शुक्रवार, 12 जून 2026

👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (अंतिम भाग)

संत ईसा ने कहा था “अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक बुरे शब्द के लिए मनुष्य को फैसले के दिन सफाई देनी होगी।” और बुरे शब्दों से हम मौन के द्वारा ही बच सकते है।

स्मरण रहे, सहज मौन ही हमारे ज्ञान की कसौटी है। “जानने वाला बोलता नहीं और बोलने वाला जानता नहीं।” इस कहावत के अनुसार जब हम सूक्ष्म रहस्यों को जान लेते हैं तो हमारी वाणी बन्द हो जाती है। ज्ञान की सर्वोच्च भूमिका में सहज मौन स्वयमेव पैदा हो जाता है। स्थिर जल बड़ा गहरा होता है। उसी तरह मौन मनुष्य के ज्ञान की गम्भीरता का चिन्ह है।

वाचालता पांडित्य की कसौटी नहीं है, वरन् गहन गम्भीर मौन ही मनुष्य के पण्डित, ज्ञानी होने का प्रमाण है।

मौन ही मनुष्य की विपत्ति का सच्चा साथी है, जो अनेक कठिनाइयों से उसे बचा लेता है। ड्राईडेन ने विपत्ति में मौन रहना सच्चा उपाय बताया है। सन्त रहीम ने भी फिरे दिनों में चुप होकर बैठने की सलाह दी है-
रहिमन चुप ह्वै बैठिए देखि दिनन को फेर
सन्त कबीर ने भी वादविवाद को मिटाने को गुरुमन्त्र बताते हुए कहा है-
“वाद विवाह विषधना बोले बहुत उपाध। मौन गहे सबकी सहे सुमिरे नाम अगाध ॥”

आत्मा की वाणी सुनने के लिए, जीवन और जगत के रहस्यों को जानने के लिये, लड़ाई झगड़े, वाद-विवादों को नष्ट करने के लिए, वाचिक पाप से बचने के लिए, ज्ञान की साधना के लिए, विपत्तियों के दिनों को गुजारने के लिये, वाणी के तप के लिए तथा अन्यान्य हितकर परिणामों के लिए हमें मौन का अवलम्बन लेना चाहिए।
दैनिक जीवन में मित भाषण और हित भाषण की आदत डालकर हम लौकिक और आध्यात्मिक प्रगति का द्वार ही प्रशस्त कर सकते हैं।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (अंतिम भाग)

संत ईसा ने कहा था “अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक बुरे शब्द के लिए मनुष्य को फैसले के दिन सफाई देनी होगी।” और बुरे शब्दों से हम मौन के द्वारा ...