रविवार, 14 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (भाग 1)

मकान-मालिक जब घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है तो उस मकान की दुर्दशा प्रारम्भ हो जाती है। मकड़ियाँ जाला बनाने लगती हैं। जगह-जगह चिड़ियाँ घोंसले बना लेती हैं। कीड़े-मकोड़े बढ़ जाते हैं। वर्षा और वायु के प्रकोप से दीवालों में दरारें पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे आलीशान मकान भी खाली पड़े रहने पर ध्वस्त होकर धराशायी बन जाते हैं। यह स्थिति घर में फली क्रियाशीलता के अभाव से हो जाती है। जब तक मालिक रहता है, तब तक उसकी लिपाई, पुताई, छानी-छप्पर, मिट्टी-मरम्मत होती रहती है। इससे वही मकान साफ -सुथरा और वर्षा में भी सुदृढ़ बना रहता है। ठीक यही बात मानव जीवन के बारे में भी लागू होती है। जब तक मनुष्य क्रिया-शील रहता है तब तक अंग-प्रत्यंग तथा मानसिक चेष्टायें सही दिशा में लगी रहती हैं, पर जैसे ही आलस्य और अकर्मण्यता संवार हुई कि रोग-शोक, असन्तोष और अशान्ति, दैन्य और दीनता के जीव-जन्तु अपना-अपना अड्डा मनःक्षेत्र में जमाने लग जाते हैं और चारों ओर निराशा की मुर्दनी छाई जान पड़ने लगती है।

लोहा देखने में कितना ठोस व मजबूत दिखाई पड़ता है। सारे शरीर की शक्ति लगा कर भी उसे तोड़ा जाना सम्भव नहीं। काटना हो तो पैनी छैनी और वजनदार घनों की चोट देनी पड़ेगी। पर उसी लोहे को किसी कूड़े-कचरे के ढेर में फेंक दीजिये तो कुछ ही दिन में जंग लग जायगी और सम्पूर्ण लोहे को चाट कर बैठ जायेगी। मनुष्य शरीर भी लोहे जैसा ही है। इसकी सुन्दरता और मजबूती तभी तक स्थिर समझिये, जब तक इसमें क्रियाशीलता है। काम से जी-चुराने और दूर भागने का परिणाम लोहे में जंग लग जाने जैसा ही हो सकता है। शरीर का महत्व काम से ही है।

कहावत है- “खाली दिमाग शैतान का घर” अर्थात् निरर्थक समय बिताने और आलस्य में पड़े रहने से उत्पन्न शिथिलता अनेक प्रकार की विकृतियाँ ही पैदा करती है। अपने साथ अनेक औरों को भी इससे हानि ही होती है। पारस्परिक कलह, अनैतिक तत्व और दुराचार बरतने वाले वे ही लोग होते हैं जो श्रम से जी चुराते हैं। जो फैशनपरस्ती को ही जीवन मानकर केवल बन ठन कर इधर-उधर घूमते रहते हैं, ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिये अभिशाप माने जाते हैं । ऐसे आदमियों को कोई अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। उनका सभी जगह निरादर होता है। प्यारा चाम नहीं काम होता है।

जीवन-विद्या के विद्वान व प्रमुख आचार्य टिनमैन अपने अनुयाइयों को सम्बोधित कर कहा करते थे-”जो आलस्य में अपना मूल्यवान् समय गँवाता है वह अभागा है। पृथ्वी पर परिश्रम से मुक्ति नहीं है । मनुष्य कर्म के लिये उत्पन्न हुआ है। उसे जीवन भर परिश्रम करना चाहिये।” एक कर्मशील महापुरुष का कथन है-”जीवन के उपरान्त चिर-काल तक मुझे विश्राम ही तो करना है।”

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 बुद्धिमान ही नहीं संवेदनशील भी बनें (भाग 2)

