सोमवार, 31 मई 2021

👉 'सफल जीवन'

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा-
गुरुदेव ये 'सफल जीवन' क्या होता है?

गुरु शिष्य को पतंग उड़ाने ले गए।
शिष्य गुरु को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था.

थोड़ी देर बाद शिष्य बोला-

गुरुदेव.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें? ये और ऊपर चली जाएगी।

गुरु ने धागा तोड़ दिया ..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...

तब गुरु ने शिष्य को जीवन का दर्शन समझाया...
बेटे..  'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं; जैसे :
-घर-
 -परिवार-
  -अनुशासन-
   -माता-पिता-
    -गुरू-और-
     -समाज-

और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

वास्तव में यही वो धागे होते हैं - जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..

इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा, जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'

अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."

धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन कहते हैं.."

घर पर ही रहकर अपना और अपने का ध्यान रखे सभी का जीवन मंगलमय हो।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग २५)

👉 तत्वज्ञान क्या है

अब यहां पर ज्ञान का स्वरूप जानने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर दुःख की उत्पत्ति होती किन कारणों से? वैसे तो जीवात्मा अपने मूल रूप में आनन्दमय है। तब अवश्य ही कोई कारण ऐसा होना चाहिये जो उसके लिये दुःख की सृष्टि करता है। उसको भी योगवाशिष्ठ में इस प्रकार बताया गया है—
‘‘देह दुःख विदुर्व्याधि
माध्याख्यं मानसामयम् ।
मौर्ख्य मूले हते विद्या
तत्वज्ञाने परीक्षयः ।।’’
—शारीरिक दुःखों को व्याधि और मानसिक दुःखों को आधि कहते हैं। यह दोनों मुख्य अर्थात् अज्ञान से ही उत्पन्न होती हैं और ज्ञान से नष्ट होती हैं।

संसार के सारे दुःखों का एकमात्र हेतु अविद्या अथवा अज्ञान ही है। जिस प्रकार प्रकाश का अभाव अन्धकार है और अन्धकार का अभाव प्रकाश होता है, उसी प्रकार ज्ञान का अभाव अज्ञान और अज्ञान का ज्ञान होना स्वाभाविक ही है और जिस प्रकार ज्ञान का परिणाम सुख-शान्ति और आनन्द है उसी प्रकार अज्ञान का फल दुःख, अशान्ति और शोक-सन्ताप होना ही चाहिये।

यह युग-युग का अनुभूत तथा अन्वेषित सत्य है कि दुःखों की उत्पत्ति अज्ञान से ही होती है और संसार के सारे विद्वान, चिन्तक एवं मनीषी जन इस बात पर एकमत पाये जाते हैं। इस प्रकार सार्वभौमिक और सार्वजनिक रूप से प्रतिपादित तथ्य में संदेह की गुंजाइश रह ही नहीं जाती—इस प्रकार अपना-अपना मत देते हुये विद्वानों ने कहा है—चाणक्य ने लिखा—‘‘अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं है।’’ विश्वविख्यात दार्शनिक प्लेटो ने कहा है—‘अज्ञानी रहने से जन्म न लेना ही अच्छा है, क्यों कि अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का मूल है।’’ शेक्सपियर ने लिखा है—‘‘अज्ञान ही अन्धकार है।’’

जीवन की समस्त विकृतियों, अनुभव होने वाले दुःखों, उलझनों और अशान्ति आदि का मूल कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही होता है। यही मनुष्य का परम शत्रु है। अज्ञान के कारण ही मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह अनेक दृष्टियों से हीन अवस्था में ही पड़ा रहता है। ज्ञान के अभाव में जिनका विवेक मन्द ही बना रहता है उनके जीवन के अन्धकार में भटकते हुये तरह-तरह के त्रास आते रहते हैं। अज्ञान के कारण ही मनुष्य को वास्तविक कर्तव्यों की जानकारी नहीं हो पाती इसलिये वह गलत मार्गों पर भटक जाता है और अनुचित कर्म करता हुआ दुःख का भागी बनता है। इसलिये दुःखों से निवृत्ति पाने के लिये यदि उनका कारण अज्ञान को मिटा दिया जाये तो निश्चय ही मनुष्य सुख का वास्तविक अधिकारी बन सकता है।

अज्ञान का निवारण ज्ञान द्वारा ही हो सकता है। शती उसकी विपरीत वस्तु आग द्वारा ही दूर होता है। अन्धकार की परिसमाप्ति प्रकाश द्वारा ही सम्भव है। इसलिये ज्ञान प्राप्त का जो भी उपाय सम्भव हो उसे करते ही रहना चाहिये।

ज्ञान का सच्चा स्वरूप क्या है? केवल कतिपय जानकारियां ही ज्ञान नहीं माना जा सकता। सच्चा ज्ञान वह है जिसको पाकर मनुष्य आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार कर सके। अपने साथ अपने इस संसार को पहचान सके। उसे सत् और असत् कर्मों की ठीक-ठीक जानकारी रहे और वह जिसकी प्रेरणा से असत् मार्ग को त्याग कर सन्मार्ग पर असंदिग्ध रूप से चल सके। कुछ शिक्षा और दो-चार शिल्पों को ही सीख लेना भर अथवा किन्हीं उलझनों को सुलझा लेने भर की बुद्धि ही ज्ञान नहीं है। ज्ञान वह है जिससे जीवन-मरण, बन्धन-मुक्ति, कर्म-अकर्म और सत्य-असत्य का न केवल निर्णय ही किया जा सके बल्कि गृहणीय को पकड़ा और अग्राह्य को छोड़ा जा सके, वह ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है।
अज्ञान की स्थिति में कर्मों का क्रम बिगड़ जाता है। संसार में जितने भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्व हैं वे सब कर्मों का फल होता है। अज्ञान द्वारा अपकर्म होना स्वाभाविक ही है और तब उनका दण्ड मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। इतना ही क्यों सकाम भाव से किये सत्कर्म सुख के फल रूप में परिपक्व होते हैं और असत्य होने से कुछ ही समय में दुःख रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इसलिये कर्म ही अधिकतर बन्धनों अथवा दुःख को मनुष्य पर आरोपित कराते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ३९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग २५)

मर्यादाओं का रक्षक है भक्त

हिमालय के श्वेतशिखरों पर भगवान सूर्य अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्ण राशि उड़ेलने लगे थे। सूर्यदेव के इस अपूर्व अनुदान से हिमालय का यह सम्पूर्ण प्रान्त स्वर्णिम आभा से भर रहा था। थोड़ी दूर पर ही स्थित हिम झील का जल भी इस आभा को अपने में समेट रहा था। यहाँ पर उपस्थित ऋषियों एवं देवों के समुदाय ने अपने प्रातःकर्म पूरे कर लिये थे। अभी कुछ ही देर पहले उन्होंने भगवान भुवनभास्कर से सम्पूर्ण जगती के लिए ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ की याचना की थी। ‘‘निर्मल बुद्धि, निर्मल भावनाओं से जन्म पाती है’’- ब्रह्मर्षि विश्वामित्र महर्षि क्रतु से कह रहे थे। आज न जाने क्यों उन्हें अपना अतीत याद आ रहा था। ‘‘भावनाएँ दूषित हों तो बुद्धि एवं कर्म सभी दूषित हो जाते हैं।’’
    
ऐसा लग रहा था कि प्रह्लाद की पावन भगवद्भक्ति का मधुर गीत अभी भी उनके अंतःस्रोत से झर रहा था। ‘‘परम भगवद्भक्त होते हुए भी प्रह्लाद ने कितना सौम्य व सदाचारपूर्ण जीवन जिया था। सभी विधि-निषेधों से परे होते हुए भी उन्होंने सभी विधि-निषेधों को माना। लोक और वेद को उन्होंने अपने आचरण से महिमामण्डित किया।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस अंतर्वाणी को देवर्षि नारद अपने अंतःकरण में जैसे सुन रहे थे। वे किंचित हँसते हुए बोले-‘‘यदि ऋषि समुदाय की आज्ञा हो तो मैं अपना अगला सूत्र प्रस्तुत करूँ।’’ देवर्षि के इस वचन का ऋषि समुदाय एवं योगित्य वर्ग ने ‘अहोभाग्य’ कहकर स्वागत किया।
‘लोकेवेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता॥ ११॥’
    
देवर्षि नारद की मधुर वाणी से यह कथा सूत्र प्रकट हुआ। इसे प्रकट करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘भक्त लोक और वेद के अनुकूल आचरण करता है। इसके विरोधी आचरण के प्रति वह उदासीन रहता है।’’ देवर्षि की बात के सूत्र को पकड़ते हुए महर्षि देवल बोल पड़े- ‘‘लोक और वेद की मर्यादाओं की अवहेलना तो उद्धत अहं करता है। भक्त तो सर्वथा अहं शून्य और विनम्र होता है। उससे तो कभी किसी तरह से मर्यादाओं की अवहेलना होती ही नहीं।’’ ‘‘सत्य यही है’’- कहते हुए वेदज्ञान को सम्पादित करने वाले, पुराणों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास को यमुना तीर पर कुटी बनाकर तपश्चर्या करने वाले भक्तवर शमीक की याद आ गयी। ऋषि शमीक हस्तिनापुर से थोड़ी दूर यमुना किनारे कुटिया बनाकर रहते थे। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे-ऋषि शमीक। वे अपने आराध्य को कण-कण में देखने के अभ्यासी थे। सृष्टि का जड़ चेतन उनकी दृष्टि में उनके आराध्य का प्रतिरूप था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ५२


👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...