गुरुवार, 31 मार्च 2016

Oh child of God ! be God !

Human powers, abilities are unlimited and are as infinite as the sky. Every human being is a symbolic representative of the divine consciousness. He possesses within himself all those abilities that are present in his Father - the Almighty.

If the Yog [union] of a soul and the Supreme Soul is made possible; even a meek and most normal-seeming human being can become the Supreme Being - God and his greatness will be equally vast.

Maya is the one, which fabricates the difference between the soul and Supreme Soul, and she is nothing more than a mere veil of ignorance.

As we are entangled in worldly attractions, running after fickle wealth and ridiculously greedy desires it's difficult for us to understand that the unusually rare opportunity of possessing a human body has been given to us and it must be used for the fulfillment of a specific purpose. Let us just not worry about the pleasures of the body but also keep in mind the contentment of the soul.

If we realize our true nature, understand our duties and resolve promptly to do as needed, we can easily get rid of the sense of insignificance and unrest, which constantly unnerves us.

To break free from this spell of ignorance is the supreme duty of any human being.

The person who performs this duty faithfully can lay claim to the greatness of God the Almighty and become God Himself.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
-Akhanda Jyoti 1964 - November Page 1

बुधवार, 30 मार्च 2016

बुद्धि का विकास

बुद्धि का विकास

क्या बुद्धि का विकास बचपन में ही संभव है? उत्तर में कहना चाहिए कि आरंभिक काल की शिक्षा अवश्य ही महत्वपूर्ण एवं सरल है। इनमें बीस वर्ष की आयु तक जो संस्कार जम जाते हैं, वे अगले चार-पाँच वर्षो में पुष्ट होकर जीवन भर बने रहते हैं। उनमें परिवर्तन कठिनाई से और कम होता है, फिर भी यह बात असंभव नहीं कि बड़ी उम्र में भी किसी नवीन विषय में योग्यता प्राप्त की जाए। वर्षा ऋतु में बीज बोने पर बिना परिश्रम के फसल आ जाती है, किंतु अन्य ऋतुओं में पानी आदि की विशेष व्यवस्था करके फसल प्राप्त होती है। बड़ी आयु में किसी विषय की योग्यता प्राप्त करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उस विषय में आंतरिक उत्कंठा और तीव्र इच्छा हो। किसी विषय को सीखने की विशेष इच्छा यदि मनुष्य के हृदय में उत्पन्न हो जाय, तो वह उस शक्ति के मुरझाये हुए बीजकोषों को उसी प्रकार चैतन्य कर सकता है जैसे कि जेठ के जलते हुए वातावरण में भी चतुर किसान जल आदि की सहायता से खेत बोता है और पौधों से फल लेता है। यह नहीं समझना चाहिए कि हमारी इतनी उम्र हो गई या हम बुड्ढे हो आए। अब क्या ज्ञान प्राप्त करेंगे ? जीवित मनुष्य के मानसिक कोषों में यह विशेषता है कि वे किसी भी दशा में पूर्णतः नष्ट नहीं होते और अत्यंत वृद्ध होने तक विकसित होने की दशा में बने रहते हैं। जिन लोगों की किशोर अवस्था निकल चुकी, बेशक उन्होंने आसानी से बुद्धि बढ़ाने का एक अवसर खो दिया, फिर भी निराश होने की कोई बात नहीं है। तीव्र इच्छा के द्वारा हर आयु में हर प्रकार की उन्नति कर सकना मनुष्य के हाथ में पूरी तरह से है।

बुद्धि बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि - पृ. ४

Development of Intelligence:

Does the intelligence develop during childhood only? Of course, the learning in the early formatting years is very important and easy too. The cultural attitude and behavioral patterns that set the roots until age of 20 years, get further strengthened in next four or five years and influence the entire life forever. Any modification later on is very difficult and rarely to come. However it is not impossible, in old age also, to acquire expertise in a new subject. It is natural to reap the crops without much effort if seeds are sowed timely in monsoon, but to get the same results in other season, a special arrangement of irrigation is required. It is very important to have a burning desire and strong internal initiation to succeed in any field at an old age. Such a desire can revitalize the shriveled or withered seeds just like a farmer who successfully sows the seeds in a hot summer but gets abundant crops with due care and appropriate watering. One should never think that he has grown old or that age has ripen beyond learning. In fact, learning is a process that goes on through out the whole life span. The brain cells never get destroyed; they are ready to grow at any age, as and when required. Those who passed their adolescence unaware, no doubt missed a golden opportunity of easily sharpening their wit and wisdom, but no need to get disappointed. With a keen desire, it is totally in one’s own hands to make progress of any kind at any age.

The Scientific Approach to Sharpen Wit and Wisdom: Page 4.

मुक्ति का अर्थ

मुक्ति का अर्थ

मुक्ति का अर्थ होगा बन्धनों से छूटना । विचार करना है कि कौन से बन्धन हैं जिनसे हम बॅंधे हैं, शरीर को रस्सों से तो किसी ने  जकड़ नहीं रखा है फिर मुक्ति किससे ? मुक्ति वस्तुत: अपने दोष-दुर्गुणों से, स्वार्थ-संकीर्णता से, क्रोध-अंहकार से, लोभ-मोह से, पाप-अविवेक सेप्राप्त करनी चाहिए । यह अंतरंग की दुर्बलता ही सबसे बड़ा बन्धन है।
स्वर्ग और मुक्ति अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करके हम इसी जीवन में
प्राप्त कर सकते हैं, इसके लिए मृत्यु काल तक की प्रतीक्षा करने की
आवश्यकता नहीं ।

युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.१४)

Meaning of Salvation

Salvation would mean freedom from bondage. It has to be thought which bondages are we subjected to, since our physical body is not roped, then from what are we seeking salvation?  

Salvation should be called indeed from one’s flaw and faults, selfishness and narrow mindedness, anger and egoism, greed and attachment, sin and indiscretion. This weakness of inner self is the biggest bondage. We can attain heaven and salvation within this life time, by redefining our perspective; for this we don't have to wait until death period.

Yug Nirman Yojna - philosophy, pattern and program -66 (6.14)

मंगलवार, 29 मार्च 2016

मैं व्यक्ति नहीं विचार हूँ

मैं व्यक्ति नहीं विचार हूँ

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि पारमार्थिक कार्यों में निरन्तर प्रेरणा देने वाली आत्मिक स्थिति जिनकी बन गई होगी, वे ही युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए देर तक धैर्यपूर्वक कुछ कर सकने वाले होंगे । ऐसे ही लोगों के द्वारा ठोस कार्यों की आशा की जा सकती है । गायत्री आन्दोलन में केवल भाषण सुनकर या यज्ञ- प्रदर्शन देखकर जो लोग शामिल हुए थे, वे देर तक अपनी माला साधे न रह सके, पर जिन लोगों ने गायत्री साहित्य पढक़र, विचार मंथन के बाद इस मार्ग पर कदम बढ़ाया था, वे पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं । युग-निर्माण कार्य के लिए हम उत्तेजनात्मक वातावरण में अपरिपक्व लोगों को साथ लेकर बालू के महल जैसा कच्चा आधार खड़ा नहीं करना चाहते ।

इसलिए इस संघ में उन्हीं लोगों पर आशा भरी नजर डाली जाएगी जो बात को गहराई तक समझ  चुके हैं, उसकी जड़ तक जा चुके हैं । वरना ऑंधे-सीधे लोगों का भानमती का कुनबा इकट्ठा करके कोई संगठन बना लिया जाए, तो वह ठहरता कहॉं है ? गायत्री परिवार की कितनी  ही शाखाएँ इसी प्रकार ठप्प हुईं, । अब उस गलती को दुबारा नहीं दुहराना चाहिए। जिन लोगों की दृष्टि में विचारों का कोई मूल्य या महत्त्व नहीं, वे किसी कार्य में देर तक कब ठहरने वाले हैं  ? जो लोग अखण्ड-ज्योति नहीं मँगा सके, जो गायत्री साहित्य नहीं पढ़ सके, वे किसी समय बड़े भारी श्रद्धावान दीखने वाले साधक भी आज सब कुछ छोड़े बैठे दीखते हैं । प्रेरणा का सूत्र टूट गया, अपना निज का कोई गहरा स्तर था नहीं, फिर उनके पैर भौतिक बाधाओं के झकझोरे में कब तक टिके रहते ?

