शुक्रवार, 5 जून 2026

👉 प्राणशक्ति का अपव्यय−मूर्खतापूर्ण अनाचरण

अपनी प्राण−शक्ति को यदि हम मितव्ययता पूर्वक खर्च करें तो जीवन को लम्बा और निरोग बनाने में उसका उपयोग कर सकते हैं और इस बचत से कुछ महत्वपूर्ण उपार्जन कर सकते हैं।

प्राण−शक्ति का सबसे अधिक अपव्यय अनावश्यक भोजन भार वहन करने से होता है। शरीर रक्षा के लिए सरल और स्वल्प भोजन की आवश्यकता होती है किन्तु हम दुष्पाच्य रूप में अधिक मात्रा में उसे ग्रहण करते हैं। सोचते हैं कीमती, स्वादिष्ट और अधिक भोजन करने से बलिष्ठ बनेंगे पर होता ठीक उलटा है। गरिष्ठ और प्रचुर भोजन जितनी शक्ति उत्पन्न करता है उससे कहीं अधिक अपने पचाने में खर्च करा लेता है अस्तु हम प्रतिदिन घाटे में रहते हैं और अन्ततः दिवालिया बनकर असमय में ही जीवनलीला समाप्त कर देते हैं।

प्राण कहाँ से आता है? उसके उपलब्धि स्रोत कहाँ हैं? यह तलाश करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि यह बहुमूल्य सम्पदा हमें शुद्ध वायु,निर्मल जल, सात्विक आहार, सूर्य संपर्क, गहरी नींद संतुष्ट मनःस्थिति से प्राप्त होती है। इन शक्ति स्रोतों की जितनी उपेक्षा करेंगे, उनसे जितने दूर रहेंगे उसने ही क्षीण होते चले जायेंगे? कमाई कम और खर्च अधिक करने पर कोई व्यवसाय ठीक तरह नहीं चलता फिर जीवन व्यवसाय ही कैसे चलेगा?

हर काम की सीमा है। मर्यादा में रहकर ही स्थिरता प्राप्त हो सकती है। सामर्थ्य से अधिक काम करना—साधनों से असंबद्ध महत्वाकाँक्षाऐं गढ़ना— भोगासिक्त में निमग्न होकर इन्द्रियों से अधिक काम लेना, दिनचर्या की नियमितता का ध्यान न रखना आदि बातें देखने सुनने में कोई बहुत बड़ी गलतियाँ नहीं मालूम पड़ती, पर वे छोटी होने पर भी चिनगारी की तरह हमारे हँसते−खेलते जीवनोद्यान में आग लगा देने के लिए पर्याप्त है। नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला अपनी प्रामाणिकता खो बैठता है और जनसहयोग से वञ्चित होता चला जाता है। व्यक्ति गत जीवनचर्या में मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाला उस बहुमूल्य सम्पदा को खोता चला जाता है जिसके आधार पर सर्वतोमुखी प्रगति की सम्भावनाओं की पृष्ठभूमि बनती है।

विषपान से आत्म−हत्या करने वाले की रक्षा कौन कब तक करेगा? जिनने नशे पीकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारने पर कमर ली है उनकी प्राण−शक्ति कब तक स्थिर रहेगी। उत्तेजक मसाले भी एक प्रकार के विष ही हैं। वासनात्मक उत्तेजनाओं से मन को निरन्तर उद्विग्न करते रहने से हम अपनी ही सुसंचित जीवन सम्पदा का क्षरण करते चले जाते हैं और अपने ही पापों का फल भोगने के लिए रुग्णता, अशक्त ता एवं अकाल मृत्यु के नरक में जा मिलते हैं।

दार्शनिक कन्फ्यूशियस ठीक ही कहते थे—जो मितव्ययता के नियम को भंग करेगा वह अन्त में दुसह दुख सहता हुआ मरेगा। उनकी यह उक्ति प्राण−शक्ति के अपव्यय के सम्बन्ध में सोलहों आने सच उतरती है। हम अपनी ही जीवन सामर्थ्य से खिलवाड़ करते हैं— उसे अनावश्यक रूप से बर्बाद करते हैं ऐसी दशा में पग−पग पर ठोकर खाने और अशान्त असफल रहने का दुष्परिणाम भोगें तो आश्चर्य ही क्या है?

