शनिवार, 23 दिसंबर 2017

👉 भुल भी जाना और भुलना भी मत

🔷 ऋषिवर के आश्रम मे एक दिन दुर नगर से एक राजा आये ऋषिवर को प्रणाम करने के बाद वो अपने मुख से ऋषिवर के सामने अपने किये गये शुभ-कर्मों का बखान करने लगे!

🔶 राजा - हॆ देव मैंने अपनी जिन्दगी मे कई धर्मशालाओ का निर्माण करवाया कई कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाया और कई निर्धन लोगो को खुब दानदक्षिणा दी! हॆ देव मेरे इन सभी सतकर्मों का कितना फल मिलेगा!

🔷 ऋषिवर - हॆ वत्स पर उन सब को ये कैसे पता की ये विवाह आपने करवाये और किसी को कैसे पता चलेगा की अमुक-अमुक निर्माण आपने करवाये है उन बच्चो को कैसे पता चलेगा की उनकी शिक्षा-दीक्षा आपने करवाई है?

🔶 राजा - हॆ देव ये तो बहुत ही आसान है क्योंकि मैंने जितने भी निर्माण करवाये उन सभी पर मैंने बड़े बड़े अक्षरों मे अपना नाम लिखवाया है की अमुक निर्माण मैंने करवाया है जैसै किसी मन्दिर मे पंखा लगवाया तो मैंने उस पर अपना नाम लिखवाया की ये पंखा मेरी तरफ से सप्रेम भेंट! और जिन कन्याओं का विवाह करवाया जिनको पढाया अथवा जिसकी भी किसी भी प्रकार की कोई मदद की मैं उन सबको बराबर याद दिलाता रहता हुं की मैंने तुम्हारे लिये किया है!

🔷 हॆ देव मैंने जो इतने महान कर्म किये है उसका कितना फल मिलेगा! और वो कितना हुआ अर्थात किसके बराबर है?

🔶 ऋषिवर - इसका उत्तर आपको तब मिलेगा जब आप पहले ये ताम्बे का लोटा बीहड़ मे बड़ी दुर एक नदी बह रही है वहाँ से इसे बिल्कुल साफ करके भरकर लाना और ध्यान रखना की थोड़ा भी खाली मत लाना नही तो सारी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी! कुछ दिनो बाद राजा आया!

🔷 ऋषिवर - लाओ वत्स वो लोटा इधर लाओ

🔶 राजा - पर इसमे जल नही है देव!

🔷 ऋषिवर - पर क्यों ? और अपनी यात्रा का वर्णन बताओ!

🔶 राजा - मैं उस बहती हुई नदी तक तो सहजता से पहुँच गया और जल भी पात्र मे भर लिया पर जब वापिस रवाना हुआ तो राह मे बीहड़ मे अनेक रास्तों की वजह से मैं भटक गया जोरों से भुख लगने लगी चलते चलते किसी गाँव मे पहुँचा वहाँ कोई विवाह का समारोह हो रहा था आश्चर्य की बात की परिवार तो गरीब था पर पता नही न जाने किसने उसका विवाह करवाया मैंने वहाँ भोजन किया और फिर रवाना हुआ!

🔷 ऋषिवर - क्या आपने पता किया की वो विवाह कौन करवा रहा था?

🔶 राजा - हॆ देव बहुत कोशिश की पर मैं सफल न हो पाया की विवाह कौन करवा रहा था शायद कोई परदे के पिछे था!

🔷 फिर मैं रवाना हुआ तो पानी की प्यास सताने लगी जंगल मे एक जगह एक कुआँ था और एक डोर लोटा रखा हुआ था पानी की व्यवस्था मिल गई और वहाँ पानी पिया फिर मैंने सोचा इस बीहड़ मे ये व्यवस्था किसने की पर कुछ भी पता न चला फिर खुब चला और फिर पानी की प्यास सताने लगी चारों तरफ देखा पर पानी कही न मिला पानी के अभाव मे मैं दम तोड़ने लगा फिर मैं नीचे गिरा और कलश का लगभग आधा पानी व्यर्थ बह गया आधा पानी बचा फिर मैंने सोचा की जिन्दगी रही तो फिर आगे कुछ करेंगे पहले ये पानी पी लो! और वो बचा हुआ आधा पानी भी मैं पी गया!

