शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (भाग 1)

निराशा, चिन्ता, असन्तोष अथवा उद्वेग किसी भी, आपत्ति अथवा विषमताओं का उपचार नहीं है। यह विकास स्वयं ही रोग और विपत्ति माने गये है। संसार में जो भी व्यक्ति सफल हुये हैं, उन्होंने अपने जीवन में निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष की कभी अवसर नहीं दिया। उन्होंने विकट से विकट परिस्थितियों में अपने को इन विकारों से बचाया है। संसार में जो भी असफल होते हैं, उनकी असफलता का कारण अभाव अथवा प्रतिकूल परिस्थितियाँ नहीं होती। उनका एक मात्र कारण निराशा, चिन्ता अथवा असन्तोष ही होता है। असफलता का निवास बाह्य परिस्थितियों की प्रतिकूलता में नहीं मनुष्य की प्रति गामिनी भावनाओं में होता है।

निराशा एक मानसिक रोग है। यह मनुष्य की गतिशीलता को अस्वस्थ बना देता है। निराशावादी व्यक्ति प्रगति की भावना और उन्नति की जिज्ञासा से उदासीन हो जाता है। प्रगति अथवा उन्नति की बात मन में आते ही उसे ऐसा आभास होने लगता है, मानो वह अपने ऊपर कोई विपत्ति लाने की बात सोच रहा हे। काम में प्रवृत्ति लाने से पूर्व ही उसे आपत्तियाँ, कठिनाईयाँ और असफलता दिखलाई देने लगती है। उसका साहस मर जाता है, उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। आपने को जहाँ का तहाँ पड़ा सुरक्षित अनुभव करता है। एक निराशावादी और मृत व्यक्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। एक स्थित शव की तरह होता है, एक चलती-फिरती लाश की तरह।

चिन्ता की चिंता तक कहा गया है। किन्तु चिन्ता रूपी चिता श्मशान की चिता से अधिक भयंकर होती है। क्योंकि वह चिंता मेरे मनुष्य को जलाया करती है और यह जीवित मनुष्य को। चिंता-ग्रस्त मनुष्य अन्दर गीली लकड़ी की तरह सुलगता करता है। इस जलन में सबसे पहले उसकी प्रसन्नता जलती है, फिर जीवन की आशाएँ, अनन्त क्षमताएँ और अन्ततः शरीर। चिन्ता की आग इस प्रकार क्रम-क्रम से जलाकर मनुष्य का सारा जीवन खाक कर डालती है।

चिन्ता की चिंता में बैठा मनुष्य अपनी यातना पूर्ण मृत्यु की प्रतीक्षा करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता। जिस वृक्ष में आग लग गई हो अथवा जिसे दावाग्नि ने झुलस डाला हो उससे हरियाली की आशा करना दुराशा मात्र है। ऐसे दाव-दुग्ध वृक्ष में न नये पत्ते उग सकते हैं, न फूल खिल सकते हैं और न फल आ सकते है। उसका ठूँठ होकर निरुपयोगी हो जाना निश्चित है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 दृष्टिकोण का सम्यक् परिष्कार (भाग 1)

नेत्र न होने पर अन्धा मनुष्य अनेक सुख-सुविधाओं से वंचित रह जाता है। उसे दूसरों पर अधिकांश कार्यों के लिए पराश्रित रहना पड़ता है। समुचित स्थान प्राप्त करना और प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ सकना भी अपेक्षाकृत कम ही सम्भव हो पाता है। इसीलिए “आँख गई तो जहान गया” की लोकोक्ति अक्सर सुनी जाती है। आँखों में विकार भर जाने से, छोटा-मोटा दुःख दर्द खड़ा हो जाने से लोग अधिक चिंतित और चौकन्ने होते है। उपचार में कमी नहीं रहने देते। सोचते है आँखें चली गई तो क्या होगा?

आम-लोग चर्मचक्षुओं को ही देखते और जानते है उन्हीं को सौंदर्य का प्रतीक मानते हैं। आँखों में आँखें डालकर एक दूसरे के मनोभावों को परखते है। उन्हीं के सहारे अपना व्यवहार, व्यवसाय चलाते है। अन्य इन्द्रियों का जीवन में जितना महत्व है उससे कम नहीं, वरन् अधिक बड़ी भूमिका चक्षुओं की है पर यह समस्त गुण गान चर्मचक्षुओं के ही किये जाते है।

मनुष्य को ऐसे अदृश्य चक्षु भी उपलब्ध हैं जो प्रत्यक्षतः चेहरे पर सटे दिखाई नहीं पड़ते, पर उन्हें परोक्ष रूप से महती भूमिका निबाहते देखा जा सकता है। यह है ज्ञानचक्षु। इन्हें प्रजा-चक्षु भी कहते है। इनका कर्तव्य दूरदर्शी विवेकशीलता के रूप में दीख पड़ता है। इन्हें आमतौर से बन्द ही पाया जाता है। प्रायः लोग उतनी ही परिधि में देख-भाल कर पाते हैं, जितना कि प्रत्यक्ष आंखें देख पाती है। इतने ही क्षेत्र को अपनी सीमा समझते हैं। उसी दायरे में कुछ सोचने की, करने की आवश्यकता समझते है। घाटे और नफे को भी इसी सीमा में घटित होने वाले घटना-क्रम के आधार पर मूल्याँकन करते है। प्रगति भी इसी सीमा में सीमित रहती है। एक प्रकार से इतनी ही परिधि में उनका अपना संस्कार सिकुड़ा हुआ होता है।

नेत्रों की दृष्टि कम हो जाने पर दूर की चीजें दीखना बंद हो जाता है और जिसे देखना है उसे आँखों के समीप लाना पड़ता है। दूर रहने पर एक धुँधली-सी छवि ही चलती फिरती दीखती है जो इस विशाल विश्व के कण कण में बिखरा पड़ा है, जो युग युगान्तरों से बढ़ता चला आया है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 03 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 03 July 2026



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