मंगलवार, 7 जुलाई 2026

👉 मनोविज्ञान हमारे सबसे बड़े शत्रु (अंतिम भाग)

यह सुरदुर्लभ मानव-जीवन बहुत मूल्यवान उपलब्धि है। यह कल्प-वृक्ष ओर कामधेनु की तरह फलदायी हैं। आप इससे जो चाहें प्राप्त कर सकते है। किंतु यह फलदायक तभी होता है, जब इसे हरा-भरा और प्रसन्न रक्खा जाए। यदि आप इसको चिन्ता की चिंता में जलाते रहेंगे, तब तो यह सूख जायेगा। इसके सारे गुण, सारी विशेषताएँ और सारे अनुग्रह नष्ट हो जाएँगे। चिन्ता छोड़िये, यह मनुष्य की जीवित अवस्था में ही मृत बना देती है। चिन्ता में जल-जलकर मर जाने से कहीं अच्छा है कि आप पुरुषार्थ के मैदान में ही इसका बलिदान दे दें। इस निरर्थक मृत्यु से तो यह सार्थक अंत कहीं अच्छा है। उसमें एक आदर्श और एक ऊँचाई तो है। चिन्ता छोड़कर प्रसन्न होइए। पुरुषार्थ करिये, आप अवश्य सफल होंगे।

आप अभाव-ग्रस्त है। जरूरतों से पीड़ित है तो इसमें क्षुब्ध अथवा असंतुष्ट रहने का क्या काम। असन्तोष आपकी इन पीड़ाओं का उपचार नहीं है। इनका उपचार है, अधिकाधिक परिश्रम एवं पुरुषता। यह वे पैसे का उपचार करने में आपका क्या जाता है? पौरुष तथा श्रमशीलता की शक्ति आपको ईश्वर की ओर से मिली ही है। उसका उपयोग करिए तब अपनी पीड़ाओं से मुक्त हो जाइए। और यदि प्रसन्नता की स्थिति में भी आप संतुष्ट रहते हैं तो समझ लीजिए कि आप लोभ तथा तृष्णा के पिशाच से ग्रस्त है। इसका उपचार संतोष तथा उदारता ही है। अपनी वृत्ति पर विचार कीजिये, उसे बुरा समझकर त्याग दीजिए। लोभ तथा तृष्णा का उपचार उसका तिरस्कार तथा संसार की अमरता में विश्वास करना है। इन्हीं उपायों का अवलम्ब लीजिये, आप असंतोष के पिशाच से छूट कर सुखी हो जाइये।

कोई भी विपत्ति अथवा आपदा क्यों न आ जाए, मूल कर भी उद्वेग में मत बह जाइए। ईश्वर की कृपा में अखंड विश्वास रखिए। अपनी आत्मा तथा बुद्धि-विवेक में अखंड विश्राम रखिए। शान्त एवं गम्भीर बने रहिए। सारी आपदायें आप पर से ऐसे गुजर जायेगी, जैसे किसी सुदृढ़ वृक्ष पर से तूफान निकल जाता है। उद्वेग एक मानसिक त्रुटि है।

निराशा, चिन्ता, असंतोष अथवा उद्वेग किन्हीं समस्याओं का हल नहीं है। यह मानव-जीवन प्रकृति के दोष हैं, जो काम बनाने के बजाय बिगाड़ देते हैं। इसको त्याग कर मनुष्य को सृजनात्मक गुणों का ही अवलम्ब लेकर चलना चाहिए। तभी वह सफल होगा और तभी सुखी तथा संतुष्ट।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1969

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👉 प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं। (भाग १ )

प्रसादे सर्व दुःखानाँ हानि रस्योपजायते।
प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धि पर्यवतिष्ठते॥ गीता 2 /65
अर्थात्- चित्त प्रसन्न रहने से उसके सब दुख दूर होते हैं और प्रसन्न चित्त होने से उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

प्रसन्न चित्त रहने से दो लाभ हैं (1) सब दुख दूर हो जाते हैं और (2) बुद्धि स्थिर होती है। सुखी आदमी का चित्त प्रसन्न रहता है। इसी बात को हम यों भी कह सकते हैं कि प्रसन्न चित्त मनुष्य सुखी होते हैं। सुख और चित्त की प्रसन्नता का आपस में अनन्य सम्बन्ध है। कई आदमी सोचते हैं कि जिसके पास साधन है वह सुखी रहता है और सुखी रहने से उसे प्रसन्नता होती है। पर सही बात यह है कि प्रसन्न रहने से सुख मिलता है और सुखी के पास साधनों की कमी नहीं रहती।

हंसोड़ आदमी मोटे देखे जाते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि मोटे होने की खुशी में हंसी आती है। पर सच्ची बात यह है कि वे हंसते स्वभाव के कारण मोटे हो जाते हैं। प्रसन्नता एक जादू भरी साधना है उसमें चतुर्मुखी सिद्धियाँ मिलती हैं। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक, चारों प्रकार के दुख दूर करने में और इन चारों दिशाओं में उन्नति एवं समृद्धि प्राप्त करने में प्रसन्नता एक अचूक ब्रह्मास्त्र है।

नस नाड़ियों में खून का दौरा भली प्रकार होता है, गर्मी पर्याप्त मात्रा में रहती है। माँस पेशियों में चैतन्यता और फुर्ती भरी रहती है। हंसते रहने से जबड़े, कंठ, श्वांस नाड़ियों और फेफड़े का और पेट का अच्छा व्यायाम होता रहता है। विशेष व्यायामों में तो किन्हीं अंगों पर थोड़ी देर के लिए बहुत दबाव पड़ता है पर हंसने से धीरे धीरे मालिश की तरह भीतरी अंगों का हलका व्यायाम होता रहता है। फलतः उनकी शक्ति बढ़ती है। हंसोड़ आदमियों के फेफड़े, जिगर तिल्ली एवं गुर्दे विशेष रूप से मजबूत पाये जाते हैं। साधारण साँस लेने से फेफड़े का आधा भाग क्रियाशील रहता है आधा भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। इस निष्क्रिय भाग में खाँसी, श्वांस, क्षय आदि के रोग कीटाणु घुस जाते हैं और निर्विरोध रूप से अपनी वंशवृद्धि करते हुए उस व्यक्ति को मृत्यु के मुँह में घसीट ले जाते हैं। परन्तु हंसने से फेफड़ों का समस्त भाग हिलता है, इस हलचल से उनकी सफाई भली प्रकार हो जाती है जिसमें उन रोग कीटों की दाल नहीं गलने पाती। अप्रसन्न, निराश, दुखी, शोकग्रस्त, क्रोधी, ईर्ष्यालु स्वभाव के मनुष्यों का स्वास्थ भट्टी में पड़ी हुई लकड़ी की भाँति जल जाता है पर जो प्रसन्न चित्त हैं, वे इस विपत्ति से बचे रहते हैं। सही कारण है कि खुश मिज़ाज आदमी प्रायः दीर्घ जीवी होते हैं। बीमारी और अकालमृत्यु उन्हें परास्त करने में प्रायः बहुत ही कम सफल होती है।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1947

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 07 July 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 07 July 2026


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