इसीलिए हम यह बारीकि से देखते रहते हैं कि सामने बैठा हुआ, लम्बी-चौड़ी बातें बनाने वाला व्यक्ति हमारी विचारधारा के साथ अखण्ड-ज्योति या साहित्य के माध्यम से बँधा है या नहीं ? यदि वह इस की उपेक्षा करता है तो हम समझ लेते हैं कि यह देर तक टिकने वाला नहीं है । जो हमारे विचारों को प्यार नहीं करते, उनका मूल्य नहीं समझते वे शिष्ठाचार में मीठे शब्द भले ही कहें, गुरुजी-गुरुजी, वस्तुत: वे हमसे हजारों मील दूर हैं, उनसे किसी बड़े काम की कोई आशा नहीं रखी जा  सकती ।

युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (२.५०)

I am not a person I am a thought.

It is an evident fact that peoples’ charity and services to society are a
source of inspiration to others. Only these people can survive and contribute, along with patience, in the mission of changing an era (Yug Nirman). Only such people can be expected to make solid contributions. The people who have joined the Thought Revolution (the Gayatri mission) by being influenced by yagnas and speeches could not stay long. However, those who have stepped forward in the mission after a deep analysis of Gayatri literature are speedily heading towards their targets with deep loyalty and faith. For the mission of the evolution of an era (Yug Nirman Yojna), we do not want to build castles in the air by taking people who are just pumped up with an enthusiastic mentality and simultaneously still immature.

In this mission, expectations will only be from those who have understood
the substance and reached the root of the literature. If we build an organization
with incompetent people, then how long will it last? Many branches of
Gayatri Parivaar have failed due to this basic flaw but we should not repeat this
mistake. People who do not place value in thought cannot
stay with any organizational work. The people who did not subscribe
to Akhand Jyoti and read Gayatri literature, although strong devotees for some time span, later became totally isolated from the mission. The reason behind this idea is that the source of inspiration was broken off. There was no deep level of self involvement that could have remained whilst dealing with materialistic problems.

We frequently observe that person blabbering right in front of us and wonder; Is he attached to our thought process and literature through the Akhand Jyoti or
not? If he/she disowns and ignores the literature, then we are convinced that he/she will not remain attached to the mission for long. One who does not love and relate to our thoughts will not be able to contribute for a long period of time. Even if they have a polite tone and mannerism, their verbal love for Guruji alone cannot contribute any great work.

Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (2.50)

आत्मविकास का लक्ष्य पूरा हो

आत्मविकास का लक्ष्य पूरा हो

सद्गुणों का अर्थ सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईश्वर- भक्ति जैसे उच्च आदर्शों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उनकी परिधि अन्तरंग और बहिरंग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र तक फैली हुई है ।। समग्र व्यक्तित्व को परिष्कृत, सज्जनोचित एवं प्रामाणिक बनाने वाली सभी आदतों एवं रुझानों को सद्गुणों की सीमा में सम्मिलित किया जाएगा ।। कोई व्यक्ति झूठ नहीं बोलता, चोरी नहीं करता, व्यभिचार से बचा है, यह बचाव उचित है और अनुकरणीय भी, पर इतने को ही आत्म- निर्माण मान बैठना अपर्याप्त होगा ।। कीट- पतंग और वृक्ष- वनस्पति भी तो झूठ चोरी से बचे रहते हैं ।। यह स्थूल सदाचार का आंशिक पालन मात्र हुआ ।। इतने भर से आत्मविकास का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता ।। मन में कुहराम मचाने वाली घुटन का भी अन्त होना चाहिए ।। जिन उद्वेगों और विकारों ने मन:क्षेत्र को अस्त व्यस्त करके रख दिया है, उनका भी निराकरण होना चाहिए ।। गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अभाव रहने के कारण जो सर्वतोमुखी दरिद्रता छाई हुई है, उसका भी अन्त होना चाहिए ।।

युग निर्माण योजना -- दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- ६६ (२.२२

The goal of self-development should be fulfilled

The meaning of good virtues shouldn’t be restricted only to achieving the high ideals like truthfulness, non-violence, celibacy, devotion to God, etc. Its sphere of influence actually spans far beyond and permeates every single area of the inner (thinking, feelings) and outer (action, speech, conduct, etc.) life. 

Good virtues include all the habits and inclinations which help us to refine the entire personality, make it honest and superb like that of a true gentleman. It is worthy and truly exemplary if someone never lies, never steals or never commits adultery. However, pursuing only this much wouldn’t be enough for the purpose of fulfilling the self-development. Even insects and plants never lie or steal, do they!? These obviously evident virtues form just a small fraction of good conduct but fall well short of fulfilling the goal of self-development.

The all-inclusive process of self-development should resolve the tumult of wayward thoughts going on continually in the mind. It should also get rid of the negative impulses (worry, anger, anxiety, etc.) and depravities which have been wrecking the mind. It should also put an end to a widespread dismal quality of life caused by the lack of excellence in qualities, actions and nature.

Translated from Pandit Shriram Sharma Acharya’s work

Yug Nirmaan Yojanaa: Darshan, swaroopa va kaaryakram 66:2.22

सोमवार, 28 मार्च 2016

Ambitions - the driving force

Every deed starts off as an ambition. As soon as an ambition arises in the mind, the mind starts strategizing for its fulfillment by employing imagination. Intellect starts searching for the means and the seed for the future action is sown in the form of thoughts and their contemplation.

Let’s take an example of an individual who aspires to be wealthy. This ambition will spur his thoughts, intellect and mind into action towards realizing it. On the other hand, if that individual were content with what he possesses and does not wish to have any more, his mind wouldn’t divert its attention in that direction.

In this way, the status or lifestyle of any individual is driven by their ambitions.

To have an ambition to succeed is quite natural, proper and useful as well.

This ambition serves a personal purpose and is beneficial to the society at large too. Spiritual, philosophical texts, which preach the dictum of “abandonment of desires and ambitions”, actually mean to teach us abandonment of the eagerness and fruits of desires.

We should not run after our ambitions without carefully considering, Who am I? At this particular moment, what is the state my resources and where do I stand? What are my strengths?

We should neither maintain any imaginary notions about ourselves nor should we encourage any ambitions that do not agree with our real nature.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
Jeevan Devta Ki Sadhna Aradhana Vol 2 - Page 2.15
जीवन आकांक्षाओं पर निर्भर

किसी भी कार्य का आरम्भ सर्वप्रथम आकांक्षा के रूप में होता है। आकांक्षा उठते ही उसकी पूर्ति के लिए मस्तिष्क कल्पना द्वारा उसके लिए योजना बनाने लगता है। बुद्धि आकांक्षा पूर्ति का उपाय खोजती है और विचार-चिंतन के रूप में कर्म का बीजारोपण होने लगता है।

उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति धनवान और साधन संपन्न बनने की आकांक्षा रखता है तो उसके विचार, उसकी बुद्धि और उसका मस्तिष्क आकांक्षा के साथ ही सक्रिय हो उठेंगे। यदि उपलब्ध साधन ही पर्याप्त जँचते हैं और अधिक धनसंग्रह की इच्छा नहीं उठती तो बुद्धि और विचार उधर जायेंगे भी नहीं।

इस प्रकार मनुष्य का स्तर और उसकी जीवन पद्धति बहुत कुछ आकाँक्षाओं पर निर्भर करती है।

प्रगति की आकांक्षा स्वाभाविक भी है और उचित, उपयोगी भी। उसमें व्यक्ति का निजी लाभ भी है और समाज का समग्र हित साधन भी।

