सोमवार, 5 अगस्त 2019

👉 अच्छाई-बुराई :-

एक बार बुरी आत्माओं ने भगवान से शिकायत की कि उनके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों किया जाता है, जबकी अच्छी आत्माएँ इतने शानदार महल में रहती हैं और हम सब खंडहरों में, आखिर ये भेदभाव क्यों है, जबकि हम सब भी आप ही की संतान हैं।

भगवान ने उन्हें समझाया- ”मैंने तो सभी को एक जैसा ही बनाया पर तुम ही अपने कर्मो से बुरी आत्माएं बन गयीं। सो वैसा ही तुम्हारा घर भी हो गया।“

भगवान के समझाने पर भी बुरी आत्माएँ भेदभाव किये जाने की शिकायत करतीं रहीं और उदास होकर बैठ गयी।

इसपर भगवान ने कुछ देर सोचा और सभी अच्छी-बुरी आत्माओं को बुलाया और बोले- “बुरी आत्माओं के अनुरोध पर मैंने एक निर्णय लिया है, आज से तुम लोगों को रहने के लिए मैंने जो भी महल या खँडहर दिए थे वो सब नष्ट हो जायेंगे, और अच्छी और बुरी आत्माएं अपने अपने लिए दो अलग-अलग शहरों का निर्माण नए तरीके से स्वयं करेंगी।”

तभी एक आत्मा बोली- “ लेकिन इस निर्माण के लिए हमें ईटें कहाँ से मिलेंगी?”

भगवान बोले- “जब पृथ्वी पर कोई इंसान अच्छा या बुरा कर्म करेगा तो यहाँ पर उसके बदले में ईटें तैयार हो जाएंगी। सभी ईटें मजबूती में एक सामान होंगी, अब ये तुम लोगों को तय करना है कि तुम अच्छे कार्यों से बनने वाली ईंटें लोगे या बुरे कार्यों से बनने वाली ईटें!”

बुरी आत्माओं ने सोचा, पृथ्वी पर बुराई करने वाले अधिक लोग हैं इसलिए अगर उन्होंने बुरे कर्मों से बनने वाली ईटें ले लीं तो एक विशाल शहर का निर्माण हो सकता है, और उन्होंने भगवान से बुरे कर्मों से बनने वाली ईंटें मांग ली।

दोनों शहरों का निर्माण एक साथ शुरू हुआ, पर कुछ ही दिनों में बुरी आत्माओं का शहर वहाँ रूप लेने लगा, उन्हें लगातार ईंटों के ढेर के ढेर मिलते जा रहे थे और उससे उन्होंने एक शानदार महल बहुत जल्द बना भी लिया। वहीँ अच्छी आत्माओं का निर्माण धीरे-धीरे चल रहा था, काफी दिन बीत जाने पर भी उनके शहर का केवल एक ही हिस्सा बन पाया था।

कुछ दिन और ऐसे ही बीते, फिर एक दिन अचानक एक अजीब सी घटना घटी। बुरी आत्माओं के शहर से ईटें गायब होने लगीं… दीवारों से, छतों से, इमारतों की नीवों से,… हर जगह से ईंटें गायब होने लगीं और देखते ही  देखते उनका पूरा शहर खंडहर का रूप लेने लगा।

परेशान आत्माएं तुरंत भगवान के पास भागीं और पुछा- “हे प्रभु! हमारे महल से अचानक ये ईटें क्यों गायब होने लगीं …हमारा महल और शहर तो फिर से खंडहर बन गया?”

भगवान मुस्कुराये और बोले-
“ईटें गायब होने लगीं!!  अच्छा! दरअसल जिन लोगों ने बुरे कर्म किए थे अब वे उनका परिणाम भुगतने लगे हैं यानी अपने बुरे कर्मों से उबरने लगीं हैं उनके बुरे कर्म और उनसे उपजी बुराइयाँ नष्ट होने लगे हैं। सो उनकी बुराइयों से बनी ईटें भी नष्ट होने लगीं हैं। आखिर को जो आज बना है वह कल नष्ट भी होगा ही। अब किसकी आयु कितनी होगी ये अलग बात है।“

इस तरह से बुरी आत्माओ ने अपना सिर पकड़ लिया और सिर झुका के वहा से चली गई|

मित्रों! इस कहानी से हमें कई ज़रूरी बातें सीखने को मिलती है, बुराई और उससे होने वाला फायदा बढता तो बहुत तेजी से है। परंतु नष्ट भी उतनी ही तेजी से होता है।

