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सोमवार, 11 मई 2026

👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच का भाव नहीं रखना चाहिये। आत्म-निर्भरता तो जीवनोत्कर्ष के पथ पर अग्रसर करती है। परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने का अद्भुत गुण मनुष्य में है। इसलिये अपने प्रत्येक कार्य की पूरी शक्ति से करना चाहिये। प्रत्येक कार्य ईश्वर का है, अतः उसे आत्म समर्पित भाव से करना चाहिये। कार्य में सद्भावना का प्रभाव उज्ज्वल चरित्र निर्माण के विकास के लिये होता है। कार्य करने का सौंदर्य, रुचिकर ढंग सफलता की निशानी है। कार्य की श्रेष्ठता में जीवन की श्रेष्ठता निहित है।

श्री रूजवैल्ट ने संकल्प किया था कि मैं ख्याति के खतरे में नहीं पड़ूंगा। हजारों प्रतिद्वंद्वियों के बीच भी अडिग बने रहे। लिंकन ने वकील से जब झूठे पक्ष की ओर से वकालत करने को कहा, तब वह बोला- ‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकता, जूरी से वार्तालाप के बीच मेरा मन मुझे धिक्कारेगा कि लिंकन तुम झूठे हो, झूठे हो।’’

नैथन स्ट्रांस से फर्म की सफलता का रहस्य पूछा गया, तो वह बोले- ‘‘यह परिणाम केवल ग्राहक के प्रति बरती गयी मेरी ईमानदारी है। मुझसे ग्राहक कभी अप्रसन्न होकर नहीं गया।’’ महानता के गुण अन्तःकरण में समावेश हो जाने पर सफलताएं कदम चूमती हैं।

आत्म-विश्वास और परिश्रम के बल पर जीवन को सार्थकता प्रदान की जा सकती है। भाग्य का निर्माणक मनुष्य स्वयं है। ईश्वर निर्णयकर्ता और नियामक है। मनुष्य परिश्रम से चाहे तो अपने भाग्य की रेखाओं को बना सकता है- परिवर्तित कर सकता है। हैनरी स्ल्यूस्टर कहता है कि- ‘‘जिसे हम भाग्य की कृपा समझते हैं, वह और कुछ नहीं। वास्तव में हमारी सूझ-बूझ और कठिन परिश्रम का फल है।” विश्वास रखें परिश्रम और आत्म-विश्वास एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। दोनों मिलकर के ही लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो पाते हैं। संकल्प करें-बाधाओं को हमेशा हँस-हँस स्वीकार करना है। डर कर मार्ग से हटाना नहीं है। लक्ष्य विहीन नहीं होना है। हमेशा गतिमान रहना है-गतिहीन नहीं होना है।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की लोकप्रियता और सफलता का कारण परिस्थितियों से समझौता है। विकट विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लेकिन वह अपने विश्वास को प्रबल बनाते गये। आखिर वह अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिये गये।

परिश्रम और सफलता की आशा करते हुए हमें लक्ष्य प्राप्ति के बीच आने वाले दुष्परिणामों को भी सामान्य करने का साहस करना चाहिये। “सर्वश्रेष्ठ के लिये प्रयत्न कीजिये मगर निकृष्टतम के लिये तैयार रहिये।” अँग्रेजी की यह कहावत बड़ी सार्थक है। हैनरी फोर्ड से एक व्यक्ति ने उनकी सफलता का रहस्य पूछा, तो उन्होंने कहा, “सफलता का सबसे पहला रहस्य है, हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना।’’

किसी को दोषी बताकर अपने को और निराश न करें। परिस्थितियों से समझौता करें और उन्हें अनुकूल बनायें। कुछ रास्ते बन्द हो जाने पर भी कुछ खुले रहते हैं। ऐसा नहीं है कि सारे रास्ते ही बन्द हो जायें। जब आप नयापन खोजेंगे तो आशा की नई किरण फूटने लगेगी। जीवन में प्रतिद्वन्द्व न जगायें, किसी से घृणा न करें, प्रेमपूर्ण व्यवहार रखें। हर्बर्ट स्वूप लिखता है, ‘सफलता का रहस्य तो मैं नहीं बता सकता, मगर असफलताओं का रहस्य जरूर बता सकता हूँ। वह है हर किसी को खुश करने की कोशिश।’ जीवन को आवश्यक कार्यों में व्यक्त रखें और अनावश्यक कार्यों में उलझकर व्यस्त रहने का रोना न रोये। आशावादी बनकर अपने जीवन और जन-जीवन की प्रेरणा श्रोत बनें।

📖 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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शनिवार, 9 मई 2026

‼️ यह सौभाग्य हर विवेकवान को मिल सकता है (भाग 2) ‼️

थोड़ी दूरदर्शिता और थोड़ी साहसिकता अपनाने पर उन तथाकथित परिस्थितियों का स्वरुप ही बदल सकता है जो लक्ष्य पथ पर चल सकने की असमर्थता विवशता बनकर सामने आती रहती है। मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसमें फंसकर छटपटाती और जिस-तिस को दोष है। किन्तु जब अपना चिन्तन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागो को समेटती, निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बन्धन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।

सामान्यता मनुष्य जीवन की गरिमा का समुचित उपयोग विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने में योग दान देकर इस सुअवसर को सार्थक बनाने में ही है। पेट प्रजनन तक अन्यान्य प्राणियों को सीमित रहना शोभा देता है, मनुष्य को नहीं। अन्य प्रणियों को साधन समिति मिले हैं। उनकी शरीर संरचना और बौद्धिक क्षमता इतनी ही है कि अपना निर्वाह भर चला सकें। किन्तु मनुष्य तो सृष्टा का युवराज है उसे इतना मिला है कि अपनी विशेषताओं के सहारे उसे तनिक-सा श्रम मनोयोग लगाकर चुटकी बजाते उपार्जित कर सकता है और शेष विभूतियों से आत्म-कल्याण और लाक-कल्याण जैसे उच्च उद्दयश्यों की पूर्ति कर सकता है।

अमृतवाणी:- गुरुदेव का दिव्य संदेश भक्ति नहीं, समर्पण चाहिए । पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी, https://youtu.be/SNV7PbxNCGI?si=5Yv6DHVs6v2ealjZ

इस सुअवसर को ठुकरा कर जो तृष्णा, वासना का लोभ-मोह का अनावश्यक भार संजोते और ढोते है, उनकी समझदारी को किस तरह सराहा जाये? दल-दल में घुमते जाना और उसकी सड़न से खीझते ओर जक्ड़न से चीखते जाना, किसी का लादा हुआ नहीं, स्वयं ही अपनाया हुआ दुर्भाग्य है। यह अनिवार्य नहीं, अपना ही चयन है। कोई चाहे तो स्थिति को किसी भी समय बदल भी सकता है। इसके लिए बहुत करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र दृष्टिकोण उलटना और कार्यक्रम बदलना पड़ता है। इस परिवर्तन से व्यवस्था बिगड़ती नहीं, वरन् और भी अच्छी बन जाती है। किन्तु उस अदूरदर्शिता को क्या कहा जाये जो अभ्यस्त ढर्रें के रुप में सिर से पैर तक लद गई है। कोई चाहे तो उसे सहज ही उतार भी सकता है।

माया छाया की तरह है वह आगे-आगे चलती और नेतृत्व करती है। किन्तु जब प्रकाश की ओर पीठ किये रहने की प्रक्रिया बदली जाती है, दिशा को उलट दिया जाता है तो सूर्य के सम्मुख होते ही छाया पीछे दौडने लगती है। परिस्थितियों की विवशता के सम्बन्ध में ऐसा ही सोचा जाता है कि वही बाधक हो रहा है। किन्तु ऐसा है नहीं। चिन्तन प्रतिगामी ढर्रा ही बसधक है। यदि आदर्शवादी आधार अपनाकर नये ढंग से सोचना और गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण कर सकना सम्भव हो सके तो प्रती होगा कि समस्त गुत्थ्याँ सुलझ गई। ऐसा मार्ग निकल आया जिस पर चलते हुए लोक और परलोक का सुव्यवस्थित रीति से सध सकना सम्भव ही नहीं सरल भी है। इस आन्तरिक परिवर्तन के लिए गतिविधियों के अमिट निर्धारण के लिए जो साहस जुटा लेते है वे देखते हैं प्रगति पथ पर बढ चलने की कितनी सहज सुविधा उपलब्ध थी। अदूरदर्शी आदतों ने ही उस सौभाग्य से मुँह मोड़ा था जो ईश्वर ने हर किसी को जीवन लक्ष्य पूरा कर सकने के निमित उदारता पूर्वक प्रदान की है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल

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शुक्रवार, 8 मई 2026

👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (अंतिम भाग)

इस संसार का निमार्ण सत और तम शुद्ध और अशुद्ध, भले और बुरे तत्वों से मिल कर हुआ है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जो पूर्णतः बुरा या पूर्णतः भला हो। समय-समय पर यह भली-बुरी परिस्थितियाँ दबती और उभरती रहती हैं। धूप-छाँव की तरह प्रिय और अप्रिय अवसर आते जाते रहते हैं। इनमें से किसे स्मरण रखा जाय और किसे भुलाया जाय यही विचार करना बुद्धिमत्ता का चिन्ह है। यदि हम दुखों को, अभावों को, असफलताओं को, दूसरों के अपकारों को ही स्मरण किया करें तो यह जीवन नरकमय दुखों से भर जायगा। हर घड़ी खिन्नता, निराशा और असंतुष्टि चित्त में छाई रहेगी। पर यदि दृष्टिकोण बदल लिया जाय और प्रिय प्रसंगों, सफलताओं, प्राप्त साधन सम्पदा के लोगों और दूसरों के किये हुए उपकारों को स्मरण किया जाय तो प्रतीत होगा कि भले ही थोड़े अभाव आज हों पर उनकी तुलना में सुख दायक वातावरण ही अधिक है, दुर्भाग्य की अपेक्षा सौभाग्य की ही स्थिति अपने को अधिक उपलब्ध है।

जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए सुविधा सामग्रियों की आवश्यकता अनुभव की जाती है, सो ठीक है। इसके लिए भी प्रयत्न करना चाहिए। पर यह भी न भूल जाना चाहिए कि जो प्राप्त है उसका सदुपयोग किया जाय। उपलब्ध साधनों का सदुपयोग यदि हम सीख जायं, हर वस्तु का मितव्ययितापूर्वक उपयोग करें, उसका पूरा-पूरा लाभ लें तो जो कुछ प्राप्त है वही हमारे आनन्द को अनेकों गुना बढ़ा सकता है। अपनी धर्मपत्नी जैसी भी कुछ वह है यदि उसे अधिक शिक्षित, अधिक सुयोग्य बनाया जाय और उसके स्वभाव तथा गुणों का अपने कार्यक्रमों में ठीक प्रकार उपयोग किया जाय तो यही पत्नी जो आज व्यर्थ का बोझ जैसी मालूम पड़ती है- अत्यंत उपयोगी एवं लाभदायक प्रतीत होने लगेगी। जितनी आजीविका आज अपने को प्राप्त है यदि उसके खर्च को ही विवेक और मितव्ययितापूर्वक ऐसी योजना बनाई जाय कि प्रत्येक पैसे से अधिकाधिक लाभ उठाया जा सके तो यह आज की थोड़ी आजीविका भी आनंद और सुविधाओं में अनेक गुनी वृद्धि कर सकती है। इसके विपरीत यदि अपना दृष्टिकोण अस्त व्यस्त है तो बड़ी मात्रा में सुख−साधन उपलब्ध होते हुए भी वे कुछ लाभ न पहुँचा सकेंगे वरन् ‘जी के जंजाल’ बनकर परेशानियाँ और उलझनें ही उत्पन्न करेंगे।

सुखी जीवन की आकाँक्षा सभी को होती है। वह उचित और स्वाभाविक भी है पर उसकी उपलब्धि तभी संभव है जब हम अपने दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें। सुधरा हुआ दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें सुधरा हुआ दृष्टिकोण स्वल्प साधनों और कठिन परिस्थितियों में भी शान्ति और सन्तोष को कायम रख सकता है। गरीबी में भी लोग स्वर्ग का आनन्द उपलब्ध करते देखे जाते हैं। पर यदि दृष्टिकोण अनुपयुक्त है, तो संसार के समस्त सुख साधन उपलब्ध होते हुए भी हमें सुखी न बना सकेंगे। अतएव सुखी जीवन की आकाँक्षा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित है कि अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहे।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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‼️ यह सौभाग्य हर विवेकवान को मिल सकता है (भाग 1) ‼️

अखण्ड-ज्योति परिजनों ने लम्बे समय से जो पढ़ा और समझा है अब उसे मस्तिष्क की उथली परतों तक सीमित न रहने देकर अन्तराल की गहराई में उतरना चाहिए और भुलकर आगत के सम्बन्ध में नई नीति निर्धारण कर सकने योग्य विवेक एवं साहस जुटाना चाहिए।

समस्याएं जानी पहचानी हैं। समाधान भी प्रायः सभी विचारवानों को विदित हैं। फिर से उस सर्न्दभ में अधिक ध्यान देने के लिए इसलिए कहा जाता है कि तथ्यों पर जिस हलके ढंग से विचार किया जाता रहा है वह अपर्याप्त है। ढर्रे आवरण उठाकर हमें वास्तविक को देखना चाहिए। इसी को तत्वदर्शन या ईश्वर दर्शन कहतें हैं। इसी का नाम आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म निर्वाण है। ढर्रे का अभ्यास ही भव बन्धन है। माया अर्थात् आवास्तविकता की खुमारी। इसे हटाया और तथ्य को अपनाया जा सके तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति के मार्ग का अवरोध मिट गया।

मनुष्य जीवन ईश्वर का बहुमूल्य अनुदान है। इसे इनाम नहीं अमानत माना जाय। भव-बन्धनों के कुचक्र से निवृति, पर्णता की प्राप्ति-र्स्वग और मुक्ति की उपलब्धि-सिद्धियों की विभूति आत्मा और परमात्मा की एकता है कि यर्थर्थता को हृदयंगम करना सम्भव हो सका या नहीं ?

पूज्य गुरुदेव के "दस सूत्रीय कार्यक्रम" क्या है ? अमृत सन्देश, https://youtu.be/osWWkn6frZ0?si=yGzD1yJe13boxQpo

कहने सुनने को तो आदर्शवादी बकवास आये दिन चलती रहती है, पर वस्तुतः उसमें कुछ सार नहीं। अध्यात्म का लाभ एवं चमत्कार मात्र उन्हीं को मिलता है जो उसे कल्पना लोक की उड़ान न मानकर जीवन-दर्शन के रुप में मान्यता देते और नदनुरुप दिशा धारा का निर्धारण करते हैं।

युग-सन्धि की ब्रह्म वेला में जागृत आत्माओं का आत्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन की यथार्थत के साथ जुड़ सके तो काम चले। सोचा जाय कि अन्य प्राणीयों की तुलना में मनुष्य को जो ‘विशेष’ मिला है वह शौक-मौज भर के लिए है ? विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के-पूर्णता तक पहुँचने के ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस र्स्वण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है जैसा कि अब तक किया जाता रहा ? लोग कहते और क्या करते हैं इसे देखने, सुनने और उन्हीं का अनुकरण करने से तो एक के पीछे एक एक करके गर्त में गिरने वानी भेड़ों की तरह अपनी भी दुर्गति ही होनी है। क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल

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गुरुवार, 7 मई 2026

👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 3)

यदि दोनों प्रकार के प्रयत्न करते हुए भी समस्या हल नहीं होती तो किसी प्रकार काम चलाऊ रास्ता निकाल कर उसी में प्रसन्न और संतुष्ट रहने की कोशिश करनी चाहिए। अपने से अधिक दुखी लोगों के साथ अपनी तुलना करने से मनुष्य यह अनुभव कर सकता है कि कुछ कष्ट होते हुए भी भगवान पर उसकी बड़ी कृपा है कि उसने उतना दुखी नहीं बनाया जितने अन्य लोग दुखी हैं। अस्पतालों में पड़े हुए बीमार, अंग-भंग, साधनहीन, संकट जंजालों में फँसे हुए, पारिवारिक उलझनों में बुरी तरह उलझे हुए अनेकों व्यक्ति इस संसार में बहुत ही दयनीय स्थिति में जीवन यापन करते हैं। उनसे अपनी तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि उनकी अपेक्षा अपनी स्थिति हजारों गुनी अच्छी है। यदि पशु पक्षियों, कीट पतंगों से अपनी तुलना की जाए तब तो निश्चय ही यह प्रतीत होगा कि अपने को प्राप्त सुविधाएं इतनी अधिक हैं कि इन थोड़ी सी कठिनाइयों को नगण्य ही माना जा सकता है।

इसी प्रकार जो व्यक्ति अभी हमें बुरे और अपने शत्रु प्रतीत होते हैं, उनके कुछ अपकारों की बात सोचना छोड़कर यदि उनके उपकारों को उनके द्वारा किये हुए सद्व्यवहारों को स्मरण करें तो निश्चय ही वे हमें शत्रु नहीं मित्र दिखाई पड़ेंगे। माता-पिता ने हमें एम.ए. तक नहीं पढ़ाया, यदि वे उतनी शिक्षा दिला देते तो आज हम ऊँची सर्विस प्राप्त करते होते, यह विचार मन में आने पर माता-पिता शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं उनके प्रति द्वेष एवं दुर्भाव उत्पन्न होता है। पर यदि हम अपनी विचार धारा बदल दें और उनने जिन आर्थिक कठिनाइयों में रहते हुए उतने बड़े कुटुम्ब का पालन करते हुए, हमारा पालन पोषण किया एवं जितनी संभव थी उतनी शिक्षा व्यवस्था की, तो उनके उपकारों के प्रति मन श्रद्धा से झुक जाएगा और वे मित्र ही नहीं देवता के समान उपकारी प्रतीत होंगे।

दृष्टिकोण में थोड़ा अन्तर कर देने से हम असंतुष्ट और खिन्न जीवन को संतोष में परिणित कर सकते हैं। ईश्वर ने सुर दुर्लभ मानव जीवन प्रदान करके इतनी बहुमूल्य सम्पदा हमें प्रदान की है कि उसका मूल्य लाखों करोड़ों रुपयों में भी नहीं चुकाया जा सकता। जैसा शरीर कुल, सम्मान, विद्या, परिवार आदि अपने को प्राप्त है उसमें से प्रत्येक को विशेषता और सुविधा का चिन्तन करें, साथ ही यह भी सोचें कि यदि यह बातें उपलब्ध न होती तो उनके अभाव में अपना जीवन कितना नीरस होता- तो इस चिन्तन से हमें प्रतीत होगा कि हमारी वर्तमान परिस्थिति दुख दारिद्र से भरी नहीं, वरन् सुख सुविधाओं से सम्पन्न है।

दूसरों के द्वारा अपने प्रति जो उपकार हुए हैं उनका यदि हम विचार करते रहें तो यही अनुभव होगा कि हमारे निकटवर्ती सभी लोग बड़े उपकारी और सेवाभावी और स्वर्गीय प्रकृति के हैं। इनके साथ रहने में अपने को सुख ही सुख अनुभव करना चाहिए। इसके विपरीत यदि उनके दोष ढूँढ़ने लगे और उन घटनाओं को स्मरण किया करें जिसमें उनने कुछ अपकार किये तो हमें अपने सभी स्वजन संबंधी बड़े दुष्ट प्रकृति के, अपकारी, असुर एवं शत्रु प्रतीत होंगे और ऐसा लगेगा कि इन लोगों का संपर्क हमारे लिए नरक के समान दुखदायी है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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बुधवार, 6 मई 2026

👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 2)

जीवन को शान्तिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँके। वरन् उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में है तो हमारी अनेकों दुश्चिंताएं आसानी से नष्ट हो सकती हैं।

एक विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। फेल होने के समाचार से उसका मानसिक सन्तुलन डगमगा जाता है। वह इस असफलता को वज्रपात जैसी मानता है। सोचता है सारी दुनिया मुझे धिक्कारेगी, मूर्ख या आलसी समझेगी, मित्रों के सामने मेरी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जायगी, अभिभावक कटु शब्द कह कर मेरा तिरस्कार करेंगे, यह कल्पना उसे असह्य लगती है, चित्त में भारी क्षोभ उत्पन्न होता है और रेल के आगे कटकर, नदी में कूद कर या और किसी प्रकार वह अपनी आत्महत्या कर लेता है। घर भर में कुहराम मच जाता है। वृद्ध माता-पिता रो-रो कर अन्धे हो जाते हैं। एक उल्लास पूर्ण हंसते खेलते घर का वातावरण शोक, क्षोभ और निराशा में परिणत हो जाता है। इस विपन्न स्थिति को उत्पन्न करने में सारा दोष उस गलत दृष्टिकोण का है जिसके अनुसार एक छोटी सी असफलता का मूल्य इतना बढ़ा-चढ़ा कर आँका गया।

एक दूसरा विद्यार्थी भी उसी कक्षा में अनुत्तीर्ण होता है। उसे भी दुख होता है पर वह वस्तुस्थिति का सही मूल्याँकन कर लेता है और सोचता है इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा फल 43 प्रतिशत ही तो रहा। मेरे समान अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या 57 प्रतिशत है। वर्तमान परिस्थितियों में अनुत्तीर्ण होना एक साधारण सी बात है इसमें सदा विद्यार्थी ही दोषी नहीं होता वरन् प्रायः शिक्षकों की उदासीनता बिना पढ़े हुए विषयों के पर्चे आ जाना और नम्बर देने वालों की लापरवाही भी उसका कारण होती हैं। इस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गये तो अगले वर्ष अधिक परिश्रम करने से अच्छे डिवीजन में उत्तीर्ण होने की आशा रहेगी आदि बातों से अपने मन को समझा लेता है और अनुत्तीर्ण होने की खिन्नता को जल्दी ही अपने मन में से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है।

दोनों ही छात्र एक ही समय एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे। एक ने आत्महत्या कर ली दूसरे ने उस बात को मामूली मान कर अपना साधारण क्रम जारी रखा। अन्तर केवल समझ का था परिस्थिति का नहीं। यदि परिस्थिति का होता तो दोनों को समान दुख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी। पर ऐसा होता नहीं, इससे स्पष्ट है कि परिस्थितियों के मूल्याँकन में गड़बड़ी होने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।

हमें चाहिए कि अपनी कठिनाइयों को बड़ा चढ़ा कर न देखें, वरन् उनको दूसरे अधिक आपत्ति ग्रस्त लोगों के साथ तुलना करके अपने आपको अपेक्षाकृत कम दुखी अनुभव करें। आपको आर्थिक कठिनाई रहती है, सभ्य सोसाइटी के लोगों जैसा जीवन यापन करने में वर्तमान आर्थिक स्थिति कुछ दुर्बल मालूम पड़ती है। थोड़ा आर्थिक अभाव अनुभव होता है और चिन्ता रहती है। इस स्थिति से छुटकारा प्राप्त करने के कई उपाय हो सकते हैं एक यह कि कुछ अधिक उपार्जन करने का प्रयत्न किया जाय। वर्तमान समय में जितना श्रम, समय और मनोयोग व्यवसाय में लगाया जाता है उससे अधिक लगाया जाए, कोई और सहायक धंधा ढूंढ़ा जाए या वर्तमान व्यवसाय में ही जो आय बढ़ने के उपाय संभव हों और दौड़-धूप करके जुटाया जाए। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि अपने खर्चे कम किये जाएं। दुनिया में सभी तरह के गरीब-अमीर लोग रहते हैं, अपनी-अपनी आमदनी के अनुसार जीवन यापन करने की योजना बनाते हैं। यदि अपनी आमदनी कम है तो क्यों न कम खर्च का बजट बनाकर काम चलाया जाए? खर्चा घटा लेने से कुछ सुविधाएं कम हो सकती हैं पर उस कमी का दुख उतना न होगा जितना बढ़े हुए खर्च की पूर्ति न होने पर दिन रात चिन्तित रहने के कारण होता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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मंगलवार, 5 मई 2026

👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 1)

अधिकाँश व्यक्ति इस संसार में ऐसे हैं जो अपने आपको बहुत, हैरान, परेशान, अभागा और संकट ग्रस्त मानते हैं। इनकी मनोव्यथा सुनी जाय और ये जी खोल कर अपनी अन्तर्वेदना सुनावें तो ऐसा लगता है मानो भगवान् ने संसार का सारा दुख इन्हीं के मत्थे पटक दिया है, बेचारे रात दिन दुखी दशा पर खिन्न रहते हैं, रात-रात भर रोते रहते हैं, नींद नहीं आती। चिन्ता और वेदना में घुलते रहते हैं। कई बार तो ऐसा होता देखा गया है कि दुखी होकर वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। कई घर छोड़ कर चले जाते हैं, साधु बाबा जी बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद ऐसा करने से उनकी अन्तर्व्यथा दूर हो जायगी।

संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जिसे सब सुख हों, किसी बात का अभाव न हो, सारी परिस्थितियाँ मनोनुकूल ही हों, कोई कष्ट न हो, कभी असफलता न मिले, कोई जिसका विरोधी न हो, ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर ढूंढ़े न मिलेगा। जहाँ अनेक सुख साधन मनुष्य को भगवान ने दिये हैं वहाँ कुछ थोड़े अभाव रखे हैं। विवेकशील व्यक्ति जीवन में उपलब्ध सुख सुविधाओं का अधिक चिन्तन करते हैं और उन उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते हुए प्रसन्न रहते हैं और उस कृपा के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहते हैं। थोड़े से अभाव एवं कष्ट उन्हें वैसे ही कौतूहल वर्धक लगते है जैसे माता अपने सुन्दर बालक के माथे पर काजल की बूँद लगा कर “डिढौरा” बना देती है कि कहीं ‘नजर’ न लग जाय।

इसके विपरीत अनेकों लोग उपलब्ध अनेकों सुख साधनों को तुच्छ मानते हैं और जो थोड़े से कष्ट एवं अभाव हैं उन्हें ही पर्वत तुल्य मान कर अपने आपको भारी विपत्तिग्रस्त अनुभव करते हैं। ऐसे लोग निरन्तर असन्तुष्ट रहते हैं, अपने सभी सम्बन्धित लोगों पर दोषारोपण करते रहते हैं ईश्वर को गाली देते हैं कि उसने हमें अमुक अभाव क्यों दिया? भाग्य को कोसते हैं कि वह इतना दुर्भाग्यपूर्ण क्यों है? माता-पिता और अभिभावक को बुरा कहते हैं कि उन्होंने अमुक साधन नहीं जुटाये जिससे हम उन्नतिशील स्थिति में होते? मित्रों और अफसरों को कोसते हैं कि उन्होंने उन्नति के लिए असाधारण सहयोग देकर बड़ा क्यों नहीं बना दिया? परिस्थिति,ग्रहदशा,दुनिया की बेवफाई, कलियुग का जमाना आदि जो भी उनकी समझ में आता है उसे बुरा भला कहते हैं और अपनी कठिनाईयों का दोष उनके मत्थे मढ़ते रहते हैं।

ऐसे लोगों की अधिकाँश मानसिक शक्ति इस रोने झींकने में ही चली जाती है। उनके बहुमूल्य समय का बहुत सा भाग इस कोसते रहने की प्रक्रिया में नष्ट हो जाता है। जिस समय का उपयोग वे अपनी कठिनाइयों को पार करने का उपाय सोचने और प्रयत्न करने में कर सकते थे उसको वे अपनी खिन्नता बनाये रखने और बढ़ाने में करते हैं। यह तरीका अपने समय और बल को नष्ट करने का ही है इसमें लाभ कुछ नहीं, उलटे उन कीमती शक्तियों के नष्ट होने की हानि ही है जिन्हें यदि बर्बाद होने से बचा लिया गया होता तो वे कठिनाईयों का एक बहुत बड़ा भाग आसानी से हल कर देतीं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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सोमवार, 4 मई 2026

👉 संकल्प बल कैसे बढ़ाएं? ( भाग 2)

मन की शक्ति को बढ़ाकर संकल्पों को जोरदार बनाने का दूसरा साधन है चित्त की एकाग्रता। हम ऊपर इस बात को दिखला चुकें हैं कि जिन विषयों की ओर वृत्ति लगाई जाती है, उन्हीं के रूप को मानसिक देह ग्रहण कर लेती है। पातंजलि योग सूत्र में “चित्तवृत्ति के निरोध” का यही अभिप्राय है कि बाह्य सृष्टि के मनोरम प्रतिबिंबों को जो प्रतिक्षण पलटते रहते हैं रोका जावे। मानसिक देह की निरन्तर चंचल वृत्तियों को रोकना, और नियत विशेष ध्येय के आकार में उनको संलग्न अथवा स्थित करना, एकाग्रता का प्रथम अंग है। यह एकाग्रता जड़रूप (मानसिक) देह से सम्बन्ध रखती है। उसको चित्तवृत्ति के साथ इतना संयुक्त करना चाहिये कि वह हमारे अन्तर में उतर जावें। यह एकाग्रता का दूसरा अंग होता है।

एकाग्रता के अभ्यास में अपने चित्त को केवल एक ही मूर्ति (रूप) पर टिकाया जाता है। अभ्यास करने वाले (ज्ञाता) का पूरा ध्यान एक ही लक्ष्य पर बिना हल चल के दृढ़ता पूर्वक स्थिर किया जाता है। बाह्य विषयों से आकर्षित होकर चित्त को निरन्तर इधर उधर जाने और भिन्न भिन्न बातों की चिन्ता करने से रोका जाता है। इसके लिये इच्छा शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है कि वह मन के अन्यत्र भटकते ही उसे पुनः खींच कर लक्ष्य पर ले आवे।

जब चित्त एक मूर्ति को स्थिरता से धारण कर लेता है, और ज्ञाता (अभ्यास) एकाग्र भाव से उसका ध्यान करता है, तो उसको ध्येय वस्तु का इतना ज्ञान हो जाता है जितना किसी अन्य वाचिक वर्णन (बातचीत) से नहीं हो सकता। किसी चित्र या प्राकृतिक दृश्य का जितना साँगोपाँग ज्ञान उसके प्रत्यक्ष दर्शक से होता है उतना उसके वर्णन को पढ़ने अथवा सुनने से नहीं हो सकता। पर यदि हम ऐसे वर्णन पर चित्त को एकाग्र कर लें तो उसका चित्र मानसिक देह पर बन जायेगा, और तब हमको जितना लाभ होगा उतना केवल शब्दों का पाठ करने से नहीं हो सकता। शब्द तो किसी विषय के संकेत मात्र हैं और उन पर मनन करने से उनकी मूर्ति हमारे मन में उत्पन्न हो सकती है। अगर हम उस पर बराबर ध्यान लगाते रहें तो वैसे वैसे ही उसका रूप हमारे मन में अधिकाधिक स्पष्ट होता जायेगा और हम उसके विषय में कही अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेंगे।

संकल्प शक्ति का विकास करने के जो अनेक मार्ग हैं उनमें सत्संग अथवा स्वाध्याय तथा चित्त को एकाग्र बनाना मुख्य है, क्योंकि उनको मनुष्य थोड़े प्रयत्न से कहीं भी प्राप्त कर सकता है। चित्त के एकाग्र होने से प्रत्येक प्रकार के जप और भजन का फल स्पष्ट देखने में आता है।

.....समाप्त
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रविवार, 3 मई 2026

👉 संकल्प बल कैसे बढ़ाएं? ( भाग 1)

सब तरह के आध्यात्मिक साधन का आधार मन के संयम और नियंत्रण पर रहता है। मन ही इन्द्रियों का स्वामी है और इन्द्रियाँ उस हालत में सुमार्ग पर चल सकती हैं जब कि मन कुमार्ग गामी न हो। यदि मन हमारे वश में नहीं है, उच्छृंखल है, तो उससे कोई भजन साधन ठीक तरह से हो सकना असंभव है और उस हालत में आत्मोन्नति की आशा ही व्यर्थ है।

मन को साधने में बहुत कुछ सहायता ऐसे पुरुषों की संगति से मिल सकती है जिन्होंने हमसे अधिक उन्नति करली है और जिनकी मानसिक शक्ति हम से बहुत अधिक बड़ी चढ़ी है। उच्च विचार वाला पुरुष हमें वास्तविक सहायता दे सकता है, क्योंकि जिस प्रकार के कम्प (गति) हम पैदा कर सकते हैं, उससे अधिक उच्च प्रकार के कम्प (गति) वह पुरुष पैदा करके जगत में प्रेरित करता रहता है। पृथ्वी पर पड़ा हुआ लोहे का टुकड़ा अपने आप गरम नहीं हो सकता, पर वह अग्नि के समीप रख दिया जाता है तो उष्ण कम्पों को ग्रहण करके गरम हो जाता है।

उसी प्रकार जब हम किसी शक्तिशाली विचार वाले महापुरुष के पास पहुँचते हैं, तो उसके मानसिक कम्पन हमारी देह पर प्रभाव डालते हैं और उसमें भी वैसे ही सजातीय कम्प उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण हमारा स्वर उनसे मिल जाता है अर्थात् उनके और हमारे मन में एक ही प्रकार के संकल्पों की प्रेरणा होती है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी मानसिक शक्ति बढ़ गई है और हममें ऐसे सूक्ष्म भावों को ग्रहण करने की सामर्थ्य आ गई है जो साधारण अवस्था में हमारी समझ आ सकने में बहुत कठिन थे। किन्तु जब हम फिर अकेले रह जाते हैं तो सूक्ष्म भाव ग्रहण करने की शक्ति फिर गायब हो जाती है।

श्रोतागण एक बड़े व्याख्यानदाता का भाषण सुनने जाते हैं, उसे भली प्रकार समझते जाते हैं और उसके सार को तत्काल बुद्धि में ग्रहण कर लेते हैं। वे प्रसन्न होकर लेक्चर से वापिस जाते हैं और दिल में समझते हैं कि आज हमें ज्ञान का उत्कृष्ट लाभ हुआ। पर अगले दिन जब वे किसी मित्र से उस व्याख्यान की चर्चा करते हैं, तो वे उन बातों को स्पष्ट रूप से नहीं बतला सकते, जो कल उनकी समझ में भली प्रकार आई थी। उस समय उनको यही कहना पड़ता है कि निःसंदेह कल मैंने व्याख्यान का आशय भली प्रकार समझ लिया था, पर आज वह पकड़ में नहीं आता।” इसका कारण यही होता है कि व्याख्यानदाता के भावों का अनुभव हमारे मानसिक शरीर और जीवात्मा को तो हो चुका है, पर वह अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि हम उसको बाह्य रूप में भी स्पष्ट प्रकट कर सकें। पहले दिन जब हम व्याख्यान के असली मर्म को भली प्रकार समझ रहे थे तब सामर्थ्यवान उपदेशक के शक्तिशाली कम्पों ने जिन रूपों की रचना की थी और उनको हमारी मानसिक देह ने ग्रहण कर लिया था। पर दूसरे दिन जब उन बातों को दोहराने में असमर्थता प्रतीत होती है तो इससे यह प्रकट होता है कि हमको उन विचारों को कई बार दोहराना चाहिये। वैसे भाषण कर्ता और श्रोता में एक ही शक्ति काम कर रही है, किन्तु एक ने उसे उन्नत बना लिया है और दूसरे में वह सोई हुई शिथिल पड़ी हुई है। ऐसी शिथिलता किसी बलवान व्यक्ति की शक्ति का संसर्ग होने से तेज हो सकती है।

अपने से अधिक उन्नत पुरुषों की संगति से दूसरा लाभ यह भी होता है कि उनके संसर्ग से हमारा कल्याण होता है और उनके उत्साह प्रदायक प्रभाव से हमारी वृद्धि होती है। इस रीति से सद्गुण शिष्यों को अपने समीप रख कर जो लाभ पहुँचा सकते हैं, वह केवल भाषण द्वारा उपदेश करने की अपेक्षा कहीं अधिक होता है। यदि इस प्रकार बिल्कुल निकट रहने का अवसर न मिल सके तो पुस्तकों द्वारा भी बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। पर पुस्तकें भी सावधानी के साथ चुनी जानी चाहिये। किसी वास्तविक महापुरुष के ग्रन्थ को पढ़ते समय हमें पूर्ण रीति से शिष्य की भावना रखनी उचित है। अर्थात् हमको अपना चित्त ऐसी निरपेक्ष अवस्था (साम्यावस्था) में रखना चाहिये कि जिससे हम उसके संकल्पों के कम्पों को, जहाँ तक संभव हो ग्रहण कर सकें। जब हम शब्दों को पढ़ चुकें तो हमें चाहिये कि उन पर ध्यान देवें, उनका चिन्तन करें, उनके असली आशय को अनुभव करें, उनके तमाम गुप्त अर्थों को उनमें से निकाल लेवें। हमारी चित्त वृत्ति एकाग्र होनी चाहिये ताकि शब्दों के अवसरण को छोड़कर हम ग्रंथकर्ता की चित्त वृत्ति का भाव ग्रहण कर सकें। इस प्रकार का पाठ करना अथवा पढ़ना शिक्षा का काम देता है और हमारी मानसिक उन्नति में बड़ा सहायक होता है। जिस पाठ में इतना प्रयत्न नहीं किया जायगा वह दिल को बहलाने वाला और हमारे ज्ञान भण्डार को कुछ बढ़ाने वाला ही हो सकता है, पर उससे हमारी उतनी मानसिक उन्नति और वृद्धि नहीं हो सकती जैसी कि पूर्ण चिन्तन और मनन द्वारा संभव होती है।

.......क्रमशः जारी
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शुक्रवार, 1 मई 2026

👉 उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है। (अंतिम भाग)

इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि जो धर्म अथवा दर्शन आधुनिक विज्ञान के विरुद्ध होगा, उसकी गिनती आज दंभ और पाखंड में ही की जायगी। यदि मानव जाति को प्रगति और कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करना है तो विज्ञान तथा धर्म और राजनीति तथा धर्म के बीच पाई जाने वाली सब प्रकार की विसंगतियों (परस्पर विरोधी बातों) का अंत कर देना चाहिये। इसी से मनुष्यों में ऐक्य की स्थापना होकर शाँति का प्रसार हो सकता है। सौभाग्यवश भारतवर्ष का दर्शनशास्त्र अत्यंत प्राचीन होने पर भी विज्ञान के बहुत कुछ अनुकूल है। उस धर्म मूलक दर्शन शास्त्र से जो नीति शास्त्र विकसित हुआ है, वह बहुत न्यायपूर्ण है और उसके आधार पर आध्यात्मिकता की रक्षा करते हुये समाज का उचित आर्थिक और राजनैतिक संगठन किया जा सकता है। विदेशी लोगों को यह बात कुछ आश्चर्य जनक जान पड़ती है, पर इसमें संदेह नहीं कि विकास के सिद्धान्त और नीतियुक्त शासन का निरूपण हिंदू धर्म में पहले ही कर दिया गया है। हिंदू धर्म के मुख्य आधार वेदान्त में परमात्मा की जो परिभाषा की गई है, वह किसी ऐसे परमात्मा से सम्बन्ध नहीं रखती जिसे मनुष्य की कल्पना ने उत्पन्न किया हो। गीता में ईश्वर की चर्चा जिन शब्दों में की गई है और उसके जो लक्षण बतलायें गये हैं उनसे वैज्ञानिक भी विरोध नहीं कर सकते। नौवें अध्याय में एक जगह स्पष्ट कह दिया गया है-

“सब चराचर सृष्टि मुझ में स्थिति है, और फिर आश्चर्य की बात यह है कि मैं उससे अलग हूँ और प्रकृति अकेली ही काम किया करती है। प्रकृति ही मेरे हस्तक्षेप बिना, चर और अचर सृष्टि को उत्पन्न करती है।”

उपनिषदों में स्पष्ट शब्दों में यह घोषित कर दिया गया है कि आदि शक्ति का क्रम से जो विकास हुआ है, उसी से विश्व की उत्पत्ति हुई है। यही बात आज कल के वैज्ञानिक भी कह रहे हैं। विज्ञान पिछले कुछ वर्षों में अणु और परमाणुओं द्वारा जगत के निर्माण के जिस सिद्धान्त पर पहुँचा है, वह भी हिंदू दर्शन में ज्यों का त्यों हजारों वर्ष पहले से मिलता है।

पर इन बातों से आगे बढ़कर उपनिषदों ने यह भी प्रतिपादित किया है कि प्रकृति से उत्पन्न होने पर भी मनुष्य को आत्मा की ही भक्ति और खोज करना चाहिये। क्योंकि आत्मा ही सत्य है और जो व्यक्ति उससे विमुख होकर केवल भौतिक उन्नति पर ही ध्यान देते है वे अंत में भ्रष्टाचार और कपट के कैद में फँस जाते हैं।

व्यक्तिगत लाभ का उद्देश्य न रख कर केवल समाज के हित की दृष्टि के काम करना ही भगवत् गीता में जीवन का मार्ग बतलाया गया है। उसमें सब कामों को समान रूप से प्रतिष्ठा के योग्य बतलाया गया है, और प्रत्येक कार्य को निर्लिप्त भाव से सच्चाई के साथ करने पर जोर दिया गया है। वास्तव में गीता एक अनोखी रीति से धार्मिक दृष्टि कोण से समाजवादी विचारधारा का प्रतिपादन करती है। गीता में कहा गया है कि “अपने नियत कर्मों को उचित रीति से पूरा करते रहना ईश्वर की बहुत बड़ी उपासना है।”

वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार समाज-संगठन का उचित मार्ग यही है कि कुछ लोगों को विशेष अधिकार प्राप्त कर लेने के बजाय समस्त कामों का बँटवारा जनसाधारण के हित की दृष्टि से बुद्धिमत्ता पूर्वक किया जाय। यदि हम चाहते हैं कि समाज व्यक्तिगत जीवन का इस प्रकार नियंत्रण करें कि प्रत्येक व्यक्ति सुविधापूर्वक जीवन निर्वाह कर सके, तो यह कार्य केवल कानून, पुलिस और फौज के द्वारा नहीं हो सकता। इसके लिये हमको जनता के विचारों में आध्यात्मिकता का समावेश करना पड़ेगा, जिससे हम अपना निर्धारण कर्तव्य आनंदपूर्वक करते रहें और समस्त समाज के हित का ध्यान रखें।

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

👉 उत्तम जीवन व्यवहार ही हमारा धर्म है। (भाग 1)

वर्तमान समय में अपने को धार्मिक कहने वाले व्यक्ति प्रायः यह मत प्रकट किया करते हैं कि संसार में धर्म ही सर्वोपरि है, इसलिये जीवन से सम्बन्ध रखने वाले आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक आदि विषयों को गौण समझना चाहिये, और उनका निर्णय धर्म को प्रमुख स्थान देकर ही करना चाहिये। यह बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है, पर कार्य रूप में इसका पालन संभव नहीं होता। क्योंकि धर्म राजनीति, विज्ञान आदि सभी मानव-प्रकृति के अंग हैं और उनका आधार “सत्य” पर है। जिस चीज का आधार सत्य के बजाय असत्य पर होगा, वह न तो कल्याणकारी हो सकती है और न स्थायी। इसलिये जो लोग अर्थ और राजनीति, विज्ञान आदि की उपेक्षा करके धर्म को ही प्रधानता देते हैं, वे प्रायः पाखंडी और ढोंगी हो जाते हैं, उनके कहने और करने में ऐक्य का भाव नहीं पाया जाता। वे मुँह से धर्म के लिये गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने पर भी जहाँ अपना स्वार्थ होता है वहाँ सर्वथा विपरीत मार्ग से चलते हैं और इस प्रकार संसार के अन्य लोगों को भी धर्म-विमुख करने में सहायक बनते हैं।

प्राचीनकाल में मनुष्य जीवन में इतना अधिक विरोध-भाव नहीं पाया जाता था। इसका खास कारण यह था कि उस समय विज्ञान की इतनी प्रगति नहीं हुई थी, और जो कुछ हुई थी वह साधारण जनता में वर्तमान समय की भाँति प्रचारित नहीं की गई थी। इसलिये धर्म और दर्शन के सिद्धान्तों के अनुसार ही राज्य और समाज के नियम भी निश्चित किये गये थे। इससे लोगों के व्यवहार और सिद्धान्तों में इतना परस्पर विरोधी-भाव उत्पन्न नहीं होता था। अब विज्ञान का विकास बहुत अधिक हो गया है और उसे सर्वसाधारण की शिक्षा का एक प्रमुख अंग बना दिया गया है, इससे परस्पर विरोधिता का भाव अकल्पित रूप से बढ़ गया है।

इससे भी अधिक विचारणीय दशा धर्म और राजनीति के सम्बन्ध में दिखलाई पड़ती है। इसका बहुत स्पष्ट उदाहरण देखना हो तो वर्तमान ईसाई राष्ट्रों पर निगाह डालना चाहिये। कहाँ तो ईसा का पूर्ण क्षमा-भाव रखने का उपदेश, और कहाँ आज कल के ईसाई कहलाने वाले शासकों की कूट नीति, हथियारों की प्रतिद्वंदिता और करोड़ों व्यक्तियों का संहार करने वाले महासमरों का आयोजन। ये ईसाई जिस प्रकार अपने व्यापारिक लाभ को अधिकाधिक बढ़ाने के लिये युद्ध-कला की दृष्टि से निर्बल राष्ट्रों का शोषण करते हैं और बराबरी वाले राष्ट्रों को युद्ध की भीषणता द्वारा नष्ट करने के उपाय करते हैं- ये दोनों बातें ईसा के उपदेशों के सर्वथा विपरीत हैं। पर ईसा के इन्हीं उपदेशों को बाईबल में प्रतिदिन पढ़ते और स्कूलों में सर्वत्र उनकी शिक्षा देते हुये ये लोग किस हृदय से लाखों करोड़ों लोगों के संहार की योजना बनाते रहते हैं, यह समझ में नहीं आता। एक ओर तो ये लोग गिरिजाघरों के लिये करोड़ों रुपए खर्च करते रहते हैं और बाईबल का संसार के कोने-काने में प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, और दूसरी ओर वे ही लोग घातक से घातक अस्त्र तैयार करके अन्य देशों के बड़े-बड़े नगरों को दो चार मिनट के भीतर ही मटियामेट कर डालते हैं। इस प्रकार का कार्य एक बड़ा मिथ्याचार है और उसके फल से ईसाई सभ्यता का भवन ढहे बिना नहीं रह सकता।

.....क्रमशः जारी
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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

👉 ईश्वर है या नहीं? (अंतिम भाग )

प्राणियों के शरीर में खाद्य पदार्थों को रक्त माँस के रूप में परिणत करते रहने वाली पाचन-प्रणाली ऐसी आश्चर्यजनक है कि उसकी रासायनिक क्षमता देखते ही बनती है। रोगों की निरोधक शक्ति स्वयं ही बीमारियों से लड़ती और रोग-मुक्ति का साधन बनती है। चिकित्सकों से उपचारों द्वारा उसे थोड़ी सहायता ही मिलती है। इस प्रक्रिया की आश्चर्यजनक शक्ति को देखते हुए वैज्ञानिकों को दांतों तले उँगली दबाकर रह जाना पड़ता है। शरीर में लगा हुआ एक- एक कल पुर्जा इतना संवेदनशील और अद्भुत कारीगरी से भरा हुआ है कि उसे अपने आप बना हुआ, अपने आप काम करने वाला नहीं माना जा सकता।

प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश की प्रक्रिया में सन्तुलन रहना एक ऐसा तथ्य है, जिसे किसी विचारवान् सत्ता का ही कार्य कहा जा सकता है। विभिन्न प्राणी अपनी सन्तानोत्पत्ति बड़ी तेजी से करते हैं। मनुष्य चार-छः बच्चे तो साधारणतः पैदा कर ही लेता है। सुअर और कुत्ते तो अपने जीवन काल में सौ-पचास बच्चे पैदा करते हैं। मक्खी,मच्छर, मछली, चींटी, दीमक आदि तो कई-कई सौ अण्डे देती है। मुर्गी को ही देखिए वह अपने जीवन में कई-सौ अण्डे देती होगी। यह उत्पादन-क्रम विश्व के लिए एक संकट सिद्ध हो सकता है। यदि एक भी प्राणी की यह वंश-वृत्ति निर्बाध गति से चले तो उसके बच्चे ही इस सारी धरती पर कुछ ही वर्षों में छा जावें और अन्य प्राणियों को खड़े रहने के लिए भी जगह न बचे। पर कोई सूक्ष्म सत्ता इस वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए रोग, युद्ध, दुर्भिक्ष, अभाव आदि पैदा करती रहती है और वे सीमित संख्या में उतने ही बने रहते हैं, जितने के लिए धरती पर गुंजाइश है। यदि ऐसा न होता तो करोड़ों वर्षों से चले आ रहे जीवधारी अब तक इतने हो गये होते कि उन्हें अन्य लोक में भेजने के अतिरिक्त और कोई मार्ग न रहता।

जिस ऋतु में जो रोग होता है, उसको शमन करने वाली जड़ी-बूटियाँ भी उसी ऋतु में होती हैं। फल, शाक और अन्नों के बारे में भी यही बात है। ऋतु की आवश्यकता के अनुसार ही पृथ्वी में से वनस्पति और फल-फूल पैदा होते हैं। जहाँ के निवासियों को वहीं की जलवायु और अन्न, शाक, औषधि अनुकूल पड़ती है। यह कार्य किसी विचारवान शक्ति का ही हो सकता है।

नियन्त्रण और सन्तुलन की यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया अपने आप होती रहे, ऐसा संभव नहीं। इसके पीछे कोई विचारशील चेतन सत्ता ही काम करती है। उस ज्ञानवान् चित्त-शक्ति को ईश्वर नाम दिया जाता है। उसके अस्तित्व से इन्कार करना, दिन रहते सूरज को न मानने जैसा दुराग्रह ही कहा जायेगा।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

👉 ईश्वर है या नहीं? (भाग 2)

मशीन से सम्बन्धित जितनी भी वस्तुएँ हैं वे सभी चालक की अपेक्षा रखती हैं। सञ्चालन करने एवं प्रयोग करने वाला न हो तो वे महत्वपूर्ण होते हुए भी किसी के कुछ काम नहीं आतीं। इससे प्रकट होता है कि जड़ पदार्थ किसी सञ्चालक की प्रेरणा से ही सक्रियता धारण करते हैं। विशाल सृष्टि के कार्यक्रम में जो सक्रियता, नियमितता और व्यवस्था दीख पड़ती है, उसके पीछे भी चेतन सत्ता का हाथ होना आवश्यक है। इतना बड़ा सृष्टि-साम्राज्य अपने आप इतने विवेकपूर्ण ढंग से नहीं चल सकता। हवा को बहाने वाली, ऋतुओं को बदलने वाली, पौधों को उगाने और सुखाने वाली, कोई शक्ति मौजूद है- यह मानना पड़ेगा। इसे प्रकृति कहें या परमेश्वर, इस नाम-भेद से कुछ बनता बिगड़ता नहीं।

पदार्थों में क्षमता मौजूद भले ही हो, पर उसे गतिशील बनाने वाली एक प्रेरक शक्ति का भी पृथक से अस्तित्व मौजूद है। अणु अपनी धुरी पर अपने आप नहीं घूमते, उन्हें घुमाने वाली भी कोई प्रेरक शक्ति होनी ही चाहिए। इतने नियमबद्ध, इतने विशाल विश्व ब्रह्माण्ड का ठीक प्रकार सञ्चालन होते रहना किसी चैतन्य-सत्ता के द्वारा ही सम्भव है। बुद्धिहीन जड़ पदार्थ अपने आप अपना कार्य नियमपूर्वक करते रहेंगे,यह कैसे सम्भव हो सकता है? सूर्य-चन्द्रमा ग्रह-नक्षत्र अपनी-अपनी धुरी तथा कक्षा में निर्धारित गति से घूमते हैं। यदि इसमें तनिक भी अन्तर आ जाय तो एक ग्रह दूसरे ग्रह से टकरा कर टूटने लगे और इसकी प्रतिक्रिया से अन्य ग्रह नक्षत्रों की भी गति-व्यवस्था बिगड़ जाय। पर होता ऐसा नहीं, क्योंकि इन सबका सञ्चालन एक सावधान सत्ता द्वारा हो रहा है।

जो भी वस्तुएं हमारे उपयोग में आती हैं वह किसी न किसी के द्वारा बनाई हुई होती हैं। रोटी, कपड़ा, दवा, मकान,चारपाई, बर्तन, लालटेन, पुस्तक, घड़ी आदि हमारे उपयोग की सभी चीजें किसी के द्वारा बनाई गई हैं। इनके मूल पदार्थ- अन्न, धातु, कपास आदि को तथा उनके भी मूल पञ्च-तत्वों को बनाने वाला भी कोई होना चाहिए। इसी निर्मात्री और सञ्चालन शक्ति का नाम ईश्वर है।

विश्व का सञ्चालन और नियन्त्रण करने वाली कोई विचारशील सत्ता है। उसका अनुमान उसकी कृतियों को ध्यानपूर्वक देखने से सहज ही लग जाता है। जिस प्राणी को जिस परिस्थिति में उत्पन्न किया है उसके अनुकूल ही उसे साधन भी दिये हैं। माँसाहारी जीवों के दाँत और नाखून ऐसे बनाये है कि वे शिकार को पकड़ और फाड़ कर खा सकें। इसी प्रकार शाकाहारी जीवों को उसी व्यवस्था के अनुरूप खाने और पचाने के यन्त्र मिले हैं। ठण्डे बर्फीले प्रदेशों में रहने वाले जानवरों के शरीर पर बड़े-बड़े बाल और गर्म भूमि पर रहने वालों के शरीर उष्णता सहन करने की क्षमता-सम्पन्न होते हैं।

*.....क्रमशः जारी*
✍️ *परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य* 
*📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964*

"Shantikunj Rishi Chintan *शांतिकुंज हरिद्वार का आधिकारिक YouTube चैनल*
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👉 ईश्वर है या नहीं? (भाग 1)

कई व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार करते हैं और कहते हैं-इस सृष्टि को बनाने एवं चलाने वाली कोई चेतन सत्ता नहीं है। प्रकृति के परमाणु अपने आप अपना काम करते रहते हैं और उसी से जीवों का जन्म-मरण होता रहता है। वे आत्मा की सत्ता को भी नहीं मानते और कहते हैं कि पेड़-पौधों की तरह मनुष्य भी एक बोलने वाला पौधा मात्र है। वह रज-वीर्य के संयोग से जन्मता और रोग एवं बुढ़ापे की क्रिया से मर जाता है।

यह नास्तिकवादी विचारधारा दिन-दिन अधिक तेजी से बढ़ रही है। विज्ञानवेत्ताओं को अपनी प्रयोगशालाओं में ईश्वर के अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण किन्हीं यन्त्रों दुर्बीनों या खुर्दबीनों में नहीं मिल सका है। इसलिए वे यही कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव में हम ईश्वर के अस्तित्व का समर्थन नहीं कर सकते। विज्ञान की वर्तमान मान्यताओं को ही सब कुछ मानने वाले लोगों को इससे और भी अधिक प्रोत्साहन मिला है।

ईश्वर की मान्यता से नीति धर्म और सदाचार के बन्धनों में रहने के लिए मनुष्य को विवश होना पड़ता। उच्छृंखलतावादी ईश्वर की मान्यता रखने पर भी धर्म-कर्म के बन्धनों को तोड़ते रहते थे। अब उन्हें कम्युनिज्म और विकास का समर्थन मिल जाने से और भी अधिक छूट मिलती है। इस प्रकार उच्छृंखलता और अनैतिकता का मार्ग और भी अधिक प्रशस्त हो जाता है। यह मान्यताएं यदि इसी प्रकार बढ़ती और पनपती रहीं तो नैतिकता, श्रम और सदाचार के लिए एक विश्व-व्यापी संकट खड़ा होने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि अनीश्वरवादी विचारधारा के तर्कों का परीक्षण किया जाय और यह देखा जाय कि उनके कथन में कुछ सार भी है या नहीं?

ईश्वर कहाँ हैं? | Ishwar Kahan Hai | Shantikunj Rishi Chintan, https://youtu.be/6FIYJ6T1DTA?si=Btn7Hr4GatfwuWwX

अनीश्वरवादियों का कथन है कि-प्रकृति के जड़ परमाणु अपने आप अपनी धुरी पर घूमते हैं, बदलते और हलचल करते हैं, उसी से सृष्टि का क्रम चलता है तथा प्राणियों की उत्पत्ति होती है। ईश्वर की इसमें कुछ भी आवश्यकता नहीं है।

इस कथन पर विचार करते हुए हमें देखना होगा कि क्या चेतन की प्रेरणा बिना जड़ पदार्थों में एक क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित गति-विधि निरन्तर चलते रहना सम्भव हो सकता है? देखते हैं कि कोई रेल, मोटर, जहाज, मशीन, अस्त्र आदि कितना ही महत्वपूर्ण एवं शक्ति शाली क्यों न हो, उसे चलाने के लिए चालक की बुद्धि ही काम करती है। राकेट से लेकर उपग्रह तक स्वचालित यन्त्र तभी अपनी सक्रियता जारी रख पाते हैं, जब रेडियो सक्रियता के माध्यम से मनुष्य उन्हें किसी दिशा विशेष में चलाते हैं। चालक के अभाव में अपनी इच्छा और शक्ति से यदि वस्तुएँ अपने आप ही चलने और काम करने लगें तो फिर उन्हें जड़ ही क्यों कहा जाय?

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

👉 अपनी इच्छा शक्ति को बढ़ाइए

‘जहाँ चाह है वहाँ राह है’ यह एक पुरानी कहावत है, परन्तु इसमें बड़ा बल है। मनुष्य की जैसी अच्छी बुरी इच्छा होती है वह उसी के अनुसार अपनी समस्त शक्तियों को लगा देता है और उसमें सफल होता है। मनुष्य की जैसी इच्छा होती है, वह वैसा ही बनता चला जाता है। कवि, लेखक, वक्ता, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनने की इच्छा रखने वाला अपनी क्रियाओं को उसी दिशा में मोड़ देता है और अपनी सारी शक्तियों को एकाग्र करके उस में लगा देता है, परिणामस्वरूप वह वही बन जाता है।

हमारा भविष्य हमारे अपने हाथों में है। उसको बनाने वाले हम स्वयं ही हैं। एक विद्वान् युवकों से कहा करते थे कि “यही समय है जब तुम्हें अपने मार्ग का निश्चय कर लेना चाहिए नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा कि मैंने स्वयं अपने भविष्य को अन्धकारमय बनाया है। इच्छा एक ऐसी वस्तु है जो आसानी से हमारे स्वभाव में आ जाती है। इसलिए दृढ़ इच्छा करना सीखो और उस पर दृढ़ बने रहो। इस तरह से अपने अनिश्चित जीवन को निश्चित बना कर उन्नति का मार्ग प्रशस्त करो।”

जिस मनुष्य में कोई इच्छा नहीं होती, वह क्रियाहीन और निरुत्साही बना रहता है। ऐसे ही मनुष्य संसार में दीन-दीन दशा में देखे जाते हैं। मनुष्य को पिछड़ा हुआ और गिरी हुई परिस्थितियों में रखने वाली कोई वस्तु है तो वह इच्छा शक्ति का अभाव है जिसे हमें दूर करना है। जिस तरह नदी का चलता पानी स्वच्छ व स्वास्थ्यप्रद होता है और एक स्थान पर खड़ा पानी गंदला और स्वास्थ्य विनाशक होता है उसी तरह से इच्छा शक्ति जीवन में आगे बढ़ने और कुछ करने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है और इसके अभाव में हमें वर्तमान परिस्थितियों में ही सन्तुष्ट होना पड़ता है। यदि हम आलसी बन कर अपना जीवन बिता देते हैं, तो भगवान के द्वारा दिये गये उत्तरदायित्व को निबाहने से जी चुराते है, अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने से भागते हैं। हम यहाँ जागरुक रहने और दूसरों को जगाये रखने के लिए आये हैं। जब हमारी शक्तियाँ ही गुप्त पड़ी रहेंगी तो हम दूसरों के लिए कुछ करने में कैसे समर्थ होंगे? पहले तो अपनी शक्तियों को जाग्रत करने के लिए इच्छा शक्ति को बढ़ाना चाहिए और अपने जीवन का एक निश्चित मार्ग चुन लेना चाहिए तभी हमें सन्तोष होगा कि यहाँ हम मुर्दों की तरह नहीं बल्कि जिन्दों की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

एक संन्यासी कहा करते थे कि “जैसा तुम चाहो वैसे ही बन सकते हो क्योंकि इच्छा शक्ति का दैव के साथ ऐसा घनिष्ठ संबन्ध है कि हम सच्चे दिल से जो कुछ होने की इच्छा करें, वही हो सकते हैं। ऐसा कोई नहीं है जिसकी उत्कट इच्छा आज्ञाकारी, सन्तोषी, नम्र अथवा उदार होने की हो और वह वैसा ही न हो जाये।” महापुरुषों के जीवन चरित्र इस सत्य की गवाही देते हैं। उन्होंने संसार में जितने बड़े-बड़े कार्य किये हैं, उन में इसी महाशक्ति का सहारा मुख्य था। यह तो सभी कार्यों की जड़ है। इसके बिना तो किसी कार्य का आरम्भ होना भी सम्भव नहीं है। अब यह व्यक्ति विशेष की बुद्धि और विवेक पर निर्भर है कि वह अपनी इच्छा शक्ति को किस ओर लगाये। चोर, डाकू भी इसके आधार पर सफल होते हैं और सन्त, महात्मा और महापुरुष भी इसी के सहारे समाज में क्रान्तियाँ करते हैं। धन्य हैं वह जो प्रभुदत्त इस शक्ति को उत्तम मार्ग में लगाते हैं।

*📖 अखण्ड ज्योति जून 1959*

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👉 हम सद्गुणों का उपार्जन क्यों न करें? (भाग 1)

संयम एक प्रकार का अनुशासन है जो साधक में वैराग्य लाता है और उसे योग-पथ पर अग्रसर होने में सहायता प्रदान करता है। यम अथवा आत्मनिग्रह का अभ्यास ही संयम है। यही सारे सद्गुणों का अधिष्ठान है।

संयम ही रोगों के विरुद्ध दृढ़तम चहार दीवारी है यही सारी व्याधियों से सुरक्षित रखता है। इससे सुन्दर स्वास्थ्य शक्ति बल तथा वीर्य की प्राप्ति होती है।

एक सप्ताह के लिए चाय, काफी अथवा धूम्रपान करना बन्द कर दो। इससे तुम्हारी इच्छाशक्ति बलवती होगी जिससे संयम कार्य में मदद मिलेगी। अन्य संयम तुम्हारे लिए सरलतर हो जायेंगे।

संयम का लक्ष्य मन को निम्न पाशवीय अभिरुचियों से ऊपर उठाना ही है। इससे निश्चय ही आत्मपरिष्कार में सहायता मिलती है।

नियताहार, संयम, उपवास, आत्मनियन्त्रण, आत्म-निग्रह, आत्मसंयम, परिमितता ये सब पर्यायवाची हैं।

मदोन्मत्तता, आत्यंतिकता, उद्भ्रान्तता, उन्माद, आत्म-तृप्ति, इन्द्रिय परायणता, लम्पटता, ये सब संयम के विपरीतार्थक शब्द हैं।

आत्मविश्वास कैसे बढ़ाएं | Aatmvishwas Kaise Badhaye | https://youtu.be/Av3k4y9QHKE?si=fQDFCkLMpz8EPnzi

भोजन बन्द कर देना भोजन से संयम कहलाता है। अल्पाहार करना ही नियताहार है। अनाहार कभी एक बार कर लिया जाता है परन्तु अल्पाहार अभ्यास की वस्तु है। इच्छित वस्तु का परित्याग ही आत्म-निग्रह है। अनिच्छित वस्तु का परित्याग भी संयम ही है। नियमित समय तक, साधारणतः धार्मिक व्रतों में, भोजन न करना उपवास कहलाता है। युक्ति पूर्वक कुछ विशेष वस्तुओं का सीमित सेवन तथा कुछ का पूर्ण परित्याग ही परिमितता है। हम लोग दुर्गुणों में संयम तथा भोजन में मिताहार का प्रयोग करते हैं।

यह एक सुन्दर सद्गुण है कि एक मनुष्य दूसरों के साथ चाहे उनकी प्रकृति कैसी भी क्यों न हो, अपने को व्यवस्थित तथा उपयुक्त बनाता है। जीवन में सफलता पाने के लिए यह सर्वोत्तम तथा अनिवार्य सद्गुण है। शनैःशनैः इसका उपार्जन करना आवश्यक है। बहुसंख्यक-जन इसे नहीं जानते कि किस प्रकार दूसरों के साथ अपने को उपयुक्त बनावें। दूसरों के हृदय पर शासन करने के लिए तथा अन्ततः जीवन संग्राम में विजयी होने के लिए यथा काल व्यवस्था एक विचित्र सद्गुण है।

पत्नी नहीं जानती कि पति के साथ किस प्रकार अनुकूल बर्ताव करना चाहिये। वह सदा अपने पति को अप्रसन्न रखती है, घर में झगड़े का कारण बनती है और अन्ततः पति द्वारा परित्यक्त होती है। किरानी नहीं जानते कि अपने मालिक के साथ किस प्रकार व्यवहार करें। वह उससे झगड़ पड़ता है और शीघ्र ही अपनी करनी का फल भोगता है। शिष्य नहीं जानता कि गुरु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। व्यापारी नहीं जानता कि किस प्रकार वह ग्राहकों के साथ व्यवहार करे। फलतः वह अपने व्यापार तथा ग्राहकों से वंचित रह जाता है। दीवान यदि नहीं जानता कि महाराजा के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए तो उसको नौकरी से अलग होना पड़ता है। यथा काल व्यवस्था के ऊपर संसार आधारित है। जो इस कला अथवा विज्ञान को जानता है वह संसार में सकुशल निवास करता है और जीवन की सभी परिस्थितियों में सुखी रहता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जून 1959

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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

👉 आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग (भाग २)

जो लोग अभी इतनी मानसिक उन्नति नहीं कर सके हैं कि दूसरों की मूर्खतापूर्ण भूलों को क्षमा कर दें, उनको कम से कम क्रोध और असत्य के बदले तुरंत वैसा ही व्यवहार करने के बजाय कुछ देर ठहर कर समस्त परिस्थिति पर शाँतचित्त से विचार करना चाहिए। ऐसा होने से वे कम से कम वैसी मूर्खता से बच जायेंगे जैसी पहला व्यक्ति कर चुका है।

दूसरों के उद्देश्य के विषय में शंका करना अच्छा कार्य नहीं है। केवल उसकी अन्तरात्मा ही उसके विचारों को जानती है। हो सकता है कि वह कुछ ऐसे उद्देश्यों से प्रेरित होकर कोई कार्य कर रहा हो जो तुम्हारे मस्तिष्क में आ ही नहीं सकते। यदि तुम किसी के विरुद्ध कोई बात सुनते हो, तो तुम इसको दोहराओ मत। संभव है वह सत्य न हो और यदि हो भी, तो उसके विषय में मौन रहना ही अधिक दयालुता होगी।

बोलने से पहले सोच लो अन्याय असत्य भाषण से दोष-भागी बनोगे। कार्यों में भी सत्य का पालन करो, अपना मिथ्या प्रदर्शन मत करो, क्योंकि प्रत्येक दल सत्य के उस स्वच्छ प्रकाश में बाधा है जिसे तुम्हारे द्वारा उसी प्रकार प्रकाशित होना चाहिये जैसे सिर्फ शीशे के द्वारा सूर्य का प्रकाश प्रकाशित होता है।

अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, https://youtu.be/vSKChpugH14?si=M9jnwKP58NH40az5

आचरण और व्यवहार में सत्य का पालन वास्तव में कठिन है, इसका अर्थ यह है कि दूसरों के सामने कोई कार्य इस उद्देश्य से न करना चाहिए कि उसके मन में हमारे लिये उच्च-धारणा बैठ जाये। साथ ही जिस कार्य के करने में दूसरों के सामने लज्जित ना होना पड़े ऐसा कार्य छुपकर भी नहीं करना चाहिए। लोगों को आप अपना सच्चा स्वरूप देखने दीजिये और जो कुछ आप नहीं हैं वैसा बनने का ढोंग मत कीजिये। बहुत लोगों का ऐसा उद्देश्य रहता है कि हमारे प्रति दूसरों की धारणा हमारी रुचि के अनुकूल ही होनी चाहिये। फलतः ऐसी अनेक प्रकार की छोटी बातें होती हैं, जिन्हें हम एकान्त में तो कर लें, परन्तु दूसरों के सामने नहीं करेंगे, क्योंकि हम सोचते हैं कि लोग हम से ऐसी बातों के करने की आशा नहीं करते।

यह बात सत्य है कि हमें कभी अपना झूठा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रत्येक प्रकार का झूठा प्रदर्शन पतनकारी होता है। परन्तु यह भी ध्यान रखिये कि उस झूठे प्रदर्शन को टालने के लिये कहीं आप उसकी प्रतिकूल पराकाष्ठा तक न पहुँच जायें लोग कभी-कभी ऐसा कहते हैं कि “मैं तो अपने प्राकृतिक रूप में ही लोगों के सामने अपने को प्रकट करना चाहता हूँ।” और ऐसा कहकर वे अपना अत्यन्त निकृष्ट, अशिष्ट और असभ्य रूप लोगों को दिखलाना आरम्भ करते हैं। किन्तु ऐसा करके वे अपना प्राकृतिक स्वरूप जैसा होना चाहिये वह नहीं दिखलाते, वरन् इसके विपरीत अपने हीन, तुच्छ और निकृष्ट रूप का प्रदर्शन करते हैं। क्योंकि मनुष्य में जो कुछ उच्चतम, सर्वोत्तम एवं सर्वश्रेष्ठ गुण हैं, वे ही आत्मा से निकट सम्बन्ध रखते हैं, अतः अपने-आत्मा के प्राकृतिक स्वरूप को प्रकट करने के लिये हमें यथाशक्ति सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

*धार्मिक पाखण्ड भी असत्य का ही एक रूप है। यदि कोई मनुष्य अपने आपको आध्यात्मज्ञानी प्रकट करता है, साथ ही अपनी उन्नति एवं सिद्धियों का वर्णन करके पाखंडी लोगों की तरह भोले-भाले व्यक्ति यों की प्रशंसा प्राप्त करने का यत्न करता है तो यह समझ लेना चाहिए कि वह सत्य का वास्तविक अनुयायी नहीं है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जून 1957

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रविवार, 12 अप्रैल 2026

👉 आचरण और व्यवहार में सत्य का प्रयोग (भाग 1)

मनुष्य का कर्तव्य है कि सत्य और असत्य का भेद पहिचानने का प्रयत्न करता रहे। सत्य आध्यात्मिक जगत का सर्वोत्तम रत्न है और भगवान ने उसे पहिचानने की निश्चित योग्यता भी मनुष्य को दी है पर आधुनिक युग के कुतर्कशील लोगों ने उसका स्वरूप ऐसा गँदला कर दिया है कि उसकी पहिचान करना भी बड़ा कठिन हो जाता है। इसके लिए सबसे पहला उपाय यह है कि हम स्वयं मन, वाणी और कर्म से सदा सत्य का पालन करें। जो व्यक्ति सत्य का पालन करता है वह सत्य और असत्य की पहिचान अपने सहज-ज्ञान से शीघ्र ही कर सकता है।

सत्य और असत्य की पहिचान पर ज्यादा जोर देने की आवश्यकता इसलिये भी है कि संसार में आजकल अनेकों मूर्खतापूर्ण असत्य विचार और अन्धविश्वास भरे पड़े हैं, और जो व्यक्ति इनका दास बना रहता है वह कभी उन्नति नहीं कर सकता।

इसलिये तुम्हें किसी बात को इसलिये ग्रहण नहीं करना चाहिए कि उसे बहुसंख्यक लोग मानते हैं, या वह शताब्दियों से चली आई है, अथवा उन धर्मग्रंथों में लिखी है जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं। तुम्हें उस पर स्वयं भी विचार करके उसके सत्य-असत्य और उचित-अनुचित होने का निर्णय करना चाहिए। याद रखो कि एक विषय पर चाहे एक हजार मनुष्यों की अनुमति क्यों न हो किन्तु यदि वे लोग उस विषय में कुछ भी नहीं जानते, तो उनके मत का कुछ भी मूल्य नहीं है। जिसे सत्य मार्ग पर चलना है उसे स्वयं विचार करना सीखना चाहिए, क्योंकि अंधविश्वास संसार की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। यह एक ऐसा बंधन है जिससे पूर्ण रूप से मुक्ति होना चाहिए। दूसरों के विषय में तुम्हारा विचार सदा सत्य होना चाहिए। उनके विषय में जो बात तुम नहीं जानते उस पर विचार मत करो।

यह कल्पना भी मत करो कि लोग सदा तुम्हारे ही विषय में सोचा करते हैं। यदि एक मनुष्य कोई ऐसा कार्य करता है जिससे तुम्हारी समझ में तुम्हारी हानि होगी, अथवा वह कोई बात कहता है जो तुम्हारे विचार पर तुम पर घटती है, तो तत्काल ही यह मत सोचो कि “उसका उद्देश्य मुझे हानि पहुँचाना था। “ बहुत सम्भव है कि उसने तुम्हारे विषय में सोचा ही न हो, क्योंकि प्रत्येक जीव के अपने निज के कष्ट होते हैं और उसके विचारों का केन्द्र मुख्यतः वह स्वयं ही रहता है। यदि कोई मनुष्य तुमसे क्रोधित होकर बात करता है तो यह मत सोचो कि वह तुमसे घृणा करता है अथवा तुम्हें व्यथित करना चाहता है। हो सकता है कि उसे किसी अन्य व्यक्ति ने क्रोधित कर दिया हो, और संयोग से उस समय तुम उसे मिल जाते हो, और तब उसका सारा क्रोध तुम्हीं पर उतरता है। यह ठीक है कि वह मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहा है, क्योंकि क्रोध करना ही मूर्खता है। किंतु तुम्हें उसके विषय में असत्य विचार नहीं करना चाहिये।

लोगों की बहुत सी छोटी-छोटी कठिनाइयाँ इसी प्रकार पैदा हो जाती हैं। किसी व्यक्ति पर यदि परेशानियों का भार बहुत अधिक होता है तो उसके कारण वह लगभग प्रत्येक बात पर क्रोध करने लग जाता है। वास्तव में हम अपने आस-पास रहने वालों के भी सब कष्टों को नहीं जानते, क्योंकि कोई भी समझदार व्यक्ति अपनी कठिनाइयों को घोषित करता नहीं फिरता। साधारण मर्यादा उसे ऐसा करने से रोकती है। किन्तु यदि हम यह याद रखे कि ऐसी कठिनाइयाँ सबके लिये उपस्थित हैं और उनके प्रति उदार भाव से काम लें, तो हम स्वयं क्रोध से अवश्य बच सकेंगे।



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👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...