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👉 कुकर्मों की सर्वनाशी विभीषिका (भाग 1)

पाप का आकर्षक सर्प की तरह सुहावना लगता है मनुष्य उसे लाभ और सुख की आशा से पकड़ने का प्रयत्न करता है और आरम्भ में उस पकड़ की सफलता पर प्रसन्न भी होता है पर कुछ ही समय में यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फाँसी का फन्दा गले में बाँध लेने की तरह कितना दुखद और कितना विषम था।

चूहा सरलता पूर्वक रोटी का, मिठाई का टुकड़ा पाने के लालच से पिंजड़े के छेद में प्रवेश करता है, इस सफलता को वह अपनी बुद्धिमत्ता और सौभाग्य भरी उपलब्धि मानता है। मिठाई में दाँत लगाते समय तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना ही नहीं रहता। दूसरे चूहे जबकि एक-एक दाना बीनते जहाँ-जहाँ भटकते हैं तब उसने सहज ही इतनी सारी मिठाई खाने का अवसर प्राप्त कर लिया-क्या यह कम आनन्द की बात है? चूहा इस सौमान्य कल्पना में अधिक देर नहीं उड़ पाता। कठोर वास्तविकता कुछ ही क्षणों में सामने आ खड़ी होती है। खटका गिरता है और उस कैद में जकड़ जाता है जिसका अन्त मृत्यु के साथ ही सम्भव होता है। तब उसे समझ आती है कि यह आकर्षण भरा प्रलोभन बहुत महंगा पड़ा। अच्छा होता वह एक-एक दाना बीनकर—भारी दौड़धूप करके—पेट भरने को सन्तोषजनक मान लेता।

दुष्कर्मों और दुर्व्यसनों का स्वरूप और आकर्षण कुछ ऐसा ही है जिसे देखकर अदूरदर्शी उन पर बेतरह टूट पड़ने हैं। आगा-पीछा सोचने लायक विवेक भी हाथ में नहीं रहता। अधिक जल्दी—अधिक मात्रा में—अधिक सुख पाने की लिप्सा उस सूक्ष्म चिंतन का  अपहरण कर लेती है जिससे यथार्थता क —प्रतिक्रिया को समझना सम्भव होता है। कुकर्मी के  आरम्भ में अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व होता है। अपने उस साहस की आप ही प्रशंसा करता है जिसे दूसरे लोग कर नहीं पाये और अधिक सुखोपभोग करने से वंचित रह गये। किन्तु उसकी यह मान्यता देर तक स्थिर नहीं रहती। कुछ ही समय में पता चलता है कि जो कमाया गया उससे हजारों गुना अधिक गँधा दिया गया।

कुकर्मी को अपना शील, सदाचार गँवाना पड़ता है। इसके साथ ही उसकी आन्तरिक गरिमा नष्ट हो जाती है। जिन आस्थाओं के कारण मनुष्य अपनी आँखों में सम्मानित होता है और दूसरों की आँखें उसे श्रेष्ठ सत् पुरुषों में गिनती है उन्हें गँवा देने के बाद आदमी एक ओछा और घिनौना प्राणी भर रह जाता है। इन्द्रिय सुख और अहंकार का पोषण एक सीमा तक कर लेने पर भी उसे निरन्तर यह लगता रहता है कि कोई ऐसी चीज हाथ से चली गई जो आत्मिक आनन्द एवं सन्तोष की दृष्टि से नितान्त आवश्यक थी। अपनी आँख में गिरने वाला व्यक्ति अन्य किसी की दृष्टि में सम्मानास्पद और प्रामाणिक नहीं हो सकता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1974 

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 05 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 June 2026


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👉 प्राणशक्ति का अपव्यय−मूर्खतापूर्ण अनाचरण

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