🔶 ऋषिवर - हॆ राजन जिस तरह से इतनी मेहनत के बावजूद भी तुम खाली हाथ लोटे हो आपके प्रश्न का यही उत्तर है!

🔷 राजा - हॆ देव मैं कुछ समझा नही

🔶 ऋषिवर - ध्यान से सुनना राजन और उस पर गहरा चिन्तन भी करना दान है महान पर कब?

🔷 जब दान देकर भुला दिया जाता है और जो दान गुप्त हो वही दान सात्विक कर्म है पर जो दान गिनाया और दिखाया जाये वो राजसिक कर्म है और राजसीक दान का आधा पुण्य प्रदर्शन मे चला जाता है और जिसे बार-बार गिनाया जाये और मन मे ये भाव आये की ये मैंने तुम्हे दिया, ये भवन मैंने बनवाया है, मैंने तुम्हे पढाया है, अमुक निर्माण मैंने किया है, वो तामसिक कर्म है और ऐसे तामसिक दान का सारा पुण्य व्यर्थता मे चला जाता है!

🔶 सात्विक का एक आना राजसीक के लाख आनों से और तामसिक के करोड़ों आनों से ज्यादा श्रेष्ठ और महान है! दान और सेवा का प्रदर्शन मत करो दान और सेवा जितनी गुप्त होगी उतना ही ज्यादा अच्छा होगा!

🔷 सेवा करके भुल जाओ दान ऐसे दो की दायाँ हाथ दे तो बायें हाथ को भी पता न चले की दायें हाथ ने क्या दिया, और मत तो उसे गिनाना और मत उसे मन मे याद रखना नही तो किया न किया सब व्यर्थ हो जायेगा!

🔶 सबसे अच्छा तरीका जो भी करो उसे परमपिता परमेश्वर को समर्पित कर दो! अरे आप दिखावे के लिये कर रहे हो या उस परमतत्व के लिये? आपने किसी और के लिये क्या किया उसे भुल जाओ पर किसी और ने आपके लिये क्या किया उसे कभी मत भुलना!

🔷 राजा - हॆ नाथ अब तक मैं राजसीक और तामसिकता के मद मे अंधा होकर चल रहा था पर आज आपने मेरी आँखे खोल दी आज के बाद प्रभु मुझसे जो भी करवायेंगे वो सब गुप्त रखा जायेगा और सात्विकता से इस जीवन को चलाया जायेगा!

🔶 ऋषिवर - हाँ वत्स हमेशा याद रखना की जो नही है बस वही है और जो है वो कही नही है अर्थात प्रदर्शन से बचना और गोपनीय दान और गोपनीयता का अपना एक अलग ही स्थान है!

🔷 और सेवा करके भुल जाना पर सेवा लेके मत भुलना!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 24 Dec 2017


👉 ईश्वर कहाँ है?

जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ।
मैं बौरि खोजन गई रही किनारे बैठ॥

🔶 ईश्वर को ढूँढ़ने के लिए, उसे प्राप्त करने के लिए हम नाना प्रकार के प्रयत्न करते हैं, पर उसे नहीं पाते, कहते हैं कि वह सर्वत्र है, वह सब जगह हैं, पर फिर भी हमें क्यों नहीं दीखता?

🔷 उसे प्राप्त करने को धन, वैभव, जीवन तक नष्ट करते हैं, पर पाते नहीं, अन्त में निराश हो कहते हैं कि-ईश्वर नहीं हैं।

🔶 भाई ईश्वर हैं! पर उसे खोजने में गलती कर रहे हो, हम उसे धन वैभव से नहीं पा सकते, अगर उसे पाना हैं तो प्रेम करना सीखो प्राणी मात्र से प्रेम करो, जड़ चेतन से प्रेम करो, आत्मा से प्रेम करो।

🔷 उसे पाने को जंगल में जाने की, धूनी रमाने की, धन वैभव कष्ट करने की, कोई आवश्यकता नहीं हैं। जब वह सर्वत्र है तो आपके पास भी होगा, होगा नहीं-हैं। कहाँ? आपके शरीर में।

🔶 जिसे आप आत्मा कहते हैं क्या आपने कभी अपनी आत्मा की आवाज पर ध्यान दिया हैं? नहीं यही कारण है कि आप उसे ढूँढ़ने पर भी नहीं पाते।

🔷 विचार करो! जब तुम बोलते हों, चलते हों, काम करते हों, सोचते हो या शुभ काम करने की प्रेरणा होती है तो वह कहाँ से और कौन करता या कहता हैं? जब तुम किसी को कष्ट पहुँचाने का विचार कर चलते हो और तुम्हें अन्दर से कोई रोकता हैं कि ऐसा न करो वह कौन हैं? वह अपने अन्दर मौजूद हैं, उसे अपने अन्दर ही प्राप्त किया जा सकता हैं।

📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1944 पृष्ठ 15

👉 दुःखी संसार में भी सुखी रहा जा सकता है (भाग 1)

🔷 गुरु नानक ने कहा है—‘‘नानक दुखिया सब संसार।’’ इसी प्रकार एक विचारक ने सुख की परिभाषा करते हुए कहा है—‘‘इस सृष्टि में दुःख ही व्याप्त है। दुःख के अभाव को सुख कहना उचित होगा।’’

🔶 इन दोनों कथनों से स्पष्ट है कि संसार में दुःखों की प्रधानता है। संसार का मूल भाव दुःख ही है। सुख स्वाभाविक नहीं है। यह बात बहुत अंशों तक सत्य होते हुए भी अक्षरशः सत्य नहीं है। क्योंकि यदि यह इसी प्रकार अक्षरशः सत्य होती तो संसार में किसी का जीना असम्भव हो जाता। संसार में लोग जीते हैं, जीना चाहते हैं। लोगों में उत्साहपूर्वक जीने की इच्छा है। इसका अर्थ है कि संसार में सुख का तत्त्व मौजूद है। यहां केवल दुःख ही दुःख होता तो कोई भी इस प्रकार जीने की इच्छा नहीं रखते। तथापि नानक जैसी महान् आत्माओं का कथन झूठा नहीं माना जा सकता। उसमें सत्य का एक बड़ा अंश है। संसार में दुःखी लोगों की ही बहुतायत है। सुख, स्वास्थ्य, धन-दौलत, यश-मान सभी कुछ होते हुए भी अधिकांश व्यक्ति दुःखी ही देखे जाते हैं। कोई विरले व्यक्ति ही अपनी परिस्थितियों में सुखी अथवा सन्तुष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को देखकर ही नानक ने यह भाव व्यक्त किया है कि—‘नानक दुखिया सब संसार।’

🔷 सांसारिक दृष्टि से यह बात सर्वथा सत्य है कि यहां दुःख का भाव अधिक स्वाभाविक है, वह सहज रूप प्राप्त होता रहता है। किन्तु सुख पाने के लिए उपाय करना होता है। वह यों ही अनायास प्राप्त नहीं हो सकता। धन को सुख का प्रधान साधन माना जाता है। इस साधन की उपलब्धि के लिए लोग कठोर परिश्रम करते हैं उद्योग-धन्धे, कार-रोजगार, खेती-बाड़ी, दुकान, हाट, नौकरी-चाकरी आदि न जाने कितने काम किया करते हैं। बहुत बार तो अनेक लोग इसके लिए अनैतिक और अनुचित कर्म करने की भूल भी कर बैठते हैं। इन साधनों एवं उपायों में भिन्नता भले ही है पर मूल उद्देश्य सबका एक ही है—सुख के लिये प्राप्त करना।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1969 पृष्ठ 32
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1969/April/v1.32

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.5

👉 Amrit Chintan 2 Dec

🔶 If you want success – Be brave. Your masculine musculature and strong will to face the hurdles and probles of life will defeat your enemy. When gold is put overflame – all pollution burn up leaving pure gold in your hand. Difficulty and hard-ship of your life makes you strong to face other adversities of life.

