सोमवार, 29 जून 2026

👉 मृत्यु से डर कैसा? (भाग 1)

दिन के प्रकाश का विलुप्त होने और रात्रि को अंधकार के आगमन की घड़ी का आ धमकना सामान्यतः घाटे का सौदा प्रतीत होता है, किन्तु इसके साथ ही सूर्य के कान्ति हीन होने, उसके विश्राम करने और पुनः नयी ज्योत्सना साथ उदय होने की आशा भी रहती है। काल निशा में विश्राम करने के लिए जीव पुराने शरीर का परित्याग कर जाता है। यह प्रयाण काल ही मौत के नाम से जाना जाता है। सृष्टि सुव्यवस्था के संचालन की विभिन्न क्रियाओं में जन्म और मृत्यु का यह परिवर्तन चक्र एक सहज स्वाभाविक एवं अनिवार्य प्रक्रिया है। उससे बच सकना किसी भी प्राणी के लिए संभव नहीं।

थकान के बाद हरी नींद आने नींद पूरी होने के बाद जाग पड़ने की तरह मरने और पुनः जन्म लेने की क्या सम्भावना नहीं? कार्योपरान्त थकान मिटाने के लिए विश्राम आवश्यक है। यह न केवल मनुष्य, वरन् समस्त जीवों के लिए अनिवार्य है। प्रकृति चक्र में भी विश्राम की यह प्रक्रिया किसी न किसी रूप में चलती रहती है। दिन भर की थकान के बाद रात्रि को विश्राम किया जाता है। विश्राम की क्रिया शक्तिसंचय की सृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। इसी के आधार पर दूसरे दिन नये उल्लास के साथ कार्य किये जाते है।

दिन भर कार्य करने वाले मजदूर रात को विश्राम करते है, पशु-पक्षी भी अपने घोंसले में सोते है। पुराणों की आख्यायिकाओं के अनुसार सूर्य भी रात्रि की गोद में विश्राम करने जाता है। जीव भी अपनी यात्रा पथ में विश्राम करता है। वह मृत्यु शैया में अपने विगत श्रम से मुक्ति पाता है तथा पुनः नये जीवन में प्रवेश करता है। जीव की यात्रा इसी क्रम से अपने कर्मानुसार अनन्त जीवन की ओर चलती रहती है। अतः मृत्यु भी उसके प्रगति-क्रम की एक अनिवार्य सीढ़ी कही जा सकती है। अविनाशी जीवात्मा अपनी यात्रा को मौत रूपी स्टेशनों पर ठहरती हुई पूर्ण करती है, अपने गन्तव्य लक्ष्य तक पहुँचती है। जन्म और मृत्यु का यह गति चक्र न होता तो शायद ही जीवात्मा यात्रा सफल हो पाती।
मोहासिक्त व्यक्ति को ही मृत्यु से डर लगता है। देख भी जाता है कि लोग मौत का नाम सुनते ही काँपने लगते हैं। इसे अशुभ मानते हैं। किसी सगे सम्बन्धी की होने पर रोते चिल्लाते हैं। स्वयं भी मौत के डर से चिन्तित रहते हैं। जबकि मरण की सुनिश्चितता को जानते हुए भी डरना केवल अविवेक ही कहा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 सच्चिदानन्द की आस्था और अनुभूति (भाग 1)

परमात्मा को सच्चिदानन्द स्वरूप कहा गया है। उस विराट् का ही एक अंश होने से जीवात्मा भी उन्हीं गुणों से सुशोभित है। सत्, चित्, आनन्द ये तीनों मिलकर कारण शरीर का ढाँचा बनाते हैं। सत् अर्थात् शाश्वत, अजर, अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् चेतना- दिव्य गुणों से सुसज्जित, उच्चस्तरीय आदर्शों-आस्थाओं से युक्त। आनन्द अर्थात् भाव संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त अन्तःकरण। आशा, उत्साह, संतोष के परस्पर समन्वय पर आधारित जीवन क्रम। आत्मा का सहज स्वभाव है ऊँचा उठना, अपने विराट् स्वरूप की स्वयं को प्रतिमूर्ति बनाने के लिए इन्हीं गुणों से स्वयं को समृद्ध करना तथा अन्ततः समस्त आवरणों को हटाते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करना। परिष्कृत जीवात्मा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आध्यात्मिक पुरुषार्थ करती है एवं जीव-ब्रह्म सम्मिलन से निःसृत परमानन्द की स्थिति को प्राप्त करती है।

