मंगलवार, 16 अगस्त 2016

👉 एक सैल्यूट इन्हें भी


🔴 जहां यह तैनात रहते हैं वहां की हवा आदमखोर कहलाती है। पारा माइनस 70 डिग्री से कम रहता है और यह इस तापमान से जूझने वाले सुपरमैन कहलाते हैं। जी हां यही कहानी है सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात रहने वाले भारतीय जवानों की। जवानों की पल्टन की तैनाती तीन-तीन माह के लिए की जाती है। 


🔵 इन तीन माह में यह नहाने से एकदम दूर रहते हैं। क्योंकि नहाने के लिए यदि बहादुरी दिखाने की कोशिश की तो शरीर का कोई ना कोई अंग गलकर वहीं गिर जाएगा। खाना भरपूर रहता है पर यह जानते हैं कि खाने के बाद उन्हें कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। बर्फीले हवाएं इन्हें निगलने के लिए हर पल इनके सिर पर मंडराती रहती हैं। बर्फ के नीचे सैनिक दफन होते हैं और उनकी बर्फ में बनी कब्र के ऊपर मोर्चा लेने के दूसरी पौध खड़ी हो जाती है। 


🔴 इसके बाद भी यहां सैनिक मुस्तैदी से हर पल तैनात रहते हैं। मौसम से लड़ते हैं और पाकिस्तान से होनी वाली घुसपैठ पर भी नजर रखते हैं। बहुत कम पल्टन ऐसी होती हैं जिसमें उतने सैनिक ही वापस लौट आएं जितने सियाचिन पर मोर्चा संभालने पहुंचते हैं। यहां तैनात सैनिकों के सिर पर कोई ताज नहीं होता। इनके जान गंवाने की खबर भी सैनिकों परिजनों तक चिट्ठी से पहुंचती है। इसका मजमून हर भाषा में तैयार रहता है क्योंकि सैनिक के परिजनों की भाषा अलग-अलग होती है। बस सैनिक का नाम और नंबर खाली रहता है, जिसे सैनिक के जान गंवाने के बाद रिक्त स्थान में लिख दिया जाता है। 

🔵 यह पांच-पांच की संख्या में बर्फ पर कमर में रस्सी बांधकर गश्त करते हैं। ताकि कोई एक खाई में जाए तो बाकी उसे बचा सकें पर कई बार यह पांच के पांचों की बर्फ में समा जाते हैं और इनके बर्फ में समाने की जानकारी जब तक मिलती है, तब तक इनके ऊपर कई फुट मोटी बर्फ जम चुकी होती है।

फिऱ भी यह सब सहते हैं।
देश के लिए जीते और देश के लिए मरते हैं।
सलाम और सैल्यूट इन जवानों को।
इनकी जांबाजी को। इनके जज्बे को।

👉 समाधि के सोपान (भाग 18) (In The Hours Of Meditation)


🔴 और गुरु की वाणी ने मेरी आत्मा से कहा-तुम मनुष्य हो फिर तुम्हारा विश्वास कहाँ है ? क्या तुम पशु हो जो प्रत्येक खतरे के सामने काँपते हो! जब तक तुम देहबुद्धि को जीत नहीं लेते तब तक तुम सत्य की अनुभूति नहीं कर सकते। क्या तुम शव हो ? क्या तुम भौतिक धूल की कीचड़ में सदैव नाचते रहोगे ? अपनी क्षुद्रता से बाहर आओ। सामने आओ। मनुष्य बनो। यदि वह सदैव दबी रहे तो तुम्हारी दिव्यता कहाँ है ? तब क्या तुम इतने महत्त्वपूर्ण हो कि संसार तुम्हारे लिए रुका पड़ा रहे। आत्मा से आत्मा को जीतो। मुक्त हो जाओ। यदि तुम अविनश्वर की उपलब्धि की चेष्टा करो तो मृत्यु तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी क्योंकि मृत्यु क्या है तुम यही भूल चुके होगे। अमरत्व तुम्हारा होगा।

🔵 समस्त संसार -सत्य के प्रगटीकरण के लिए रत है। किन्तु चरित्रगठन ही इस प्रयत्न की सफलता का प्रथम सोपान है। चरित्र ही सब कुछ है। चरित्र का निर्माण करो ! चरित्र का गठन करो !! प्रत्येक मुहूर्त अपने चरित्र का गठन करो। अपनी आत्मा में अमरत्व का चिन्तन करो और तुम अमर हो जाओगे। सत्य को अपना निवासस्थान बना लो और तब जन्म, मृत्यु तथा जीवन के विभिन्न अनुभव तुम्हें भयभीत न कर सकेंगे।

🔴 शरीर को जाने दो। इसके प्रति आसक्ति छोड़ो। स्वयं को मन में मुक्त कर लो। काम, भय, भोजन, तथा निद्रा में सीमित पशु- चेतना को जीतना ही धर्म तथा नैतिकता है। इसे त्यागो। शव के प्रति इस आसक्ति को त्यागो। इसे शव कह कर ही संबोधित करो। सदा इसके साथ शव के समान ही व्यवहार करो। इसके ऊपर सोने का आवरण न चढ़ाओ। यह गंदा है। आत्मा ही सत्य है। आत्मा की चेतना अमर है। अमरता के विचार तुम्हें शाश्वत में ले जाते हैं। वीर बनो! साहसी बनो! वज्र के समान शक्तिशाली बनो। वत्स! यदि तुम ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहते हो तो शरीर की चिन्ता का समय नहीं है। अभी समय है, अभी अवसर है। तुम सत्य की सन्तान हो। सत्य तुम्हारा स्वभाव है। इसीलिए  आत्मा के चैतन्य में डूब जाओ। निर्भीक बनो। जीवन के सुख दु:ख के ऊपर उठना सीखो। स्मरण रखो तुम आत्मा हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...