सोमवार, 18 मई 2026

‼️ हमीं एक कदम और आगे बढ़ें ( भाग 2) ‼️

गीताकार ने योगी की व्याख्या करते हुए उसकी पहचान “दिन में सोने रात में जगने की” बताई है। इस अलंकारिक निरूपण का तात्पर्य है दुनियादारी की रीति-नीति को मूर्खतापूर्ण मानकर अपने एकाकी विवेक के आधार पर स्वतन्त्र निर्णय करना। भले ही वे लोक प्रचलन के साथ तालमेल न खाते हों। ऐसा कर गुजरना किसी के लिए भी सम्भव है। न इसमें घाटा है न मूर्खता। बहुत लोगों द्वारा अपनाये गये ढर्रे को उचित मान बैठना नहीं है। अन्धी भेड़ों के पीछे-पीछे चलने की अपेक्षा रवीन्द्र का वह उद्बोधन मार्मिक है जिसमें ‘एकला चलो रे ‘ का सूर्य चन्द्र जैसा साहस अपनाने और ज्वलनशील दीपक का अनुकरण करने की प्रेरणा दी गई है। चिन्तन का यह मर्म बिन्दु ही ऐसा है जिसको गर्त में गिरने या आकाश में उछलने की दिशाओं में से किसी एक का वरण किया जा सकता है।

युग मनीषियों की श्रेणी में सम्मिलित होने के लिए किसी उच्च शिक्षित होने के तनिक भी आवश्यकता नहीं है। उसके लिए कबीर जितना अक्षर ज्ञान भी पर्याप्त है। बड़े कुचक्र षड्यन्त्र रचते रहने वाले बहु पथिता को इस देव मानवों की बिरादरी में उनकी डिग्री के कारण सम्मिलित नहीं किया जा सकता। जिस विद्यालय में इन मनीषियों को पढ़ना है उसमें अपना उदाहरण प्रस्तुत करने की एकमात्र योग्यता ही काम करती है। बकवासी वाचालता का काम तो अब टेप रिकार्डर से भी मजे में लिया जा सकता है। आवश्यकता तो स्वल्प शिक्षित बुद्धी की है जिनके अनुगमन के लिए कोई-कोई अन्तःकरण उमड़ पड़े। इन दिनों तिलक चाहिए, सुभाष, पटेल, विनोबा, दयानन्द, विवेकानन्द जैसे धुनी के धनी।

अमृतवाणी:- गुरु शिष्य सम्बन्ध | Guru Shishya Sambandh | https://youtu.be/vwLT4WrMewg?si=i8HCNsd80Ur5ESun

यहाँ वाचालता या चतुरता की नहीं बड़े दिल, बड़े साहस और उदात्त दृष्टिकोण भर की आवश्यकता है। वह जितना जिस अनुपात में होगा वे उतने ही ऊँचे स्तर के युग मनीषा गिने जा सकेंगे और युग की पुकार पूरी करने में महती भूमिका निभाते हुए अपने को कृत-कृत्य कर सकेंगे। इस दिशा में तथाकथित व्यस्त और अभावग्रस्त लोग भी यदि ईमानदारी की यथार्थता अपनायें तो देखेंगे कि प्रतिकूलताओं के बीच भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। बड़ा न सही छोटा योगदान तो गिलहरी से भी बन पड़ा था। मनुष्य अपने को सर्वथा असमर्थ कहे यह बात हजार बार दुहराने पर भी किसी के गले नहीं उतरती है। आदर्शवादिता के क्षेत्र में आन्तरिक कृपणता के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं है। उसी के कारण तो अर्जुन, वकीलों जैसी दलीलें प्रस्तुत करता चला जा रहा है। उसी प्रवंचना को धमकाते हुए गीताकार ने कहा था-प्रज्ञा वाँदाश्च भाष से’। वाचालों की छल भरी भाषा मत बोल। वस्तुस्थिति को समझ और मन की आँखें खोल।

प्रज्ञा परिजनों में इन दिनों ऐसे ही असमंजस भरे व्यामोह से जूझना पड़ेगा। अच्छा हो वे जोखिम उठायें-छलाँग लगायें और हनुमान जैसा दुस्साहस अपनायें। इससे कम में बात बनेगी नहीं, दल-दल में फँसी हुई गाड़ी आगे बढ़ेगी नहीं। परमार्थ के सम्मुख स्वार्थ को सिकोड़ने का ठीक यही समय है। लोभ और मोह में कटौती करते ही ऐसा उपाय निकल आता है जिसमें निर्वाह और परिवार की उचित व्यवस्था पर बिना किसी प्रकार का आन्तरिक दबाव डाले युग धर्म की पुकार सुनने वाले-उसके लिए कुछ करने वाले प्राणवानों के साथ-साथ चला जा सके।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर

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‼️ हमीं एक कदम और आगे बढ़ें ‼️

युगान्तरीय चेतना से परिचित, प्रभावित, प्रशंसक, समर्थक, प्रज्ञा-परिवार को एक कदम आगे बढ़कर अब सघन सहयोग की भूमिका में प्रवेश करना होगा। उन्हें अपना एक विशिष्ट स्तर एवं स्वरूप विनिर्मित करना होगा। समय के परिवर्तन में उनकी भावभरी भूमिका होनी चाहिए। ऐसे भाव-भरी जो उन्हें महामानवों की-युग पुरुषों की-पंक्ति में खड़ा कर दे। ऐसी भावभरी जिसमें त्याग, बलिदान और सेवा साधना का गहरा पुट हो। जो विचार समर्थन से आगे बढ़कर कर्मभूमि में उतरे और एक कुछ करे जिससे समूचे संपर्क क्षेत्र को नव जीवन मिले। ऐसा नव जीवन जिसे उपलब्ध करने वाले कृत-कृत्य होकर रहें और कृतज्ञतापूर्वक अगणित पीढ़ियों तक स्मरण, नमन, वन्दन करते रहें।

बात दूसरे स्तर के साहस भर की है। मानव जीवन दुस्साहसियों से भरा है। इसमें पग-पग पर जोखिम है। त्याग और संयम की विवशता भी बनी ही रहती हैं। इच्छा से नहीं, अनिच्छा से प्रकृति प्रेरणा से करना तो वही पड़ता है। प्रश्न इतना भर है कि क्या वह सब ढर्रे से बाधित होकर करने की अपेक्षा विवेकपूर्वक, अन्तः प्रेरणा से, आदर्शों के निमित्त किया जा सकता है क्या? बाधित होकर या स्वेच्छा पूर्वक-व्यामोह के दबाव से या विवेक भरे उत्साह से चयन इन्हीं दो में से एक का काम करना पड़ता है। जोखिम दोनों में समान है। न चाहने पर भी जो करने के लिए प्रकृति बाधित करती है उसी को यदि अन्तः प्रेरणा से आपत्तिकालीन युग धर्म की पुकार पूरी करने के लिए किया जा सके तो एक शब्द में उसे विवेक भरी साहसिकता और मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली साहसिकता ही कहा जाएगा। समय आ गया कि इस परीक्षा की घड़ी में अपने चयन चुनाव में राजहंसों जैसी उत्कृष्टता का परिचय देना होगा। इस विषम बेला में उन्हें प्रेय का नहीं श्रेय का वरण करना चाहिए।

अमृतवाणी:- भावी महाभारत | Bhavi Mahabharat | Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/IdZz6NdR3IU?si=pEZWJZ2goASbNWUV

मनुष्य कमाता बहुत हैं, पर प्रकृति उसमें से थोड़ा-सा ही खाने की छूट देती है। चार रोटी ही पेट में प्रवेश कर पाती हैं। चाहने पर भी कोई अधिक उदरस्थ नहीं कर सकता। तन ढकने के वस्त्र, सोने का बिस्तर औसत लम्बाई से अधिक के प्रयुक्त नहीं हो सकते। जो खाया खर्चा उसके उपरान्त का बचत भाग किन्हीं दूसरों के लिए छोड़ना ही पड़ता है। मरने के बाद तो सिकन्दर कुछ न ले जा सका और ताबूत से बाहर खुले हाथ निकलवा कर ऐसे ही रोता-कलपता चला गया। प्रश्न इतना भर है कि उस बचत की अनावश्यक रूप से कुटुम्बियों पर ही लादा जाय या उस स्वाति-बूँद की तरह असंख्य प्यासों पर बरसा दिया जाय? चुना किसे गया इसी में अपनी सूझ-बूझ है। स्वयं के लिए तो सीमित उपयोग ही सम्भव है। यह समय साधना यह उदारता, अपनाने के लिए प्रकृति ने हर किसी को बाधित किया हैं बात इतनी भर है कि व्यामोह की जकड़न ही सब कुछ रही, या आदर्शवादी विवेकशीलता अपनाने वाली आत्म प्रेरणा से भी कुछ करते-धरते न बन पड़ा।

यह सोचना मात्र भ्रम है कि आदर्शवादी गतिविधियों में भाग लेने से-परमार्थ प्रयोजनों में सहयोग करने से घाटा पड़ता है और घर वालों की सुविधा में कमी पड़ती है। इस चिन्तन के पीछे मिथ्या और डर मात्र है। महामानवों में से प्रत्येक की जीवनचर्या पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ढर्रा बदलते समय की थोड़ी-सी असुविधा के अतिरिक्त उनमें से किसी को भी घाटे में नहीं रहना पड़ा। बुद्ध ने क्या खोया? गाँधी को कितना घाटा पड़ा? शंकराचार्य, चाणक्य आदि अन्यान्यों की तरह गोरख धन्धे में उलझे रहने को बुद्धिमानी और आदर्शवादी साहस अपनाने की मूर्खता माने बैठे रहते तो उनकी गणना पेट प्रजनन के कोल्हू में पिलने वाले नर पामरों से अधिक न रही होती। दुनियादार कबीर, नानक दादू, रैदास, ज्ञानेश्वर, चैतन्य, वह न बन सके होते जो कृपणता का परित्याग करने के उपरान्त बन गये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1982 अक्टूबर

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👉 श्रेष्ठ आदतों में सर्वप्रमुख- नियमितता (भाग 2)

बुरी आदतें अक्सर दूसरों की देखा-देखी या सम्बद्ध वातावरण के कारण क्रियान्वित होती और स्वभाव का अंग बनती चली जाती हैं। मन का स्वभाव पानी की तरह नीचे की ओर लुढ़कने का है। इन दिनों लोक प्रवाह भी अवांछनियता का पक्षधर ही बन गया है। दोस्ती गाँठने वाले चमकदार व्यक्तियों में से अधिकाँश की आदतें घटिया स्तर की होती हैं। उनके प्रभाव संपर्क से भी वैसा ही अनुकरण चल पड़ता है। इस प्रकार अनायास ही मनुष्य बुरी आदतों का शिकार बनता जाता है। यही है वह चंगुल जिसमें जकड़े हुए लोग हेय जीवन जीते और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम सहते हैं।

जिस क्रम से आदतें अपनाई जाती हैं, उसी रास्ते उन्हें छोड़ा या बदला भी जा सकता है। रुझान, संपर्क, वातावरण, अभ्यास यदि बदला जा सके तो कुछ दिन हैरान करने के बाद आदतें बदल भी जाती हैं। कई बार प्रबल मनोबल के सहारे उन्हें संकल्पपूर्वक एवं झटके से भी उखाड़ा जा सकता है। पर ऐसा होता बहुत ही कम है। बाहर की अवांछनियताओं से जूझने के तो अनेक उपाय हैं, पर आन्तरिक दुर्बलताओं से एकबारगी गुंथ जाना और उन्हें पछाड़ कर ही पीछे हटना किन्हीं मनस्वी लोगों के लिए ही सम्भव होता है। दुर्बल मन वाले तो छोड़ने पकड़ने आगे बढ़ने पीछे हटने के कुचक्र में ही फंसे रहते हैं। अभीष्ट परिवर्तन होने पर उसका दोष जिस-तिस पर मढ़ते रहते हैं। किन्तु वास्तविकता इतनी ही है कि आत्म परिष्कार के लिए- सत्प्रवृत्तियों के अभ्यस्त बनने के लिए- सुदृढ़ निश्चय के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं। जिन्हें पिछड़ेपन से उबरने और प्रगतिशील जीवन अपनाने की वास्तविक इच्छा हो उन्हें अपनी आदतों का पर्यवेक्षण करना चाहिए और उनमें से जो अनुपयुक्त हों उन्हें छोड़ने, बदलने का सुनिश्चित निर्धारण करना चाहिए। स्वभाग्य निर्माता, प्रगतिशील महामानवों में से प्रत्येक को यही उपाय अपनाना पड़ता है।