इस आत्म गरिमा से अपरिचित मनुष्य भटकता है। यह विस्मृति अनेकानेक समस्याओं को जन्म देती है। इन्हें ही माया के आवरण-मनुष्य के विभ्रम कहा जा सकता है। ये ही रोग-शोकों के रूप में अन्ततः बाहर प्रकट होते हैं।

सच्चिदानंद का पहला चरण है ‘सत्’। ‘सत्’ मनुष्य को जीवन के क्षण भंगुर होने का बोध कराता है। हम अजर, अमर, अविनाशी हैं। पंचतत्वों से बनी इस काया अवयवों के बिखर जाने पर भी हमारी सत्ता बनी ही रहेगी। यह बोध बना रहे तो भटकाव से बचा जा सकता है।

सत् की अनुभूति व्यक्ति को यह विचार करने पर विवश करती है कि यह शरीर मरण-धर्मा है। परन्तु आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। वह तो एक सतत् प्रवाह है। आत्मा का स्वास्थ्य ही मानव की समस्त सफलताओं का प्राण है। यह तभी सम्भव है जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार तथा उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करता है। सत् परायण व्यक्ति आशावादी होता है। अपने कर्मों के फल के लिए वह उद्विग्न नहीं होता। स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए जीता है।

सत् में आस्था रखने वाला व्यक्ति सृष्टि को चलाने वाली बुद्धिमान, उद्देश्यपूर्ण व्यवस्था में दृढ़ विश्वास रखता है। वह जानता है कि विधि-विधानों, नियमों के अनुरूप चलने वाली इस सृष्टि की व्यवस्था में किसी तरह की अनुशासनहीनता, अनियंत्रण, अदूरदर्शिता का स्थान नहीं है। कर्मफल से पूर्णतः अवगत यह व्यक्ति अपनी समस्त गतिविधियों का निर्धारण सुघढ़तापूर्ण करता है। वह जानता है कि आत्मा कभी नहीं बदलती। बदलता तो यह चोला है। फिर उसके लिए व्यर्थ मोह क्यों करना? अनावश्यक संग्रह एवं उपभोगों में स्वयं को लीन करना इस सृष्टि के मुकुटमणि मानव के लिए कतई शोभनीय नहीं है। ऐसा चिन्तन प्रखर होने पर स्वयं को ऊँचा उठा हुआ पाता है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न सोपानों को पार करता हुआ वह अपने लक्ष्य तक जा पहुँचता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1981

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 June 2026


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रविवार, 28 जून 2026

👉 सादगी और संतोष की जिन्दगी!

वस्तुओं की प्रचुर मात्रा भी मनुष्य को सन्तोष नहीं दे सकती, पर इससे ठीक उल्टी विधि अपनाने से काम बन जाता है। मन को सन्तोष का अभ्यस्त कर लिया जाय तो इच्छा की पूर्ति सहज ही हो जाती है। मनुष्य की आवश्यकताएं स्वल्प हैं। उपभोग भी एक सीमा तक ही हो सकता है। उतना उपार्जन करना और साधन जुटाना सरल है। अतएव इच्छाएं सीमित रखने, उपभोग को औचित्य की मर्यादा में रखने तथा कठिन परिश्रम से उपार्जन में जुटे रहने पर कोई कारण नहीं कि इच्छाओं की पूर्ति न हो सके। अभावग्रस्तता और दरिद्रता का रोना आलसी, अपव्ययी रोते है या फिर जिनकी आकाँक्षाएं असीमित है।

संग्रह और उपभोग पर सीमा बाँन लगना चाहिए। इसके लिए औचित्य की मर्यादा और देख वासी के स्तर की होनी चाहिए। एक परिवार के सदस्य आमतौर से एक ही स्तर का रहन सहन तथा निर्वाह अपनाते है। भले ही उनमें से कोई अधिक खाये, पहने भी, यह भी नहीं हो सकता, इससे असमानता बढ़ेगी, मनोमालिन्य पनपेगा और ऐसी परम्परा चल पड़ेगी, जिसके रहते स्नेह सौजन्य का टिक सकना कठिन है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यदि सादगी का जीवन जिया जाए तो कम आजीविका वाले व्यक्ति भी प्रसन्नता भरे गुजार सकते हैं और सन्तोष के साथ रह सकते है।

अपव्यय अपने आप में एक बड़ा दुर्गुण है। कोई व्यक्ति अधिक कमाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस कमाई को फिजूल खर्च में फूँक दिया जाए। इस पैसे से ज्ञान-वृद्धि जैसे स्वार्थ और दूसरों की सहायता करने जैसे परमार्थ साधे जा सकते है। उससे आत्म कल्याण और लोक कल्याण के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। ठाट-बाट का अहंकारी प्रदर्शन तथा विलासी शौक-मौज के अपव्यय में हाथ खुला छोड़ने पर आदत बिगड़ती है और अधिक खर्च करने की इच्छा होने लगती है। वह बढ़ते बढ़ते नशेबाजों जैसी कुटेब बन जाती है। ऐसे कुटैवग्रस्तों का काम उचित उपार्जन से नहीं चलता, वह कम पड़ता है। इसलिए बढ़ी हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए अनुचित मार्ग अपनाने पड़ते हैं। अधिकाँश अपराधियों के मूल रूप में यही देखा जाता है।

यह सोचना सही नहीं है कि जितने ठाट बाट से रहेगा वह उतना ही बड़ा समझा जायेगा। यह बचकाना-चिन्तन समझदारों का नहीं होता। बड़प्पन सज्जनता है और उसकी पहचान सादगी से होती है। सादगी का अर्थ है-नम्रता, निरहंकारिता। अपने को जन-साधारण स्तर का समझने वाला खर्चीला रहन-सहन नहीं अपना सकता, क्योंकि उसमें क्षुद्रता और अहमन्यता की स्पष्ट गंध आती है। जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का अनुभव नहीं करते, वे ही संग्रही, विलासी और अहंकारी की भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे लोगों से स्वार्थ साधने वाले ही चाटुकारी भरी मुँह सामने प्रशंसा कर सकते हैं। पीछे पीछे भी उनके मुँह से यथार्थता निकलती है। स्वार्थी, संकीर्ण और निष्ठुर प्रकृति के व्यक्ति ही प्रायः महत्वाकाँक्षी होते हैं। उदारचेता अधिक कमाने पर भी सीमित साधनों से सादगी का निर्वाह करते हैं और उन महत्वकाँक्षाओं से दूर रहते है। ऐसा न करने पर समय और श्रम का अधिकाँश भाग खप जाता है। इस संदर्भ में कटौती करने पर व्यक्तिपरक कार्यों में संलग्न हो सकता है, जो सद्गुणों की अभिवृद्धि कर सके और सर्वत्र सुख-शान्ति का वातावरण बना सके।

लोग अच्छी बातों की नकल कम और बुरी बातों की अधिक करते हैं। एक अपव्ययी अनेकों को उस का आदि बना देता है। फलतः दोष रोष और असन्तोष तीनों ही बढ़ते और वातावरण को विषाक्त करते हैं। वस्तु इच्छाओं को सन्तोष तथा सादगी की जिन्दगी जीना ही श्रेयस्कर है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 28 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2026


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शनिवार, 27 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (अंतिम भाग)

इस देहासक्ति से मनुष्य की बड़ी गहरी हानि होती है। देह को प्रधानता मिलते ही आत्मा पीछे रह जाती है। आत्मा के गौण होते ही अज्ञान का घना अंधकार घेर लेता है और तब उस अंधकार में इस मान जीव की जो दुर्दशा होती है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। उसे भय, संशय, सन्देह तथा आशंकाओं की डायन हर समय सताया करती है। एष्णा और तृष्णायें उसे एक क्षण भी विश्राम नहीं लेने देतीं। आस्तिकता, आस्था और अञनागत भविष्य के सारे दीप बुझ जाते है और मनुष्य एक अँधेरा अन्त पाकर अनन्त अंधकार में जाकर तुम कल्पों के लिए डूब जाता है।

शरीर और कुछ नहीं एक साधन मात्र है, आत्मा के उद्धार का साधन। इसकी खोज खबर रखनी तो चाहिये, पर उसी सीमा तक जहाँ तक यह साधन रूप में आत्मोद्धार में सहायक हो सके। इसे स्वस्थ तथा सशक्त बनाये रखने के लिये जो भी जरूरी हो करिये पर इसकी इन्द्रिय लिप्सा की जिज्ञासा का कभी भी रंजन न करिये। विषय भोग और आराम, विश्राम जिन्हें यह माँगा करता है, इसके लिये घातक तथा अनावश्यक है। इनकी सुविधा पाकर यह शरीर आलसी, प्रमादी और ढीठ बन जाता है और तब हर उस साधना में आनाकानी करने लगता है, जो आत्मा के उद्धार में आवश्यक होते है। अस्तु देहाभिमान अथवा आशक्ति से सदा सावधान रहकर दूर रहना चाहिये।

देहासक्ति छूटते ही बाकी सारी आसक्तियाँ आपसे आप छूट जाती है। इसका पोषण करते हुए, इसको ठीक वैसे ही भूले रहिये, जैसे जीव इसका विसर्जन हो जान के बाद भूल जाता है। ममता मोह और माया के सारे सम्बन्ध भी टूट जाते है, ठीक उसी प्रकार इसका विस्मरण किए रहने से सारी आसक्तियाँ छूट जावेंगी और तब अन्तिम समय में उनको अनुभूति भी साथ लगी हुई न जायेगी। जीवनिर्लित और निर्मोहपूर्वक जाकर अनन्त जीवन को ग्रहण कर लेगा।

मनुष्य का जीवन ही अन्तिम नहीं है, इसके बाद एक दीर्घकालीन जीव भी है, जिसके यापन में आवश्यक पुष्य का सम्बल इस जीवन में संचय करने के लिए अनासक्ति भाव से कर्म करते हुए, जीवन चलाइये और बाद में माया-मोह तथा आसक्ति से निवृत्त होकर संसार से यात्रा कीजिए। तभी वहाँ जाकर दीर्घकालीन सुख, सन्तोष की प्राप्ति होगी।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 27 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 June 2026



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शुक्रवार, 26 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 3)

पारलौकिक जीवन की तैयारी में निर्मोह, निर्लिप्तता अथवा अनासक्ति की साधना भी परमावश्यक है। इस असार संसार के माया मोह लेकर जाने वाले उस पार के अपार जीवन में बड़ी सघन यातना के भागीदार बनते है को माया मोह के कारण रो-रोकर प्राण छोड़ते और तड़प तड़प कर संसार से विदा होते है, वे वहाँ भी अपनी अस अन्तिम स्थिति के अनुसार वैसे ही रो रो और तड़प तड़प कर जीवन बितायेगा। मनुष्य की अतिमानसिक स्थिति इस बात का स्पष्ट विज्ञापन है कि उसे उस पारलौकिक जीवन में किस भोग का भागी बनना होगा। यदि वह निर्लिप्तावस्था में हँसता खेलता हुआ गया, तब तो समझना चाहिये कि वहाँ भी हँसता खेलता ही रहेगा और यदि रोता सिसकता हुआ, विदा हुआ तो वहाँ भी रोता सिसकता ही रहेगा। इसमें दो सम्भावनायें नहीं हो सकती।

इह जीवन के दुःख अन्त का सबसे बड़ा और अगाध कारण आसक्ति ही है, आसक्ति के कारण ही सम्बन्धियों के बिछुड़ने का घेरा पड़ता है। आसक्ति के कारण ही थोड़ी सी असफलता निराशा की घटाये घेर लेती है। आसक्ति के कारण ही जरा सी उपेक्षा प्रतिहिंसा की आग जला देती है और आसक्ति के कारण ही धन वैभव के लिए पाप कर्मों में संलग्न हो जाते है। अस्तु आसक्ति ही को सारे दुःखों का मूल कारण मानना और उससे छूटने का उपाय करना चाहिये।

आसक्ति बड़ा भयंकर रोग है, फिर चाहे वह पुत्र-पत्नी के प्रति हो, धन-दौलत के प्रति हो, सुहृद सहचरों के प्रति हो देह अथवा अभिरुचियों के प्रति हो। इस रोग से बच कर ही मनुष्य एक निरामय एवं निर्भय जिन्दगी जी सकता है और निश्शंक अनत अपना सकता है।

जिस भय के कारण लोग कायर-कुचाल और कापुरुष बन जाते है, उसकी जननी आसक्ति ही है देहासक्ति के कारण ही लोग इस भय से उसके रंजन, भंजन में लगे रहते है कि कहीं यह बूढ़ी न हो जाये, कहीं इसकी शक्ति न चली जाये, कहीं भोग वासना के अयोग्य न हो जाये। इसी भय के कारण ही उसे विधि और पट-परिधानों की पूजा पगार चढ़ाते रहते है। वे पता नहीं, यह क्यों नहीं सोच पाते कि यह नश्वर मिट्टी एक दिन मिट ही जानी है। इस पर कितना ही चन्दन बदन क्यों न चढ़ाया जाये, कितनी ही मनौती और भिन्न क्यों न की जाये समय पाकर यह बूढ़ी तथा कुरूप हो ही जायेगी। आवश्यकता से अधिक शरीर को मान्यता देने का कारण यह देहासक्ति ही है। इस निःसार देहासक्ति के कारण मनुष्य न तो दृढ़ता पूर्वक साधन कर पाता है और न नियम, संयम का निर्वाह। अधिक साधने अथवा बाल खींचने से कहीं यह निर्बल न हो जाये-अधिक संयम, नियमों से इसको कष्ट होगा। परमार्थ पथ पर डाल देने से इसके भोग विलास के अधिकार छिन जायेंगे आदि आदि न जाने कितनी कल्पनायें मनुष्य को देहारोधक बना देती है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 25 जून 2026

👉 आध्यात्मिक जीवन इस तरह जिये (भाग 2)

अस्तु इस जीवन का कुछ पता नहीं कि यह किस समय अपनी गति को मति में बदल दे। इसलिये बुद्धिमानी इसी में है कि इसकी क्षणभंगुरता को स्वीकार कर तुरन्त इसी क्षण से अपने पारलौकिक जीवन की तैयारी में संलग्न जो जाया जाये। जो बिना संबल, संचय किये अनन्त प्रवास में चला जायेगा, उसे अनन्त कष्ट होंगे, यह निश्चय है। वहाँ यहाँ जैसी स्वाधीनता और सुविधा नहीं है, जो यहाँ से न भी ने जायें, वहाँ बना लेंगे, संचय कर लेंगे। वहाँ तो यहाँ साथ लिये पाथेय के बल पर ही अवधि यापन करनी होगी। वहाँ न सत्कर्म का अवसर मिलेगा और न अपकर्म का। वहाँ तो केवल यहीं के कर्मों के अनुसार आपको आपका संचय दे दिया जायेगा, जिसके ड़ड़ड़ड़ पर फिर चाहे आपको आनन्द भोगना पड़े और चाहें यातनाएँ।

यहाँ का संचय किया हुआ वह सम्बल क्या है, जो वहाँ काम आना है? वह सम्बल है पुण्य-परमार्थ निर्मोह और निर्लिप्तता पुण्य परमार्थ का अर्जन सत्कर्म और उसके साथ लगी हुई, सद्भावना से होता है। यदि सत्कर्म के साथ सद्भावना का संयोग नहीं है तो उस सत्कर्म का पुण्य परास्त हो जायेगा। एक मनुष्य किसी दुःखी की सहायता करता है पर भावना यह रखता कि ऐसा करने से यह मनुष्य मुझे अमीर और उदार समझेगा, मेरा आभारी होगा और यथासम्भव मेरी पूजा-प्रतिष्ठा करेगा। समाज में जो देखे, सुनेगा, वह मुझे सम्मान देगा, मेरा आदर करेगा, जिससे समाज में मेरा स्थान बनेगा। बस उसका सत्कर्म दूषित हो गया, उसका पुण्य ऋणी हो गया, ऐसा सत्कर्म पारलौकिक जीवन में सम्बल बन कर काम न आ सकेगा।

यह पुण्य बन कर सम्बल तब बनेगा, जब सहायता करने के पीछे कोई भाव ही न रहे और यदि रहे तो यह भाव रहे कि अमुक व्यक्ति हमारी तरह ही मनुष्य है। हमारा भाई है। उसकी आवश्यकता, उसकी तकलीफ और उसका कष्ट हमारा कष्ट है। हमारी सहायता पाना उसका नैसर्गिक अधिकार है और सहायता करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। मेरे पास जो कुछ है, वह सब प्राणी मात्र की धरोहर है, जो सबको उचित प्रकार से मिलनी ही है। मेरा इस पर कोई आभार नहीं, बल्कि इसका ही आभार मुझ पर है, जो यह मेरी सेवा, मेरी सहायता स्वीकार करने की कृपा कर रहा है। इस प्रकार के अहंकार रहित सत्कर्म ही पारलौकिक जीवन के सम्बल बना करते है।

किन्तु यह निरहंकार भावना प्राप्त कैसे हो? इसके लिये भी उपाय करना होगा। और वह उपाय है उपासना ईश्वर पुनीति। सम्पूर्ण आत्म-समर्पण के साथ परमात्मा की उपासना करते करते जब व्यक्ति के हृदय में उसका प्रकाश आ विराजेंगे, तब उसे सारा जड़-चेतन संसार परमात्मा रूप ही दीखने और अनुभव होने लगेगा। उसका ‘स्व’ सार्वभौम हो जायेगा। ऐसी स्थिति में उसे किसी से पृथकता का अनुभव ही न होगा। स्वयं सहायक, समानार्थी, सहायता और परिणाम सबका सब ईश्वर रूप ही दिखाई देगा। ऐसी दशा में उसे न तो यह पता चलेगा कि वह किसी की सहायता कर रहा है या कोई उससे सहायता पा रहा है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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