जाता है जिसका बाह्य-वेष न तो सुन्दर होता है और न उसका व्यक्तित्व ही आकर्षक होता है तब भी हमारा हृदय उससे मिलकर प्रसन्न हो उठता है, उससे आत्मीयता का अनुभव होता है। इसका अर्थ यही है कि वह आकर्षण बाह्य का नहीं अन्तर का है, जिसमें सद्भावनाओं तथा सद्विचारों के फूल खिले हुए हैं।

इस विचार प्रभाव को इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि जब एक सामान्य पथिक किसी ऐसे मार्ग से गुजरता है जहां पर अनेक मृगछौने खेल रहे हों, सुन्दर पक्षी कल्लोल कर रहे हों तो वे जीव उसे देखकर सतर्क भले हो जायें और उस अजनबी को विस्मय से देखने लगें किन्तु भयभीत कदापि नहीं होते। किन्तु यदि उसके स्थान पर जब कोई शिकारी अथवा गीदड़ आता है तो वे जीव भय से त्रस्त होकर भागने और चिल्लाने लगते हैं। वे दोनों ऊपर से देखने में एक जैसे मनुष्य ही होते हैं किन्तु विचार के अनुसार उनके व्यक्तित्व का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 13 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 35)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं

🔴 मन और मस्तिष्क, जो मानव-शक्ति के अनन्त स्रोत माने जाते हैं और जो वास्तव में हैं भी उनका प्रशिक्षण विचारों द्वारा ही होता है। विचारों की धारणा और उनका निरन्तर मनन करते रहना मस्तिष्क का प्रशिक्षण कहा गया है। उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति अपने मस्तिष्क में कोई विचार रखकर उसका निरन्तर चिन्तन एवं मनन करता रहता है, वे विचार अपने अनुरूप मस्तिष्क में रेखायें बना देते हैं, प्रणालियां तैयार कर दिया करते हैं कि मस्तिष्क की गति उन्हीं प्रणालियों के बीच ही उसी प्रकार बन्ध कर चलती है, जिस प्रकार नदी की धार अपने दोनों कूलों से मर्यादित होकर।

🔵 यदि दूषित विचारों को लेकर मस्तिष्क में मन्थन किया जायेगा, तो मस्तिष्क की धारायें दूषित हो जायेंगी, उनकी दिशा विकारों की ओर निश्चित हो जायेगी और उसकी गति दोषों के सिवाय गुणों की ओर न जा सकेगी। इसी प्रकार जो बुद्धिमान मस्तिष्क में परोपकारी और परमार्थी विचारों का मनन करता रहता है, उसका मस्तिष्क परोपकारी और परमार्थी बन जाता है और उसकी धारायें निरन्तर कल्याणकारी दिशा में ही चलती रहती हैं।

🔴 इस प्रकार इसमें कोई संशय नहीं रह जाता कि विचारों की शक्ति अपार है, विचार ही संसार की धारणा के आधार और मनुष्य के उत्थान-पतन के कारण होते हैं। विचारों द्वारा प्रशिक्षण देकर मस्तिष्क को किसी ओर मोड़ा और लगाया जा सकता है। अस्तु बुद्धिमानी इसी में है कि मनुष्य मनोविकारों और बौद्धिक स्फुरणाओं में से वास्तविक विचार चुन ले और निरन्तर उनका चिन्तन एवं मनन करते हुए, मस्तिष्क का परिष्कार कर डाले। इस अभ्यास से कोई भी कितना ही बुद्धिमान, परोपकारी, परमार्थी और मुनि, मानव या देवता का विस्तार पा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 34)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं
🔴 चरित्र की रचना संस्कारों के अनुसार होती है और संस्कारों की रचना विचारों के अनुसार। अस्तु आदर्श चरित्र के लिए, आदर्श विचारों को ही ग्रहण करना होगा। पवित्र कल्याणकारी और उत्पादक विचारों को चुन-चुनकर अपने मस्तिष्क में स्थान दीजिये। अकल्याणकर दूषित विचारों को एक क्षण के लिए भी पास मत आने दीजिये। अच्छे विचारों का ही चिन्तन और मनन करिये। अच्छे विचार वालों के संसर्ग करिये। अच्छे विचारों का साहित्य पढ़िये और इस प्रकार हर ओर से अच्छे विचारों से ओत-प्रोत हो जाइये।

