बुधवार, 17 मई 2017

👉 सब कुछ करता तू ही...

🔵 एक बार मेरी धर्मपत्नी बहुत गम्भीर रूप से बीमार हो गईं। उन्हें दमा की बीमारी थी। हालत इतनी खराब थी कि पानी में हाथ डालना भी मुश्किल था। कोई भी काम अपने हाथ से नहीं कर पातीं। केवल हम दो व्यक्तियों के परिवार में घर के काम- काज के लिए दो लड़कियों को रखना पड़ा। अपनी दोनों बेटियों का विवाह हो चुका था। वे अपने परिवार की जिम्मेदारियों को छोड़कर हमारे पास आकर मॉँ की सेवा नहीं कर सकतीं थी। इधर यह बीमारी थी जो छूटती ही नहीं थी। पाँच साल तक इलाज चलता रहा। मगर हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती ही चली गई।

🔴 मैं स्वयं एक होमियोपैथ चिकित्सक हूँ। होमियोपैथिक,एलोपैथी,आयु़र्वेद सब तरह का इलाज कराकर थक चुका था। हर रात किसी न किसी डॉक्टर को बुलाकर लाना पड़ता था। हुगली जिले में ऐसे कोई प्रतिष्ठित डॉक्टर नहीं बचे थे जिन्हें न दिखाया गया हो, लेकिन यह सिलसिला कभी समाप्त होता नहीं दिखता था। रात- रात भर पत्नी के बिस्तर के पास बैठकर बीतता। कभी रोते- रोते गुरु देव से प्रार्थना करता- हे गुरु देव! उनकी यह असह्य पीड़ा हमसे नहीं सही जाती। या तो ठीक ही कर दीजिए या जीवन ही समाप्त कर दीजिए।

🔵 दिन पर दिन बीतते गए। हमारे आँसुओं का कोई अंत नहीं दिखता था। एक दिन आधी रात को इसी उधेड़बुन में बैठा था कि किस नए डॉक्टर को दिखाया जाए। दिखाने से कोई लाभ है भी या नहीं। अचानक किसी की आवाज आई- इतनी चिन्ता क्यों करते हो? एक अंतिम प्रयास खुद भी तो करके देखो। मैंने चौंककर इधर- उधर देखा। यह अन्तरात्मा की आवाज थी। जैसे गुरु देव ही इलाज की नई दिशा की ओर इंगित कर रहे हों। मैंने तत्काल निर्णय कर लिया, अब जो कुछ हो उन्हीं के निर्देश पर इलाज करूँगा। किसी डॉक्टर को नहीं बुलाऊँगा।
 
🔴 यह निर्णय लेते ही मन में उत्साह की लहर आई। मन की सारी दुश्चिंताए मिट गईं। भोर होते- होते मैंने धर्मपत्नी को भी यह बात बता दी कि अब मेरे घर कोई डॉक्टर नहीं आएँगे। मैं ही इलाज करूँगा। उन्होंने भी सहमति जताई। कहा- ‘मर तो जाऊँगी ही, यह मरण अगर आपके ही हाथों लिखा हो, तो कौन टाल सकता है? पत्नी की इन निराशा भरी बातों से भी मेरा उत्साह कम नहीं हुआ। बल्कि अन्दर से जोरदार कोई प्रेरणा उठी और मैं होमियोपैथी की किताब लेकर बैठ गया।
 
🔵 गहन अध्ययन कर सारे लक्षणों को मिलाकर सटीक दवा खोजने का प्रयास करता। इसी तरह एक के बाद एक कई दवाएँ चलाईं; लेकिन स्थिति दिन- पर बुरी होती गई। बेटियाँ मुझ पर लांछन लगाने लगीं। आस- पड़ोस के लोग भी कंजूस कहकर ताने देने लगे। बेटियों ने तो यहाँ तक कह दिया कि यदि हमारी माँ को कुछ हो गया, तो हम आपको जेल भी पहुँचाने में नहीं चूकेंगी। फिर भी इस काम में गुरु देव का निर्देश समझकर मैं जुटा रहा।
 
🔴 गुरु देव को स्मरण कर एक पर एक दवा मिला- मिलाकर प्रयोग परीक्षण करता रहा। कुछ लाभ न होता देख जब मन विचलित हो उठा, हिम्मत जवाब देने लगी, तब फिर एक बार वही आवाज सुनाई पड़ी- चिन्ता मत कर, कल तू जरूर सही दवा खोज निकालेगा। मैं चारों ओर से ध्यान हटाकर किताब लेकर बैठा। सारे लक्षणों को सूचीबद्ध किया। पहले दी गई दवाओं के परिणामों को देखते हुए दुबारा अच्छी तरह अध्ययन कर दवा चुनी। गुरु देव का स्मरण कर दवा देते समय मन ही मन कहा- गुरुदेव! यह दवा मैं नहीं दे रहा। यह आपकी दी हुई दवा है। अब आप जानिए और आपका काम जाने।
 
🔵 गुरु देव की बात सच हुई। दवा सही निकली। इसी दवा से धीरे- धीरे मेरी पत्नी स्वस्थ होने लगी। हमारे घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं। इसके बाद से पूज्य गुरु देव को स्मरण कर जब- जब रोगियों को दवा दी है, रोगी को अवश्य ही आराम पहुँचा है। गुरुदेव की बड़ी कृपा रही है मुझ पर।