अस्त्र-शस्त्रों एवं अन्याय विनाशकारी यन्त्रों के निर्माण में बात सुरक्षा की होती तो समझ में भी आती। किंतु राष्ट्रीय सुरक्षा इन विनाशकारी यंत्रों पर नहीं टिकी है। उसके लिये तो सामान्य अस्त्र, शस्त्र एवं कुशल सैनिक भी पर्याप्त होते हैं। उनके शौर्य, पराक्रम के विकास से ही राष्ट्र को बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रखा जा सकता है। विनाशकारी बमों तथा अन्याय विस्फोटक यन्त्रों में तो बुद्धि की कुटिलता ही झाँकती दिखाई देती है।

समाज में जैसा भी आदर्श होगा, उसके अनुरूप ही प्रवृत्तियां पनपेंगी एवं गतिविधियाँ चल पड़ेंगी। आदर्श विलासिता और सम्पन्नता को बनाया गया। फलस्वरूप संसार उसी ओर चल पड़ा। श्रेष्ठ आदर्शों एवं सिद्धांतों के अभाव में गतिविधियों में उत्कृष्टता का समावेश नहीं रहा। कारणों की गहराई में जाने पर एक ही तथ्य का पता लगता है वह है- बुद्धि द्वारा मानवी सम्वेदना की उपेक्षा की जाना। बुद्धि की निरंकुशता इसी कारण बढ़ी। संकीर्णताओं को प्रोत्साहन मिला। ध्वंसात्मक गतिविधियाँ अपनाकर व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने का सिलसिला चल पड़ा।

बुद्धि का महत्व एवं उसकी उपयोगिता असंदिग्ध है। किन्तु यह तभी बन पड़ती है जब उसके साथ सम्वेदनाओं का संयोग हो। बुद्धि की उच्चतम स्थिति को ‘प्रज्ञा’ के नाम से विभूषित किया गया है। सघन सम्वेदनाओं के साथ जुड़कर ही वह इस उच्चतम स्थिति तक पहुँचती है। सृजनात्मक प्रवृत्तियों को इसी के द्वारा प्रोत्साहन मिलता है। साँस्कृतिक विकास की सारी सम्भावनाएँ इसी पर आधारित हैं। बुद्धि की प्रखरता एवं उससे मिलने वाले भौतिक अनुदानों का सही उपयोग विकसित भाव-सम्वेदनाओं द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

महापुरुषों द्वारा छेड़े जाने वाले अभियानों में इस तत्व को विकसित करने का ही महान लक्ष्य अनिवार्य रूप से जुड़ा होता है। वे इस तथ्य से परिचित होते हैं कि इसको उभारे बिना मनुष्य को श्रेष्ठता की ओर नहीं मोड़ा जा सकता। वे साधनों के विकास की उपेक्षा तो नहीं करते किन्तु उनको अधिक प्रधानता भी नहीं देते। उनकी सामर्थ्य मानवोचित्त गुणों के विकास के लिये ही प्रयुक्त होती है। साधना एवं अन्य आध्यात्मिक उपचारों के पीछे भी इसी उद्देश्य की पूर्ति ही निहित होती है।

आदर्शवादी भाव-सम्पन्नता से ही भौतिक उपलब्धियाँ भी मानव मात्र के लिये उपयोगी बन सकती हैं। बुद्धि की प्रखरता भावनाओं की उदात्तता से जुड़कर ही सर्वतोमुखी विकास का आधार प्रस्तुत कर सकती है। इस तथ्य को हृदयंगम कर उसे विकसित करने के लिए हर सम्भव प्रयास किये जाने चाहिए।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1981

Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 14 June 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 June 2026


Shantikunj Haridwar के Official YouTube Channel को Subscribe करके Bell 🔔 बटन को जरूर दबाएं और अपडेट रहें।

👉 Official WhatsApp चैनल  awgpofficial Channel को फॉलो जरूर करें।

Please 👍 Like | 🔄 Share | 🔔 Subscribe


👉 काम करने से जी न चुराइये (भाग 1)

मकान-मालिक जब घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है तो उस मकान की दुर्दशा प्रारम्भ हो जाती है। मकड़ियाँ जाला बनाने लगती हैं। जगह-जगह चिड़ियाँ घ...