अनगढ़ स्थिति में आमतौर से सभी मनुष्य कुसंस्कारी होते हैं। जीव ने क्रमिक विकास के लम्बे रास्ते पर चलते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचने में सफलता पाई है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। महत्वाकाँक्षा ने अधिक उत्तम परिस्थिति प्राप्त करने के लिए तद्नुरूप मनःस्थिति बनाई है। सदुद्देश्य के लिए किये गये प्रयत्नों में नियति भी सहायक होती है और ईश्वर की अनुकम्पा भी। अस्तु जीवधारी को उच्च स्तरीय स्थिति तक पहुँचने की अभिलाषा उसे वहाँ ले आई जहाँ सृष्टि का मुकुट-मणि मनुष्य कहलाने का गर्व-गौरव उपलब्धि हो सके।

इतने पर भी अनेकों में कुसंस्कारों का अभ्यास अभी भी बना हुआ है जो निम्न योनियों की विषम परिस्थितियों में भले ही स्वाभाविक रहे हैं, पर आज उन्हें अपनाये रहने में हानि ही हानि है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1981 फरवरी

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👉 आत्म कल्याण का सरल मार्ग (अंतिम भाग)

जिन्होंने बहुत उपदेश सुने हैं, वे देवता रूप हैं। कारण, जब मनुष्य की प्रवृत्ति अच्छाई की और होती है, तभी वह सदुपदेशों को ग्रहण करता है। तभी सत्संग में बैठता है। तभी मन में और अपने चारों ओर वैसा शुभ सात्विक वातावरण बनाता है। किसी विचार को सुनने का तात्पर्य चुपचाप उसमें रस लेना, उसमें रमण करना भी है। जो जैसा सुनता है, कालान्तर में वैसा ही बन भी जाता है। हम जिन सदुपदेशों को ध्यानपूर्वक सुनेंगे, कल निश्चय ही वैसे बन भी जावेंगे।

एक विद्वान ने कहा है, जल जैसी जमीन पर बहता है उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे बुरे विचारों का लोगों की संगति के अनुसार बदल जाता है। इसलिये चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन मूर्ख व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल मिल जाते हैं और उनके संपर्क से अपने आपको भी दुष्ट ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, किन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भय रहती है जहाँ वह, उठता बैठता है। आदमी का घर चाहे जहाँ हो पर वास्तव में उसका निवास स्थान वह है जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों या विचारों की सोहबत पसन्द है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति पर निर्भर है। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे कर्म करे, यह बहुत ही कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग या सदुपदेशों से ही प्राप्त होती है। स्मरण रखिये कुसंग से बढ़कर कोई हानिकारक वस्तु नहीं हैं सत्संगति से बढ़ कर कोई लाभ नहीं है।

जब हम सदुपदेशों की संगति में रहते हैं, तो गुप्त रूप से अच्छाई में बदलते भी रहते हैं। वह सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक क्रिया स्थूल नेत्रों से दीखती नहीं हैं किन्तु इसका प्रभाव तीव्र होता है। अन्ततः मनुष्य उन्हीं के अनुसार बदल जाता है।

गंगा जल से जिस प्रकार शरीर शुद्ध होता है, सदुपदेश से मन बुद्धि और आत्मा पवित्र होती है। धर्मात्मा पुरुषों की शिक्षा एक सुदृढ़ लाठी के समान है जो गिरे हुये पतितों को सहारा देकर ऊंचा उठती है और बुरे अवसरों पर, गिरने से बचा लेती है। जो शिक्षित हैं, उनके लिये सैकड़ों एक से एक सुन्दर अनुभव पूर्ण ग्रन्थ विद्यमान हैं, कवियों, विचारकों इनका मनन व आचरण करना चाहिए। जो अशिक्षित है वे लोग भी धर्मात्माओं के संग से इतनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं कि जिसमें अपने आपको संभाल सकें और विपत्ति के समय अपने पैरों पर खड़ा हो सकें। स्वयं भगवान गीता में कहते हैं।

नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्र मिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसं सिद्धः कालेनात्मनि विन्दति
॥4।38
*अर्थात् इस संसार में सद्ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कोई भी पदार्थ नहीं है उस ज्ञान को कितने ही काल से कार्य योग के द्वारा सुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है।*

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 18 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2026


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‼️ हमीं एक कदम और आगे बढ़ें ( भाग 2) ‼️

गीताकार ने योगी की व्याख्या करते हुए उसकी पहचान “दिन में सोने रात में जगने की” बताई है। इस अलंकारिक निरूपण का तात्पर्य है दुनियादारी की रीति...