इच्छा के त्याग वाली उक्ति जिन आध्यात्म ग्रंथों में पाई जाती है, वहाँ उसका प्रयोजन प्रतिफल का, आतुरता का परित्याग करने भर से है।

हम क्या हैं, हमारी परिस्थिति  कैसी है और हम किस धरातल पर खड़े हैं, हमारी कितनी क्षमताएँ हैं? इन्हें जाने, समझे बिना महत्वाकांक्षाओं के पीछे नहीं दौड़ा जाना चाहिए। अपने सम्बन्ध में न कोई काल्पनिक धारणाएँ रखे और न ऐसी कोई आकांक्षा रखे जो की अपनी प्रकृति के अनुकूल न हो।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
जीवन देवता की साधना - आराधना (2)-2.15

रविवार, 27 मार्च 2016

भले-बुरे कर्मों का ग्रे मैटर के परमाणुओं पर यह रेखांकन (जिसे प्रकट के शब्दों में अंतःचेतना का संस्कार कहा जा सकता है) पौराणिक चित्रगुप्त की वास्तविकता को सिद्ध कर देता है। चित्रगुप्त शब्द के अर्थों से भी इसी प्रकार की ध्वनि निकलती है। गुप्त चित्र, गुप्त मन, अंतःचेतना, सूक्ष्म मन, पिछला दिमाग, भीतर चित्र इन शब्दों के भावार्थ को ही चित्रगुप्त शब्द प्रकट करता हुआ दीखता है। ‘चित्त’ शब्द को जल्दी में लिख देने से ‘चित्र’ जैसा ही बन जाता है। सम्भव है कि चित्त का बिगाड़ कर चित्र बन गया हो या प्राचीनकाल में चित्र को चित्त और चित्र एक ही अर्थ के बोधक रहे हों। कर्मों की रेखाएँ एक प्रकार के गुप्त चित्र ही हैं, इसलिए उन छोटे अंकनों में गुप्त रूप से, सूक्ष्म रूप से, बड़े-बड़े घटना चित्र छिपे होते हैं, इस क्रिया प्रणाली को चित्रगुप्त मान लेने से प्राचीन शोध का समन्वय हो जाता है।

यह चित्रगुप्त निःसंदेह हर प्राणी के हर कार्य को, हर समय बिना विश्राम किए अपनी बही में लिखता रहता है। सबका अलग-अलग चित्रगुप्त है। जितने प्राणी हैं, उतने ही चित्रगुप्त हैं, इसलिए यह संदेह नहीं रह जाता कि इतना लेखन कार्य किस प्रकार पूरा हो पाता होगा। स्थूल शरीर के कार्यों की सुव्यवस्थित जानकारी सूक्ष्म चेतना में अंकित होती रहे, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ‘पौराणिक चित्र गुप्त एक है और यहाँ अनेक हुए’ यह शंका भी कुछ गहरी नहीं है। घटाकाश, मठाकाश का ऐसा ही भेद है। इंद्र, वरुण, अग्नि, शिव, यम, आदि देवता बोधक सूक्ष्मत्व व्यापक समझे जाते हैं। जैसे बगीचे की वायु गंदे नाले की वायु आदि स्थान भेद से अनेक नाम वाली होते हुए भी मूलतः विश्व व्यापक वायु तत्व एक ही है, वैसे ही अलग-अलग शरीरों में रहकर अलग-अलग काम करने वाला चित्रगुप्त देवता भी एक ही तत्त्व है।

यह हर व्यक्ति के कर्मों लेखाकिस आधार पर कैसा, किस प्रकार, कितना, क्यों लिखता है? यह अगली पंक्तियों में बताया जाएगा एवं चित्रगुप्त द्वारा लिखी हुई कर्म रेखाओं के आधार पर स्वर्ग-नरक का विवरण और उनके प्राप्त होने की व्यवस्था पर प्रकाश डाला जाएगा।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
समर्थता का सदुपयोग

बेल पेड़ से लिपट कर ऊँची तो उठ सकती है, पर उसे अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए आवश्यक रस भूमि के भीतर से ही प्राप्त करना होगा। पेड़ बेल को सहारा भर दे सकता है, पर उसे जीवित नहीं रख सकता । अमरबेल जैसे अपवाद उदाहरण या नियम नहीं बन सकते।

व्यक्ति का गौरव या वैभव बाहर बिखरा दीखता है । उसका बड़प्पन आँकने के लिए उसके साधन एवं सहायक आधार-भूत कारण प्रतीत होते हैं।

पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं।

मानवी प्रगति के मूलभूत तत्त्व उसके अन्तराल की गहराई में ही सन्निहित रहते हैं।

परिश्रमी, व्यवहारकुशल और मिलनसार प्रकृति के व्यक्ति सम्पत्ति उपार्जन में समर्थ होते हैं। जिनमें इन गुणों का आभाव है, वे पूर्वजों की छोड़ी हुई सम्पदा की रखवाली तक नहीं कर सकते। भीतर का खोखलापन उन्हें बाहर से भी दरिद्र ही बनाये रहता है।

गरिमाशील व्यक्ति किसी देवी देवता के अनुग्रह से महान नहीं बनते। संयमशीलता, उदारता और सज्जनता से मनुष्य सुदृढ़ बनता है, पर आवश्यक यह भी है कि उस दृढ़ता का उपयोग लोक मंगल के लिए किया जाय। पूँजी का उपयोग सत्प्रयोजनों के निमित्त न किया जाय तो वह भारभूत ही होकर रह जांति है। आत्मशोधन की उपयोगिता तभी है, जब वह चंदन की तरह अपने समीपवर्ती वातावरण में सत्प्रवृत्तियों की सुगंध फैला सके ।

- पं श्रीराम शर्मा आचार्य
- अखंड ज्योति अप्रैल 1987 पृष्ठ -1

क्या है सभ्य होने का अर्थ ?

सभ्यता क्या है , उसकी पहचान क्या है, इन बातोँ पर मै अक्सर सोचा करता था। लोगो के मुख से जो सुनता था और नैतिक शिक्षा की किताबो मे जो बाते लिखी होती थी, मै उनसे न जाने क्यो सहमत नही हो पाता था, दरअसल, मुझे Civilized Man सभ्यता स्कूल मे बताया गया कि सभ्यता के लिए इंसान को टिप-टाप दिखना चाहिए। उसके नाखून कटे हो, कपङे बिल्कुल साफ सुथरे हो। लेकिन मै इस पर इत्तेफाक नही कर पाया।

कई बार खेलने के दौरान मेरी शर्ट गंदी हो जाती, तो टीचर कहते कि इतने गंदे कपङे पहने हो, सभ्यता बिल्कुल नही है। एक दिन मैने टीचर से पूछ ही लिया-क्या जीवन के लिए इस तरह की सभ्यता आवश्यक है? अगर कोई गरीब है, उसके कपङे फटे हुए है, तो क्या वह सभ्य नही है? मेरे ये सवाल सुनकर उन्होने मुझे बङे प्रेम से समझाया, देखो, कपङे फटे हो, तो कोई बात नही, कितु वे धुले हुए साफ-सुथरे और प्रेस किए हुए होने चाहिए। अध्यापक की यह बात भी मेरे गले नही नही उतरी। मैँ सोचने लगा, यह कैसी सभ्यता ? जिसके पास खाने को भी पैसे न हो, वह फटे कपङे सिलवाकर, धुलवाकर, और प्रेस करवा कर कैसे पहन सकता है ? अगर वह ऐसा नही कर सकता तो क्या वह असभ्य हो जायेगा ?