🔵  कुछ ही समय में आपके उन शुभ विचारों से आपकी एकात्मक अनुभूति जुड़ जायेगी, उनके चिन्तन-मनन में निरन्तरता आ जायेगी, जिसके फलस्वरूप वे मांगलिक विचार चेतन मस्तिष्क से अवचेतन मस्तिष्क में संस्कार बन-बनकर संचित होने लगेंगे और तब उन्हीं के अनुसार आपका चरित्र निर्मित और आपकी क्रियायें स्वाभाविक रूप से आपसे आप संचालित होने लगेंगी। आप एक आदर्श चरित्र वाले व्यक्ति बनकर सारे श्रेयों के अधिकारी बन जायेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 9 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 33)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं

🔴 धर्म-कर्म और विरक्ति भाव में रुचि होने पर भी भोग वासनायें उनका साथ नहीं छोड़ पातीं। विचार जब तक संस्कार नहीं बन जाते मानव-वृत्तियों में परिवर्तन नहीं ला सकते। संस्कार रूप भोग वासनाओं से छूट सकना तभी सम्भव होता है जब अखण्ड प्रयत्न द्वारा पूर्व संस्कारों को धूमिल बनाया जाये और वांछनीय विचारों का भावनात्मक अनुभूति के साथ, चिन्तन-मनन और विश्वास के द्वारा संस्कार रूप में प्रौढ़ और परिपुष्ट किया जाय। पुराने संस्कारों की रचना परमावश्यक है।

🔵 चरित्र मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है। यही वह धुरी है, जिस पर मनुष्य का जीवन सुख-शान्ति और मान-सम्मान की अनुकूल दिशा अथवा दुःख-दारिद्रय तथा अशान्ति, असन्तोष की प्रतिकूल दिशा में गतिमान होता है। जिसने अपने चरित्र का निर्माण आदर्श रूप में कर लिया उसने मानो लौकिक सफलताओं के साथ पारलौकिक सुख-शान्ति की सम्भावनायें स्थिर कर लीं और जिसने अन्य नश्वर सम्पदाओं के माया-मोह में पकड़कर अपनी चारित्रिक सम्पदा की उपेक्षा कर दी उसने मानो लोक से लेकर परलोक तक के जीवन पथ में अपने लिए नारकीय प्रभाव प्रबन्ध कर लिया।

🔴 यदि सुख की इच्छा है तो चरित्र का निर्माण करिये। धन की कामना है तो आचरण ऊंचा करिये, स्वर्ग की वांछा है तो भी चरित्र को देवोपम बनाइये और यदि आत्मा, परमात्मा अथवा मोक्ष मुक्ति की जिज्ञासा है तो भी चरित्र को आदर्श एवं उदात्त बनाना होगा। जहां चरित्र है वहां सब कुछ है, जहां चरित्र नहीं वहां कुछ भी नहीं। भले ही देखने-सुनने के लिए भण्डार के भण्डार क्यों न भरे पड़े हों।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 8 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 32)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 विचारों के विपरीत कार्य हो जाने का रहस्य यही होता है कि मनुष्य की क्रिया प्रवृत्ति पर संस्कारों का प्रभाव रहता है और गुप्त मन में छिपे रहने से उनका पता नहीं चल पता। संस्कार विचारों को व्यर्थ कर अपने अनुसार मनुष्य की क्रियायें प्रेरित कर दिया करते हैं। जिस प्रकार पानी के ऊपर दीखने वाले छोटे से कमल पुष्प का मूल पानी के तल में कीचड़ में छिपा रहने से नहीं दीखता, उसी प्रकार परिणाम रूप क्रिया का मूल संस्कार अवचेतन मन में छिपा होने से नहीं दीखता।

🔵 कोई-कोई विचार ही तात्कालिक क्रिया के रूप में परिणित हो पाता है अन्यथा मनुष्य के वे ही विचार क्रिया के रूप में परिणत होते हैं, जो प्रौढ़ होकर संस्कार बन जाते हैं। ये विचार जो जन्म के साथ ही क्रियान्वित हो जाते हैं, प्रायः संस्कारों के जाति की ही होते हैं। संस्कारों से भिन्न तात्कालिक विचार कदाचित् ही क्रिया के रूप में परिणत हो पाते हैं बशर्ते कि वे संस्कार के रूप में परिपक्व न हो गये हों। वे संतुलित तथा प्रौढ़ मस्तिष्क वाले व्यक्ति अपने अवचेतन मस्तिष्क को पहले से ही उपयुक्त बनाये रहते हैं, जो अपने तात्कालिक विचारों को क्रिया रूप में बदल देते हैं। इसका कारण इसके सिवाय और कुछ नहीं होता कि उनके संस्कारों और प्रौढ़ विचारों में भिन्नता नहीं होती—एक साम्य तथा अनुरूपता होती है।

🔴 संस्कारों के अनुरूप मनुष्य का चरित्र बनता है और विचारों के अनुरूप संस्कार। विचारों की एक विशेषता यह होती है कि यदि उनके साथ भावनात्मक अनुभूति का समन्वय कर दिया जाता है तो वे न केवल तीव्र और प्रभावशाली हो जाते हैं, बल्कि शीघ्र ही पक कर संस्कारों का रूप धारण कर लेते हैं। किन्हीं विषयों के चिन्तन के साथ यदि मनुष्य की भावनात्मक अनुभूति जुड़ जाती है तो वह विषय मनुष्य का बड़ा प्रिय बन जाता है। यही प्रियता उस विषय को मानव-मस्तिष्क पर हर समय प्रतिविम्बित बनाये रहती है। फलतः उसी विषय में चिन्तन, मनन की प्रक्रिया भी अबाधगति से चलती है और वह विषय अवचेतन में जा-जाकर संस्कार रूप में परिणत होता रहता है। 

🔵 इसी नियम के साथ बहुधा देखा जाता है कि अनेक लोग, लोक प्रियता के कारण भोगवासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ, सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनसे मुक्त नहीं हो पाते। वे  चाहते हैं कि संसार के नश्वर भोगों और अकल्याणकर वासनाओं से विरषित हो जाये, लेकिन उनकी यह चाह पूरी नहीं हो पाती। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 7 मार्च 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 31)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं
🔴 धन और स्वास्थ्य भी मानव-जीवन की सम्पत्तियां हैं— इसमें सन्देह नहीं। किन्तु चरित्र की तुलना में यह नगण्य हैं। चरित्र के  आधार पर धन और स्वास्थ्य तो पाये जा सकते हैं किन्तु धन और स्वास्थ्य के आधार पर चरित्र नहीं पाया जा सकता। यदि चरित्र सुरक्षित है, समाज में विश्वास बना है तो मनुष्य अपने परिश्रम और पुरुषार्थ के बल पर पुनः धन की प्राप्ति कर सकता है। चरित्र में यदि दृढ़ता है, सन्मार्ग का त्याग नहीं किया गया है तो उसके आधार पर संयम, नियम और आचार-विचार के द्वारा खोया हुआ स्वास्थ्य फिर वापस बुलाया जा सकता है। किन्तु यदि चारित्रिक विशेषता का ह्रास हो गया है तो इनमें से एक की भी क्षति पूर्ति नहीं की जा सकती। इसलिए चरित्र का महत्व धन और स्वास्थ्य दोनों से ऊपर है। इसीलिये विद्वान् विचारकों ने यह घोषणा की है, कि—‘‘धन चला गया तो कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, तो कुछ गया। किन्तु यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया।’’

🔵 मनुष्य के चरित्र का निर्माण संस्कारों के आधार पर होता है। मनुष्य जिस प्रकार के संस्कार संचय करता रहता है, उसी प्रकार उसका चरित्र ढलता रहता है। अस्तु अपने चरित्र का निर्माण करने के लिए मनुष्य को अपने संस्कारों का निर्माण करना चाहिए। संस्कार, मनुष्य के उन विचारों के ही प्रौढ़ रूप होते हैं, जो दीर्घकाल तक रहने से मस्तिष्क में अपना स्थायी स्थान बना लेते हैं। यदि सद्विचारों को अपनाकर उनका ही चिन्तन और मनन किया जाता रहे तो मनुष्य के संस्कार शुभ और सुन्दर बनेंगे। इसके विपरीत यदि असद्विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जायेगा तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-कर्कट ही इकट्ठा होता जायेगा।

🔴 विचारों का निवास चेतन मस्तिष्क और संस्कारों का निवास अवचेतन मस्तिष्क में रहता है। चेतन मस्तिष्क प्रत्यक्ष और अवचेतन मस्तिष्क अप्रत्यक्ष अथवा गुप्त होता है। यही कारण है कि कभी-कभी विचारों के विपरीत क्रिया हो जाया करती हैं। मनुष्य देखता है कि उसके विचार अच्छे और सदाशयी हैं, तब भी उसकी क्रियायें उसके विपरीत हो जाया करती हैं। इस रहस्य को न समझ सकने के कारण कभी-कभी वह बड़ा व्यग्र होने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 छिद्रान्वेषण की दुष्प्रवृत्ति

छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो...