सोमवार, 22 जून 2026

👉 हमारी चरित्र-भ्रष्टता कैसे मिटे? (अंतिम भाग)

इस तरह के प्रतिरोध के लिए अकेले व्यक्ति को तो संकल्प करना ही चाहिए, किन्तु सारे समाज को संगठित होकर बुराइयों के विपरीत कदम उठाना चाहिए। कोई कारण नहीं कि समाज की संगठित शक्ति के समक्ष बुराइयाँ जीवित रह सकें। खेद है, सामाजिक उत्तरदायित्व हम लोग नहीं समझते। कोई व्यक्ति किसी गुण्डे से निपटते समय सहायता के लिए पुकार करता है, तो हम किवाड़ बन्द करके बैठ जाते हैं, सुनकर भी अनसुनी कर जाते हैं, देखकर भी अनदेखे बन जाते हैं। लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब हमें भी इन दूषित तत्वों से आक्रान्त होना पड़ेगा।

आज बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष में, भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सामूहिक अभियान की आवश्यकता है। जब तक लोगों में इस सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पैदा न होगी, तब तक बुराइयाँ एक-एक कर हम सबको प्रभावित करती रहेंगी, हानि पहुँचाती रहेंगी।

हमारी एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बड़े-बड़े सिद्धान्त बघारते हैं, नीति और न्याय की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, लेकिन यह सब दूसरों के लिए। अपने कार्य कलापों को न्याय, नीति की कसौटी पर हम बहुत ही कम कसते हैं। एक दुकानदार बाजार में बैठकर सरकार, पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोज कर आलोचना करता है, किन्तु उसकी आलोचक वृत्ति उस समय गायब हो जाती है, जब वह वस्तुओं में मिलावट करता है, ग्राहकों को कम तोलता है, अधिक मुनाफा वसूल करता है। आततायी और गुण्डों को हम लोग कोसते हैं, उन्हें बुरा कहते हैं, किन्तु हमारी समीक्षात्मक बुद्धि उस समय जाने कहाँ चली जाती है, जब हम पराई स्त्री को बुरी निगाह से देखते हैं। बिना प्रति-मूल्य दिए समाज के साधनों का उपभोग करते हैं, अनीति के साथ धन एकत्र करते हैं, दूसरों के श्रम अधिकार एवं साधनों का अनुचित शोषण करते हैं।

जिस तरह हम दूसरों की आलोचना करते हैं, उसके लिए न्याय नीति की माँग करते हैं, उसी तरह यह भी आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार को नीति, धर्म की कसौटी पर कसें। जो बुरा है उसे न करें।

हम दूसरों के साथ कोई ऐसी बात न करें जो स्वयं अपने लिए न चाहते हों। बुराइयों को मिटाने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व जो हम पर हैं, उसे सब तरह के खतरे उठाकर भी पूरा करने में न चूकें। कार्य व्यवहार को नीति, न्याय और धर्म की कसौटी पर परखें, जो बुराई है उससे दूर रहें। ये तीन बातें हमारे जीवन में ढल जायँ तो कोई सन्देह नहीं कि ये बुराइयां आज नहीं तो कल समाप्त ही हो जायगी।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram

धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


👉 स्वर्ग आपके घर में हैं। (भाग 3)

इस सुख की अनुभूति तभी मिल सकती है, जब स्त्री-पुरुषों में पारस्परिक विश्वास सुदृढ़ बना रहे। इससे आत्मीयता बनी रहती है, स्नेह स्थिर रहता है। छोटी-मोटी गलतियाँ भी हो जाती हैं, तो उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा कर देने से सम्बन्धों में बिगाड़ पैदा नहीं होता। जो इतना भी न कर सकें, उसे मनुष्य कहना भी भूल है। मनुष्य की सच्ची कसौटी वह है कि यह अपने संरक्षण में निवास करते वालों का शारीरिक और मानसिक भरण पोषण करने हुए दूसरों के हितों में ही अपना सुख माने। अपनी पत्नी, अपने बच्चों को सुखी, हँसता-खेलता देखकर कौन ऐसा सद्गृहस्थ होगा, जिसे खुशी न होती हो। 

छोटी-छोटी गलतियाँ प्रायः सबसे होती रहती हैं। दाल में थोड़ा नमक ज्यादा हो गया, बच्चे ने दूध बिखेर दिया या भोजन पकाने में थोड़ा विलम्ब हो गया, इतने मात्र से यह मान लेना कि आपकी पत्नी आपका ध्यान नहीं रखती, उचित प्रतीत नहीं होता। जिस प्रकार पुरुषों को बाह्य जीवन में अनेकों उलझनें आती हैं, वैसी ही घर में भी सम्भव हैं। इन समस्याओं को लेकर अपने मधुर सम्बन्ध क्यों खराब करें? उदारता पूर्वक गलतियों को क्षमा कर देने से दूसरे भी सोचते है कि आपको उनका कितना ध्यान है। इसी बात को लेकर तो नारियाँ अपने पिता का घर छोड़कर पतियों का सहचर्य स्वीकार करती हैं जिससे इसकी पूर्ति भी सम्भव न हो सकी, इतना भी नहीं बन पड़ा तो उस अभागे पति को कंजूस ही कहा जायगा।

आनन्द का वातावरण पति-पत्नी के स्नेहपूर्ण सम्बन्धों पर आधारित है। उनमें आत्मीयता हो तो कम-शिक्षित और कम सुन्दर दम्पत्ति भी अभावपूर्ण जीवन में भी सुख का रसास्वादन प्राप्त कर सकते हैं। आकर्षण का कारण बाह्य सौंदर्य नहीं कहा जा सकता। आन्तरिक पवित्रता, स्नेह और आत्मीयता के कारण अपनी कम सुन्दर पत्नी भी प्राण-प्रिय होती है। घर का सौंदर्य भी मधुर सम्बन्धों से ही फलता-फूलता है।-शास्त्रों का कथन है-

भार्यापत्युर्व्रतं कुर्याद् भार्यावाश्व पतिवतम्।
संसारोऽपि हि सारः स्याद दम्पत्योरेक कः॥
यदि पति-पत्नी एक हृदय हों तो यह अनुसार संसार भी सारवान् बन सकता है। वहाँ इसी धरती में भी स्वर्ग के दर्शन करने हों तो हर सद्गृहस्थ को अपने दाम्पत्य जीवन में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता और अभिन्नता की भावना पैदा करनी होगी।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram

धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 22 June 2026


शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें।
आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए आधिकारिक माध्यमों से जुड़ें।

Shantikunj Haridwar के आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म (Official Platforms):  
👇👇👇👇
▶️ Official YouTube Channel
Shantikunj Rishi Chintan – AWGP

📢 Official WhatsApp Channel

📱 Official WhatsApp Number
8439014110

📸 Official Instagram

𝕏 Official X (Twitter)

✈️ Official Telegram

धन्यवाद 🙏
आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 June 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग १)

आत्म स्वरूप का ज्ञान, जिज्ञासा द्वारा ही संभव है। हम वस्तुतः है क्या-यह बोध तभी हो सकता है, जब हम उसको जानने के लिए उत्सुक और उत्कंठित हो जि...