अपनी किताबो मे भी मुझे सभ्य होने की यही पहचान लिखी हुई मिली। घर के बङे लोग भी कहते- सभ्य लोग ऐसा नही करते, वैसा करते हैँ। इस तरह की हिदायते सुनने को मिलती, लेकिन एक दिन मेरी जिदगी मे एक घटना घट गई, जब मैने सभ्यता का अर्थ तो जाना ही, जीवन की मेरी दिशा ही बदल गई।

एक दिन जब मै अखबार पढ़ रहा था, तो मेरी नजर एक छोटी सी खबर पर टिक गई। उस खबर मे लिखा था कि किस तरह एक महिला का प्रसव सङक पर हुआ और किसी भी व्यक्ति ने उस महिला की मदद नही की। मै यह खबर पढ़ कर आश्चर्यचकित हो गया कि सभ्यता की चादर ओढ़े ये समाज इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? मेरे मन मे यह खयाल आया कि उस समय सभ्य लोग कहां थे, जिन्होने धुले हुए प्रेस किए हुए कपङे पहने थे? शायद वे अपने कपङे गंदे होने के डर से मदद नही कर सके होगे। शायद उनकी वह सभ्यता आङे आ गई होगी।उस खबर का मुझ पर इतना ज्यादा प्रभाव पङा कि मुझे यह समझ मे आ गया कि सभ्यता भीतर की चीज है, वह बाहरी आवरण नही। इस घटना के कारण ही मुझमे यह बदलाव आया कि जहां भी किसी की मदद करने का अवसर मिलता, वहां मै तत्परता से पहुंच जाता था। मैने कभी इस बात की चिँता नही की कि मेरे कपङे गंदे हो जाएंगे और मुझ पर असभ्य होने का टैग लग जाएगा। मै अंततःसमझ गया था कि सभ्य होने का अर्थ संवेदनशील होना है।

भान उदय

शनिवार, 26 मार्च 2016

कौन कहता है की आँसू मे वजन नही होता, अरे एक बूँद ढल जायें तो मन हल्का हो जाता!

एक आँसू गिरा दे किसी निर्दोष की आँख से तो भविष्य तबाह हो जाता! कौन कहता है की आँसूओं मे शक्ति नही होती, अरे बिना आँसूओं के तो भक्ति भी भक्ति नही होती!

एक राजा जिसे अपने साम्राज्य को बढ़ाने की बड़ी चाह थी और ऊपर से मांसाहारी भी था प्रजा पर अनेक कर लगाकर अपना खजाना भरता रहता था! एक बार वो किसी जंगल मे शिकार करने के लिये गया जंगल मे बहुत दुर निकल गया पानी की बड़ी प्यास लगने लगी अब भटकते भटकते रात हो गई पुरी रात भटका पर पानी न मिला!

सुबह एक कोई अपाहिज पानी की मटकी लिये हुये जा रहा था वो राजा उसके पास पहुँचा और राजा ने उस अपाहिज से कहा की ए भाई मैं प्यास से मर रहा हुं मुझे अपनी मटकी से पानी पिला दो तो अपाहिज रोने लगा उसकी आँखो से आँसूओं की धारा बहने लगी राजा ने उससे पूछा अरे पानी माँग रहा हुं तो रो क्यों रहे हो तो उस अपाहिज ने कहा हॆ देव यहाँ से दो कोस की दूरी पर एक कुआँ है और मैं ठहरा एक अपाहिज वहाँ तक जाऊँगा और वहाँ से पानी लेकर आऊँगा तब तक आपकी व्यथा मुझसे सहन न होगी और आपकी इतनी श्रद्धा नही दिख रही है की आप वहाँ तक चल सको बस इसी लिये मेरी आँखो मे आँसू आ गये !

पता नही की कौनसे अपराध किये थे मैंने न जाने किस निर्दोष की आँख मे आँसू दिये थे मैंने जिसकी ये सजा मैं भुगत रहा हुं पर आप चिन्ता न करो देव वो सामने भोले बाबा के शिवलिंग पर एक मटकी लगी हुई है शायद उसमे थोड़ा पानी हो सकता है अन्दर पुजारी जी होंगे वो आपको पानी पिला देंगे अच्छा राजन अब मैं चलता हुं!

राजा पहुँचा भोले बाबा के मन्दिर मे पुजारीजी ने पानी पिलाया तो राजा की आँखो से आँसू बहने लगे पुजारीजी ने पूछा तो आँसू और बढ़ने लगे और फिर राजा ने कहा और उस अपाहिज के बारे मे राजा बोलने लगे

देखा जब मैंने उसे तो स्तब्ध रह गई आँखे मेरी
पूँछ बैठा मैं उसे क्यों है आँसू आँखो मॆ तेरी
न बोला कुछ भी न बोला पर जब बार बार पुछा
तो उसने जो कहा तो शर्म से झुक गई आँखे मेरी
और जब गहरा चिन्तन किया तो पुरी जिन्दगी बदल गई मेरी

उसने कहा मुझ से रोती है बहुत रोती है आँखे मेरी
मैं कुछ करना चाहता हुं परमार्थ के लिये
पर जब देखता हूँ मैं की कोई मदद माँग रहा है मुझसे और जब वो देखता है मदद के लिये एक आशा भरी नजरो से मेरी तरफ और जब मैं पाता हुं अपने आपको बहुत विवश
तो आँखो मॆ आँसू आ जाते है मेरी

फिर मैंने उससे कह दिया अब कुछ न बोलो बिल्कुल भी न बोलो

क्योंकि आपकी आँखो मॆ आँसू आते है परमार्थ के लिये
और मेरी आँखो मॆ आँसू आते है स्वार्थ के लिये!

तब शर्म से झुक गई आँखे मेरी और अब सोचता हुं की ईश्वर ने मुझे इतना कुछ दिया पर मैने संसार को आँसूओं के सिवा कुछ न दिया, अपनी जिह्वा के लिये न जाने कितने निर्दोष पशुओं की आँखो मे आँसू दिये और उनका वध किया, अपने खजाने और अपनी लोभी प्रवर्ति को पुरा करने के लिये न जाने कितने निर्दोष और अबोधो की आँखो मे आँसू दिये!

फिर पुजारीजी ने कहा राजन आपकी आँखो से जो पश्चात्ताप के आँसू बहे उन्हे व्यर्थ न जाने देना और इस मानव देह को सार्थक करना और आगे से किसी भी आँख मे आँसू मत देना!
और राजा ने वही किया जो पुजारीजी ने कहा!
Dharma accepts and understands the practicalities of life

Dharma neither regards various forms of penance such as, religious austerity (e.g. fasting) as supreme nor attaches any importance to meaningless renunciation of physical pleasures.

Intention of Dharma is that individuals should experience bliss and happiness in their life. Such happiness could be spiritual as well as material [experienced through senses]. None of such happiness enjoyed within the boundaries of Dharma should be seen as condemnable.

In itself generating and maintaining wealth isn’t a sinful act. Dharma never prohibits such acts as long as the means used; do not harm other people. If the means are nefarious, such goals [generating wealth etc.] are condemned by Dharma. Dharma identifies such acts as being evil, forbids them and shows the right way of doing things.