🔷 The role of spirituality is to make your life. Free of weaknesses and vices of life and to adopt truth and bliss of life. In ancient India people has high moral character and honesty and as the result of that people were very happy and were living in good prosperity and equanimity. But in modern times inspite of all scientific development men have lost peace and Love among themselves. Today every one seems money minded at all cost of ethical codes.

🔶 To attain the status of a saint or sage one had to be a pious and lead a austerity. He leaves the material interest and adopts divine life. Without sadhana one can not attain that life. But these persons not only elevate them selves but also can help other.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (अन्तिम भाग)

🔷 तात्पर्य यह है कि दिन भर की समस्त कार्य-पद्धति के साथ उच्चकोटि की भावनायें नियोजित रखी जायें। हर दिन कागज पर पूरी दिनचर्या नोट कर ली जाय जिसमें दिन भर का समय विभाजन और हर कार्य के साथ जुड़ी रखी जाने वाली भावनाओं का विवरण लिखा रहें। यह कागज मेज़ पर या जेब में रखा रहे। निर्धारित कार्य पद्धति और विचार प्रक्रिया में कितनी सफलता मिल रही है कितनी असफलता, इसका निर्णय हर घंटे करते रहा जाय। इस प्रकार चलता हुआ क्रम रात को सोते समय यह बतायेगा कि सब मिलाकर कुल कितने प्रतिशत सफलता मिली कितनी असफलता। सफलता के लिए प्रसन्न हुआ जाय और जो भूलें हुई हो उन्हें दूसरे जनम में -दूसरे दिन सुधारने के लिए अधिक सतर्कता जागृत की जाय।

🔶 रात्रि को सोने के लिए जब बिस्तर पर जाया जाय तब संन्यास जैसी भावनाओं को हृदयंगम किया जाय। जो कुछ कर्तव्य थे वे ईश्वर के सौंपे हुए थे, ईमानदारी से पूरे किये गये। जो शेष हैं उन्हें ईश्वर पूरा करेगा। कुटुंब परिवार, धन, वैभव आदि सब भगवान का था उसकी धरोहर उसे सौंप कर निश्चिंतता पूर्वक निर्लिप्त मन से अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा मृत्यु की गोद में शयन किया जा रहा है। अंतिम मृत्यु के लिए यह श्रेष्ठतम साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाय तो परलोक में निश्चित रूप से परम शांति और सद्गति ही मिलेगी।

🔷 चिंतन का स्वरूप शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के खाँचे में इस तरह कर देता है कि असावधानी के कारण पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों के पनपने की कोई गुँजाइश न रहे। ढीली-पोली जीवनचर्या पर ही विकृतियाँ सवार होती हैं यदि जागरूकता और सतर्कता बनी रहे तो दुष्ट दुर्भावों को संग लगाने का अवसर नहीं मिले। यदि वे कदाचित् आक्रमण करें भी तो सदा लड़ने और अड़ने के लिए तैयार रखता है। कभी कामुकता के विचार मन में उठें तो उसे निरस्त करने के लिए व्यभिचार से उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों की लंबी सूची तैयार रखता है और जैसे ही उस स्तर के दुष्ट विचार उठें कि प्रतिरोधी सदाचार परायण विचार शृंखला पर गंभीरता पूर्वक ऊहापोह आरंभ कर देता है। जहाँ यह प्रक्रिया आरंभ हुई वहाँ कुविचारों के निराकरण में तनिक भी देर नहीं लगती।

🔶 उच्चस्तरीय भावनात्मक साधना के लिए भजन, मनन और चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 6
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.3

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई...