सोमवार, 6 अप्रैल 2026

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 6 April 2026


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👉 बातें नहीं काम कीजिये

अनेक व्यक्तियों के मस्तिष्क उत्तम 2 विचारों से परिपूर्ण है और उनकी प्राप्ति के लिए अनेक सुविधायें भी उन्हें उपलब्ध हैं। सफलता की अनेक युक्तियाँ भी उनके पास हैं। किंतु फिर भी क्या कारण हैं कि वे लोग आगे नहीं बढ़ पाते हैं?

इनके व्यक्तित्व की त्रुटि यह है कि ये कागजी योजनायें तो यथेष्ट बनाते हैं, परन्तु स्वयं के विचारों को कार्यरूप में परिणत नहीं करते। विचार यदि निष्क्रिय हैं तो वे कल्पना के रंगीन महत्व के ही समान है, जिनमें न तो दृढ़ता ही है और न स्थायित्व। बात को सोचना एक चीज है, उसको कार्यरूप में परिणत करके स्वयं वैसा ही बन जाना दूसरी चीज है।

सफल व्यक्ति कार्य को क्रियात्मक रूप से कर देने में विश्वास करते थे। उनके आन्तरिक जीवन तथा बाह्य क्रियात्मक जीवन में पूर्ण साम्य था। कार्य संसार को संचालन करने वाली शक्ति है। जो कार्य को कर डालता है, उसके अंग, मस्तिष्क, स्मृति, अनुभव की वृद्धि होती है। जो केवल सोचता है, वह जहाँ का तहाँ रु का रहता है।

नेपोलियन पढ़ा लिखा नहीं था। अधिक सोचता नहीं था। वह कार्य करने का प्रेमी था। “मुझे बड़ी-बड़ी योजनाएं मत बताओ, जो मैं कर सकूँ, वही मुझे चाहिये।” यही उसका उद्देश्य था।

शिवाजी की शिक्षा कितनी थी? अकबर ने कौन सी डिग्री डिप्लोमा प्राप्त किये थे? महाराज रणजीत को एक नेत्र से कम दीखता था, पर अपनी अद्भुत कार्य करने की शक्ति द्वारा उन्होंने प्रसिद्धि प्राप्त की थी।

अँग्रेजी में एक कहावत है कि “नर्क की सड़क उत्तम योजनाओं से परिपूर्ण है।” अभिप्राय यह है कि जो गरजते हैं, सो बरसते नहीं। रावण के पास अमृत के घड़े रखे रहे किंतु उसको उन्हें पान करने का अवसर ही प्राप्त न हुआ। वह अपने बल में विश्वास रखे, निष्क्रिय जीवन व्यतीत करता रहा।

हैमलेट नामक राजकुमार की कठिनाई का हाल प्रत्येक व्यक्ति ने सुना है। “करूं या न करूं”? इसी दुविधा में वह सदैव फँसा रहा, एक पग भी आगे न बढ़ सका। उसका अधिक सोचना, योजनायें बनाना व्यर्थ रहा।

यही उसकी असफलता का कारण बना। जो हैमलेट की समस्या थी, वही आज के अनेक व्यक्तियों की है।

Ep:- 1/21 भावी विभीषिकाएं और उनका प्रयोजन | महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया | https://youtu.be/baOpgE_Lgck?si=8B95APnzAPzmYgpS

क्या लाभ है उस विचार से जिस पर काम न किया जाय? यह वैसा ही है, जैसा एक बीज, जो बञ्जर भूमि पर पड़ गया हो और अँकुरित न हो सका हो। यह वह पुण्य है, जो फड़कर फल का उत्पादन नहीं करता। व्यर्थ ही खिलकर अपनी पंखुरियाँ इधर-उधर छितरा देता है।

कार्य न करने वाला व्यक्ति एक प्रकार का शेखचिल्ली है। वह बड़ी योजनाएं बनाता है, बढ़-2 बातें करता है, शब्दों के माया जाल की उसके पास न्यूनता नहीं होती है। वह बात करने में आगे, पर काम में पीछे रहता है, कहेगा मन भर कार्य न करेगा, रत्ती भर। ऐसे व्यक्ति निष्क्रिय, बेकार, कोरे बातूनी जमा खर्च करने वाले होते हैं उनसे महान् कार्य की आशा नहीं की जा सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि आप जो सोचे-विचारे या योजनाएं विनिर्मित करें, वे इस प्रकार की हो, जिन्हें कि आप कार्यरूप में परिणत कर सके। योजनाएं निर्माण करने के पूर्व सोचिये कि क्या आप उन्हें कर सकेंगे, क्या उनमें और आपकी शक्ति यों में अनुपात बराबर हैं, कहीं आप अपने सामर्थ्य से बाहर की बात तो नहीं सोच रहे हैं। जो योजना आपने बनाई हैं उसके लिये आपके पास क्या-2 साधन हैं। कितना धन है? कितने मित्र, बन्धु, बान्धव हैं। आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक, सामाजिक स्थिति कैसी है। इन पर विचार करके ही किसी कार्य में हाथ डालें। कार्य की सफलता के लिये आपकी मानसिक, शारीरिक या क्रियात्मक शक्ति यों का एकीकरण आवश्यक है और इस एकीकरण को कार्य के उद्देश्य की ओर केन्द्रित करिये। मानसिक दृष्टि से सचेष्ट और जागृत रहिये। संकल्प शक्ति का विकास एवं संचालन जरूरी है। इन बातों पर भली भाँति विचार करने के पश्चात् कार्य करने से सफलता अवश्य मिलती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1956

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (भाग 2)

महासिद्ध सरहपा कहते हैं कि साधक यदि अपने ध्यान को जाँचना चाहता है तो उसे निम्न मानदण्डों पर अपने को परखना चाहिए। 
1. आहार संयम, 
2. वाणी का संयम, 
3. जागरुकता, 
4. दौर्मनस्य का न होना, 
5. दुःख का अभाव, 
6. श्वास की संख्या में कमी हो जाना और 
7. संवेदनशीलता। 

ये सात ऐसे मानदण्ड हैं- जिनके आधार पर कोई भी साधक कभी भी अपने को जाँच सकता है कि उसकी ध्यान साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ़ हो रही है।
 
पहली कसौटी आहार संयम की है। ध्यान साधक में यदि आहार संयम सध रहा है तो समझना चाहिए उसका ध्यान भी सध रहा है। यह आहार संयम है क्या? तो इसके उत्तर में महान् योगी आचार्य शंकर कहते हैं- साधक को आहार कुछ इस तरह से लेना चाहिए जैसे कि औषधि ली जाती है। यानि की आहार वही हो और उतना ही हो जितना कि देह के पोषण के लिए पर्याप्त है। भगवद्गीता सात्त्विक आहार को परिभाषित करते हुए ध्यान साधक को ‘लघ्वाशी’ यानि कि कम खाने का निर्देश देती है। संक्षेप में ज्यों-ज्यों ध्यान प्रगाढ़ होता है साधक की स्वाद में रुचि समाप्त होती जाती है। ध्यान द्वारा मिलने वाली ऊर्जा बढ़ने के कारण उसका आहार भी बहुत न्यून हो जाता है।

ध्यान:- अंतदर्शन का ध्यान, Antdarshan Ka Dhyan | Shraddhey Dr. Pranav Pandya, 

दूसरी कसौटी है- वाणी संयम। वाणी संयम का अर्थ प्रायः लोग मौन होना समझ लेते हैं। लेकिन ऐसा उसी तरह से नहीं है जिस तरह से आहार संयम का अर्थ उपवास करना नहीं है। इसका अर्थ इतना भर है कि ध्यान साधना ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों अध्यात्म लोक के द्वार खुलते जाते हैं। ज्ञान और प्रकाश का एक नया लोक उसे मिल जाता है। फिर उसकी रुचि बेवजह की बातों में अपने आप ही समाप्त हो जाती है। इस क्रम में एक बड़ी रहस्यपूर्ण स्थिति भी आती है, जिसे केवल ध्यान साधक ही समझ सकते हैं कि ध्यान की प्रगाढ़ता में वाणी की अपेक्षा अन्तश्चेतना कहीं अधिक सक्रिय एवं प्रभावी होती है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 2003 पृष्ठ 3

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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 April 2026

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