Similarly, marrying to have good family is deemed as virtuous by Dharma. Any form of spiritual or material pursuits; be it religious observances or indulgence in luxury, wealth, marriage, etc. do not pose any hindrance to attaining perfection in life. This is true as long as they are done with an aim of facilitating ones own spiritual well-being and doing good to society. On the other hand, they will be looked down upon (by Dharma) if their focus shifts from enriching and progressing ones life to selfishness.
- Pt. Shriram Sharma Acharya
- Essence of Dharma and Its Significance Page 1.29
धर्म जीवन की शाश्वतता को आधार मानकर चलता है

धर्म तपस्या को ही सर्वोपरि नहीं मानता, न शारीरिक सुखों के निष्प्रयोजन, परित्याग को महत्त्व देता है ।

वह जीवन को आनन्दमय देखना चाहता है । आनन्द इन्द्रिय ग्राह्य भी हो सकता है और आत्मिक भी । इस तरह का कोई भी आनन्द धर्म की मर्यादा में निन्दनीय नहीं है ।

इसी तरह धन-सम्पत्ति आदि भी अपने आप में कोई पाप नहीं है । धर्म इसके लिए रोक नहीं लगता, लेकिन धन संग्रह करने के उपायों से किसी दूसरे का अहित होता हो तो वह धर्म की दृष्टी से निन्दनीय है । धर्म इस तरह के प्रयत्नों को बुरा बताकर उन पर रोक लगता है और सही मार्ग बताता है ।

इसी तरह उत्तम सन्तान लाभ के लिए विवाह करना, धर्म द्वारा अच्छा माना गया है । किसी भी रूप में धर्मपरायणता, सुखभोग, सम्पत्ति, विवाह आदि जीवन की पूर्णता के अवरोधक नहीं हैं, जब वे आत्म-कल्याण और समाज हित के लिए किये जाते हों, लेकिन जब इनका प्रयोजन जीवन की समृद्धि, विकास से दूर हटकर अपने आप में केन्द्रित हो जाता है, तभी ये अच्छे नहीं माने जाते ।

- पं श्रीराम शर्मा आचार्य
- धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म (वांग्मय 53)-1.21

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

अपने को जानो

विद्वान इब्सन का कथन है - शक्तिशाली मनुष्य वह है, जो अकेला है। कमजोर वह है, जो दूसरों का मुँह ताकता है। अकेले का अर्थ है "आत्म-निर्भर, अपने पैरों पर खड़े होने वाला"।

यहाँ अकेलापन असहयोगी के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। इब्सन का तात्पर्य यह है कि जो अपनी जिम्मेदारी को समझता है, अपने कर्तव्यों को निबाहता है, उसे प्रगति के लिये आवश्यक आधार अपने भीतर से ही मिल जाता है, बहार के साधन उसके चुम्बकत्व से खींचकर अनायास ही इकट्ठे हो जाते हैं।

कन्फ्यूसियस ने कहा है महान व्यक्ति अपनी आवश्यक वस्तुओं को भीतर ढूंढ़ते हैं, जबकि कमजोर उन्हें पाने के लिये दूसरों का सहारा तकते हुए भटकते रहते हैं। तत्त्वदर्शी और मनीषी सदा से ही कहते रहे हैं - जो अपनी सहायता आप करता है, उसी कि सहायता करने परमात्मा भी आता है।

जिसने अपने ऊपर से भरोसा खो दिया उसे इश्वर कि ऑंखें भी अविश्वासी ठहरती हैं। परमात्मा कि निकटतम और अधिकतम सत्ता अपने भीतर ही पाई जा सकी है। जो उसे नहीं देखता वह बहार कहाँ पर ऐसा अवलंबन प्राप्त कर सकेगा जो उसे विपत्ति से बचाने और आगे बढ़ाने में सहायता कर सके? अपनी क्षमता और सम्भावना पर से विश्वास उठा लेना परमात्मा कि सत्ता और महत्ता को अस्वीकार करना है।

ऐसी अनास्थावादी मनोभूमि जहाँ हो वहाँ हमें घिनौने किस्म कि नास्तिकता कि गंध मिलेगी।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
- चेतन, अचेतन एवं सुपर चेतन मन वांग्मय 22- पृष्ठ 3.1

Know thyself

Wise Ibsen says, "The strongest man in the world is he who stands alone. He is weak who expects, waits for others [to help him]" (An Enemy of the People, 1882). Alone here means - self-reliant, one who is able to stand on one's own two feet. In this context, alone does not mean an uncooperative individual. What Ibsen implies here is a person who knows his responsibilities, performs his duties, that person finds the necessary support he needs [for progress] from within. External resources easily come, drawn to him by his magnetism.

Confucius says, "What the superior man seeks is in himself; what the small man seeks is in others". Intellectuals and sages have always taught, God helps them who help themselves. One who has lost faith and confidence in himself, is counted amongst the unfaithful in the eyes of God.

Inside of us lies the most intense and nearest presence of the divine. One who does not experience that presence, that which is inside of him, from where will he be able to find a support [something to hold on to], which will save him and push him forward?

To not believe in ones own capabilities and possibilities is like refusing to accept the authority of God. In places, where such type of disbelief exists, there we can find the vilest form of atheism.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
- Chetan, Achetan Evum Super Chetan Mann Vangmay 22, - Page - 3.1
बुद्धि का बल

विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां अजीबो-गरीब वस्त्र पहने एक ज्योतिषी आ पहुंचा।

वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला,” मैं ज्ञानी हूँ, मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?”

शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे।

सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा।

अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा।

सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे, बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी।

ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, ” तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो, तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है। तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है ….”

ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा।

पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कहा।

ज्योतिषी बोला, ” तुम्हारा बेडौल सिर और माथे से पता चलता है कि तुम एक लालची ज्योतिषी हो, और तुम्हारी ठुड्डी की बनावट तुम्हारे सनकी होने के तरफ इशारा करती है।”

इतना सुनकर शिष्य और भी क्रोधित हो गए पर इसके उलट सुकरात प्रसन्न हो गए और ज्योतिषी को इनाम देकर विदा किया। शिष्य सुकरात के इस व्यवहार से आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा, ” गुरूजी, आपने उस ज्योतिषी को इनाम क्यों दिया, जबकि उसने जो कुछ भी कहाँ वो सब गलत है ?”
"नहीं पुत्रों, ज्योतिषी ने जो कुछ भी कहा वो सब सच है, उसके बताये सारे दोष मुझमें हैं, मुझे लालच है, क्रोध है, और उसने जो कुछ भी कहा वो सब है, पर वह एक बहुत ज़रूरी बात बताना भूल गया, उसने सिर्फ बाहरी चीजें देखीं पर मेरे अंदर के विवेक को नही आंक पाया, जिसके बल पर मैं इन सारी बुराइयों को अपने वष में किये रहता हूँ, बस वह यहीं चूक गया, वह मेरे बुद्धि के बल को नहीं समझ पाया!" , सुकरात ने अपनी बात पूर्ण की।

मित्रों, यह प्रेरक प्रसंग बताता है कि बड़े से बड़े इंसान में भी कमियां हो सकती हैं, पर यदि हम अपनी बुद्धि का प्रयोग करें तो सुकरात की तरह ही उन कमियों से पार पा सकते हैं।
माया की गठरी:-

किसी गांव में एक फकीर घूमा करता था। उसकी सफेद लंबी दाढ़ी थी और हाथ में एक मोटा डंडा। चीथड़ों में लिपटा उसका ढीला—ढीला और झुर्रियों से भरा बुढ़ापे का शरीर। अपने साथ एक गठरी लिए रहता था सदा। और गठरी पर बड़े—बड़े अक्षरों में लिख रखा था : 'माया'। वह बार—बार उस गठरी को खोलता भी था। उसमें उसने बड़े जतन से रंगीन रही कागज लपेट कर रख छोड़े थे। कहीं मिल जाते रास्ते पर तो कागजों को इकट्ठा कर लेता। अपनी माया की गठरी में रख लेता। जिस गली से निकलता उसमें रंगीन कागज दिखता तो बड़ी सावधानी से उठा लेता। सिकुड़नों पर हाथ फेरता, उनकी गड्डी बनाकर, जैसे कोई नोटों की गड्डी बनाता है, अपनी माया की गठरी में रख लेता।

उसकी गठरी रोज बड़ी होती जाती थी।

लोग उसे समझाते कि पागल, यह कचरा क्यों ढोता है? वह हंसता और कहता कि जो खुद पागल हैं वे दूसरों को पागल बता रहे हैं।

कभी—कभी किसी दरवाजे पर बैठ जाता और कागजों को दिखा कर कहता, ये मेरे प्राण हैं। ये खो जाएं तो मैं एक क्षण जी न सकूंगा। ये खो जाएं तो मेरा दिवाला निकल जाएगा। ये चोरी चले जाएं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। कभी कहता ये मेरे रुपये हैं, यह मेरा धन है। इनसे मैं अपने गांव के गिरते हुए किले का पुन: निर्माण कराऊंगा। कभी अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेर कर स्वाभिमान से कहता, उस किले पर हमारा झंडा फहराएगा और मैं राजा बनूंगा। और कभी कहता किं इनको नोट ही मत समझो, इनकी ही मैं नावें बनाऊंगा। इन्हीं नावों में बैठ कर उस पार जाऊंगा।

और लोग हंसते। और बच्चे हंसते औरते भी हंसती। और जब भी कोई जोर से हंसता तो वह कहता, चुप रहो। पागल हो और दूसरों को पागल समझते हो।

तभी गांव में एक ज्ञानी का आगमन हुआ। और उस ज्ञानी ने गाव के लोगों से कहा, इसको पागल मत समझो और इसकी हंसी मत उड़ाओ। इसकी पूजा करो नासमझो! क्योंकि यह जो गठरी ढो रहा है, तुम्हारे लिए ढो रहा है। ऐसे ही कागज की गठरियां तुम ढो रहे हो। यह तुम्हारी मूढ़ता को प्रकट—करने के लिए इतना श्रम उठा रहा है। इसकी गठरी पर इसने 'माया' लिख रख छोड़ा है। कागज, कूड़ा—कचरा भरा है। तुम क्या लिए घूम रहे हो? तुम भी सोचते हो कि महल बनाएंगे, उस पर झंडा फहराएंगे। नाव बनाएंगे, उस पार जाएंगे। सिकंदर बनेंगे कि नेपोलियन। सारे ससार को जीत लेंगे। बड़े किले बनाएंगे कि मौत भी प्रवेश न कर सकेगी।

और जब यह फकीर समझाने लगा लोगों को तो वह का भिखमंगा हंसने लगा और उसने कहा कि मत समझाओ। ये खाक समझेंगे। ये कुछ भी न समझेंगे। मैं वर्षों से समझाने की कोशिश कर रहा हूं। ये सुनते नहीं। ये मेरी गठरी देखते हैं, अपनी गठरी नहीं देखते। ये मेरे रंगीन कागजों को रंगीन कागज समझते हैं .और जिन नोटों को इन्होंने तिजोडियो में भर रखा है उन्हें असली धन समझते हैं। मुझे कहते हैं पागल, खुद पागल हैं।

यह पृथ्वी बड़ा पागलखाना है। इसमें से जागो। इसमें से जागो, इसमें से न जागे तो बार—बार मौत आएगी और बार—बार तुम वापस इसी पागलखाने में फेंक दिए जाओगे। फिर—फिर जन्म! इसीलिए तो पूरब के मनीषी एक ही चिन्तन करते रहे हैं सदियों से— आवागमन से कैसे छुटकारा हो ? कैसे मिटे जन्म? कैसे मिटे मौत? मिटने का एक ही उपाय है। तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा है जिसका न कभी जन्म हुआ और न कभी मृत्यु होती है। तुम्हारे भीतर अजन्मा और अमृतस्वरूप कुछ पड़ा है। वही तुम्हारा हीरा है, उसे खोज लो। वही तुम्हारा धन।

शुभ प्रभात। आज का दिन आप के लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

गुरुवार, 24 मार्च 2016


आप अपने जीवन में कितनी होलियाँ मना चुके, कितने दिवालियाँ बिता चुके, सावन, सनुने, दौज, दशहरे अबतक कितने बिता दिये,जरा उँगलियों पर गिन कर बताइये तो कितनी बार आपने धूम-धाम से तैयारियाँ की और कितनी बार आनन्द सामग्री को विसर्जित किया। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं कब? वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूलि में समा गईं। इस बार की होली भी ऐसी ही होनी है। चैत बदी प्रतिपदा, दौज, तीज के बाद त्योहार की एक धुँधली सी स्मृति रह जायगी। और चौथ, पाँचें को ही कोई कष्ट आ गया तो भूल जायेंगे कि इसी सप्ताह हमने किसी त्योहार का आनंद भी उठाया था। ऐसे अस्थिर आनंद पर मेरी बधाई कुछ ज्यादा उपयुक्त न होती पर यह छाया दर्शन भी कोई दुख की बात नहीं है।

मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनायें और साथ ही यह भी चिन्तन करें कि जिसकी यह छाया है उस अखण्ड आनन्द को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ?

आइये, उस अखण्ड आनन्द को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अन्तरों में जल उठे जिसकी लपटें आकाश तक पहुँच। अन्तर के कपट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़ झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस जो अँधेरी कोठरी में छिपे बैठे हैं और हमें भीतर ही भीतर खोंट खोंप कर खा रहे हैं इसी होलिका में भस्म हो जावें। अपने सब पाप तापों को जला कर हम लोग शुद्ध स्वर्ण की तरह चमकने लगें। उसी निर्मल शरीर से वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकेगा।

अखण्ड-ज्योति परिवार के हृदयों में ईश्वर ऐसी ही होली जला दें। यही आज मेरी प्रार्थना है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1940 पृष्ठ 1

बुधवार, 23 मार्च 2016

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

ऐ वतन, करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.
ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून
क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में

मंगलवार, 22 मार्च 2016

दुष्ट  लड़का

एक लड़का बड़ा दुष्ट था। वह चाहे जिसे गाली देकर भाग खड़ा होता।

एक दिन एक साधु बाबा एक बरगद के नीचे बैठे थे। लड़का आया और गाली देकर भागा। उसने सोचा कि गाली देने से साधुचिढ़ेगा और मारने दौड़ेगा, तब बड़ा मजा आयेगा लेकिन साधु चुपचाप बैठे रहे। उन्होंने उसकी ओर देखा तक नहीं।
लड़का और निकट आ गया और खूब जोर- जोर से गाली बकने लगा।

साधु अपने भजन में लगे थे। उन्होंने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया। तभी एक दूसरे लड़के ने आकर कहा- ‘बाबा जी! यह आपको गालियाँ देता है?’ बाबा जी ने कहा- ‘हाँ भैया, देता तो है, पर मैं लेता कहाँ हुँ। जब मैं लेता नहीं तो सब वापस लौटकर इसी के पास रह जाती हैं।’

लड़का बोला- लेकिन यह बहुत खराब गालियाँ देता है। साधु- यह तो और खराब बात है। पर मुझे तो वे कहीं नहीं चिपकीं, सब की सब इसी के मुख में भरी हैं। इससे इसका ही मुख गंदा हो रहा है।

गाली देने वाला लड़का सब सुन रहा था। उसने सोचा, साधु ठीक ही तो कह रहा है। मैं दूसरों को गाली देता हूँ तो वे ले लेते हैं। इसी से वे तिलमिलाते हैं, मारने दौड़ते हैं और दुःखी होते हैं। यह गाली नहीं लेता तो सब मेरे पास ही तो रह गयीं।

लड़का मन ही मन बहुत शर्मिंदा हुआ और सोचने लगा छिःमेरे पास कितनी गंदी गालियाँ हैं। वह साधु के पास गया, क्षमा माँगी और बोला- बाबाजी! मेरी यह गंदी आदत कैसे छूटे और मुख कैसे शुद्ध हो?

साधु ने समझाया -‘पश्चात्ताप करने तथा फिर ऐसा न करने की प्रतिज्ञा करने से बुरी आदत दूर हो जायेगी।

मधुर वचन बोलने और भगवान् का नाम लेने से मुख शुद्ध हो जायेगा।’

सोमवार, 21 मार्च 2016

कुछ लोग धनी बनने की वासना रूपी अग्नि में अपनी समस्त शक्ति, समय, बुद्धि, शरीर यहाँ तक कि अपना सर्वस्व स्वाहा कर देते हैं। यह तुमने भी देखा होगा। उन्हें खाने- पीने तक की भी फुरसत नहीं मिलती। प्रातःकाल पक्षी चहकते और मुक्त जीवन का आनन्द लेते हैं तब वे काम में लग जाते हैं। इसी प्रकार उनमें से नब्बे प्रतिशत लोग काल के कराल गाल में प्रविष्ट हो जाते हैं। शेष को पैसा मिलता है पर वे उसका उपभोग नहीं कर पाते। कैसी विलक्षणता। धनवान् बनने के लिए प्रयत्न करना बुरा नहीं। इससे ज्ञात होता है कि हम मुक्ति के लिए उतना ही प्रयत्न कर सकते हैं, उतनी ही शक्ति लगा सकते हैं, जितना एक व्यक्ति धनोपार्जन के लिये।

मरने के बाद हमें सभी कुछ छोड़ जाना पड़ेगा, तिस पर भी देखो हम इनके लिए कितनी शक्ति व्यय कर देते हैं। अतः उन्हीं व्यक्तियों को, उस वस्तु की प्राप्ति के लिये जिसका कभी नाश नहीं होता, जो चिरकाल तक हमारे साथ रहती है, क्या सहस्त्रगुनी अधिक शक्ति नहीं लगानी चाहिए? क्योंकि हमारे अपने शुभ कर्म, अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ- यही सब हमारे साथी हैं, जो हमारी देह नाश के बाद भी साथ जाते हैं। शेष सब कुछ तो यही पड़ा रह जाता है।

यह आत्म- बोध ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। जब उस अवस्था की उपलब्धि हो जाती है, तब यही मानव- देव- मानव बन जाता है और तब हम जन्म और मृत्यु की इस घाटी से उस ‘एक’ की ओर प्रयाण करते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु- किसी का आस्तित्व नहीं है। तब हम सत्य को जान लेते हैं और सत्यस्वरूप बन जाते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 1
धर्म अप्रभावित हैं

वास्तव में धर्म तो एक ही हैं। धर्म के लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए जो अलग-अलग पद्धतियाँ प्रचलित हैं, वे धर्म नहीं वरन सम्प्रदाय हैं। धर्म मनो महासागर हैं और सम्प्रदाय नदियाँ हैं, जो विभिन्न स्थानों और दिशाओं से आकार इस महासागर में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विलिन हो जाती हैं। यदि इन नदियों को ही भ्रमवश कोई सागर समझ लें व अपने सागर होने की महत्ता का ही ढिंढोरा पीटने लगे तो पीटने पर नदी सागर तो बन नहीं सकती। धर्मं का तो एक ही लक्ष्य हैं सत्यं, शिवं, और सुन्दरं अर्थात ऐसे आचरण जो सत्य हों, शुभ हों, और कल्याणकारी हों। धर्म के इस लक्ष्य की उपलब्धि के लिए विभिन्न मार्ग जैसे पूजा, उपासना, अनुष्ठान, अदि की व्यवस्था विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित रहती हैं। इनमें से किसी सम्प्रदाय में कोई पद्धति विशेष अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती हैं, किसी में कम। इसी से हम इन पद्धतियों के प्रभावी होने न होने को यह मैं लेते हैं मनो अमुक धर्म अमुक से श्रेष्ठ अथवा निम्नतर हैं। वास्तव में धर्म तो अपने स्थान पर स्थिर, अटल, शाश्वत हैं, उस तक पहुँचने के मार्ग अपेक्षाकृत सुविधाजनक अथवा कष्टप्रद हो सकते हैं, परन्तु उनके कारण धर्म प्रभावित नहीं होता।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्मं तत्त्व का दर्शन और मर्म (वांग्मय 53) पृष्ठ 1.4

Dharma is eternal, immutable

In reality there is just one. One Dharma, one true faith, one true religion, one truth. Though there are different prevalent ways to attain the goals of Dharma, these are not different Dharmas (Faiths) themselves, but different groups or sects. Dharma is akin to a vast ocean and the different sects are the rivers which come to it from different directions and different places. Whether seen or unseen all of them eventually lead into the ocean and become one with it. Even after mistaking a stream to be an ocean, and creating a huge hype around it, in reality the situation still remains the same. In-spite of the hype a stream cannot become an ocean. Faith has one goal that is  to be Satyam (true), Shivam (virtuous), and Sundaram (divine). A conduct which is true, virtuous and divine. To achieve this goal of Dharma, various methods have been popular in various sects, like ritualistic worship, prayer, rendering service to a particular idol or symbol. Amongst these various ways, some appear to be more effective than others. These generalized assumptions force us to assign gradation to various religions (sects). We falsely assume one to be greater than the other. In reality Dharma was, is and will be eternally steady, strong, immutable, immovable, and perpetual. The paths to reach that goal may be easy or difficult than presumed but because of the difference in paths, the destination which is Dharma is not affected.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
-Dharma ka Tattava Darshan aur Marm Vangmay 53 page 1.4

रविवार, 20 मार्च 2016


हमें यह ध्यान में रखकर चलना चाहिए कि मन की मलीनता  हटाने के लिए कुछ बड़े और लगातार प्रयत्न करने पड़ते हैं तब कही वह काबू में आता है। घोड़े को सही रास्ते पर चलाने के लिए उसके मुँह में लगाम लगानी पड़ती है और हाथ में चाबुक रखना पड़ता है ऐसा ही प्रबन्ध मन के लिए किया जा सके तो ही वह रास्ते पर चलेगा।

नित्य स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए। स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।

स्वाध्याय के बाद आता है मनन- चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 43
संगत का प्रभाव:-   
एक मादा शुक ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। मालिक उन दोनों को बेचने बाजार पहुंचा, जिनमें से एक को डाकू सरदार ने व दूसरे को एक महंत ने खरीदा।

एक बार उस राज्य का राजा शिकार के दौरान रास्ता भटकते हुए एक बस्ती के पास पहुंचा तो पिंजरे में बैठा एक तोता आवाज देने लगा- ‘कोई अमीर आ रहा है, लूटो-लूटो, पकड़ो-पकड़ो, मारो-मारो।’

यह सुनते ही राजा सावधान हो गया। उसने तुरंत अपना घोड़ा दूसरी दिशा में मोड़ लिया।

थोड़ी दूरी पर राजा दूसरी बस्ती में पहुंचा। घोड़े की टाप सुनकर दूसरा तोता पिंजरे में बोल उठा- ‘पधारिए अतिथि देवता, ऋषि आश्रम में आपका स्वागत है।’

राजा ने रात भर वहां विश्राम किया। सुबह राजा ने मंत्री से पूछा- ‘‘एक तोते ने लूटने, मारने की आवाज में पुकारा, दूसरे ने अतिथि देवो भव: के स्वर में स्वागत किया। दोनों में इतना अंतर कैसे आया होगा?’’

मंत्री ने तोते वाले से जानकारी ली और बताया- ‘‘राजन, ये दोनों तोते सगे भाई हैं। किंतु एक को डाकू सरदार ने खरीद लिया। उसे डाकुओं जैसे संस्कार मिले। दूसरे को एक महंत जी ने खरीद लिया। उसे ऋषि आश्रम में अतिथि सत्कार के संस्कार मिले, इसलिए आचरण में इतना अंतर आ गया।’’

अच्छी संगति मिलने पर पशु भी शिष्ट आचरण सीख जाता है। गलत संगति मिलने पर मनुष्य भी पशु जैसा आचरण करने लगता है।

मनुष्य बचपन में जो कुछ सीखता है, वह अपने घर-परिवार और आस-पड़ोस के माहौल से ही सीखता है। उसकी संगत जीवन निर्माण में नींव का पत्थर बन जाती है।      
शुभ प्रभात । आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो ।

शनिवार, 19 मार्च 2016

स्वाध्याय और मनन मानसिक परिष्कार के दो साधन
(भाग 1)

मन बैसाखी गधे की तरह है जिसे नहला धुला देने पर भी मलीनता प्रिय लगती है और दूसरे ही दिन धूलि में लौटकर फिर पहले जैसी गंदगी में लिपट जाता है। हाथी की आदत भी ऐसी ही होती है। नदी तालाब में बैठा स्वच्छ होता रहेगा पर जब बाहर निकलेगा तो सूँड़ में रेत भर कर सारे बदन पर डाल लेगा। न जाने गंदगी में इन्हें क्या मजा आता है?

मन की आदत भी ऐसी ही गंदी है। स्वाध्याय और सत्संग के सम्पर्क में आकर कुछ समय के लिए ऐसा सज्जन बन जाता है मानो सन्त हो। रामायण गीता सुनते समय आँखों में आँसू आते हैं। नरक की पीड़ायें जानकर पश्चाताप भी होता है और मृत्यु की जब याद दिलाई जाती है जब डर भी लगता है कि मौत के दिन समीप आ पहुँचे। जिंदगी बीत चली। अब बचे कूचे दिनों का तो सदुपयोग कर ले। पर यह ज्ञान देर तक नहीं ठहरता किसी मुर्दे की जलाने जाते हैं तब मरघट में श्मशान वैराग्य’ उठता है। काया नाशवान् होने की बात सूझती है और लगता है इस क्षणभंगुर जीवन के लिए क्या बुराइयाँ ओढ़नी क्या पाप करने। क्या अहंकार करना- किस बात पर इतराना। उस समय तो यही ज्ञान जंचता है पर घर आते आते वह वैराग्य न जाने कहाँ हवा में उड़ जाता है और उसी पुराने ढर्रे पर गाड़ी के पहिये लुढ़कने लगते हैं।

यही स्थिति सदा बनी रहे तो ज्ञान, परमार्थ की बात बेकार है। चिकने घड़े की तरह यदि श्रेष्ठता भीतर घुसे ही नहीं तो बाहर की लीपा-पोती से क्या काम चलेगा। ज्ञान की सार्थकता तो तब है जब उसका प्रभाव अन्तः करण पर पढ़े और जीवन की रीति- नीति बदले। ऐसा न हो सका तो पढ़ने सुनने के - पोथी के बेंगने भूख को कहाँ बुझाते हैं।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 43
 जानकारी न होना

एक राजा वन भ्रमण के लिए गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोपड़ी पर जा पहुँचा। वहाँ से आतिथ्य मिला जो जान बची।

चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा- हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुख नगर का चन्दन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं। उसके द्वारा जीवन आनन्दनमय बीतेगा।

वनवासी उस परवाने को लेकर नगर के अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चन्दन का उपवन उसे प्राप्त हो गया। चन्दन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, उसकी जानकारी न होने से वनवासी चन्दन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी।

धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गये। एक अन्तिम पेड़ बचा। वर्षा के कारण कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गठ्ठा जब बाजार में पहुँचा तो सुगन्ध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया। आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा- यह चन्दन काष्ठ है। बहुत मूल्यवान् है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो। वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चाताप करने लगा कि उसे इतना बड़ा बहुमूल्य चन्दन वन कौड़ी मोल कोयले बनाकर बेच दिया।

पछताते हुए नासमझ को सान्त्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा-मित्र, पछताओ मत, यह सारी दुनिया, तुम्हारी ही तरह नासमझ है।

जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदलें कौड़ी मोल में गँवाते रहते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गँवाकर भी कोई मनुष्य अन्त में सँभल जाता है तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।
मूर्ति पूजा का औचित्य

विदेशों में भारतीय संस्कृति की दिग्विजयी यात्रा से लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद की कीर्ति भारत के कोने-कोने में फैल गई। उनको वक्तृत्व शैली और अध्यात्म के तर्क संगत प्रतिपादन से प्रभावित होकर काशी के तत्कालीन नरेश ने स्वागत के लिए आमंत्रित किया।

स्वामी जी अद्वैत-वेदांत के प्रकाण्ड पंडित थे। उनकी विचारधारा के संबंध में बात-चीत चली। नरेश मूर्तिपूजा के कट्टर विरोधी थे और स्वामी जी प्रबल समर्थक थे। अध्यात्म साधना की प्रथम कक्षा वे मूर्तिपूजा को ही मानते थे परंतु निर्गुणोंपासक और विभिन्न मतवादियों से भी उन्हें कोई विरोध नहीं था। अपने सिद्धांतों का वे प्रतिपादन अवश्य करते थे परन्तु दुराग्रह नहीं।

मूर्तिपूजा की चर्चा छेड़ते हुए काशी नरेश ने कहा- “अद्वैत वेदांत की विचारधारा से मूर्तिपूजा का मेल तो नहीं बैठता है फिर आप इसका समर्थन क्यों करते हैं।"

स्वामी जी ने कहा- परमात्मा शक्ति स्वरूप और शक्ति को कोई आकार नहीं दिया जा सकता है यह बात ठीक है परन्तु मैं खुदी मूर्तिपूजा को आत्म साधना का प्रथम सोपान समझता हूँ

‘आपके विचारों में ही विरोधाभास आपके अनुयायियों में कई भ्रान्तियाँ पैदा कर सकता है इसलिए किसी भी बात को केवल भावना के कारण ही स्वीकार नहीं करना चाहिए- काशी नरेश ने उपदेश दिया।

स्वामी जी बोले- मैंने मूर्ति पूजा में भावना नहीं तथ्य पाया है।’

‘भला इसमें क्या तथ्य। निर्गुण निराकार परमात्मा का कोई आकार कैसे निश्चित किया जा सकता है।’

‘ईश्वर का कोई आकार नहीं परन्तु साधना उपासना की सुगम पद्धति यही है कि मन को स्थिर करने के लिये ईश्वर की धारणा किसी मूर्ति रूप में की जाये।’

‘यह तो मिथ्या संतोष हुआ'- नरेश ने आशंका की-इसके माध्यम से आत्मोन्नति कैसे संभव होगी।

‘वस्तुतः मिथ्या संतोष नहीं है। ईश्वर सर्वव्यापी है तो मूर्ति में क्यों नहीं होगा-स्वामी जी ने समाधान दिया।

स्वामी जी उनके दुराग्रही प्रतिपादन को तोड़ गये थे। महल के भीतर की दीवारों पर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित वीर पुरुषों के चित्र टाँगे थे। शायद वे उक्त नरेश के पूर्वजों के रहे होंगे।

स्वामी जी ने एक चित्र की इंगित करते हुए कहा- ‘यह चित्र किन का है। जरा इसे उतरवाकर मँगाइये।’

राजा के अनुचरों ने तत्काल वह चित्र उतारा ओर स्वामीजी को दिया। काशी नरेश ने बताया- ‘यह चित्र मेरे परदादा महाराज का है।’

क्या आपने अपने जीवन में इन्हें देखा है- स्वामीजी ने प्रश्न किया।

‘जी नहीं- नरेश ने उत्तर दिया।

‘तो फिर क्या आप इस चित्र पर थूक सकते हैं’- स्वामीजी ने कहा-आपको थूकना चाहिए। थूकिए।’

‘नहीं थूक सकता- नरेश ने कहा- ये हमारे पूजनीय हैं।

स्वामीजी ने कहा- आपने तो इन्हें देखा नहीं है। फिर इन्हें श्रद्धापात्र कैसे मानते हैं और फिर यह तो मात्र चित्र है इन पर थूकने में धृष्टता कैसी होगी।

बात काशी नरेश की भी समझ में आ रही थी परंतु फिर भी वे थूकना नहीं चाहते थे। स्वामी जी बोले-आप इस चित्र के प्रति पूज्यभाव रखते हैं। यद्यपि इस चित्र पर थूकने से आपके परदादा का कुछ नहीं बिगड़ेगा और यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि यह चित्र पूरी तरह आपके परदादा के शरीर की प्रतिकृति भी नहीं हैं इसी प्रकार प्रतिमा के प्रति अपना विश्वास और श्रद्धा भाव रखना आवश्यक है। ईश्वर शक्ति है, चेतना है पर सामान्य जन का मन ऐसे अमूर्त के प्रति एकाग्र हो पाना दुस्तर है, इसीलिए मैं मूर्तिपूजा में विश्वास रखता हूँ।

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...