विचार क्रांति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विचार क्रांति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 22 अगस्त 2026

👉 अधूरी शिक्षा से ही संतोष न कर लीजिए।

आज कल बौद्धिक ज्ञान को शिक्षा कहते हैं। मास्टरी, डाक्टरी, इंजीनियरी, कला-कौशल आदि की योग्यताएं शिक्षा कहलाती हैं इनके द्वारा धन, मान तथा सुख सामग्री की प्राप्ति होती है। क्या शिक्षा का प्रयोजन यही है? नहीं, केवल इतने मात्र से काम नहीं चल सकता। शरीर को आनन्द मिला पर आत्मा अशाँत रही तो वह वैभव फीका है, निस्सार है। सच्चा आनन्द वह है जिसमें साँसारिक और आत्मिक जीवन की उभय पक्षीय उन्नति एवं तृप्ति प्राप्त हो। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को पूर्णरूपेण सुखी बनाना है।

हम संसार की अनेक बातें जानते हैं, पर अपनी आत्म-सत्ता के संबंध में हमारा ज्ञान बहुत थोड़ा है। दुनियावी स्वार्थ में हम भले ही चौकस हों, पर आत्मिक स्वार्थों के क्षेत्र में पग-पग पर बाजी हारते हैं। थोड़ी सी भोग सामग्री हमारे पास भले ही जमा हो जाय पर आत्मिक सम्पत्तियों से प्रायः हम रीते ही रहते हैं। यह समझ किस काम की? इस शिक्षा से, इस चतुराई से क्या लाभ, जिसके द्वारा एकाँगी तुच्छ को प्राप्त करना तो सुलभ हो जाय पर वास्तविक लाभ की पहचान और उपलब्धि में कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न हो। शिक्षा तो वह है- जिससे बुद्धि का उचित परिमार्जन हो और जीवन के हर पहलू पर ठीक तरह विचार कर सकने की क्षमता प्राप्त हो जाय।

कहते हैं कि “इंसान को इशारा काफी होता है।” जो संकेत मात्र से साधारण विचार बुद्धि से अपना हित अनहित समझ ले। कुमार्ग पर चलने से अपरिमित हानि होती है और लाभ अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक। जिसे कौड़ी के मोल हीरा बेचते हुए झिझक नहीं होती उसे शिक्षित किस प्रकार कहा जाय? शिक्षित कहना तो दूर उसे तो इंसान तक नहीं कह सकते, क्योंकि “इन्सान को इशारा काफी होता है।” जब कोई अनुचित कार्य किया जाता है तो आत्मा इशारा करती है, अन्तःकरण पुकारता है कि यह न करो यह अनुचित है। यह बड़ा जोरदार इशारा है जो इशारा नहीं समझता और केवल लोभ तथा भय को ही समझता है वह तो पशु है। उसे तो नर पशु ही कहा जा सकता है।

साँसारिक जानकारी की बहुत सी बातें स्कूलों में सिखाई जाती है, वे उचित भी हैं और आवश्यक भी, पर इतने मात्र से ही संतुष्ट हो बैठना पर्याप्त न होगा। हमें शिक्षा का वह भाग भी प्राप्त करना चाहिए जिससे सत् असत् का विवेक होता है और सच्चे स्वार्थ साधन के लिए उत्साह पैदा होता है। ऐसी शिक्षा के लिए स्वाध्याय, सत्संग, संयम, सदाचार तथा सच्चिदानंद प्रभु का आश्रय लेना होता है। ऐसी शिक्षा अपने प्रकाश से अन्तरात्मा के अन्धकार को दूर करके आत्मिक और साँसारिक जीवन को सुखी बना सकती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शनिवार, 25 जुलाई 2026

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य (अंतिम भाग)

जैन-धर्म में “तत्वाधिगम् सूत्र” में इस बात को और भी विवरण युक्त करते हुए लिखा है—
हिंसानृतास्तेयब्राह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम्।
(तत्वा. (7/2)
अर्थात्—प्राण हिंसा करना, झूठे बोलना, चोरी करना, व्यभिचार और परिग्रह इन पाँच पापों को छोड़ना ही व्रत है।

बौद्ध दर्शन में निवृत्ति मार्ग की चर्चा की जाती है। वह वस्तुतः आत्मोद्धार का ही पर्याय है। इसके लिए जिन साधनों का विस्तार किया गया है, वे भी उपनिषदों के आत्म-शोधन एवं जैन दर्शन के व्रतों के समान ही है। बौद्ध भिक्षु जब आत्म-कल्याण के लिये निवृत्ति पथ का अनुसरण करता है तो उसे भी इस तरह की पाँच प्रतिज्ञायें करनी पड़ती हैं—

पाणातिपाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—मैं प्राणि-बध नहीं करूंगा।
अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—किसी की चोरी नहीं करूंगा।
कामे सुमिच्छासारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
— व्यभिचार नहीं करूंगा।
मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
—मैं कभी झूठ नहीं बोलूँगा।
सुरा-मेरेय-मज्ज पमाद ट्ठाना वेरमणी
सिक्खापदं समादियामि।
—माँस मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करूंगा।

हिन्दू धर्म में भी यह सम्पूर्ण दुराचरण तो विवर्जित हैं ही साथ ही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से जानी गई मन की सूक्ष्म विकारमय वृत्तियों से जिनके कारण बड़े दोष बन पड़ते हैं, निग्रह की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है जो वास्तव में दूसरे धर्मों के सिद्धान्तों की अपेक्षा अधिक तथ्यपूर्ण एवं वैज्ञानिक हैं। उदाहरणार्थ काम-वासना बुरी वस्तु है और वह आत्म-ज्ञान से विमुख करने वाली है पर मनुष्य केवल मनोबल के आधार पर वासना से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि परिस्थितियों का प्रभाव भी तो अपना महत्व रखता है। मन की काम-वासना वस्तुतः वैज्ञानिक दृष्टि से अन्न दोष है अर्थात् यदि आहार अनियमित है तो मन की वासना पर कभी भी नियंत्रण नहीं किया जा सकता। इसलिए सच्चरित्रता के सिद्धान्तों को कुछ वाक्यों तक ही सीमित नहीं किया गया वरन् उनका बहुत अधिक विस्तृत विश्लेषण किया गया है। अर्थात् इन नियमों को प्रारम्भिक अवस्था, आहार-विहार, शिक्षा-दीक्षा, भाषा-व्यवहार, धर्म-कर्म आदि से ही बाँधने का प्रयास किया है। इस सर्वांगीण शुद्धि-प्रक्रिया को अपनाये बिना मनुष्य जीवन के दोषों से कदापि मुक्त नहीं हो सकता।

संसार में मनुष्य अपने क्षणिक सुख के लिए अनेक प्रकार के दुष्कर्म कर डालता है। उसे यह खबर नहीं होती कि इन दुष्कर्मों का फल हमें अन्त में किस प्रकार भुगतना पड़ेगा। मनुष्य को जो तरह-तरह के कष्ट उठाने पड़ते हैं, उनके लिए किसी अंश तक समाज और देशकाल की परिस्थितियाँ भी उत्तरदायी हो सकती हैं पर अधिकाँशतया वह अपने ही दुष्कर्मों के प्रतिफल भोगता है। किन्तु मनुष्य शरीर दुःख भोगने के लिए नहीं मिला। यह आत्म-कल्याण के लिए मुख्यतः कर्म-साधन है, इसलिए अपनी प्रवृत्ति भी आत्म-कल्याण या सुख प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति होना चाहिए और इसके लिए बुरे कर्मों से बचना भी आवश्यक हो जाता है।

विकास का क्रम भी इसी तरह चलता है। साधनों को प्राप्त कर यदि आत्मा विवेक का सदुपयोग करता है और उसे अच्छे कर्मों में लगाता है तो आत्मा अपनी शक्तियों को बढ़ाता हुआ अनुकूल साधनों को भी बनाता रहता है और अन्त में प्रारब्ध से, स्वाधीन होकर अपनी पूर्ण उन्नति कर लेता है।

इन दोनों मार्गों में से एक का चुनाव करना आवश्यक हो जाता है। आत्म-ज्ञान की इच्छा रखने वाले एक साथ दोनों आचरण नहीं कर सकते। शास्त्रकार ने अपना निष्कर्ष स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुए लिखा है—
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्वं पूषन्नपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये॥

“सत्य का मुख ढ़का हुआ है ऐ सत्य शोधक! यदि तू उसे प्राप्त करना चाहता है तो उस ढक्कन को खोलना पड़ेगा जिससे सत्य ढ़क गया है। यदि तू उसे नहीं छोड़ सकता तो सत्य ही तुझे छोड़ जाएगा।” दोनों बातें एक साथ कदापि नहीं हो सकतीं। आत्म-ज्ञान को बुरे कर्मों ने भी इसी तरह ढ़क लिया है। उसे प्राप्त करने के लिए इस अशुद्ध अवस्था का परित्याग करना ही पड़ता है। साँसारिक विषय वासनाओं की इच्छाओं पर विजय करनी ही पड़ती है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

👉 आत्म-साक्षात्कार के लिए सच्चरित्रता अनिवार्य

कठोपनिषद् में वैवस्वत यम ने नचिकेता को आत्म-साधना पर प्रकार डालते हुए कहा—
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्त मानसो वापि प्रज्ञानेनैन माप्नुयात्॥
1/2/24
“हे शिष्य! जिनने अपना चरित्र शुद्ध नहीं किया, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं, जिसका चित्त स्थिर नहीं रहता और जिसका मन सदैव अशान्त रहता है, वह केवल बाह्य ज्ञान के आधार पर आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता।”

चरित्र या कर्म अपना फल किस प्रकार देते हैं? यह जानने की बात है। बीज के अनुरूप ही फल होता है। पाप से आत्मा की पराधीनता दृढ़ होती है और पुण्य आत्मा को मुक्त अवस्था की ओर अग्रसर करता है, यही पाप और पुण्य के फल का रहस्य है। बुरे कर्म आत्मा के लिये आवश्यक हैं या नहीं? यह बातें व्यवहार से स्पष्ट मालूम पड़ जाती हैं। मोटे तौर पर वासना पूर्ति से अशान्ति बढ़ती है, क्रोध से शरीर जलने लगता है और आत्मा को बेचैनी मालूम पड़ती है। लोभ आता है तो मनुष्य कितना उद्विग्न हो जाता है, मानो वह नरक की अग्नि में प्रत्यक्ष जल रहा हो। इसी प्रकार संसार में जितने भी बुरे कर्म हैं, वह आत्मा को कष्ट देने वाले और उसके शाश्वत गुणों के विपरीत ही होते हैं, फिर इनके रहते आत्मा अपने मुक्त रूप में प्रकट भी कैसे हो सकता है?

मन की मलीनतायें, पाप, क्रोध, काम और इच्छायें नहीं रहतीं तो आत्मा को तुरन्त शान्ति मिलती है, गुण बढ़ते हैं, ज्ञान बढ़ता है, आनन्द मिलता है, शक्ति अनुभव होती है, सन्तोष होता है। इस प्रकार आत्मा को सुख की अनुभूति होती है। इससे भी मालूम पड़ता है कि काम, क्रोध आदि विकार हैं और वे आत्मा की पवित्रता को कलंकित करने वाले ही होते हैं। अतः इनके रहते हुए आत्म-ज्ञान की इच्छा कैसे पूर्ण हो सकती है?

आत्मा में केवल वही इच्छायें सुखद अनुभव होती हैं, जिन्हें हम पुण्य कहते हैं। सेवा, सर्द्धम, सद्भावना, प्रेम, स्नेह और त्याग-उदारता के क्षणों में आत्मा की शुद्ध इच्छा प्रकट होती है, जबकि साँसारिक भोग की इच्छायें पराधीनता और दूसरे पदार्थों का दास बनाती हैं। अतः रागद्वेष सभी अस्वाभाविक हैं। इनके रहते हुए आत्म-स्थिरता या आत्मा के सुखों में एकाग्रता नहीं हो पाती और आत्मस्थित हुए बिना उसका ज्ञान प्राप्त करना सम्भव नहीं। यह स्थिति ही ऐसी है, जिसे कामनाओं के पहाड़ पर चढ़कर नहीं देख सकते। आत्मा को देखने के लिए तो विशुद्ध आत्म-गुण वाला बनना पड़ता है या आत्मा में ही बस जाना होता है। अतः आत्मा को जागृत करने का पहला महामन्त्र आत्मा को शुद्ध बनाना है।
अध्यात्म योग की आधार शिला की व्याख्या करते हुए श्री शंकराचार्य ने भी इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। उन्होंने लिखा है—

विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य चेतस आत्मानि
समाधान मध्यात्म योगः।
अर्थात्— चित्त को विषयों से हटा कर आत्मा में समावेश करना ही अध्यात्म-योग है।
उपरोक्त कथन से इस आन्तरिक प्रक्रिया पर पूरी तरह प्रकाश पड़ जाता है कि आत्मा की शुद्धि के बिना आत्म-ज्ञान सम्भव नहीं है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1966

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


गुरुवार, 23 जुलाई 2026

👉 अधीरता एक छिछोरापन है। (भाग 2)

प्राचीन समय में जब शिष्य विद्याध्ययन के लिए जब गुरु के पास जाता था तो उसे पहले अपने धैर्य की परीक्षा देनी होती थी। गौएं चरानी पड़ती थीं, लकड़ियाँ चुननी पड़ती थीं, उपनिषदों में इस प्रकार की अनेकों कथाएं हैं। इन्द्र को भी लम्बी अवधि तक इसी प्रकार तपस्या पूर्ण प्रतीक्षा करनी पड़ी थी, जब वह अपने धैर्य की परीक्षा दे चुका, तब उसे आवश्यक विद्या प्राप्त हुई। प्राचीन काल में विज्ञ पुरुष जानते थे कि धैर्यवान् पुरुष ही किसी कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, इसलिये धैर्यवान् स्वभाव वाले छात्रों को ही विद्याध्ययन कराते थे। क्योंकि उनके पढ़ाने का परिश्रम भी अधिकारी छात्रों द्वारा ही सफल हो सकता था। चंचल चित्त वाले, अधीर स्वभाव के मनुष्य का पढ़ना न पढ़ना बराबर है। अक्षर ज्ञान हो जाने या अमुक कक्षा का सार्टीफिकेट ले लेने से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। प्रमाण प्रत्यक्ष है। आज लाखों करोड़ों ‘पढ़े गधे’ इधर से उधर घूरे के तिनके चरकर लदते मरते रहते हैं। कोई कहने लायक पुरुषार्थ उनसे नहीं हो पाता।

आतुरता एवं उतावली का स्वभाव जीवन को असफल बनाने वाला एक भयंकर खतरा है। कर्म का परिपाक होने में समय लगता है। रुई को कपड़े के रूप तक पहुँचने के लिए कई कड़ी मंजिले पार करनी होती हैं और कठोर व्यभिधानों से होकर गुजरना पड़ता है, जो संक्राँति काल के मध्यवर्ती कार्यक्रम को धैर्यपूर्वक पूरा होने देने की जो प्रतीक्षा नहीं कर सकता, उसे रुई को कपड़े के रूप में देखने की आशा न करनी चाहिए। किया हुआ परिश्रम एक विशिष्ट प्रक्रिया के द्वारा फल बनता है। इसमें देर भी लगती है और कठिनाई भी आती है। कभी-कभी परिस्थितिवश यह देरी और कठिनाई आवश्यकता से अधिक भी हो सकती है। उसे पार करने के लिए समय और श्रम लगाना पड़ता है। कभी-कभी तो कई बार का प्रयत्न भी सफलता तक नहीं ले पहुँचाता, तब अनेक बार अधिक समय तक अविचल धैर्य के साथ जुटे रहकर अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करना होता है। आतुर मनुष्य इतनी दृढ़ता नहीं रखते, जरा सी कठिनाई या देरी से वे घबरा जाते हैं और मैदान छोड़कर भाग निकलते हैं। यही भगोड़ापन उनकी पराजयों का इतिहास बनता जाता है।

चित्त का एक काम पर न जमना, संशय और संकल्पों-विकल्पों में पड़े रहना एक प्रकार का मानसिक रोग है। यदि काम पूरा न हो पाया तो? यदि कोई आकस्मिक आपत्ति आ गई तो? यदि फल उलटा निकला तो? इस प्रकार की दुविधापूर्ण आशंकाएं मन को डाँवाडोल बनाये रहती हैं। पूरा आकर्षण और विश्वास न रहने के कारण मन उचटा-उचटा सा रहता है। जो काम हाथ में लिया हुआ है, उस पर निष्ठा नहीं होती। इसलिये आधे मन से वह किया जाता है। आधा मन दूसरे नये काम की खोज में लगा रहता है। इस डाँवाडोल स्थिति में एक भी काम पूरा नहीं हो पाता। हाथ के काम में सफलता नहीं मिलती। बल्कि उल्टी भूल होती जाती है, ठोकर पर ठोकर लगती जाती है। दूसरी ओर आधे मन से जो नया काम तलाश किया जाता है, उसके हानि-लाभों को भी पूरी तरह नहीं विचारा जा सकता। अधूरी कल्पना के आधार पर नया काम वास्तविक रूप में नहीं वरन् आलंकारिक रूप में दिखाई पड़ता है। पहले काम को छोड़कर नया पकड़ लेने पर भी उस नये काम की भी वहीं गति होती है, जो पुराने की थी। कुछ समय बाद उसे भी छोड़कर नया ग्रहण करना पड़ता है। इस प्रकार ‘काम शुरू करना और उसे अधूरा छोड़ना’ इस कार्यक्रम की बराबर पुनरावृत्ति होती रहती है और अन्त में मनुष्य अपने असफल जीवन पर पश्चाताप करता हुआ, इस दुनिया से कूँच कर जाता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

बुधवार, 22 जुलाई 2026

‼️ आत्म नियंत्रण के लिए व्रत ‼️

किसी सत कार्य को पूरा करने का संकल्प व्रत कहलाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह आदि महाव्रत कहलाते हैं। धर्मचर्या प्रतिज्ञा लेना उसे निबाहना व्रत है। अनेक दिशाओं में बिखरी हुई इच्छाओं को एकत्रित करके एक कार्य में लगाने के लिए तथा उस कार्य में जागरुक रहने के लिए व्रत लिए जाते हैं। व्रत का एक संकल्प है जिसे लेकर मनुष्य अपने ऊपर एक स्वेच्छा उत्तरदायित्व लेता है। यह उत्तरदायित्व व्रत की प्रतिज्ञा के आधार पर पालन होता रहता है।

मन की मूल प्रवृत्तियाँ बड़ी स्वच्छंद हैं वे बार -बार इधर उधर भागती हैं। नित नये परिवर्तन, चंचलता तथा, अस्थिरता में मन को बड़ा रस आता है। भौंरा एक फूल से दूसरे पर उड़ता फिरता है, मन जंगली घोड़े की तरह जहाँ तहाँ उछल-कूद मचाना अधिक पसन्द करता है। किसी एक बात पर डटा रहना उसे रुचिकर नहीं होता। यदि स्वभाव को ज्यों का त्यों रहने दिया जाय तो किसी एक विचार पर स्थिर रहना या एक कार्य में जुटा रहना कठिन है। कितने ही मनुष्य जिन्होंने अपनी प्रवृत्तियों का नियंत्रण नहीं किया है अपने विचार और कार्य जल्दी-जल्दी बदलते रहते हैं, फलस्वरूप उनका जीवन क्रम सदा अस्त−व्यस्त रहता है। किसी भी दिशा में उन्हें सफलता नहीं मिलती।

आत्मोन्नति के लिए जीवन क्रम को, विचारधारा को, कार्य प्रणाली को पूर्ण तथा नियंत्रण ऐसा होना चाहिए कि कठिनाइयाँ आने पर भी निश्चित पथ से विचलित होने का अवसर न आवे। इस आत्म नियंत्रण की महत्वपूर्ण सफलता को प्राप्त करने के लिए संकल्प को, प्रतिज्ञा का, व्रत को, लेना पड़ता है। जिव्हा के चटोरेपन पर उपवास द्वारा वाचालता पर मौन द्वारा काम वासना पर ब्रह्मचर्य द्वारा नियन्त्रण स्थापित किया जाता है। “अमुक काम न करूंगा” या “इस मर्यादा के अन्दर करूंगा” इस प्रकार की कठोर प्रतिज्ञा करने से एक निश्चित संकल्प की स्थिरता होती है। यदि धार्मिक भावनाओं के साथ, ईश्वर की साक्षी में यह प्रतिज्ञा की जाती है तो उसे व्रत कहा जाता है। साधारण प्रतिज्ञाओं की अपेक्षा व्रत की शक्ति बहुत प्रबल होती है क्योंकि उसका अन्तःकरण के गहरे स्तल तक प्रभाव पड़ता है। साधारण प्रतिज्ञाएं तो टूटती भी रहती हैं पर व्रतों में ईश्वर की कृपा से आम तौर से सफलता ही मिलती है। उनके टूटने के अवसर बहुत ही कम आते हैं।

अध्यात्म का अर्थ क्या है? | Adhyatam Ka Arth Kya Hai | Dr Chinmay Pandya, 

व्रतों के साथ एक प्रकार की तपश्चर्या सम्बन्धित है। उनके द्वारा तितीक्षा का कष्ट सहने का अभ्यास बढ़ता है। नियत गतिविधि से कोई धार्मिक कृत्य, व्रतों के आधार पर बड़ी आसानी से चलते रहते हैं। एक व्रत के सफलतापूर्वक पूरा हो जाने पर साधक का साहस बढ़ जाता है। और अगले व्रतों के लिए वह अधिक दृढ़ हो जाता है। इसलिए आरम्भ छोटे व्रतों से किया जाता है। स्त्रियों में इस प्रकार के छोटे-छोटे व्रतों का बहुत प्रचलन है। वे संक्रान्ति से कोई धार्मिक अनुष्ठान आरम्भ करती हैं। एक वर्ष पूरा हो जाने पर उस कर्मकाण्ड का सफलतापूर्वक पूर्ण हो जाने के उपलक्ष्य में कुछ दान पुण्य करती हैं।

मार्गशीर्ष का, माघ का प्रातःकालीन शीतल जल का स्नान शीत की तितीक्षा का व्रत है। भूमि पर शयन, मौन, उपवास, भोजन में से कुछ वस्तुओं का त्याग, प्रातःकालीन शीघ्र जागरण नियत पूजन वन्दन क्रिया क्षेत्र की परिक्रमा, आहार-विहार दिनचर्या एवं किसी पद्धति में किन्हीं विशेष बातों का सम्मिलित करना या त्याग करना, सर्दी-गर्मी, भूख प्यास को सहना, एक प्रकार के तप हैं। इन्हें नियत समय पर धार्मिक भावनाओं के साथ आरम्भ और पूर्ण करना व्रत कहलाता है।

व्रतों के अपनाने से आत्म बल बढ़ता है। इसलिए आत्म मार्ग के पथिकों को समय-समय पर शारीरिक, मन, वाणी, व्यवहार और वस्तुओं सम्बन्धी व्रतों का पालन करते रहना चाहिए। कुछ समय तक के लिए जूता पहनना छोड़ देना, भूमि पर सोना, उपवास रखना, रात्रि जागरण, पैदल तीर्थ यात्रा, नमक छोड़ देना, सूर्य दर्शन के साथ भोजन करना, कम वस्त्रों का धारण, शीत ऋतु में प्रातः स्नान जैसे उपायों का अवलम्बन करते रहने से शरीर कष्ट सहिष्णु बनता है मौन, पूजन, आराधना, एकान्त सेवन, दान, परोपकार सत्संग, स्वाध्याय, म्यान जैसे कार्यों से मानसिक क्षमता एकाग्रता बढ़ती है। केवल सत्य ही बोलना, हिंसा न करना, धन का अधिक संचय न करना, काम सेवन अयुक्त मर्यादा से अधिक न करना। अन्योपार्जित धन से, कटुभाषण से बचना, आदि आत्मिक बातों से आत्म शक्ति बलवती होती है।

आत्म शुद्धि के लिए चांद्रायण या अर्ध चांद्रायण जैसे व्रत बहुत उपयोगी हैं। उनसे अनेक रोगों की अपने आप चिकित्सा भी हो जाती है। चांद्रायण व्रत एक महीने के लिए होता है। जिस आदमी का आहार एक सेर का हो वह पूर्णमासी के दिन पूर्ण आहार करके प्रतिदिन एक छटाँक घटाता जाय और अमावस्या को बिल्कुल निराहार रहे। फिर शुक्र पक्ष की प्रतिपदा से एक छटाँक आरम्भ करके प्रतिदिन एक छटाँक बढ़ाता जाय और पन्द्रह दिन में (अगली पूर्णमासी को) पूरे आहार पर पहुँच जावे। अर्ध चांद्रायण इसका आधा होता हो। पन्द्रह दिन में से सात दिन क्रमशः कम करे आठवें दिन निराहार रहे फिर उसी क्रम से बढ़ाकर अगले सात दिन में पूर्ण आहार पर पहुँच जावे। नये साधकों को अर्ध चांद्रायण ही सुगम पड़ता है।

व्रतों से साधक की आत्म शक्ति बढ़ती है और उसे बाह्य एवं आन्तरिक अनेक लाभों की उपलब्धि होती है।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1947

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शनिवार, 11 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (अंतिम भाग)

बहुत से लोग कपटपूर्ण स्थिति वाले भी होते है। वे ऊपर से तो बड़े सज्जन और अनुरूप दिखलाई देने का प्रयत्न करते रहते है। उसी के अनुरूप बोलते और उसी के अनुरूप आचरण भी प्रदर्शित करते है। पर यह सब उनका होता दिखावा ही। उनका इस प्रकार का बाह्य अन्तर के छल पर एक आवरण होता है। अवसर पाते ही ऐसे कपटी व्यक्ति दूसरों की हानि करते देर नहीं करते। वास्तविकता तो यह होती है कि बाहर का आदर्श उनका एक जाल के समान होता है, एक छल और छलावा होता है। अवसर पाकर दूसरों को छल लेने का, धोखा देने का एक उपाय मात्र होता है। ऐसे छली और कपटी लोग स्वप्न में भी कभी सुख शाँति नहीं पा सकते। वे ऊपर से कितनी ही शाँति-सन्तोष और स्थिरता का अभिनय करने में क्यों न सफल हो जायें पर अन्दर ही अन्दर अशाँत, भीत व्यग्र बने रहते है। उनकी अन्तरात्मा उनकी कुरूपता पर उन्हें धिक्कारती रहती है। उन्हें स्पष्ट अनुभव होता है कि वे जो कुछ दिखला और कर रहे है, वह सब मिथ्या है। एक दिन इसका परिणाम उन्हें भोगना ही होगा। उनकी अन्तरात्मा उन्हें क्षमा नहीं करेगी और तब समय आयेगा तो यही आत्मा जो मनुष्य का मित्र कही गई है, शत्रु बनकर उनके सामने खड़ी हो जायेगी। 

तन, मन और बुद्धि की सारी शक्तियाँ कुण्ठित कर देगी और उनको परिणाम भोगने के लिए निर्बल से निर्बल करके डाल देगी। उभय रूपी व्यक्ति इस सारे सत्य को भली प्रकार जानते है और भविष्य के भय से हर समय जलते गलते रहते है।

इसी अन्तर बाहर को अनुरूपता के कारण, विरोधी चिन्तन के फलस्वरूप इतना मानसिक ताप हो जाता है कि बहुत बार मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ तक पैदा हो जाती है। इसी विरोधाभास के कारण हृदय कमजोर होकर बैठ जाते है और कभी कभी लोग इस आपत्ति से पागल तक हो जाते है। अन्दर बाहर का यह विरोधाभास भयंकर यातना भरी स्थिति है। इसमें कैसे अबुद्धिमान लोग एक क्षण को भी शाँति के लिए तरसते रहते है। इस द्विविधि जीवन से उसी तरह बचते रहना चाहिये, जिस प्रकार सावधान लोग दुमुँही साँप से बचते है।

इन दोनों उपायों के साथ सुख-शाँति की सुरक्षा करने के लिये, एक छोटी-सी आवश्यकता और है। वह है ‘सामंजस्य’। बिना सामंजस्य बुद्धि के भी काम नहीं चल सकता। यदि कोई व्यक्ति अन्तर से आदर्शवादी है और उसका बाह्य व्यवहार भी उसी के अनुरूप है, तथापि सामंजस्य गुण का अभाव है, तब भी वह दूसरों के गलत काम देख सुनकर अथवा अनुभव करके अशाँत होता रहेगा। असामंजस्य बुद्धि वाले व्यक्तियों का यह एक मिराज हो जाता है कि जैसा मैं आदर्शवादी हूँ, वैसा ही हर आदमी बने और जब वे इसके विरुद्ध देखते है तो अशाँत और व्यग्र होते है। इस अच्छाई बुराई से भरे संसार में सबका एक सा होना सम्भव नहीं। जो जैसा है उसे उसके भाग्य और अन्त पर छोड़कर अपनी सुख-शाँति की रक्षा करना ही चाहिये। आवश्यकता भर ड़ड़ड़ड़ को समझा, सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न तो करना चाहिये किन्तु इस विषय में इस सीमा तक भावुक न हो जाये कि उसके दुर्भाग्य में अपना भाग बना ले। मानवीय सद्भावना रखते हुए उसे उसके कर्मों पर छोड़िये, न उस पर क्रोध करिये और न क्षोभ। यदि उसकी बुराई के छींटे अपने आप पर भी कभी आ जाते है तो उन्हें सहन करिये, साधारण सामंजस्य बनाए रहिये और इस प्रकार अपनी सुख शाँति को प्रभावित मन होने दीजिये, यही बुद्धिमानी है और यही उचित है।

इस प्रकार जीवन में यदि स्थायी सुख शाँति की आकांक्षा है तो संतुलन, समरूपता और सामंजस्य का अभ्यास करिये। इनका अवलम्बन लिए बिना अभिमत फल की आशा नहीं की जा सकती।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग ३)

जो मनीषी संतुलित मन वाले होते है। राग-द्वेष ईर्ष्या, स्पर्धा, उद्वेगों आवेशों से चलायमान नहीं होते, उनको और असन्तोष के कारण प्रभावित नहीं करने पाते। वे सुख दुख को धूप-छाँव की माया मात्र मानकर उनकी उपस्थिति में भीषण स्थिति में ही बने रहते है। न उनका मन विचलित होता है और न स्वयं वे। जिनका मन विविध विकारों और विकृतियों से भरा रहता है, जो क्षिप्त-विक्षिप्त और विक्षोभ के रोगी होते है, उनका मन संतुलित नहीं रहता, वे क्षण क्षण पर आन्दोलित और चलायमान होते हुए, सुख-दुख के झूले में झटके खाते रहते है। जिन्होंने प्रयत्नपूर्वक मन को स्थिरता, एकाग्रता और निरोध का अभ्यास करा लिया है, वे हर स्थिति और हर परिस्थिति में संतुलित रहकर सुख-शाँति के अधिकारी बनते है। मानसिक संतुलन सुख-सन्तोष का बहुत बड़ा आधार है, उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते ही रहना चाहिये।

अनुरूपता भी सुख शाँति का एक महत्वपूर्ण आधार है। अनुरूपता के अर्थ है अन्तर और बाह्य की अनुरूपता जिसका अन्तर पवित्र और आदर्शपूर्ण है, किन्तु उसके कार्य उसके अनुरूप नहीं है, तब भी सुख शाँति का सुलभ होना सम्भव नहीं। मन कुछ और चाहे, तन कुछ करता रहे- इससे भी मनुष्य में एक विरोध बना रहता है। अपनी अवहेलना होते रहने से मन सदा अक्लांत और संतत बना रहता है। जो अन्तर बाहर की द्विविधि स्थिति में पड़े रहते है, वे कभी संतुष्ट नहीं होते। उन्हें मन, की प्रेरणा पर चलने से तन की तृष्णायें सताती है और तन की प्रेरणा पर चलने से मन धिक्कारता है। बहुत बार बहुत से लोगों की नैतिक बुद्धि प्रबल होती है। अन्तरमन में आदर्श प्रेरणाएँ मचलती रहती है, किन्तु उन्होंने आदर्श व्यवहार का अभ्यास नहीं किया होता है। ऐसी स्थिति में उनसे यंत्रवत ही आदर्श से घिरे कार्य हो जाते है। जिससे पश्चाताप तो होता ही है साथ ही कर्मों के फलस्वरूप भी कष्ट और क्लेश उठाने पड़ते है।

इसी प्रकार बहुत से बाहर से बड़े सत्यनिष्ठ और आदर्शवादी होते है। वे सत्कर्म करने का प्रयत्न करते है। किन्तु उनका कुसंस्कारी मन उनका विरोध करता है। उनके किये पर स्वार्थ हानि, लाभ-हानि आदि का अभियोग लगाता है। बाहर से आदर्शवादियों को मन को ताड़ना में पड़ कर बड़ी भयंकर यातना उठानी पड़ती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग २)

सुख-दुख का मन की स्थिति पर निर्भर होने का प्रमाण यह है कि बहुत बार मन को स्थिति के अनुसार मनुष्य एक ही बात में विपरीत अनुभूतियाँ पाया करता है। जिस समय मन स्वस्थ और शाँत होता है, उस समय कोई अप्रियता भी विक्षोभ उत्पन्न नहीं करने पाती और जब मन की स्थिति प्रतिकूल होती है तो प्रिय बातें भी अच्छी नहीं लगती। जैसे जब कोई पिता विनोद पूर्ण मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की शरारत में भी उसे आनन्द आता है किन्तु जब वह मलिन मनःस्थिति में होता है तो बच्चों की उचित प्रसन्नता भी उस क्षुभित और दुःखी कर देती है। हानि लाभ की सूचनाओं में भी इसी तरह मनःस्थिति के अनुसार दुःख सुख होता रहता है। दुःख-सुख का जन्म बाहरी पदार्थों अथवा परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। उसका जन्म मन से मन में ही होता है। इसीलिए उन्हें मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है।

हमारे हृदय में सदा सुख का ही जन्म होता रहे, दुख की स्थिति में भी हम सुख का अनुभव करते रहें-इसके लिए आवश्यक है कि हम अपनी मनोभूमि को अनुकूल बनायें। मन की अनुकूलता का उपाय है ‘संतुलन’। संतुलन का आशय है, जल्दी जल्दी आन्दोलित न होना। उन्नति लाभ और सफलता के अवसरों पर खुशी से नाच उठना, हर्षातिरेक में जाना और गतिरोध, हानि अथवा असफलता के क्षणों में निराश, ह्रास अथवा शोकातिरेक से रो उठना वास्तव में मानसिक असंतुलन के लक्षण है।

अभ्यास पूर्वक यदि मनुष्य अपने इस मानसिक असंतुलन पर काबू रखने लगे तो वह एक सन्तोषप्रद सीमा तक सुख-दुख के घात-प्रतिघात से बचा रह सकता है। जो सुखात्मक अशाँत स्थिति में हर्षातिरेक से आन्दोलित हो उठेगा। दुःख के समय उसका शोक विह्वल हो उठना स्वाभाविक ही है। सुख का आघात तो एक हद तक सहा भी है। उससे अधिक हानि नहीं होती। केवल पुरुषोचित गाम्भीर्य और सुखोपभोग में समय की हानि अवश्य होती है बाकी हर्षातिरेक कोई गहरी हानि ऐसी हानि नहीं करता, जिसकी पूर्ति न हो सके अथवा दूर तक जिसका प्रभाव पड़े। किन्तु दुःख का आघात प्रायः असहाय होता है। उसके शक्तियों चेतना और यहाँ तक कि बुद्धि को भी दूरगामी हानि होती है। इसलिये सुख की अपेक्षा दुख के आघात से बचाव करना अधिक आवश्यक है। तथापि इसके उपाय मानसिक संतुलन की सिद्धि तभी सम्भव है, जब सुख के समय भी न आन्दोलित होने का अभ्यास रक्खा जाये। दुख के समय तो संभले रहने का प्रयत्न किया जाये और सुख के समय अतिरेक में बहते रहा जाये तो इस अधूरे प्रयत्न द्वारा प्रयोजन सिद्ध न होगा। यह तो एक और अभ्यास करना और दूसरी और उसे बिगाड़ लेना होगा।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

बुधवार, 8 जुलाई 2026

👉 सुख-दुःख मानसिक स्थिति पर अवलम्बित हैं (भाग १)

सुख-शाँति की उपलब्धि हो सकती है, यह ध्रुव सत्य है। जो लोग यह मान्यता बनाये बैठे है कि यह संसार तो दुःखों का आगार है, यहाँ पर सुख दुर्लभ है, नहीं मिल सकता-वे निश्चय ही भूल पर है। ऐसे लोग संसार के नाम से अपने मनोयोग का ही कथन करते है। चूँकि उनका अपना मानस जीवन शोक-संतापों और असन्तोष, अशान्ति से भरा होता है, इसलिए उन्हें यह सारा संसार ही दुःख का आगार आभासित होता है। जबकि वास्तविक बात यह है कि संसार में दुःख की अपेक्षा सुख की मात्रा अधिक है।

यदि ऐसा न होता तो यह संसार अब तक मनुष्यों से रिक्त हो चुका होता। दुःख और कष्टों में कोई जीता ही न रह पाता। इसके विपरीत बराबर देखा जाता है कि लोग उत्साहपूर्वक जी रहे है। संसार से मनुष्यों को प्यार है। वे इसकी अधिकाधिक उन्नति के लिए प्राणपण से प्रयत्नरत है। यदि उन्हें इस संसार में सुख-शाँति और आनन्द न मिलता तो क्यों तो वे इसमें जीना पसन्द करते और क्यों इसको सजाने का प्रयत्न करते। जिया तो सुख और आनंद के लिए जाता है, न कि दुख और शोक सन्ताप के लिये। हर मनुष्य के पास उसका एक सुख है, जो उसे मिलता है। अब यह भिन्न बात है कि वह उसको समझ न पाये और अपने किन्हीं भ्रमों और अज्ञान से आहत उल्टा अनुभव करे अथवा अपनी गलतियों से अपने सुख में आग लगाता रहे। मनुष्य निश्चय ही कतिपय सुधारों के आधार पर अपने सुख के भाग को स्थायी अधिक तथा निरापद बना सकता है। और उसे बनाना भी चाहिये।

किन्तु सुख भाग योंही सुरक्षित न हो जायेगा। उसके लिए कुछ प्रयत्न करना होगा। प्रयत्नों में सबसे पहला प्रयत्न है मन का परिष्कार। सुख दुख वस्तुतः और कुछ नहीं। वे मन की दो दिशाओं के भिन्न-भिन्न नाम मात्र है। इनका जन्म बाह्य संयोगों से न होकर मन से ही होता है। इसलिये सुख और दुःख को मनुष्य का मानस पुत्र कहा गया है। पिता स्वस्थ होता है सन्तान भी स्वस्थ होती है। पिता सज्जन होता है, सन्तान भी सज्जन होती है। पिता रोगी होता है, सन्तान भी वैसी होती है। पिता दुष्ट होता है, सन्तान का सज्जन होना कठिन है। इसी प्रकार मन यदि सुन्दर दशा में है, उससे तदनुरूप सुख का जन्म और यदि मन की दशा अच्छी नहीं है तो उससे दुःख का ही जन्म होना है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (अंतिम भाग)

यह सुरदुर्लभ मानव-जीवन बहुत मूल्यवान उपलब्धि है। यह कल्प-वृक्ष ओर कामधेनु की तरह फलदायी हैं। आप इससे जो चाहें प्राप्त कर सकते है। किंतु यह फलदायक तभी होता है, जब इसे हरा-भरा और प्रसन्न रक्खा जाए। यदि आप इसको चिन्ता की चिंता में जलाते रहेंगे, तब तो यह सूख जायेगा। इसके सारे गुण, सारी विशेषताएँ और सारे अनुग्रह नष्ट हो जाएँगे। चिन्ता छोड़िये, यह मनुष्य की जीवित अवस्था में ही मृत बना देती है। चिन्ता में जल-जलकर मर जाने से कहीं अच्छा है कि आप पुरुषार्थ के मैदान में ही इसका बलिदान दे दें। इस निरर्थक मृत्यु से तो यह सार्थक अंत कहीं अच्छा है। उसमें एक आदर्श और एक ऊँचाई तो है। चिन्ता छोड़कर प्रसन्न होइए। पुरुषार्थ करिये, आप अवश्य सफल होंगे।

आप अभाव-ग्रस्त है। जरूरतों से पीड़ित है तो इसमें क्षुब्ध अथवा असंतुष्ट रहने का क्या काम। असन्तोष आपकी इन पीड़ाओं का उपचार नहीं है। इनका उपचार है, अधिकाधिक परिश्रम एवं पुरुषता। यह वे पैसे का उपचार करने में आपका क्या जाता है? पौरुष तथा श्रमशीलता की शक्ति आपको ईश्वर की ओर से मिली ही है। उसका उपयोग करिए तब अपनी पीड़ाओं से मुक्त हो जाइए। और यदि प्रसन्नता की स्थिति में भी आप संतुष्ट रहते हैं तो समझ लीजिए कि आप लोभ तथा तृष्णा के पिशाच से ग्रस्त है। इसका उपचार संतोष तथा उदारता ही है। अपनी वृत्ति पर विचार कीजिये, उसे बुरा समझकर त्याग दीजिए। लोभ तथा तृष्णा का उपचार उसका तिरस्कार तथा संसार की अमरता में विश्वास करना है। इन्हीं उपायों का अवलम्ब लीजिये, आप असंतोष के पिशाच से छूट कर सुखी हो जाइये।

कोई भी विपत्ति अथवा आपदा क्यों न आ जाए, मूल कर भी उद्वेग में मत बह जाइए। ईश्वर की कृपा में अखंड विश्वास रखिए। अपनी आत्मा तथा बुद्धि-विवेक में अखंड विश्राम रखिए। शान्त एवं गम्भीर बने रहिए। सारी आपदायें आप पर से ऐसे गुजर जायेगी, जैसे किसी सुदृढ़ वृक्ष पर से तूफान निकल जाता है। उद्वेग एक मानसिक त्रुटि है।

निराशा, चिन्ता, असंतोष अथवा उद्वेग किन्हीं समस्याओं का हल नहीं है। यह मानव-जीवन प्रकृति के दोष हैं, जो काम बनाने के बजाय बिगाड़ देते हैं। इसको त्याग कर मनुष्य को सृजनात्मक गुणों का ही अवलम्ब लेकर चलना चाहिए। तभी वह सफल होगा और तभी सुखी तथा संतुष्ट।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram


धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...