🌹 डॉ.टी० के० घोष हुगली (पं.बंगाल)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/sfg

👉 आइए! आत्म शक्ति द्वारा अपने अभावों की पूर्ति करें

🔴 आपको अपने जीवन में अनेक प्रकार की आवश्यकताएँ अनुभव होती हैं, अनेक अभाव प्रतीत होते हैं और अनेक इच्छाएँ अतृप्त दशा में अन्तःकरण में कोलाहल कर रही हैं। इस प्रकार का अशान्त एवं उद्विग्न जीवन जीने से क्या लाभ? विचार कीजिए कि इनमें कितनी इच्छाएँ वास्तविक हैं और कितनी अवास्तविक? जो तृष्णाएँ मोह ममता और भ्रम अज्ञान के कारण उठ खड़ी हुई हैं उनका विवेक द्वारा शयन कीजिए। क्योंकि इन अनियंत्रित वासनाओं की पूर्ति, तृप्ति और शान्ति संभव नहीं। एक को पूरा किया जायेगा कि दस नई उपज पड़ेंगीं।

🔵 जो आवश्यकताएँ वास्तविक हैं। उनको प्राप्त करने के लिए अपने पुरुषार्थ को एकत्रित करके इसे उचित उपयोग कीजिए। पुरुष का पौरुष इतना शक्तिशाली तत्व है कि उसके द्वारा जीवन की सभी वास्तविक आवश्यकताएँ आसानी से पूरी हो सकती हैं। इसमें से अधिकाँश का पौरुष सोया हुआ रहता है। क्योंकि उसे प्रेरणा देने वाली अग्नि आत्म शक्ति- मंद पड़ी रहती है। उस चिंगारी को जगाकर अपने शक्ति भण्डार को चैतन्य किया जा सकता है। यह सचेत पौरुष हमारी प्रत्येक सच्ची आवश्यकता को पूरी करने में पूर्णतया द्वारा समर्थ है। आइए, अभावग्रस्त चिन्तातुर स्थिति से छुटकारा पाने के लिए तृष्णाओं का विवेक द्वारा शमन करें और आवश्यकता को पूर्ण करने वाले पौरुष को जगाने के लिए आत्मशक्ति की चिंगारी को जगावें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/August/v1.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 103)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 अध्यात्म को विज्ञान से मिलाने की योजना-कल्पना में तो कइयों के मन में थी, पर उसे कोई कार्यान्वित न कर सका इस असम्भव को सम्भव होते देखना हो तो ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में आकर अपनी आँखों से स्वयं देखना चाहिए। जो सम्भावनाएँ सामने हैं, उन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले दिनों अध्यात्म की रूपरेखा विशुद्ध विज्ञान पर बनकर रहेगी।

🔵 छोटे-छोटे देश अपनी पंच वर्षीय योजनाएँ बनाने के लिए आकाश-पाताल के कुलावे मिलाते हैं, पर समस्त विश्व की कायाकल्प योजना का चिंतन और क्रियान्वयन जिस प्रकार शान्तिकुञ्ज के तत्त्वावधान में चल रहा है, उसे एक शब्द में अद्भुत एवं अनुपम ही कहा जा सकता है।

🔴 भावनाएँ हमने पिछड़ों के लिए समर्पित की हैं। शिव ने भी यही किया था। उनके साथ चित्र-विचित्र समुदाय रहता था और सर्पों तक को वे गले लगाते थे। उसी राह पर हमें भी चलते रहना पड़ा है। हम पर छुरा रिवाल्वर चलाने वालों को पकड़ने वाले जब दौड़ रहे थे पुलिस भी लगी हुई थी। सभी को हमने वापस बुला लिया और घातक को जल्दी ही भाग जाने का अवसर दिया। जीवन में ऐसे अनेक प्रसंग आए हैं, प्रतिपक्षी अपनी ओर से कुछ कमी न रहने देने पर भी मात्र हँसने और हँसाने के रूप में प्रतिदान पाते रहे हैं।

🔵 हमने जितना प्यार लोगों से किया है, उससे सौ गुनी संख्या और मात्रा में लोग हमारे ऊपर प्यार लुटाते रहे हैं। निर्देशों पर चलते रहे हैं और घाटा उठाने तथा कष्ट सहने में पीछे नहीं रहे हैं। कुछ दिन पूर्व प्रज्ञा संस्थान बनाने का स्वजनों को आदेश किया, तो दो वर्ष के भीतर २४०० गायत्री शक्ति पीठों की भव्य इमारतें बनकर खड़ी हो गईं और उसमें लाखों रुपयों की राशि खप गई। बिना इमारत के १२ हजार प्रज्ञा संस्थान बने सो अलग। छुरा लगा तो सहानुभूति में इतनी बड़ी संख्या स्वजनों की उमड़ी, मानों मनुष्यों का आँधी-तूफान आया हो। इनमें से हर एक बदला लेने के लिए आतुरता व्यक्त कर रहा था। हमने तथा माताजी ने सभी को दुलार कर दूसरी दिशा में मोड़ा। यह हमारे प्रति प्यार की-सघन आत्मीयता की ही अभिव्यक्ति तो है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.7

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 May 2017


👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 5)

🌹  हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।

🔵 हम में से अनेक दुर्बल व्यक्ति शैतान के प्रलोभन में फँसते और गला कटाते हैं। विवेक कुंठित हो जाता है। भगवान् पहचानने में नहीं आता, सन्मार्ग पर चलना नहीं बन पड़ता और हम चौकड़ी चूक कर मानव जीवन में उपलब्ध हो सकने वाले स्वर्णिम सौभाग्य से वंचित रह जाते हैं। ईश्वर पर अटूट विश्वास और उसकी अविच्छिन्न समीपता का अनुभव, इसी स्थिति को आस्तिकता कहते हैं। उसका नाम ‘उपासना’ है। परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है, कोई गुप्त, प्रकट स्थान उसकी उपस्थिति से रहित नहीं, वह सर्वांतर्यामी घट-घट की जानता है। सत्कर्म ही उसे प्रिय है। धर्म मार्ग पर चलने वाले को ही वह प्यार करता है। इतना ही मान्यता तो ईश्वर भक्त में विकसित होनी ही चाहिए। इस प्रकार की निष्ठा जिसमें होगी वह न शरीर से दुष्कर्म करेगा और न मान में दुर्भावों को स्थान देगा। इसी प्रकार जिसको ईश्वर के सर्वव्यापक और न्यायकारी होने का विश्वास है, वह कुमार्ग पर पैर कैसे रखेगा? आस्तिक कुकर्मी नहीं हो सकता। जो कुकर्मी है उसकी आस्तिकता को एक विडंबना या प्रवंचना ही कहना चाहिए।

🔴 ईश्वर का दंड एवं उपहार ही असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को इस बात का सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचा जाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुट-पुट पूजा-अर्चना जप-ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। भावनाओं और क्रियाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने से ही यह प्रयोजन पूरा होता है। न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। स्तन, अर्चन करके उसे उसके नियम विधान से विचलित नहीं किया जा सकता है। अपना पूजन स्मरण या गुणगान करने वाले के साथ यदि वह पक्षपात करने लगे, तब उसकी न्याय-व्यवस्था का कोई मूल्य न रहेगा, सृष्टि की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी। सबको अनुशासन में रखने वाला परमेश्वर स्वयं भी नियम व्यवस्था में बँधा है। यदि कुछ उच्छृंखलता एवं अव्यवस्था बरतेगा तो फिर उसकी सृष्टि में पूरी तरह अंधेर खाता फैल जाएगा। फिर कोई उसे न तो न्यायकारी कहेगा और न समदर्शी। तब उसे खुशामदी या रिश्वतखोर नाम से पुकारा जाने लगेगा, जो चापलूस स्तुति कर दे, उससे प्रसन्न, जो पुष्प-नैवेद्य भेंट करें, उससे प्रसन्न।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/hum
 

👉 रौशनी की किरण

🔵 रोहित आठवीं कक्षा का छात्र था। वह बहुत आज्ञाकारी था, और हमेशा औरों की मदद के लिए तैयार रहता था। वह शहर के एक साधारण मोहल्ले में रहता था, जहाँ बिजली के खम्भे तो लगे थे पर उनपे लगी लाइट सालों से खराब थी और बार-बार कंप्लेंट करने पर भी कोई उन्हें ठीक नहीं करता था।

🔴 रोहित अक्सर सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को अँधेरे के कारण परेशान होते देखता, उसके दिल में आता कि वो कैसे इस समस्या को दूर करे। इसके लिए वो जब अपने माता-पिता या पड़ोसियों से कहता तो सब इसे सरकार और प्रशाशन की लापरवाही कह कर टाल देते।

🔵 ऐसे ही कुछ महीने और बीत गए फिर एक दिन रोहित कहीं से एक लम्बा सा बांस और बिजली का तार लेकर और अपने कुछ दोस्तों की मदद से उसे अपने घर के सामने गाड़कर उसपे एक बल्ब लगाने लगा। आस-पड़ोस के लोगों ने देखा तो पुछा, ” अरे तुम ये क्या कर रहे हो?”

🔴 “मैं अपने घर के सामने एक बल्ब जलाने का प्रयास कर रहा हूँ ?” रोहित बोला।

🔵 “अरे इससे क्या होगा, अगर तुम एक बल्ब लगा भी लोगे तो पुरे मोहल्ले में प्रकाश थोड़े ही फ़ैल जाएगा, आने जाने वालों को तब भी तो परेशानी उठानी ही पड़ेगी !”  पड़ोसियों ने सवाल उठाया।

🔴 रोहित बोला, ” आपकी बात सही है , पर ऐसा कर के मैं कम से कम अपने घर के सामने से जाने वाले लोगों को परेशानी से तो बचा ही पाउँगा। ” और ऐसा कहते हुए उसने एक बल्ब वहां टांग दिया।

🔵 रात को जब बल्ब जला तो बात पूरे मोहल्ले में फ़ैल गयी। किसी ने रोहित के इस कदम की खिल्ली उड़ाई तो किसी ने उसकी प्रशंशा की। एक-दो दिन बीते तो लोगों ने देखा की कुछ और घरों के सामने लोगों ने बल्ब टांग दिए हैं। फिर क्या था महीना बीतते-बीतते पूरा मोहल्ला प्रकाश से जगमग हो उठा। एक छोटे से लड़के के एक कदम ने इतना बड़ा बदलाव ला दिया था कि धीरे-धीरे पूरे शहर में ये बात फ़ैल गयी , अखबारों ने भी इस खबर को प्रमुखता से छापा और अंततः प्रशाशन को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और मोहल्ले में स्ट्रीट-लाइट्स को ठीक करा दिया गया।

🔴 मित्रो कई बार हम बस इसलिए किसी अच्छे काम को करने में संकोच कर जाते हैं क्योंकि हमें उससे होने वाला बदलाव बहुत छोटा प्रतीत होता है। पर हकीकत में हमारा एक छोटा सा कदम एक बड़ी क्रांति का रूप लेने की ताकत रखता है। हमें वो काम करने से नहीं चूकना चाहिए जो हम कर सकते हैं। इस कहानी में भी अगर रोहित के उस स्टेप की वजह से पूरे मोहल्ले में रौशनी नहीं भी हो पाती तो भी उसका वो कदम उतना ही महान होता जितना की रौशनी हो जाने पर है। रोहित की तरह हमें भी बदलाव होने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए बल्कि, जैसा की गांधी जी ने कहा है, हमें खुद वो बदलाव बनना चाहिए जो हम दुनिया में देखना चाहते हैं, तभी हम अँधेरे में रौशनी की किरण फैला सकते हैं।

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए। (भाग 3)

🔵 प्राचीन काल में भारत में नारी को यह सब अधिकार मिले हुए थे। उनके लिये शिक्षा की समुचित व्यवस्था थी, समाज में आने-जाने और उसकी गतिविधियों में भाग लेने की पूरी स्वतन्त्रता थी। वे पुरुषों के साथ वेद पढ़ती-पढ़ाती थीं, यज्ञ में होता, ऋत्विज् तथा यज्वा के रूप में योगदान किया करती थीं। यही कारण था कि वे गुण, कर्म, स्वभाव में पुरुषों के समान ही उन्नत हुआ करती थीं और तभी समान एवं समकक्ष स्त्री-पुरुष की सम्मिलित सन्तान भी उन्हीं की तरह गुणवती होती थीं। जब तक समाज में इस प्रकार की मंगल परम्परा चलती रही, भारत का वह समय देव-युग के समान सुख-शान्ति और सम्पन्नता पूर्ण बना रहा, किन्तु ज्योंही इस पुण्य-परम्परा में व्यवधान आया, नारी को उसके समुचित एवं आवश्यक अधिकारों से वंचित किया गया, भारतीय समाज का पतन होना प्रारम्भ हो गया और ज्यों नारी को दयनीय बनाया जाता रहा, समाज अधोगति को प्राप्त होता गया और अन्त में एक ऐसा अन्धकार-युग आया कि भारत का सारा गौरव और उसकी सारी साँस्कृतिक गरिमा मिट्टी में मिल गई।

🔴 कहना न होगा कि जिस प्रकार शिखा सहित ही दीपक, दीपक है, उसी प्रकार सुयोग्य, सुशील और सुगृहिणी के रूप में ही पत्नी, पत्नी मानी जायगी। अयोग्य विवाहितायें वास्तव में पुरुष रूपी शरीर में पक्षाघात के समान ही हैं। जीवनरूपी रथ में टूटे पहिये और उन्नति अभियान में विखण्डित पक्ष की तरह ही बेकार हैं।

🔵 इस रूप में पुरुष की पूर्ति नारी तब ही कर सकती है, जब उन्हें इस कर्तव्य के योग्य विकसित होने का अवसर दिया जाये। जहाँ स्त्रियों को केवल बच्चा पैदा करने की मशीन, विषय-विष का समाधान और चूल्हे-चौके की दासी-भर समझकर रक्खा जायेगा, वहाँ उससे उपर्युक्त पतित्व की अपेक्षा करना मूर्खता होगी।

🔴 हमारे समाज में आज एक लम्बे युग से नारी की उपेक्षा होती चली आ रही है। जिसके फल स्वरूप धर्म भार्या के रूप में उसके सारे गुण और समाज निर्मात्री के रूप में सारी योग्यताएं समाप्त हो गई हैं। उसे पैर की जूती बनाकर रक्खा जाने लगा, जिससे वास्तव में जूती से अधिक उसकी कोई उपयोगिता रह भी नहीं गई है। ऐसी निम्न कोटि में पहुँचाई गई नारी से यदि आज का स्वार्थी एवं अनुदार पुरुष यह आशा करे कि वह गृह-लक्ष्मी बनकर उसके घर को सुख-शान्तिपूर्ण स्वर्ग का एक कोना बना दे, उसकी सन्तानों की सुयोग्य, तो वह दिन के सपने देखता है, आकाश-कुसुम की कामना करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/April/v1.28

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 May

🔴 ध्यान का तात्पर्य है बिखरे हुए विचारों को एक केंद्र पर केंद्रीभूत करना। यह एकाग्रता का अभ्यास, चिन्तन को नुकीला बनाता है। मोटे तार से कपड़ों को नहीं सिया जा सकता। पर जब इसकी पैनी नोंक निकाल दी जाती है तो कपड़े की सिलाई का प्रयोजन भली-भाँति पूरा हो सकता है। बिखराव में शक्तियों की अस्त व्यस्तता रहती है। पर जब उन्हें बटोरकर एक केंद्र के साथ बाँध दिया जाता है तो अच्छी बुहारने वाली झाडू बन जाती है। धागों को इकट्ठा करके कपड़ा बुना जाता है और तिनके रस्सी बन जाते हैं। मेले ठेलों की बिखरी भीड़ गन्दगी फैलाती और समस्या बनती है पर जब उन्हीं मनुष्यों को सैनिक अनुशासन में बाँध दिया जाता है तब ये ही देश की सुरक्षा संभालते हैं, शत्रुओं के दाँत खट्टे करते हैं और बेतुकी भीड़ को नियम मर्यादाओं में रखने का काम करते हैं। बिखरे घास-पात को समेटकर चिड़ियाँ मजबूत घोंसले बना लेती हैं और उनमें बच्चों समेत निवास करती हैं।

🔵 विचारों को दिशाबद्ध रखने वाले विद्वान, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, शिल्पी, विशेषज्ञ, दार्शनिक बन जाते हैं। पर जिनका मन उखड़ा-उखड़ा रहता है वे समस्त सुविधा साधन होते हुए भी आवारागर्दी में जीवन बिता देते हैं। अर्जुन के द्रौपदी स्वयंवर जीतने की कथा प्रसिद्ध है। उसकी समूची एकाग्रता मछली की आँख पर जमाई थी और लक्ष्य वेध लिया था। जब कि दूसरे राजकुमार चित्त के चंचल रहने पर वैसे ही धनुष-बाण रहने पर असफल होकर रह गये थे। निशाने वही ठिकाने पर बैठते हैं जो लक्ष्य के साथ अपनी दृष्टि एकाग्र कर लेते हैं।             
                                                   
🔴 अध्यात्म प्रयोजन में कल्पना और भावना का एकीकरण करते हुए किसी उच्च केंद्र पर केंद्रीभूत करने का अभ्यास कराया जाता है इसे ध्यान कहते हैं। ध्यान की क्षमता सर्वविदित है। कामुक चिन्तन में डूबे रहने वालों को स्वप्नदोष होने लगते हैं। टहलने के साथ स्वास्थ्य सुधार की भावना करने वाले तगड़े होते जाते हैं पर दिन भर घूमने वाले पोस्ट मैन या उसी कार्य को भारभूत मानने वाले उस अवसर का कोई लाभ नहीं उठ पाते। पहलवान की भुजायें मजबूत हो जाती हैं किन्तु दिन भर लोहा पीटने वाले लुहार को कोई लाभ नहीं होता। इस अन्तर का एक ही कारण है भावनाओं का सम्मिश्रण होना और दूसरे का वैसा न कर पाना।  

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पुरुषार्थ की दिशा

🔵 हम कहाँ पहुँच गये? यह तो हमारा अभीष्ट स्थान नहीं। हमें यहाँ चैन नहीं मिल सकता। हम ऐसी स्थिति में क्यों पहुँचे, कैसे पहुँचे, किसकी भूल थी-इस ओर देखें या न देखें-यह देखना सार्थक हो या निरर्थक; पर हमें यह सहन नहीं। इससे तो हटना ही पड़ेगा-बचना ही होगा। अवांछनीय परिस्थितियों में पड़े हुए, अपने आपको पीड़ित अनुभव करने वाले व्यक्ति अगणित हैं। उन सबकी एक ही कामना-आकांक्षा होती है कि हम इस स्थिति से बाहर निकलें। ऐसी स्थिति का हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ उपक्रम भी उसके लिए अपनाता ही है।

🔴 लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो मात्र रोना ही रोते रहते हैं। अपने प्रयत्न का सबसे सार्थक पक्ष उन्हें यही दिखता है कि अपनी अवांछनीय परिस्थितियों के लिए किसी अन्य को दोषी ठहरा दें। भगवान् से लेकर अपने आस-पास के किसी व्यक्ति को उसका लांछन देने-उसका कारण सिद्ध करने में ही वह सारी अकल व सारा समय खर्च कर देते हैं। इससे उन्हें झूठा संतोष भले ही मिल जाता हो, पर उस यंत्रणा से मुक्ति तो मिल ही नहीं सकती।
  
🔵 कुछ व्यक्ति ऐसे समय पर परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं तथा उन्हीं हालातों में मरते-खपते रहने के लिए किसी प्रकार मन पक्का कर लेते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने समय-श्रम व सूझ-बूझ को विषम स्थितियों की प्रतिक्रियाओं को समेटने-बटोरने में ही लगाकर रह जाते हैं। उससे आगे की मनोभूमि के व्यक्ति वे होते हैं, जो प्रतिक्रियाओं को नहीं मूल कारणों को देखते हैं तथा उन्हें ही ठीक करने के लिए दमखम के साथ उतर पड़ते हैं। समय-श्रम और सूझ-बूझ उनकी भी लगती है, पर एक-एक कदम पर उनकी सार्थकता अधिक-से अधिक होती जाती है। एक कारण का निवारण हो जाने पर उनकी अनेक कठिनाइयाँ अनायास ही सरल होती चली जाती हैं।

🔴 पुरुषार्थ की दिशा यदि सही नहीं है, तो धुआँधार काम करके भी परिणाम ‘नहीं’ के बराबर ही रह जाना स्वाभाविक है। हाय-तौबा मचाते रहना, रोना रोते रहना, दोष किस पर मढ़ें? इसके प्रयास करते रहना भी एक प्रकार का पुरुषार्थ ही तो है, भले ही उसे दिशाविहीन कहा जाय।

🔵 बड़े परिवर्तन सदैव सही दिशा में कार्य करने वाले पुरुषार्थियों द्वारा संभव हुए हैं। महात्मा बुद्ध हों या फिर स्वामी विवेकानन्द; सभी के साथ यह बात लागू होती है। वर्तमान परिवर्तनचक्र भी इससे भिन्न सिद्धांतों पर नहीं चल सकता। जो भी व्यक्ति इस युगपरिवर्तन के लिए की जाने वाली महासाधना के लिए आगे आएँगे, वे सभी इस दिशा में किये गए प्रखर पुरुषार्थ की मर्यादा से ही आगे बढ़ेंगे। जिनमें समझदारी का अंश है, उन्हें अवश्यंभावी परिवर्तन तथा उसकी आवश्यक शर्तों पर ध्यान देते हुए आज ही अपने पुरुषार्थ की सही दिशा तय कर लेनी चाहिए।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 74

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 4)

🌹  हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।

🔵 जीव को परमेश्वर का अंश कहा गया है। जिस प्रकार जल के प्रपात में से पानी के अनेक छोटे-छोटे झरने उत्पन्न होते और विलय होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न जीवधारी परमात्मा में से उत्पन्न होकर उसी में लय होते रहते हैं। आस्तिकता वह शुद्ध दृष्टि है जिसके आधार पर मनुष्य अपने जीवन की रीति-नीति का क्रम ठीक प्रकार बना सकने में समर्थ होता हैं। ‘‘हम ईश्वर के पुत्र हैं, महान् महत्ता, शक्ति एवं सामर्थ्य के पुंज हैं। अपने पिता के उत्तराधिकार में हमें वह प्रतिभा उपलब्ध है, जिससे अपने संबंधित जगत का, समाज एवं परिवार का सुव्यवस्थित संचालन कर सकें।

🔴 ईश्वर की विशेष प्रसन्नता, अनुकंपा एवं सहायता प्राप्त करने के लिए हमें परमेश्वर का आज्ञानुवर्ती धर्म परायण होना चाहिए। प्रत्येक प्राणी में भगवान् व्याप्त है, इसलिए हमें हर किसी के साथ सज्जनता का व्यवहार करना चाहिए। संसार के पदार्थों का निर्माण सभी के लिए है, इसलिए अनावश्यक उपयोग न करें। पाप से बचें, क्योंकि पाप करना अपने ईश्वर के साथ ही दुर्व्यवहार करना है। कर्म का फल ईश्वरीय विधान का अविच्छिन्न अंग है। इसलिए सत्कर्म करें और सुखी रहें, दुष्कर्मों से बचें ताकि दुःख न सहन पड़ें। ये भावनाएँ एवं मान्यताएँ जिसके मन में जितनी ही गहरी होंगी, जो इन्हीं मान्यताओं के अनुरूप अपनी रीति-नीति बना रहा होगा, वह उसी अनुपात में आस्तिक कहलाएगा।’’

🔵 मनुष्य को अनंत प्रतिभा प्रदान करने के उपरांत परमात्मा ने उसकी बुद्धिमत्ता परखने का भी एक विधान बनाया है। उपलब्ध प्रतिभा का वह सदुपयोग कर सकता है या नहीं, यही उसकी परीक्षा है। जो इस परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, उसे वे उपहार मिलते हैं, जिन्हें जीवन मुक्ति, परमपद, अनंत ऐश्वर्य, सिद्धावस्था, ऋषित्व एवं देवत्व आदि नामों से पुकारते हैं, जो असफल होता है, उसे कक्षा में अनुत्तीर्ण विद्यार्थी की तरह एक वर्ष और पढ़ने के लिए चौरासी लाख योनियों का एक चक्कर पूरा करने के लिए रोक लिया जाता है। यह बुद्धिमत्ता की परीक्षा इस प्रकार होती है कि चारों ओर पाप, प्रलोभन, स्वार्थ, लोभ, अहंकार एवं वासना, तृष्णा के शस्त्रों से सज्जित शैतान खड़ा रहता है और दूसरी ओर धर्म, कर्तव्य, स्नेह, संयम की मधुर मुस्कान के साथ विहँसता हुआ भगवान्। इन दोनों में से जीव किसे अपनाता है, यही उसकी बुद्धि की परीक्षा है, यह परीक्षा ही ईश्वरीय लीला है। इसी प्रयोजन के लिए संसार की ऐसी विलक्षणता द्विविधापूर्ण स्थिति बनी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 

👉 उठो! जागो!! और साधक बनो!!!

🔵 ध्यान की गहनता में अदृश्य स्पन्दनों के साथ गुरुदेव की वाणी स्फुरित हो उठी-‘‘उठो! जागो!! और देखो, जैसा बाह्य जगत् है वैसा ही एक अन्तर्जगत् भी है। वत्स! यदि बाह्य जगत् में आश्चर्य है, रहस्य है, विशालता है, सौन्दर्य है, महान् गौरव है तो अन्तर्जगत् में भी अजेय महानता और शक्ति, अवर्णनीय आनन्द तथा शान्ति और सत्य का अचल आधार है। हे वत्स! बाह्य जगत् अन्तर्जगत् का आभास मात्र है और इस अन्तर्जगत् में तुम्हारा सत्यस्वरूप स्थित है। वहाँ तुम शाश्वतता में जीते हो, जबकि बाह्य जगत् समय की सीमा में ही आबद्ध है। वहाँ अनन्त और अपरिमेय आनन्द है, जबकि बाह्य जगत में संवेदनाएँ, सुख तथा दुःख से जुड़ी हुई हैं। वहाँ भी वेदना है, किन्तु अहो, कितनी आनन्दमयी वेदना है। सत्य का पूर्णतः साक्षात्कार न कर पाने के विरह की अलौकिक वेदना और ऐसी वेदना विपुल आनन्द का पथ है।

🔴 आओ, साधक बनो! अपने वृत्ति को इस अन्तर्जगत् की ओर प्रस्तुत करो। वत्स! मेरे प्रति उत्कट प्रेम के पंखों से उड़कर आओ। गुरु और शिष्य के सम्बन्ध से अधिक घनिष्ठ और भी कोई सम्बन्ध है क्या? हे वत्स, मौन! अनिवर्चनीयता!! यही प्रेम का लक्षण है। आन्तरिक मौन की गहन गहराइयों में भगवान् विराजमान हैं। युगसाधना के अनिवार्य कर्त्तव्य को करते हुए अपनी आन्तरिकता को मुझसे जोड़ो। स्वयं को मेरे अलौकिक अस्तित्व से एकाकार करो। जो मैं हूँ, तुम वही बनो। भवगत् पवित्रता के लिए भक्तों के हृदय विभिन्न मन्दिर हैं, जहाँ सुगन्धित धूप की तरह विचार ईश्वर की ओर उठते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, उसका अध्यात्मीकरण कर लो। रूप-अरूप सभी में ब्रह्म का, देवत्व का दर्शन करो। ईश्वर से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है।
  
🔵 अन्तर्गत की अन्तरतम गुहा में, जिसमें व्यक्ति उत्कट गुरुप्रेम या कठोर साधना द्वारा प्रविष्ट होता है, वहाँ ईश्वर सर्वदा सन्निकट हैं। वे भौतिक अर्थ में निकट नहीं, किन्तु आध्यात्मिक अर्थ में हमारी आत्मा के भी आत्मा के रूप में; वे हमारी आत्मा के सारतत्त्व हैं। स्वयं को साधना के लिए समर्पित कर दो। साधना का उज्ज्वलतम रूप गुरुप्रेम है। जितना तुम मेरे प्रेम में डूबते हो, उतना ही तुम मेरे निकट आते हो, क्योंकि मैं अन्तरतम का निवासी हूँ। मैं आत्मा हूँ, विचार या रूप से अछूती आत्मा! मैं अभेद्य, अनिश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ। ब्रह्म हूँ।

🔴 युग सन्धिकाल के इन अन्तिम पलों में समूची मानवता तुम्हारी कठोरतम साधना से झरने वाले अमृत बिन्दुओं की ओर प्यासे चातक की भाँति टकटकी लगाए है। साधना तो वह विरासत है, जो मैंने तुम्हें सौंपी है। इससे प्राप्त होने वाली अनन्तशक्ति तुममें समा जाने के लिए आतुर है।’’ परावाणी की यह गूँज ध्यान के उन्मीलन के बाद भी बनी रही। उनके स्वर अभी भी अन्तर्चेतना में झंकृत हो रहे थे-उठो! जागो!! और साधक बनो!!!

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 72

👉 छूट गयी कमर की बेल्ट और बैसाखी

🔵 बचपन से ही मैं बागवानी का शौकीन रहा हूँ। जब मैं नौकरी पेशा में था, तो मैंने अपने छोटे से आवास को तरह- तरह के फूलों और पौधों से सजा रखा था। व्यस्तताओं से भरे जीवन में भी मैं उन पौधों की देखभाल के लिए समय निकाल ही लेता था।

🔴 एक दिन मैं पौधों में पानी डाल रहा था। छुट्टी का दिन था, सो मैं सोच रहा था कि लगे हाथों बेतरतीबी से बढ़ आए पौधों की कटाई- छँटाई भी कर डालूँ। सभी तरह के औजार पास ही पड़े थे। मैंने कैंची उठाकर छँटाई शुरू कर दी। तभी मेरी नजर उस बेल पर गयी जिसे रस्सियों के सहारे छत पर पहुँचाया गया था।

🔵 एस्बेस्टस की छत पर इस लता ने अपना घना आवरण बिछा रखा था, जिससे गर्मियों में काफी ठण्डक बनी रहती थी, लेकिन धीरे- धीरे यह दीवार के पास ही इतना घना होने लगा कि आसपास की सुन्दरता में बाधक बन गया था। इसकी करीने से छँटाई करने के लिए स्टूल के सहारे दीवार पर चढ़ गया। दीवार मात्र दस इंच चौड़ी थी। सावधानी से दोनों पैर जमाकर मैंने छँटाई शुरू की। रस्सी के चारों ओर बेतरतीबी से फैली हुई लताओं को काटता हुआ अपना हाथ ऊपर की ओर उठाने जा रहा था। मेरी कोशिश थी कि छत के पास तक की छँटाई अच्छी तरह से हो जाए। छत की ऊँचाई को छूने की कोशिश में मेरा संतुलन बिगड़ा और मैं उस पार सड़क पर जा गिरा। गिरते ही पीड़ा से चीख उठा, जिससे आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई। अन्दर से पत्नी दौड़ी आई और मुझे इस तरह पड़ा देख जोर- जोर से रोने लगी और उस बेल को कोसने लगी। लोगों ने मुझे उठाकर बरामदे में पड़े बिछावन पर लिटा दिया। कई बहिनों ने पंखा झलना शुरू किया। दो भाई डॉक्टर बुलाने के लिए दौड़ पड़े। डॉक्टर आए और दवा, इंजेक्शन आदि देकर, मरहम पट्टी कर चले गए। पड़ोस से आए लोग भी एक- एक कर जा चुके थे। मैं पीड़ा से कराहता हुआ गुरुदेव को स्मरण कर रहा था। बीच- बीच में पत्नी के रोने- बिलखने की आवाज से ध्यान बँट जाता।
 
🔴 थोड़ी देर बाद फोन से सूचना पाकर मेरे सम्बन्धी डॉ. विधुशेखर पाण्डेय जी आ पहुँचे। उन्होंने मुझे अपने निजी नर्सिंग होम, आरोग्य निकेतन ले जाने का निर्णय लिया। मेरे लड़के प्रेमांकुर और डॉ. साहब के बीच मोटर साइकिल पर बिठाकर मुझे भगवानपुर ले जाया गया। वहाँ एक्स- रे करने पर पता चला कि दाएँ पैर की एड़ी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई है। दूसरे दिन अस्थि विशेषज्ञ डॉ. ए.के. सिंह को भी दिखाया गया। पैर में सूजन हो गई थी, इसलिए तत्काल प्लास्टर न कर कच्चा प्लास्टर चढ़ाया गया। एक सप्ताह बाद पक्का प्लास्टर हुआ। चिकित्सक के निर्देशानुसार डेढ़ माह तक पूरी तरह बिस्तर पर रहना था। इतनी लम्बी अवधि तक निकम्मों की तरह पड़े रहना होगा, यह सोच- सोचकर जीवन भार- सा लगने लगा। शौचादि क्रिया भी बिस्तर पर लेटे- लेटे ही करनी थी। सेवा सुश्रुषा के लिए पत्नी भी अस्पताल चली आईं।
 
🔵 निरंतर डेढ़ माह तक लेटे रहने से रीढ़ एवं कमर के नीचे बैक सोर हो गया था। निर्धारित समय पर प्लास्टर कटा और मैं बैसाखी- इंकलेट, कमर के ऊपर लगने वाले लोहे के प्लेट युक्त विशेष बेल्ट के सहारे चलनेफिरने लगा। फिर भी मन में इतना संतोष तो था ही कि गुरुवर की अनुकम्पा से मैं अपाहिज होने से बच गया। तीन दिन बाद घर आ गया। एक दिन गुरुजी ने स्वप्र में दर्शन दिए और मुझे शान्तिकुञ्ज जाने को कहा। उसी अवस्था में मैंने जाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं।
 
🔴 २ मई २००७ को मैं शान्तिकुंज आ गया। यहाँ आते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर में कोई पीड़ा, कोई क्लेश है ही नहीं। यहाँ आने के एक माह बाद एक दिन शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता आदरणीय अमल कुमार दत्ता, एम.एस. ने मेरी शारीरिक परेशानियों के सम्बन्ध में विस्तार से जानकारी ली। एक्स- रे करवाया और रिपोर्ट देखकर बोले- अब बगैर छड़ी बेल्ट, इन्कलेट के चलने की आदत डालें। मुझे असमंजस में देखकर उन्होंने आश्वस्त किया, चिंता न करें- गुरुदेव सब अच्छा ही करेंगे।
 
🔵 मैंने उसी समय आँखें बन्द करके पूज्य गुरुदेव का स्मरण किया। बेल्ट, इन्क्लेट उतारे, छड़ी को बगल में दबाया और पूज्य गुरुदेव की समाधि की ओर बढ़ चला। तब से लेकर आज तक मिशन के काम से तीसरी मंजिल पर बने ढेर सारे विभागों के कार्यालयों तक जाने- आने के लिए हर रोज सैकड़ों सीढ़ियाँ आराम से चढ़ता उतरता हूँ। सब पूज्यवर की ही कृपा है।

🌹 डी.एन. त्रिपाठी पूर्व जोन, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/gai

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 17 May 2017


👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...