वही सच्चाई और अच्छाई से चलने वाले धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं पर उनकी सफलता स्थायी होती है. अतः हमें हमेशा सच्चाई की बुनियाद पर अपने सफलता की इमारत खड़ी करनी चाहिए, झूठ और बुराई की बुनियाद पर तो बस खंडहर ही बनाये जा सकते हैं।

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 5 August 2019



👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 5 Augest 2019



👉 रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कदम उठाने होंगे

नया युग लाने के लिए धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने के लिए-सतयुग की पुनरावृत्ति आँखों के सामने देखने के लिए-हमें कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण, दुस्साहस भरे रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कदम उठाने होंगे। शत-सूत्री कार्यक्रमों के अंतर्गत उसकी कुछ चर्चा हो चुकी है। बड़े परिवर्तनों के पीछे बड़ी कार्य पद्धतियाँ भी जुड़ी रहती हैं। निश्चित रूप से हमें ऐसे अगणित छोटे-बड़े आन्दोलन छेड़ने पड़ेंगे, संघर्ष करने पड़ेंगे, प्रशिक्षण संस्थाएँ चलानी पड़ेंगी जन करना अभियान में लाखों मनुष्यों का जन, सहयोग, त्याग-बलिदान सूझ-बूझ एवं प्रयत्न, पुरुषार्थ नियोजित किया जाएगा भारत के पिछले राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में कितनी जनशक्ति और कितनी धन-शक्ति लगी थी। यह सर्वविदित है, यह भारत तक और उसके राजनैतिक क्षेत्र तक सीमित थी। अपने अभियान का कार्यक्षेत्र उससे सैकड़ों गुना बड़ा है।

अपना कार्यक्षेत्र समस्त विश्व है और परिवर्तन राजनीति में ही नहीं वरन् व्यक्ति तथा समाज के हर क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने हैं। इसके लिये कितने सृजनात्मक और कितने संघर्षात्मक मोर्चे खोलने पड़ेंगे, इसी कल्पना कोई भी दूरदर्शी कर सकता है। वर्तमान अस्त-व्यस्तता को सुव्यवस्था में परिवर्तित करना एक बड़ा काम है। मानवीय मस्तिष्क की दिशा, विचारणा, आकांक्षा अभिरुचि ओर प्रवृत्ति को बदल देना-निष्कृष्टता के स्थान पर उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना करना-सो भी समस्त पृथ्वी पर रहने वाले चार अरब व्यक्तियों में निस्सन्देह एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक काम है। इसमें अग्रणी व्यक्तियों, असंख्य आन्दोलनों और असीम क्रिया तन्त्रों का समन्वय होगा।

यह एक अवश्यम्भावी प्रक्रिया है, जिसे महाकाल अपने ढंग से नियोजित कर रहे हैं। हर कोई देखेगा कि आज की वैज्ञानिक प्रगति की तरह कल भावनात्मक उत्कर्ष के लिए भी प्रबल प्रयत्न होंगे और उसमें एक से एक बढ़कर व्यक्तित्व एवं संगठन गज़ब की भूमिका प्रस्तुत कर रहे होंगे। यह सपना नहीं, सच्चाई है। जिसे अगले दिनों हर कोई मूर्तिमान् होते हुए देखेगा। इसे भविष्यवाणी नहीं समझना चाहिये, एक वस्तुस्थिति है जिसे हम आज अपनी आँखों पर चढ़ी दूरबीन से प्रत्यक्षतः देख रहे हैं। कल वह निकट आ पहुँचेगी और हर कोई उसे प्रत्यक्ष देखेगा। अगले दिनों संसार का समग्र परिवर्तन करके रख देने वाला एक भयंकर तूफान विद्युत गति से आगे बढ़ता चला आ रहा है। जो इस सड़ी दुनियाँ को समर्थ, प्रबुद्ध, स्वस्थ और समुन्नत बनाकर ही शान्त होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, सितंबर १९६९, पृष्ठ ६६


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/September/v1.66

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ४४)

👉 तंत्र एक सम्पूर्ण विज्ञान, एक चिकित्सा पद्धति

अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ सदियों से यही करते आ रहे हैं और इन क्षणों में भी यही कर रहे हैं। तंत्र का समूचा विज्ञान मूल रूप से पाँच तत्त्वों पर टिका हुआ है। जिस तरह से पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु एवं आकाश इन पाँच तत्त्वों से सृष्टि बनती है, उसी तरह से १. पदार्थ, २. स्थान, ३. शब्द, ४. अंक एवं ५. काल, इन पाँच अवयवों के सहारे तंत्र की वैज्ञानिक प्रक्रिया क्रियाशील होती है। तंत्र के क्षेत्र में इन पाँचों का अपना विशिष्ट अर्थ है। जिसे जानकर ही इसके प्रयोग किये जा सकते हैं। इस क्रम में सबसे पहला है पदार्थ। इस सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिकों की भाँति तंत्र विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की विभिन्न धाराओं ने एक विशिष्ट क्रम से मिलकर इस सृष्टि के विभिन्न पदार्थों की सृष्टि की है। इस सृष्टि का प्रत्येक अवयव भले ही वह वस्तु हो या प्राणी अथवा वनस्पति ऊर्जा का ही सघन रूप है।

जगत् और जीवन की इस सच्चाई को स्वीकारते तो वैज्ञानिक भी हैं, पर वे सृष्टि के प्रत्येक अवयव को समपूर्णतया या आँशिक रूप से ऊर्जा में परिवर्तित करने की कला नहीं जानते। लेकिन तांत्रिक ऐसा करने में सक्षम होते हैं। वे अपने प्रयोगों में सृष्टि के प्रत्येक अवयव का चाहे वह जीवित हो या मृत उसमें निहित ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं। वृक्षों की जड़ें या पत्तियाँ, पशु- पक्षियों एवं मनुष्यों के नाखून या बाल तक में निहित ऊर्जा का वह समुचित प्रयोग कर लेते हैं। इन प्रयोगों में दूसरा क्रम स्थान का है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्माण्डीय ऊर्जाधाराएँ प्रत्येक स्थान पर एक सुनिश्चित रीति से केन्द्रीभूत होती हैं। इसलिए किस ऊर्जा का किस तरह से क्या उपयोग करना है, उसी क्रम में स्थल का चयन किया जाता है। यह स्थान मंदिर, देवालय भी हो सकता है और पीपल, वट आदि वृक्षों की छाँव भी अथवा नदी का किनारा या श्मशान भी हो सकता है।

तंत्र विज्ञान में तीसरा किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। शब्द की तन्मात्रा आकाश है। आकाश परम तत्त्व है, इसी से अन्य तत्त्व उपजे हैं। इसी वजह से तंत्र ने आकाश तत्त्व को अपनी साधना के आधार के रूप में स्वीकारा है। शब्द से बने बीजाक्षर एवं मंत्राक्षरों के सविधि प्रयोग से तंत्र विशेषज्ञ ब्रह्माण्ड की ऊर्जाधाराओं की दिशा को नियंत्रित एवं नियोजित करते हैं। पढ़ने वाले भले इसे असम्भव माने, पर ऐसा होता है। इसे कोई भी अनुभव कर सकता है। तंत्र विद्या में शब्द के प्रयोग अतिरहस्यमय हैं और तुरन्त प्रभाव प्रकट करने वाले हैं। इसमें कोई बीजाक्षर तो ऐसे हैं जो एक- डेढ़ अक्षर के होते हुए भी सिद्ध हो जाने पर कुछ ही सेकण्डों में चमत्कार पैदा करने लगते हैं।

इस क्रम में चौथे तत्त्व के रूप में अंक का स्थान है। शब्दों की भाँति अंक भी तंत्र विद्या में महत्त्व रखते हैं। इन अंकों और कुछ निश्चित रेखा कृतियों के संयोग से यंत्रों का निर्माण होता है। इन यंत्रों की पूजा- प्रतिष्ठा एवं सविधि साधना के द्वारा विशिष्ट ऊर्जाधारा को इसमें केन्द्रित किया जाता है। इसी को यंत्र की जागृति कहते हैं। ऐसा होने पर फिर यंत्र ट्रांसफार्मर जैसा काम करने लगता है, यानि कि वह अपने में केन्द्रित ऊर्जा को काम्य प्रयोजन की पुर्ति के योग्य बनाता है। इस विज्ञान का पाँचवा तत्त्व है काल, जिस पर सारी प्रयोग प्रक्रिया निर्भर करती है। इसके अन्तर्गत यह जानना होता है कि उपरोक्त सभी चारों तत्त्वों का संयोग कब- किन विशेष क्षणों में किया जाय।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ६४

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Aug 2019

■  मनुष्य में एक छोटी सी समस्या है, वो कभी स्वयं की निंदा सुन नहीं पाता। यदि कोई उसके विषय में बुरा कहे, सह नहीं पाता। सदैव भयभीत रहता है कि जो चार लोग हैं, कहीं मेरे विषय में बुरा न सोचें और यदि उसे पता लग जाए कि कोई उसकी पीठ पीछे उसकी बुराई कर रहा है, तो दुःखी हो जाता है। अब क्या इस कारण से स्वयं को दुखी कर लेना क्या उचित है? कदापि नहीं। क्योंकि सबसे पहली बात जो आपको स्मरण रखनी है। यदि कोई पीठ पीछे आपकी बुराई करता है, वो आपसे दो कदम पीछे है, है न? जो आपके बारे में आपसे सारी बातें कर सकता है। यदि ऐसा नहीं है, यदि वो सत्य कह रहे हैं, तो सर्वप्रथम अपनी भूलों को समझें। उस सत्य को समझें और निकाल फेंकें इन अवगुणों को और फिर देखें आप उनसे दो कदम और आगे बढ़ जाएँगे। क्योंकि ये जीवनरथ आगे देखकर चलाया जाता है, पीछे देखकर नहीं। तो ये पीछे देखना छोड़ दीजिये। जो वर्तमान है इसे देखिये इसे जीयें। जो आपका लक्ष्य है उसे साधिये।

◇ मनुष्य जो है ये भूलों का पिटारा है। मनुष्य जो है, गलतियों का पुतला है और ये सत्य है। भूल भला किससे नहीं होती? हर एक से होती है और एक नहीं अनेक भूलें होती हैं। किन्तु स्मरण रखियेगा उनके वस्त्रों पर कीचड़ लगता है, जो कीचड़ साफ करने का प्रयास करते हैं। तो जहाँ प्रयास वहाँ भूलें तो होंगी ही। अब यदि आप कोई नया संकल्प करने जा रहे हैं, कोई बड़ा कार्य करने जा रहे हैं, और आपसे कोई भूल हो जाए, तो कोई बात नहीं। पश्चाताप न करें। अपनी भूल को पहचानें, उसे समझें, उसे सुधारने का प्रयास करें और सबसे महत्वपूर्ण बात अपनी भूलों से सीखें। उन्हीं के हाथों से लहू बहता है, जो काँटों में छिपे उस पुष्प को निकालने का प्रयास करते हैं। स्मरण रखिये जिसने जीवन में कभी कोई भूल नहीं की उसने कभी कोई नया करने का प्रयास ही नहीं किया। ये भूल आपका सबसे बड़ा शिक्षक है। इससे दुःखी न होइये। पश्चाताप ना करें, इस भूल का आदर करना सीखें, फिर देखें आप स्वयं को जीवन में और ऊँचा पायेंगे।

★ दूध को जल से अधिक श्रेष्ठ माना जाता है, और इसीलिये दूध का मूल्य जल से तनिक अधिक है। अब दूध को यदि दही बनाओगे तो इस दूध की आयु कुछ और अधिक बढ़ जाती है। इसका मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब इस दही का माखन बनाओगे तो इसकी आयु कुछ सप्ताहों तक और बढ़ जाती है, और मूल्य कुछ और मुद्राएँ अधिक, अब यदि इस माखन का घी बनाएँगे तो इसकी आयु वर्षों तक चलती है, और मूल्य माखन से कुछ और अधिक होता है। अब इन सबका मूल दूध ही है। तो इन सबकी जीवन आयु एवं इनके मूल्य में इतना अंतर क्यों? इसका कारण ये दूध को दही बनने के लिए खटास सहनी पड़ी, दही को माखन बनने के लिए बिलोने के आघात सहने पड़े, और माखन को घण्टों तक ताप सहना पड़ा। तब जाके इसकी आयु इतनी बढ़ी, तब जाके इसका मूल्य इतना बढ़ा। अब हम सारे मनुष्य एक समान दूध की भाँति किन्तु महान वही बनते हैं, जो कठिनाइयों का सामना करते हैं। संकटों का सामना करते हैं। जो इन चुनौतियों पर खरे उतरते हैं। यदि ये सब करोगे तभी जीवन में आगे बढ़ोगे। तभी आपके यश की आयु बढ़ती जायेगी, और तभी ये संसार आपको महत्व देता जायेगा।

👉 पुण्य की कमाई

" टिकट कहाँ है ? " -- टी सी ने बर्थ के नीचे छिपी लगभग तेरह - चौदह साल की लडकी से पूछा।"
नहीं है साहब।

"काँपती हुई हाथ जोड़े लडकी बोली।
"तो गाड़ी से उतरो।" टी सी ने कहा।
इसका टिकट मैं दे रहीं हूँ।............पीछे से ऊषा भट्टाचार्य की आवाज आई जो पेशे से प्रोफेसर थी ।

"तुम्हें कहाँ जाना है ?" लड़की से पूछा" पता नहीं मैम ! "" तब मेरे साथ चल बैंगलोर तक ! ""
तुम्हारा नाम क्या है ? "" चित्रा

"बैंगलोर पहुँच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी एक पहचान के स्वंयसेवी संस्थान को सौंप दिया । और अच्छे स्कूल में एडमीशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली होने की वजह से चित्रा से कभी-कभार फोन पर बात हो जाया करती थी ।करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमरीका) बुलाया गया । लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्सन पर गई तो पता चला पीछे खड़े एक खूबसूरत दंपत्ति ने बिल भर दिया था।"तुमने मेरा बिल क्यों भरा ? ? ""

मैम, यह बम्बई से बैंगलोर तक के रेल टिकट के सामने कुछ नहीं है ।
""अरे चित्रा ! ! ? ? ? . . . .

चित्रा कोई और नहीं इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मुर्ति थी, एवं इंफोसिस के संस्थापक श्री नारायण मूर्ति जी की पत्नी थी।

यह उन्ही की लिखी पुस्तक "द डे आई स्टाॅप्ड ड्रिंकिंग मिल्क" से लिया गया कुछ अंश

कभी कभी आपके द्वारा भी की गई सहायता किसी की जिन्दगी बदल सकती है।

👉 Solving Life’s Problems - Part 2

I once met a woman who had virtually no problems. I was on a late-night radio program in New York City. This woman called the station and wanted me to come to her home. I was intending to spend the night at the bus station, so I said okay. She sent her chauffeur for me, and I found myself in a millionaire’s home, talking to a middle-aged woman who seemed like a child. She was so immature, and I wondered at her immaturity, until I realized that the woman had been shielded from all problems by a group of servants and lawyers. She had never come to grips with life. She had not had problems to grow on, and therefore had not grown. Problems are blessings in disguise!

Were I to solve problems for others they would remain stagnant; they would never grow. It would be a great injustice to them. My approach is to help with cause rather than effect. When I help others, it is by instilling within them the inspiration to work out problems by themselves. If you feed a man a meal, you only feed him for a day — but if you teach a man to grow food, you feed him for a lifetime.

It is through solving problems correctly that we grow spiritually. We are never given a burden unless we have the capacity to overcome it. If a great problem is set before you, this merely indicates that you have the great inner strength to solve a great problem. There is never really anything to be discouraged about, because difficulties are opportunities for inner growth, and the greater the difficulty the greater the opportunity for growth.

To be continued...
📖 From Akhand Jyoti

👉 धर्म का सच्चा स्वरूप

संसार में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, ताओ, कन्फ्यूशियस, जैन, बौद्ध, यहूदी आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म-सम्प्रदायों पर दृष्टिपात करने से यही पता चलता है कि उनके बाह्यस्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। यह अंतर होना उचित भी है, क्योंकि जिस वातावरण, जिन परिस्थितियों में वे पनपे और फैले हैं, उनकी छाप उन पर पड़ना स्वाभाविक है। मनीषी, अवतारी, महामानवों ने देश काल, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठता-संवर्द्धन एवं निकृष्टता-निवारण के लिए जो सिद्धान्त एवं आचार शास्त्र विनिर्मित किए, कालान्तर में वे ही धर्म-सम्प्रदायों के नाम से पुकारे जाने लगे। इस कारण उनके बाह्य कलेवर में विविधता होना स्वाभाविक है। फिर भी, जहाँ तक मौलिक सिद्धान्तों की बात है, वह सभी तथाकथित धर्मों में एक ही है। सभी ने एक सार्वभौम सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, मानव का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया है।
  
सभी प्रचलित धर्मों में ‘प्रार्थना’ को किसी न किसी रूप में स्वीकार किया एवं अपने दैनिक क्रिया-कृत्यों में सम्मिलित किया गया है। अमेरिका के विख्यात साइक्रियेटिस्ट डॉ. ब्रिल के अनुसार- ‘कोई भी व्यक्ति, जो वास्तव में धार्मिक है, मनोरोगों का शिकार नहीं हो सकता।’ मनःचिकित्सकों एवं मनोविश्लेषकों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि धार्मिक कर्मकाण्डों में जो प्रार्थना की जाती है। प्रसिद्ध विचारक डेल कारनेगी ने लिखा है- ‘जीवन की जटिलताओं और विषमताओं से संघर्ष करके सफलता पाने में कोई भी व्यक्ति अकेले समर्थ नहीं है, आस्था और विश्वास के साथ इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाए।’ मौलाना रूम ने कहा है- ‘रूह की दोस्ती इल्म और ईमान से है, उसके लिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि में कोई फर्क नहीं है।’
  
प्रसिद्ध ईसाई धर्मोपदेशक जस्टिन ने कहा है- ‘जितनी भी श्रेष्ठ विचारणाएँ हैं, वे चाहे किसी भी देश या धर्म की हों, सब मनुष्यों के लिए ईश्वरीय निर्देश की तरह हैं।’ शिव महिमा में उल्लेख है-जिस प्रकार बहुत सी नदियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार से घूमकर अंततः समुद्र में ही जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार अलग-अलग धर्म, पंथों से चलकर उसी एक ईश्वर तक पहुँचते हैं।
  
इंजील ने लिखा है- ‘मनुष्य के नथुनों में जितने श्वास आते हैं, उतने ही ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते हैं।’ चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस का कथन है- ‘अलग-अलग धर्मों की प्रेरणाएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, पूरक हैं।’ प्रसिद्ध संत जरथ्रुस्त के अनुसार-‘हम संसार के उन सभी धर्मों को मानते और पूजते हैं, जो नेकी सिखलाते हैं।’ योगेश्वर श्रीकृष्ण जी ने भगवद्गीता में स्पष्ट कहा  है-‘सभी मनुष्य भिन्न-भिन्न पथों से चलकर अंततः मुझ तक ही पहुँचते हैं।’
  
अनेकों मनीषियों, युगद्रष्टा ऋषियों ने इसे स्वीकार किया है कि विभिन्न धर्मों में वर्णित आदर्श एवं सिद्धान्त सनातन हैं। एक्लेजियास्टिक्स ने उल्लेख किया है- क्या कोई ऐसा आदर्श है, जिसके संदर्भ में यह कहा जा सके कि यह नया है? हर सिद्धान्त सनातन है, जिसका उल्लेख विभिन्न धर्मों में मिलता है।
  
हजरत मोहम्मद ने सभी धर्मानुयायियों को संबोधित करते हुए कहा- ‘आओ हम सब मिलकर उन बातों पर विचार करें, जो हममें और तुममें एक सी हैं।’ ‘शोतोकु’ नामक संत ने कहा- ‘शिनतो, कन्फ्यूशियस व बौद्ध ये तीनों धर्म एक धर्म रूपी वृक्ष के विभिन्न अवयव हैं।  जापानी जनता ने धर्म के मूल तत्त्व को आत्मसात् कर लिया और धर्मों के बाह्य कलेवरों की भिन्नता को समझ लेने के फलस्वरूप विभेदता की कुचाल में न फँसी, उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर बढ़ती गई।’
  
उक्त विवेचनों से यही निष्कर्ष निकलता है कि विविध धर्मों के बाह्य कलेवर एवं क्रिया-कृत्यों में न्यूनाधिक भिन्नता भले ही हो, परन्तु सबका प्राण तत्त्व एक ही है। धर्म का सच्चा स्वरूप वस्तुतः वही है, जो शाश्वत सिद्धान्तों के रूप में सभी धर्मों में विद्यमान है। धर्म के उस प्राण तत्त्व को हृदयंगम कर व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट किए जाने से ही सबका कल्याण संभव हो सकेगा और मानवीय समाज सुख-शांति का रसास्वादन कर सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...